Monday, July 6, 2026
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क्रिसमस पर बनाएं एगलेस केक

एगलेस अलमंड केक

सामग्री : 275 ग्राम मैदा, 125 ग्राम मक्खन (पिघला हुआ), 1 बड़ा चम्मच क्रीम, 275 ग्राम चीनी, 100 ग्राम बारीक कटे हुए बादाम, 1/4 चम्मच बेकिंग सोडा, पानी 35 मिली., 1 चम्मच बेकिंग पावडर।
विधि : लाजवाब आलमंड केक बनाने के लिए सर्वप्रथम चीनी व पानी को एक पैन में डालें। धीमी आंच पर चढ़ाएं और तीन तार की चाशनी बना लें। चाशनी में मक्खन डालें व अच्छी तरह मिला दें। अब मैदा, बेकिंग पावडर व सोडे को छानकर चाशनी में मिलाकर एकसार करें। क्रीम भी फेंटकर मिला दें। अब बादाम डालकर घी लगे केक पॉट में डाल दें और 180 डिग्री सेंटीग्रेड पर 30 मिनट बेक कर लें। ठंडा होने पर लाजवाब आलमंड केक ऊपर क्रीम से डेकोरेट करके पेश करें।

नोट : आप चाहे तो केक में साबुत बादाम भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

एगलेस चॉकलेट सूजी केक

सामग्री : 200 ग्राम सूजी, 100 ग्राम चीनी पाउडर, 30 ग्राम कोको पाउडर(विकल्प), 70 ग्राम दही, 80 मि.ली तेल, 200 मि.ली दूध, 1/2 छोटा चम्मच बेकिंग पाउडर, 1/2 छोटा चम्मच बेकिंग सोडा, 1/2 छोटा चम्मच नमक , 1 चम्मच चॉकलेट सॉस
गार्निश के लिए व्हीप्ड क्रीम (फेंटी हुई), गार्निश के लिए चॉकलेट शेविंग्स(कसी हुई)
विधि : सबसे पहले एक बर्तन में सूजी, चीनी और कोको पाउडर को मिक्स करें। इसके बाद सूजी और कोको पाउडर के मिश्रण में दही, तेल और चॉकलेट सॉस को मिक्स करें। अब इस मिश्रण में आधा दूध मिलाएं और एक स्मूद घोल तैयार कर लें, फिर 10 मिनट तक अलग रख दें। इसके बाद माइक्रोवेव को 180 डिग्री सेल्सियस पर गर्म होने के लिए ऑन कर दें। 10 मिनट बाद केक के मिश्रण में बाकी बचा हुआ दूध मिलाएं और अच्छे से मिक्स कर लें। इसके बाद मिश्रण में नमक, बेकिंग पाउडर और बेकिंग सोडा मिलाएं और मिक्स करें। अब एक बेकिंग टिन को ग्रीस कर लें और उसमें बेटर डालें। इसके बाद बेकिंग ट्रे को पहले से प्रीहीटिड माइक्रोवेव में करीब 25मिनट के लिए रखें। 25 मिनट बाद माइक्रोवेव को बंद करें और टूथपिक डालकर केक चेक के पकने के बार में चेक कर लें। अगर केक पक जाएगा, तो टूथपिक पर केक का मिश्रण नहीं लगेगा, वरना केक को कुछ देर और पकाएं। अब पके हुए केक को बेकिंग ट्रे से बाहर निकाल लें। इसके बाद केक को वायर वाली ट्रे पर रखें। अब केक पर व्हीप्ड क्रीम की एक परत लगाएं, फिर उस पर चॉकलेट शेविंग्स(कसी हुई) से गार्निश करें। अब तैयार केक को चाकू की मदद से काटें और बच्चों को सर्व करें।
सुझाव : हमेशा ताजा और मीठा दही का ही इस्तेमाल करें भुनी हुई सूजी का प्रयोग न करें। चॉकलेट के बिना सूजी केक बनाना चाहते हैं, 30 ग्राम कोको पाउडर के बजाय 30 ग्राम सूजी इस्तेमाल कर सकती हैं। आप गीले अवयवों के साथ सूजी को भिगोते समय 10 मिनट आराम करने का समय दें। फ्लेवरलेस तेल का प्रयोग करें।

