Saturday, April 11, 2026
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मुज्जफरपुर कांड : सिर्फ शोर मत बचाइए, जमीन पर जाकर काम भी कीजिए

आपने राक्षस देखे हैं….और राक्षसों के आगे घुटने टेकते राजा देखे हैं…..? आपने कलियों को असमय जमीन पर टूटते और कुचले जाते देखा है….पहला वाकया याद करने के लिए आपको पुराणों में झाँकने की जरूरत नहीं है…आपको किसी रामायण और महाभारत को देखने की जरूरत भी नहीं है….हमारा समय इतना बेरहम समय है कि आपको अब रावण और कंस की बुराई करने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि वह राक्षस हमारे और आपके पास ही हैं….अगर आपने सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से बिहार के मुज्जफरपुर कांड की तस्वीरें देखीं तो वहाँ पर बृजेश ठाकुर के चेहरे पर तैरती खौफनाक हँसी को देखिए….राक्षस शायद इससे भी नर्मदिल ही होंगे। हैरत की बात यह है कि इस मुद्दे पर सीएम नीतीश कुमार भी खामोश हैं। राजनीति की बात छोड़िए…राजनेता तो पहले से ही बदनाम हैं। उनके कर्तव्य वे कितने निभाते हैं….सबको पता है मगर इससे क्या हमारी जिम्मेदारी कम होती है। कलियाँ मसली जातीं रहीं, टूटती रहीं और हम तमाशा देखते रहे..जनाब…वह इस देश की तकदीर थी जो तोड़ी जा रही थी।

इतने लम्बे समय से आस – पास के लोगों का खामोश रहना….ये क्या दर्शाता है? इससे भी शर्मनाक यह कि इसमें भी औरतें शामिल हैं…आखिर क्यों नहीं मंत्री को तब तक बर्खास्त किया जाता, जब तक उनके पति बेदाग न निकलें…ऐसी कौन सी मजबूरी है? एक आदमी 300 प्रतियाँ अखबार की छापकर किस तरह लाखों के विज्ञापन पा लेता है और स्वयंसेवी संस्थाओं पर निगरानी करने के लिए कोई आयोग क्यों नहीं है और अगर है तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या बृजेश के करीबी पत्रकार भी कुछ नहीं जानते थे और अब पत्रकार खबरों से इतर कोई कदम क्यों नहीं उठा रहे हैं? क्या गारण्टी है कि भविष्य में किसी और राज्य से इस तरह के कृत्य सामने नहीं आयेंगे। बिहार में जुवेनाइल कोर्ट के लिए भी अदालतों को क्यों कहना पड़ रहा है? बिहार के साहित्यकार…बुद्धिजीवी क्या कर रहे हैं… चिन्ता मुज्जफरपुर के लिए नहीं है….देश भर में फैले ऐसे होम्स के लिए है…क्या आपको नहीं लगता कि निगरानी में चूक हुई?

इस कांड को लेकर बिहार की छवि निश्चित रूप से खराब हुई है तो ऐसे में आप बिहार को ब्रांड कैसे बनाने जा रहे हैं, नीतीश बाबू? आज तेजस्वी तंज कस रहे हैं तो क्या यह खेल उनके जमाने से नहीं चला आ रहा था मगर सब के सब ब्लेम गेम खेलने में व्यस्त हैं…जब कुछ हो जाता है, तभी बुद्धिजीवी या साहित्यकार क्यों उतरते हैं…यह मेरी समझ के बाहर है। अचानक बिहारी होने पर उनको शर्म आने लगती है…मगर क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है कि जमीनी स्तर पर जाकर ऐसे इलाकों में काम करें? जरूरी है कि त्वरित अदालतों के साथ जुवैनाइल कोर्ट भी हों…शेल्टर होम्स पूरी तरह संस्थाओं के भरोसे न छोड़े जायें और सभी दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई ही न हो बल्कि बच्चियों के पुनर्वास की व्यवस्था भी की जाए…वरना ऐसे कांड होते रहेंगे और आप रैलियों के सिवा कुछ नहीं कर सकेंगे। सिर्फ शोर मत बचाइए, जमीन पर जाकर काम भी कीजिए

राष्ट्रीयता

1934 को ‘हंस’ में प्रकाशित प्रेमचंद का यह लेख बेहद प्रासंगिक हो गया है।

मुंशी प्रेमचंद

यह तो हम पहले भी जानते थे और अब भी जानते हैं कि साधारण भारतवासी राष्ट्रीयता का अर्थ नहीं समझता, और यह भावना जिस जागृति और मानसिक उदारता से उत्पन्न होती है, वह अभी हम में बहुत थोड़े आदमियों में आई है। लेकिन इतना जरूर समझते थे कि जो पत्रों के संपादक हैं, राष्ट्रीयता पर लंबेे-लंबे लेख लिखते हैं और राष्ट्रीयता की वेदी पर बलिदान होने वालों की तारीफों के पुल बांधते हैं, उनमें जरूर यह जागृति आ गई है और वह जात-पांत की बेडि़यों से मुक्त हो चुके हैं, लेकिन अभी हाल में ‘भारत’ में एक लेख देखकर हमारी आंखें खुल गईं और यह अप्रिय अनुभव हुआ कि हम अभी तक केवल मुंह से राष्ट्र-राष्ट्र का गुल मचाते हैं, हमारे दिलों में अभी वही जाति-भेद का अंधकार छाया हुआ है।
और यह कौन नहीं जानता कि जाति भेद और राष्ट्रीयता दोनों में अमृत और विष का अंतर है। यह लेख किन्हीं ‘निर्मल’ महाशय का है और यदि यह वही ‘निर्मल’ हैं, जिन्हें श्रीयुत ज्योतिप्रसाद जी ‘निर्मल’ के नाम से हम जानते हैं, तो शायद वह ब्राह्मण हैं। हम अब तक उन्हें राष्ट्रवादी समझते थे, पर ‘भारत’ में उनका यह लेख देखकर हमारा विचार बदल गया, जिसका हमें दुख है. हमें ज्ञात हुआ कि वह अब भी उन पुजारियों का, पुरोहितों का और जनेऊधारी लुटेरों का हिंदू समाज पर प्रभुत्व बनाए रखना चाहते हैं जिन्हें वह ब्राह्मण कहते हैं पर हम उन्हें ब्राह्मण क्या, ब्राह्मण के पांव का धूल भी नहीं समझते।
‘निर्मल’ की शिकायत है कि हमने अपनी तीन-चौथाई कहानियों में ब्राह्मणों को काले रंगों में चित्रित करके अपनी संकीर्णता का परिचय दिया है जो हमारी रचनाओं पर अमिट कलंक है। हम कहते हैं कि अगर हममें इतनी शक्ति होती, तो हम अपना सारा जीवन हिंदू-जाति को पुरोहितों, पुजारियों, पंडों और धर्मोपजीवी कीटाणुओं से मुक्त कराने में अर्पण कर देते।
हिंदू-जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल हैं, जो एक विशाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है, और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है. राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, समाज में साम्य-भाव का दृढ़ होना। इसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जब तक यहां एक दल, समाज की भक्ति, श्रद्धा, अज्ञान और अंधविश्वास से अपना उल्लू सीधा करने के लिए बना रहेगा, तब तक हिंदू समाज कभी सचेत न होगा। और यह दल दस-पांच लाख व्यक्तियों का नहीं है, असंख्य है। उसका उद्यम यही है कि वह हिंदू जाति को अज्ञान की बेडि़यों में जकड़ रखे, जिससे वह जरा भी चूं न कर सके. मानो आसुरी शक्तियों ने अंधकार और अज्ञान का प्रचार करने के लिए स्वयंसेवकों की यह अनगिनत सेना नियत कर रखी है।
अगर हिंदू समाज को पृथ्वी से मिट नहीं जाना है, तो उसे इस अंधकार-शासन को मिटाना होगा। हम नहीं समझते, आज कोई भी विचारवान हिंदू ऐसा है, जो इस टकेपंथी दल को चिरायु देखना चाहता हो, सिवाय उन लोगों के जो स्वयं उस दल में हैं और चखौतियां कर रहे हैं। निर्मल, खुद शायद उसी टकेपंथी समाज के चौधरी हैं, वरना उन्हें टकेपंथियों के प्रति वकालत करने की जरूरत क्यों होती? वह और उनके समान विचारवाले उनके अन्य भाई शायद आज भी हिंदू समाज को अंधविश्वास से निकलने नहीं देना चाहते, वह राष्ट्रीयता की हांक लगाकर भी भावी हिंदू समाज को पुरोहितों और पुजारियों ही का शिकार बनाए रखना चाहते हैं।

