सनबर्न से बचाएँगे ये कुदरती तरीके
देश में होगी अब कृत्रिम बारिश, भाप को बदला जाएगा पानी में, कहते हैं ‘क्लाउड सीडिंग’
सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र के किसानों को राहत देने के लिए राज्य सरकार ने कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग) कराने का फैसला किया है। राज्य सरकार ने इसके लिए 30 करोड़ रुपये का फंड आवंटित किया है। यह दूसरा मौका है जब राज्य में कृत्रिम बारिश करवाने की तैयारी की जा रही है। इससे पहले साल 2015 में राज्य सरकार ने नासिक में यह प्रयास किया था। लेकिन, तकनीकी खामियों के चलते यह काम नहीं कर सकी थी। जानिए कृत्रिम बारिश के बारे में –
बिना बादल के क्लाउड सीडिंग होना मुश्किल
मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली निजी एजेंसी स्काईमेट के वॉइस प्रेसीडेंट और चीफ मेट्रोलॉजिस्ट महेश पलावत ने बताया कि क्लाउड सीडिंग के लिए बादल होना जरूरी होते हैं। बिना बादल के क्लाउड सीडिंग नहीं की जा सकती। बादल बनने पर सिल्वर आयोडाइड और दूसरी चीजों का छिड़काव किया जाता है। जिससे भाप पानी की बूंदों में बदलती है। इसमें भारीपन आता है और गुरुत्वाकर्षण के कारण यह पानी की बूंदों के रूप में पृथ्वी पर गिरती हैं। पलावत के अनुसार, भारत में क्लाउड सीडिंग का सफलता का प्रतिशत ज्यादा नहीं है लेकिन बादल साथ दें तो इसे करना सम्भव है। महाराष्ट्र के विदर्भ में जून के पहले सप्ताह में बादल बनने की संभावना है, ऐसे में यदि क्लाउड सीडिंग करवाई जाती है तो इसका फायदा मिल सकता है।
क्या होती है कृत्रिम वर्षा
कृत्रिम वर्षा (क्लाउड सीडिंग) एक ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए बादलों की भौतिक अवस्था में कृत्रिक तरीके से बदलाव लाया जाता है। ऐसी स्थिति पैदा की जाती है, जिससे वातावरण बारिश के अनुकूल बने। इसके जरिए भाप को वर्षा में बदला जाता है। इस प्रक्रिया में सिल्वर आयोडाइड और सूखे बर्फ को बादलों पर फेंका जाता है। यह काम एयरक्राफ्ट या आर्टिलरी गन के जरिए होता है। कुछ शोधों के बाद हाइग्रस्कापिक मटेरियल जैसे नमक का भी इसमे इस्तेमाल होने लगा है। जल प्रबंधक अब इसे ठंड में स्नोफॉल बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल करने पर देखने लगे हैं।
किसने यह शुरू की?
इस पद्धति को सबसे पहले जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के विंसेंट शेफर और नोबल पुरस्कार विजेता इरविंग लेंगमुइर ने सुनिश्चित किया था। शेफर ने जुलाई 1946 में क्लाउड सिडिंग का सिद्धांत खोजा। 13 नवंबर 1946 को क्लाउड सीडिंग के जरिए पहली बार न्यूयॉर्क फ्लाइट के जरिए प्राकृतिक बादलों को बदलने का प्रयास हुआ।जनरल इलेक्ट्रिक लैब द्वारा फरवरी 1947 में बाथुर्स्ट, ऑस्ट्रेलिया में क्लाउड सीडिंग का पहला प्रदर्शन किया गया था।
कहाँ-कहाँ इस्तेमाल हो रहा?
विश्व मौसम संगठन के अनुसार, अभी तक 56 देश कृत्रिम बारिश का इस्तेमाल कर चुके हैं। इसमें संयुक्ति अरब अमीरात से लेकर चीन तक शामिल हैं। यूएई ने जहां पानी की कमी दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया तो वहीं चाइना ने 2008 में समर ओलम्पिक की ओपनिंग सेरेमनी के पहले प्रदूषण को खत्म करने के लिए इसका इस्तेमाल किया था। यूएस में स्की रिसोर्ट के जरिए क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल स्नोफॉल के लिए भी किया जाता है। वहीं चाइना अब सूखे से बचने के लिए इस सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है।
यह तरीका कितना काम करता है?
ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, स्पेन और यूएस सभी इस पद्धति का परीक्षण कर चुके हैं। अबूधाबी के रेगिस्तान में भी इसका इस्तेमाल हो चुका है। हालांकि बारिश होने के लिए यह जरूरी है कि वायुमंडल में थोड़ी नमी हो। इस प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। पहले चरण में हलचल पैदा की जाती है। दूसरा चरण बिल्डिंग अप कहलाता है और तीसरे में केमिकल छोड़े जाते हैं।
गर्मियों का इको फ्रेंडली फ्रिज है मटका, घड़ा, सुराही


मार्केट में मटके के अलावा मिट्टी की सुराही, टंकी, जग, बोतल आदि भी मौजूद हैं। टंकी में टोंटी लगी होने के कारण पानी निकालने के लिए उसे बार-बार नहीं खोलना पड़ता। सुराही में मटके की अपेक्षा ज्यादा पानी ठंडा होता है। वहीं बोतल को आप अपने साथ ऑफिस भी ले जा सकते हैं।रख-रखाव हो सही
– मटके में रखा पानी देर तक ठंडा रहे इसके लिए उसे ऐसी जगह पर रखा जाए जहां वह हिल-डुल न सके। किसी स्टैंड का प्रयोग करें। साथ ही इसे ढकने के लिए मिट्टी का ही ढक्कन यूज करें।
– मटके को हमेशा ऐसी जगह रखा जाना चाहिए जहां छांव हो और हवा भी आती रहे।
– अगर मटका खुले में रखा है तो उसके मुंह के ऊपर कॉटन का कपड़ा गीला करके रख दें। इससे पानी ठंडा बना रहता है और अंदर कोई कीड़ा या चींटी भी नहीं जाएगी।
– वैसे तो मटके का पानी रोजाना बदलना चाहिए। लेकिन अगर संभव न हो तो इसमें भरे पानी का एक हफ्ते से ज्यादा दिन तक प्रयोग नहीं करें। एक हफ्ते बाद पानी को हर हाल में बदल लेना चाहिए।

ऐसे करें मटके की सफाई
काई लगने पर
कई बार मटके में अंदर काई भी लग जाती है। इसे स्क्रब ब्रश से साफ करें। काई साफ करने के लिए ठंडा या हल्का गर्म, कैसा भी पानी इस्तेमाल कर सकते हैं।
साधारण सफाई
मटके को साफ करते समय हल्के गर्म पानी का इस्तेमाल करें। साफ हाथों को मटके के अंदर डालकर उसकी अंदरूनी दीवारों को हल्के गर्म पानी से साफ कर दें। बाद में साफ हल्के गर्म पानी से खंगाल लें। मटके को धूप में सूखने के लिए छोड़ दें। सूखने पर फिर से पानी भर लें।खरीदते वक्त इन बातों का रखें ध्यान
– मटका खरीदते समय उसे किसी कॉइन से हल्का-सा बजाकर देखें। अगर उसमें से टन की तेज आवाज आ रही है तो मटका टूटा-फूटा नहीं है।
– किसी भी प्रकार के मटके पर अगर कोई चमक दिखाई दे तो उसे न खरीदें। पारंपरिक (लकड़ी या उपलों) रूप से पके मटकों पर कोई चमक नहीं होती। ऐसी चमक के लिए रंग या वार्निश का प्रयोग किया जाता है, जो सेहत के लिए नुकसानदायक है। इन मटकों के पानी से अजीब सी दुर्गंध भी आती है।
गर्मियों के दिन हैं, आम के स्वाद में घोलें मिठास
आम पेड़ा

सामग्री : खोया- 200 ग्राम, पिसी शक्कर- 50 ग्राम, आम का रस- 200 मिली, इलायची पाउडर- छोटा चम्मच, अखरोट, बादाम व पिस्ता- कुटा हुआ।
विधि : कड़ाही में खोया भूनते हुए थोड़ा-थोड़ा आम का रस डालकर मिलाएं। जब मिश्रण अच्छी तरह भुन जाए तब पिसी शक्कर, इलायची पाउडर, कुटा हुआ अखरोट, बादाम व पिस्ता चूरा मिलाएं। थोड़ी देर इसे भूनें। जब मिश्रण कड़ाही की तली छोड़ने लगे तब इसे आंच से उतार दें और ठंडा होने दें। तैयार मिश्रण के पेड़े बना लें। ऊपर से अखरोट, बादाम और पिस्ता का चूरा लगाएं।
