Monday, April 13, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने दी सबरीमाला मंदिर में 10-50 साल की उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक मे एक और अहम फैसला सुनाते हुए केरल के सबरीमाला मंदिर के द्वार सभी महिलाओं के लिए खोल दिये हैं। अब इस मंदिर में हर उम्र की महिलाओं को प्रवेश मिलेगा। कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक का नियम रद करते हुए कहा है कि यह नियम महिलाओं के साथ भेदभाव है और उनके सम्मान व पूजा अर्चना के मौलिक अधिकार का हनन करता है। शारीरिक कारणों पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना गलत है। केरल के सबरीमाला मंदिर मे 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी। इसके पीछे मान्यता थी कि इस उम्र की महिलाओं को मासिक धर्म होता है और उस दौरान महिलाएं शुद्ध नहीं होतीं। मंदिर के भगवान अयैप्पा बृम्हचारी स्वरूप में हैं और इस उम्र की महिलाएं वहां नहीं जा सकतीं। इस रोक को सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी गई थी।यह फैसला पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने चार- एक के बहुमत से सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर, आरएफ नारिमन, और डीवाई चंद्रचूड़ ने बहुमत से फैसला देते हुए रोक के नियम को असंवैधानिक ठहराया है।
हालांकि पीठ की पांचवी सदस्य न्यायाधीश इंदू मल्होत्रा ने असहमति जताते हुए रोक के नियम को सही ठहराया है। कहा है कि अयैप्पा भगवान के सबरीमाला मंदिर को एक अलग धार्मिक पंथ माना जाएगा और उसे संविधान के अनुच्छेद 26 में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में संरक्षण मिला हुआ है। वह अपने नियम लागू कर सकता है।मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने स्वयं और जस्टिस खानविल्कर की ओर से दिए गए फैसले में पुराने समय से महिलाओं के साथ चले आ रहे भेदभाव का जिक्र करते हुए कहा है कि उनके प्रति दोहरा मानदंड अपनाया जाता है। एक तरफ तो उन्हें देवी माना जाता है और दूसरी तरफ धार्मिक आस्था के मामले में उन पर कठोर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। इस घिसीपिटी सोच को त्यागना होगा। समाज को महिलाओं से ही ज्यादा पवित्रता और शुद्धता की चाहत रखने की पुरुषवादी धारणा से बराबरी के सिद्धांत की ओर स्थानांतरित होना होगा जो कि महिलाओं को किसी भी तरह से पुरुष से कमतर नहीं समझता। धर्म में पुरुषवादी धारणा को किसी की धार्मिक आस्था और पूजा के अधिकार के ऊपर मान्यता नहीं दी जा सकती। शारीरिक और जैविक बदलाव की आड़ में महिलाओं के दमन को सही नहीं ठहराया जा सकता। जैविक बदलाव के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाला कोई भी नियम संवैधानिक नहीं हो सकता।

राजकपूर की पत्नी कृष्णा राज कपूर का निधन

मुम्बई : दिवंगत अभिनेता राज कपूर की पत्नी कृष्णा राज कपूर का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 87 वर्ष की थी। उनके बेटे रणधीर कपूर ने बताया, “ दिल का दौरा पड़ने से मेरी मां का निधन हो गया। वृद्धावस्था भी इसमें एक बड़ा कारण रहा। उनके निधन से हम बहुत दुखी हैं।’ राज कपूर और कृष्णा मल्होत्रा की शादी 1946 में हुई थी। उनकी पांच संतानों में दो बेटियां – रितु और रीमा हैं, जबकि तीन बेटे रणधीर, ऋषि और राजीव हैं। कृष्णा राज कपूर मशहूर अभिनेता राजेंद्र नाथ, प्रेम नाथ और नरेंद्र नाथ की बहन थीं। उनकी बहन उमा अभिनेता प्रेम चोपड़ा की पत्नी हैं। रिद्धीमा कपूर साहनी ने इंस्टाग्राम पर अपनी दादी को श्रद्धांजलि दी। साहनी ने अपनी दादी की तस्वीर लगाते हुए लिखा, “ मैं आपसे प्यार करती हूं और हमेशा ही करती रहूंगी। भगवान आपकी आत्मा को शांति दे, दादी।’

