Friday, April 24, 2026
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इस बार मनााइए बजट वाली फैशनेबल दिवाली

दिवाली के पहले खरीददारी हम सब करते हैं और जब आलमारी में लगा हो कपड़ों का ढेर या फिर बजट हो कम, तो लगता है कि बजट वाला फैशन होता या फिर बगैर किसी खर्च के ही लुक मिल जाए शानदार तो क्या कहने। जी हाँ…ऐसा हो सकता है। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ तरीके जो आपके बजट में देंगे शानदार लुक –

मम्मी की कोई साड़ी अगर आपको बहुत पसंद आ रही है और इस वजह से नहीं पहन पा रही कि ब्लाउज आपके पास नहीं है, तो कोई परेशान होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि ट्रडिशनल तरीके से साड़ी तो हर कोई पहनता है, आप थोड़ा नयापन इसमें जोड़ दीजिए और इसे अपनी प्लेन टी-शर्ट के साथ पहन लें।

साड़ी अगर हल्के रंग और खादी या कॉटन में हो, तो आपका प्रयोग और भी सफल हो जाएगा। अक्सेसरीज के तौर पर इसके साथ पहन लें सिल्वर कलर का बड़े साइज का चोकर। बस आपका मॉर्डन साड़ी लुक तैयार है।


फेस्टिव लुक पाने के लिए जरूरी नहीं कि आप हैवी वर्क वाली ड्रेस ही पहनें। इसके बजाय अपने स्टाइल को ऐसा बनाएं कि ड्रेस में बहुत वर्क न होने के बावजूद भी आप फेस्टिव लुक पा सकें। इसमें आपका काम आसान कर देगा केप के साथ पहना गया कुर्ता और प्लेन घेर वाली स्कर्ट। कोई लाइट कलर की स्कर्ट चुनें और उसके साथ नॉर्मल प्लेन कुर्ता कैरी कर लें।

आपकी वार्डरोब में एक डार्क रंग का प्लाजो है, तो यह सही समय है उसे इस्तेमाल करने का। अगर प्लाजो का घेर ज्यादा है, तो भी परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। ज्यादा घेरवाला इसे और बेहतर ही बनाएगा। एक टाइट फिट क्रॉप टॉप लें और दोनों के ऊपर पहन ले एक एंकल लेंथ श्रग। इसके साथ आप वेजिस पहन सकती हैं।

एक बहुत ही खूबसूरत लुक आपको आसानी से मिल सकता है अगर आपके पास एक लॉन्ग स्कर्ट है। अपने किसी पुराने ब्लाउज को पीछे से डीप यू का आकार देकर काट लें और एक बैक हुक लगा लें। आप इसके साथ बड़ा कुंदन का मांग टीका लगा सकती हैं। टीके को एक जगह सेट करने के लिए डबल साइडिड टेप का इस्तेमाल करें।

यदि आपको लगता है कि आपका सूट, स्कर्ट, टॉप, जीन्स जो भी होगा आउटफिट पहन रही हैं, बहुत सिंपल है तो उसके साथ सीक्वेंस बीड आदि वर्क वाला हैवी स्टोल पहनें। इससे आपका आउटफिट स्टाइलिश लगेगा।

प्लेन ब्लैक स्कर्ट के साथ कलर्ड टॉप पहनें और स्कर्ट या टॉप में से किसी एक को सीक्वेंस से सजाएँ। आजकल बाजार में आयरन ऑन सीक्वेंस मोटिफ मिलते हैं। उनका इस्तेमाल भी कर सकती हैं।

प्लेन स्कर्ट के साथ ही टी-शर्ट या स्ट्रेपी टॉप पहनें और खूब सारी चंकी मोती की चेन पहन लें। साथ में यदि ब्रोकेड बैग व चप्पल भी पहनेंगी तो कम बजट में स्टाइलिश नजर आना कोई मुश्किल काम नहीं है।

आपने यदि आउटफिट बहुत मामूली पहना है, लेकिन एक्सेसरीजस्टाइलिश व हैवी पहनी है, तो आपका कंप्लीट लुक खूबसूरत और गॉर्जियस नजर आएगा, इसलिए आउटफिट के साथ-साथ एक्ससेरीज पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है।

अपनी प्लेन जार्जेट या शिफॉन साड़ी को न्यू तथा हैवी लुक देने के लिए उसे कोर्सेट, ब्रोकेड ब्लाउज, स्पेगैटी आदि के साथ पहनें।

यदि ऐसा नहीं करना चाहतीं, तो हैवी एक्ससेरीज पहनकर भी आप फेस्टिव लुक दे सकती हैं।

अगर आपका वजन  ज्यादा है और आप हैवी साड़ी पहनना चाहती हैं तो हैवी मैसूर सिल्क की साड़ी लें। यह आपको स्लिमर लुक देगी। पैटल स्लीब्ज के ब्लाउज भी आपको देंगे फेस्टिव लुक।

कुछ अलग हटकर दिखने के लिए पहनें लहँगा स्टाइल। अगर आप डिजाइनर लुक चाहें तो अपने लिए साड़ी भी डिजाइन करवा सकती हैं। पल्ले और प्लेट्स के लिए नेट इस्तेमाल करें और बाकी साड़ी के लिए जॉर्जेट काम में लें। आजकल डिजाइनिंग की जरी बॉर्डर भी बाजार में उपलब्ध है। इन्हें साड़ी में लगाएँ और तैयार करें अपनी यूनिक डिजाइनर साड़ी

जानिए रंगोली या मांडना में अन्तर

चौंसठ कलाओं में से एक चित्रकला का एक अंग है अल्पना। इसे ही मांडना भी कहते हैं और इसी का एक रूप है रंगोली। भारत में मांडना विशेषतौर पर होली, दीपावली, नवदुर्गा उत्सव, महाशिवरात्रि और संजा पर्व पर बनाया जाता है। मांडनों को श्री और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। माना जाता है कि जिसके घर में इसका सुंदर अंकन होता रहता है, वहां लक्ष्मी स्थाई रूप से निवास करती है। घर में हमेशा सकारात्मकता और प्रसन्नता बनी रहती है।

मांडना और रंगोली में फर्क : मांडने की एक खासियत यह भी है कि यह लंबे समय तक बने रहते हैं। इसे बनाने के लिए गीले रंगों का प्रयोग किया जाता है, जो सूखने के बाद लंबे समय तक उतने ही आकर्षक नजर आते हैं। रंगोली में सूखे रंगों का प्रयोग किया जाता है जिसे कभी भी हटाया या मिटाया जा सकता है।