आम खीर

सामग्री : आम का गूदा- 1 कप, फुल क्रीम दूध-1 लीटर, कंडेंस्ड मिल्क- 2 बड़े चम्मच, चावल- 4 बड़े चम्मच भिगोए हुए, पिसी शक्कर- कप, पिस्ता- 1 बड़ा चम्मच कटा हुआ, बादाम- 1 बड़ा चम्मच कटा हुआ।
विधि : दूध और चावल को भारी तले के बर्तन में उबालें। धीमी आंच पर चावल गलने और गाढ़ा होने तक पकाएं। कंडेंस्ड मिल्क और पिसी शक्कर डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। आंच से उतारकर मिश्रण को ठंडा होने दें। इसमें आम का गूदा मिलाएं। कटा पिस्ता और बादाम ऊपर से डालकर परोसें।
सौहार्द की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं, सबकी है
बंगाल की राजनीति इन दिनों राम के नाम पर चल रही है और सरकारी सहिष्णुता का एक नया चेहरा सामने आ रहा है। धर्मनिरपेक्ष और बौद्धिक बंगाल में राम के नाम पर बवाल हो रहा है और राज्य की मुखिया हिन्दीभाषियों के खिलाफ जितना गुबार था, सब अपशब्दों में बहा रही हैं। संविधान ने सबको धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार दिया है और जय श्री राम का नारा भी नया नहीं है। याद रखने वाली बात है कि 1992 में जब बाबरी मस्जिद प्रकरण हुआ तब यहाँ वाममोर्चा की सरकार थी मगर इस तरह की नौबत तब नहीं आयी थी। भाजपा के सहारे जब ममता सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ीं तब भी जय श्री राम के नारे लगते थे, तब भी उनको परहेज नहीं हुआ मगर आज है क्योंकि वर्चस्व टूटता नजर आ रहा है। इस पूरे प्रकरण में जो बात सबसे दुःखद है, वह है इस राज्य में बंगाली और गैर बंगाली का विभाजन, दीदी..आज यही कर रही हैं और इसी पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकी जा रही हैं। अगर यह विवाद और गहराता है तो बंगाल में गृह युद्ध की स्थिति आ सकती है और तब केन्द्र को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। दिक्कत यह है कि भाषा और संस्कृति को आधार बनाकर हिन्दीभाषी समाज को अलगाने की जो कोशिश की जा रही है, उसे बुद्धिजीवियों के एक वर्ग का समर्थन भी मिल रहा है। यही विडम्बना है कि इस समाज का बुद्धिजीवी वर्ग अपने हितों को पहले देखता रहा है, वह सत्ता के खिलाफ कभी खड़ा नहीं होता मगर प्रतिरोध करने वालों के सामने बाधक वही हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जो ममता अलग राज्यों के मामले में मदद करने की बात घोषणापत्र में करती हैं, उनको दार्जिलिंग के अलग होने से तकलीफ है। दरअसल, यह तकलीफ वर्चस्व की है और यह समय है कि यह तय हो कि बंगाल इस देश का हिस्सा है या वह अलग ही किसी देश के रूप में स्वीकृत होता जा रहा है? यह प्रश्न जातीयता और राष्ट्रीयता के टकराव का भी है। क्या जातीय चेतना इस कदर हावी होने की इजाजत है कि देश पीछे छूट जाये..आखिर अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक क्यों बनें..