Monday, April 13, 2026
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देश के प्रधान न्यायाधीश बने रंजन गोगोई, इस पद पर पूर्वोत्तर के पहले व्यक्ति

नयी दिल्ली : न्यायिक प्रक्रिया और कार्यवाही के संदर्भ में एक सख्त न्यायाधीश के तौर पर पहचान रखने वाले न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने बुधवार को देश के 46वें प्रधान न्यायाधीश का पदभार संभाल लिया और वह पूर्वोत्तर से न्यायपालिका के इस शीर्ष पद पर पहुंचने वाली पहली हस्ती हैं।
तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली और मुकदमों के आवंटन की प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले न्यायाधीशों में शामिल रहे न्यायमूर्ति रंजन गोगोई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने बुधवार तीन अक्टूबर को राष्ट्रपति भवन में प्रधान न्यायाधीश पद की शपथ दिलायी। उन्होंने न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा का स्थान लिया है, जिनका कार्यकाल दो अक्टूबर को समाप्त हो गया।
असम के राष्ट्रीय नागरिक पंजी और लोकपाल कानून के तहत लोकपाल संस्था की स्थापना जैसे विषयों पर सख्त रूख अपनाने वाले न्यायमूर्ति गोगोई 17 नवंबर 2019 को सेवानिवृत्त होने तक करीब 13 महीने देश के प्रधान न्यायाधीश रहेंगे।
न्यायमूर्ति गोगोई तब सुर्खियों में आए थे जब निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली को लेकर 12 जनवरी को न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर के नेतृत्व में चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स की थी। इन चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों में न्यायमूर्ति गोगोई भी शामिल थे। इस प्रेस कॉन्फ्रेन्स में न्यायाधीशों ने तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पर कई आरोप लगाये थे।

उन्होंने बाद में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था, ‘‘स्वतंत्र न्यायाधीश और आवाज उठाने वाले पत्रकार लोकतंत्र की रक्षा की पहली पंक्ति हैं।’’ पिछले सप्ताह एक अन्य सार्वजनिक समरोह में उन्होंने कहा था कि देश के प्रधान न्यायाधीश के तौर पर उनकी प्राथमिकता मामलों के ‘‘बैकलॉग’’ से निपटना है।

केरल में फरवरी, 2011 में एक ट्रेन में हुये सनसनीखेज सौम्या बलात्कार और हत्या के मामले में शीर्ष अदालत के निर्णय से असहमति व्यक्त करते हुये पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने तब सोशल मीडिया पर तल्ख़ टिप्पणियां कीं थीं। इसे लेकर न्यायमूर्ति गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 11 नवंबर, 2016 को पूर्व सहयोगी न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू को अवमानना का नोटिस जारी करके सनसनी पैदा कर दी थी। यह पहला मौका था जब शीर्ष अदालत ने अपने ही पूर्व सदस्य के खिलाफ स्वत: अवमानना का नोटिस जारी किया था। न्यायमूर्ति काटजू ने बाद में अपनी टिप्पणियों के लिये न्यायालय से क्षमा मांग ली थी जिसे स्वीकार करते हुये न्यायमूर्ति गोगोई की पीठ ने मामला खत्म कर दिया था।
इसी तरह, असम के राष्ट्रीय नागरिक पंजी के मसौदे के संबंध में मीडिया से बात करने पर इस काम से जुड़े अधिकारियों को आड़े हाथ लेते हुये न्यायमूर्ति गोगोई की पीठ ने उन्हें सख्त चेतावनी दी थी। शीर्ष अदालत के फैसले के बावजूद लोकपाल संस्था की स्थापना और लोकपाल की नियुक्ति में हो रहे विलंब को लेकर दायर अवमानना याचिका पर भी न्यायमूर्ति गोगोई की पीठ ने सख्त रूख अपना रखा है। न्यायमूर्ति गोगोई की 23 अप्रैल, 2012 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर पदोन्नति हुई थी। असम के डिब्रूगढ़ में 18 नवंबर, 1954 को जन्मे रंजन गोगोई ने 1978 में वकालत शुरू की और 28 फरवरी, 2001 को उन्हें गौहाटी उच्च न्यायालय का स्थाई न्यायाधीश बनाया गया। इसके बाद नौ सितंबर, 2010 का उनका तबादला पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में किया गया और 12 फरवरी, 2011 को उन्हें इसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। असम के पूर्व मुख्यमंत्री केशव चंद्र गोगोई के पुत्र न्यायमूर्ति गोगोई ने असम के राष्ट्रीय नागरिक पंजी, सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन, राजीव गांधी हत्याकांड मामले के दोषियों को उम्र कैद की सजा से छूट तथा लोकपाल जैसे महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं।

