Wednesday, July 8, 2026
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बप्पा को खिलाइए उनका प्रिय मोदक

फ्राइड मोदक

सामग्री: 1 नारियल कद्दूकस किया हुआ, 1 कटोरी शक्कर, 1 टीस्पून इलायची पाउडर, 1 कप दूध, 2 कटोरी गेहूं का आटा, आधा कटोरी रवा, स्वादानुसार नमक, तेल अथवा घी तलने के लिए
विधि: कड़ाही में नारियल, शक्कर और दूध मिक्स करके धीमी आंच पर पकाएं। जब मिश्रण सूख जाए, तो गैस बंद करके इसमें इलायची पाउडर मिलाएं। इसे बहुत ज़्यादा न सुखाएं। गेहूं के आटे में रवा (सूजी), तेल या घी का मोयन डालकर सख़्त आटा गूंध लें। 2 घंटे इसे अलग रख दें।  फिर अच्छी तरह गूंधकर इसकी पूरी बनाएं। इसमें तैयार मिश्रण भरकर मोदक का आकार दें। दूसरी कड़ाही में तेल गरम करके मोदक तल लें।

केसर मोदक

सामग्री: मसला हुआ 250 ग्राम मावा, पिसी हुई 100 ग्राम शक्कर , आधा टीस्पून इलायची पाउडर, थोड़ा-सा केसर, थोड़े-से बारीक़ कटे हुए सूखे मेवे (बादाम, काजू और पिस्ता)
विधि: कड़ाही में खोआ डालकर धीमी आंच पर भून लें। एकसार होने तक आंच से उतार लें। सारी सामग्री डालकर अच्छी तरह मिक्स करें। थोड़ा-सा मिश्रण चिकनाई लगे मोदक के साँचे में डालकर मोदक बनाएं।

भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है

भारतेन्दु हरीशचन्द्र

“तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने गम से कब खाली।

चलो बस हो चुका मिलना न हम खाली न तुम खाली॥”

तीन मेंढ़क एक के ऊपर एक बैठे थे। ऊपर वाले ने कहा, ‘जौक शौक’, बीच वाल बोला, ‘गम सम’,सब के नीचे वाला पुकारा, ‘गए हम’। सो हिंदुस्तान की प्रजा की दशा यही है ‘गए हम’। पहले भी जब आर्य लोग हिंदुस्तान में आकर बसे थे राजा और ब्राह्मणों के जिम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलावें और अब भी ये लोग चाहें तो हिंदुस्तान प्रतिदिन क्या प्रतिछिन बढ़े। पर इन्हीं लोगों को निकम्मेपन ने घेर रखा है। ‘बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः समर दूषिताः’ हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जबकि इनके पुरुखों के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मिट्टी की कुटियों में बैठ कर बाँस की नालियों से जो तारा, ग्रह आदि बेध कर के उनकी गति लिखी है वह ऐसी ठीक है कि सोलह लाख रुपए की लागत से विलायत में जो दूरबीन बनी है उनसे उन ग्रहों को वेध करने में भी ठीक वही गति आती है और अब आज इस काल में हम लोगों की अंग्रेजी विद्या के और जनता की उन्नति से लाखों पुस्तकें और हजारों यंत्र तैयार हैं जब हम लोग निरी चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी बन रहे हैं। यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है। अमेरिकन, ‍‍अंग्रेज, फरांसीस आदि तुरकी-ताजी सब सरपट्ट दौड़े जाते हैं। सब के जी में यही है कि पाला हमी पहले छू लें। उस समय हिंदू का टियावाड़ी खाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं। इनको औरों को जाने दीजिए जापानी टट्टुओं को हाँफते हुए दौड़ते देख कर के भी लाज नहीं आती। यह समय ऐसा है कि जो पीछे रह जाएगा फिर कोटि उपाय किए भी आगे न बढ़ सकेगा। लूट की इस बरसात में भी जिस के सिर पर कम्बख्ती का छाता और आँखों में मूर्खता की पट्टी बँधी रहे उन पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए।

मुझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर आज कुछ कहो कि हिंदुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है। भला इस विषय पर मैं और क्या कहूँ भागवत में एक श्लोक है – “नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारं मयाsनुकूलेन तपः स्वतेरितं पुमान भवाब्धि न तरेत स आत्महा।” भगवान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य जन्म ही दुर्लभ है सो मिला और उस पर गुरु की कृपा और उस पर मेरी अनुकूलता। इतना सामान पाकर भी मनुष्य इस संसार सागर के पार न जाए उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए, वही दशा इस समय हिंदुस्तान की है। अंग्रेजों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पा कर भी हम लोग जो इस समय उन्नति न करें तो हमारे केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है। सास और अनुमोदन से एकांत रात में सूने रंग महल में जाकर भी बहुत दिनों से प्राण से प्यारे परदेसी पति से मिल कर छाती ठंडी करने की इच्छा भी उसका लाज से मुँह भी न देखे और बोले भी न तो उसका अभाग्य ही है। वह तो कल परदेस चला जाएगा। वैसे ही अंग्रेजों के राज्य में भी जो हम मेंढ़क, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम ही रहें तो फिर हमारी कमबख्त कमबख्ती फिर कमबख्ती ही है। बहुत लोग यह कहेंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती, बाबा, हम क्या उन्नति करें। तुम्हारा पेट भरा है तुम को दून की सूझती है। उसने एक हाथ से अपना पेट भरा दूसरे हाथ से उन्नति के काँटों को साफ किया। क्या इंग्लैंड में किसान, खेत वाले, गाड़ीवान, मजदूर, कोचवान आदि नहीं हैं? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते, किंतु वे लोग जहाँ खेत जोतते-बाते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी कौन नई कल व मसाला बनावें जिससे इस खेत में आगे से दून अनाज उपजे। विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला। यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पिएगा या गप्प करेगा। सो गप्प भी निकम्मी। वहाँ के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध छाँटते हैं। सिद्धांत यह कि वहाँ के लोगों का यह सिद्धांत है कि एक छिन भी व्यर्थ न जाए। उसके बदले यहाँ के लोगों को जितना निकम्मापन हो उतना ही बड़ा अमीर समझा जाता है। आलस्य यहाँ इतनी बढ़ गई कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला –

“अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
दास मलूका कहि गए सबके दाता राम॥”

चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करने वालों की ही चारों ओर बढ़ती है। रोजगार कहीं कुछ भी नहीं है अमीरों, मुसाहिबी, दल्लालों या अमीरों के नौजवान लड़कों को खराब करना या किसी की जमा मार लेना इनके सिवा बतलाइए और कौन रोजगार है जिससे कुछ रुपया मिले। चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हुई है किसी ने बहुत ठीक कहा है कि दरिद्र कुटुंबी इस तरह अपनी इज्जत को बचाता फिरता है जैसे लाजवंती बहू फटें कपड़ों में अपने अंग को छिपाए जाती है। वही दशा हिंदुस्तान की है। मुर्दम-शुमारी का रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन-दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन-दिन कमती होता जाता है। सो अब बिना ऐसा उपाय किए काम नहीं चलेगा कि रुपया भी बढ़े और वह रुपया बिना बुद्धि के न बढ़ेगा। भाइयों, राजा-महाराजों का मुँह मत देखो। मत यह आशा रखो कि पंडित जी कथा में ऐसा उपाय बतलाएँगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढ़े। तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो, कब तक अपने को जंगली, हूस, मूर्ख, बोदे, डरपोक पुकरवाओगे। दौड़ो इस घुड़दौड़ में, जो पीछे पड़े तो फिर कहीं ठिकाना नहीं है। ‘फिर कब-कब राम जनकपुर एहै’ अब की जो पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहुँचोगे। जब पृथ्वीराज को कैद कर के गोर ले गए तो शहाबुद्दीन के भाई गयासुद्दीन से किसी ने कहा कि वह शब्दबेधी बाण बहुत अच्छा मारता है। एक दिन सभी नियत हुई और सात लोहे के तावे बाण से फोड़ने को रखे गए। पृथ्वीराज को लोगों ने पहिले से ही अंधा कर दिया था। संकेत यह हुआ कि जब गयासुद्दीन ‘हूँ’ करे तब वह तावे पर बाण मारे। चंद कवि भी उसके साथ कैदी था। यह सामान देख कर उसने यह दोहा पढ़ा –

“अब की चढ़ी कमान को जाने फिर कब चढ़े।
जिन चूके चहुआज इक्के मारय इक्क सर।”