मगर हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि हिंदू-समाज उनके प्रयत्नों और सिरतोड़ कोशिशों के बावजूद अब आंखें खोलने लगा है और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि जिन कहानियों को ‘निर्मल’ जी ब्राह्मण-द्रोही बताते हैं, वह सब उन्हीं पत्रिकाओं में छपी थीं, जिनके संपादक स्वयं ब्राह्मण थे। मालूम नहीं ‘निर्मल’ जी ‘वर्तमान’ के संपादक श्री रमाशंकर अवस्थी, ‘सरस्वती’ के संपादक श्री देवीदत्त शुक्ल, ‘माधुरी’ के संपादक पं. रूपनारायण पांडे, ‘विशाल भारत’ के संपादक श्री बनारसीदास चतुर्वेदी आदि सज्जनों को ब्राह्मण समझते हैं या नहीं, पर इन सज्जनों ने उन कहानियों को छापते समय जरा भी आपत्ति न की थी। वे उन कहानियों को आपत्तिजनक समझते, तो कदापि न छापते. हम उनका गला तो दबा न सकते थे। मुरव्वत में पड़कर भी आदमी अपने धार्मिक विश्वास को तो नहीं त्याग सकता।
ये कहानियां उन महानुभावों ने इसीलिए छापीं, कि वे भी हिंदू समाज को टकेपंथियों के जाल से निकालना चाहते हैं, वे ब्राह्मण होते हुए भी इस ब्राह्मण जाति को बदनाम करने वाले जीवों का समाज पर प्रभुत्व नहीं देखना चाहते. हमारा खयाल है कि टकेपंथियों से जितनी लज्जा उन्हें आती होगी, उतनी दूसरे समुदायों को नहीं आ सकती, क्योंकि यह धर्मोपजीवी दल अपने को ब्राह्मण कहता है। हम कायस्थ कुल में उत्पन्न हुए हैं और अभी तक उस संस्कार को न मिटा सकने के कारण किसी कायस्थ को चोरी करते या रिश्वत लेते देखकर लज्जित होते हैं। ब्राह्मण क्या इसे पसंद कर सकता है, कि उसी समुदाय के असंख्य प्राणी भीख मांगकर, भोले-भाले हिंदुओं को ठगकर, बात-बात में पैसे वसूल करके, निर्लज्जता के साथ अपने धर्मात्मापन का ढोंग करते फिरें। यह जीवन व्यवसाय उन्हीं को पसंद आ सकता है, जो खुद उसमें लिप्त हैं और वह भी उसी वक्त तक, जब तक कि उनकी अंधस्वार्थ भावना प्रचंड है और भीतर की आंखें बंद हैं।
आंखें खुलते ही वह उस व्यवसाय और उस जीवन से घृणा करने लगेंगे। हम ऐसे सज्जनों को जानते हैं, जो पुरोहित कुल में पैदा हुए, पर शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद उन्हें वह टकापंथपन इतना जघन्य जान पड़ा कि उन्होंने लाखों रुपए साल की आमदनी पर लात मार स्कूल में अध्यापक होना स्वीकार कर लिया। आज भी कुलीन ब्राह्मण पुरोहितपन और पुजारीपन को त्याज्य समझता है और किसी दशा में भी यह निकृष्ट जीवन अंगीकार न करेगा। ब्राह्मण वह है, जो निस्पृह हो, त्यागी हो और सत्यवादी हो. सच्चे ब्राह्मण महात्मा गांधी, मदनमोहन मालवीय जी हैं, नेहरू हैं, सरदार पटेल हैं, स्वामी श्रद्धानंद हैं। वह नहीं जो प्रातःकाल आपके द्वार पर करताल बजाते हुए- ‘निर्मलपुत्र देहि भगवान’ की हांक लगाने लगते हैं, या गणेश-पूजा और गौरी पूजा और अल्लम-गल्लम पूजा पर यजमानों से पैसे रखवाते हैं, या गंगा में स्नान करने वालों से दक्षिणा वसूल करते हैं, या विद्वान होकर ठाकुर जी और ठकुराइन जी के श्रृंगार में अपना कौशल दिखाते हैं, या मंदिरों में मखमली गावतकिये लगाये वेश्याओं का नृत्य देखकर भगवान से लौ लगाते हैं।
हिंदू बालक जब से धरती पर आता है और जब तक वह धरती से प्रस्थान नहीं कर जाता, इसी अंधविश्वास और अज्ञान के चक्कर में सम्मोहित पड़ा रहता है और नाना प्रकार के दृष्टांतों से मनगढ़ंत किस्से कहानियों से, पुण्य और धर्म के गोरखधंधों से, स्वर्ग और नरक की मिथ्या कल्पनाओं से, वह उपजीवी दल उनकी सम्मोहनावस्था को बनाए रखता है. और उनकी वकालत करते हैं हमारे कुशल पत्रकार ‘निर्मल’ जी, जो राष्ट्रवादी हैं। राष्ट्रवाद ऐसे उपजीवी समाज को घातक समझता है और समाजवाद में तो उसके लिए स्थान ही नहीं। और हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय.
उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे, या सभी हरिजन होंगे। कुछ मित्रों की यह राय हो सकती है कि माना टकेपंथी समाज निकृष्ट है, त्याज्य है, पाखंडी है, लेकिन तुम उसकी निंदा क्यों करते हो, उसके प्रति घृणा क्यों फैलाते हो, उसके प्रति प्रेम और सहानुभूति क्यों नहीं दिखलाते, घृणा तो उसे और भी दुराग्रही बना देती है और फिर उसके सुधार की संभावना भी नहीं रहती। इसके उत्तर में हमारा यही नम्र निवेदन है कि हमें किसी व्यक्ति या समाज से कोई द्वेष नहीं, हम अगर टकेपंथीपन का उपहास करते हैं, तो जहां हमारा एक उद्देश्य यह होता है कि समाज में से ऊंच-नीच, पवित्र-अपवित्र का ढोंग मिटावें, वहां दूसरा उद्देश्य यह भी होता है कि टकेपंथियों के सामने उनका वास्तविक और कुछ अतिरंजित चित्र रखें, जिसमें उन्हें अपने व्यवसाय, अपनी धूर्तता, अपने पाखंड से घृणा और लज्जा उत्पन्न हो, और वे उसका परित्याग कर ईमानदारी और सफाई की जिंदगी बसर करें और अंधकार की जगह प्रकाश के स्वयंसेवक बन जाएं।
‘ब्रह्मभोज’ और ‘सत्याग्रह’ नामक कहानियों ही को देखिए, जिन पर ‘निर्मल’ जी को आपत्ति है। उन्हें पढ़ कर क्या यह इच्छा होती है कि चौबे जी या पंडित जी का अहित किया जाए? हमने चेष्टा की है कि पाठक के मन में उनके प्रति द्वेष न उत्पन्न हो, हां परिहास द्वारा उनकी मनोवृत्ति दिखाई है। ऐसे चौबों को देखना हो, तो काशी या वृंदावन में देखिए और ऐसे पंडितों को देखना हो तो, वर्णाश्रम स्वराज्य संघ में चले जाइए, और निर्मल जी पहले ही उस धर्मात्मा दल में नहीं जा मिले हैं, तो अब उन्हें चटपट उस दल में जा मिलना चाहिए, क्योंकि वहां उन्हीं की मनोवृत्ति के महानुभाव मिलेंगे। और वहां उन्हें मोटेराम जी के बहुत से भाई-बंधु मिल जाएंगे, जो उनसे कहीं बड़े सत्याग्रही होंगे. हमने कभी इस समुदाय की पोल खोलने की चेष्टा नहीं की, केवल मीठी चुटकियों से और फुसफुसे परिहास से काम लिया, हालांकि जरूरत थी बर्नाड शॉ जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति की, जो घन से चोट लगाता है।
हिंदू बालक जब से धरती पर आता है और जब तक वह धरती से प्रस्थान नहीं कर जाता, इसी अंधविश्वास और अज्ञान के चक्कर में सम्मोहित पड़ा रहता है और नाना प्रकार के दृष्टांतों से मनगढ़ंत किस्से कहानियों से, पुण्य और धर्म के गोरखधंधों से, स्वर्ग और नरक की मिथ्या कल्पनाओं से, वह उपजीवी दल उनकी सम्मोहनावस्था को बनाए रखता है।
निर्मल जी को इस बात की बड़ी फिक्र है कि आज के पचास साल बाद के लोग जो हमारी रचनाएं पढ़ेंगे, उनके सामने ब्राह्मण समाज का कैसा चित्र होगा और वे हिंदू समाज से कितने विरक्त हो जाएंगे। हम पूछते हैं कि महात्मा गांधी के हरिजन आंदोलन को लोग आज के एक हजार साल के बाद क्या समझेंगे? यह कि हरिजनों को ऊंची जाति के हिंदुओं ने कुचल रखा था। हमारे लेखों से भी आज के पचास साल बाद लोग यही समझेंगे कि उस समय हिंदू समाज में इसी तरह के पुजारियों, पुरोहितों, पंडों, पाखंडियों और टकेपंथियों का राज था और कुछ लोग उनके इस राज को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न कर रहे थे। निर्मल जी इस समुदाय को ब्राह्मण कहें, हम नहीं कह सकते।
हम तो उसे पाखंडी समाज कहते हैं, जो अब निर्लज्जता की पराकाष्ठा तक पहुंच चुका है। ऐतिहासिक सत्य चुप-चुप करने से नहीं दब सकता। साहित्य अपने समय का इतिहास होता है, इतिहास से कहीं अधिक सत्य। इसमें शर्माने की बात अवश्य है कि हमारा हिंदू समाज क्यों ऐसा गिरा हुआ है और क्यों आंखें बंद करके धूर्तों को अपना पेशवा मान रहा है और क्यों हमारी जाति का एक अंग पाखंड को अपनी जीविका का साधन बनाए हुए है, लेकिन केवल शर्माने से तो काम नहीं चलता. इस अधोगति की दशा सुधार करना है। इसके प्रति घृणा फैलाइए, प्रेम फैलाइए, उपहास कीजिए या निंदा कीजिए सब जायज है और केवल हिंदू-समाज के दृष्टिकोण से ही नहीं जायज है, उस समुदाय के दृष्टिकोण से भी जायज है, जो मुफ्तखोरी, पाखंड और अंधविश्वास में अपनी आत्मा का पतन कर रहा है और अपने साथ हिंदू-जाति को डुबोए डालता है।
हमने अपने गल्पों में इस पाखंडी समुदाय का यथार्थ रूप नहीं दिखाया है, वह उससे कहीं पतित है, उसकी सच्ची दशा हम लिखें, तो शायद निर्मल जी को तो न आश्चर्य होगा, क्योंकि वह उसी समुदाय के एक व्यक्ति हैं, लेकिन हिंदू समाज की जरूर आंखें खुल जाएंगी, मगर यह हमारी कमजोरी है कि बहुत सी बातें जानते हुए भी उनके लिखने का साहस नहीं रखते और अपने प्राणों का भय भी है, क्योंकि यह समुदाय कुछ भी कर सकता है। शायद इस सांप्रदायिक प्रसंग को इसीलिए उठाया भी जा रहा है कि पंडों और पुरोहितों को हमारे विरुद्ध उत्तेजित किया जाए। निर्मल जी ने हमें ‘आदर्शवाद’ और कला के विषय में भी कुछ उपदेश देने की कृपा की है, पर हम यह उपदेश ऐसों से ले चुके हैं, जो उनसे कहीं ऊंचे हैं। आदर्शवाद इसे नहीं कहते कि अपने समाज में जो बुराइयां हों, उनके सुधार के बदले उनपर परदा डालने की चेष्टा की जाए, या समाज को एक लुटेरे समुदाय के हाथों लुटते देखकर जबान बंद कर ली जाए। आदर्शवाद का जीता-जागता उदाहरण हरिजन-आंदोलन हमारी आंखों के सामने है। निर्मल जी जबान में तो इस आंदोलन के विरुद्ध कुछ कहने का साहस नहीं रखते, लेकिन उनके दिल में घुसकर देखा जाए तो मंदिरों का खुलना और मंदिरों के ठेकेदारों के प्रभुत्व का मिटना, उन्हें जहर ही लग रहा होगा, मगर बेचारे मजबूर हैं, क्या करें?
निर्मल जी हमें ब्राह्मण द्वेषी बता कर संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने हमें हिंदू द्रोही भी सिद्ध किया है, क्योंकि हमने अपनी रचनाओं में मुसलमानों को अच्छे रूप में दिखाया है, तो क्या आप चाहते हैं, हम मुसलमानों को भी उसी तरह चित्रित करें, जिस तरह पुरोहितों और पाखंडियों को करते हैं? हमारी समझ में मुसलमानों से हिंदू जाति को उसकी शतांश हानि नहीं पहुंची है, जितनी इन पाखंडियों के हाथों पहुंची और पहुंच रही है। मुसलमान हिंदू को अपना शिकार नहीं समझता, उसकी जेब से धोखा देकर और अश्रद्धा का जादू फैलाकर कुछ ऐंठने की फिक्र नहीं करता।
फिर भी मुसलमानों को मुझसे शिकायत है कि मैंने उनका विकृत रूप खींचा है। हम ऐसे मुसलमान मित्रों के खत दिखा सकते हैं, जिन्होंने हमारी कहानियों में मुसलमानों के प्रति अन्याय दिखाया है। हमारा आदर्श सदैव से यह रहा है कि जहां धूर्तता और पाखंड और सबलों द्वारा निर्बलों पर अत्याचार देखो, उसको समाज के सामने रखो, चाहे हिंदू हो, पंडित हो, बाबू हो, मुसलमान हो, या कोई हो।
इसलिए हमारी कहानियों में आपको पदाधिकारी, महाजन, वकील और पुजारी गरीबों का खून चूसते हुए मिलेंगे, और गरीब किसान, मजदूर, अछूत और दरिद्र उनके आघात सहकर भी अपने धर्म और मनुष्यता को हाथ से न जाने देंगे, क्योंकि हमने उन्हीं में सबसे ज्यादा सच्चाई और सेवा भाव पाया है। और यह हमारा दृढ़ विश्वास है कि जब तक यह सामुदायिकता और सांप्रदायिकता और यह अंधविश्वास हम में से दूर न होगा, जब तक समाज को पाखंड से मुक्त न कर लेंगे तब तक हमारा उद्धार न होगा।
हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि सामाजिक जुए से भी, इस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है, और हमें आश्चर्य होता है कि निर्मल जी और उनकी मनोवृत्ति के अन्य सज्जन कैसे इस पुरोहिती शासन का समर्थन कर सकते हैं। उन्हें खुद इस पुरोहितपन को मिटाना चाहिए, क्योंकि वह राष्ट्रवादी हैं। अगर कोई ब्राह्मण, कायस्थों के करारदाद की, उनके मदिरा सेवन की, या उनकी अन्य बुराइयों की निंदा करे, तो मुझे जरा भी बुरा न लगेगा। कोई हमारी बुराई दिखाए और हमदर्दी से दिखाए, तो हमें बुरा लगने या दांत किटकिटाने का कोई कारण नहीं हो सकता।
मिस मेयो ने जो बुराइयाँ दिखाई थीं उनमें उसका दूषित मनोभाव था। वह भारतीयों को स्वराज्य के अयोग्य सिद्ध करने के लिए प्रमाण खोज रही थीं। क्या निर्मल जी मुझे भी ब्राह्मण-द्रोही, हिंदू-द्रोही की तरह स्वराज्य-द्रोही भी समझते हैं?
अंत में मैं अपने मित्र निर्मल जी से बड़ी नम्रता के साथ निवेदन करूंगा कि पुरोहितों के प्रभुत्व के दिन अब बहुत थोड़े रह गए हैं और समाज और राष्ट्र की भलाई इसी में है कि जाति से यह भेद-भाव, यह एकांगी प्रभुत्व, यह खून चूसने की प्रवृत्ति मिटाई जाए, क्योंकि जैसा हम पहले कह चुके हैं, राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्णव्यवस्था, ऊंच-नीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है। इस तरह के लेखों से आपको आपके पुरोहित भाई चाहे अपना हीरो समझें और मंदिर के महंतों और पुजारियों की आप पर कृपा हो जाए, लेकिन राष्ट्रीयता को हानि पहुंचती है और आप राष्ट्र-प्रेमियों की दृष्टि में गिर जाते हैं। आप यह ब्राह्मण समुदाय की सेवा नहीं, उसका अपमान कर रहे हैं।

