Saturday, April 11, 2026
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माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला ने शेयर बेचकर कमाए 242 करोड़ रुपये

वाशिंगटन : माइक्रोसॉफ्ट के भारतीय मूल के सीईओ सत्या नडेला ने कंपनी में अपने शेयर बेचकर 242 करोड़ रुपये की कमाई की है। उन्होंने ऐसे समय यह बिक्री की है, जब कंपनी के शेयर 110 डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर चल रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट के शेयर पिछले एक साल में 53 फीसदी बढ़े हैं और 25 जुलाई को 111 डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंचे थे। 50 साल के नडेला के पास कंपनी के 7.78 लाख शेयर अभी भी हैं। हालांकि नडेला इन पैसों का कहां निवेश करने वाले है, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई है। माइक्रोसॉफ्ट के प्रवक्ता ने सिर्प इतना कहा कि यह नडेला का निजी वित्तीय निर्णय है। कंपनी के अनुसार, नडेला लगातार कंपनी की कामयाबी के लिए काम कर रहे हैं और शेयरों की उनकी होल्डिंग माइक्रोसॉफ्ट द्वारा तय की गई सीमा के तहत ही है। गौरतलब है कि नडेला के अलावा कई और भारतीय प्रतिभाएं दिग्गज कंपनियों की कमान संभाले हुए हैं। इनमें गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, मास्टरकार्ड के अजय बंगा, नोकिया के सीईओ राजीव सूरी और एडोब के सीईओ शांतनु नारायण शामिल हैं। इसके अलावा संजय झा ग्लोबल फाउंड्रीज के सीईओ, नेटएप के अगुआ जार्ज कुरियन और काग्निजेंट के सीईओ जॉर्ज कुरियन शामिल हैं।

सालाना वेतन-भत्ते 138 करोड़ रुपये
उनका सालाना वेतन भी करीब 100 करोड़ रुपये के करीब है और भत्ते-सुविधाओं समेत कंपनी उन पर करीब 138 करोड़ रुपये खर्च करती है। नडेला ने फरवरी 2014 में स्टीव बॉमर की जगह माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ का पद संभाला था। इससे पहले उन्होंने 2016 में शेयरों की बिक्री की थी, लेकिन तब कंपनी के एक शेयर की कीमत 58 डॉलर ही थी।

देश ने एक तिहाई तटरेखा खोयी, उतनी की ही वृद्धि भी हुई : रिपोर्ट

नयी दिल्ली : पिछले 26 वर्षों में चक्रवात और लहरों जैसी प्राकृतिक आपदाओं और निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियों से भारत की करीब एक तिहाई तटरेखा का क्षरण हुआ है जबकि नये रेत निक्षेपण की वजह से करीब करीब उतना ही क्षेत्र जुड़ा भी है।

राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र ने 1990 और 2016 के बीच भारत की 7,517 किलोमीटर लंबी तटरेखा में से 6,031 किलोमीटर क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और पाया कि उसके 33 फीसदी हिस्से खासकर बंगाल की खाड़ी से लगती तटेरखा का क्षरण हुआ । सबसे अधिक क्षरण पश्चिम बंगाल में हुआ। साथ ही, सर्वेक्षण के दौरान 29 फीसद की वृद्धि या निक्षेपण में बढ़ोतरी भी नजर आयी। इस रिपोर्ट के लेखकों में एक एनसीसीआर के निदेशक एम वी रमना मूर्ति ने कहा, ‘‘क्षरण और वृद्धि एक दूसरे के पूरक हैं। यदि एक जगह से बालू या अवसाद बह गये तो यह अवश्य ही कहीं और जमा हुए।’’

इस रिपोर्ट के अनुसार सर्वेक्षण के अंतर्गत शामिल तटरेखा के 2,156.43 किलोमीटर हिस्से का क्षरण हुआ जबकि 1,941.24किलोमीटर क्षेत्र की बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट के सहलेखक पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम राजीवन ने बताया कि वैसे तो लंबे समय से यह ज्ञात था कि तटरेखा का क्षरण हो रहा है लेकिन अधिकारियों ने उसके सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण की जरूरत महसूस की ताकि विभिन्न एजेंसियां जरूरी कार्रवाई कर सकें।

मूर्ति के अनुसार क्षरण से मानव बस्तियां नष्ट होती है, क्योंकि समुद्र का पानी स्थल पर आ जाता है। इससे तटीय क्षेत्रों में खेती भी प्रभावित होती है। छोटी नौकाओं वाले पारंपरिक मछुआरों के लिए तट समुद्र में जाने का द्वार होता है, ऐसे में तट के नष्ट होने का तात्पर्य उन्हें समुद्र में उतरने के लिए बंदरगाह का इस्तेमाल करना होता है।

मूर्ति के मुताबिक उसी तरह वृद्धि से भूक्षेत्र बढ़ जाता है क्योंकि तट का विस्तार होता है। यह एक सकारात्मक बात है। लेकिन यदि यही वृद्धि डेल्टा या संकरी खाड़ी में होता है तो उसका पारिस्थितिकी पर नकारात्मक असर होता है क्योंकि गाद जमने से समुद्र का पानी इन क्षेत्रों में नहीं जा पाता। एश्चुअरी और संकरी खाड़ी जलीय जंतुओं और वनस्पतियों का प्रजनन स्थल होता है।

नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक वी एस नायपॉल का निधन

लंदन : उपनिवेशवाद, आदर्शवाद, धर्म और राजनीति जैसे विषयों पर मुखर रूप से अपनी बात रखने वाले नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक वी एस नायपॉल का 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
नायपॉल की पत्नी नादिरा नायपॉल ने एक बयान में कहा,‘‘ उन्होंने जो हासिल किया वह महान था और उन्होंने अंतिम सांस अपने प्रियजनों के बीच ली। उनका जीवन अद्भुत रचनात्मकताओं एवं प्रयासों से भरा था।’’
नायपॉल ने अपने जीवन में 30 से अधिक किताबें लिखीं। ‘द मिस्टिक मैसूर’ उनकी पहली किताब थी। वर्ष 1961 में प्रकाशित ‘अ हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास’ उनकी सबसे मशहूर एवं लोकप्रिय किताब है।
‘द मिमिक मेन’ (1967) , ‘इन ए फ्री स्टेट’ (1971) , ‘गुरिल्लाज’ (1975), ‘ए बेंड इन द रिवर, (1979) , ‘ए वे इन वर्ल्ड’ (1994) , ‘द इनिग्मा ऑफ अराइवल‘ (1987), ‘बियॉन्ड बिलिफ : इस्लामिक एक्सकर्जन अमंग द कन्वर्टेड पीपुल्स’ (1998), ‘हॉफ ए लाइफ’ (2001), ‘द राइटर एंड द वर्ल्ड’ (2002), ‘लिटरेरी ऑकेजन्स (2003), ‘द नॉवेल मैजिक सीड्स’ (2004) आदि उनकी मशहूर रचनाओं में से हैं।
नायपॉल को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें वर्ष 1971 में मिला ‘मैन बुकर प्राइज’ और वर्ष 1990 में मिला ‘नाइटहुड’ शामिल है।
नायपॉल को वर्ष 2001 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल का जन्म 17 अगस्त 1932 में त्रिनिदाद में एक भारतीय हिंदू परिवार में हुआ था और 18 साल का होने पर वह छात्रवृत्ति हासिल कर ऑक्सफोर्ड में पढ़ने के लिए चले गए। इसके बाद वह इंग्लैंड में बस गए।
नायपॉल ने पहली शादी पेट्रीसिया एन हेल नायपॉल से वर्ष 1955 में की थी लेकिन वर्ष 1996 में पेट्रीसिया का निधन हो गया और उसी वर्ष नायपॉल पाकिस्तानी पत्रकार नादिरा अल्वी से शादी के बंधन में बंध गए।

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले बिल्डर पर सौ करोड़ का जुर्माना

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के आदेश को बरकरार रखते हुए पुणे के एक बिल्डर पर पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखकर निर्माण करने पर प्रोजेक्ट की कुल लागत का 10 फीसदी जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना 100 करोड़ रुपये बैठ रहा है।
कोर्ट ने इस मामले में प्रोजेक्ट प्रोपोनेंट पर भी पांच करोड़ रुपये का जुर्माना ठोका है। लेकिन, प्रोजेक्ट को गिराने का आदेश देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा, इस मामले में जिन लोगों ने फ्लैट और दुकानें ले ली हैं उनका नुकसान होगा। हालांकि कोर्ट अवैध निर्माण को वैध करने के खिलाफ है लेकिन इस केस में उसके सामने कोई विकल्प नहीं है।
जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ ने यह जुर्माना गंगा गोयल डेवलपर्स इंडिया प्रा. लि. पर लगाया है। बिल्डर ने पर्यावरण क्लीयरेंस का उल्लंघन कर निर्माण खड़ा कर दिया था। इसके अलावा उसने कई म्यूनिसिपल कानूनों का भी उल्लंघन किया था। बिल्डर के खिलाफ एक स्थानीय व्यक्ति तानाजी बालासाहेब गंभीरे ने एनजीटी में शिकायत की थी।
एनजीटी ने बिल्डर को पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन का दोषी पाया और 20016 में उसे 100 करोड़ रुपये पर्यावरणीय मुआवजे के तौर पर जमा करने के आदेश दिया। साथ ही एनजीटी ने यह भी आदेश दिया था कि महाराष्ट्र के मुख्य सचिव पर्यावरण प्रमुख सचिव के व्यवहार की जांच करें और उसकी रिपोर्ट एनजीटी में पेश करें। इस प्रोजेक्ट में 807 फलैट, 117 दुकान/ ऑफिस, सांस्कृतिक केंद्र और क्लब हाउस हैं।

बृजेश कुमारी बिजली फॉल्ट ठीक करने वाली पहली ‘लाइनवुमेन’

लखनऊ : यूपी में अब लाइनवूमेन बिजली फाल्ट ठीक करती नजर आएंगी। बेहद मुश्किल और मेहनत भरा यह काम अब तक पुरुषों के लिए ही माना जाता था लेकिन एटा के जलेसर की बृजेश कुमारी बघेल ने इस धारणा को बदल दिया। वह प्रदेश की पहली लाइनवूमेन बनीं जो पुरुष सहकर्मियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तार, खंभे और ट्रांसफार्मर के फाल्ट ठीक करने का काम बखूबी कर रही हैं। इस तरह उन्होंने किसी पर निर्भर रहने की अपेक्षा अपने छह बच्चों का जिम्मेदारी खुद उठाना बेहतर समझा।
बड़ी जिम्मेदारी तो संभाली मुश्किल डगर