उसका संकेत समझ कर जब गयासुद्दीन ने ‘हूँ’ किया तो पृथ्वीराज ने उसी को बाण मार दिया। वही बात अब है। ‘अब की चढ़ी’ इस समय में सरकार का राज्य पाकर और उन्नति का इतना सामान पाकर भी तुम लोग अपने को न सुधारों तो तुम्हीं रहो और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो। धर्म में, घर के काम में, बाहर के काम में, रोजगार में, शिष्टाचार में, चाल चलन में, शरीर में,बल में, समाज में, युवा में, वृद्ध में, स्त्री में, पुरुष में, अमीर में, गरीब में, भारतवर्ष की सब आस्था, सब जाति,सब देश में उन्नति करो। सब ऐसी बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ के कंटक हों। चाहे तुम्हें लोग निकम्मा कहें या नंगा कहें, कृस्तान कहें या भ्रष्ट कहें तुम केवल अपने देश की दीन दशा को देखो और उनकी बात मत सुनो। अपमान पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः स्वकार्य साधयेत धीमान कार्यध्वंसो हि मूर्खता। जो लोग अपने को देश-हितैषी मानते हों वह अपने सुख को होम करके, अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कस के उठो। देखा-देखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा। अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजो। कोई धर्म की आड़ में, कोई सुख की आड़ में छिपे हैं। उन चोरों को वहाँ-वहाँ से पकड़ कर लाओ। उनको बाँध-बाँध कर कैद करो। हम इससे बढ़कर क्या कहें कि जैसे तुम्हारे घर में कोई पुरुष व्याभिचार करने आवे तो जिस क्रोध से उसको पकड़कर मारोगे और जहाँ तक तुम्हारे में शक्ति होगी उसका सत्यानाश करोगे उसी तरह इस समय जो-जो बातें तुम्हारे उन्नति पथ की काँटा हों उनकी जड़ खोद कर फेंक दो। कुछ मत डरो। जब तक सौ, दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बाहर न निकाले जाएँगे , दरिद्र न हो जाएँगे , कैद न होंगे वरंच जान से न मारे जाएँगे तब तक कोई देश न सुधरेगा।

साभार ट्विटर

अब यह प्रश्न होगा कि भई हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधारना किस चिड़िया का नाम है। किस को अच्छा समझे। क्या लें क्या छोड़ें तो कुछ बातें जो इस शीघ्रता से मेरे ध्यान में आती हैं उनको मैं कहता हूँ सुनो –

सब सुन्नियों का मूल धर्म है। इससे सबसे पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है। देखो अंग्रेजों की धर्मनीति राजनीति परस्पर मिली है इससे उनकी दिन-दिन कैसी उन्नति हुई है। उनको जाने दो अपने ही यहाँ देखो। तुम्हारे धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति समाजगठन वैद्यक आदि भरे हुए हैं। दो-एक मिसाल सुनो तुम्हारा बलिया के मेला का यहीं स्थान क्यों चुना गया है जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते। दस-दस, पाँच-पाँच कोस से ले लोग एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें। एक दूसरे का दुःख-सुख जानें। गृहस्थी के काम की वह चीजें जो गाँव में नहीं मिलतीं यहाँ से ले जाएँ। एकादशी का व्रत क्यों रखा है? जिसमें महिने में दो-एक उपवास से शरीर शुद्ध हो जाए। गंगाजी नहाने जाते हैं तो पहले पानी सिर पर चढ़ा कर तब पैर पर डालने का विधान क्यों है? जिससे तलुए से गरमी सिर पर चढ़कर विकार न उत्पन्न करे। दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने सालभर में एक बार तो सफाई हो जाए। होली इसी हेतु है कि बसंत की बिगड़ी हवा स्थान-स्थान पर अग्नि जलने से स्वच्छ हो जाए। यही तिहवार ही तुम्हारी म्युनिसिपालिटी है। ऐसे ही सब पर्व, सब तीर्थ, व्रत आदि में कोई हीकमत है। उन लोगों ने धर्मनीति और समाजनीति को दूध पानी की भाँति मिला दिया है। खराबी जो बीच में हुई वह यह है कि उन लोगों ने ये धर्म क्यों मानने लिखे थे। इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक धर्म मान लिया। भाइयों, वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरणकमल का भजन है। ये सब तो समाज धर्म है। जो देश काल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं। दूसरी खराबी यह हुई कि उन्हीं महात्मा बुद्धिमान ऋषियों के वंश के लोगों ने अपने बाप-दादों का मतलब न समझकर बहुत से नए-नए धर्म बना कर शास्त्रों में धर दिए बस सभी तिथि व्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गए। सो इन बातों को अब एक बार आँख खोल कर देख और समझ लीजिए कि फलानी बात उन बुद्धिमान ऋषियों ने क्यों बनाई और उनमें देश और काल के अनुकूल और उपकारी हों उनका ग्रहण कीजिए। बहुत-सी बातें जो समाज विरुद्ध मानी जाती हैं किंतु धर्मशास्त्रों में जिनका विधान है उनको मत चलाइए। जैसा जहाज का सफर, विधवा-विवाह आदि। लड़कों की छोटेपन ही में शादी करके उनका बल,बीरज, आयुष्य सब मत घटाइए। आप उनके माँ-बाप हैं या शत्रु हैं। वीर्य उनके शरीर में पुष्ट होने दीजिए। नोन, तेल लकड़ी की फिक्र करने की बुद्धि सीख लेने दीजिए तब उनका पैर काठ में डालिए। कुलीन प्रथा,बहु विवाह आदि को दूर कीजिए। लड़कियों को भी पढ़ाइए किंतु इस चाल में नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती है जिससे उपकार के बदले बुराई होती है ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल-धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें। वैष्णव, शास्त्र इत्यादि नाना प्रकार के लोग आपस में बैर छोड़ दें यह समय इन झगड़ों का नहीं। हिंदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए जाति में कोई चाहे ऊँचा हो, चाहे नीचा हो सबका आदर कीजिए। जो जिस योग्य हो उसे वैसा मानिए,छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए। सब लोग आपस में मिलिए। मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस हिंदुस्तान में बस कर वे लोग हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें। ठीक भाइयों की भाँति हिंदुओं से बरताव करें। ऐसी बात जो हिंदुओं का जी दुखाने वाली हो न करें। घर में आग लगे सब जिठानी, द्यौरानी को आपस का डाह छोड़ कर एकसाथ वह आग बुझानी चाहिए। जो बात हिंदुओं का नहीं मयस्सर है वह धर्म के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्राप्त है। उनके जाति नहीं, खाने-पीने में चौका-चूल्हा नहीं, विलायत जाने में रोक-टोक नहीं, फिर भी बड़े ही सोच की बात है कि मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा कुछ नहीं सुधारी। अभी तक बहुतों को यही ज्ञात है कि दिल्ली,लखनऊ की बादशाहत कायम है। यारो, वे दिन गए। अब आलस, हठधरमी यह सब छोड़ो। चलो हिंदुओं के साथ तुम भी दौड़ो एक-एक-दो होंगे। पुरानी बातें दूर करो। मीर हसन और इंदरसभा पढ़ा कर छोटेपन ही से लड़कों का सत्यानाश मत करो। होश संभाला नहीं कि पढ़ी पारसी, चुस्त कपड़ा पहनना और गजल गुनगुनाए –