भगवान शिव के त्रिशूल पर जो टिकी है…वह है काशी

वाराणसी जिसे बनारस या काशी भी कहा जाता है, एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्‍थल है। यह शहर गंगा नदी के तट पर उत्तर प्रदेश में स्थित है। यह विश्‍व का वैसा प्राचीनतम शहर है जहां प्राचीन काल से ही लोग लगातार निवास करते आ रहे हैं। इसका उल्‍लेख प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्‍वेद में भी मिलता है। इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है। वाराणसी हजारों सालों से उत्तरी भारत का धर्म और संस्‍कृति का केंद्र रहा है। महाभारत में भी इसका जिक्र मिलता है क्योंकि भीष्म जिन तीन कन्याओं, अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का हरण कर ले गये थे, वे तीनों राजकुमारियाँ काशी की ही थीं।
वाराणसी ने अपने ढ़ंग का शास्‍त्रीय ‘हिन्‍दुस्‍तानी संगीत’ वि‍कसित किया। इसने अनेक विशिष्‍ट दार्शनिक, कवि, ले‍खक तथा संगीतज्ञ पैदा किया है। कबीर, रविदास, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल तथा उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान यहीं के थे। प्रसिद्व सितार वादक तथा बांसुरी वादक पंडित रविशंकर और हरिप्रसाद चौरसिया भी बनारस के ही रहने वाले है। इसके अलावा बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय भी यहीं है। तुलसीदास ने अपनी प्रसिद्ध पुस्‍तक रामचरितमानस की रचना यहीं की थी।

वाराणसी से संबंधित अनुश्रुतियां तथा पौराणिक क‍थाएं –
विश्‍वास किया जाता है कि गंगा नदी के तट पर बसे इस शहर को ही भगवान शिव ने पृथ्‍वी पर अपना स्‍थायी निवास बनाया था। यह भी माना जाता है कि काशी का निर्माण सृष्टि रचना के प्रारम्भिक चरण में ही हुआ था। यह शहर प्रथम ज्‍योर्तिलिंग का भी शहर है।

काशी विश्वनाथ मंदिर

पुराणों में काशी को ब्रह्मांड का केंद्र बताया गया है तथा यह भी कहा गया है यहां के कण-कण में शिव निवास करते हैं। वाराणसी के लोगों के अनुसार, ” काशी के कंकर में शिवशंकर हैं।” इनके कहने का अर्थ यह है कि यहां के प्रत्‍येक पत्‍थर में शिव का निवास है।
काशी को ‘महाश्‍मशान’ के नाम से भी जाना जाता है। इसे पृथ्‍वी का सबसे बड़ा शमशान भूमि माना जाता था। यहां के मर्णिकाघाट तथा हरिश्‍चंद्र घाट को सबसे पवित्र घाट माना जाता है।  प्राचीन काल में विश्‍वास किया जाता था कि यहां जिनका क्रिया कर्म किया जाता है उन्‍हें मोक्ष की प्राप्‍ित होती है। वाराणसी का एक अन्‍य नाम ‘अभिमुक्‍ता’ था। माना जाता है कि इस शहर को भगवान शिव अपने त्रिशूल पर उठाए हुए हैं।