मार्च 2017 में बृजेश के पति राकेश उर्फ रविंद्र कुमार की बिजली दुर्घटना में मौत हो गई। तीन लड़कियों और तीन लड़कों की पूरी जिम्मेदारी आ गई। बृजेश ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने बिजली विभाग से मिली मदद के बाद भी काम करने की गुजारिश की। एसडीओ जलेसर पवन वर्मा ने ग्रेजुएट पास बृजेश को आफिस और फील्ड में काम करने का विकल्प दिया तो उन्होंने फील्ड में लाइनवूमेन के तौर पर काम करना स्वीकार किया। तीन महीने से बृजेश काम कर रही हैं। साड़ी पहनकर काम करने में दिक्कतें आईं तो उन्होंने सलवार-सूट पहनकर काम करना शुरू किया। जलेसर के एसडीओ पवन वर्मा कहते हैं कि हमने शुरुआत में उन्हें अन्य लाइनमैन के साथ सहयोगी के तौर पर रखा, अब वह काम सीख गईं हैं। बृजेश की सबसे बड़ी बेटी इंटरमीडिएट में पढ़ती है, अन्य बच्चे भी स्कूल जाते हैं। वह कहती हैं कि बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए ही इतनी मेहनत वाली नौकरी कर रही हैं।

महिलाओं के लिए नया अवसर

प्रदेश में महिलाओं के लिए रोजगार का एक नया रास्ता और खुल गया। जल्द ही यूपी पावर कारपोरेशन अपने अन्य वितरण निगमों में भी महिलाओं को इस तरह काम करने का मौका दे सकता है। अधीक्षण अभियंता शेष बघेल कहते हैं कि आपरेटिंग स्टाफ के तौर पर महिलाओं की तैनाती शून्य है। अब बृजेश की तैनाती से संभव है इस में महिलाएं अधिक आएं।

अहम महिला अफसर :
एमडी यूपी पॉवर कारपोरेशन – अपर्णा यू, आईएएस
निदेशक, विद्युत सुरक्षा निदेशालय – शुभ्रा सक्सेना, आईएएस
निदेशक, केस्को, कानपुर – सौम्या अग्रवाल, आईएएस

मुश्किलें :
पहनावा
काम का समय तय नहीं
बेहद भारी और मुश्किल उपकरणों का उठाना-लगाना

हरिवंश : पत्रकारिता से उच्च सदन के उपसभापति तक का सफर

नयी दिल्ली : राज्यसभा में आज राजग के उम्मीदवार के रूप में उपसभापति पद पर निर्वाचित हुए हरिवंश सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं और राजनीति में वह जयप्रकाश नारायण के आदर्शों से प्रेरित हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज उच्च सदन में उन्हें उपसभापति पद पर निर्वाचित होने के बाद बधाई देते हुए कहा कि वह ‘समाज-कारण’ से जुड़े रहे और ‘राज-कारण’ से दूर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिताबदियारा गांव में 30 जून, 1956 को जन्मे हरिवंश को जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए और पत्रकारिता में डिप्लोमा की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही मुंबई में उनका ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समूह में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में 1977-78 में चयन हुआ। वह टाइम्स समूह की साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ में 1981 तक उपसंपादक रहे।

उन्होंने 1981 -84 तक हैदराबाद एवं पटना में बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी की। 1984 में उन्होंने पत्रकारिता में वापसी की और 1989 अक्तूबर तक आनंद बाजार पत्रिका समूह से प्रकाशित ‘रविवार’ साप्ताहिक पत्रिका में सहायक संपादक रहे।

हरिवंश ने वर्ष 1990-91 के कुछ महीनों तक तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार (संयुक्त सचिव) के रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय में भी काम किया।

ढाई दशक से अधिक समय तक ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक रहे हरिवंश को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने राज्यसभा में भेजा। उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार का बेहद करीबी माना जाता है।

राज्यसभा में आज उपसभापति पद के लिए हुए चुनाव में हरिवंश को 125 और उनके समक्ष खड़े हुए विपक्ष के उम्मीदवार बी के हरिप्रसाद को 105 मत मिले।

उपसभापति पद पर निर्वाचित होने के बाद उन्हें सभी दलों के नेताओं ने बधाई दी। किंतु प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें बधाई देते समय उनके जीवन के कई महत्वपूर्ण और लगभग अपरिचित पहलुओं का भी दिलचस्प ढंग से उल्लेख किया।

हरिवंश ने कई पुस्तकें लिखी और संपादित की हैं। इनमें ‘दिसुम मुक्तगाथा और सृजन के सपने’, ‘जोहार झारखंड’, ‘झारखंड अस्मिता के आयाम’, ‘झारखंड सुशासन अभी भी संभावना है’, ‘बिहार रास्ते की तलाश’ शामिल हैं।

नीरज को एशियाई खेलों का ध्वजवाहक चुना गया

नयी दिल्ली : स्टार भाला फेंक एथलीट नीरज चोपड़ा को 18 अगस्त को जकार्ता में होने वाले एशियाई खेलों के उद्घाटन समारोह के लिये भारतीय दल का ध्वजवाहक चुना गया।

भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) के अध्यक्ष नरिंदर बत्रा ने दल के लिये आयोजित रवानगी समारोह के दौरान यह घोषणा की। एशियाई खेलों का आयोजन 18 अगस्त से दो सितंबर तक जकार्ता और पालेमबांग में किया जायेगा।
बीस वर्षीय नीरज मौजूदा राष्ट्रमंडल खेलों के चैम्पियन हैं और उन्होंने पिछले महीने फिनलैंड में सावो खेलों में स्वर्ण पदक जीता था।
नीरज ने 2017 में एशियाई एथलेटिक चैम्पियनशिप में 85.23 मीटर के थ्रो से स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। उन्होंने पोलैंड में 2016 आईएएएफ विश्व अंडर-20 चैम्पियनशिप में भी स्वर्ण पदक हासिल किया था।
पूर्व हाकी कप्तान सरदार सिंह 2014 एशियाई खेलों में भारत के ध्वजवाहक थे।
भारतीय खिलाड़ियों ने दक्षिण कोरिया के इंचियोन में पिछले चरण में 11 स्वर्ण, 10 रजत और 36 कांस्य पदक से कुल 57 पदक हासिल किये थे।