“शौक तिल्फी से मुझे गुल की जो दीदार का था।
न किया हमने गुलिस्ताँ का सबक याद कभी॥”

भला सोचो कि इस हालत में बड़े होने पर वे लड़के क्यों न बिगड़ेंगे। अपने लड़कों को ऐसी किताबें छूने भी मत दो। अच्छी से अच्छी उनको तालीम दो। पैंशन और वजीफे या नौकरी का भरोसा छोड़ो। लड़कों को रोजगार सिखलाओ। विलायत भेजो। छोटेपन से मेहनत करने की आदत दिलाओ। सौ-सौ महलों के लाड़-प्यार, दुनिया से बेखबर रहने की राह मत दिखलाओ।

भाई हिंदुओं, तुम भी मतमतांतरों का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रेम बढ़ाओ। इस महामंत्र का जप करो। जो हिंदुस्तान में रहे चाहे किसी जाति, किसी रंग का क्यों न हो वह हिंदू है। हिंदू की सहायता करो। बंगाली, मरट्ठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मणों, मुसलमानों सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिससे तुम्हारे यहाँ बढ़े तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहे वह करो। देखा जैसे हजार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली है वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार तरह से इंग्लैंड, फरांसीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती है। दीआसलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है। जरा अपने ही को देखो। तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बनी है। जिस लकलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंग्लैंड का है। फरांसीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो और जर्मनी की बनी चरबी की बत्ती तुम्हारे सामने जल रही है। यह तो वही मसल हुई एक बेफिकरे मंगती का कपड़ा पहिन कर किसी महफिल में गए। कपड़े को पहिचान कर एक ने कहा – अजी अंगा तो फलाने का हे, दूसरा बोला अजी टोपी भी फलाने की है तो उन्होंने हँस कर जवाब दिया कि घर की तो मूछें ही मूछें हैं। हाय अफसोस तुम ऐसे हो गए कि अपने निज की काम के वस्तु भी नहीं बना सकते। भइयों अब तो नींद से जागो। अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो। वैसे ही खेल खेलो। वैसा बातचीत करो। परदेसी वस्तु और परदेसी भाषा का भरोसा मत रखो अपने में अपनी भाषा में उन्नति करो।

[बलिया में ददरी के मेले के समय अार्य देशोपकारिणी सभा में दिया गया भाषण]