धमोक स्तूप के पास एक बौद्ध मठ

काशी के रूप में वर्णित वाराणसी या बनारस शहर भारत की समृद्ध विरासत को अपने आप में संजोये हुए है। यह प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति, दर्शन, परंपराओं और आध्यात्मिक आचरण का एक आदर्श सम्मिलन केंद्र रहा है। यह सप्त पुरियों यथा प्राचीन भारत के सात पवित्र नगरों में से एक है। बनारस शहर गंगा नदी के किनारे पर स्थित है। गंगा की दो सहायक नदियाँ वरुणा और अस्सी के नाम पर इसका नाम वाराणसी हुआ। काशी- पवित्र शहर, गंगा- पवित्र नदी और शिव – सर्वोच्च भगवान, ये तीनों वाराणसी को एक विशिष्ट स्थान बना देते हैं। आज वाराणसी सांस्कृतिक और पवित्र गतिविधियों का केंद्र है।

श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर
शहर के मुख्य देव भगवान शिव को समर्पितश्री काशी विश्वनाथ मंदिर एक प्रमुख पवित्र आकर्षण है। बारह ज्योतिर्लिंगों में सेएक शिवलिंग इस मंदिर में है। यह प्रकाश का अग्निमय स्तंभ है, जिसके द्वारा भगवान शिवने अपने दिव्य वर्चस्व को चिन्हित किया। ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पृथ्वी की सतहको तोड़ कर स्वर्ग की ओर प्रकाश रूप में चमक रहे हैं। वर्तमान मंदिर इंदौर की रानीअहिल्याबाई होल्कर ने 1776 में बनाया था, हालांकि तत्कालीन समय से पहले भी श्री काशीविश्वनाथ मंदिर अस्तित्व में था। महाराजा रणजीत सिंह द्वारा शिखर को लगभग 800 किलोसोने से जड़वाया गया था, इसलिए इसे वाराणसी में स्वर्ण मंदिर के रूप में भी जाना जाताहै। पिछली शताब्दियों में मंदिर का कई बार पुनर्निर्माण हुआ है। वाराणसी का दूसरा नामपर इस मंदिर के नाम पर काशी है। इस तीर्थ का प्राचीन धार्मिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराणमें भी उल्लेख मिलता है। यहाँ का भक्तिपूर्ण माहौल प्रत्यक्ष रूप से अनुभव होता है।मंदिर की पवित्रता हजारों मील की यात्रा कर आने वाले तीर्थयात्रियों की भक्ति से औरबढ़ती प्रतीत होती है। यहां मंत्रों का जप होता है और घंटियाँ निरंतर बजती रहती है।प्राँगण के भीतर कई छोटे मठ हैं। यहां शिव के बैल नन्दी की एक 2.1 मीटर ऊँची प्रतिमाप्रतिष्ठापित है। वाराणसी की यात्रा के दौरान यहाँ की आरती सबसे ज्यादा प्रभावशालीअनुभवों में से एक है।

अस्सी घाट

ज्ञानवापी: विश्वनाथ मंदिर के बगल स्थित मस्जिद में श्रृंगारगौरी मां की मूर्ति है। मस्जिद के बाहर मंदिर परिसर में विशाल कुंआ है और उसके बाहर विशालकाय नंदी है जो मस्जिद की ओर देख रहा है। यहाँ कुएं का जल लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
काल भैरव: काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। बाबा विश्वनाथ से लगभग एक किमी दूरी पर यह मंदिर स्थित है।
दुर्गाकुंड: आदिशक्ति मां दुर्गा का यह मंदिर पवित्र सरोवर दुर्गाकुंड के किनारे है। मान्यता है कि यहां मां की मूर्ति को स्थापित नहीं किया गया था बल्कि स्वयं प्रकट हुई थी। नवरात्रि में यहां दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।
तुलसी मानस मंदिर: दुर्गाकुंड के नजदीक ही सफेद संगमरमर से बना विशाल तुलसी मानस मंदिर है। भगवान राम को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 1964 में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहां पर बैठकर तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी। मानस मंदिर की दीवारों पर रामचरित मानस की चैपाइयां लिखी है।
संकटमोचन मंदिर: मानस मंदिर से आधा किमी की दूरी पर स्थित संकटमोचन मंदिर हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है। यहां साल में एक बार संगीत समारोह आयोजित होता जिसमें विख्यात कलाकार प्रस्तुति देते हैं।
भारतमाता मंदिर: कैंट स्टेशन से लगभग दो किमी दूर भारत माता को समर्पित यह एक अनोखा मंदिर है। 1936 में इस मंदिर का निर्माण बाबू शिव प्रसाद गुप्त ने करवाया था। मंदिर में अविभाजित भारत का नक्शा बना है। संगमरमर से बने इस नक्शे में, मैदान, नदियों, पहाड़ों और समुद्र को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है। इसके अलावा काशी कई छोटे-बड़े अन्य मंदिर भी हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

बनारस के घाट- बनारस शहर को चंद्राकार घेर हुए गांगा के छोटे-बड़े 84 घाट हैं। अस्सी घाट से लेकर राजघाट तक पैदल घूमने का अपना ही मजा है। अस्सी घाट के नजदीक ही महारानी लक्ष्मीबाई का जन्मस्थल है। आगे दसाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट और भी । सुबह-शाम इन घाटों पर घूमने का अपना ही आनंद है।

बनारस के घाट पर बैठकर सूर्योदय देखना अपने आप में अद्भुद अनुभव है। फिर शाम को गंगा आरती। आध्यात्म और संगीत का अनुपम संगम। सूर्याेदय और गंगा आरती देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग आते हैं।

रामनगर का किला

यहां नाव से भी आरती का आनंद लिया जा सकता है। यहीं बीच में है मणिकर्णिका घाट। जहां से गुजरते हुए बरबस संसार के सबसे बड़े सच से साक्षात्कार होता है। कहते हैं इस महाश्मशान में जिसका अंतिम संस्कार होता है उसे स्वर्ग में जगह मिलती है।
बनारस में चर्च और कई प्रसिद्ध मसि्जद भी हैं। हां, बनारस आएं है तो कबीर की जन्मस्थली, लहरतारा और रविदास मंदिर देखकर ही जाएं।
देव दीपावली : कार्तिक पूर्णिमा के दिन वाराणसी में देव दीपावली मनाई जाती है। यह उत्सव बहुत ही अद्भुत और दुर्लभ है। इस दिन शहर के सभी घाटों को मिट्टी के दीये जलाकर सजाया जाता है।

इस दृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि मानों आकाश के सारे तारे बनारस के घाट पर उतरकर भगवान शिव की महाआरती कर रहे हैं।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय : वाराणसी को ‘सर्वविद्या की राजधनी’ कहा जाता है। महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। 1300 एकड़ में फैला विश्वविद्यालय एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विवि है।

इसके परिसर में स्थित नया विश्वनाथ मंदिर भी अच्छा दर्शनीय स्थल है। यह भव्य मंदिर परिसर की शान है। बनारस जाएं तो यहां जरूर जाएं। दुनिया भर में बीचएयू नाम से प्रसिद्ध इस विवि में देश सहित दुनिया के कई देशों के विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। बनारस में काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विवि और सारनाथ में तिब्बत उच्च शिक्षण संस्थान भी है।

तुलसी मानस मंदिर

भारत कला भवन: काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित यह कला और शिल्प संग्रहालय विश्वभर में प्रसिद्ध है।

यहां 15वीं और 16वीं शताब्दी की कई शिल्पकारियां रखी हैं। इसके साथ ही मुगलकाल तथा अन्य राजाओं के शासन काल की पेंटिंगों का विशाल संग्रह है। इस संग्रहालय में पुराने सिक्कों का भी बहुत अच्छा संग्रह है।
आसपास
रामनगर किला: शहर से 14 किलोमीटर दूर गंगा के पूर्वी किनारे पर महाराजा काशी का किला है। इसका निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने करवाया था। लाल पत्थरों से निर्मित इस किले को संग्रहालय में बदलकर आम जनों के लिए खोल दिया गया है। इस संग्रहालय में राजसी ठाठबाट की तमाम चीजें गाडिय़ां, गहने, कपड़े आदि के अलावा अस्त्र-शस्त्र का विशाल संग्रह है। अपनी तरह का यह एशिया का सबसे बड़ा संग्रहालय है।
सारनाथ : बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए विशेष महत्व रखने वाला यह स्थल कई मायनों में महत्वपूर्ण है। भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश यहीं दिया था।
धमेक स्तूप: यह स्तूप सारनाथ की पहचान है। 43.6 मीटर लम्बा यह स्तूप ईंट और पत्थरों से बना हुआ है। इसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष रखे गए हैं।
मूलगंध कुटी विहार: महात्मा बुद्ध का यह आधुनिक मंदिर महाबोधि सोसाइटी द्वारा बनवाया गया है। जिसमें भगवान बुद्ध की मनमोहक मूर्ति स्थापित है। कुछ पुराने मंदिर यहां जर्जर भी हो चुके हैं जिनका पुनरोद्धार कराया जा रहा है। यहां एक छोटा सा चिडिय़ा घर और पुराने अवशेष हैं।
सारनाथ संग्रहालय: इस संग्रहालय में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अशोक स्तंभ संरक्षित है। इसके अलावा यहां बुद्ध और बोध्सित्व की मूर्तिकला का विशाल और दुर्लभ संग्रह है।

