Monday, July 6, 2026
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धोखे से सम्पत्ति बेचने पर भी खरीदार बेदखल नहीं होगा

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि ऐसे व्यक्ति द्वारा जो संपत्ति के मालिक नहीं है लेकिन भ्रमित करके संपत्ति दूसरे व्यक्ति को बेचता है तो ऐसे खरीदार को कानूनी संरक्षण मिलेगा। उसे संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता। मामले के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता ने 1990 में एक प्लॉट पर स्वामित्व का दावा दायर किया था। यह प्लॉट उसने जनवरी 1990 में प्रणब बोरा से बिना यह जाने खरीदा था कि यह भूमि लैंड सीलिंग में सरप्लस भूमि थी जिसे सरकार ने दो साल पहले सरप्लस घोषित किया था। हालांकि सितंबर 1990 में यह भूमि सीलिंग से मुक्त कर दी गई। इस पर खरीदार ने 1991 में भूमि अपने नाम दाखिल खारिज करवा ली। मगर चार साल के बाद विक्रेता संपत्ति में घुस आया और उस पर कब्जा कर लिया।
खरीदार ने कोर्ट में स्वामित्व घोषित करने का मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने उसके पक्ष में आदेश दिया, लेकिन पहली अपीलीय अदालत ने इसे पलट दिया। अदालत ने कहा कि हस्तांतरण के समय विक्रेता भूमि का मालिक नहीं था, साथ ही खरीदार का भी संपत्ति पर धारा 53 ए के तहत अधिकार नहीं बनता, क्योंकि वह सरकारी भूमि थी। इस फैसले को हाईकोर्ट ने भी सही माना और पुष्टि कर दी। मामला सुप्रीम कोर्ट में आया और कोर्ट ने उसका दावा स्वीकार कर लिया। जस्टिस एल नागेश्वर राव और एमआर शाह की पीठ ने फैसले में कहा कि संपत्ति हस्तांतरण एक्ट की धारा 43 कहती है कि जहां कोई व्यक्ति धोखाधड़ी से या गलती से कोई जमीन बेचता है और उसकी कीमत ले लेता है तो यह हस्तांतरण सही माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हस्तांतरण के समय भूमि पर विक्रेता का अधिकार त्रुटिपूर्ण था या उसका कोई टाइटल ही नहीं था, लेकिन बाद में वह उसका मालिक या टाइटल होल्डर बन जाता है तो ऐसा हस्तांतरण वैध होगा। ऐसी हालत में विक्रेता को यह अधिकार नहीं होगा कि वह भूमि के हस्तांतरण / बिक्री पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि कानून ऐसे व्यक्ति को, जो जमीन को अपना बता के बेच चुका है, मुकदमा करने से रोकता है, वह यह नहीं कह सकता कि पूर्व का हस्तांतरण उस पर बाध्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को अपनी गलती का फायदा उठाने का अधिकार नहीं है।

हुगली के तट पर

आनन्द गुप्ता 

पिछली रात की याद लेकर
चाँद
अभी भी टँगा है आकाश में !

स्वर्णिम धूप में नहाया हुआ है हुगली नदी का जल
जहाँ झिलमिलाती है तुम्हारी कंचन छवि !

दूर कहीं से वीरेंद्र कृष्ण भद्र की आवाज़ में
ध्वनित हो रहे हैं महालया के गीत
लाल पाड़ की साड़ी पहनी महिलाएँ
‘उलू ‘ ध्वनि और शंखनाद से
कर रही हैं देवी की अराधना
“एशो हे देवी ! ”

ढाकी ने ढाक बजाया
और आनंद से भर उठी हैं चारों दिशाएँ
रात भर झर-झर कर ज़मीन पर बिछे
शिऊली फूल की मधुर गंध में
घुल- मिल गयी है तुम्हारी देह- गंध !

अगरबत्ती की सुंगध से
महक रहा है हुगली का यह घाट
पितरों का तर्पण कर रहे हैं लोग
मैदानों में उत्सव मना रहे हैं
कास के लहलहाते फूल
जैसे निरुद्देश्य भागे जा रहे हों सफ़ेद घोड़े !

किनारे का बालू तुम्हारी पीठ है
जहाँ पर मैं रचता हूँ प्रेम का महाकाव्य
हुगली के छोटे टापू तुम्हारा वक्ष
जहाँ मेरे सपने पलते हैं !

नदी पर तैरता है आकाश
जिस पर मैं इंद्रधनुष रचता हूँ !

अभी-अभी
कोई नौका चला आया है धीरे से
माँझी ने गाया है कोई करुण गीत
कोई टीस
मन की उभर आई है अचानक !

पाठकों और रंगकर्मियों के लिए दस्तावेज़ ‘कला वसुधा’