मनायें नवरात्रि का त्योहार, चटपटे स्वाद के साथ

चटपटी साबूदाना चाट

सामग्री : 200 ग्राम साबूदाना, 1/2 प्याला मूंगफली दाने, 3 बड़े आलू, 150 ग्राम पनीर, 2 हरी मिर्च, 1/3 छोटा चम्मच नमक, 1/2 छोटा चम्मच लाल मिर्च पावडर, 1/2 छोटा चम्मच काली मिर्च पावडर, 1/2 छोटा चम्मच जीरा, 3 बड़े चम्मच तेल।
विधि : चाट बनाने से आधा घंटे पहले साबूदाना को पानी में भिगो दें। मूंगफली दाने साफ करके उन्हें तल कर रख लें। आलू छीलकर टुकड़े कर लें। पनीर के भी छोटे टुकड़े कर लें। आलू-पनीर दोनों को हल्का-हल्का तल लें। एक कड़ाही में तेल गरम करके इसमें जीरे का छौंक लगा दें। जीरा भून जाने पर साबूदाना डालें। धीमी आंच पर इसे थोड़ी देर भूनते रहें। अब भुने हुए साबूदाने में तले हुए आलू, पनीर व तले हुए मूंगफली दाने डालें। अब नमक, मिर्च व बारीक कटी हरी मिर्च डाल दें और अच्छी तरह से हिलाएं। आंच बंद कर दें और ऊपर से हरा धनिया बुरका कर नींबू के साथ साबूदाना चाट पेश करें।

साबूदाना-पनीर के चटपटे बड़े
सामग्री : 150 ग्राम पनीर, 1/2 कप बारीक साबूदाना, 1 छोटा चम्मच कुट्टू का आटा, 1 बड़ा चम्मच काजू, 2 साबुत लाल मिर्च, 2-3 हरी मिर्च, थोड़ा सा हरा धनिया, सैंधा नमक स्वादानुसार, तलने के लिए तेल।
विधि : साबूदाने को एक कप पानी में 1 घंटे के लिए भिगो दें। हरा धनिया, हरी मिर्च बारीक काट लें। लाल मिर्च, काजू के टुकड़े करें और पनीर मैश कर लें। भीगे साबूदाने का पानी छानकर इसमें सामग्री अच्छी तरह मिलाएं। मिश्रण को मनचाहा आकार देकर तल लें। हरी चटनी या रायते के साथ गरमा-गरम सर्व करें।