1.मांडना क्या है?
मांडना के रंग : चावल या चूने को मिलाकर गेरुआ, सफेद, पीला आदि रंग बनाकर मांडना के रंग तैयार किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मांडना उकेरने में गेरू या हरिमिच, खड़िया या चूने का प्रयोग किया जाता है। गेरू या हरिमिच का प्रयोग बैकग्राउंड के रूप में जबकि विभिन्न आकृतियों और रेखाओं का खड़िया या चूने से बनाया जाता है।

मांडना के प्रकार : स्थान आधारित, पर्व आधारित, तिथि आधारित और वर्षपर्यंत आधारित अंकित किए जाने वाले आदि मांडना के प्रकार हैं।

क्या बनाते हैं मांडना में : मांडना में चौक, चौपड़, संजा, श्रवण कुमार, नागों का जोड़ा, डमरू, जलेबी, फेणी, चंग, मेहंदी, केल, बहू पसारो, बेल, दसेरो, सातिया (स्वस्तिक), पगल्या, शकरपारा, सूरज, केरी, पान, कुंड, बीजणी (पंखे), पंच कारेल, चंवर छत्र, दीपक, हटड़ी, रथ, बैलगाड़ी, मोर, फूल व अन्य पशु-पक्षी आदि बनाए जाते हैं। मांडने की पारंपरिक आकृतियों में ज्यॉमितीय एवं पुष्प आकृतियों के साथ ही त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत्त, कमल, शंख, घंटी, स्वस्तिक, शतरंज पट का आधार, कई सीधी रेखाएं, तरंग की आकृतियां आदि भी बनाई जाती हैं।

दीवार पर : दीवारों पर लिपाई-पुताई के बाद मांडने बनाए जाते हैं। दीवार पर केल, संजा, तुलसी, बरलो आदि सुंदर बेलबुटे बनाए जाते हैं।

आंगन में : आंगन में खांडो, बावड़ी, चौक, दीपावली की पांच पापड़ी़ चूनर चौक। सबसे खास होता है बीच आंगन का मांडना। यह दीप पर्व का विशेष आकर्षण होता है। घर-आंगन में मांडने बनाकर अति अल्प मात्रा में मूंग, चावल, जौ व गेहूं जैसी मांगलिक वस्तुएं फैला दी जाती हैं।

चबूतरे पर : चबूतरे पर पंचनारेल आदि। हवन और यज्ञों में वेदी का निर्माण करते समय भी मांडने बनाए जाते हैं।

पूजाघर में : पूजाघर में नवदुर्गा, लक्ष्मीजी के पग, गाय के खुर और अष्टदल कमल, गणेश आदि बनाए जाने का महत्व है।

रसोईघर में : रसोईघर में छींका चौक, मां अन्नपूर्णा की कृपादृष्टि बनी रहे, इस हेतु विशेष फूल के आकार की अल्पना बनती है जिसके 5 खाने बनते हैं। हर खाने में विभिन्न अनाज-धन-धान्य को प्रतीकस्वरूप उकेरा जाता है। गोल आकार में बनी इस अल्पना के बीच में दीप धरा जाता है।

2.रंगों की ओली रंगोली– वर्तमान में रंगोली का प्रचलन सबसे अधिक है, लेकिन पुरानी परंपरानुसार आज भी आंतरिक इलाकों में मांडने बनाए जाते हैं। रंगोली सूखे रंगों से बनाई जाती है। रंगों की सहायता से, कई लयबद्ध बिंदुओं को मिलाते हुए रंगोली की कई सुंदर-सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं, जो बेहद आसान और आकर्षक होती है।

यह तरीका आसान होने के कारण युवतियों के साथ ही छोटी बालिकाएं भी आसानी से रंगोली को आकार दे सकती हैं। इसके बाद इसमें अपने अनुसार रंग भरकर इसे और भी आकर्षक बनाया जाता है। तब तैयार होती है, खूबसूरत रंगोली। अगर आपको रंगोली बनाना कठ‍कठिन लगता है, तो आपके लिए सबसे बेहतर तरीका यही है। इसके लिए बाजार में किताब उपलब्ध है।

 

 

घर लाएं मिट्टी के गुल्लक,बच्चों को बनायें आर्थिक तौर पर समझदार

आज के लाखों युवा भविष्य की वित्तीय जरूरतों के प्रति सचेत और गंभीर नहीं हैं. वे इसके महत्व को नहीं जानते. ऐसा लगता है कि वे भविष्य की वित्तीय जरूरतों से बेखबर हैं. यह आप भी जानते हैं कि बढ़ती उम्र में जब आय के साधन सीमित हो जाते हैं या कहें खत्म हो जाते हैं, तो न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने और जीवन शैली को बनाये रखने के लिए बढ़ते खर्च को पूरा करना मुश्किल होता है. इसलिए यह जरूरी है कि हम आप इस दीपावली के शुभ अवसर पर अपने बच्चों को शुरू से ही बचत और निवेश करना सिखायें –
भारतीय परिवार में छोटी बचत का रिवाज बहुत पुराना है. लगभग हर घर में मिट्टी के गुल्लक होते थे और बच्चे उनमें पैसे जमा करते थे. यह चलन अब बहुत कम ही देखने को मिलता है. नयी पीढ़ी, जिसे मिलेनियम भी कहा जाता है, बचत और अपनी आर्थिक जिम्मेवारियों के प्रति लापरवाह दिखती है. यह भविष्य के लिए ज्यादा चिंतित नहीं रहती और आज में ही जीवन व्यतीत करने में विश्वास क स्वभाव में आ गया है जैसे बार-बार स्मार्टफोन बदलना, गाड़ियां बदलना, होटल-रेस्तरां में पार्टी करना, घर-परिवार की जिम्मेवारियों से बेखबर अपनी दुनिया में जीना। इस पीढ़ी को बचत करने या निवेश के बारे में ज्यादा न सोचते हैं और न विश्वास करते हैं। यह गुल्लक वाली पीढ़ी नहीं है। इस पीढ़ी को नहीं पता कि भविष्य में इसे किन मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। तेजी से बदलती हुई इस दुनिया में खुद के भविष्य के लिए कितनी आर्थिक तैयारी करनी है, इस पीढ़ी को नहीं पता। आज स्कूलों में प्लस टू के स्टूडेंट से बात करें, तो स्थिति का आभास होगा कि उन्हें बचत और निवेश बारे में कुछ भी नहीं पता और वे इसको लेकर गंभीर नहीं हैं. अगर आनेवाली पीढ़ी के भविष्य को सुखमय बनाना चाहते हैं, तो यह जरूरी है कि बच्चों में बचत करने की प्रवृत्ति को विकसित करना होगा, ताकि निवेश करने के तरीके को वे समझें –