जीतेन्द्र सिंह 

पिछले दिनों लखनऊ से निकलने  वाली प्रदर्शनकारी कलाओं की त्रैमासिक पत्रिका कला वसुधा के पाँच अंक पढ़े । कालिदास प्रथम एंव द्वितीय प्रसंग, नौटंकी (सांगीत)प्रसंग, और बलराज साहनी प्रथम एंव द्वितीय प्रसंग, यह अंक ऐसे समय में प्रकाशित हुआ है जब रंगमंच अपने भविष्य के लिए वर्तमान समय में आंतरिक रूप से जुझ रहा है । वहीं कला वसुधा रंगमंच के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते हुए आशा बाँधती है।
इन दिनों कला वसुधा के यह अंक अपनी सार्थकता की वजह अत्यन्त लोकप्रिय और चर्चाओं में हैं।पाँचों  विशेषांक हिन्दी पाठकों एंव रंगकर्म करने वालों के लिए पठनीय एंव संग्रहणीय हैं क्योंकि इन अंकों में अपने समय की जानकारी बहुत तथ्यात्मक तरीके से संग्रहित किये गये है ।कालिदास  प्रसंग के दोनों अंको में संस्कृत नाटकों एंव कालिदास की पूरी यात्रा एक साथ पढ़ने को मिल जाती है ।कालिदास के नाटकों के साथ उनके साहित्य की प्रासंगिकता पर उल्लेख किया गया है। नौटंकी (संगीत)अंक परम्पराशील नाट्य नौटंकी का उद्भव एंव विकास के  साथ लोक नाट्यों की परम्परा पर नौटंकी के जानकारों के साथ- साथ कलाकारों के बातचीत महत्वपूर्ण बनाया दिया है। बलराज साहनी प्रसंग भी दो अंकों  में बाँटा गया है। इसमें फ़िल्मों एंव रंगमंच के समीक्षकों के लेख शामिल है। खुद बलराज साहनी के लेख शामिल है।साहनी के शुरुआती दौर के संस्मरण और अन्य लेख भी हैं। बलराज साहनी के व्यक्तित्व के साथ यथार्थवादी समाजवादी एवं स्वाभाविक सपने देखने की आदत और उनके  रंगकर्म के बारे पढ़ कर उनके विशाल व्यक्तित्व के बारे पता चलता है ।
इसके लिए प्रधान सम्पादक शंख बंदोपाध्याय और संपादक उषा बनर्जी को जाता है । व्यक्तिगत कोशिश से इस तरह की पत्रिका लगातार निकते देख कर हैरानी होती है। कला वसुधा की यह प्रत्येक अंक की सामग्री रंगकर्म अध्ययन से परिचित करता है। वर्तमान समय में दस्तावेज़ के रुप में महत्वपूर्ण बन गये हैं।

(समीक्षक वरिष्ठ रंगकर्मी हैं)

ऋषि कुमार शुक्ला ने सम्भाला सीबीआई निदेशक का पदभार 

नयी दिल्ली : सीबीआई के नवनिर्वाचित निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने जाँच एजेंसी प्रमुख का पदभार संभाला। भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के 1983 बैच के अधिकारी शुक्ला ऐसे समय में सीबीआई का कार्यभार संभाल रहे हैं जब एजेंसी तथा कोलकाता पुलिस के बीच विवाद राजनीतिक रूप ले चुका है और केन्द्र तथा पश्चिम बंगाल सरकारें एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं।
सीबीआई के प्रवक्ता नितिन वाकणकर ने बताया कि आईपीएस आर के शुक्ला ने सोमवार सुबह सीबीआई निदेशक का पद संभाला। मध्य प्रदेश पुलिस के पूर्व डीजीपी और खुफिया विभाग के अनुभवी अधिकारी शुक्ला के पूर्ण निदेशक के रूप में कार्यभार संभालने से एजेंसी के कामकाज में स्थिरता आने की संभावना है। एजेंसी पहले ही पोंजी घोटाला मामलों में पश्चिम बंगाल सरकार की कार्रवाई को चुनौती देने के लिए उच्चतम न्यायालय जाने का फैसला कर चुकी है।
सीबीआई के अंतरिम प्रमुख एम. नागेश्वर राव की स्थिति कुछ अजीबो-गरीब हो गई और वह पश्चिम बंगाल पुलिस की इस कार्रवाई का तत्काल जवाब नहीं दे सके। पश्चिम बंगाल में ना सिर्फ सीबीआई टीम को हिरासत में लिया गया बल्कि साल्ट लेक के सीजीओ परिसर स्थित एजेंसी के कार्यालय की भी घेराबंदी कर ली गई। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केन्द्र की कथित मनमानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इस कदम से हुए उनके (ममता के) अपमान के खिलाफ रविवार शाम धरने पर बैठ गईं थीं।
सीबीआई का एक दल शारदा और रोज वैली घोटाला मामलों में अचानक कोलकाता पुलिस प्रमुख राजीव कुमार से पूछताछ करने उनके घर पहंची, जिसके बाद इस मामले ने तूल पकड़ा। पश्चिम बंगाल पुलिस ने सीबीआई के दल को दरवाजे पर ही रोक दिया और बाद में उन्हें थाने ले गई। राज्य पुलिस अधिकारियों ने कहा कि पश्चिम बंगाल पुलिस ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि एजेंसी के अधिकारियों के पास कोई वारंट नहीं था। बनर्जी के एक करीबी सहयोगी से उनके आवास पर हाल ही में पूछताछ की गई थी। आम चुनावों के मद्देनजर जाँच में तेजी कर दी गई है।

अबू धाबी ने बनाया हिन्दी को अदालत की तीसरी आधिकारिक भाषा 

दुबई : अबू धाबी ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अरबी और अंग्रेजी के बाद हिन्दी को अपनी अदालतों में तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है। न्याय तक पहुंच बढ़ाने के लिहाज से यह कदम उठाया गया है। अबू धाबी न्याय विभाग (एडीजेडी) ने शनिवार को कहा कि उसने श्रम मामलों में अरबी और अंग्रेजी के साथ हिन्दी भाषा को शामिल करके अदालतों के समक्ष दावों के बयान के लिए भाषा के माध्यम का विस्तार कर दिया है। इसका मकसद हिन्दी भाषी लोगों को मुकदमे की प्रक्रिया, उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में सीखने में मदद करना है। आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक, संयुक्त अरब अमीरात की आबादी का करीब दो तिहाई हिस्सा विदेशों के प्रवासी लोग हैं। संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय लोगों की संख्या 26 लाख है जो देश की कुल आबादी का 30 फीसदी है और यह देश का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। एडीजेडी के अवर सचिव युसूफ सईद अल अब्री ने कहा कि दावा शीट, शिकायतों और अनुरोधों के लिए बहुभाषा लागू करने का मकसद प्लान 2021 की तर्ज पर न्यायिक सेवाओं को बढ़ावा देना और मुकदमे की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना है।