हर 30 सेकंड में एक ट्वीट होता है महिलाओं के खिलाफ

एमनेस्टी इंटरनेशनल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर कंपनी एलिमेंट एआई ने अपनी स्टडी में दावा किया है कि ट्विटर पर हर 30 सेकंड में महिलाओं के खिलाफ धमकी, गाली, अपमानजनक या अभद्र ट्वीट किए जाते हैं। इस स्टडी में कहा गया है कि, ट्विटर पर अपमानजनक और अभद्र ट्वीट का शिकार होने वाली ज्यादातर महिलाएं पत्रकार या राजनेता हैं। स्टडी के मुताबिक, इन महिलाओं को हर 30 सेकंड में एक ऐसा ट्वीट मिलता है, जिसमें उनके खिलाफ अभद्र या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और एलिमेंट एआई ने इसके लिए ‘ट्रोल प्रोजेक्ट’ नाम से स्टडी की थी, जिसमें 150 देशों के 6,500 से ज्यादा वॉलेंटियर्स ने हिस्सा लिया था। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, इन वॉलेंटियर्स ने 2 लाख 88 हजार ट्वीट्स निकाले जो महिला पत्रकारों या नेताओं को अमेरिका और ब्रिटेन में 2017 में भेजे गए थे। एमनेस्टी की स्टडी के मुताबिक, साल 2017 में महिलाओं को 1.1 मिलियन (10 लाख से ज्यादा) अपमानजनक या अभद्र ट्वीट भेजे गए थे। यानी औसतन, ट्विटर पर हर 30 सेकंड में एक महिला अभद्रता का शिकार हुई।
इस अध्ययन में पाया गया कि गोरे रंग की महिलाओं को पिछले साल 5.6% अपमानजनक और 1.2% अभद्र ट्वीट मिले जबकि सांवले रंग की महिलाओं को इसी दौरान 8.9% अपमानक और 2.2% अभद्र ट्वीट मिले थे। इस हिसाब से गोरे रंग की महिलाओं के मुकाबले सांवले रंग की महिलाओं को 60% ज्यादा अपमानजनक और 84% अभद्र ट्वीट भेजे गए थे।
इस स्टडी में पाया गया 7% महिला पत्रकारों को 5.8% अपमानजनक और 1.2% अभद्र ट्वीट मिले, यानी हर 14 में से एक पत्रकार को सोशल मीडिया पर इस तरह के ट्वीट का सामना करना पड़ा। स्टडी में पाया गया कि 454 महिला पत्रकारों के खिलाफ 2,25,766 ट्वीट ऐसे थे, जिनमें अपमानजनक या अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया था।
इसी तरह से महिला राजनेताओं को भी ट्विटर पर सबसे ज्यादा शिकार होना पड़ता है। उन्हें 5.85% अपमानजनक और 1.27% अभद्र ट्वीट मिले। स्टडी के मुताबिक, 324 महिला राजनेताओं को 8,67,136 ट्वीट ऐसे मिले जिनमें उनके खिलाफ अपमानजनक या अभद्र भाषा कही गई थी। मतलब ट्विटर पर महिला राजनेताओं के खिलाफ महिला पत्रकारों के खिलाफ ज्यादा अपमानजक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिसर्च में सामने आया कि राइट विंग की पत्रकार और लेफ्ट विंग की राजनेताओं के खिलाफ ज्यादा मामले सामने आते हैं। लेफ्ट विंग की पत्रकार को 5.44% अपमानजनक और 1.13% अभद्र ट्वीट मिलते हैं, वहीं लेफ्ट विंग की नेताओं को 6.27% अपमानजनक और 1.35% अभद्र भाषा वाले ट्वीट किए जाते हैं।
इसी तरह से राइट विंग की पत्रकारों को 8.8% अपमानजनक और 1.98% अभद्र ट्वीट किए जाते हैं जबकि राइट विंग की नेताओं के लिए 5.07% अपमानजनक और 1.12% अभद्र ट्वीट होते हैं।
हालांकि, लेफ्ट विंग की महिला पत्रकारों और राजनेताओं को 6.05% अपमानजनक और 1.29% अभद्र ट्वीट मिलते हैं। वहीं, राइट विंग की पत्रकारों और नेताओं को 5.33% अपमानजनक और 1.18% अभद्र ट्वीट भेजे जाते हैं।