यूपी, बिहार व झारखंड के लोग…स्थिति और विकट हो सकती है मगर सम्भव है कि इसी से कोई रास्ता निकले..यही वह बंगाल है जिसने हिन्दी प्रदेश को उर्वर किया…आखिर क्या वजह है कि जातीयता के नाम पर हम संकुचित होते जाए..क्या होगा जब हिन्दी प्रदेशों में भी इस तरह की आवाजें उठने लगें…दोनों ही सूरतें गलत है…हमें अब रुककर सोचने की जरूरत है कि हम कहाँ जा रहे हैं..और कहाँ पहुँचेंगे…तुष्टीकरण की राजनीति ने ही यह हाल किया है और इसे रोका न गया तो स्थिति और विकट होगी इसलिए समस्या के तूल पकड़ने के पहले समाधान खोजना होगा क्योंकि सौहार्द की जिम्मेदारी किसी एक की नहीं, हम सबकी है।
हम सब में कुछ कर गुजरने की अपूर्व क्षमता है
शिक्षण, पत्रकारिता, रंगमंच से लेकर उद्यमी बनने का सफर तय किया है पीहू पापिया ने। इस समय प्रतिष्ठित क्ष्री चैतन्य स्कूल, डनलप शाखा की हिन्दी की शिक्षिका हैं। जनवरी 2019 में हिन्दी ज्ञान, हिन्दी कार्य और हिन्दी कारवाँ संस्था द्वारा आयोजित हिन्दी शिक्षण प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित हुईं। 2017 के दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में पहली पुस्तक का विमोचन हुआ है। रॉक क्लाइम्बिंग के रोमांचक खेल को भी आजमाया है। पापिया ने सफलतापूर्वक पश्चम बंगाल के पुरुलिया जिले में स्थित दो पहाड़ जयचंडी (2003) और माटाबुरो (2004) की चढ़ाई की है। बिंग विमेन संगठन की ओर से फलक 2019 के अंतर्गत नयी दिल्ली में स्वयं सिद्धा सम्मान (पश्चिम बंगाल) से सम्मानित हो चुकी हैं। पीहू पापिया से अपराजिता की मुलाकात, पेश हैं प्रमुख अंश –
मेरे बारे में
जन्म 2 फरवरी 1981, कोलकाता में हुआ। स्कूल केन्द्रीय विद्यालय बैरकपुर (वायुसेना) जिसे मिनी इंडिया कहती हूं। मेरा मानना है कि प्राथमिक तौर पर व्यक्तित्व निर्माण में स्कूल की महत्वपूर्ण भूमिका रहती। प्रेसीडेंसी कालेज, कोलकाता से पढ़ी फिर विश्वविद्यालय कलकत्ता विश्व विद्यालय से एम ए किया। कुछ अलग करने का जज्बा है। बेटी आर्या को एक बेहतर जिन्दगी व भविष्य देने का सपना है। दुनिया घूमने की चाहत है।
मीडिया में होता है भेदभाव
सच कहूँ तो मीडिया जगत से जुड़ने की कई वजहें थीं। एक जुनून, एक रोमांच सा खुद के अंदर महसूस करती थी, लेखन जगत को और संजीदगी से लेने से पहले बहुत सीखना चाहती थी। साथ ही मुझे ट्रेवलिंग यानी सफर का बहुत शौक है। इसलिए स्कूली दिनों में ही पत्रकारिता को अपना भावी पेशा चुन लिया था। यहाँ से मैंने बहुत कुछ जाना, सीखा और समझा। सन्मार्ग, प्रभात खबर, युवा शक्ति आदि समाचार पत्रों के साथ संलग्न रही। मैं नियमित क्षेत्र नहीं छोड़ना चाहती थी परन्तु कुछ निजी कारणों से मुझे ऐसा करना पड़ा जिसका मुझे अफसोस है। बच्चे मेरे दिल की धड़कन हैं। शायद उनका प्यार मुझे शिक्षा जगत में खींच लाया। पर जिन्दगी का सफर बड़ा ही अप्रत्याशित है। देखते है आगे के सफर में मेरे लिए क्या सरप्राइज छिपा है। आठ वर्ष पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया है। कई तरह के अनुवाद कार्य किये हैं जिसमें एक बंगला फिल्म की पटकथा का अनुवाद, लेख, विज्ञापन, समाचार, राजनीतिक प्रचार सामग्री, किताब, स्लोगन आदि शामिल है। मैं अँग्रेजी से हिन्दी व बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद करती हूँ। मेरे ब्लॉग का नाम जुनूनी फितूर है। मेरी कलम को वहाँ प्राण मिलते हैं। महिला पत्रकारों की स्थिति पर बात करूँ तो मैं जानती हूँ पेशेवर जगत में आज भी राज्य, क्षेत्र, जिला, लिंग (जेंडर) को लेकर भेदभाव होता है। हर किसी को अपनी काबिलयत दिखाने का मौका मिलना चाहिए। साथ ही मैं मानती हूँ कि महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा का अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
खुद को सीमाओं में बांधना पसंद नहीं
मैं स्वयं को खुशनसीब मानती हूँ कि ईश्वर ने मुझे हुनर दिये। इसलिए खुद को सीमाओं में बांधना पसंद नहीं। आज अगर मुझे कोई पुछता है कि क्या कर रही हो तो मैं कहती हूँ ” exploring life” यानी जीवन की खोज में निकली हूँ। इस छोटी सी जिन्दगी में नकारात्मक में वक्त बरबाद क्यों किया जाए। जी भर कर जी लेना चाहिए। कृत्रिम गहने बनाने का व्यवसाय शुरू करना मेरे उसी सफर का हिस्सा है। इसमें लेखन की तरह सृजन का सुकून मिलता है। मेरे ब्रांड का नाम “पीहू – हैंड मेड ट्रेजर” है, जो शनैः शनैः लोकप्रियता अर्जन कर रहा है। मैं ” औरा स्टूडियो” नामक फैशन फोटोग्राफी हाउस के लिए मॉडलों के लिए फैशन ज्वेलरी और एक्ससरीज़ डिजाइन करती व बनाती हूँ।
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रंगमंच से नाता स्कूली दिनों से जुड़ गया था
रंगमंच से नाता स्कूली दिनों से जुड़ गया था। अब यह मेरे वजूद का हिस्सा बन गया है। तीन साल पहले अपने नाटक दल “कालकूट” का गठन किया था और कोलकाता के हिन्दी मेला में ‘दादी माँ का भूत’ नाटक का मंचन किया था। बच्चों के साथ काम करना बहुत भाता है। जिन्दगी की आपाधापी में शायद नियमित मंचन न कर पाऊँ पर जब-जब मंच मुझे बुलाता है निकल पड़ती हूँ एक नये यादगार सफर पर। भविष्य के कई सपने मन में संजो रखें हैं, देखते हैं कब पूरा करने का मौका मिले। मेरा एक छोटा नाटक दल है “कालकूट”। मौका मिलते ही मंच के रोमांच से रूबरू हो जाते हैं। 2016 दिसम्बर में सांस्कृतिक पुर्ननिर्माण मिशन कोलकाता द्वारा आयोजित “हिन्दी मेला” में कालकूट ने “दादी माँ का भूत” नाटक प्रस्तुत किया था जो वृद्ध व बुजुर्गों की अवस्था पर केन्द्रित था। इस नाटक के लिए मुझे “सर्वश्रेष्ठ निर्देशक” का पुरुस्कार मिला था। मैंने बांग्ला फिल्म “नॉट ए डर्टी फिल्म” में प्रसिद्ध बंगला अभिनेत्री माधवी चट्टोपाध्याय की आवाज की हिन्दी में डबिंग की है।
किसी भी प्रकार के आरक्षण के खिलाफ हूँ
मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण के खिलाफ हूँ। कोई भी क्षेत्र या मामला हो, निर्णय मेधा से होना चाहिए। इससे गुणवत्ता बरकरार रहती है जो विकास की गति को भी बढ़ावा देती है। पुरुषों और स्त्रियों में शारीरक बल में भिन्नता है, बस उसमें एक पैमाना निर्धारित कर दिया जाए। यहाँ तक की शिक्षा, नौकरी आदि में भी कोई आरक्षण नहीं होना चाहिए। अगर हो भी तो जातिगत नहीं आर्थिक स्थिति पर हो ताकि अमीर-गरीब का भेद मिटे और सभी रूप से प्रगति कर सकें।
सशक्तिकरण की परिभाषा
मेरे लिए सशक्तिकरण की परिभाषा है – आर्थिक आत्मनिर्भरता। घर हो या बाहर कर्म की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। कोई भी व्यक्ति हो वह बिना कर्म किए बैठा न रहे। कोई भीख न माँगे। इससे देश की प्रगति में हमारी हिस्सेदारी और बढ़ेगी। देश फिर से सोने की चिड़िया बन जायेगा।
लेखन क्षेत्र
एक काव्य संग्रह ” जिन्दा हूँ” प्रकाशित हो चुका है। अभी एक लघुकथा संग्रह, दो काव्य संग्रह, एक उपन्यास व एक बाल काव्य संग्रह पर काम कर रही ही। सारी बाधाओं से उभर कर जल्द ही पाठकों तक पहुँचाऊंगी। अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा अयन प्रकाशन की ओर से “कविता अभिराम” में चार कविता संकलित। मैं पीहू के नाम से ही लिखती हूँ। यह एक काव्य-संग्रह है। आने वाली किताबों पर अभी काम कर रही हूँ। रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुईं।
मेरी ताकत
मेरी बेटी का प्यार, माता-पिता का बगैर किसी शर्त के सम्बल, मेरे गाड ब्रदर मानस भइया, मेंटर अनुपम भइया, मित्रों का कठिन वक्त में साथ और प्रेम मुझे जूझने की ताकत देता है।
भविष्य योजना
भविष्य में मेरे चाहने वालों के लिए बहुत सरप्राइज पड़े हैं जिनको अभी उजागर नहीं करुँगी। वैसे लेखन, ज्वेलरी डिजाइन व्यवसाय, फिल्म, संगीत, शिक्षा, अभिनय, रंगमंच आदि क्षेत्रों में बहुत काम करना है।
सन्देश
खुद को कम न आँकें। हम सब में कुछ कर गुजरने की अपूर्व क्षमता है। जिस दिन आप ऐसा कर लेंगे आपको अपने हर हौसले के आगे जीत दिखेगी।
देश महिलाओं की नेतृत्व क्षमता पर भरोसा कर रहा हैः प्रतिभा सिंह
कोलकाता : अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन पश्चिम बंगाल की अध्यक्ष तथा प्रसिद्ध गायिका प्रतिभा सिंह के नेतृत्व में कोलकाता महानगर इकाई की कार्यकारिणी का गठन किया गया। मीनू सिंह अध्यक्ष, इंदु सिंह महासचिव, राजेश्वरी सिंह उपाध्यक्ष, सुनिता सिंह सचिव, संचिता सिंह कोषाध्यक्ष तथा लाजवंती सिंह सदस्य बनायी गयीं। काशीपुर में आयोजित बैठक में कोलकाता महानगर इकाई की संरक्षिका गिरजा दारोगा सिंह और गिरजा दुर्गादत्त सिंह बनायी गयीं। इस अवसर पर प्रदेश इकाई की कार्यकारिणी की बैठक भी हुई, जिसमें प्रदेश महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष इंदु सिंह, कोषाध्यक्ष पूजा सिंह, उप कोषाध्यक्ष रीता सिंह, संयुक्त महासचिव ममता सिंह विशेष तौर पर उपस्थित थीं। बालीगंज इकाई की अध्यक्ष सुमन सिंह, सदस्य रीता सिंह, सोदपुर इकाई की महासचिव सुनिता सिंह, उपाध्यक्ष रीना सिंह, बैरकपुर इकाई की संयोजक आशा सिंह भी उपस्थित थीं। इस अवसर पर प्रदेश व अंचल इकाइयों की भावी योजनाओं पर विचार-विमर्श किया गया। प्रतिभा सिंह ने इस अवसर पर कहा कि महिलाओं को मिल-जुलकर एक दूसरे की मदद करनी होगी और उनकी बाधाओं को दूर करने में अपना योगदान देना होगा। देश में होने वाली शैक्षणिक परीक्षाओं में बेटियों ने साबित कर दिया है कि वे बेटों से कहीं अधिक मेधावी हैं। देश महिलाओं के नेतृव क्षमता पर भी भरोसा कर रहा है, यह सुखद है।