आजादी पर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यह कहा था

15 अगस्त 1947 की आधी रात को जब दुनिया के कई हिस्सों में लोग नींद में डूबे हूए थे, उस समय भारत में जश्न का माहौल था। लोगों की आंखों में न नींद थी और न कोई आलस। देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिलने की खुशी ऐसी थी कि सबकी आंखों में सिर्फ आने वाले भारत के सपने तैर रहे थे। ऐसे माहौल में देश के पहले प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आजादी का पहला भाषण दिया था। इस भाषण को ‘ए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं उन्होंने इस भाषण में क्या कहा था

‘हमने नियति को मिलने का एक वचन दिया था, और अब समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएं, पूरी तरह ना सही, लेकिन बहुत हद्द तक। आज रात बारह बजे, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई सुबह के साथ उठेगा। एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत ही कम आता है, जब हम पुराने को छोड़ नए की तरफ जाते हैं, जब एक युग का अंत होता है, और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा, अपनी बात कह सकती है। यह एक संयोग है कि इस पवित्र मौके पर हम समर्पण के साथ खुद को भारत और उसकी जनता की सेवा, और उससे भी बढ़कर सारी मानवता की सेवा करने के लिए प्रतिज्ञा ले रहे हैं।

इतिहास के आरम्भ के साथ ही भारत ने अपनी अंतहीन खोज प्रारंभ की, और ना जाने कितनी ही सदियां इसकी भव्य सफलताओं और असफलताओं से भरी हुई हैं। चाहे अच्छा वक़्त हो या बुरा, भारत ने कभी इस खोज से अपनी नजर नहीं हटाई और कभी भी अपने उन आदर्शों को नहीं भूला जिसने इसे शक्ति दी। आज हम दुर्भाग्य के एक युग का अंत कर रहे हैं और भारत पुनः खुद को खोज पा रहा है। आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो महज एक कदम है, नए अवसरों के खुलने का, इससे भी बड़ी विजय और उपलब्धियां हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं। क्या हममें इतनी शक्ति और बुद्धिमत्ता है कि हम इस अवसर को समझें और भविष्य की चुनौतियों को स्वीकार करें?

भविष्य में हमें विश्राम करना या चैन से नहीं बैठना है बल्कि निरंतर प्रयास करना है ताकि हम जो वचन बार-बार दोहराते रहे हैं और जिसे हम आज भी दोहराएंगे उसे पूरा कर सकें। भारत की सेवा का अर्थ है लाखों-करोड़ों पीड़ित लोगों की सेवा करना। इसका मतलब है गरीबी और अज्ञानता को मिटाना, बिमारियों और अवसर की असमानता को मिटाना। हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही महत्वाकांक्षा रही है कि हर एक आंख से आंसू मिट जाएं। शायद ये हमारे लिए संभव न हो पर जब तक लोगों कि आंखों में आंसू हैं और वे पीड़ित हैं तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा।

और इसलिए हमें परिश्रम करना होगा, और कठिन परिश्रम करना होगा ताकि हम अपने सपनों को साकार कर सकें। वो सपने भारत के लिए हैं, पर साथ ही वे पूरे विश्व के लिए भी हैं, आज कोई खुद को बिलकुल अलग नहीं सोच सकता क्योंकि सभी राष्ट्र और लोग एक दुसरे से बड़ी समीपता से जुड़े हुए हैं। शांति को अविभाज्य कहा गया है, इसी तरह से स्वतंत्रता भी अविभाज्य है, समृद्धि भी और विनाश भी, अब इस दुनिया को छोटे-छोटे हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता है। हमें स्वतंत्र भारत का महान निर्माण करना है जहां उसके सारे बच्चे रह सकें।

आज नियत समय आ गया है, एक ऐसा दिन जिसे नियति ने तय किया था – और एक बार फिर वर्षों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और स्वतंत्र खड़ा है। कुछ हद्द तक अभी भी हमारा भूत हमसे चिपका हुआ है, और हम अक्सर जो वचन लेते रहे हैं उसे निभाने से पहले बहुत कुछ करना है। पर फिर भी निर्णायक बिंदु अतीत हो चुका है, और हमारे लिए एक नया इतिहास आरम्भ हो चुका है, एक ऐसा इतिहास जिसे हम गढ़ेंगे और जिसके बारे में और लोग लिखेंगे।

ये हमारे लिए एक सौभाग्य का क्षण है, एक नए तारे का उदय हुआ है, पूरब में स्वतंत्रता का सितारा। एक नयी आशा का जन्म हुआ है, एक दूरदृष्टिता अस्तित्व में आई है। काश ये तारा कभी अस्त न हो और ये आशा कभी धूमिल न हो।! हम सदा इस स्वतंत्रता में आनंदित रहें।

भविष्य हमें बुला रहा है। हमें किधर जाना चाहिए और हमारे क्या प्रयास होने चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानो और कामगारों के लिए स्वतंत्रता और अवसर ला सकें, हम गरीबी, अज्ञानता और बिमारियों से लड़ सकें, हम एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश का निर्माण कर सकें, और हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना कर सकें जो हर एक आदमी-औरत के लिए जीवन की परिपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सकें?