आरबीआई ने  0.25 घटाई  प्रतिशत रेपो दर , मकान-दुकान के लिए सस्ते हो सकते हैं कर्ज

मुम्बई : मुद्रास्फीति की नरमी को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने गत गुरुवार को अपनी नीतिगत ब्याज दर ‘रेपो’ 0.25 प्रतिशत घटा कर 6.25 प्रतिशत कर दी। इससे बैंकों को कर्ज का धन सस्ता पड़ेगा और वे आने वाले दिनों में मकान, वाहन तथा अन्य निजी वस्तुओं की खरीद और उद्योग धंधे के लिए कर्ज सस्ता कर सकते हैं।
नए गवर्नर शक्तिकांत दास के नेतृत्व में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीस) की पहली बैठक हुई। रिजर्व बैंक ने अपने नीतिगत दृष्टिकोण को भी नरम कर ‘तटस्थ‘ कर दिया है। अभी तक उसने मुद्रास्फीति के जोखिम के मद्देनजर इसे ‘ नपी-तुली कठोरता’ वाला कर रखा था। इससे संकेत मिलता है कि रिजर्व बैंक आगे चल कर रेपो दर में और कमी कर सकता है। केंद्रीय बैंक ने मुद्रास्फीति के लगातार नीचे बने रहने के मद्देनजर बाजार में कर्ज सस्ता करने वाला यह कदम उठाया है। खुदरा मुद्रास्फीति दिसंबर 2018 में 2.2 प्रतिशत थी जो इसका 18 माह का निम्नतम स्तर है।
रेपो दर वह दर होती है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को एक दिन या इससे भी कम समय के लिये नकद धन उधार देता है। रेपो दर में 0.25 प्रतिशत कटौती के साथ ही रिवर्स रेपो दर भी इतनी ही घटकर 6 प्रतिशत रह गई। इसके साथ ही बैंक दर और सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ) 6.50 प्रतिशत पर आ गई। छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की यह चालू वित्त वर्ष की छठी और अंतिम द्विमासिक समीक्षा बैठक थी। बैठक में छह में से चार सदस्यों ने रेपो दर में कमी किए जाने का समर्थन किया। हालांकि, रिजर्व बैंक के रुख को नरम करने के मामले में सभी सदस्य एक राय रहे।
रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति के बारे में अपने अनुमान को भी कम किया है। उसका मानना है कि मार्च 2019 में समाप्त होने वाली तिमाही में यह 2.8 प्रतिशत रहेगी। वर्ष 2019-20 की पहली छमाही के लिये मुद्रास्फीति अनुमान 3.2- 3.4 प्रतिशत रहने और तीसरी तिमाही में 3.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। मौद्रिक नीति समिति ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि ‘‘ निकट अवधि में मुद्रास्फीति की मुख्य दर नरम बने रहने का अनुमान किया गया है। मुद्रास्फीति का वर्तमान स्तर नीचे है और खाद्य मुद्रास्फीति भी शांत है।’’
समिति ने कहा है कि ‘‘सब्जियों और तेल की कीमत, वैश्विक व्यापार में तनाव, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के महंगा होने, वित्तीय बाजारों में उतार चढ़ाव और मानूसन की स्थिति के प्रति हमें सजग रहना होगा।’’ समिति के प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘नीतिगत ब्याज में यह कटौती आर्थिक वृद्धि में सहायक होने के साथ साथ मुद्रास्फीति को चार प्रतिशत पर सीमित रखने के मध्यावधिक लक्ष्य के अनुकूल है।’’
मौद्रिक समिति की बैठक में डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य और सदस्य चेतन घाटे ने रेपो को 6.5 प्रतिशत पर ही बनाए रखने का पक्ष लिया। लेकिन गवर्नर दास और तीन अन्य सदस्यों ने इसमें कमी लाने के प्रस्ताव के पक्ष में सहमति जताई। एमपीसी ने कहा है कि इस समय ‘‘निजी निवेश और उपभोग को मजबूत करने और प्रोत्साहित करने की जरूरत है।’ प्रस्ताव में कहा गया है कि निवेश में तेजी आई है, पर यह मुख्य रूप से बुनियादी ढांचा क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ाए जाने का परिणाम है।
गौरतलब है कि कर्ज सस्ता होने से निजी निवेश और उपभोग प्रोत्साहित हो सकता है। आरबीआई ने 2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.4% रहने का अनुमान लगाया है। चालू वित्त वर्ष के लिये केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने जीडीपी वृद्धि 7.2% रहने का अुनमान लगाया है।
एमपीसी का अनुमान है कि अंतरिम बजट के प्रावधानों से लोगों के पास खर्च करने को ज्यादा पैसा बचेगा और सकल मांग बढेगी। लेकिन इसका असर दिखने में अभी समय लगेगा। अंतरिम बजट 2019-20 में सरकार ने छोटे और सीमांत किसानों को साल में छह हजार रुपये की आय समर्थन योजना लागू करने के साथ साथ पांच लाख रुपये तक की कर योग्य आय को छूट दे कर कर मुक्त करने की घोषणा की है। किसानों के लिए आय हस्तांतरण योजना पर इस साल 20,000 करोड़ रुपये और अगले वित्त वर्ष में 75000 करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान है। इससे ग्रामीण बाजार में उपभोग मांग बढ़ने की उम्मीद है लेकिन इससे चालू वित्त वर्ष का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.3 प्रतिशत के बजट अनुमान से बढ कर संशोधित अनुमान में 3.4 प्रतिशत पर पहुंच गया है।

नहीं रहे मराठी अभिनेता रमेश भाटकर

मुम्बई : वयोवृद्ध मराठी अभिनेता रमेश भाटकर का सोमवार को निधन हो गया । वह 70 साल के थे । पिछले करीब डेढ़ साल से वह कैंसर से परेशान थे। अभिनेता जयवंत वाडकर ने पीटीआई भाषा से कहा, ‘‘वह जितनी बहादुरी से लड़ सकते थे, बीमारी से वह लड़े लेकिन पिछले एक महीने से वह बहुत पीड़ा में थे और हम सभी को उनकी चिंता थी। वह पिछले 15 दिनों से आईसीयू में थे।’ भाटकर को टीवी सीरीज ‘कमांडर’ और ‘हेलो इंसपेक्टर’ में उनके किरदारों के लिए जाना जाता है। उन्होंने ‘आई पाहिजे’ , ‘ कुछ तो है’ और ‘भावेश जोशी सुपरहीरो’ जैसी हिंदी और मराठी फिल्मों में अभिनेता के तौर पर 30 साल से अधिक समय तक काम किया।

स्त्रियों की अन्तर्कथा : ‘अंतराल’