नवरात्रि 2018: इस वजह से वेश्यालय की मिट्टी से बनती है मां दुर्गा की प्रतिमाएं

नवरात्रि की शुरुआत 10 अक्टूबर 2018 से होने को है। जहां एक तरफ उत्तर भारत में इस त्यौहार की धूम पूरे नौ दिन तक रहती है। वहीं दूसरी तरफ नवरात्रि में दक्षिण भारत में दुर्गा पूजा का त्योहार 6 दिन तक मनाया जाता है। दुर्गा पूजा पूर्णरुप से मां दुर्गा की आराधना का पर्व है।
दुर्गा पूजा में मां की अर्चना के लिए विशेष तौर पर वेश्यालय की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा की जाती है। यह मूर्ति उतनी ही पवित्र मानी जाती है, जितनी पवित्र मां दुर्गा स्वयं है। लेकिन क्या आप यह जानते है कि ऐसा क्यों किया जाता है?
पूरी दुनिया में वेश्यों को नीचा समझा जाता है, तो मां की प्रतिमा के निर्माण में अपवित्र स्थान की मिट्टी का प्रयोग क्यों किया जाता है?
दुर्गा पूजा में आराधना के लिए बनने वाली विशेष प्रतिमा बनाने में चार वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। पहली गंगा तट की मिट्टी, गौमूत्र, गोबर और वेश्यालय की मिट्टी या किसी ऐसे स्थान की मिट्टी जहां जाना निषेध हो।
ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में एक वेश्या मां दुर्गा की अनन्य भक्त थी उसे तिरस्कार से बचाने के लिए माँ ने स्वयं आदेश देकर, उसके आंगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई। साथ ही उसे वरदान दिया कि बिना वेश्यालय की मिट्टी के उपयोग के दुर्गा प्रतिमाओं को पूरा नहीं माना जाएगा।
बताया जाता है कि वेश्याओं को सामाजिक रूप से काट दिया जाता है, लेकिन इस त्योहार के सबसे मुख्य काम में उनकी ये बड़ी भूमिका उन्हें मुख्य धारा में शामिल करने का एक जरिया है।

यौन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने के लिए डेनिस मुक्वेगे-नादिया मुराद को शांति का नोबेल पुरस्कार

नोबेल के शांति पुरस्कार विजेताओं के नाम की घोषणा कर दी गई है। नॉर्वे की कमेटी ने इस साल दो लोगों को इस पुरस्कार के लिए चुना है। जिनके नाम डेनिस मुक्वेगे और उनकी साथी नादिया मुराद हैं। नोबेल समिति की अध्यक्ष बेरिट रेइस एंडरसन ने यहां नामों की घोषणा करते हुए कहा कि इन दोनों को यौन हिंसा को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के इनके प्रयासों के लिए चुना गया है। दोनों वैश्विक अभिशाप के खिलाफ संघर्ष के उदाहरण हैं। शांति का नोबेल पुरस्कार देने वाली समिति के अनुसार इस बार 216 व्यक्तियों और 115 संगठनों को नामित किया गया था।
प्रति वर्ष यह पुरस्कार उस शख्स या व्यक्ति को दिया जाता है जिसने विश्व शांति में अपना योगदान दिया हो या शांति के लिए कोशिश की हो। इस साल इस पुरस्कार के लिए कुल 331 लोग नामित किए गए थे। जो नामांकित व्यक्तियों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है जिसे शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाता है उसके नाम को गुप्त रखा जाता है। नामांकित किए व्यक्तियों में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग-उन, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन और पोप फ्रांसिस जैसी शख्सियतों का भी नाम शामिल था।
शांति पुरस्कार देने वाली संस्था ने ट्वीट कर कहा, 2018 नोबेल शांति पुरस्कार विजेता डेनिस मुक्वेगे ने युद्ध के समय यौन हिंसा के पीड़ितों की रक्षा करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। उनकी साथी नादिया मुराद को भी इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, जिसने खुद और दूसरों के खिलाफ दुर्व्यवहार के बारे में जिक्र किया है।’
जानें कौन हैं डेनिस मुक्वेगे
डेनिस का जन्म 1 मार्च 1955 को पेंटोकोस्टल मंत्री के घर हुआ था। पेशे से गायनोकोलोजिस्ट 9 भाई-बहनों में वह तीसरे नंबर के हैं। उन्होंने बुकावू के पनजी अस्पताल में काफी काम किया है। यहाँ वह उन महिलाओं का इलाज करते थे जिनके साथ सुरक्षाबलों ने बलात्कार या सामूहिक दुष्कर्म किया होता था। दूसरे कांगों युद्ध के बाद उन्होंने ऐसी हजारों पीड़िताओं का इलाज किया है। वह 18 घंटे के दौरान लगभग 10 पीड़िताओं की सर्जरी किया करते थे। द ग्लोब एंड मॉल के अनुसार मुक्वेगे बलात्कार की चोटों को ठीक करने के लिए दुनिया के अग्रणी विशेषज्ञ हैं।
जानें कौन है नादिया मुराद
नादिया मुराद बसी ताहा का जन्म इराक के कोजो में 1993 में हुआ था। वह इराक की यजीदी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। उन्हें आईएसआईएस ने अगवा करके तीन सालों तक बंधक बनाकर रखा था। मुराद नादिया अभियान की संस्थापक हैं। यह संस्था उन महिलाओं और बच्चों की मदद करती है जो नरसंहार, सामूहिक अत्याचार और मानव तस्करी के पीड़ित होते हैं। संस्था उन्हें अपनी जिंदगी दोबारा जीने और उन बुरी यादों से उबरने में मदद करती है।