छोटे बच्चों को गुल्लक से जोड़ें

कच्ची उम्र में ही बच्चों को बचत की आदत डालने के लिए सबसे बेहतर उपाय है उसके लिए मिट्टी के गुल्लक लाना। इस गुल्लक की खासियत होती है कि इसे बिना तोड़े जमा किये पैसे नहीं निकाले जा सकते. ये पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं और सस्ते भी। एक-दो-पांच-दस रुपये के सिक्कों को जमा करते हुए कैसे एक बड़ी रकम तैयार की जा सकती है, बच्चों को यह तब पता चलता है जब गुल्लक को फोड़ने का समय आ जाता है। जमा किये हुए छोटे-छोटे पैसों से तैयार हुई बड़ी रकम को देख कर उनके अंदर की खुशी बाहर आ जाती है और फिर वे बड़ी गुल्लक की माँग करने लगते हैं. इन्हें निवेश के बारे में भी बताना चाहिए।

जन्मदिन के मौके को बनाएं अवसर

बच्चों के जन्मदिन के अवसर पर परिवार के कई सदस्य उपहार स्वरूप पैसे देते हैं। आप भी बच्चे के जन्मदिन को धूमधाम से मनाते हैं. बच्चों के जन्मदिन में मिले हुए उनके पैसों का एकमुश्त निवेश शुरू कर दें – जैसे इक्विटी या म्यूचुअल फंड में. या फिर इनके जन्मदिन पर एक एसआइपी शुरू कर दें. हर साल जन्म दिन पर पैसे जमा करते जायें. 15 साल की लंबी अवधि में यही छोटी-छोटी रकम इतनी बड़ी पूंजी बन जायेगी कि आपको बच्चों के उच्च शिक्षा या अन्य खर्च को आसानी से पूरा करने में मदद होगी। साथ ही बच्चों को बचत और निवेश की जानकारी होगी.

किशोरों को जरूर दें निवेश की जानकारी

बच्चों को बचत के साथ-साथ निवेश की भी जानकारी देना जरूरी है. किशोरावस्था में जब उनके मन में तेजी से नये कदम उठाने दुनिया को अपनी नजर से देखने और समझने का प्रयास तेज पकड़ने लगता है, तो उसी समय उनको आर्थिक दुनिया की आधारभूत जानकारी भी उपलब्ध करा देनी चाहिए. उन्हें पावर ऑफ कंपाउंडिंग की जानकारी देनी चाहिए। उनके ही नाम पर या उनके हाथों निवेश कराना शुरू कर देना चाहिए. फुरसत के  क्षण उनसे इस विषय पर विचार विमर्श करते हुए उन्हें निवेश की बारिकीयों के बारे में जरूर बताना चाहिए ताकि वे भी आपके निर्णय को समझ पायें कि बचत और निवेश कितना महत्वपूर्ण है।

लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस की जानकारी जरूर दें

जीवन के रास्ते में कब कौन-सी घटना घटेगी, इसका कोई पूर्वानुमान नहीं कर सकता. यानी आप कब बीमार पड़ जायेंगे और उस बीमारी के इलाज में कितना खर्च होगा, इसका अनुमान लगाना संभव नहीं है. जीवन के किस मोड़ पर कौन-सी अप्रत्याशित घटना हो जाए, यह भी नहीं कहा जा सकता और फिर परिवार के सदस्यों के लिए आप कुछ कर नहीं पायेंगे. इन सबका समाधान है इंश्योरेंस यानी बीमा। जीवन बीमा के साथ-साथ स्वास्थ्य बीमा आज की जरूरत बन चुका है. समय के साथ इलाज का खर्च भी बढ़ता जा रहा है. बच्चों को बतायें कि वे अपने और पूरे परिवार का हेल्थ इंश्योरेंस जरूर कराएं।

नौकरी शुरू करते ही उठाएं कदम

कॅरियर की शुरुआत करते ही बच्चों से निवेश करवाना शुरू करा दें. आप उस दौर से गुजर चुके होते हैं, इसलिए अपने अनुभव के अनुसार छोटी अवधि, मध्यम अवधि और लंबी अवधि के लक्ष्यों को लेकर निवेश शुरू करवाना चाहिए। यही उम्र है, जब उन्हें बाजार की जोखिमों की भी जानकारी जरूर दी जानी चाहिए। उन्हें बताया जाना चाहिए कि ऐसी लापरवाही न बरतें कि ज्यादा लालच में आकर खुद का नुकसान न उठाना पड़े। इक्विटी, डेब्ट, बैंक, पोस्ट ऑफिस, बॉन्ड आदि की जानकारी जरूर विस्तार से दें। अगर आप खुद इसमें सक्षम नहीं हैं, तो किसी स्थापित वित्तीय सलाहकार से बात करवाएं. बच्चों में जितनी जल्दी इन सभी की जानकारी होगी, वे उतना बेहतर निवेश विकल्प अपनी जोखिम क्षमता के अनुसार चुन सकेंगे। मुद्रास्फीति को देखते हुए उनके रिटायरमेंट के समय उन्हें कितनी पूंजी की जरूरत होगी, इस पर विस्तार से चर्चा जरूर करनी चाहिए।

वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करना सिखाएं

किशोरावस्था के दौरान ही बच्चों को उनकी आर्थिक जरूरतों के विषय में जरूर बतायें और उस पर उनसे चर्चा भी करें. उन्हें परिवार की पूरी आय-व्यय की जानकारी भी दें। मासिक खर्च के अलावे कई अन्य त्रैमासिक, अर्धवार्षिक और वार्षिक खर्च होते हैं. परिवार के लिए इमरजेंसी फंड भी जरूरी होता है और उसमें कितनी रकम रखी जा सकती है। इन सब की जानकारी देते हुए अन्य वित्तीय लक्ष्यों की भी जानकारी जरूर दें. साथ ही बताएं कि छोटी बचत कर वे कैसे इन वित्तीय लक्ष्यों को पूरा कर सकते हैं.