राहुल गौड़

पूजा की छुट्टी से ठीक एक दिन पहले लेखिका द्वारा भेंट स्वरूप प्राप्त इस पुस्तक के शीर्षक ने मुझे सबसे पहले आकृष्ट किया है। कहानी संग्रह का नाम है ‘अन्तराल’। यह डॉ. शुभ्रा उपाध्याय का पहली कहानी संग्रह है। इसके अलावा विविध पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कहानियां प्रकाशित होती रही हैं। कुल चौदह कहानियों के इस संग्रह से गुजरते हुए मैंने पुस्तक के साथ शीर्षक का तालमेल बैठाने की कोशिश की। वस्तुतः यह शीर्षक स्त्री जीवन के उन क्षणों का परिणाम है जब वह अपने अस्तित्व को लेकर चिंतनशील होती हैं। हमारे भारतीय समाज में स्त्री चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ से परे पारिवारिक सदस्यों की सहायता या सहयोग में ही अपनी सार्थकता स्वीकारती है। घर और बाहर की परिस्थितियों में वह अपने विवेक से सदा संतुलन बनाए रखती है। इसके लिए उन्हें पितृसत्तात्मक समाज में निरंतर प्रताड़ित और शोषण का शिकार होना पड़ता है । एक स्त्री को ही प्रायः अपने अहं से समझौता करना पड़ता है । आवरण पृष्ठ पर मुद्रित प्रस्तावना में कलकत्ता विश्वविद्यालय की पूर्व प्रो. चन्द्रकला पाण्डेय ने लिखा है-“संग्रह की कहानियां अधिकांश स्त्रियों के मानस में घटित होने वाली व्याकुलताओं को व्यंजित करती हैं। स्त्री पात्र अपने स्त्री होने की परिणति को झेल रहे हैं। ये वे स्त्रियां हैं जो लगातार लड़ रही है, जूझ रही है अपनी निष्ठा को सच्चा व पवित्र सिद्ध करने के लिये हर पल हर घड़ी तत्पर खड़ी हैं।” अतः शुभ्रा उपाध्याय की ये कहानियां स्त्री चेतना के उस उधेड़बुन को अभिव्यक्त करने में समर्थ हैं जो एक स्त्री के विविध क्रियाकलापों के अंतराल में चल रही है।
इस कहानी संग्रह की कुल चौदह कहानियां (क्रमश: अहर्निश, घूँघट, प्यासी धरती, तपिश, काश….,पहली कविता, अटूट बंधन, पंछियों का एक जोड़ा, अंगू की माँ, आइना, सोलह साल की बेटी, कहानी का प्लाट, कासे कहूँ….? और बारिश) समाज की विडम्बनापूर्ण अवस्था में स्त्रियों के अस्मिता की खोज है। इस संग्रह की पहली कहानी ‘अहर्निश’ में लेखिका ने प्रियंका और उसके माँ के माध्यम से माँ और पुत्री के बीच आदरपूर्ण संबंध को दर्शाया है। जहाँ एक तरफ माँ अपनी समस्त समस्याओं और आतंरिक व्यकुलताओं को अपने हृदय में सहेजे है वहीं दूसरी तरफ प्रियंका अपने प्रेम के मिठास और आदरपूर्ण क्रियाकलापों से अपने माँ की मुस्कान बनाये रखना चाहती है। वह अपनी माँ को उसके पुत्र के बिछोह से उपजे अवसाद से बचाने के लिए अहर्निश (हर पल) तत्पर है। वह अपने समय का उपयोग पिता और भाई के गैरमौजूदगी को पाटने के लिए अत्यंत ही कलात्मक ढंग से करती हैं। यह कहानी निर्मल अनुभूतियों के कोमलता को लिए हुए है ।
‘घूँघट’ शीर्षक कहानी ग्रामीण युवती के निर्भरता और समाज के खोखले सिद्धान्तों को उद्घाटित करने वाली कहानी है। यह कहानी एक ओर तो समाज के निर्ममता को दर्शाती है तो दूसरी ओर रक्त-सम्बन्ध से जुड़े पुत्र के स्वार्थ को भी दर्शाता है । हम एक ऐसे संकटमय दौर में है जहाँ प्रेम और समर्पण जैसे शब्दो का गलाघोंट दिया गया है और हम संवादहीनता के दौर से गुजर रहे हैं । हमारे समाज में लोग एक-दूसरे के हर्ष-विषाद बाँटने के स्थान पर परस्पर मॉब लिंचिंग द्वारा परिचालित हो रहे हैं। एक ऐसी विघटनकारी स्थिति जन्म ले चुकी हैं जो केवल मौन या नीरवता को ही प्रधानता देती है । कपट के शोर में मानवीय संवेदनाएं दम तोड़ रही हैं । कहानी की प्रमुख पात्र एक ऐसी अबला युवती है जिसका जन्म ही मानों वेदनाओं को सहने के लिए हुआ है। वह अपनी इस वेदनानुभूति को अभिव्यक्त करना चाहती है पर उसे सुनने वाला कोई नहीं । लेखिका ने इस कहानी में लिखा है-“वह (औरत) तो जैसे बनी ही इसी हेतु होती है। वेदनाओं के सुहाग का लाल टीका उसकी निरंतर जर्जर होती खोखली मन:स्थिति का हँस-हँस कर मजाक उडाता है, किन्तु वह धीर गम्भीर शास्त्रों के नारीत्व का ख्याल किए चुपचाप नीलकंठ बनी हमेशा गरल पान किया करती है। उसे तो अपने अमृत पुत्रों के समक्ष इतना भी अधिकार नहीं है कि अपने विषैले कंठ की करुण पुकार तक सुना सके।” ऐसे स्त्री की कोई व्यक्ति यदि सहायता भी करना चाहता है तो समाज के खोखले सिद्धान्तों का हवाला देकर उसे पुनः प्रताड़ित किया जाता है। उसके प्रति संवेदना व्यक्त करने वाले व्यक्ति पर भी तरह -तरह के लांछन लगाए जाते हैं। जिसके अस्तित्व से इस संसार की संरचना हुई है उसी के प्रति समाज का नजरिया बिल्कुल ही निर्मम और कठोर है। कहानी के अंत में लेखिका एक ऐसे परिवेश की परिकल्पना करती है जो स्त्री हृदय के समान ही कोमल और संवेदनशील है।
तीसरी कहानी ‘प्यासी धरती’ में गाँव की खेतीबारी का पारंपरिक स्वरुप वर्णित है। गाँव अमूमन पिछड़े प्रदेश को कहा जाता है परन्तु पुरखों द्वारा दी गई सांस्कृतिक एवं पारम्परिक सीख से समृद्ध गाँव सम्पूर्ण विश्व के लिए खाद्य उपजाता है। जहाँ लड़कियों को सपने देखने की तो आजादी है पर उसे पूरा करने की नहीं। अपने कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान औरत रात के अँधेरे में घुटनो के बल हल खिंचने के लिए भी तैयार है। कहानी में ग्रामीण औरतो के लोकगीत का प्रयोग कर लेखिका ने कहानी को जीवंत बना दिया है –
“बंसवा की कोठिया लुकाने मिया बरखु!
झुलनी पसवने न बूडे मिया बरखू!”
चौथी कहानी ‘तपिश’ में दाम्पत्य जीवन में संदेह और विश्वास के तानेबाने को बहुत ही कलात्मक ढंग से लेखिका ने प्रस्तुत किया है। प्रिया अपने पति परेश को संदेह की निगाहों से देखती है परन्तु उसका विश्वास संदेह पर बार-बार भारी पड़ता है। वह तो अपने पति की सहचारिणी बन कर रहना चाहती है। उसके साथ मिल कर सृजन के गीत गाना चाहती है – “सोचती हूँ कुछ विलक्षण रचूँ! कुछ ऐसा, जिसकी अमरता को निहारूँ मुग्ध होकर !….. मंथन गति में जीवन का लय सहशक्ति में सृजन का गीत!” नायिका जिस ‘सहशक्ति में सृजन का गीत’ की बात कर रही है वह एकाकी सम्भव नहीं है। वह स्वयं को आसमान में उड़ते परिंदे के समान समझती है। यदि परेश उसका साथ दे दे तो उसके थके हुए पंखों में पुनः ऊर्जा का संचार हो जाएगा।