रख्माबाई : स्त्री अधिकार और कानून

वरिष्ठ इतिहासकार सुधीर चन्द्र की पुस्तक ‘‘रख्माबाई स्त्री अधिकार और कानून’’ गुलाम भारत के समय की एक ऐतिहासिक घटना का विश्लेषण है। यह बालविवाह जैसी सामाजिक कुरितियों के खिलाफ एक स्त्री के विद्रोह की कहानी है। सन् 1984 में रख्माबाई नामक स्त्री ने अपने पति के साथ रहने से इसलिए इन्कार कर दिया था, क्योंकि जिस समय उनकी शादी हुई उस समय वो अपरिपक्व थीं, जिसे वह विवाह नहीं मानती थी।“रख्माबाई में एक साथ लक्षित ‘विद्रोह’ और ‘समर्पण’ में कानून, जनमानस और सामाजिक बदलाव के बीच सतत चलता कार्य-कारण सम्बंध देखा जा सकता है।’’

रख्माबाई के खिलाफ दादाजी के मुकदमे में स्त्रियों की स्थिति को लेकर एक पूर्वग्रह छिपा हुआ था। इसकी क्रूरता सुनवाई के दौरान कभी-कभार ही उभरकर सामने आई। लेकिन जब आई तो दिखा गई कि एक व्यक्ति के रूप में स्त्राी का अपना कोई स्वतंत्रा अस्तित्व नहीं था। ऐसे ही एक अवसर पर, रख्माबाई पर दादाजी के अधिकार का दावा करते हुए वीकाजी ने कहा, ‘पत्नी अपने पति का एक अंग होती है, इसलिए उसे उसके साथ ही रहना चाहिए।’ यह उस तरह की बात थी जिसका मजाक उड़ाकर बेली यूरोपीय श्रेष्ठता से जुड़ा अपना दम्भ जता सकते थे। उन्होंने कहा, ‘आप इस नियम को भावनगर के ठाकुर पर कैसे लागू करेंगे, जिन्होंने राजपूतों की परम्परा के अनुसार एक ही दिन में चार स्त्रिायों के साथ विवाह किया?’ वीकाजी ने बेधड़क जवाब दिया, ‘तो फिर ठाकुर की अस्मिता को चार हिस्सों में विभाजित माना जाएगा।’ हिन्दू कानून की इस व्याख्या पर अदालत में जो अट्टहास हुआ उसे समझा जा सकता है। लेकिन बेली जैसों के इस विश्वास को समझना मुश्किल है कि औरतों के प्रति उनका नज़रिया उस नज़रिए से बेहतर था जिसको लेकर यह अट्टहास हुआ था। ग्रेटना ग्रीन विवाहों की तरह उन्हें यह भी याद होना चाहिए था कि ‘सबसम्पशन’ (सन्निवेश) अंग्रेजी पारिवारिक जीवन की धुरी हुआ करता था। बेली भूल गए थे कि सन्निवेश के इसी सिद्धान्त का एक अवशेष अंग्रेजी कानून की एक महत्त्वपूर्ण मान्यता के रूप में अब भी मौजूद था। इस सिद्धान्त के अनुसार, पत्नी इस सीमा तक अपने पति का अभिन्न अंग थी कि उसे अपने पति के खिलाफ दीवानी अदालत में मुकदमा करने का भी अधिकार नहीं था। µइसी पुस्तक से