साभार – भारत दर्शन

सर्वपल्ली राधाकृष्णन…जानिए कुछ खास बातें

1 दक्षिण भारत के तिरूतनी नाम के एक गांव में 1888 को प्रकांड विद्वान और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। वे बचपन से ही मेधावी थे। उन्होंने दर्शन शास्त्र में एम.ए. की उपाधि ली और सन् 1916 में मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हो गए। इसके बाद वे प्राध्यापक भी रहे। डॉ. राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शनशास्त्र से परिचित कराया। सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गई।
2 शिकागो विश्वविद्यालय ने डॉ. राधाकृष्णन को तुलनात्मक धर्मशास्त्र पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया। वे भारतीय दर्शन शास्त्र परिषद्‍ के अध्यक्ष भी रहे। कई भारतीय विश्वविद्यालयों की भांति कोलंबो एवं लंदन विश्वविद्यालय ने भी अपनी-अपनी मानद उपाधियों से उन्हें सम्मानित किया।
3  विभिन्न महत्वपूर्ण उपाधियों पर रहते हुए भी उनका सदैव अपने विद्यार्थियों और संपर्क में आए लोगों में राष्ट्रीय चेतना बढ़ाने की ओर रहता था।
4  डॉ. राधाकृष्णन अपने राष्ट्रप्रेम के लिए विख्‍यात थे, फिर भी अंग्रेजी सरकार ने उन्हें सर की उपाधि से सम्मानित किया क्योंकि वे छल कपट से कोसों दूर थे। अहंकार तो उनमें नाम मात्र भी न था।
5 भारत की स्वतंत्रता के बाद भी डॉ. राधाकृष्णन ने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे पेरिस में यूनेस्को नामक संस्था की कार्यसमि‍ति के अध्यक्ष भी बनाए गए। यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अंग है और पूरे संसार के लोगों की भलाई के लिए अनेक कार्य करती है।
6 सन् 1949 से सन् 1952 तक डॉ. राधाकृष्णन रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत पद पर रहे। भारत रूस की मित्रता बढ़ाने में उनका भारी योगदान रहा था।
7  सन् 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाए गए। इस महान दार्शनिक शिक्षाविद और लेखक को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया। 13 मई, 1962 को डॉ. राधाकृष्णन भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बने। सन् 1967 तक राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने देश की अमूल्य सेवा की।
8  डॉ. राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक, शिक्षाविद और लेखक थे। वे जीवनभर अपने आपको शिक्षक मानते रहे। उन्होंने अपना जन्मदिवस शिक्षकों के लिए समर्पित किया। इसलिए 5 सितंबर सारे भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कुछ विचार

1. यहां पूजा भगवान की नहीं बल्कि उनकी होती है जो भगवान के नाम पर बोलने का दावा करते हैं।
2.  अपने पड़ोसी को उतना प्यार करो जितना खुद को करते हो, क्योंकि तुम ही अपने पड़ोसी हो।

3. शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे।

4. पुस्तकें वह माध्यम हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकें।

5.  शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अतः विश्व को एक ही ईकाई मानकर शिक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए।

6. शांति राजनीतिक या आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकती बल्कि मानवीय स्वभाव में बदलाव से आ सकती है।

7. शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए, जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ लड़ सके।

5 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ महिला न्यायाधीश करेंगी सुनवाई

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट में पांच सितम्बर को एकबार फिर से इतिहास दोहराया जाएगा जब न्यायमूर्ति आर भानुमति और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पूरी तरह महिला न्यायाधीशों वाली पीठ किसी मामले पर सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट में पहली बार 2013 में पूरी तरह महिलाओं वाली पीठ देखने को मिली थी। उस समय एक मामले पर सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की पीठ बैठी थी। साल 2011 में न्यायमूर्ति देसाई को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किए जाने के बाद शीर्ष अदालत में दो महिला न्यायाधीश देखने को मिलीं थीं। न्यायमूर्ति फातिमा बीवी सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त होने वाली पहली महिला न्यायाधीश थीं। उनके बाद सुजाता मनोहर, रूमा पाल, ज्ञान सुधा मिश्रा, रंजना प्रकाश देसाई, आर भानुमति, इंदु मल्होत्रा और फिर हाल में इंदिरा बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त हुईं। इनमें से न्यायमूर्ति बीवी, न्यायमूर्ति मनोहर और न्यायमूर्ति पाल उच्चतम न्यायालय में अपने पूरे कार्यकाल के दौरान एकमात्र महिला न्यायाधीश रहीं। न्यायमूर्ति सुजाता मनोहर ने बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से अपने करियर की शुरुआत की थी। वह बाद में केरल उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश बनीं। इसके बाद उन्हें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जहां उनका कार्यकाल आठ नवंबर 1994 से 27 अगस्त 1999 तक रहा।
अभी तीन महिला न्यायधीश
अगस्त में न्यायमूर्ति बनर्जी को शपथ दिलाए जाने के साथ ही उच्चतम न्यायालय के इतिहास में पहली बार तीन महिला न्यायाधीश हैं। स्वतंत्रता के बाद से शीर्ष अदालत में वह आठवीं महिला न्यायाधीश हैं। तीन वर्तमान महिला न्यायाधीशों में न्यायमूर्ति भानुमति सबसे वरिष्ठ हैं। उन्हें 13 अगस्त 2014 को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था।
बीवी फातिमा पहली महिला जज थीं
न्यायमूर्ति फातिमा बीवी फातिमा सुप्रीम कोर्ट में 1989 में जज बनीं थीं। उच्चतम न्यायालय के 1950 में गठन के 39 वर्षों के बाद 1989 में किसी महिला को शीर्ष अदालत का न्यायाधीश बनाया गया। केरल उच्च न्यायालय के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें शीर्ष अदालत में नियुक्त किया गया था।