पांचवीं कहानी ‘काश…’ है। जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है कि कहानी किसी व्यक्ति के उस लालसा की है जिसे वह पूर्ण नहीं कर पाया। किसी भी वस्तु का महत्व उसके न होने पर ही समझ आता है। इस कहानी में नायिका बूढ़ी मीना के प्रति सहानुभूति महसूस करती है। मीना अपने सैनिक बेटे और बहु द्वारा प्रताड़ित होती है और नायिका (बच्ची) को ही सबकुछ मानती है। उसकी यह उत्कट आकांक्षा थी कि उसके हाथ की बनी चाय बच्ची उसके घर में पिये। परन्तु नायिका के ऊँचे कुल का संस्कार उसे ऐसा करने से मना करता है क्योंकि मीना जाति से हरिजन है। गाँव से दूर प्रदेश में नायिका को जब भी यह संस्मरण याद आता है तो उसे बहुत पछतावा होता है। मीना अब इस दुनिया में नहीं थी और उसकी एक मात्र आकांक्षा भी अपूर्ण रह गई। लेखिका ने दोनों पात्रों का चरित्रांकन बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से किया है।
छठीं कहानी ‘पहली कविता’ एक अनचाहा, अनसमझे प्रेम की कहानी है। एक बिल्कुल ही सामान्य से मुलाकात में भी जीवन भर का साथी मिल सकता है। इस कहानी में नायिका के ऊपर नियति के वार और ऐसे संकट के समय में डॉ. प्रशांत के द्वारा किये गए सहायता को अत्यंत ही मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है । यह वस्तुतः सहायता नहीं बल्कि साथ है जो दोनों एक-दूसरे के लिए निभा रहे थे । कथानक के साथ कहानी का शिल्प भी बेजोड़ है । चाय पीते-पीते नायिका फ्लेश-बैक में चली जाती है । जीवन की खट्टी-मीठी और साथ ही हृदयविदारक दृश्यों को प्रतिबिंबित कर वह पुनः वापस लौट आती है । नायिक और डॉ. प्रशांत के साथ होने की वजह को रेखांकित करने वाली यह कहानी अपने शैलीगत सौंदर्य के कारण और भी प्रभावकारी बन पड़ा है ।
सातवीं कहानी ‘अटूट बन्धन’ बदलते परिवेश में नैतिक सीख देने वाली विलक्षण कहानी है। आठवें कहानी ‘पक्षियों का जोड़ा’ में लेखिका ने साम्प्रदायिक उन्माद को अभिव्यक्त किया है । प्रमुख पात्र मानस देश का सिपाही है, जिसके कंधे पर सम्पूर्ण राष्ट्र की सुरक्षा है । वह अपने परिवार को दंगों के आग में झुलसने से नहीं बचा सका । उसकी माँ की ख्वाहिश थी – “मैं भी शहीद भगत सिंह की माँ कहलाऊँ! मैं भी चंद्रशेखर आजाद की जननी बनूँ!” भगत सिंह और चंद्रशेखर की माँ में एक समानता थी कि उन दोनों ने अपने बेटों को देश पर न्योछावर होते देखा था । परंतु मानस की माँ यह दिन देखने से पहले ही धार्मिक विद्वेष की बलि चढ़ गई । उसकी माँ के साथ उसके बीवी और एकलौता बेटा अमित भी खूनी वहशियों का शिकार हो गया । आश्चर्य की बात है कि एक परिवार के लगभग सभी लोग धार्मिक कट्टरता से लहुलूहान हो ईश्वर को प्राप्त हो गए हैं, उनका शव चहारदीवारी में कैद है परंतु उन्हें देखने के लिए कोई पड़ोसी नहीं आता । आज हमारे समाज में लोग बिल्कुल ही स्वार्थकेंद्रित और कठोर हो गए हैं । मानस अपने सम्पूर्ण परिवार को घर के आंगन में ही अग्नि को समर्पित करता है । बाद में तिलमिला कर अपने बंदूक से हवा में दो गोलियां दागता है। इससे और कुछ नहीं पर पक्षियों का एक जोड़ा शिकार हो जाता है । गाँधी जी ने कहा था “आँख के बदले आँख, पूरे देश को अँधा कर देगा।” प्रतिशोध और हिंसा-प्रतिहिंसा की ज्वाला में मासूम पक्षियो के जोड़े, इसी प्रकार तबाह होते रहेंगे । अतः यह कहानी हमे यह संदेश देती है कि हिंसा व्यर्थ है। इससे और कुछ नही बल्कि मासूम लोगों की जाने जाती हैं।
नौवीं कहानी ‘अंगू की माँ’ में एक गृहणी के गृहस्थ जीवन के मनोरंजक पहलुओं को उद्घाटित किया गया है। पूरे घर को अपनी चंचलता से गुंजायमान करने वाली अंगू की माँ सांप्रदायिक सद्भाव से संपृक्त है। लेखिका ने लिखा है- “अपनी जाति का लेबल लगाये गर्वीली अंगू की माँ अछूतों के यहाँ भी सस्नेह निमंत्रित की जाती है।….यदि सवर्णो में शादी-ब्याह की ढोल अंगू की माँ की चौडी़ हथेली का आघात सह कर चिल्लाती है तो हरिजनों का ढोल भी उन्हीं थापो से दहाड़ता है।” अतः जीवन के विविध उतार-चढ़ाव के विरुद्ध वह अपने हँसमुख अंदाज और चंचलता के बल पर टकराती है ।
दसवीं कहानी ‘आइना’ की प्रधान पात्र ‘रीटा’ है। वह एक पढ़ी-लिखी,दफ्तर में काम करने वाली युवती है । वह आइना देखने से बचती है, मानो किसी प्रकार का फोबिया हो उसे आइने से । कहानी के उत्तरार्द्ध हिस्से को पढ़ने पर यह पता चलता है कि वह दरअसल किसी फोबिया की शिकार नहीं बल्कि एक जीवनदर्शन की अनुगामिनी है । उसे हर पल यह महसूस होता है कि आइने में दिखने वाली स्त्री वह नहीं जिसे वो पहले से जानती हो । अतः यह कहानी आत्मान्वेषण की एक दृष्टि है ,जो एक स्त्री के स्वरुप को उसके रंग-रूप से नही बल्कि उसके चरित्र से परखने की मांग करता है।
ग्यारवीं कहनी ‘सोलह साल की बेटी’ एक किशोरी के स्नेहपूर्ण अन्तस की महागाथा है। सुमित्रा की सोलह साल की बेटी काव्या अपने अपूर्ण प्रेम से शोकाहत अपने मन में तूफान तथा आँखों में समुन्द्र छिपाए रहती है। उसकी यह अवस्था सुमित्रा को अपने किशोरावस्था की याद दिलाती है कि किस प्रकार उसने सोमेश के पत्रों को अग्नि के हवाले किया था। वह स्मृति जब भी सुमित्रा के मन में आती है ,वह सिहर उठती है। यही वजह है कि जब उसकी पुत्री भी उसी दौर से गुजरती है तो उसे काव्या पर गुस्सा नहीं बल्कि तरस आता है। अतः कहानी में स्त्री जीवन के विवशता को दर्शाया गया है।