बेहिसाब खर्च करने से रोकें

बार-बार फोन बदलने या आकर्षक गाड़ी के लिए मनमानी कीमत चुकाने के लिए तत्पर रहने जैसी खर्चीली प्रवृत्ति को रोकना भी बड़ी बचत है।

कर बचत के उपायों को बताएं

बच्चे जब नयी नौकरी में जाते हैं और कमाने लगते हैं तो उनमें अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है, क्योंकि उस समय उनके ऊपर परिवार की कोई जिम्मेदारी का बोझ नहीं होती. उन्हें नहीं पता होता कि आयकर विभाग द्वारा दिये गये कई विकल्पों से वे अपने आयकर को बचा सकते हैं. इसलिए यह सही समय होता है जब आप उन्हें आयकर बचाने के विभिन्न विकल्पों की भी जानकारी प्रदान करें।

 

गोल्ड ईटीएफ में करें निवेश, डिजिटल गोल्ड दिलाएगा फायदा

भारतीय महिलाओं को सोने के जेवर काफी पसन्द होते हैं लेकिन यह निवेश का आदर्श विकल्प नहीं है। सोने के दाम कम होना किसी खुशखबरी-सा लगता है। पिछले कुछ हफ्तों में ऐसा ही हुआ है। यह सोने में निवेश का अच्छा समय माना जा रहा है, लेकिन ध्यान रखें गोल्ड ज्वैलरी को असली निवेश न मानें। सोना सस्ता होने पर सोने की चूड़़ियां, हार या दूसरे गहने खरीद लेना पहले अच्छा विकल्प माना जाता, जब निवेश के बहुत विकल्प नहीं थे। लेकिन आज आर्थिक अनिश्चितता के दौर में कई विकल्पों के साथ सोने में निवेश अच्छा है। अगर सोने में निवेश करते भी हैं, तो गहनों में नहीं करें। हम सोने की चमक से तो अंजान नहीं है, लेकिन उन तकनीकों को अपनाने में पीछे हैं, जिससे सोने को रखना आसान, सुरक्षित और सस्ता पड़ता है।

गोल्ड ईटीएफ के फायदे
गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) के जरिए निवेशक इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सोना खरीद/बेच सकते हैं और आर्बिटेज गेन (एक मार्केट से खरीदकर दूसरे मार्केट में बेचने पर लाभ) हासिल कर सकते हैं। भारत में गोल्ड ईटीएफ 2007 से चल रहे हैं और एनएसई और बीएसई में रेगुलेटेड इंस्ट्रूमेंट्स हैं। इन्हें कई म्यूचुअल फंड स्कीम्स के जरिए खरीद सकते हैं, जो बुलियन, माइनिंग या सोने के उत्पादन से जुड़े सहयोगी बिजनेसों में निवेश करती हैं। गोल्ड ईटीएफ में निवेश के कई फायदे हैं, जो इसे सोने के अन्य विकल्पों से बेहतर बनाते हैं।

खरीदना आसान
ईटीएफ के जरिए सोना यूनिट्स में खरीदते हैं, जहां एक यूनिट एक ग्राम की होती है। इससे कम मात्रा में या एसआईपी (सिस्टमेटिक इंवेस्टमेंट प्लान) के जरिए सोना खरीदना आसान हो जाता है। वहीं भौतिक (फिजिकल) सोना आमतौर पर तोला (10 ग्राम) के भाव बेचा जाता है। ज्वैलर से खरीदने पर कई बार कम मात्रा में सोना खरीदना संभव नहीं हो पाता।

पारदर्शी कीमत
गोल्ड ईटीएफ की कीमत पारदर्शी और एक समान होती है। यह लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन का अनुसरण करता है, जो कीमती धातुओं की ग्लोबल अथॉरिटी है। वहीं फिजिकल गोल्ड की अलग-अलग विक्रेता/ज्वैलर अलग-अलग कीमत पर दे सकते हैं।

सबसे शुद्ध
गोल्ड ईटीएफ से खरीदे गए सोने की 99.5% शुद्धता की गारंटी होती है, जो कि सबसे उच्च स्तर की शुद्धता है। आप जो सोना लेंगी उसकी कीमत इसी शुद्धता पर आधारित होगी।

कम चार्जेस
गोल्ड ईटीएफ खरीदने में 0.5% या इससे कम का ब्रोकरेज लगता और पोर्टफोलियो मैनेज करने के लिए सालाना 1% चार्ज देना पड़ता है। यह उस 8 से 30 फीसदी मेकिंग चार्जेस की तुलना में कुछ भी नहीं है जो ज्वैलर और बैंक को देना पड़ता है, भले ही आप सिक्के या बार खरीदें।

अच्छा रिटर्न
ईटीएफ सोना बेचने के इस ब्रिज का नाम कर्नल चेवांग रिनचेन रखा गया है। चेवांग ने पाकिस्तान के खिलाफ 1948 व 1971 और चीन के या खरीदने में ट्रेडर्स को सिर्फ ब्रोकरेज देना होता है। वहीं फिजिकल गोल्ड में लाभ का बड़ा हिस्सा मेकिंग चार्जेस में चला जाता है और यह सिर्फ ज्वैलर्स को ही बेचा जा सकता है, भले ही सोना बैंक से ही क्यों न लिया हो।

रखने में जोखिम नहीं
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड डीमैट एकाउंट में होता है जिसमें सिर्फ वार्षिक डीमैट चार्ज देना होता है। साथ ही चोरी होने का डर नहीं होता। वहीं फिजिकल गोल्ड में चोरी के खतरे के अलावा उसकी सुरक्षा में भी खर्च करना होता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

तन बसा परदेस में, याद आयी देस की दिवाली

अफ्रीका के घाना में रह रही भारती सिंह याद कर रही हैं देस की दिवाली…त्योहार में बसा बचपन, आस – पास का वातावरण…सब कुछ उमंग में हैं और मन लौट चला है पीछे की ओर..आप भी शामिल हो जाइए स्मृतियों की झिलमिलाती रोशनी के साथ –

1.

दीवाली के घरौंदे तो बनकर सूख ही जाते थे।अब बारी थी खिलोने और ग्वालिन की। मिट्टी के हाथी ,घोड़े ,बाघ हाथी तोता सब मिलता है अभी भी ,साथ मे मिट्टी के गुल्लक भी। ग्वालिनें दो,चार आठ दस दिए लिए। अब दीवाली तक किसे इन्तजार हो।मिट्टी की पूरी रसोई मिलती थी।चूल्हे बर्तन सील लोढ़ा सुप सारी ग्रहस्थी। सब बनठन कर तैयार । घरौंदे सजाने का भी काम था।छत पर कुर्सियां डालनी थी।बगीचे में झूला भी। बड़े भैया लोग एक से एक कंदील बनाकर कुछ दिन पहले ही टांग देते।बाजारों पर चीन का कब्जा नही था।पकवान भी घर मे ही बनते। घर के भी सारे समान धोकर तैयार। सब तो वैसा ही होगा। काहे को आये विदेश।मन वही कही छूट गया।