वाराणसी का वह घर, जहाँ रहे देश के पूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री जी

घर की रसोई में मिट्टी का चूल्हा हो और बेडरूम में पटुआ की सुतली से बिनी खाट तो एक बार आंखों पर यकीन नहीं होगा कि यह जगह देश के प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री की है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि अब मंत्री-विधायक तो दूर सत्ताधारी नेताओं के करीबी रिश्तेदार और कारिंदे भी मौका पाकर चंद दिनों में ही ऊंची हवेलियों के मालिक और कंगाल से करोड़पति बन बैठते हैं। पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे शास्त्री जी का घर आज भी पुराना वाराणसी के रामनगर में उस दौर की स्वच्छ और ईमानदार राजनीति की गवाही दे रहा है।

संस्कृति मंत्रालय ने देश के दूसरे प्रधानमंत्री के मिट्टी के घर को म्यूजियम के रूप में तब्दील कर दिया है। बीते हफ्ते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल राम नाइक ने इसका उद्घाटन किया था। जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री के पैतृक आवास पर तैयार स्मृति भवन उनके जीवन का परिचय देगा। संग्रहालय के पहले कमरे में तैयार वॉर रूम में चीन और पाकिस्तान के युद्ध की दुर्लभ तस्वीरें लगाई गई हैं। शास्त्रीजी के रसोईघर और बैठक को भी उसी समय का लुक दिया गया है।

इसमें दो अक्टूबर 1904 को पूर्व पीएम के जन्म से लेकर 12 जनवरी 1966 को नई दिल्ली में विजय घाट पर अंत्येष्टि तक के बारे में जानकारी दी गई है। पूर्व पीएम की स्मृतियों से जुड़े 150 से अधिक चित्र लगाए गए हैं। काशी के लाल शास्त्री जी की दो अक्टूबर को 14वीं जयंती है। तो आइए, आज जानते हैं सादगी कर्मठता और आदर्श राजनीति के उस चेहरे के बारे में, जो इस दौर की सियासत के लिए सीख भी है और आइना भी।

शास्त्री जी! अब तो अपना मकान बनवा लीजिए

शास्त्री जी के घर की पिछले साल की तस्वीर – फोटो : अमर उजाला
काशी नरेश के किले से महज डेढ़ सौ मीटर के फासले पर घुमावदार गली के दूसरे मोड़ पर महज सवा विस्वा जमीन पर पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कमरे में अभी वह लालटेन सहेज कर रखी गई है, जिसकी रोशनी में उन्होंने पढ़ाई की थी। तीन चूल्हे भी उन दिनों के संघर्ष की आंच दबाए वहीं गड़े हैं, जहां उनकी मां राम दुलारी देवी बेटे के लिए उम्मीदों की भाप में खुद तपा करती थीं। पड़ोस में रहने वाले शास्त्री जी के फुफेरे भाई श्याम मोहन उन दिनों के उनके संघर्ष और सत्ता शीर्ष पर पहुंचने के बाद की ईमानदारी को याद कर भावुक हो उठे। आंखें भर आईं। 1965 के उस दिन की यादों में खो गए जिस रोज पीएम के रूप में शास्त्री जी घर आए थे। वो बताते हैं कि तब उनकी उम्र 14 साल की थी। दोपहर का वक्त था। सुबह से ही पुलिस का पहरा रामनगर में लग गया था। भैया की कार के आगे पीछे दर्जनों गाड़ियां थीं। चौक पर काफिला रुका और भैया अंगरक्षकों को रोक कर सीधे सबसे पहले किले में काशीनरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह से मिलने पहुंचे। वहां से पैदल ही गली से होकर घर आए थे। उनके चाचा काली प्रसाद और किशोरी लाल ने दरवाजे पर अगवानी की थी। घर आते ही उन्होंने सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी।