जस्टिस रंजन गोगोई होंगे सुप्रीम कोर्ट के अगले मुख्य न्यायाधीश

नयी दिल्ली : जस्टिस रंजन गोगोई (63) सुप्रीम कोर्ट के अगले मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) होंगे। वे 2 अक्टूबर को रिटायर हो रहे मौजूदा सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा की जगह लेंगे। न्यूज एजेंसी के मुताबिक, शनिवार को सीजेआई दफ्तर की ओर से कानून मंत्रालय को जस्टिस गोगोई के नाम की सिफारिश की गई। माना जा रहा है जस्टिस गोगोई को 3 अक्टूबर को सीजेआई पद की शपथ दिलाई जा सकती है। वे 17 नवंबर 2019 को रिटायर होंगे। जस्टिस गोगोई जनवरी में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले चार जजों में शामिल थे। पिछले दिनों सीजेआई की नियुक्ति के लिए कानून मंत्रालय ने सीजेआई दीपक मिश्रा को चिट्ठी भेजी थी, जिसमें उनसे उत्तराधिकारी का नाम पूछा गया। शीर्ष अदालत की परंपरा के मुताबिक, रिटायरमेंट से एक महीने पहले सीजेआई को सबसे वरिष्ठ जज का नाम सरकार को भेजना होता है। जस्टिस गोगोई फिलहाल जजों के वरिष्ठता क्रम में सबसे आगे हैं।
2012 में सुप्रीम कोर्ट में जज बने : जस्टिस गोगोई 28 फरवरी 2001 को गुवाहाटी हाईकोर्ट में जज बने थे। इसके बाद 12 फरवरी 2011 को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए। बाद में उन्हें अप्रैल 2012 में सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया गया। यहां वे असम के एनआरसी, सरकारी विज्ञापनों के लिए निर्देश, लोकपाल-लोकायुक्तों की नियुक्ति जैसे अहम मुद्दों की सुनवाई से जुड़े रहे हैं। असम के सीएम थे जस्टिस गोगोई के पिता : जस्टिस रंजन गोगोई असम के रहने वाले हैं। उनके पिता केसी गोगोई 1982 में डिब्रूगढ़ से कांग्रेस के विधायक थे। तब असम में राष्ट्रपति शासन के बाद वे दो महीने तक असम के मुख्यमंत्री रहे थे।

अभिनेता हमेशा अकेला होता है : शाहिद कपूर

मुम्बई : अभिनेता शाहिद कपूर ने कहा कि लोकप्रियता, ग्लैमर और प्रशंसा जैसी बातें सपनों में अच्छी लगती हैं लेकिन अभिनेता हमेशा अकेला होता है जो भावनाओं को व्यक्त करने की तलाश में रहता है। 37 वर्षीय अभिनेता ने कहा कि अकेले होने पर अपनी भावनात्मकता से खुद को मजबूत बनाते हैं जो एक कलाकार के तौर पर उन्हें समृद्ध करती है। शाहिद ने एक साक्षात्कार में कहा कि ‘‘बतौर कलाकार आप हमेशा अकेले होते हैं। आप हर वक्त सुर्खियों में रहते हैं, और लोग उसी तौर पर देखते हैं। मेरा मानना है कि जब भी कुछ भावनात्मक होता है, तो वह प्रदर्शन में दिखाई देता है।’ उन्होंने अकेलेपन के अहसास को अपने दिल के बेहद करीब बताया और कहा कि इस वक्त अपने प्रति बेहद ईमानदार होता हूं और मुमकिन है कि अंदर से बदल रहा होता हूं। उन्होंने कहा कि अभिनेता क्या करता है, क्या कहता है। इसलिए अंदर जितना होता है उतना ही बाहर दिखाना होता है। उन्होंने इन सब को संभालना सीखा है और उनका मानना है कि लंबे कॅरियर के लिए यह बेहद जरूरी होता है। अन्यथा यह एक बेहद अजीब काम है। आप लगातार यहां ऊपर नीचे होते हैं। इसलिए अच्छी स्थान की तलाश में रहते हैं। शाहिद ने कहा कि यदि बेहतर करना चाहते हैं तो बतौर कलाकार आपका ‘स्वार्थी’ होना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब अपने कॅरियर को देखता हूं तो महसूस करता हूं कि मैंने कई बेहद खराब फिल्में की हैं और कई बेहद अच्छी फिल्में की हैं।’’