रख्माबाई स्त्री अधिकार और कानून

लेखक- सुधीर चन्द्र

अाईएसबीएन-978-81-267-2337-9

पेज-223

मूल्य- 400

प्रकाशन-राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

(साभार – राजकमल प्रकाशन)

जल्दी याद करना सीखेंं

https://www.youtube.com/watch?v=CReq_7TL3mM&t=83s

वीडियो साभार – सन्तोष सिंह के यूट्यूब चैनल से

ये औरतों की चीज़ है

ऋतेश पाण्डेय

(ऋतेश पाण्डेय चर्चित संस्कृतिकर्मी हैं और नीलाम्बर के सचिव हैं। आमतौर पर स्त्रियों की समस्याओं पर इस कदर की गम्भीर बात को सहज अन्दाज में कह जाना आसान नहीं होता। ऋतेश जी बहुत कम लिखते हैं मगर जो भी लिखते हैं, आप उसे पढ़कर सोचेंगे जरूर। मासिक धर्म यानी पीरियड्स को लेकर लिखी गयी यह पोस्ट हमारे समाज और परिवारों में व्याप्त भ्रान्तियों के साथ उस सोच को भी सामने रखती है जिस पर बात करना समय की माँग है। इस बार सोशल मीडिया से यह जरूरी बात….)

 

बात उन दिनों की है जब whisper napkins बाज़ार में नए – नए आए थे या शायद मुझे पहली बार दिखे थे। तब तक दूरदर्शन पर “धोना, सुखाना, गया वो ज़माना” वाला प्रचार नहीं आया था, और हम मासिक धर्म जैसे शब्द से बिल्कुल अनजान थे।

कोई तीस-पैंतीस वर्ष पहले की बात है। जी. टी. रोड, पिलखाना के पास नए-नए अपार्टमेंट उभरने लगे थे। उनमें नई-नई सुंदर सजी चकमक दुकानें खुलने लगीं थी। जहाँ WELL PACKAGED वस्तुएँ हमें ललचाया करतीं।  यह उन दिनों की बात है जब हमारे लिए ब्रेड मतलब कि पाव रोटी रिहायशी चीज़ हुआ करती थी।

तो हुआ ये कि WHISPER के पैकेट पर मेरी नज़र बार-बार अटक जा रही थी। नीले रंग का बड़ा ही सुंदर पैकेट । बार-बार मेरा ध्यान उधर ही चला जाता। सुंदर पैकेट मतलब बढ़िया ब्रेड। क्योंकि मँहगे और स्वादिष्ट मिल्की पाव रोटी के पैकेट भी बड़े सुंदर हुआ करते थे। (बता देना चाहता हूँ कि WHISPER के पैकेट मैंने पहली बार किसी MEDICAL STORE में नहीं General Store में देखा था
तो साहब एकदिन जब नहीं रहा गया, मैंने जाकर दुकानदार से उस नए नीले पैकेट वाले ब्रेड के बारे में पूछ दिया और उसकी कीमत जाननी चाही। पहले तो वह मुझे आश्चर्य से देखता रहा। फिर मुस्कराने लगा। अंत में हँसते हुए बोला.. बाबू ये खाने की चीज नहीं है। ये औरतों की चीज है और मैं झेंपता हुआ मन में कई सवालों से जूझता चला आया।