पंडित जी प्रसाद देने बढ़े तो जांच के लिए सुरक्षा कर्मियों ने लपक लिया। भैया मुस्कुराते हुए बोले- यह मेरा घर है यहां चिंता की कोई बात नहीं। उन्होंने प्रसाद माथे लगा लिया था। उस दिन भैया को देखने के लिए समूचा रामनगर ही नहीं, बनारस और मिर्जापुर से लेकर मुगलसराय तक उमड़ पड़ा था। भैया ने अंगरक्षकों को दूर खड़ा करा दिया। सबका हाल पूछते मिलते-जुलते रहे। तभी पड़ोस के राजनारायण लाल मुलाकात के लिए आ गए। बोले- शास्त्री जी! अब तो अपना मकान बनवा लीजिए। उन्होंने जो जवाब दिया उसे सुनकर वो सहम गए। शास्त्री जी का कहना था कि मेरा तो अभी बहुत अच्छा है। मेरे देश की बहुतायत जनता के पास तो झोपड़ियां ही हैं। चिंता है कि पहले उनके मकान बन जाएं फिर अपने मकान के बारे में सोचूंगा। उस दिन भैया ढाई घंटे घर में रहे। फिर कभी नहीं आ सके। 11 जनवरी 1969 को हम लोग हिल गए, जब उनके हमेशा के लिए इस दुनिया से चले जाने की खबर आई।
 शास्त्री संग्रहालय में आधुनिक तकनीक और पुरातन का संगम
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय में कुल 14 कमरे हैं। इन कमरों में आधुनिक तकनीक और पुरातन का संगम दिखाया गया है। उनका जीवन परिचय महत्वपूर्ण तिथियों के साथ एक कमरे में लगाया गया है। इसमें दो अक्टूबर 1904 को पूर्व पीएम के जन्म से लेकर 12 जनवरी 1966 को नई दिल्ली में विजय घाट पर अंत्येष्टि तक के बारे में जानकारी दी गई है। पूर्व पीएम की स्मृतियों से जुड़ी 150 से अधिक चित्र लगाए गए हैं। एक कमरे में उनके पिता शारदा प्रसाद और माता रामदुलारी देवी का ब्लैक एंड व्हाइट फोटो लगाई गई है। इसमें पूर्व पीएम के वंश वृक्ष का जिक्र किया गया है। एक कमरे में खटिया पर सफेद चादर और तकिया, बल्ब जलता हुआ लालटेन, बेना रखा गया है, जिसमें पूर्व पीएम विश्राम करते थे। इसी कमरे में छत पर जाने के लिए सीढ़ी बनाई गई है। एक कमरे में उनका बैठका था। जहां बैठकर बातचीत करते थे। उनके भाषण और कहे वाक्य को स्लोगन बनाकर लगाया गया है। ललिता शास्त्री की प्रतिमा के पास जवान और किसान को दिखाया गया है।
रसोई घर में सिल बट्टा, ओखली, मूसर, पत्थर की चक्की, चौका, बेलन, मिट्टी का चूल्हा, केतली, मथनी, गिलास, लोटा, थाली, पानी भरने का पीतल का गगरा सहित आदि सामान रखे गए हैं। खटिया, मचिया सहित कई जरूरी सामान रखे हैं। दो कमरों के बीच में आंगननुमा जगह पर जय जवान और जय किसान के नारे बंदूक और हल के जरिए दिखा गया है।

स्मृति भवन में लाल की स्वाभिमानी ललिता की कहानी

स्मृति भवन में लाल की स्वाभिमानी ललिता की कहानी दर्शाई गई है। बच्चों के आग्रह पर पूर्व पीएम ने बतौर प्रधानमंत्री एक फिएट बैंक लोन से खरीदा था। किस्तों की अदायगी के पूर्व वे गोलोकवासी हो गए। बैंक अधिकारियों ने ललिता शास्त्री से किस्त माफ करने का आग्रह किया लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। भारत के लाल की ललिता ने सच्ची अर्धांगिनी के रूप में न केवल लौकिक जीवन में उनका ख्याल रखा बल्कि पारलौकिक जीवन में शास्त्री जी के स्वाभिमानी आत्मा पर आंच नहीं आने दी। अपने पारिवारिक पेंशन से कार के बची किस्तों का भुगतान किया।
(साभार – अमर उजाला)