(साभार – काशीयाना डॉट कॉम तथा उत्तर प्रदेश पर्यटन)

पत्रकारिता में सर्वमान्य, अंतिम और शाश्वत कुछ नहीं होता

 

प्रो. जयराम शुक्ल, प्रभारी, रीवां परिसर, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संंचार विश्वविद्यालय

कोलकाता प्रेस क्लब तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा हाल ही में कार्यरत पत्रकारों के लिए तीन दिवसीय पत्रकारिता कार्यशाला आयोजित की गयी थी। कोलकाता प्रेस क्लब तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा हाल ही में कार्यरत पत्रकारों के लिए तीन दिवसीय पत्रकारिता कार्यशाला आयोजित की गयी थी।हमने अपराजिता में सभी वक्तव्य आपके सामने रखे हैं और उम्मीद है कि पत्रकारों के साथ पत्रकारिता के विद्यार्थियों को भी यह एक नयी दिशा देंगे।

कार्यशाला में कुलपति जगदीश उपासने तथा कुलसचिव संजय द्विवेदी  ने बदलते समय की पत्रकारिता और उसकी चुनौतयों पर विस्तृत चर्चा की। विश्वविद्यालय के रीवा परिसर के प्रभारी जयराम शुक्ल ने  लगातार तीन दिनों तक पत्रकारिता के इतिहास, महिलाओं के योगदान, संवाददाता की चुनौतियों और समस्याओं के अतिरिक्त पत्रकारिता और उसकी जरूरतों के बारे में भी बताया। तीसरी और अंतिम कड़ी में पढ़िए प्रो. जयराम शुक्ल के वक्तव्य के कुछ खास अंश 

 

 

हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले लोग पेशेवर नहीं थे, वे साहित्य के लोग थे
मीडिया में हम समाजसेवा के लिए नहीं सृजनात्मकता की चाह के साथ आते हैं। पत्रकारिता का मूल चरित्र हिक्की गजट में दिखता है। इसने पहले ही अंक में पर्दाफाश करना शुरू कर दिया था मगर तब भी उसमें समाज सेवा नहीं थी, आज भी नहीं है। यह विशुद्ध रूप से प्रोफेशन है। हिन्दी को सम्पर्क भाषा बनाने की माँग भी अहिन्दी भाषी प्रदेशों में उठी। आरम्भिक हिन्दी पत्रकारिता पर साहित्य का प्रभाव अधिक दिखता है। हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले लोग पेशेवर नहीं थे, वे साहित्य के लोग थे। हिन्दुस्तान में आज बोली जाने वाली भाषा हिन्दी सबसे युवा भाषा है।
पत्रकारिता एक क्राफ्ट है
पत्रकारिता एक क्राफ्ट है। पत्रकार बिखरे हुए तथ्यों को जोड़कर उसे पठनीय बनाता है। पत्रकार के लिए तथ्यों को लेकर स्पष्ट रहना जरूरी है। उसके पास एक व्यापक दृष्टि होनी चाहिए। हिन्दी सम्वाद और सम्पर्क की भाषा है और यही उसकी खूबी है। पत्रकार के लिए भाषा संवाद का हथियार है और लिपि उसकी संवाहक है। हिन्दी प्रवाहमान भाषा है। बोलियाँ निकाल दें तो उसमें कुछ नहीं बचता। हिन्दी की धारण करने की क्षमता ही उसे विशिष्ट बनाती है।
नवजागरण काल में अखबार राजनीतिक लड़ाई का हथियार था
प्रश्न यह है कि पत्रकारिता का जन्म बंगाल से ही क्यों हुआ? जब किसी को दबाया जाता है तो विद्रोह भी सबसे पहले वहीं से आरम्भ होता है। बंगाल तत्कालीन समय में बहुत सी रूढ़ियों से जकड़ा था और उससे निकलने की छटपटाहट में ही यहाँ सबसे पहले राजनीतिक, साहित्यिक, दार्शनिक चेतना आयी जिसका केन्द्र कलकत्ता था। अँग्रेजी के पत्रकार अँग्रेजों के साथ चले तो हिन्दी के पत्रकार साहित्य के साथ चले और उनका खिंचाव कोलकाता की ओर था। वे जनचेतना, समाज सुधार, राजनीतिक आन्दोलन लेकर चले। अखबार राजनीतिक लड़ाई का हथियार था। अगर राजनीतिक योगदान को छोड़ दें तो महात्मा गाँधी बहुत अच्छे पत्रकार थे। उन्होंने इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया, हरिजन जैसे अखबारों का सम्पादन किया। बाल गंगाधर तिलक ने मराठा और केसरी, गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप जैसे पत्र निकाले। अमृतबाजार पत्रिका के कारण ही वर्नाक्यूलर एक्ट लागू आया। पत्रकारिता इस समय तक यूरोप में प्रोफेशन बन चुकी थी मगर भारत में पत्रकारों को समाज सुधार का माध्यम माना जाता था। इस आभामण्डल से हिन्दी पत्रकारिता आज भी मुक्त नहीं हो सकी है। लोग तब अखबार में सहयोग राशि या चन्दा माँगते थे। उसके बाद मूल्य और अब कीमत शब्द का प्रयोग किया जाने लगा है।
पाठक ग्राहक, फिर रीडर और अब कस्टमर बन गया है
मेल भारतीय संस्कृति में एक पवित्र शब्द है। तब हर अखबार जोड़ता था। आजादी के बाद मेल शब्द का मतलब बदल गया, पाठक ग्राहक, फिर रीडर और अब कस्टमर बन गया है। मिशन प्रोफेशन बन चुका है। आज जो बिल्कुल भी न लिखे, वही योग्य पत्रकार माना जाता है। अँग्रेजी के पत्रकारों को उनकी फेस वैल्यू के कारण अधिक महत्व मिल रहा है। कई बड़े अँग्रेजी पत्रकारों के लेखों का अनुवाद कर हिन्दी अखबारों में छापा जा रहा है। हिन्दी के पत्रकारों को किया जाने वाले भुगतान अँग्रेजी की तुलना में आधा है। हिन्दी के बहुत कम अखबार हैं जो हिन्दी में लिखने वालों को पारिश्रमिक देते हैं।
पत्रकारिता वह है, जो रोज पुराने मानदंडों को तोड़ती हो
भाषा के सन्दर्भ में श्याम रुद्र पाठक का जिक्र आवश्यक है जिन्होंने हिन्दी के लिए आन्दोलन किया। धरना देते रहे और अन्त में कई महीनों के बाद उनको तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। अँग्रेजी आज भी स्टेटस की भाषा मानी जाती है और कॉरपोरेट को हिन्दी उनका माल बेचने के लिए चाहिए। हिन्दी का साहित्य सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखक को साहित्यकार ही नहीं मानता। आरम्भिक दिनों में समालोचकों ने निराला का भी विरोध किया था। किताबें उतनी ही लिखी जा रही हैं जितनी समीक्षकों तक पहुँच सकें। हिन्दी को जनभाषा बनने में अड़चनें डाली जा रही हैं और इस कमी को पूरा किया है हिन्दी के अखबारों ने। जनसत्ता ने हिन्दी अखबारों के प्रति लोगों का नजरिया बदला। राजधानी दिल्ली में इस अखबार ने हिन्दी पत्रकारिता को अँग्रेजी पत्रकारिता के समकक्ष लाकर खड़ा किया। जनसत्ता ने पत्रकारों को सशक्त बनाया। ये वह अखबार था जिसने भोपाल गैस कांड को पहले ही भाँप लिया था। हिन्दी में नवाचार शुरू हुए तो जनता ने भी हाथों -हाथ लिया। अखबारों के लिए गरीबों की कहानी महत्वपूर्ण नहीं है मगर देशबन्धु ने ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में गहरी छाप छोड़ी। पत्रकारिता वह है, जो रोज पुराने मानदंडों को तोड़ती हो।
पत्रकारिता में सर्वमान्य, अंतिम और शाश्वत कुछ नहीं होता
जो पत्रकार होता है, वह जीवन भर पत्रकार रहता है। पत्रकार के लिए अपनी बीट से हटकर भी चीजें जानना जरूरी है। उसे हमेशा अपडेट रहना चाहिए। अगर पत्रकारिता की बात की जाए तो भोपाल का सप्रे सँग्रहालय इस लिहाज से पत्रकारों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता में सर्वमान्य, अंतिम और शाश्वत कुछ भी नहीं होता। संवाददाता न्यूज सेंस का मास्टर होता है। खबरों को सँवारना डेस्क का काम होता है मगर संवाददाता जब अपनी खबर खुद लिखता है तो उसे उपसम्पादक की जिम्मेदारी भी सम्भालनी पड़ती है इसलिए भाषा का ज्ञान बेहद आवश्यक है।
महिलाओं के प्रति समानता तभी होगी, जब आचरण समान होगा
महिलाओं के योगदान की बात करें तो पश्चिम बंगाल नेतृत्व करता है। रतलान की हेमन्त कुमारी देवी ने 1888 में सुगृहिणी नामक पत्रिका का सम्पादन किया। 1856 में भारती नाम की पत्रिका निकली जिसकी सम्पादक स्वर्ण कुमारी देवी थीं। इनका सम्बन्ध टैगोर परिवार से था। सरला देवी ने परम्परा निकाली। हिन्दी पत्रकारिता में भारतेन्दु का बड़ा नाम है। उन्होंने बाल, राजनीतिक पत्रिका निकाली। उन्होंने बाला बोधिनी प्रकाशित की। नवजागरण काल में भी महिलाओं का योगदान है और समानता तभी होगी जब आचरण समान होगा। इस देश में आर्थिक विपन्नता की शिकार सबसे अधिक महिलाएँ ही हैं। तत्कालीन समय में भी बंगाल में महिलाओं की स्थिति बहुत ज्यादा खराब थी और बंगाल में महिलाओं ने सबसे अधिक आवाज बुलन्द की। आशापूर्णा देवी, महाश्वेता देवी इसका उदाहरण हैं मगर 6ठीं शताब्दी के पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। मंडन मिश्र की पत्नी ने आदि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया। आज स्थिति यह है कि महिला आरक्षण का मसला संसद में सत्र के अंतिम दिन उठाया जाता है। पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत सत्य है। जिस दिन किसी पत्रकार ने सत्य का मर्दन किया, उसी दिन आप शून्य हो गये।
पत्रकार अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, प्रेस की मर्यादा और अनुशासन बनाकर रखती है मगर कार्रवाई करने का अधिकार उसे नहीं है। पत्रकारिता आज विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है। उदारीकरण के बाद वैश्वीकरण के दौर में ही जी न्यूज, स्टार न्यूज जैसे चैनल आये। आज हर खबर सन्देह से देखी जा रही है। चैनलों में जो दिखाया जाता है, वह सब पहले से तय होता है। राजनीति भी आज शो बिजनेस हो गयी है। सोशल मीडिया पर डेटा चुराकर आँकड़ों का व्यवसाय किया जा रहा है। फेक अकाउंट और धार्मिक ध्रुवीकरण ट्रोल करने वालों का खेल है। यह ध्रुवीकरण 1984 से चला आ रहा है जब मीडिया, समाचार और चुनाव में हस्तक्षेप हुआ। भ्रामक प्रचार तब भी हो रहा था। पत्रकार अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं। आज मीडिया संस्थानों का एक टारगेट ग्रुप है और वह उनके लिए काम करता है। मीडिया आज कस्बों और ग्रामीण इलाकों के लिए काम नहीं करते। गाँव और किसान अखबारों के केन्द्र में नहीं है। वह आँकड़ों में आता है और तब आता है जब इन आँकड़ों से सत्ता को हिलाया जा सके।
संवाददाता के पास जासूस और अन्वेषक की दृष्टि होना जरूरी है
जोखिम लेने का जज्बा आपको पत्रकार बनाता है। एक संवाददाता जिस दिन पार्टी बन जाता है, उसके भीतर बसा संवाददाता खत्म हो जाता है। रिपोर्ट तथ्यों के साथ रखी जानी चाहिए। संवाददाता को एक वकील भी होना चाहिए। वह हमेशा भावशून्य, निरपेक्ष और तथ्यपूर्ण होता है। खबरों को जस का तस, तथ्यों के साथ रखें। पत्रकार वह है जो खबर की तलाश में कहीं भी जा सकता है। संवेदना के साथ आप संवाददाता नहीं रह सकते मगर वह सम्पादन करता हो तो दोहरी जिन्दगी जीता है। संवाददाता खबर खोजता नहीं बल्कि खबर सूँघता है। जब तक उसकी खोज पूरी नहीं होती, वह किसी पर उंगली नहीं उठाता। वह न्यूजफुल चीजों को देखता चलता है। संवाददाता के पास जासूस और अन्वेषक की दृष्टि होना जरूरी है।
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का दुरुपयोग पत्रकारों ने किया है
समाज के हित में कई खबरों को नजरअन्दाज करना पड़ता है। संवाददाता में लचीलापन होना जरूरी है। खुद को परम ज्ञानी मानने की गलती न करें। पत्रकार की आँख और उसके कान खुले होने चाहिए। उसके लिए सूत्र यानी सोर्स महत्वपूर्ण होते हैं और यह आपके कौशल पर निर्भर करता है। आज का पत्रकार कई सीमाओं में बँधा है। उसके अधिकार आम आदमी से भी कम हैं। पत्रकार के पास पत्रकार होने का प्रमाणपत्र तक नहीं है। यह भी कटु सत्य है कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का दुरुपयोग पत्रकारों ने किया है। श्रमजीवी पत्रकार भी श्रम कानूनों के अन्तर्गत ही आता है।
पत्रकारिता में पुनरावृत्ति एक दोष है