अंतिम तीन कहानियों (कहानी का प्लाट, कासे कहूँ और बारिश) में भी स्त्री के इन्ही विविध एहसासों की अभिव्यक्ति हुई है । डॉ. शुभ्रा उपाध्याय के समस्त कहानियों के स्त्री पात्र पुरुष के वर्चश्ववादी समाज से लड़ कर अपनी अस्मिता को सिद्ध करना नहीं चाहती बल्कि वे अपनी उपादेयता और निष्ठा के बल पर मानवीय संबंधों को नई दिशा देना चाहती हैं । उनकी कहानी की नायिकाएं उस सम्मान की अभिलाषी हैं जिससे उन्हें वंचित रखा गया है। वे प्रत्येक क्रियाकलाप पर प्रश्न चिह्न लगाना नहीं चाहती, उनकी आकांक्षा बस इतनी है कि उन्हें भी खुले आकाश में विचरण करने दिया जाय, उन्हें भी सपने देखने और उसे पूरा करने की आजादी दी जाय। डॉ. शुभ्रा उपाध्याय ने कहानियों के कथानक समकालीन समाज से ही लिया है। मनोविश्लेषणवादी दृष्टि से भी कृति का अनेक महत्व है। पाठक चाहे तो किरदार के मन-मस्तिष्क में चल रहे मानसिक अवगुंठनों को सरलता से समझ सकते हैं। लेखिका की भाषा बिल्कुल ही सहज, सरल एवं प्रवाहमयी है जिसमें संस्कृत से लेकर देशज शब्दों का प्रयोग किया गया है । उन्होंने अपने पात्रों के भाषा का निर्धारण भी मनोवैज्ञानिक धरातल पर किया है । समग्रतः भारतीय समाज में स्त्री चेतना तथा मानवीय संबंधों में रुचि रखने वाले पाठक को यह पुस्तक ‘अंतराल’ अवश्य पढ़नी चाहिए ।

स्त्रियों की अंतर्कथा : ‘अंतराल’

पुस्तक : अंतराल
लेखक : शुभ्रा उपाध्याय
प्रकाशक : मानव प्रकाशन
संस्करण : प्रथम संस्करण, 2010
पृष्ठ संख्या : 120
मूल्य : 200/-

(लेखक विद्यासागर विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं)

बासन्ती हवा…बासन्ती मन….परिधान बासन्ती

पीला और सफेद…दोनों का एक खूबसूरत रिश्ता है। सफेद रंग शान्ति और मैत्री का प्रतीक है तो पीले रंग में जीवन की चमकती खुशी और उत्साह दिखता है। बसन्त पंचमी पर हम सब पीला या बासन्ती रंग पहनते हैं..माँ सरस्वती भी इन्हीं रंगों के परिधानों में दिखती हैं।
कहा भी गया है – श्वेत वसन, श्वेत पद्मासन…मगर पीले रंग का भारतीय संस्कृति से बहुत गहरा रिश्ता है। हमारे यहाँ पीताम्बर भी हैं और श्वेत वसना वाग्देवी भी हैं।