टॉयलेट में झूलते कपड़े
हमारे बचपन का बड़ा हिस्सा ऐसे मकान में गुज़रा जहाँ सार्वजनिक टॉयलेट ही इस्तेमाल होते थे। जहाँ घटित और पकड़ी गईं कई “टॉयलेट-एक प्रेम कथा” हमारे कानों में अब तक गूँज रहीं हैं। इन टॉयलेट्स में अक्सर झूलते कपड़ों के टुकड़ों ने मेंरे मन में जिज्ञासा पैदा की। वे वहाँ क्यों हैं? किस काम आती हैं? एक वाकया मुझे याद आता है जब पिता जी रूई का बड़ा-सा बंडल लेकर आए थे। अगले दिन दुकान पर ले जानी वाली चीजों की तैयारी में वे लगे थे। हमेशा की तरह हम सहयोग कर रहे थे। हमारे एक दूर के फुफेरे चाचा जिनका नाम मकरध्वज मिश्रा था, और लोगों ने बिगाड़कर जिसे मुकुरधुज कर दिया था। वह वहीं आए हुए थे। वे लगातार पिता जी से उस रूई के बंडल के बारे में पूछे जा रहे थे। उनकी मुस्कराहट बता रही थी कि वे समझ रहे थे कि वह बंडल क्योंकर आया होगा। वे नर्लज्ज से प्रश्न किए जा रहे थे। पिता जी बात को टालते रहे थे। मैं जब भी उस घटना के बारे में सोचता हूँ तो मन करता है कि सारी मर्यादाओं को भूलकर उन्हें दो टुक सुनाऊँ और एक चमाट जड़ दूँ।
आज भी जब Medical Store Sanitary Napkins काले पैकेट में दिया करते हैं। तब सोचता हूँ कि हम कितने आधुनिक और समझवाले बन पाए हैं? साथ ही उन दिनों सार्वजनिक संडास,टॉयलेट्स का उपयोग करती अपनी माँ, चाची और मौसी और उनके जैसी महिलाओं की समस्याओं और झेंपों को महसूस कर परेशान और लज्जित होता हूँ, यह जानते हुए कि लोखों, करोड़ों महिलाएँ आज भी वैसी ही समस्यायों का सामना कर रही हैं।
महागुरु ज्ञान और कौआ छूना

11वीं में जब पहुँचे तो राय जी हिंदी टीचर मिले। अपने को काफ़ी ‘बोल्ड’ टाइप ज़ाहिर करते थे। उदाहरण के लिए पढाते -पढाते एक दिन जाने कौन-से प्रसंग पर कहने लगे कि विदेशी कुत्तों का क्या कहना! वे इतने मँहगे साबुन और शैंपू से नहाते हैं जितने हमारे बीच बैछे कुछ विद्यार्थियों के घर के महीने का खर्च होगा… और कि वे मँहगी गाड़ियों में घूमते हैं… और कि वे सुंदर धनी ललनाओं की गोद में बैठते है… और.. और वे बताते कि वे कुत्ते उन ललनाओं के किन -किन अंगों को छूते हैं… साहब! वर्णन कुछ ऐसा होता कि कुछ विद्यार्थी, कुछ क्या लगभग सभी के मन में गुदगुदी होने लगती… और तभी वे अचानक किसी एक विद्यार्थी से पूछ बैठते –“क्यों ठाकुर, क्या सोचने लगे…” फिर मुस्करा कर कहते। “देखो ये सपने में कुत्ता बन गया था। अरे नालायक तुम कुत्ता तो बनोगे… लेकिन सड़क वाला… ” और फिर पूरे क्लास में ठहाका गूँज उठता। बाद में पता चला कि वे अपने हर बैच को यह सुनाया करते थे और खुद को बच्चों का प्रिय बनाया करते थे।

बहरहाल एक दिन जाने क्या प्रसंग आया कि गुरू जी मासिक धर्म पर कुछ बताने लगे और कहा कि मासिक धर्म में जो रक्त बहता है, उसकी एक बूँद भी जहाँ गिर जाए वह स्थान अपवित्र और बंजर हो जाए… और कि उसका स्पर्श करने वाले भयंकर नर्क का अधिकारी बनता है। और जाने क्या-क्या भयानक बता गए वे जो हम ठीक से समझ भी न पाए। इस विषय़ में तब भी हम अज्ञानी से ही थे। पर डर तो हम गए ही।