लॉ कमिशन की सलाह, लड़कों के लिए भी शादी की उम्र 18 वर्ष हो

नयी दिल्ली : विधि आयोग (Law commission) ने सुझाव दिया है कि महिलाओं और पुरुषों के लिए शादी की न्यूनतम कानूनी उम्र समान होनी चाहिए। आयोग ने कहा कि वयस्कों के बीच शादी की अलग-अलग उम्र की व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए। दरअसल, विभिन्न कानूनों के तहत, शादी के लिए महिलाओं और पुरुषों की शादी की कानूनी उम्र 18 साल और 21 साल है। परिवार कानून में सुधार पर अपने परामर्श पत्र में आयोग ने कहा, अगर बालिग होने की सार्वभौमिक उम्र को मान्यता है जो सभी नागरिकों को अपनी सरकारें चुनने का अधिकार देती है तो निश्चित रूप से, उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने में सक्षम समझा जाना चाहिए। बालिग होने की उम्र (18 साल) को भारतीय बालिग अधिनियम 1875 के तहत महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए शादी की कानूनी उम्र के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। पत्र में कहा गया, पति और पत्नी के लिए उम्र में अंतर का कोई कानूनी आधार नहीं है क्योंकि शादी कर रहे दोनों लोग हर तरह से बराबर हैं और उनकी साझेदारी बराबर वालों के बीच वाली होनी चाहिए। आयोग ने नजरिया साझा किया कि महिलाओं और पुरुषों की विवाह उम्र में अंतर बनाए रखना इस दकियानूसी बात में योगदान देता है कि पत्नियां अपने पति से छोटी होनी चाहिए।

बीमार बेटा नहीं आ सका तो बहू ने सास को दी मुखाग्नि

वजीरगंज (गोंडा) :  एक पुत्र वधू ने बेटी ही नहीं बेटे होने का भी फर्ज निभाने की मिसाल पेश की है। मुंबई से बीमार बेटे के न आ सकने की वजह से बहू ने न केवल सास के अंतिम संस्कार की तैयारी की बल्कि मुखाग्नि भी दी।
वजीरगंज के बभनी गांव की रहने वाली वृद्ध कलावती की रविवार बीमारी के दौरान मृत्यु हो गई थी। बेटे को खबर दी गई लेकिन बीमारी की वजह से वह नहीं आ सका। तब तीन दिन इंतजार करने के बाद गुरुवार को बहू गुड़िया ने सास का पूरा विधि विधान से अंतिम संस्कार किया।
गांव वालों ने बताया कि घर में बहू अकेली थी। मृतका का पुत्र राजितराम मुंबई में रहकर मेहनत मजदूरी करता है। पट्टीदारी के अन्य परिवारजन मुखाग्नि देने को तैयार नहीं थे। तीन दिनों तक शव बर्फ के सहारे सुरक्षित रखा गया। तब गुरूवार को गुड़िया ने सिर्फ बेटे के हाथों मुखाग्नि देने की परंपराओं को तोड़ते हुए एक नई पहल की अपनी सास को मुखाग्नि देने की रस्म निभाई। गांव के चंदन, बजरंगी और राम लायक का कहना है कि कि पुत्र वधू गुड़िया ने अपनी सास कलावती की बीमारी की हालत में भी में पुत्र-पुत्रियों से बढ़कर सेवा की थी।
प्रधान ने दी जानकारी :
बभनी ग्राम सभा प्रधान प्रतिनिधि अयोध्या चौहान ने बताया कि मृतका कलावती के एक ही पुत्र था जो मुम्बई में मजदूरी करता था। उसके बेटे की तबीयत काफी खराब है। उसका मुम्बई के एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। हालत काफी नाजुक होने के कारण वह अपने घर मां के अंतिम संस्कार के लिए नहीं आ सका। जब परिवार के अन्य लोगों ने मुखाग्नि देने से इंकार किया तो बहू गुड़िया आगे आई। उसकी भावना को देखते हुए गांव वालों ने भी उसके फैसले को स्वीकार किया। मृत सास के पति की काफी पहले मौत हो चुकी है।