सम्प्रेषणीयता और संवादशैली पत्रकारिता की विशेषता है। कलाकार भी कम्यूनिकेटर होता है। सृजनात्मक लेखन पत्रकारिता से भी जुड़ा होता है। आप सााहित्य से उक्तियाँ ले सकते हैं। सम्पर्क कौशल अभ्यास से आता है। अगर आपके पास शब्द नहीं हैं तो आप बहुत देर तक नहीं बोल सकते। पत्रकारिता में पुनरावृत्ति एक दोष है। निकट भविष्य में सबसे अधिक संकट संवाददाता के सामने ही है। सोशल मीडिया ने लोगों को इतना सशक्त बना दिया है कि उन तक खबर आपके पहुँचाने से पहले पहुँच जा रही है।
अखबार अब विश्लेषण के लिए पढ़े जायेंगे
पत्रिकायें बन्द हो रही हैं। अखबार अब स्पेस सेल कर रहे हैं। बिलखते बच्चे की कहानी को कोई विज्ञापन रिप्लेस कर रहा है। पाठक रीडिंग मटेरियल चाहता है। दैनिक अखबारों के सामने वायरल होती खबरें हैं। अखबार अब फर्स्ट हैंड खबरों के लिए नहीं बल्कि विश्लेषण के लिए पढ़े जायेंगे। इस ट्रेन्ड को 1983 में सबसे पहले जनसत्ता ने भाँपा और उसी के अनुसार बदलाव किये। आज सभी अखबार इसी दिशा में चल रहे हैं। अब कई अखबार खुद को पत्रिका कहने लगे हैं। खबर एक सप्ताह, माह में रंग बदलती है। न्यू मीडिया ने संवाददाता की मेहनत खत्म कर दी है।
आप प्रभावशाली, बोधगम्य लिखेंगे तो आप बाजार पर भारी पड़ेंगे
दो ताकतें हैं जिनमें से एक बाजार को अपने अनुसार बना लेती है और दूसरी जो बाजार के अनुरूप खुद को ढाल लेती हैं। दोनों का अपना महत्व है। नया मीडिया खुद को बाजार के मुताबिक ढालता है मगर यह सत्य है कि आप प्रभावशाली, बोधगम्य लिखेंगे तो आप बाजार पर भारी पड़ेंगे। हमारी अपनी वरीयता है और यह सम्पादक पर निर्भर करता है कि वह किसे खबर मानता है। स्थानीय मुद्दों पर सम्पादकीय बड़ी बात मानी जाती है। अब सम्पादकीय पीछे के पन्नों में आ रहा है। किसी एक दफ्तर में दिन -भर की गतिविधि का आकलन भी खबर बन सकता है।
जिम्मेदार पत्रकार होने के नाते विकल्प और समाधान भी दें
भाषा आपको खुद अर्जित करनी होगी। वह कोई आपको सिखा नहीं सकता है। संवाददाता, लेखक और सम्पादक जितना पढ़ें, उतना अच्छा होगा। फीचर में विश्लेषण के साथ शब्द सामर्थ्य तथ्य को नयापन देकर बेहतर बनाता है। सम्पादकीय अखबार की आत्मा है। इसमें विश्लेषण के साथ एक सन्देश भी होता है। वह तथ्यगत विस्तार व आँकड़ों के साथ आता है। आपको सन्दर्भ जोड़ने होंगे। जिम्मेदार पत्रकार होने के नाते विकल्प और समाधान भी दें।
मुद्रित भविष्य विश्वसनीय और आराधनीय है
फिर भी प्रिंट मीडिया का भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि अक्षर और शब्द हमारी आस्था का प्रश्न हैं। शब्द को ब्रह्म कहा गया है। सिख धर्म तो पूरी तरह गुरु ग्रन्थ साहिब पर आधारित है। अक्षर वह है जिसका क्षरण नहीं होता। वह शाश्वत है। यूरोप में विकास होने के बावजूद बाइबिल अभी भी है। मुद्रित भविष्य विश्वसनीय और आराधनीय है।

जनहित पत्रकारिता की पहली शर्त है

कोलकाता प्रेस क्लब तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा हाल ही में कार्यरत पत्रकारों के लिए तीन दिवसीय पत्रकारिता कार्यशाला आयोजित की गयी थी। यह भाषण कार्यशाला के समापन समारोह में वरिष्ठ पत्रकार तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति  प्रो.  जगदीश उपासने ने दिया था।यह वक्तव्य आपको पत्रकारिता और पत्रकार की जिम्मेदारियों के बारे  में बताता है। उम्मीद है कि पत्रकारों के साथ पत्रकारिता के विद्यार्थियों को भी यह एक नयी दिशा देंगे।  दूसरी कड़ी प्रस्तुत है

प्रो. जगदीश उपासने (कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय)