सफेद की धवलता अगर पवित्रता है तो पीला है शुभता का प्रतीक। शादी के आमन्त्रण पत्र के कोने पर आज भी पीली हल्दी लगती है और हल्दी लगाकर ही बनते हैं वर – वधू।
खेतों में लहलहाती सरसों एक अलग ही रंग लेकर आती है और बगिया में गेंदे और सूरजमुखी के फूलों की छटा ही निराली है। यहाँ तक कि इन फूलों को आप अपने बालों में भी सजा सकती हैं और घर के ड्रॉइंग रुम में भी। फलों का राजा आम भी पीला है। ये सारे प्रिंट अब आपको कपड़ों में भी दिखते हैं।


अगर बात फैशन की करें तो पीले रंग को आप किसी भी रंग के साथ पहन सकती हैं। जीन्स से लेकर पटियाला तक…साड़ी से लेकर कुरता तक।  फेंगशुई विशेषज्ञों का कहना है कि पीले रंग के परिधान हमारे दिमाग के उस हिस्से को अधिक अलर्ट करते हैं, जो हमें सोचने-समझने में मदद करता है। यही नहीं, पीला रंग खुशी का एहसास कराने में भी मददगार होता है।


पीला रंग हमारे दिमाग को अधिक सक्रिय करता है जो महिलाएं महीने में कई बार पीले परिधान धारण करती थीं, उनका आत्मविश्वास ऐसा न करने वाली महिलाओं की तुलना में अधिक सक्रिय होता है।
पीले रंग को किसी भी टॉप, कुरते के साथ पहनें या एक्सेसरीज लें…आप अलग भी दिखेंगी और खूबसूरत भी…आजमाकर देखिए।

सरस्वती…नदी जिसे वापस लाने की जरूरत है

भारत नदियों का देश है। भारत में नदियों को माता कहकर बुलाया जाता है। न जाने कितनी सभ्यताएं नदियों के तट पर बसीं और समृद्ध हुईं, आज भी हो रही हैं मगर विकास के नाम पर लालच वाली जो भूख है, वह नदियों को ही खत्म कर रही है। गंगा, यमुना..को सब जानते हैं। नमामि गंगे परियोजना ही चल रही है मगर एक और नदी है जिसका पौराणिक, धार्मिक और सामाजिक महत्व है, जो लुप्त है मगर फिर भी विद्यमान है। सरस्वती नदी को लेकर यह आलेख हमें इन्टरनेट पर खोजते हुए मिला और हमें लगा कि इसे पढ़ा और पढ़ाया जाना चाहिए तो आप भी पढ़ें ।ऐसे आलेखों की जरूरत है, इसे हमने रोअर मीडिया से लिया है –

सरस्वती: आखिर कहाँ विलुप्त हो गई वैदिक काल की देवतुल्य नदी!

आज पवित्रता की प्रतीक नदियों का अस्तित्व खतरे में है। गंगा-यमुना समेत तमाम नदियों को बचाने की मुहिम जारी है, लेकिन इन सब के बीच खास है सरस्वती नदी. वह नदी जो पुराणों के अनुसार आज भी बह रही है, पर किसी को दिखाई नहीं दे रही और विज्ञान के अनुसार वो सैकड़ों साल पहले धरती पर थी, पर आज विलुप्त हो चुकी है। अन्य नदियों से अलग सरस्वती नदी हमेशा से ही जिज्ञासा का विषय रही है। प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन होना माना जाता है, जबकि सरस्वती नदी कभी किसी को दिखाई नहीं देती।


हिमाचल के सिरमौर से उ्दगम!
वैज्ञानिक आधार को सच मानें तो सरस्वती धरती पर बहती थी और प्राकृतिक परिवर्तनों के चलते वह लुप्त हो गयी। जब पुरातात्विक स्थलों की खुदाई की गई तो पता चला कि सरस्वती नदी हरियाणा में यमुनानगर जिले की काठगढ़ ग्राम पंचायत में आदिबद्रि स्थान पर पहाड़ों से मैदानों में प्रवेश करती थी, जबकि ऋग्वेद, स्कंद पुराण, गरुड़ पुराण, वामन पुराण, पद्म पुराण जैसे शास्त्रों को मानें तो सरस्वती नदी का उद्गम हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की नाहन तहसील का गाँव जोगी वन है। यह जगह ऋषि मार्कंडेय धाम मानी जाती है।
एक कथा के अनुसार जोगी वन में मार्कंडेय मुनि ने तपस्या की. जिससे प्रसन्न होकर सरस्वती नदी गूलर में प्रकट हुईं। मार्कंडेय मुनि ने सरस्वती का पूजन किया. इसके बाद माँ सरस्वती ने वन के तालाब को अपने जल से भरा और फिर पश्चिम दिशा की ओर चली गयीं। इसके बाद राजा कुरू ने उस क्षेत्र को हल से जोता और यहां 5 योजन का विस्तार हुआ। तब से यह स्थान दया, सत्य, क्षमा, आदि गुणों का स्थल माना जाता है. बाद में यहीं मार्कंडेय को अमरत्व प्राप्त हुआ था। कहा जाता है कि बाद में महर्षि उन्ही गूलर के पेड़ों के बीच समा गए थे, जहां से सरस्वती नदी की धार फूट पड़ी थी।