महात्मा गांधी के दिल की धड़कनें सुनायेगा यह सँग्रहालय

2 अक्टूबर यानि महात्मा गांधी के जन्मदिवस के अवसर पर दिल्ली का नेशनल गांधी म्यूजियम  में गांधी जी के बारे में जानने वाले लोगों को गांधी जी की कृत्रिम दिल की धड़कने भी सुनने को मिलेंगी। इन धड़कनों को गांधी जी की विभिन्न ईसीजी डिटेल से तैयार किया गया है।
ईसीजी डिटेल से बनाई धड़कन
गांधी जी की कृत्रिम दिल की धड़कन को उनकी अलग-अलग अवस्थाओं में ईसीजी डिटेल के आधार पर बनाया गया है। अपने आप में इस तरह का प्रयोग पहली बार किया गया है।
खास डिजिटल किट भी होगी 
महात्मा गांधी के जन्मदिवस के मौके पर नैशनल म्यूजियम एक खास डिजिटल किट भी लाया है जिसे कोई भी 300 रुपए में खरीद सकेगा। इस किट में एक पेनड्राइव दी जाएगी जिसमें 20 गांधी जी के द्वारा और 10 उनपर लिखी गई किताबें शामिल हैं। इसके अलावा इसमें 100 तस्वीरें और महात्मा गांधी की असली आवाज भी हैं। इसमें महात्मा गांधी के पसंदीदा भजन का संग्रह भी मिलेगा।
आजादी से जुड़ी प्रमुख फुटेज है पेन ड्राइव में
पेन ड्राइव में महात्मा गांधी से जुड़ी विडियो और फोटो के अलावा भारत छोड़ों अंदोलन के समय जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस और महात्मा गांधी के भाषण भी शामिल है। इसके अलावा 1931 में महात्मा गांधी के लंदन में दिए गए भाषण को भी इसमें शामिल किया गया है।

पता- राजघाट, दिल्ली
समय – सुबह 9.30 बजे से शाम 5.30 बजे तक

फर्जी खबरों पर लगेगी रोक, गूगल, फेसबुक, ट्विटर करेंगे चुनाव आयोग की मदद

नयी दिल्ली : मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने बताया है कि उन्हें इंटरनेट पर बादशाहत रखने वाली गूगल और सोशल मीडिया मुगल ट्विटर और फेसबुक (एफबी) ने आश्वासन दिया है कि वह चुनाव प्रचार के दौरान अपने प्लेटफार्म से चुनाव को प्रभावित नहीं होने देंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त रावत ने रविवार को बताया कि इन कंपनियों ने कर्नाटक चुनाव के दौरान रोकथाम की अपनी तकनीकों का परीक्षण किया था। यह छोटा सा पायलट प्रोजेक्ट एक शुरुआत थी। लोकसभा चुनाव से पहले चार राज्यों (मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम) में होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान अपेक्षाकृत बड़े पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत होगी। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव इसी साल के अंत में होने हैं।
कम्पनी प्रमुखों से चुनावों में मदद के लिए पूछताछ
रावत ने बताया कि वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा के नेतृत्व वाली कमेटी ने गूगल, फेसबुक और ट्विटर के क्षेत्रीय और स्थानीय प्रमुखों को बुलाकर पूछा था कि वह भारतीय चुनावों की शुद्धता को बरकरार रखने के लिए क्या कर सकते हैं। वह नहीं चाहते कि फेक न्यूज और मतदाताओं को प्रभावित करने वाली सामग्री सोशल मीडिया के इन मंचों पर प्रसारित हो।
गड़बड़ सामग्री को नहीं होने देंगे प्रसारित
मुख्य चुनाव आयुक्त रावत ने बताया कि सभी कंपनियों ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान इंटरनेट और सोशल मीडिया मंचों पर मतदाताओं को भ्रमित या प्रभावित करने वाली विषय सामग्री को प्रसारित न होने देने के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। विशेषकर मतदान से पहले के 48 घंटे अहम होते हैं जब मतदाता को बाहरी किसी व्यक्ति या सामग्री से प्रभावित हुए बगैर खुद से मंथन का समय मिलना चाहिए।
अपने आप आयोग के पास चला जाएगा खर्च का ब्‍योरा
गूगल का कहना है कि वह अपने यहां एक ऐसी प्रणाली स्थापित करेगा जिससे उनके मंचों या कंपनियों में किए गए अतिरिक्त खर्च का ब्योरा खुद ब खुद चुनाव आयोग के पास चला जाएगा। यानी लाइक्स खरीदने या एकाएक लाखों फालोवर्स बढ़ाने जैसे आरोपों को गहराई से समझा जा सकेगा।
धारा 126 में होंगे बदलाव
सिन्हा के अधीन कमेटी इस बात पर भी विचार करेगी कि जनप्रतिनिधि कानून, 1951 की धारा 126 में क्या संभावित बदलाव किए जा सकते हैं। इस धारा के तहत टेलीविजन या अन्य ऐसे उपकरण पर चुनाव क्षेत्र में मतदान से 48 घंटे पहले चुनाव से संबंधित कोई विषय सामग्री प्रसारित करने पर रोक है।