बहुत जल्द ही हमें उनके इस विचार और वैसे विचार वालों का व्यावहारिक दुष्परिणाम दिख गया। बारहवीं पास करने के बाद ज़ेब खर्च के लिए हम ट्यूशन करने लगे। एक ट्यूशन में भाई-बहन दो विद्यार्थी पढते थे। राजस्थानी ब्राह्मण थे। दधीची कुलनाम वाले। तो हुआ यों कि एक दिन ट्यूशन के दौरान पानी-वानी, चाय-वाय सब शिष्या ने ही दिया। और दूसरे दिन भी दुहराया। मैंने गौर किया कि उसकी माँ फ्लैट के हॉल में ही एक कोने में पड़ी रहती हैं। मैं शिष्या से पूछ दिया। माँ की तबीयत खराब है क्या? शिष्या ने बताया कि उन्हें कौआ छू गया है। कौआ छू गया है..! मतलब? माने कैसे कौआ छू गया, और छूगया तो छू गया इसमें ऐसा क्या हो गया? मैंने पूछना चाहा पर जाने क्यों पूछा नहीं। अनुभव ने बता दिया कि यह कोई सचमुच के कौआ छूने वाला टोटका नहीं हो सकता। फिर यह कौआ छूने वाली घटना हर महीने रीपीट होने लगी। फिर दूसरे ट्यूशन में भी ऐसा देखने को मिला। तो बिना पूछे भी बातें स्पष्ट होने लगीं। बाद में तो दोस्तों से इसपर बात भी हुई। बहरहाल तब मुझे गुरू जी का कक्षा में दिया गया वक्तव्य बेहतर समझ आने लगा।

पिछड़ापन तो है फिर भी मुझे इस बात की खुशी है, कि मेरे घर-परिवार में, मेरे गाँव में शयाद मेरे अंचल में भी, कहीं किसी महिला को उसके इस जैविक क्रिया के कारण “कौआ छुने”, अपनो के बीच ही पृथक जीने की सज़ा जैसी व्यवस्था को नहीं झेलना पड़ता। ऐसा ना मेरी पत्नी के साथ है। न माँ को ऐसे देखा न दादी को। इस बात पर अपने पूर्वजों को बड़ा वाला थैंक्यू।

ग़ालिब की 221वीं जयंती के अवसर पर संगोष्ठी

कोलकाता : गालिब ने भारतीय परंपरा का विकास किया और अपने ऐतिहासिक दौर में दायरों और बंधनों को चुनौती दी। उनकी शायरी लोगों के मन को छूती है और इसने उर्दू के बाहर भी पाठकों को आकर्षित किया है। वे एक उदार और धर्मनिरपेक्ष कवि के रूप में सामने आते हैं। भारतीय भाषा परिषद में ‘कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयाँ और’ पर आयोजित संगोष्ठी में उपर्युक्त विचार व्यक्त किए गए। आलिया विश्‍वविद्यालय की प्रोफेसर दरख्शां जर्रीन ने कहा कि गालिब ने अपने जीवन में इतना अधिक दुख झेला कि वे ईश्‍वर से शिकायत हीं नहीं करते उन्हें झेड़ते भी हैं। उन्होंने बनारस की यात्रा के समय लिखा था कि इतनी बुराइयों के बावजूद यदि दुनिया नष्ट नहीं हो रही है तो इसकी एक वजह बनारस सा खूबसूरत नगर है। वे कलकत्ता भी आए थे और इसके बारे में कहा। ‘कलकत्ते का जो जिक्र किया तूने हमनशीं, इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाय-हाय’। वे बहुत उदार शायर थे।
खिदिरपुर कॉलेज की प्रोफेसर इतु सिंह ने कहा कि गालिब को पढ़े बिना उत्तर भारत की बौद्धिक समृद्धि को समझा नहीं जा सकता। प्रो.इरशाद आलम ने कहा कि गालिब के पास एक विश्‍व दृष्टि थी।
अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि गालिब एक ऐसे कवि थे कि यदि प्रेम और खुदा में किसी एक को चुनने का सवाल आता तो गालिब प्रेम को चुनते। उनके प्रेम का बड़ा ही व्यापक अर्थ था। उन्होंने अपनी शायरी में यह दिखाया है कि हिंदुस्तान अपने अभाव में भी कितनी जिंदादिल रह सकता है और आत्मसम्मान के लिए लड़ सकता है।
धन्यवाद देते हुए पीयूषकांत ने कहा कि पश्‍चिमी देश अपनी विरासत को बचा कर रखते हैं। हमें भी हिंदी-उर्दू की अपनी साझी विरासत को बचाना चाहिए। सभा में बड़े पैमाने पर साहित्यप्रेमी और युवा उपस्थित थे।