हमे कठिन परिश्रम करना होगा। हम में से से कोई भी तब तक चैन से नहीं बैठ सकता है जब तक हम अपने वचन को पूरी तरह निभा नहीं देते, जब तक हम भारत के सभी लोगों को उस गंतव्य तक नहीं पहुंचा देते जहां भाग्य उन्हें पहुंचाना चाहता है।

हम सभी एक महान देश के नागरिक हैं, जो तीव्र विकास की कगार पे है, और हमें उस उच्च स्तर को पाना होगा। हम सभी चाहे जिस धर्म के हों, समानरूप से भारत मां की संतान हैं, और हम सभी के बराबर अधिकार और दायित्व हैं। हम और संकीर्ण सोच को बढ़ावा नहीं दे सकते, क्योंकि कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या कर्म संकीर्ण हैं।

विश्व के देशों और लोगों को शुभकामनाएं भेजिए और उनके साथ मिलकर शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बढ़ावा देने की प्रतिज्ञा लीजिए। और हम अपनी प्यारी मात्रभूमि, प्राचीन, शाश्वत और निरंतर नवीन भारत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और एकजुट होकर नए सिरे से इसकी सेवा करते हैं।’

72वां स्वतंत्रता दिवस: 15 अगस्त नहीं इस दिन आज़ाद होता भारत

हर हिन्दुस्तानी के दिल में हिन्दुस्तान है और इस हिन्दुस्तान की तारीख में 15 अगस्त बहुत खास दिन है। हिन्दुस्तान यानि हमारा प्यारा भारत इस साल आजादी की 72वीं वर्षगांठ मना रहा है। 15 अगस्त भारतीयों के जेहन में बसी एक ऐसी तारीख है जिसकी तुलना 26 जनवरी छोड़कर शायद ही किसी और दिन से की जा सके मगर आजादी का यह दिन कुछ और भी हो सकता है।  लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत को आज़ादी मिलने के लिए किसी और तारीख पर सहमति बनी थी।

ये था मामला

असल में कांग्रेस साल 1930 से ही स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए 26 जनवरी के दिन का चयन कर चुकी थी। हालांकि इंडिया इंडिपेंडेंस बिल के मुताबिक ब्रिटिश प्रशासन ने सत्ता हस्तांतरण के लिए 3 जून 1948 की तारीख तय की गई थी। फरवरी 1947 में नए चुनकर आए ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट रिचर्ड एटली ने घोषणा की थी कि, सरकार तीन जून 1948 से भारत को पूर्ण आत्म प्रशासन का अधिकार प्रदान कर देगी। लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को देखते हुए सी.राजागोपालचारी ने कहा कि 1948 तक रुकने की क्या जरूरत है। फरवरी 1947 में ही लुई माउंटबेटन को भारत का आखिरी वायसराय नियुक्त किया गया था। माउंटबेटन पहले पड़ोसी देश बर्मा के गवर्नर हुआ करते थे। उन्हें ही व्यवस्थित तरीके से भारत को सत्ता हस्तांतरित करने की जिम्मेदारी भी दी गई थी।

माउंटबेटन ने क्या किया

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि माउंटबेटन ब्रिटेन के लिए 15 अगस्त की तारीख को शुभ मानता था क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के वक़्त जब 15 अगस्त 1945 को जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया था, तब माउंटबेटन अलाइड फोर्सेज का कमांडर हुआ करता था। इसलिए माउंटबेटन ने ब्रिटिश प्रशासन से बात करके भारत को सत्ता हस्तांतरित करने की तिथि 3 जून 1948 से 15 अगस्त 1947 कर दी। हालांकि एक दूसरे इतिहासकार धड़े का तर्क ज्यादा पुष्ट मालूम पड़ता है।

भारत को 3 जून 1948 के बजाय 15 अगस्त 1947 को ही सत्ता हस्तांतरित करने को लेकर एक और कारण यह भी बताया जाता है कि, ब्रिटिशों को इस बात की भनक लग गयी थी कि, मोहम्मद अली जिन्ना जिनको कैंसर था और वो ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजों को चिंता थी कि अगर जिन्ना नहीं रहे तो महात्मा गांधी अलग देश न बनाने के प्रस्ताव पर मुसलमानों को मना लेंगे।

माउंटबेटन ने की थी साजिश!

असल में जिन्ना ही वह चेहरा थे जिनको आगे रखकर ब्रिटिशों ने भारत को दो टुकड़ों में बांटने की साजिश रची थी और देश में ब्रिटिशों ने ऐसा हिन्दू- मुस्लिम ध्रुवीकरण किया जिसकी आग सदियों तक नहीं मिटने वाली थी। अगर जिन्ना की मृत्यु ब्रिटिशों के प्लान के पूरा होने से पहले हो जाती तो उन्हें मुश्किल आ सकती थी। बता दें कि 15 अगस्त ब्रिटिशों के लिए शुभ दिन था क्योंकि इसी दिन ब्रिटेन और मित्र राष्ट्रों ने जापान को आत्म समर्पण करवाकर द्वतीय विश्वयुद्ध जीता था इसलिए इसे दिन भारत को भी सत्ता हस्तांतरित करने का निर्णय लिया गया। अंततः 15 अगस्त 1947 को ब्रिटेन ने भारत को सत्ता हस्तांतरित कर दिया और जैसा कि अंग्रेजों को अंदेशा था यह सब हो जाने के कुछ ही महीने बाद जिन्ना की मृत्यु हो गई।