ब्रिटेन बना रहा है बच्चों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल के दिशा-निर्देश

लंदन : सोशल मीडिया के बच्चों पर पड़ते नकारात्मक प्रभाव से फिक्रमंद ब्रिटेन सरकार बच्चों के लिए इन साइटों और एपों के इस्तेमाल के घंटे मुकर्रर करने के लिए दिशा-निर्देश बनाने पर काम कर रही है।
ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हेनकोक ने कहा कि उन्होंने योजना बनाने के निर्देश दिए हैं और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया कंपनियों पर हमला बोलते हुए कहा कि वे उपयोगकर्ताओं की आयु सीमा पर अपने स्वयं के नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘ एक पिता के तौर पर मैं बच्चों के मानिसक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के प्रभाव के बढ़ते साक्ष्यों को लेकर बहुत फिक्रमंद हूं। बच्चों द्वारा (सोशल मीडिया के) बेलगाम इस्तेमाल से उनके मानसिक स्वास्थ्य के क्षतिग्रस्त होने का खतरा है।’’
ब्रिटेन के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डेम सेली डेविस को दिशा-निर्देश का प्रारूप तैयार करने का प्रभारी नियुक्त किया गया है जो दिशा-निर्देश तय करेगा कि सोशल मीडिया पर कितना वक्त बिताने को सेहतमंद समझा जाना चाहिए। हेनकोक ने ‘ऑब्जर्वर’ अखबार से कहा, ‘‘ माता-पिता यह कह सकते हैं कि ‘नियम कहते हैं कि निश्चत वक्त से ज्यादा आपको सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।’ इसलिए हमारे पास समाज के लिए नियम बनाने, समाज की तरफ से फैसला लेने के लिए एक मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं ताकि स्कूलों और माता-पिता को निर्णय नहीं करना पड़े।’ मंत्री ने सुझाव दिया कि सोने से पहले फोन को ऑफ करना नुकसान को सीमित करने का एक तरीका हो सकता है।
डेविस से सोशल मीडिया के इस्तेमाल की न्यूनतम उम्र के बारे में भी सलाह देने को कहा गया है। हेनकोक ने कहा,‘‘ फेसबुक और इंस्टाग्राम की शर्तें कहती हैं कि अगर आप 13 साल से कम उम्र के हैं तो आपको इसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, लेकिन इसे लागू करने के लिए कुछ नहीं करते हैं। व्हाट्सएप के दिशा-निर्देश कहते हैं कि 16 साल से कम उम्र होने पर इसे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।’’

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला- प्रमोशन में आरक्षण दे सकते हैं राज्‍य