सरस्वती का पौराणिक इतिहास
सरस्वती का पहला जिक्र ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद के नदी सूक्त के एक मंत्र (10.75) में सरस्वती नदी को ‘यमुना के पूर्व’ और ‘सतलुज के पश्चिम’ में बहती हुई बताया गया है –
‘इमं में गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परूष्ण्या असिक्न्या मरूद्वधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमया’
इसके अलावा ऋग्वेद के अन्य छंदों 6.61, 8.81, 7.96 और 10.17 में भी सरस्वती नदी की महानता का जिक्र किया गया है। इन छंदों में सरस्वती नदी को ‘दूध और घी’ से भरा हुआ बताया गया है। महाभारत में सरस्वती नदी के प्लक्षवती नदी, वेदस्मृति, वेदवती जैसे कई नाम मिलते हैं। बताया जाता है कि बलराम ने द्वारका से मथुरा तक की यात्रा सरस्वती नदी से की थी और लड़ाई के बाद यादवों के पार्थिव अवशेषों को इसमें बहाया गया था।
वाल्मीकि रामायण में भरत के कैकय देश से अयोध्या आने के प्रसंग में सरस्वती और गंगा को पार करने का वर्णन है। जिसमें लिखा गया है,
‘सरस्वतीं च गंगा च युग्मेन प्रतिपद्य च, उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारूण्डं प्राविशद्वनम्’
वैदिक काल में सरस्वती की बड़ी महिमा थी और इसे ‘परम पवित्र’ नदी माना जाता था। वहीं कहा जाता है कि सरस्वती नदी का जल पीने के बाद ही ​ऋषियों ने पुराण, शास्त्र और ग्रंथों की रचना की थी। गुजरात का सिद्धपुर सरस्वती नदी के तट पर बसा हुआ माना जाता है। इसके पास में बिंदुसर नाम का तालाब है, जिसे महाभारतकाल में ‘विनशन’ कहा जाता था। माना जाता है कि महाभारत काल में ही सरस्वती लुप्त हो गयी थी।


नासा ने भी माना नदी का अस्तित्व!
भारतीय पुरातत्व परिषद् ने अपने शोधों में कहा है कि सरस्वती का उद्गम उत्तरांचल में रूपण नाम के हिमनद (ग्लेशियर) से होता था. यह नैतवार में आकर हिमनद जल में बदल जाती थी और फिर इसकी जलधारा आदिबद्री तक पहुँचती थी जहाँ इसे सरस्वती नदी कहा जाता था। इसके बाद नदी आगे बढ़ती थी. इस शोध के बाद रूपण ग्लेशियर को सरस्वती ग्लेशियर कहा जाने लगा है। सरस्वती नदी हरियाणा और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों से होती हुई बहती थी। इसकी कई सहायक नदियां भी थीं. भूगर्भीय खोजों से स्पष्ट हुआ है कि सदियों पहले प्राकृतिक परिर्वतनों के कारण सरस्वती नदी ने अपना मार्ग बदला था।
भीषण भूकंप के कारण कई विशाल पहाड़ धरती के ऊपर आ गए और सरस्वती की मुख्य सहायक नदी दृषद्वती यानी यमुना नदी ने उत्तर और पूर्व की ओर बहना शुरू कर दिया। भूकंप के झटकों के कारण सरस्वती नदी का पानी भी यमुना नदी में गिर गया और तब से यमुना ही सरस्वती के जल को खुद में समाए हुए है। जबकि वास्तविक सरस्वती नदी उस वक्त सूख गयी।
सरस्वती नदी के अस्तित्व को नासा भी स्वीकार कर चुका है। भारत और नासा के संयुक्त अभियान के तहत उपग्रह कार्यक्रम शुरू किया गया था जिसके माध्यम से वैज्ञानिकों ने एक ऐसी विशाल नदी के प्रवाह-मार्ग का पता लगाया, जो किसी समय पर भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र में बहती थी। उपग्रह से मिली तस्वीरों के अनुसार यह नदी आठ किमी. चौड़ी थी और करीब 4 हजार वर्ष पहले प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण सूख गई।


शोध में आ रहे अलग नतीजे
सरस्वती नदी के अस्तित्व पर शास्त्र और विज्ञान दोनों मुहर लगा चुके हैं। नासा ने माना है कि लगभग 5,500 साल सरस्वती नदी भारत के हिमालय से निकलकर हरियाणा, राजस्थान व गुजरात में लगभग 1,600 किलोमीटर तक बहती थी और अंत में अरब सागर में विलीन हो जाती थी।
इसरो के वैज्ञानिक एके गुप्ता ने अपनी टीम के साथ थार के रेगिस्तान में शोध किया और पाया कि यहां पानी का कोई स्त्रोत नहीं है, फिर भी धरती के नीचे कुछ जगहों पर ताजे पानी के भंडार मिलते हैं। ऐसा ही जैसलमेर में भी है। यहां 50-60 मीटर पर भूजल मौजूद है। यहाँ खोदे गए कुए सालों से नहीं सूखे हैं।
यहाँ के पानी की जाँच की गयी और पानी में ट्राइटियम की मात्रा नगण्य है। आइसोटोप टेस्ट में भी स्पष्ट हुआ है कि यहाँ रेत के टीलों के नीचे पानी की मात्रा है और रेडियो कार्बन डाटा इस बात का संकेत है कि यह पानी हजारों सालों से यहाँ जमा है।
वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय भू-भौतिकीय अनुसंधान संस्थान की एक टीम ने संगम में नया शोध शुरू किया। इस टीम का नेतृत्व वैज्ञानिक डॉ. सुभाष चंद्रा कर रहे हैं. इस शोध मैपिंग में हेलीबॉर्न इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम की मदद ली जा रही है, जो 30 मीटर की ऊँचाई से जमीन के नीचे 500 मीटर तक सूक्ष्म डेटा इकट्ठा कर सकता है। इससे प्राप्त डेटा के आधार पर यह पता लगाया जाएगा कि आखिर यमुना और गंगा के अलावा सरस्वती नदी कहां से और किस दिशा से बहती रही है।
सरस्वती नदी के अस्ति​त्व का प्रमाण मिलने के बाद अब वैज्ञानिक इस खोज में लग गए हैं कि आखिर सरस्वती नदी को फिर से कैसे जीवित किया जा सकता है। धर्म-शास्त्रों के अनुसार सरस्वती नदी आज भी है, लेकिन अदृश्य है जबकि वैज्ञानिक इस तर्क से सहमत नहीं हैं.
हरियाणा और राजस्थान में मिले सरस्वती नदी के रास्तों की खोज जारी है।

मूल लेख का लिंक – (साभार रोअर मीडिया)