संवेदनहीन राजनीति की जद में बच्चे और शेल्टर होम्स

सुषमा त्रिपाठी
हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि समस्या को कांड में तब्दील कर राजनीतिक हथियार बना लिया जाता है और नतीजा यह है कि लोग राजनीति में उलझ जाते हैं। समस्या पीछे छूट जाती है। यही हो रहा है मुज्जफरपुर के बाद देवरिया में। मुज्जफरपुर कांड पर सुप्रीम कोर्ट खुद तत्पर है, मामला सीबीआई के पास है। बिहार सरकार ने तय कर लिया है कि बाल सुधार गृहों का संचालन अब वह खुद करेगी। योगी आदित्यनाथ ने भी सीबीआई जाँच की बात कह दी है मगर शेल्टर होम कांड को राजनीति के वार से आप कैसे बचाने जा रहे हैं? सबसे खौफनाक बात है कि बच्चियों की तकलीफ भूलकर राजनीति संवेदनहीनता की हदें पार कर चुकी है और अपराधी बेशर्म हँसी हँस रहे हैं। इतनी हिम्मत बगैर प्रश्रय पाये तो आ नहीं सकती। ऐसा नहीं होता तो बिहार के सीएम नीतीश कुमार मंत्री मंजू वर्मा का इस्तीफा अब तक माँग चुके होते। अब जब कि सबूत भी सामने आ चुके हैं कि बिहार में समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा और बृजेश ठाकुर के बीच जनवरी से अब तक 17 बार फोन पर बातचीत हुई थी।

इतनी देर क्यों नीतीश जी?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह स्कैंडल मामले में मुख्य आरोपी बृजेश ठाकुर के कॉल डिटेल से यह खुलासा हुआ है। मुजफ्फरपुर मामले को लेकर समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा पर इस्तीफे की तलवार लटक रही है। हालांकि सोमवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही कहा था कि किसी को अकारण जिम्मेदार ठहराकर इस्तीफ़ा कैसे लिया जा सकता है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि अगर कुछ भी साक्ष्य सामने आता है तो वो इस्तीफ़ा लेने में देर नहीं करेंगे। अब मुजफ्फरपुर मामले की जांच में लगे अधिकारियों को प्रारंभिक छानबीन में पता लगा है कि मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा मामले में मुख्य अभियुक्त बृजेश ठाकुर के सम्पर्क में थे। बृजेश ठाकुर के फोन की कॉल डिटेल से यह जानकारी सामने आई है। ऐसी स्थिति में सीएम किस बात का इन्तजार कर रहे हैं। हैरत की बात यह है कि कांड में मामला दर्ज होने के बाद भी ब्रजेश ठाकुर को सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं। कोई जानने की कोशिश नहीं कर रहा कि आखिर बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित एक बालिका गृह यौन शोषण मामले का मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में प्रकाशित होने वाले तीन अखबारों का मालिक भी है। उस पर इन अखबारों की कुछ प्रतियां छपवाकर उस पर बड़ा-बड़ा सरकारी विज्ञापन पाने में कामयाब होने के आरोप हैं।

मंजू वर्मा को क्यों बचाया जा रहा है

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ब्रजेश तीन अखबारों मुजफ्फरपुर से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र प्रात: कमल, पटना से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार न्यूज नेक्स्ट और समस्तीपुर जिला से उर्दू में प्रकाशित एक अखबार हालात-ए-बिहार से प्रत्यक्ष या परोक्ष से जुड़ा हुआ है। ब्रजेश को प्रात: कमल के विशेष संवाददाता के रूप में भी सूचीबद्ध किया गया है। उसके पुत्र राहुल आनंद न्यूज नेक्स्ट के संवाददाता और हालात-ए-बिहार के संवाददाता के रूप में एक शाईस्ता परवीन तथा संपादक के रूप में रामशंकर सिंह का नाम दर्शाया गया है। ब्रजेश को पीआईबी और राज्य सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (आईपीआरडी) दोनों से मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा प्राप्त था, जो कि उनके खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद उनकी मान्यता दोनों जगहों से रद्द कर दी गयी। आईपीआरडी सूत्रों ने बताया कि उत्तर बिहार से जुड़ी परियोजनाओं का सरकारी विज्ञापन प्रात: कमल अखबार का प्रकाशन शुरू होने के समय से प्रकाशित हो रहा है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ब्रजेश के स्वामित्व वाले हिंदी दैनिक की 300 से अधिक प्रतियां प्रकाशित नहीं होती हैं, लेकिन प्रतिदिन इसके 60,862 प्रतियां बिक्री दिखाया गया था, जिसके आधार पर उसे बिहार सरकार से प्रति वर्ष करीब 30 लाख रुपये के विज्ञापन मिलते थे।