डॉ. कुसुम खेमानी को ‘मीरा स्मृति सम्मान’ एवं ‘गाथा रामभतेरी’ उपन्यास का लोकार्पण
कोलकाता : राज भवन में साहित्य भंडार, इलाहाबाद की ओर से कथाकार डॉ. कुसुम खेमानी को प्रतिष्ठित मीरा स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया| यह पुरस्कार राज्यपाल डॉ केसरीनाथ त्रिपाठी के हाथों प्रदान किया गया| इलाहाबाद से पधारे ‘मीरा स्मृति न्यास’ के सतीश चंद्र अग्रवाल ने कुसुम खेमानी का परिचय पुरस्कार से पहले पढ़कर सुनाया| साथ ही ऐसे सफल आयोजन के लिए सबका धन्यवाद किया| इसी अवसर पर कुसुम खेमानी के नए उपन्यास ‘गाथा रामभतेरी’ का लोकार्पण भी राज्यपाल के हाथों संपन्न हुआ| राज्यपाल ने उक्त अवसर पर मीरा स्मृति सम्मान के लिए कुसुम खेमानी को बधाई दी और ‘गाथा रामभतेरी’ पर अपने विचार प्रकट किए| उन्होंने कहा कि इस उपन्यास में लेखिका के अनुभव और शोध दिखता है जो उपन्यास को काफी रोचक और पठनीय बनाता है|
कुसुम खेमानी ने मीरा स्मृति सम्मान की कृतज्ञता स्वीकार करते हुए कहा कि यह साहित्य की सफलता ही है कि इतनी संख्या में लोग हॉल में उपस्थित हो जाते हैं| लोगों की उपस्थिति सृजन के लिए उत्साहित करती है|
कार्यक्रम की शुरुआत कल्लोल बनर्जी द्वारा रवींद्र संगीत के सुमधुर गायन से हुआ| कार्यक्रम का संचालन करते हुए कलकत्ता विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग की प्रोफेसर राजश्री शुक्ला ने राज्यपाल की कई कविताओं का पाठ किया एवं सबों का धन्यवाद ज्ञापन किया|
राष्ट्र की भावात्मक एकता का मंच है साहित्य
कोलकाता : नाटक और फिल्म विधाएँ इस समय व्यावसायिकता की मार झेल रही हैं लेकिन समाज को जोड़ने और सचेतन करने में इनकी एक बड़ी भूमिका है। दोनों के बीच एक समान चीज है अभिनय। भरत ने अपने नाट्य शास्त्र में यह विद्या विशेष कर समाज के साधारण वर्गों को इस उद्देश्य से दी थी कि वे इसके माध्यम से अपना दुख-सुख कह सकें। भारतीय भाषा परिषद और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा आज आयोजित साहित्य संवाद में विचारकों ने यह बात कही। आरंभ में इबरार खान ने अपने शोध पत्र में हिंदी और उर्दू नाटकों का तुलनात्मक विवेचन किया। इसके अलावा मधु सिंह ने हिंदी कथा साहित्य के फिल्मीकरण पर अपना आलेख पाठ किया।