न्यायालय ने दिया बलात्कार पीड़ितों की पहचान उजागर नहीं करने का निर्देश

नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने बलात्कार और यौन हिंसा पीड़ितों के नाम और पहचान उजागर नहीं करने का निर्देश देते हुए कहा कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे समाज में बलात्कार पीड़ितों के साथ ‘अछूत’ जैसा व्यवहार किया जाता है।
न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को निर्देश दिया कि बलात्कार और यौन हिंसा पीड़ितों की पहचान किसी भी रूप में उजागर नहीं की जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों, ऐसे मामले भी जिनमें आरोपी नाबालिग हों, की प्राथमिकी सार्वजनिक नहीं करे।
इस मामले में पिछले दिनों सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत से कहा गया था कि महिलाओं के प्रति अपराध के मामलों में निष्पक्ष सुनवाई के लिये प्रेस की आजादी और पीड़ित के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। इस मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रही वरिष्ठ अधिवक्ता इन्दिरा जयसिंह ने न्यायालय में दलील दी थी कि अदालत के विचाराधीन मामलों में मीडिया ‘समानान्तर सुनवाई’ कर रहा होता है और इसलिए शीर्ष अदालत को महिलाओं के प्रति अपराध के मामलों की रिपोर्टिंग के लिये दिशानिर्देश निर्धारित करने चाहिए।
जयसिंह का यह भी दावा था कि सक्षम अदालत में आरोप पत्र दाखिल करने से पहले ही पुलिस मीडिया को सूचनाएं लीक करती है जो न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के समान है। उन्होंने कठुआ सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले का जिक्र करते हुये दावा किया था कि इसमें अदालत में आरोप पत्र दाखिल होने से पहले ही मीडिया ने कुछ आरोपियों के निर्दोष होने का फैसला भी सुना दिया था।
जयसिंह ने भारतीय दंड संहिता की धारा 228-ए (यौन अपराध पीड़ित की पहचान उजागर करने से संबंधित) और पॉक्सो कानून की धारा 23 की व्याख्या करने का न्यायालय से अनुरोध किया था। निर्भया कांड के बाद देश में महिलाओं की सुरक्षा की दिशा में पहल के समर्थन में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह मुद्दा उठा था।

अमिताभ घोष को 2018 का ज्ञानपीठ पुरस्कार

नयी दिल्ली : अंग्रेजी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार अमिताव घोष को वर्ष 2018 के लिए 54वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले वह अंग्रेजी के पहले लेखक हैं।
ज्ञानपीठ द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि यहां शुक्रवार को प्रतिभा रॉय की अध्यक्षता में आयोजित ज्ञानपीठ चयन समिति की बैठक में अंग्रेजी के लेखक अमिताव घोष को वर्ष 2018 के लिए 54वां ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया। देश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में अमिताव घोष को पुरस्कार स्वरूप 11 लाख रूपये की राशि, वाग्देवी की प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जायेगा।
ज्ञानपीठ के सूत्रों ने बताया कि अंग्रेजी को तीन साल पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार की भाषा के रूप में शामिल किया गया था और अमिताव घोष देश के सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार से सम्मानित होने वाले अंग्रेजी के पहले लेखक हैं। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 1956 को जन्में अमिताव घोष को लीक से हटकर काम करने वाले रचनाकार के तौर पर जाना जाता है। वह इतिहास के ताने बाने को बड़ी कुशलता के साथ वर्तमान के धागों में पिरोने का हुनर जानते हैं। घोष साहित्य अकादमी और पद्मश्री सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘द सर्किल ऑफ रीजन’, ‘दे शेडो लाइन’, ‘द कलकत्ता क्रोमोसोम’, ‘द ग्लास पैलेस’, ‘द हंगरी टाइड’, ‘रिवर ऑफ स्मोक’ और ‘फ्लड ऑफ फायर प्रमुख हैं। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 में मलयालम लेखक जी शंकर कुरूप को प्रदान किया गया था।