पृथ्वी शॉ : 22 गज जमीन पर कौंधती बिजली

नयी दिल्ली : राजकोट के बड़े से स्टेडियम में हजारों दर्शकों के सामने वेस्टइंडीज की टीम के खिलाफ सफेद पोशाक में पहली बार टेस्ट क्रिकेट में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने उतरा 18 बरस का एक सांवला सा लड़का आगे बढ़कर पहली गेंद खुद खेलने का हौसला दिखाए और मैदान के हर ओर बेहतरीन शॉट लगाकर शतक बनाए, तो लगता है कि भारतीय क्रिकेट को सचिन तेंदुलकर का उत्तराधिकारी मिल गया है।
पृथ्वी शॉ का नाम पिछले करीब आठ बरस से क्रिकेट के गलियारों में सुनाई दे रहा है। हालांकि उसने तीन बरस की उम्र में ही बल्ला थाम लिया था, जब उसका कद उन स्टंप्स से भी छोटा था, जिनके सामने खड़े होकर वह बल्लेबाजी किया करता था। आज यह आलम है कि उसके कद की तुलना दुनिया के बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ियों से की जा रही है।
पृथ्वी को करीब दस बरस पहले सचिन तेंदुलकर ने बल्लेबाजी करते हुए देखा था और आठ बरस के बच्चे का, गेंद को समझने और सही तकनीक के साथ पूरी ताकत से शॉट लगाने का अंदाज उन्हें इतना पसंद आया था कि उन्होंने उसी समय उसके भारत के लिए खेलने की भविष्यवाणी कर दी थी।
पृथ्वी के बेहतरीन खेल का ही चमत्कार है कि वह रिजवी स्प्रिंगफील्ड के लिए खेलता है, जो मुंबई की सर्वश्रेष्ठ स्कूल टीम है और वह शहर के प्रसिद्ध एमआईजी क्रिकेट क्लब में क्रिकेट की बारीकियां सीखता है। इस क्लब की प्रतिष्ठा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सचिन तेंदुलकर के पुत्र अर्जुन को भी इसी क्लब में कोचिंग दी जा रही है।
शॉ को इस बात का एहसास है कि उनके खेल में कुछ ऐसी बात है कि लोग उनकी तुलना सचिन तेंदुलकर से करते हैं। हाल ही में साव ने एक अखबार के साथ मुलाकात में कहा, ‘‘लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि उन्हें मुझमें सचिन तेंदुलकर का अक्स नजर आता है। वह क्रिकेट के भगवान से मेरी तुलना करते हैं। मेरे लिए यही ठीक है कि मैं इन बातों पर ध्यान दिए बिना अपनी बल्लेबाजी पर ध्यान दूं।’’
पृथ्वी शॉ का परिवार मूलतः बिहार के गया का रहने वाला है। उनके पिता पंकज शॉ बहुत पहले मुंबई के नजदीक विरार में आकर बस गए और छोटे से पृथ्वी की क्रिकेट में दिलचस्पी देखकर मात्र तीन बरस की उम्र में विरार की क्रिकेट अकादमी में उनका दाखिला करा दिया। पृथ्वी शॉ बहुत छुटपन में अपने दोस्तों और पिता के साथ जेडब्ल्यू मैरिएट के नजदीक बीच पर क्रिकेट खेलते थे। बाद में पृथ्वी को एक कंपनी के रूप में प्रायोजक मिला तो परिवार मुंबई चला आया।
महज चार बरस की उम्र में अपनी मां को खो देने वाले पृथ्वी के जीवन पर उनके पिता का बहुत गहरा असर है। उन्हें एक अच्छा इनसान बनाने के साथ ही एक बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी बनाने का सपना देखने वाले अपने पिता को पृथ्वी ने चार अक्टूबर को एक बेहतरीन तोहफा दिया जब उन्होंने अपने पहले ही मैच में सैकड़ा लगाकर खुद को सचिन तेंदुलकर की श्रेणी में खड़ा कर दिया। दरअसल वह सचिन के बाद टेस्ट क्रिकेट में सैकड़ा बनाने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी हैं।