2

दीवाली की साफ सफाई जोरों पर हैlपर्दे दरवाजे सब अपनी बाट देख रहे हैं जो चमक चुके इठला रहे हैं। एक बात जो बार बार याद आ रही है बचपन मे चिकनी मिट्टी का इंतजाम भी करना होता था। सुरुचि पूर्वक घरौंदे बनते थे।उसके बगल में मिट्टी डाल कर सरसो भी बो दिया करते बगीचा तैयार हो जाता।दूसरे तल्ले की छत पर कुर्सियां मेज भी बिछाए जाते।चुने से रंगाई होती।नील गेर से डिजाइन उकेरे जाते यह सब एक सप्ताह पहले से करना होता । देश की दीवाली बहुत याद आ रही हो।

3

अपार्टमेंट के सारे बच्चे आज आज गंभीर मुद्रा मे बैठे थे.सवाल था दीवाली कैसे मनाइ जाए. सबके गुल्लक आज फुटने वाले थे.पिछले साल यह तय हुअा था कि सब अपने अपने गुल्लक के पैसो से पटाखे खरीदेंगे.पिछली बार पापा ने महंगाइ का नाम कहकर कम पटाखे दिलाए थे. तभी यह तय हुआ था कि सब अपनी जेब खर्च के पैसे बचाएंगे ताकि इस दीवाली कोइ कमी न रहे. कुल आठ हजार रुपये हुए थे सबकी गुल्लक के पैसे मिलाकर. तभी उनके मुखिया अक्षत ने कहा. आज आपसे एक विनती करना चाहता हू. “क्या” “क्यो न इस दीवाली को हम यादगार दीवाली बनाए.” मेरे पास एक आइडिया है” सब बच्चे ध्यान से सुनने लगे. हमारी सोसाइटी मे तीन कामवाली आती है.इन पैसो से हम उनके लिए दीए तेल और कुछ पटाखे खरीदे .ताकि उनके बच्चे भी खुशी खुशी दीवाली मना सके, कुछ देर तो बच्चे मायुस हुए .फिर सब मान गए. बाल पंचायत अब नइ तरह से दीवाली मनाने पर राजी हो गइ.

 

 

ऑनलाइन वर्ल्ड रिकॉर्ड में युवा कवि रोहित प्रसाद ‘पथिक’ ने बनायी जगह

आसनसोल : आसनसोल के युवा कवि व साहित्यकार रोहित प्रसाद “पथिक” ने विश्व स्तर पर मिलने वाला ” ऑनलाइन वर्ल्ड रिकॉर्ड ” में अपना नाम दर्ज किया. रोहित ने चार भाषा हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला व उर्दू मे कविता व कहानियां लिख ऑनलाइन वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह बनायी।.इससे पहले रोहित इंडिया बुक आॕफ रिकॉर्ड में भी अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। वही रोहित को ” यंगेस्ट मल्टिलिन्गुअल पोएट ” के खिताब से सम्मानित किया गया। यह सम्मान समारोह आसनसोल साहित्यिक संस्था ” आस्था ” के सभागार में ” विजया मिलन ” कार्यक्रम में प्रदान किया गया. विद्यासागर विश्वविद्यालय के डीन डॉ दामोदर मिश्र जी ने प्रशस्ति पत्र, अंग वस्त्र व पुष्प गुच्छ से रोहित को सम्मानित किया. डॉ दामोदर मिश्र जी ने शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि रोहित के इस उपलब्धि पर हमें ही नहीं पूरे शिल्‍पांचल को गर्व है। चार भाषाओं में लिखना व जानना बहुत अच्छा है। इस मौके पर शिक्षक व वरिष्ठ कवि अवधेश कुमार अवधेश, आस्था के संयोजक नवीन चन्द्र सिंह व अध्यक्ष मनोहरलाल पटेल, प्रो० प्रमोद कुमार प्रसाद, दिनेश गुप्त गर्ग, कथाकार महावीर राजी, असित कुमार, रामजी दुबे, जयप्रकाश नारायण आदि वरिष्ठ अतिथिगण उपस्थित थे.