प्रिंट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने बड़ा संकट है। पाठकों की वफादारी अब किसी एक मीडिया के लिए नहीं है। डिजिटल मीडिया ने चुनौती ही नहीं दी है बल्कि पारम्परिक मीडिया को रिप्लेस भी किया है। आज युवाओं की पसन्द को ध्यान में रखा जा रहा है। उनकी पसन्द को ध्यान में रखकर चैनल आ रहे हैं।

2009 में नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड रिसर्च के मुताबिक न्यूज चैनल पसन्द के मामले में नौवें स्थान पर हैं। अखबार में पहले खेल का पन्ना पढ़ते हैं। सोशल मीडिया ने गेटकीपर के रूप में प्रिंट मीडिया की जिम्मेदारी खत्म कर दी है। खबरों की एक्सक्लूसिवनेस कम हो गयी मगर पत्रकारिता की मूल भावना कभी नहीं बदलती।

पत्रकार के लिए जुड़ना और जोड़ना बहुत जरूरी है। सोशल मीडिया ने यही किया है। अच्छी भाषा हर किसी लिखने वाले सभी को चाहिए। मीडिया की भाषा वही होनी चाहिए जो समाज में बोली जाती है। पत्रकारिता के बुनियादी उसूल कभी नहीं बदलते। खबरों में सच्चाई होनी चाहिए। तथ्य की सत्यता के प्रति आग्रह होना आवश्यक है।
जब हम सम्पादकीय लिखते हैं तो वह सम्बन्धित मीडिया समूह का विचार होगा। प्रेडिक्टेबल मत बनिए क्योंकि होना पत्रकार की साख गिराता है। पत्रकार लोगों को उनके काम की चीज सच्चाई के साथ बताते हैं मगर आज मीडिया की विश्वसनीयता ही सवालों के घेरे में है।
तकनीक आज महत्वपूर्ण है और उसका सही उपयोग करना जरूरी है। पत्रकारों में शिष्टाचार और अनुभवी पत्रकारों के लिए सम्मान होना जरूरी है। याद रखें कि कर्मचारी आप बाद हैं, पहले पत्रकार ही हैं।
हम जनहित के लिए हैं और जनहित पत्रकारिता की पहली शर्त है। मीडिया के सामने विश्‍वसनीनयता और पूँजी का संकट है मगर मैन्यूफक्चर्ड की गयी खबरें या ऐसे मीडिया संस्थान अधिक समय तक नहीं टिकते इसलिए तथ्यपूर्ण सत्य पत्रकारों का हथियार होता है।
अक्षर स्थायी हैं इसलिए प्रिंट मीडिया के भविष्य को लेकर चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मीडिया समाज के सहारे ही सर्वाइव कर सकता है। इंडिया पर ही नहीं, भारत पर भी ध्यान दीजिए।
(पत्रकारिता कार्यशाला के समापन समारोह में दिये गये भाषण के अंश)

अब सूचना से आगे बढ़कर विश्लेषणपरक खबरें देनी होंगी

कोलकाता प्रेस क्लब तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा हाल ही में कार्यरत पत्रकारों के लिए तीन दिवसीय पत्रकारिता कार्यशाला आयोजित की गयी थी। कार्यशाला में कुलपति  प्रो. जगदीश उपासने तथा कुलसचिव   प्रो. संजय  द्विवेदी के साथ विश्वविद्यालय की रीवा परिसर के प्रभारी  प्रो. जयराम शुक्ल ने बदलती पत्रकारिता और उसकी जरूरतों के बारे में बताया। हम अपराजिता में तीनों ही वक्तव्य आपके सामने रख रहे हैं और उम्मीद है कि पत्रकारों के साथ पत्रकारिता के विद्यार्थियों को भी यह एक नयी दिशा देंगे।

पहली कड़ी में प्रस्तुत है, विश्वविद्यालय के कुलसचिव  प्रो. संंजय द्विवेदी का वक्तव्य –

संजय द्विवेदी, कुलसचिव, माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

एक समय था जब पत्रकार कंटेंट तय करते थे। बाकी शहर में में वह बाद में जाता था मगर 1990 के बाद दुनिया बदली। 1991 के बाद उदारीकरण का दौर आया तो जीवन बदला। आज हमारा जीवन वैसा नहीं है जो 90 के दशक में हुआ करता था। आज हम बदले हुए मनुष्य हैं। पूरी दुनिया बदल गयी है और आज मीडिया को बदले हुए समय को सम्बोधित करना है। अब हम खबरों के प्रथम प्रस्तोता नहीं हैं। आज के पत्रकार फॉलो करते हैं क्योंकि खबर तो लोगों को अन्यान्य स्त्रोतों से मिल चुकी होती है। हम खबरें दोहराते हैं। कहा जा रहा है कि 2040 में अमेरिका में अंतिम अखबार छपेगा। अगर नये समय में मीडिया को प्रासंगिक बने रहना है तो सूचना देना काफी नहीं है। अब पत्रकारों को समय से आगे देखना होगा। आज सामान्य संवाददाता की जरूरत खत्म हो चुकी है। अगर बदलते मीडिया के दौर में हम नहीं बदले तो हमारी प्रासंगिकता खत्म हो जायेगी। आज सूचना का विश्लेषण व प्रभाव की जानकारी आवश्यक है। लोग अब अखबार पढ़ नहीं रहे, वे पन्ने पलटते हैं। पहले और अब की पढ़ने की आदतों में बदलाव आया है। अखबार पढ़ने का समय अब सोशल मीडया पर शिफ्ट हो रहा है। पहले लोग कुछ भी पढ़ते, लिखते और सुनते थे मगर अब सम्पादकीय पर भी तस्वीर लगानी पड़ रही है।
आज का समय शॉट्र्स का समय है। 60 और 200 शब्दों में खबरें लिखी जा रही हैं। सोशल मीडिया नहीं होता तो इस सृजनात्मकता का पता नहीं चलता। फेसबुक ने हमें खुद से प्यार करना सिखाया है। आज सूचनायें त्वरित गति से पहुँच रही हैं। आज स्थिति यह है कि हर बड़े अखबार या मीडिया संस्थान को अपना वेब पेज बनाना पड़ रहा है। सूचना को कहने का तरीका बदला है और सम्पादकों का आत्मविश्वास खत्म हो रहा है। अच्छा दिखना महत्वपूर्ण हो गया है। अखबार का पाठक भी दर्शक में बदल गया है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद उससे मुकाबले की होड़ में प्रिंट मीडिया भी अपनी मूल छवि भूलकर टीवी – टीवी खेलने लगा। हम टीवी के शीर्षकों की नकल करने लगे। अखबार में साहित्य कम होने लगा। आज सोशल मीडिया तय करता है कि अखबार क्या लिखेगा। अब न्यूज रूम का माहौल बदल गया है।
अब आपको देखना होगा कि कंटेंट कैसे रखेंगे। शीर्षक तथा इन्ट्रो पर ध्यान देना जरूरी है। हर खबर को 10 अलग दृष्टिकोणों से देखना होगा। आपको घटनाओं से आगे की ओर देखना होगा क्योंकि अब कवरेज और सूचनाओं की जरूरत नहीं रह गयी है। आज ओपिनियन मेकर की जरूरत है। अखबार को बचाना हमारी जिम्मेदारी है। भाषा को बचाने की जरूरत है। अच्छे कंटेंट के साथ अच्छी प्रस्तुति की जरूरत है। व्यक्तित्व की तरह खबरों को सजाने तथा खबरों को अपग्रेड करने की जरूरत है। खबर सजकर नहीं आयेगी तो पढ़ी नहीं जायेगी। खबरों को टुकड़ों में लिखने की आदत डालें। आज सम्पादक का आत्मविश्वास धरातल पर है। सारे अखबार एक जैसे दिख रहे हैं। मुख्य धारा के हाथ में तो चमचमाती हुई स्क्रीन है।
फिर भी उम्मीद है क्योंकि अखबार आज भी हमारे समाज का स्टेटस सिम्बल है मगर स्थिति यह है कि लोग पढ़ना कुछ और चाहते हैं और मँगवाते कुछ और हैं। पहले एक पान की दुकान से एक अखबार से सब पढ़ लिया करते थे और परिवार में भी एक ही अखबार आया करता था। वहीं आज एकल परिवार के दौर में सबके अपने -अपने अखबार हैं। आज हकीकत यह है कि भाषायी अखबार अँग्रेजी अखबारों की तुलना में आगे हैं। अँग्रेजी के आतंक के बावजूद लोगों का अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ाव बचा हुआ है। आज क्षेत्रीय चैनल सारी दुनिया में देखे जा रहे हैं। क्षेत्रीय भाषा वैश्विक होती जा रही है।
भारत में सर्वश्रेष्ठ तकनीक वाले अखबार निकल रहे हैं। क्षेत्रीय अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ रही है। जरूरी है कि अखबार अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व दिखायें। अखबारों में स्थानीयता बनी रहनी चाहिए। भाषा संस्कृति की संवाहक होती है और अखबारों में यह लोकतत्व बने रहना चाहिए।