पेड न्यूज पर चुनाव आयोग सख्त, बनेगा मॉनिटरिंग रूम

भोपाल : चुनाव आयोग ने शनिवार को पांच राज्यों में होने वाले चुनावों की तारीखों का एलान कर दिया है। तत्काल प्रभाव से आचार संहिता लागू कर दी गई है। साथ ही निष्पक्ष चुनाव हो इसके लिए आयोग ने कमर भी कस ली है। चुनाव आयोग ने फैसला किया है कि न्यूज चैनलों पर प्रसारित हो रहीं खबरों पर पल-पल की नजर रखी जाएगी। जानकारी के मुताबिक इसके लिए मध्य प्रदेश में आयोग के दफ्तर में मॉनिटरिंग सेंटर सक्रिय हो गया है।
इस सिस्टम का पूरा मकसद चुनाव में पेड न्यूज पर रोक लगाना है। इसके लिए एक नोडल अधिकारी भी नियुक्त किया गया है। दफ्तर में कार्य करने वाले लोगों का काम न्यूज चैनल पर प्रसारित हो रही खबरों को देखना है कि कहीं किसी पार्टी या नेता द्वारा पेड न्यूज तो नहीं चलवाई जा रही है।
बता दें कि चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश सहित पांच राज्यों में होने वाले चुनावों की तारीखों का एलान कर दिया है। मध्य प्रदेश में पिछले 15 सालों से भाजपा सत्ता पर काबिज है। पिछले तीन चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस को बुरी तरह हराया था। साल 2013 में हुए चुनाव में भाजपा ने कुल 230 सीटों में से 165 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस को महज 58 सीटें ही मिली थीं। वहीं, बसपा ने 4 सीटों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 3 सीटों पर कब्जा जमाया था। मध्य प्रदेश में 2 नवंबर को नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा। 9 नवंबर को नामंकन की आखिरी तरीख है। 12 को स्क्रूटनी और 14 नवंबर को नामंकन वापस लिया जाएगा। वहीं 28 नवंबर को यहां मतदान होगा और 11 दिसंबर को फाइनल नतीजे आएंगे।