सरकार ने जैव-ईंधन के निर्यात पर लगाया अंकुश

नयी दिल्ली : सरकार ने जैव-ईंधनों के आयात पर शर्तें लगाने के कुछ ही दिनों के भीतर इनके निर्यात पर भी आज कुछ अंकुश लगा दिए। जैव-ईंधन के आयात-निर्यात दोनों के लिए लाइसेंस की जरूरत होती है। जैव ईंधनों में इथाइल अल्कोहल, पेट्रोलियम तेल और बिटुमिनस खनिजों, जैव-डीजल तथा मिश्रणों से प्राप्त तेल शामिल हैं। इससे पहले इनके निर्यात पर कोई शर्तें नहीं थीं। विदेश व्यापार महानिदेशालय ने एक अधिसूचना में कहा, ‘‘जैव ईंधनों की निर्यात नीति जैव-ईंधनों की राष्ट्रीय नीति 2018 के अनुसार शर्तमुक्त की जगह संशोधित कर शर्तों के तहत कर दी गयी है।’’महानिदेशालय ने इथाइल अल्कोहल एवं अन्य गैर-प्राकृतिक स्पिरिट, जैव-डीजल, पेट्रोलियम तेल तथा बिटुमिनस खनिजों से प्राप्त तेलों समेत जैव-ईंधनों के आयात पर पिछले सप्ताह शर्तें लगा दी थीं।

जनगणना 2021 : आजाद भारत में पहली बार जुटाए जाएंगे ओबीसी के आंकड़े

नयी दिल्ली : साल 2021 की जनगणना में आजाद भारत में पहली बार अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) से संबंधित आंकड़े एकत्रित किए जाएंगे। यह कदम 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश में 1931 की जनगणना में आखिरी बार एकत्रित किए गए जातिगत आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई मंडल आयोग की सिफारिशों पर तत्त्कालीन वी पी सिंह सरकार ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी।
गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 2021 की जनगणना के लिए तैयारियों की समीक्षा की जिसके बाद ओबीसी आंकड़े एकत्रित करने के फैसले का खुलासा किया गया। गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, पहली बार ओबीसी से संबंधित आंकड़े भी इकट्ठा करने का विचार किया गया है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन की एक शाखा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने 2006 में देश की आबादी पर नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट की घोषणा की और कहा कि देश में ओबीसी आबादी कुल आबादी की करीब 41 फीसदी है।
एनएसएसओ ने ग्रामीण इलाकों में 79,306 परिवारों और शहरी इलाकों में 45,374 परिवारों की गणना की। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 2019 के लोकसभा चुनावों में 2021 जनगणना में ओबीसी आंकड़े एकत्रित करने के फैसले का उल्लेख कर सकती है क्योंकि कई ओबीसी संगठन लंबे समय से इसके लिए मांग कर रहे हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) ने 2011 में सामाजिक आर्थिक एवं जाति जनगणना कराई थी और मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने तीन जुलाई 2015 में इसके नतीजों का ऐलान किया।
इसके बाद 28 जुलाई 2015 को सरकार ने कहा था कि जाति जनगणना के संबंध में कुल 8.19 करोड़ गलतियां पाई गई हैं जिनमें से 6.73 करोड़ गलतियां सुधार दी गई। हालांकि 1.45 करोड़ गलतियों में अभी सुधार नहीं किया गया है। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि जनगणना 2021 तीन सालों में पूरी हो जाएगी। आज की समीक्षा बैठक में गृह मंत्री ने इसके रोडमैप पर चर्चा की। इस बात पर जोर दिया गया कि डिजाइन और तकनीकी चीजों में सुधार पर जोर दिया जाए ताकि जनगणना करने के तीन साल के अंदर आंकड़ों को अंतिम रूप दे दिया जाए।
अभी तक पूरे आंकड़े जारी करने में सात से आठ साल का समय लग जाता है। इस बड़ी कवायद के लिए 25 लाख से अधिक कर्मियों को प्रशिक्षित किया जाता है। सिंह ने सिविल पंजीकरण प्रणाली खासतौर से दूरवर्ती इलाकों में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण में सुधार करने तथा आंकड़ों का आकलन करने के लिए नमूना पंजीकरण प्रणाली को मजबूत करने जैसे कि शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर और प्रजनन दर पर भी जोर दिया।