क्रान्ति की अग्निशिखा : महारानी लक्ष्मीबाई

शुभांगी उपाध्याय

फिरंगी : मैंने बोला न इधर आओ…, इस पर हम बैठेगा।
व्यक्ति : नाहि साहिब! ई नाहिं होई  सकत, ई घोड़ा पर तो केवल युवराज साहिब ही बैठत है।
फिरंगी (क्रोधित स्वर में) : यू ब्लडी इंडियन! तुम हमको मना करता। गिव मी दैट… (व्यक्ति के हाथ से चाबुक छीनकर उसी से उसकी पिटार्इ करता है।)
तभी एकाएक एक तेजस्विनी बालिका (आयु 7-8 वर्ष) वहाँ पहुँचकर उस फिरंगी अफसर के हाथ से चाबुक छीन लेती है।
बालिका : ए फिरंगी! तेरा ये दुस्साहस!! तूने हमारे बासुदा को मारा! (और दनादन उस फिरंगी अफसर को चाबुक से पीटने लगती है।) चल माफी माँग!’’
ऐसी वीरांगना थीं हमारी प्यारी मनु। हाँ, ठीक समझा आपने… ये वही मनु है जिन्हें बचपन में मणिकर्णिका और विवाहोपरांत महारानी लक्ष्मीबाई  के नाम से जाना जाता है।
विश्‍व की सबसे प्राचीनतम नगरी, महादेव की काशी (उत्तर प्रदेश) में इस महान वीरांगना का जन्म 19 नवंबर, 1835 में हुआ। इनके पिता श्रीमान् मोरोपंत तांबे एक मराठी ब्राह्मण थे तथा माता श्रीमती भगिरथी बाई एक विदुषी महिला थी। मनु अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी और मात्र चार वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपनी माँ को खो दिया। घर में कोई और उनकी देखभाल के लिए नहीं था इसलिए वे भी अपने पिता के साथ कानपुर के पेशवा श्रीमंत बाजीराव (द्वितीय) के दरबार जाने लगी।
नन्हीं मनु को पेशवा साहिब प्रेम से ‘छबीली’ बुलाते थे। अपने मधुर व्यवहार से मनु ने सबका दिल जीत लिया था। पेशवा साहिब के दत्तक पुत्रों, नाना साहिब और राव साहिब के साथ ही वो पली-बढ़ी थी। उनके गुरु श्री तात्या टोपे एक वीर योद्धा और महान देशभक्त थे।
अब मनु शस्त्र-विद्या के साथ-साथ शस्त्र विद्या में भी पारंगत होने लगी थी। एक सच्चे गुरु की भाँति ही तात्या जी ने मनु को जीवन जीने की सही दिशा प्रदान की। बचपन से उसके हृदय में राष्ट्रभक्ति के बीज बोकर उसके जीवन को सार्थक व उद्देश्यपूर्ण बना दिया।
मनु एक विलक्षण कन्या थी। वह साहसी, निडर, शाौर्यवान तथा कुशााग्र बुद्धि वाली थी। एक बार राज्य में एक पागल हाथी घुस आया था। उसने तबाही मचा रखी थी, किसी को उसके समक्ष जाने का साहस न हुआ। किन्तु जब मनु को इस बात का भान हुआ, तब वे बिना एक क्षण गँवाए उस हाथी को काबू करने निकल पड़ी और उसमें सफल भी हुर्इ। तब वह मात्र आठ वर्ष की थी।
उन्हें बचपन से ही छत्रपति शिवाजी महाराज की वीर गाथाएँ जुबानी याद थी। शिवाजी महाराज के स्वराज के स्वप्न को आगे चलकर मनु ने भी जिया और अंग्रेजों से लोहा लिया। स्वदेश की माटी से उन्हें अगाध प्रेम था। वे सदैव कहती थी- ‘‘इस मिट्टी ने मुझे जिस गौरव के साथ अपनाया है, इसकी रक्षा के लिए मैं अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दूँगी।’’
उनके बाल्यकाल से जुड़ी एक और रोचक घटना की चर्चा करना आवश्यक प्रतीत होता है। एक बार श्रीमंत पेशवा साहिब परिवार सहित अपने एक मित्र राजा के राज्य में एक उत्सव में सम्मिलित होने के लिए जाते हैं। उस राज्य में अंग्रेजी हुकूमत ने अपनी जड़ें मजबूत कर रखी थी। वे वहाँ की जनता पर बहुत अत्याचार करते थे। लोगों में उनका भय चरम पर था। उस राज्य में पहुँचकर तात्या गुरु बच्चों को लेकर घ्ाूमने निकले। उन्होंने देखा कि दुष्ट फिरंगी अफसर राज्य के एक बुजुर्ग को सता रहा है और उस बुजुर्ग की पगड़ी उछालकर दूर फेंक देता है। जिस पर वे क्रोधित होकर उस फिरंगी अफसर पर गरजते हैं- ‘‘ये केवल पगड़ी ही नहीं अपितु हम भारतवासियों के गौरव का प्रतीक भी है। तुम्हें इनसे क्षमा माँगनी चाहिए।’’
अंग्रेज : ‘‘यू ब्लडी इंडियन! तुम हमसे जुबान लड़ाता है। चलो एक खेल खेलता है। अगर हम जीता तो हम थूकेगा और तुमको चाटना होगा।’’
अपने गुरु के इतने बड़े अपमान से मनु आग-बबूला हो उठी। उसने क्रोधित स्वर में कहा- ‘‘ए फिरंगी! तू क्या हमारे गुरु का मुकाबला करेगा? यदि है साहस तो आ, पहले हमसे और हमारे नाना भाऊ से निपट कर दिखा, और याद रख यदि तू हारा तो तुझे मेरे गुरु और बूढ़े बाबा से हाथ जोड़कर क्षमा माँगनी होगी और ससम्मान पगड़ी भी पहनानी होगी।
फिरंगी अफसर ने कुटिल मुस्कान दी और फिर ;श्रववेजपदहद्ध (घुड़सवार भाला-युद्ध) नामक खेल के लिए चुनौती दी। इस खेल को केवल फिरंगी ही जानते थे, हम भारतीय इससे अपरिचित थे। खेल प्रारंभ होते ही नाना साहिब घोड़े पर सवार हुए। धूर्तता इन अंग्रेजों के नस-नस में घुली हुई थी। वे इस मामूली से खेल में भी छल करने से बाज नहीं आए।
दूर खड़े एक दूसरे अंग्रेज अफसर ने नाना साहिब पर शीशा चमका दिया और सूर्य की किरणें उनकी आँखों पर पड़ी। वे भाले का वार संभाल नहीं पाए और धड़ाम् से घोड़े पर से गिर गए। अब मनु की बारी थी। बुद्धिमान् मनु ने पहले ही अंग्रेजों की चाल को समझ कर तात्या गुरु को आगाह कर दिया था। तात्या जी ने तुरन्त ही उस अंग्रेज के हाथ से शीशा छीनकर तोड़ दिया। अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए मनु ने एक ही वार में अंग्रेज को घोड़े से गिरा दिया। इतनी करारी शिकस्त से अंग्रेज भौचक्का रह गया और भागने लगा। परन्तु मनु ने भी उसे जाने नहीं दिया और शर्त के अनुसार उस फिरंगी ने माफी माँगी और पगड़ी पहनाई
मनु के प्रभावशाली व्यक्तित्व से कोई भी अछूता  नहीं रह पाया था। झांसी राज्य से आए एक प्रकाण्ड पंडित श्री तात्या दीक्षित भी इस घटना के साक्षी थे और मन ही मन में सोच रहे थे कि यदि झांसी को ऐसी वीरांगना महारानी मिल जाती तो कितना अच्छा होता।