नहीं रहे मशहूर वायलिन वादक बालाभास्कर

तिरूवनंतपुरम : कार हादसे में गंभीर रूप से घायल होने के करीब एक सप्ताह बाद मशहूर वॉयलिन वादक बाला भास्कर का यहाँ एक निजी अस्पताल में मंगलवार सुबह निधन हो गया। वह 40 साल के थे। हादसा 25 सितंबर को हुआ था। उसमें भास्कर की दो वर्षीय बेटी की मौत हो गयी थी। घटना के समय भास्कर का परिवार त्रिशूर के एक मंदिर से पूजा करके लौट रहा था। पल्लीपुरम में उनकी कार एक पेड़ से जा टकरायी। भास्कर ने कॉलेज में अपनी सहपाठी लक्ष्मी से 22 साल की उम्र में शादी की थी । अस्पताल के सूत्रों ने पीटीआई भाषा से कहा, ‘‘भास्कर हृदयगति रुकने से 12 बजकर 56 मिनट पर चल बसे। उनकी न्यूरोसर्जरी हुई थी और वह जीवनरक्षक प्रणाली पर थे। उन पर दवाओं का असर होने लगा था।’ सोमवार को उनके दोस्त और गिटार वादक स्टीफन देवास्सी उनसे मिलने गये थे और भास्कर ने अपनी जीभ में थोड़ी हलचल की थी जिससे उम्मीद बंधी थी कि उनकी स्थिति सुधर रही है लेकिन गत सोमवार की रात को उनकी हृदयगति रुक गयी और वह चल बसे। अस्पताल के सूत्रों ने बताया कि लक्ष्मी को भास्कर की मृत्यु का समाचार नहीं दिया गया है। इसी कॉलेज में उन्होंने और उनकी पत्नी ने पढ़ाई की थी। केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन, वित्त मंत्री थॉमस इसाक और विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने भास्कर को श्रद्धांजलि अर्पित की। भास्कर के निधन पर गायक के जे येशुदास,संगीतकार एम जयचंद्रन, विधानसभा में विपक्ष के नेमा रमेश चेन्निथला ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने भी ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके अलावा गायक-संगीतकार शंकर महादेवन, मलयालम फिल्म स्टार पृथ्वीराज और मलयालम फिल्म अभिनेता दुलकुर सलमान ने भी भास्कर के निधन पर शोक व्यक्त किया । भास्कर मलयालम फिल्मोद्योग में सबसे कम उम्र में संगीत निर्देशक बन गये थे। उन्होंने 17 साल की उम्र में ’‘‘मंगलय पल्लक’’ फिल्म के लिए संगीत रचा। उन्हें 2008 में बिस्मिल्लाह खान युवा संगीतकार पुरस्कार मिला था।

हर साल पत्नी को रिक्शा में बैठा 45 सौ किलोमीटर पैदल चल कर पहुँचते हैं वैष्णो देवी के दरबार

भोपाल : वैष्णोदेवी के मंदिर में लोग मुरादें पाते हैं.. रोते रोते आते हैं, हंसते हंसते जाते हैं..बात आज से 15 साल पहले की है। मध्यप्रदेश के अनूपपुर में रहने वाले यादव दंपती संतोष और प्रेमा संतान सुख से वंचित थे। संतान होती, पर जीवित न बचती। दुख और निराशा का घोर अंधकार घेरे चला था। उम्मीद की अंतिम किरण के रूप में यदि कुछ शेष था तो वह थी आस्था। मन में संतान की मुराद लिए दोनों माता वैष्णोदेवी के दरबार को चल पड़े..। सन्तोष कुमार यादव भले ही साधारण रिक्शा चालक हैं, लेकिन उनकी आस्था और संकल्प शक्ति असाधारण है। दरअसल, आस्था एक मनोविज्ञान है। आस्था की शक्ति अपना काम करती है, हम इसे चमत्कार कहते है। संतोष पिछले तेरह साल से हर शारदेय नवरात्र पर 4500 किलोमीटर (पैदल जाना और आना) का पैदल सफर तय कर माँ वैष्णोदेवी के दरबार तक पहुंचते हैं। देवी को धन्यवाद अर्पित करते हैं, श्रद्धासुमन भेंट करते हैं। यही नहीं वे अपनी पत्नी को रिक्शे में बैठाकर उसे भी देवी के दरबार तक खींच ले जाते हैं।
साठ साल से ऊपर का कमजोर हो चला शरीर, बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी, लेकिन चेहरे पर आस्था, श्रद्धा और विश्र्वास की दृढ़ चमक। बताते हैं कि शादी के बाद संतान सुख से वंचित थे। पत्नी प्रेमा बाई की गोद सूनी बनी हुई थी। दो बार वह गर्भवती हुईं, लेकिन दोनों बच्चे जन्म के साथ ही गुजर गए। तब किसी के कहने पर माता वैष्णोदेवी के दरबार में झोली फैलाने का मन बनाया। देवी में पूर्ण आस्था रखते हुए यात्रा का संकल्प लिया। मन्नत रखी कि जन्म लेने वाला बच्चा जीवित बच जाएगा तो उसके 14 साल का होने तक हर साल मां वैष्णोदेवी के दर तक पैदल पहुंचेंगे।
इसके बाद प्रेमा पुन: गर्भवती हुईं। जब गर्भ छह माह का हुआ तो पति-पत्नी व्याकुल हो उठे। डर था कि कहीं यह बच्चा भी दामन से न निकल जाए। वैष्णोदेवी की शरण में जाने का निर्णय कर लिया। गर्भवती प्रेमा को अपने रिक्शे में बिठाकर सन्तोष निकल पड़े अनूपपुर से लगभग बाईस सौ किमी दूर आस्था के दर की ओर। तीन महीने लगे वैष्णोदेवी तक पहुंचने में। माता के दरबार के निकट पहुंच चुके थे। पर्वत पर चढ़ाई शुरू कर दी थी। प्रेमा बाई के गर्भ में पल रहा बच्चा इस दौरान नौ माह से ज्यादा का हो चुका था। प्रेमा बताती हैं, हम जैसे-तैसे माता के दरबार के निकट जा पहुंच थे। अब दर्शन ही शेष थे। थोड़ी ही चढ़ाई बची थी। मंदिर सामने था, लेकिन इससे पहले कि हम माता के दर्शन कर पाते मुझे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। मैंने बालक को जन्म दिया। बाद में बच्चे को गोद में लेकर माता के दर्शन किए। बेटे को माँ का प्रसाद समझकर उसका नाम विष्णु प्रसाद रखा। माता ने कृपा की और आज विष्णु हमारे साथ है। हमारा सहारा है।
सन्तोष ने बताया कि आज तक यात्रा के दौरान कभी कोई असुविधा नहीं हुई। पूरे रास्ते लोगों का सहयोग मिला। रिक्श में जरूरी साजोसामान भी लाद लेते हैं। सोलर पैनल, पंखा, लाउड स्पीकर, खाने-पीने का समान, रिक्शा रिपेयरिंग के टूल और दवाई साथ रखते हैं।