आयोजन के दूसरे सत्र में युवा कवियों का काव्यपाठ हुआ। इसमें प्रियंकर पालीवाल, निर्मला तोदी, राज्यवर्द्धन, विश्वबंधु, सुरेश शॉ और नीलम कुमारी ने हिस्सा लिया। लेखों और कविताओं पर डॉ.अवधेश प्रसाद सिंह, जितेंद्र जीतांशु और रामप्रवेश रजक ने अपने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि हमें आत्मप्रलाप से संवाद की ओर बढ़ना होगा। इसमें सबसे अधिक सहायक हो सकता है साहित्य। साहित्य राष्ट्र की भावात्मक एकता का मंच है जहाँ किसी भेद-भाव के लिए स्थान नहीं होता। आयोजन का संचालन करते हुए विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि हमारे समय में सर्जनात्मकता और सामाजिकता के बीच संबंध आवश्यक है। मोबाइल के युग में आमने-सामने बैठ कर कविताएँ सुनना और विचारों का आदान-प्रदान करना हमारी मानवता को सींचेगा। यह आयोजन इसीलिए है।
आरंभ में भारतीय भाषा परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार ने विद्वानों और कवियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य संवाद नई पीढ़ी का मंच है जहाँ युवा पीढ़ी का हमेशा स्वागत है। राहुल शर्मा ने धन्यवाद दिया। इस आयोजन के लिए डॉ.कुसुम खेमानी ने अपना शुभकामना संदेश भेजा था।
जितनी सहज न्यूयॉर्क में थी, उतनी ही कृष्णनगर की सड़कों पर हैं महुआ
कृष्णानगर : तृणमूल के टिकट पर लोकसभा पहुँचीं महुआ मोएत्र कॉरपोरेट जगत से हैं। तृणमूल की मुखर नेत्रियों में शामिल महुआ के मुताबिक कृष्णनगर की गलियों तक पहुँचने का उनका सफर अमेरिका में मैसाच्यूसेट्स से शुरू हुआ था। वह बताती हैं, ‘मैंने वहाँ इकोनोमिक्स और मैथ्स की पढ़ाई की। ग्रेजुएशन के बाद बैंकिंग क्षेत्र में कदम रखा। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए जेपी मॉर्गन में वाइस प्रेसिडेंट बन गई। न्यूयॉर्क और लंदन में काम किया। लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कहां तो मैं लुई वितें के हैंडबैग, बॉबी ब्राउन के आइलाइनर और कारनेशन लिप कलर जैसे ब्रांड्स पसंद करती थी, लेकिन अब मुझे फुलिया कॉटन की स्थानीय साड़ी भी उतनी ही पसंद है। मुझे इन दोनों दुनियाओं में कोई टकराव नहीं दिखता। मैं न्यूयॉर्क में जितना सहज थी, उतनी ही कृष्णनगर की सड़कों पर हूँ। यह रास्ता मैंने खुद चुना है। मैंने नदिया जिले की करीमनगर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा। वहाँ मैंने अपने तमाम बैंकिंग अनुभव जमीन पर उतारे। 150 करोड़ रुपये के काम कराए। इसी से साबित किया कि मैं लोकसभा चुनाव के लिए प्रबल दावेदार हूँ। ममता बनर्जी को मेरा काम पसन्द आया। होलयोक कॉलेज से निकलकर मेरे साथी रियूनियन में किस्से सुनाते थे, कि कौन कहां डायरेक्टर, मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रेसीडेंट बन गया। जुलाई 2008 में कांग्रेस की सिपाही बन गयी। राहुल गाँधी ने आम आदमी की सिपाही प्रोग्राम चलाया हुआ था। यह मेरे लिए नर्सरी थी। 2009 का चुनाव कांग्रेस ने तृणमूल के साथ मिलकर लड़ा। कृष्णानगर सीट ममता की पार्टी ने जीती। दो साल बाद मैं ममता के साथ चली गई।’ 43 साल की महुआ तृणमूल सांसद हैं। पं बंगाल के कृष्णानगर से जीती हैं। सियासत में आने से पहले जेपी मार्गन कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थीं। 2008 में राहुल कांग्रेस में लाए।
साभार – दैनिक भास्कर