किशोरावस्था में प्रवेश करते ही मनु का विवाह झांसी नरेश श्री गंगाधर राव नेवालकर से हो गया। तत्पश्‍चात् मनु महारानी लक्ष्मीबाई के नाम से प्रसिद्ध हुई।  वीरता और   वैभव का मिलन हुआ। प्रजा अपनी महारानी को पाकर बहुत हर्षित थी। विवाहोपरान्त भी रानी साहिब अपने लक्ष्य पर अडिग रहीं हालाँकि उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। भारतमाता की रक्षा और सेवा का संकल्प उन्होंने और दृढ़ किया।
उन्होंने वन-जागृति का कार्य तत्परता से आरंभ किया। झांसी की प्रजा में राष्ट्रभक्ति की अलख जगार्इ। अपनी सेवा में नियुक्त दासियों से मित्रवत् व्यवहार कर, भारतमाता की सेवा की गुहार लगार्इ। रानी साहिबा ने राज्य की सभी स्त्रियों को प्रशिक्षण देकर उन्हें शस्त्र विद्या सिखार्इ ताकि संकट की घड़ी में वे भी अपना योगदान दे सकें। देखते ही देखते रानी साहिब ने उनकी एक विशाल सेना ही खड़ी कर दी जिनमें सुन्दर, काशी, मुंदर, मोतीबार्इ, झलकारी बार्इ आदि प्रसिद्ध है। स्त्री सशक्तिकरण का यह सर्वोच्च उदाहरण है।
र्इश्‍वर की असीम अनुकम्पा से रानी साहिब को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुर्इ। प्रजा ने अपने युवराज का हर्षोल्लास से स्वागत किया। महाराज गंगाधर राव ने नन्हें शिशु को दामोदर राव नेवालकर नाम से संबोधित किया। झांसी को वारिस मिलता देख फिरंगियों को मिर्ची लग गर्इ। वे नन्हें युवराज की हत्या के लिए नए-नए षड्यंत्रों को अंजाम देते रहे और अंतत: मात्र चार माह की अल्पायु में ही युवराज चल बसे। इस घटना से पूरी झांसी शोकाकुल हो गयी। रानी साहिब पर यह पहला वज्र प्रहार था।
तत्पश्‍चात् झांसी नरेश का भी स्वास्थ्य दिन-पर-दिन गिरजा गया। फिरंगियों को तब भी चैन नहीं मिला। वे तरह-तरह की योजनाएँ बना कर झांसी पर कब्जा करने का प्रयास करते रहते थे। वे महाराज पर संधि कर लेने का दबाव बनाते और बदले में पेंशन तथा अन्य सुविधाएँ प्रदान करने का प्रस्ताव रखते।
अंग्रेजों के इस कृत्य से महाराज क्रोधित व चिंतित थे। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने प्रजा के हित में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने अपने चचेरे भार्इ के पुत्र आनन्द राव को गोद लेकर उसे झांसी का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। तत्पश्‍चात् वह भी दामोदर राव के नाम से ही जाना गया। ईस्ट इंडिया कम्पनी के ‘गर्वनर जनरल लॉर्ड डलहौजी’ ने ‘डॉक्टरीन ऑफ लैप्स’ के तहत महाराज के निर्णय का बहिष्कार किया। उनके दत्तक पुत्र को अगला राजा स्वीकार ना करके महाराज पर दबाव बनाया कि वे झांसी को अंग्रेजों के हवाले कर दें। इस घटना से उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया और 21 नवम्बर, 1853 को उन्होंने अंतिम श्‍वांस ली।
इस दु:ख और संकट की घड़ी में भी रानी साहिब ने हिम्मत नहीं हारी। फिरंगियों को लगा कि अब तो झांसी उनकी हुई। पहले तो उन लोगों ने रानी साहिब को तरह-तरह के प्रलोभन दिये और जब वे नहीं मानीं तब अंग्रेजों ने उन पर किला छोड़ने का दबाव बनाया।
भारतमाता के चरणों की धूल को अपने मस्तक पर लगाते हुए रानी साहिब ने गर्जना की- मैं अपनी झांसी नहीं दूँगी।
रानी साहिब के मजबूत इरादे और राष्ट्रभक्ति को देख उन लोगों ने सीधा आक्रमण करने की योजना बनाई  । इधर झांसी भी अब रण के लिए तैयार थी। समस्त प्रजा को अपनी रानी साहिब पर अटूट विश्‍वास था। रघुनाथ सिंह, तात्या टोपे, कर्मा, गौस खान, भील समाज आदि अनेक वीर योद्धा मातृभूमि के लिए लड़ने हेतु प्रस्तुत थे।
इस युद्ध में इन वीर योद्धाओं के साथ झांसी की वीरांगनाओं की टुकड़ी ने भी मोर्चा संभाला। गौस खान साहिब उस जमाने के विख्यात तोपची थे और अपनी सबसे बड़ी तोप ‘कड़क बिजली’ से उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिये थे।
इस भीषण युद्ध में सैन्य बल से बहुत कम होने के बावजूद भी कुशल रणनीति और आत्मबल के कारण रानी साहिब ने विजय प्राप्त की। किन्तु इस युद्ध में उन्होंने कई वीर योद्धाओं को खो दिया जिनमें से एक गौस खान साहिब भी थे। उनका बलिदान राष्ट्र के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया।
इतनी करारी हार के बाद ये धूर्त फिरंगी चुप नहीं बैठने वाले थे। उन्होंने बड़ी योजना के तहत झांसी के आस पास के राज्यों को हड़पना प्रारम्भ कर दिया। कुछ स्वार्थी, सत्ता लोभी राजाओं ने अपनी जान बचाने के लिए दुश्मनों से हाथ मिला लिया। आजीवन उनकी चाटुकारिता और दासता स्वीकार कर ली।
अब यहीं से शुरू होती है भारतवर्ष के इतिहास की वह स्वर्णिम गौरवगाथा जिसे ‘1857 की क्रान्ति’ के नाम से जाना जाता है। धूर्त फिरंगियों के विरुद्ध यह पहला स्वतंत्रता संग्राम था। पूरा भारतवर्ष त्राहिमाम्-त्राहिमाम् कर रहा था। क्रान्ति की ज्वाला सभी के हृदय में धधक रही थी। बंगाल रेजिमेन्ट के वीर सेनानी श्री मंगल पाण्डे ने अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा खड़ा कर दिया और परिणामस्वरूप उन्हें फांसी दे दी गर्इ।
इससे पूरा भारतवर्ष आक्रोशित हो उठा। समय की माँग थी कि सब एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ें और भारतमाता को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त करवाएँ। ‘फूट डालो और राज करो’ वाली रणनीति के तहत अंग्रेज राज्य जीतते जा रहे थे।
अकेला झांसी ही एक राज्य था जिसने र्इस्ट इंडिया कम्पनी की जड़ें हिलाकर रख दी थी। महारानी लक्ष्मीबार्इ के नाममात्र से अंग्रेज थर-थर कांप उठते थे। परन्तु वो दिन आ ही गया जब एक बार पुन: विशाल सैन्य बल से अंग्रेजों ने झांसी किले पर कूँच किया।