क्या मेनका के इस बयान के बाद सांसद गम्भीर होंगे

आखिर ये कैसे सम्भव हो पा रहा है? सबसे बड़ी बात क्या बच्चे और वंचित बच्चे आपकी प्राथमिकता सूची में हैं? क्या आप वाकई इस मसले को लेकर गम्भीर हैं? क्या सांसद अपनी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं या उन्होंने राई रक्ती भर भी कोशिश की है। खुद देश की महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी को कहना पड़ रहा है कि उनको समय से रिपोर्ट ही नहीं मिल रही है। उनका मानना है कि अगर जाँच करवायी जाये तो ऐसे कई मामले सामने आयेंगे और हम सब जानते हैं कि यह सही है। मुजफ्फरपुर और देवरिया में फर्क सिर्फ इतना है कि ये दो अलग अलग राज्यों में हैं। मुजफ्फरपपुर मामले का मुख्य गुनहगार हवालात में है तो देवरिया शेल्टर होम केस में यूपी सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए जिलाधिकारी को हटा दिया है। केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि ये न सिर्फ भयावह है, बल्कि इस तरह की घटनाओं के सामने आने के बाद दुख होता है। उन्हें पता है कि इस तरह की बहुत सी घटनाएं होती होंगी लेकिन हमने उन संस्थाओं को पैसे देने के अलावा ध्यान नहीं दिया। इस तरह के घृणित अपराध को रोकने के लिए हमें पुख्ता कदम उठाने ही होंगे। मेनका गांधी ने कहा कि वो सांसदों के सामने प्रस्ताव रखती हैं कि वो अपने संसदीय क्षेत्र में जाकर इस संबंध में जानकारी जुटा कर उन्हें रिपोर्ट दें। सांसदों द्वारा प्राप्त रिपोर्ट के बाद वो तत्काल कार्रवाई करेंगी। उन्होंने कहा कि कुछ सफेदपोश लोग इस तरह के काले कारनामों को अंजाम दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की समस्या से निजात पाने के लिए एक हजार औरतों और एक हजार बच्चों के लिए बड़े शेल्टर होम को बनाने की जरूरत है। हमें छोटे छोटे सेंटर्स के गठन से बचना होगा। उनका मंत्रालय बड़े सेंटर्स के गठन के लिए धन मुहैया कराएगा। आप सोशल मीडिया पर भी इसे बड़े भयावह तरीके से पेश करते हैं और बच्चों पर हो रहे अपराधों के प्रति तो बिल्कुल संवेदनशील नहीं हैं। पीड़िता की तस्वीरें और जबरन उनका इंटरव्यू लेकर अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाना एक भद्दे मजाक के अलावा कुछ नहीं हो सकता। कठुआ मामले में भी मीडिया हाउसों को चेतावनी मिली थी। कोई ऐसी ठोस प्रणाली नहीं है जो ऐसे शेल्टर होम्स की निगरानी करे। हम यहाँ सिर्फ बिहार, यूपी या किसी खास राज्य की बात इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि सारे देश में हालात ऐसे हैं, आप कितनी घटनायें सामने रखेंगे?

जनता ही कुछ कर सकती है

हैरानी है कि तमाम कानूनों, एजेंसियों, बाल सुधार अभियानों, संस्थाओं और आयोगों के अलावा पुलिस और सरकार की विशाल मशीनरी हाथ पर हाथ धरे ही बैठी रहती, अगर टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस (टिस) के छात्रों का एक अध्ययन दल बिहार न पहुंचता और वहाँ बाल संरक्षण में काम कर रहे एनजीओ की सोशल ऑडिट न करता। पिछले साल अगस्त में नीतिश कुमार सरकार ने ये काम टिस को सौंपा था। इस साल अप्रैल में टिस अध्ययन दल ने जो रिपोर्ट बिहार सरकार को सौंपी उसमें छह शॉर्ट स्टे होम्स में और 14 शेल्टरों में बाल यौन उत्पीड़न के मामले बताए गए थे।
बिहार सरकार एनजीओ की मदद से 110 शेल्टर होम या संरक्षण गृह चलाती है। उत्तर प्रदेश के देवरिया में भी ऐसा ही एक संरक्षण गृह सामने आया जो एक दंपत्ति चला रहा था। वहां से भी 24 लड़कियों को छुड़ाया गया और तीन लोगों की गिरफ्तारी हुई है. कुछ समय पहले झारखंड के रांची में मिशनरीज़ ऑफ चेरेटी की दो ननों पर बच्चा चोरी का आरोप लगा था।
दुनिया की कुल बाल आबादी में 19 फीसदी बच्चे भारत में हैं. देश की एक तिहाई आबादी में, 18 साल से कम उम्र के करीब 44 करोड़ बच्चे हैं। सरकार के ही एक आकलन के मुताबिक 17 करोड़ यानी करीब 40 प्रतिशत बच्चे अनाश्रित, वलनरेबल हैं जो विपरीत हालात में किसी तरह बसर कर रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक और भौगोलिक तौर पर वंचित और उत्पीड़ित बच्चों के अधिकारों की बहाली और उनके जीवन, शिक्षा, खानपान और रहन-सहन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। महिला और बाल कल्याण के लिए 1966 में बना राष्ट्रीय जन सहयोग और बाल विकास संस्थान, एनआईपीसीसीडी बच्चों और महिलाओं के समग्र विकास के लिए काम करता है. बच्चों पर केंद्रित राष्ट्रीय बाल नीति, 2013 में अस्तित्व में आ पाई। बच्चों पर यौन अपराधों को रोकने के लिए पोक्सो कानून 2012 में लाया गया. 2014 में जुवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) बिल लाया गया। जेजे एक्ट 2000 में बना था, 2006 और 2011 में दो बार इसमे संशोधन किए गए। जहां तक बाल कल्याण नीतियों की बात है तो समन्वित बाल सुरक्षा योजना, आईसीपीएस चलाई जा रही है। जिसका आखिरी आंकड़ा 2014 तक का है जिसके मुताबिक 317 स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसियां (एसएए) और अलग अलग तरह के 1501 होम्स के लिए 329 करोड़ रुपए आवंटित किए गए और 91,769 बच्चों को इनका लाभ प्राप्त हुआ। आईसीपीएस के तहत ही देश के ढाई सौ से ज्यादा जिलों में चाइल्डलाइन सेवाएं चलाई जा रही हैं। बच्चों के उत्पीड़न और उनकी मुश्किलों का हल करने का दावा इस सेवा के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन लगता नहीं कि मुजफ्फरपुर या देवरिया में बच्चियों की चीखें इन चाइल्डलाइन्स तक पहुँच पाई हों।