नयी दिल्ली : अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कर्मियों के पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। सर्वोच्‍च अदालत ने अपने फैसले में सीधे-सीधे पदोन्‍नति में आरक्षण को खारिज नहीं किया है। कोर्ट ने इस मामले को राज्‍यों पर छोड़ दिया है। राज्‍य सरकार अगर चाहे तो वे प्रमोशन में आरक्षण दे सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में एससी/एसटी आरक्षण के लिए कोई डेटा जमा करने की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने नागराज मामले में 2006 में दिए गए अपने फैसले पर पुनर्विचार करने से भी इनकार कर दिया है यानि इस मामले को दोबारा 7 जजों की पीठ के पास भेजना जरूरी नहीं है।
बता दें कि 2006 में नागराज से संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने कहा था कि सरकार एससी/एसटी को प्रमोशन में आरक्षण दे सकती है, लेकिन शर्त लगाई थी कि प्रमोशन में आरक्षण से पहले यह देखना होगा कि अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में एससी/एसटी आरक्षण के लिए किसी भी तरह का डाटा जमा करने की भी जरूरत नहीं है। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों की दलील स्वीकार की हैं। फैसला सुनाते हुए जस्टिस नरीमन ने कहा कि नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही था, इसलिए इस पर फिर से विचार करना जरूरी नहीं है।
गौरतलब है कि सरकार और आरक्षण समर्थकों ने 2006 के एम नागराज के फैसले को पुनर्विचार के लिए सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजे जाने की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मांग पर सभी पक्षों की बहस सुनकर गत 30 अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
सरकार और आरक्षण समर्थकों का कहना है कि एम नागराज फैसले में दी गई व्यवस्था सही नहीं है। एससी एसटी अपने आप में पिछड़े माने जाते हैं। राष्ट्रपति द्वारा जारी सूची में शामिल होने के बाद उनके पिछड़ेपन के अलग से आंकड़े जुटाने की जरूरत नहीं है। जबकि आरक्षण विरोधियों ने एम नागराज फैसले को सही ठहराते हुए कहा था कि उस फैसले में पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दी गई व्यवस्था सही कानून है। फैसले के एक भाग पर नहीं बल्कि फैसला आने की पूरी परिस्थितियों पर विचार होना चाहिए। उनका कहना था कि आरक्षण हमेशा के लिए नहीं है ऐसे में पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाए बगैर यह कैसे पता चलेगा कि सरकारी नौकरियों में एससी एसटी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है और इसलिए इन्हें प्रोन्नति में आरक्षण देने की जरूरत है।

एयर इंडिया त्योहारी मांग की पूर्ति के लिए उतारेगी 423 सीटों वाला ‘जंबो जेट’

मुम्बई : एयर इंडिया 423 सीटों वाले डबल डेकर जंबो जेट बोइंग-747 की सेवा शुरू करने जा रही है। सरकारी विमानन कंपनी ने फेस्टिवल सीजन को ध्‍यान में रखकर 16 अक्‍टूबर से इस सेवा को शुरू करने का निर्णय लिया है। एयर इंडिया ने बयान जारी कर इस बात की जानकारी दी है। कंपनी ने बताया कि 16 अक्टूबर से 21 अक्टूबर के बीच नई दिल्ली से कोलकाता और मुंबई के लिए जंबो जेट की रोज एक उड़ान होगी।
एयर इंडिया के डबल डेकर विमान में प्रथम श्रेणी में 12 सीट, बिजनेस श्रेणी में 26 सीट, जबकि इकोनॉमी श्रेणी में 385 सीट हैं। सामान्य तौर पर चार इंजनों वाले इस विमान का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय परिचालन या अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के आने-जाने में किया जाता है। सरकारी विमानन कंपनी ने बताया कि 1 नवंबर से 11 नवंबर के बीच प्रतिदिन जंबो जेट की दो उड़ान दिल्‍ली-मुंबई-दिल्‍ली में शुरू की जाएंगी। दिवाली के त्‍योहार को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है, क्‍योंकि इस सीजन में मांग बेहद बढ़ जाती है।