पत्रकार के लिए जुड़ना और जोड़ना आवश्यक है : जगदीश उपासने

कोलकाता :  माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने ने कहा कि है कि पत्रकारिता की मूल भावना किसी भी सूरत में नहीं बदलती। पत्रकार के लिए जुड़ना और जोड़ना आवश्यक है और सोशल मीडिया भी यही कर रहा है। पत्रकारों को इंडिया पर ही नहीं, भारत की भी बात करनी होगी। कोलकाता प्रेस क्लब द्वारा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल तथा सन्मार्ग के सहयोग से हिन्दी में पत्रकारिता लेखन के कौशल विकास पर तीन दिवसीय कार्यशाला के समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए उपासने ने कहा कि जनहित पत्रकारिता की पहली शर्त है।

मीडिया के सामने विश्‍वसनीनयता और पूँजी का संकट है मगर मैन्यूफक्चर्ड की गयी खबरें या ऐसे मीडिया संस्थान अधिक समय तक नहीं टिकते इसलिए तथ्यपूर्ण सत्य पत्रकारों का हथियार होता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय की रीवां परिसर के प्रभारी जयराम शुक्ल ने कार्यशाला के संचालक के रूप में उनके अनुभव साझा किये। उन्होंने कहा कि अक्षर स्थायी हैं इसलिए प्रिंट मीडिया के भविष्य को लेकर चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। स्वागत भाषण प्रेस क्लब के अध्यक्ष स्नेहाशीष सूर ने दिया। इस अवसर पर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष राज मिठौलिया भी उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन प्रेस क्लब के सचिव किंशुक प्रामाणिक ने दिया। इस कार्यशाला में महानगर के हिन्दी मीडिया समूहों के 40 से अधिक कार्यरत अनुभवी और युवा पत्रकारों ने हिस्सा लिया और सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र दिये गये।

‘सलाम दुनिया सुपर स्टार’ में दिखे बच्चों की बहुरंगी प्रतिभा के अनोखे रंग

कोलकाता : सलाम दुनिया द्वारा आयोजित चित्रांकन प्रतियोगिता में ‘सलाम दुनिया सुपर स्टार’ में बच्चों की प्रतिभा निखरकर सामने आयी। ‘सलाम दुनिया स्टार’ के विजेता बच्चे इस प्रतियोगिता में शामिल हुए और उन्होंने कागज पर कल्पना के रंग बिखेरे। प्रतियोगिता दो समूहों में विभाजित की गयी थी। इसमें प्रथम वर्ग के बच्चों में पहली व दूसरी कक्षा के बच्चों ने भाग लिया। इन बच्चों के लिए विषय का कोई बंधन नहीं रखा गया था। इन बच्चों ने रथयात्रा, छोटा भीम, बारिश, धान के खेत और प्रकृति के मनोरम रंग कागज पर बिखेरे। दूसरे समूह में तीसरी और चौथी कक्षा के बच्चे शामिल थे और इन बच्चों ने स्वच्छ भारत और हरित भारत की कल्पना साकार की।

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में एयर इंडिया के पूर्व अधिकारी तथा लेखक नन्द किशोर प्रसाद उपस्थित थे। उन्होंने बच्चों का उत्साहवर्द्धन करते हुए कहा कि बच्चों की कला देखकर एक बार फिर उनका बचपन लौट आया। उन्होंने कहा कि बच्चों की कल्पना में घृणा के लिए कोई जगह नहीं होती और यही इन चित्रों में दिख रहा है। बच्चों को प्रोत्साहित करने की दिशा में सलाम दुनिया की यह पहल सराहनीय है।

भारतीय भाषा परिषद के निदेशक सह वागर्थ के सम्पादक व कार्यक्रम के प्रधान अतिथि वरिष्ठ आलोचक डॉ. शम्भुनाथ ने बच्चों का उत्साहवर्द्धन करते हुए कहा कि शिक्षकों के साथ अभिभावक और इस कार्यक्रम में अभिभावकों और शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ मीडिया की बड़ी भूमिका है और सलाम दुनिया इस तरह के आयोजन कर यह महत्वपूर्ण काम कर रहा है।

प्रतियोगिता में वर्ग ‘अ’ में डीपीएस मेगासिटी के अन्तरीप मुखर्जी को प्रथम, नेशनल इंग्लिश स्कूल की तनीषा मजुमदार को द्वितीय, डीपीएस मेगासिटी के देवांश नन्दी को तृतीय पुरस्कार मिला।

प्रतियोगिता वर्ग ‘बी’ में अभिनव भारती हाई स्कूल के ऋतोब्रोतो चक्रवर्ती को प्रथम, अभिनव भारती के अर्घ्य पोल्ले को द्वितीय और इसी स्कूल के सौम्यदित्य पाल को तृतीय पुरस्कार मिला।

‘सलाम दुनिया सुपर स्टार’ प्रतियोगिता में अभिनव भारती हाई स्कूल, दिल्ली पब्लिक हाई स्कूल, नेशनल इंग्लिश स्कूल और हरियाणा विद्या मन्दिर के बच्चों ने भाग लिया।

नशा और अवैध तस्करी के विरोध में उतरीं सावित्री गर्ल्स कॉलेज की छात्रायें

कोलकाता : 26 जून को संयुक्त राष्ट्र के नशीले पदाथों के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस के मौके पर सावित्री गर्ल्स कॉलेज की एनएसएस यूनिट, स्टूडेंट्स वेलफेयर कमेटीऔर मेडिकल सेल द्वारा नशीले पदाथों के दुरुपयोग और इसके अवैध तस्करी के खिलाफ धावा बोला गया। इसमें इनका साथ नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और एक्साइज कॉलेक्टोरेट ने भी दिया। इस कार्यक्रम की शुरुआत कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. अमृता दत्ता के स्वागत भाषण के साथ हुआ। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के इंटेलिजेंस अधिकारी मनोज मिश्र और एक्साइज कॉलेजक्टरेट की डेप्यूटी एक्साइज कलेक्टर अमृतापर्णा घोष ने नशीलें पदार्थो के सेवन से होने वाले हानिकारक पक्षों के बारे में बताया। कार्यक्रम के दौरान बेथुन कॉलेज, टी. एच. के. जैन कॉलेज, सेठ सूरजमल जालान गर्ल्स कॉलेज, एमीनेंट कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी, सावित्री गर्ल्स कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच इस विषय को लेकर पावर प्रेजेंटेशन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।

प्रतियोगिता में पैनल जज के रुप में एनएसओयू एंड स्टेट एनएसएस एडवाइजर, स्कूल ऑफ एडुकेशन के निदेशक डॉ. ए. एन, दे, सरकारी नर्सिंग कॉलेज, आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज के डॉ. सुब्रत सरकार, मनोज मिश्र, टैगोर रिसर्च इंस्टीट्यूट के शिक्षक सुशांत नाग, आशुतोष कॉलेज के सहायक प्रोफेसर डॉ. चंद्रीमा भर उपस्थित थीं। इसके बाद निकाले गये जुलूस में इन कॉलेजों के विद्यार्थियों और शिक्षकों के अलावा विभिन्न सेवा समितियों के सदस्यों और बस्तियों में रहने वाले लोगों ने भी हिस्सा लिया। यह जुलूस सावित्री गर्ल्स कॉलेज के सामने से शुरू होकर हेदुआ स्थित बेथुन कॉलेज के सामने खत्म हुआ। विजेताओं को प्रमाणपत्र कलकत्ता विश्‍वविद्यालय के एनएसएस सेल के पूर्व सुपरिटेंडेंट कुणाल चटर्जी ने दिया। धन्यवाद ज्ञापन सावित्री गर्ल्स कॉलेज के एनएसएस की प्रोग्राम अधिकारी डॉ. अलेफ्या टंडावाला ने दिया।

जब नुक्कड़ नाटक बने बच्चों का हथियार

हावड़ा : सड़कें क्षमता से अधिक सह रही हैं। वाहनों की भीड़ तेजी से बढ़ रही है। साथ बढ़ राह है हादसों का आँकड़े। अब सड़कें तो हादसों से निपटने से रहीं, सुधरना तो हम राहियों को ही पड़ेगा। सरकारें और प्रशासन नियम बना सकते हैं, सेफ ड्राइव सेव लाइफ जैसे अभियान चला सकते हैं। लेकिन इनका पालन करना तो आम लोगों को ही पड़ेगा। समय की मांग समझते हुए अब हावड़ा नवज्योति के छोटे-छोटे बच्चे गत रविवार को सड़क पर उतरे। सड़क हादसों से बचाव के लिए बने नियम और अभियान के प्रति लोगों को जागरूक करने को। मार्गदर्शन मिला हावड़ा ट्रैफिक पुलिस का। हावड़ा ट्रैफिक पुलिस के एसीपी अशोक चटर्जी व एसीपी सीबीआइ दिलीप चौबे स्वयं उपस्थित थे।
हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट पर भव्य गंगा आरती के बाद बच्चों ने सेफ ड्राइव सेव लाइफ की थीम पर नुक्कड़ नाटक पेश किया। सराहने व संदेश स्वीकारने के लिए उपस्थित थे सैकड़ों स्थानीय लोग। कार्यक्रम की सफलता के लिए संस्था के अध्यक्ष डॉ सिपाही सिंह, उपाध्यक्ष संजीत सिंह, सचिव प्रभात मिश्रा, कोषाध्यक्ष अशोक कुमार के साथ संस्था से जुड़े डॉ अरविंद मिश्रा, राजू रंजन पांडेय, संतोष साव, राजू सिंह, राजू पासवान, संतोष राय, सूरज शर्मा, मोहित कोठारी, नवीन दास, कन्हैया झा, जग्गा राव व विकास राम का विशेष सहयोग था।