आखिर यह हँसी किसके दम पर है

2007 में विधायी संस्था के रूप में गठित, नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में इस समय 1300 गैरपंजीकृत चाइल्ड केयर संस्थान (सीसीआई) हैं यानी वे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत रजिस्टर नहीं किए गए हैं। देश में कुल 5850 सीसीआई हैं. और कुल संख्या 8000 के पार बताई जाती है। इस डाटा के मुताबिक सभी सीसीआई में करीब दो लाख तैंतीस हजार बच्चे रखे गए हैं। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने देश में चलाए जा रहे समस्त सीसीआई को रजिस्टर करा लेने का आदेश दिया था. लेकिन सवाल पंजीकरण का ही नहीं है. पंजीकृत तो कोई एनजीओ करा ही लेगा क्योंकि उसे फंड या ग्रांट भी लेना है, लेकिन कोई पंजीकृत संस्था कैसा काम कर रही है इसपर निरंतर निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था तो रखनी ही होगी. डिजीटलाइजेशन पर जोर के बावजूद सरकार अपने संस्थानों और अपने संरक्षण में चल रहे संस्थानों की कार्यप्रणाली और कार्यक्षमता की निगरानी का कोई अचूक सिस्टम विकसित नहीं कर पा रही है।
बंगाल की स्थिति कुछ अलग नहीं है। यहाँ भी ऐसे मामले सामने आये हैं मगर यहाँ भी राजनीति ने मुद्दे को दबा रखा है।
अब शेल्टर होम्स को लेकर एक इत्मिनान रखने वाला रवैया छोड़ देना चाहिए क्योंकि दक्षिण 24 परगना में शिशुओं की खरीद-फरोख्त का मामला बहुत पुराना नहीं हुआ है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इसमें बड़े-बड़े नाम सामने आये थे। वहीं एनसीआरबी की हालिया रिपोर्ट कहती है कि देश भर में बच्चों के खिलाफ होने वाले आपराधिक मामलों में 12,786 की वृद्धि हुई है। 2015 में आँकड़ा जहाँ 94,172 था, वहीं आँकड़ा 2016 में 1,06,958 हो गया। वहीं बच्चों के लिए काम कर रही संस्था क्राई के मुताबिक पिछले एक दशक में यह आँकड़ा 500 गुना बढ़ चुका है। बिहार के बाल सुधार गृह का मामला तो बानगी भर है। बच्चों के खिलाफ सबसे अधिक अपराध उत्तर प्रदेश (15 प्रतिशत), महाराष्ट्र (14 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (13 प्रतिशत), दिल्ली और पश्‍चिम बंगाल में हुए और इन 5 राज्यों में ही 50 प्रतिशत मामले दर्ज किये गये हैं। अब तक आप अपहरण से परेशान थे मगर सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि बच्चों से होने वाले दुष्कर्म के आँकड़े 18 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। एनसीआरबी का हालिया जो आँकड़ा है वह बताता है कि लापता बच्चों को लेकर सबसे अधिक मामले पश्‍चिम बंगाल में सामने आये जिसका प्रतिशत 15.1 प्रतिशत है मगर वर्ष के अन्त तक 55, 944 बच्चों का पता लगाया गया था। राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री डॉ. शशि पाँजा ने एक कार्यक्रम में पूछे जाने पर कहा था कि शिकायत अधिक दर्ज होने के कारण संख्या बढ़ी है। इसके अतिरिक्त कई बार ये बच्चे बांग्लादेशी होते हैं और भाषायी समानता होने के कारण इनको बंगाली समझ लिया जाता है।

बच्चे नहीं बचेंगे तो भविष्य भी नहीं बचेगा

यह बात अपनी जगह है मगर क्या इतने भर से हम आश्‍वस्त हो सकते हैं? पिछले साल ही राज्य के कई होम्स में शिशुओं की तस्करी और 10 से अधिक बच्चों की खरीद-फरोख्त का जो मामला सामने आया था, उसमें कारा (सेन्ट्रल एडप्शन रिसोर्स अथॉरिटी) में अनियमितताओं के आरोप लगे थे। शिशु तस्करी का मामला दक्षिण 24 परगना या उत्तर 24 परगना ही नहीं बल्कि उत्तर बंगाल तक जा पहुँचा था। अभी भी यह मामला बंद नहीं हुआ है। इसके पहले नवम्बर 2016 में उत्तर 24 परगना के बादुरिया और मानसिक जरूरतमंदों के ठाकुरपुकुर स्थित होम से 12 बच्चों को पुलिस ने बचाया था। इसके पहले हुगली के गुड़ाप में शेल्टर होम में भी उत्पीड़न का मामला सामने आया था। अगर हम वाकई अपनी समस्याओं को लेकर गम्भीर हैं तो जरूरी है कि राजनीति को इससे दूर करें, वरना आँकड़ों को लेकर रोने का कोई मतलब नहीं है। शेल्टर होम्स पर निगरानी बढ़ाइए और जनप्रतिनिधियों को रिपोर्ट देने के लिए बाध्य कीजिए। सरकारों को निजी संस्थाओं पर अपनी निर्भरता कम करके अपना तंत्र मजबूत कर सख्त कदम उठाने होंगे और उससे भी जरूरी है कि हम खुद सक्रिय हों क्योंकि आखिरकार सरकारें आती और जाती रहेंगी…ये बच्चे हमारे हैं, हमारे देश की तकदीर हैं जिसे हम यूँ ही नहीं छोड़ सकते।