तीन दिन तक समुद्र में फंसे नौसेना कमांडर, ऐसे बचाये गये

नयी दिल्ली : तीन दिन से घायल अवस्था में अपनी नाव में समुद्र में फंसे भारतीय नौसेना के कीर्ति चक्र विजेता कमांडर अभिलाष टॉमी (39) को सोमवार को दक्षिणी हिंद महासागर से सुरक्षित बचा लिया गया। नौसेना में पायलट कमांडर अभिलाष ‘गोल्डन ग्लोब रेस-2018’ में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। 2013 में समुद्र के रास्ते पूरी दुनिया का बिना रुके चक्कर लगाने वाले वह पहले भारतीय हैं।
कमांडर अभिलाष की स्वदेशी नौका ‘एसवी थुराया’ के शुक्रवार को तूफान में फंसने की वजह से उसके मस्तूल क्षतिग्रस्त हो गए थे। समुद्र में तेज लहरें उठने से उनकी नाव का स्तंभ टूट गया था। इस वजह से उनकी पीठ में गंभीर चोट लग गई थी। शनिवार को उन्होंने अपनी वाईबी3 टेक्सटिंग यूनिट से फ्रांस स्थित रेस आयोजकों को खुद के घायल होने का संदेश भेजा था, लेकिन समुद्र में उनकी लोकेशन पता नहीं चली थी।
रविवार को भारतीय नौसेना के निगरानी और टोही विमान पी8आइ ने उनकी नाव का पता लगा लिया था। नौसेना प्रवक्ता कैप्टन डीके शर्मा ने बताया कि फ्रांस के मछली पकड़ने वाले जहाज ‘ओसिरिस’ ने सोमवार सुबह करीब 11.30 बजे बचाव अभियान सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। इस दौरान भारतीय विमान पी-8आइ ने भी सहायता की। संडे टाइम्स की गोल्डन ग्लोब रेस की 5वीं वर्षगांठ पर आयोजित गोल्डन ग्लोब रेस बहुत मेहनत वाली प्रतियोगिता है। इसमें बिना किसी आधुनिक तकनीक की मदद लिए एक छोटी नाव में बैठकर दुनिया का चक्कर लगाना होता है। भारतीय नौसेना के कमांडर अभिलाष टॉमी को सुरक्षित बचा लेने पर उनके पिता वीसी टॉमी ने खुशी जताई है। मीडिया से बात करते हुए अभिलाष के पिता ने कहा कि अब हमें 75 फीसद राहत मिली है। हम सभी पिछले तीन दिनों से तनाव में थे। नौसेना अफसर के पिता भी नेवी में कमांडर थे। बता दें कि गोल्डन ग्लोब रेस के दौरान नौका के दक्षिण हिंद महासागर में तेज तूफान में फंसने से अभिलाष (39) घायल हो गए थे। उन्होंने कहा, ‘हां, उन्हें बचा लिया गया है, फिलहाल हम यही कह सकते हैं कि वह मानसिक रूप से स्थिर हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रतियोगिताओं में दुर्घटनाओं की संभावना होती है। इससे हम सभी वाकिफ थे। मुझे पूरी उम्मीद है कि वह जल्द ही इससे बाहर आ जाएगा। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने खुशी जताते हुए कहा कि यह जानकर राहत मिली की नौसेना अधिकारी अभिलाष टॉमी को बचा लिया गया है। वह होश में हैं और ठीक हैं। आइएनएस सतपुड़ा उन्हें चिकित्सा के लिए मॉरीशस लेकर जाएगा।