समुद्र के अंदर बन रहा दुनिया का सबसे बड़ा रेस्तरां

ओस्लो. नॉर्वे के लिंडेसनेस इलाके में उत्तर सागर के तट पर दुनिया का सबसे बड़ा अंडरवॉटर रेस्तरां बनाया जा रहा है। 110 फीट लंबा यह रेस्तरां समुद्र से निकल रहे बड़े दूरबीन की तरह दिखाई देता है। इसमें 100 लोगों के बैठने की व्यवस्था रहेगी। रेस्तरां के 2019 तक शुरू होने का अनुमान है। रेस्तरां को अंडर नाम दिया गया है। इसे नॉर्वे की कंपनी स्नोहेता बना रही है।
रेस्तरां 500 वर्गमीटर (5300 वर्गफीट) क्षेत्र में फैला है। इसमें तीन मंजिलें हैं। समुद्री पर्यावरण दिखाने के लिए 36 फीट लंबा शीशा लगाया गया है। रेस्तरां समुद्र के अंदर पांच मीटर गहराई में है।
स्नोहेता की सीनियर आर्किटेक्ट रून ग्रासडेल के मुताबिक- रेस्तरां को काफी सोच-समझकर तैयार किया गया है। इसका आधे से ज्यादा ढाँचा पानी में डूबा है। लोगों को अंदर जाने के लिए एक कांच के ग्लासवे (ब्रिज) से गुजरना होगा।
ग्रासडेल कहती हैं- क्लाइंट्स जब हमारे पास रेस्तरां बनाने का प्रस्ताव लेकर आए तो वे कुछ स्केच लेकर आए थे। वे इसे तट के नजदीक बनाना चाहते थे, लेकिन हमने कुछ दूर बनाने का सुझाव दिया क्योंकि वहाँ से असली समुद्र दिखाई देता है।
यह रेस्तरां नॉर्वे के लिंडेसनेस इलाके में बनाया जा रहा है। यहाँ काफी पर्यटक आते हैं। हालांकि, यहाँ पहुँचना आसान नहीं है। रेस्तरां आने के लिए लोगों को राजधानी ओस्लो से हवाई जहाज से क्रिस्टियनसेंड आना होना। यहां से सड़क से एक घंटे का रास्ता है। बोट सर्विस भी शुरू की जा रही है।
रेस्तरां बनाने वाली कम्पनी यहाँ आने वाले लोगों की सुरक्षा की गारंटी ले रही है। कम्पनी का दावा है कि 2500 टन की इमारत को हर चुनौती सहने के लिहाज से बनाया गया है। बनाने से पहले मरीन बायोलॉजी और मछलियों के बर्ताव का भी अध्ययन किया गया। रेस्तरां का मुख्य डाइनिंग एरिया 13 फीट लंबा रखा गया है। खाना खाते हुए लोग मछलियों और समुद्री जीवों को देखने का लुत्फ उठा सकेंगे। अंदर और बाहर रोशनी की खास व्यवस्था की गई है क्योंकि नॉर्वे में ठंड में शाम को ज्यादा डार्कनेस होती है।
रेस्तरां में सीट रिर्जव कराकर ही लोगों को आने की इजाजत होगी। अप्रैल 2019 से रिजर्वेशन लिए जाएगे।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, अब अदालतों की कार्यवाही का होगा सीधा प्रसारण