खिलाड़ी दे रहे मैच फिक्सिंग की जानकारी, भ्रष्टाचार मुक्त होगा 2019 वर्ल्ड कप: आईसीसी

नयी दिल्ली : अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के मुख्य कार्यकारी डेविड रिचर्डसन ने खुलासा किया कि मैच फिक्सिंग को लेकर खिलाड़ियों से लगातार जानकारियां मिल रही है। उन्होंने कहा, “2019 वर्ल्ड कप भ्रष्टाचार मुक्त होंगे। राष्ट्रीय संस्थान, सरकारों को भ्रष्टाचार और फिक्सिंग समाप्त करने के लिए कदम उठाने चाहिए। आईसीसी की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई (एसीयू) फिक्सिंग से लड़ने के लिए सक्रियता के साथ कदम उठा रही। उन लोगों के खिलाफ भी कदम उठाए जा रहे हैं जो इस खेल को खराब करने का काम कर रहे हैं।”
रिचर्डसन ने कहा, “आईसीसी सरकारों से मिलकर मैच फिक्सरों को जेल की सजा का प्रावधान करने के लिए कानून बनाने की अपील भी कर रही है। हम सरकारों से अपील कर रहे हैं कि वे क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग को कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में डाल दें। एसीयू फिक्सिंग को लेकर काफी सक्रिय है, जिसकी वजह से खिलाड़ियों की ओर से फिक्सरों द्वारा संपर्क किए जाने जैसी सूचनाएं लगातार मिल रही हैं।”हाल ही में श्रीलंका के गेंदबाजी कोच और पूर्व खिलाड़ी नुवान जोएसा को मैच फिक्सिंग के आरोप में निलंबित किया गया था। वहीं, श्रीलंका के दिग्गज ओपनर सनत जयसूर्या पर भी फिक्सिंग संपर्क की जानकारी नहीं देने का आरोप लगा था।

विवाह बंधन में बंधे ईशा अंबानी और आनन्द पीरामल

मुम्बई : देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की बेटी ईशा अंबानी बेहद भव्य समारोह में पीरामल रीयलिटी के संस्थापक अजय पीरामल के बेटे आनंद पीरामल के साथ विवाह बंधन में बंध गईं। शादी की रस्में मुकेश अंबानी के मुंबई स्थित 27 मंजिला आवास ‘एंटीलिया’ में पूरी की गईं। ईशा के जुड़वा भाइयों आकाश और अनंत अंबानी के पारंपरिक परिधानों में घोड़े पर सवार होकर निकलने के साथ ही बुधवार को विवाह समारोह की शुरुआत हुई। इसके बाद पीरामल परिवार बारात लेकर ‘एंटीलिया’ पहुंचा। इस दौरान व्यस्तम एल्टामाउंट रोड पर कुछ समय के लिए यातायात को रोकना पड़ा। आटोमैटिक राइफलों से लैस सुरक्षाकर्मी पूरे रास्ते बारात की सुरक्षा में तैनात थे। दूल्हा बने आनंद पीरामल विंटेज रॉल्स रॉयस कार पर सवार थे। बारात के ‘एंटीलिया’ पहुंचने पर आकाश और अनंत अंबानी के अलावा उनके चाचा अनिल अंबानी ने मेहमानों का स्वागत किया। अंबानी और पीरामल परिवार के मेहमानों में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, बच्चन परिवार, प्रियंका चोपड़ा और उनके पति निक जोनस, आमिर खान और सचिन तेंदुलकर भी शामिल थे। इस दौरान अपने पसंदीदा उद्योगपतियों, खिलाडि़यों और फिल्मी हस्तियों को देखने के लिए लोग आसपास की इमारतों पर चढ़े नजर आए।