व्यभिचार अब अपराध नहीं, महिला पति की संपत्ति नहीं : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने इससे संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया और कहा कि यह महिलाओं की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाता है और इस प्रावधान ने महिलाओं को ‘‘पतियों की संपत्ति’’ बना दिया था। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त कर दिया। शीर्ष अदालत ने इस धारा को स्पष्ट रूप से मनमाना, पुरातनकालीन और समानता के अधिकार तथा महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर. एफ. नरिमन, न्यायमूर्ति ए. एम.खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई. चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने एकमत से कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 असंवैधानिक है।
संविधान पीठ ने जोसेफ शाइन की याचिका पर यह फैसला सुनाया। यह याचिका किसी विवाहित महिला से विवाहेत्तर यौन संबंध को अपराध मानने और सिर्फ पुरूष को ही दंडित करने के प्रावधान के खिलाफ दायर की गयी थी। व्यभिचार को प्राचीन अवशेष करार देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि मानव जीवन के सम्मानजनक अस्तित्व के लिए स्वायत्ता स्वभाविक है और धारा 497 महिलाओं को अपनी पसंद से वंचित करती है।
प्रधान न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि व्यभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए लेकिन इसे अभी भी नैतिक रूप से गलत माना जाएगा और इसे विवाह खत्म करने तथा तलाक लेने का आधार माना जाएगा। घरों को तोड़ने के लिये कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं मिल सकता। भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अनुसार यदि कोई पुरूष यह जानते हुये भी कि महिला किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है और उस व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत के बगैर ही महिला के साथ यौनाचार करता है तो वह परस्त्रीगमन के अपराध का दोषी होगा। यह बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा। इस अपराध के लिये पुरूष को पांच साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान था।
शाइन की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि कानून तो लैंगिक दृष्टि से तटस्थ होता है लेकिन धारा 497 का प्रावधान पुरूषों के साथ भेदभाव करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 :समता के अधिकारः , 15 : धर्म, जाति, लिंग, भाषा अथवा जन्म स्थल के आधार पर विभेद नहींः और अनुच्छेद 21:दैहिक स्वतंत्रता का अधिकारः का उल्लंघन होता है।
न्यायमूर्ति मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविलकर ने अपने फैसले में कहा, ‘‘विवाह के खिलाफ अपराध से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 198 को हम असंवैधानिक घोषित करते हैं।’’
न्यायमूर्ति नरिमन ने धारा 497 को पुरातनकालीन बताते हुए प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति खानविलकर के फैसले से सहमति जतायी। उन्होंने कहा कि दंडात्मक प्रावधान समानता का अधिकार और महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन है।
वहीं न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि धारा 497 महिला के सम्मान को नष्ट करती है और महिलाओं को गरिमा से वंचित करती है। पीठ में शामिल एकमात्र महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने अपने फैसले में कहा कि धारा 497 संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इस प्रावधान को बनाए रखने के पक्ष में कोई तर्क नहीं है।
अपनी और न्यायमूर्ति खानविलकर की ओर से फैसला लिखने वाले प्रधान न्यायाधीश मिश्रा ने कहा कि व्यभिचार महिला की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाती है और व्यभिचार चीन, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में अपराध नहीं है। उन्होंने कहा, संभव है कि व्यभिचार खराब शादी का कारण नहीं हो, बल्कि संभव है कि शादी में असंतोष होने का नतीजा हो।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि महिला के साथ असमान व्यवहार संविधान के कोप को आमंत्रित करता है। उन्होंने कहा कि समानता संविधान का शासकीय मानदंड है।
संविधान पीठ ने कहा कि संविधान की खूबसूरती यह है कि उसमें ‘‘मैं, मेरा और तुम’’ शामिल हैं।शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं के साथ असमानता पूर्ण व्यवहार करने वाला कोई भी प्रावधान संवैधानिक नहीं है और अब यह कहने का वक्त आ गया है कि ‘पति महिला का स्वामी नहीं है।’
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि धारा 497 जिस प्रकार महिलाओं के साथ व्यवहार करता है, यह स्पष्ट रूप से मनमाना है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं हो सकता है जो घर को बर्बाद करे परंतु व्यभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए। न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने कहा कि धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किया जाये क्योंकि व्यभिचार स्पष्ट रूप से मनमाना है। पीठ ने कहा कि व्यभिचार को विवाह विच्छेद के लिये दीवानी स्वरूप का गलत कृत्य माना जा सकता है।