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होगा, जिसे अदालत की मंजूरी मिल गई है। इसकी शुरुआत शीर्ष अदालत से ही होगी। इसके लिए जल्दी ही दिशा निर्देश जारी किये जाएंगे। अदालत ने अपनी सुनवाई के दौरान यह माना कि सीधा प्रसारण से जहां न्याय प्रणाली पारदर्शी बनेगी, वहीं इसकी जवाबदेही बढ़ जाएगी।
शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एम एम खानविल्कर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने यह अहम फैसला गत बुधवार को सुनाया। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि अदालती कार्यवाही के सीधे प्रसारण से खुली अदालत के सिद्धांत सही साबित होगा। साथ ही जनता को अदालत को समझने व जानने का अधिकार स्वत: प्राप्त हो जाएगा।
अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि इस प्रक्रिया के शुरु हो जाने से अदालतों में बेवजह की भीड़भाड़ कम हो जाएगी और खुली अदालत की परिकल्पना को लागू करना आसान हो जाएगा। अदालती कार्यवाही के सजीव प्रसारण से खामियों को दूर करने में भी लोगों से मदद मिलेगी। लाइव प्रसारण प्रक्रिया को लागू करने के लिए जनता के अधिकारों और वादियों के सम्मान की रक्षा के बीच संतुलन बैठाने के लिए जल्दी ही जरूरी नियम बनाये जाएंगे।
अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने अदालत को सुझाव दिया था कि पायलट परियोजना के आधार पर अहम मुकदमों का सीधा प्रसारण किया जा सकता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘सीधा प्रसारण में 70 सेकेंड की देरी होनी चाहिए ताकि निजता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसा संवेदनशील मामलों में होने वाली बहस के अंश को प्रसारण से रोका जा सके।
उन्होंने कहा था ‘पायलट परियोजना के तौर पर सीजेआई कोर्ट से सीधा प्रसारण शुरू किया जाए। यह इसकी सफलता पर निर्भर करेगा कि सुप्रीम कोर्ट की सभी और देशभर की अदालतों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया जाए या नहीं।’ उन्होंने कोर्ट रूम से भीड़ कम करने के लिए कोर्ट परिसर में एक मीडिया रूम स्थापित करने का भी सुझाव दिया था। वादी, पत्रकार, वकील और आगंतुक कार्यवाही को देख सकें।
कानून की पढ़ाई कर रही एक छात्रा स्वप्निल त्रिपाठी ने याचिका दाखिल कर अदालती कार्यवाही का सीधा प्रसारण कक्ष स्थापित करने और कानून के छात्रों को यहां तक पहुंचने की सुविधा देने का अनुरोध किया था। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने भी याचिका दायर कर अहम मुकदमों की कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिग कराने का अनुरोध किया था। इसके अलावा एक गैर सरकारी संगठन ने भी इस मामले में जनहित याचिका दायर की थी।