माँ भवानी को याद कर रानी साहिब ने मानो स्वयं ही रणचण्डी का अवतार धर लिया। उनके मुख मण्डल पर तेज, आँखों में आत्मविश्‍वास, भ्ाुजाओं में पर्वत को भी चूर कर देने का बल और राष्ट्रभक्ति का रंग कुछ इस कदर चढ़ा था कि देखने वाला देखता रह जाए।
रानी साहिब ने युद्ध से पूर्व अपने सैनिकों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा- ‘‘हे वीर सैनिकों! हम दुश्मन से भले ही सैन्य बल में कम हैं, परन्तु हमारा आत्मबल उनसे कर्इ गुणा अधिक है। विजय अवश्य हमारी ही होगी। हर-हर महादेव…’’
धूर्त फिरंगी पूरी तैयारी के साथ आए थे। उनकी सेना प्राचीन व आधुनिक दोनों ही हथियारों से लैश थी। बाहरी संकट से निपटना तो आसान था परन्तु झांसी के गर्भ में एक विषैला सर्प पल रहा था। ‘राव दुल्हाजु’ नामक एक गद्दार ने रानी साहिब की सारी योजनाएँ जाकर दुश्मनों को पहले ही बता दी थी। इतना ही नहीं उसने तो चंद रुपयों की खातिर किले की कमजोर दीवार का भी भेद अंग्रेजों को दे दिया।
किले में रानी साहिब ने प्रजा को भी आश्रय दिया था और उनकी सुरक्षा दृष्टि से उन्होंने अपनी एक सैन्य टुकड़ी को उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाने का आदेश दिया। रानी साहिब वीरता की प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने पुत्र दामोदर को अपनी पीठ पर बाँध लिया। घोड़े की वल्गा को अपने दाँतों में भींच लिया और दोनों हाथों में तलवार धारण कर लिया। मानों साक्षात् माँ दुर्गा दुष्टों के संधार हेतु प्रस्तुत हों।
अंग्रेजों को काटते-चीरते बड़े वेग से रानी साहिब आगे बढ़ रही थी। उनके समक्ष देशद्रोही राव दुल्हाजू बाधा बनकर खड़ा था। वो उन्हें ललकार रहा था। तलवार के एक ही वार से रानी साहब ने उस गद्दार का सिर कलम कर दिया। किन्तु वे चारों ओर से अंग्रेजों की सेना से घिरी हुई थी। कोई अन्य विकल्प शेष न था इसलिए रानी साहिब ने एक कठोर निर्णय लिया।
उन्होंने पुत्र दामोदर को कसकर बाँध लिया और तीव्र गति से घोड़ा दौड़ाते हुए, हर-हर महादेव के जयघोष के साथ किले की ऊँची दीवार से छलाँग लगा दी। फिरंगी उनके पीछे भागे तो जरूर पर किसी में भी वहाँ से कूदने का साहस न था। रानी साहिब को संरक्षण देते हुए वीर योद्धा कर्मा ने अंग्रेजों को काफी देर तक किले में ही उलझाए रखा और अंतत: वीरगति को प्राप्त हुए।
आगे घनघोर जंगल था, जहाँ रानी साहिब की भेंट वीरांगना झलकारी बाई से हुई। वे हू-ब-हू महारानी जैसी दिखती थी। पीछे आ रही अंग्रेजी सेना को झलकारी बाई ने भ्रमित कर अपने साथ उलझा लिया। इधर रानी साहिब कालपी की ओर प्रस्थान करती हैं और उधर अंग्रेजों से वीरतापूर्वक लड़ते-लड़ते झलकारी बाई शहीद हो जाती हैं। मूर्ख अंग्रेज ये सोचकर जश्‍न मनाने लगते हैं कि वे महारानी लक्ष्मीबाई की हत्या करने में सफल हुए।
कालपी में रानी साहिब की भेंट तात्या टोपे, राव साहब और ओरछा की वीरांगना महारानी लड़ई सरकार से होती है। वे अब ग्वालियर नरेश से सहायता माँगने के लिए प्रस्थान करते हैं क्योंकि ग्वालियर कालपी से निकट भी था और समृद्धशाली भी। परन्तु ग्वालियर नरेश जियाजी राव सिंधिया लोभी, स्वार्थी और सत्ताप्रेमी था। उसके द्वारा निर्वाचित एक दीवान दिनकर राव भी उसी की तरह अंग्रेजों का चाटुकार था। उसी ने महारानी के जीवित होने और ग्वालियर से सहायता माँगने की खबर अंग्रेजों तक पहुँचवा दी। इतना ही नहीं उसने तो ओरछा की रानी लड़र्इ सरकार की भी हत्या करवा दी क्योंकि वे उसका भेद जान गयी थी।
अंग्रेजों ने एक बार पुन: अपनी कुत्सिक मानसिकता का परिचय देते हुए ग्वालियर नरेश को प्रलोभन देकर अपने साथ मिला लिया। ग्वालियर नरेश ने युद्ध की घोषणा की परन्तु वहाँ की राष्ट्रभक्त प्रजा व कुछ सैनिकों ने भी राजा के निर्णय पर खेद जताया और रानी साहिब से जा मिले। वे भी ‘पूर्ण स्वराज’ के इच्छुक थे। छोटा सा युद्ध हुआ जिसमें ग्वालियर नरेश की हार हुर्इ और रानी साहिब ने उसे जीवित ही छोड़ दिया। ग्वालियर पर अब पेशवा राव साहिब का आधिपत्य था। परन्तु वे तो पद मिलने के बाद यह भ्ाूल ही गए कि उन्हें अंग्रेजों से लड़कर भारतमाता को आजाद करवाना है। वे केवल नृत्य-नाटिका, संगीत एवं मद्यपान में अपना पूरा समय नष्ट करते। समय बीतता जा रहा था, रानी साहिब भीतर से अशाांत व विचलित रहती थी। वे नित रणनीतियाँ बनाती और सैन्याभ्यास करवातीं।
वहाँ रहते हुए एक दिन उन्हें बाबा गंगादास जी के बारे में ज्ञात हुआ। वे उनके पिता के आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने उनसे मिलने की उत्सुक्ता जतार्इ। उनका आश्रम ‘बाबा गंगादास की बड़ी शाला’ के नाम से आज भी सुविख्यात है। बाबाजी से भेंट करते ही रानी साहिब की चिंताएँ व शँकाएँ भी दूर हो गयी। वे ‘पूर्ण स्वराज’ के महान् उद्देश्य के प्रति और अधिक दृढ़ व संकल्पबद्ध हो गयी।
18 जून 1858 का दिन एक निर्णायक दिन था। धूर्त फिरंगियों और महारानी लक्ष्मीबार्इ के बीच अंतिम महासंग्राम का दिन था।
बिगुल और शंखनाद से रणभ्ाूमि गूँज रही थी। हर-हर महादेव और भारतमाता की जयकार से युद्ध भ्ाूमि थरथ्रा उठी। रानी साहिब का एक-एक योद्धा सौ पर भारी पड़ रहा था। चारों तरफ रक्त की नदियाँ बह रही थी। साक्षात् रणचण्डी देवी ही दुष्टों का संहार कर रही थी। फिरंगियों के छक्के छूट गए।
किन्तु नियति की कुछ और ही माँग थी। गद्दार ग्वालियर नरेश जियाजी राव सिंधिया इस युद्ध में अंग्रेजों के पक्ष से सम्मिलित हो गया। अपने राजा को समक्ष पाकर बागी सैनिकों ने हथियार डाल दिये। इस धर्म युद्ध में रानी साहिब की सहायता हेतु ‘बाबा गंगादास की शाला’ में संतों ने भी भाग लिया और अंग्रेजी फौज में मारकाट मचा दी। अनगिनत युद्ध इस स्वाभिमान की लड़ार्इ में शहीद हो गए।
रणभूमि से मिल रही सूचनानुसार बाबा गंगादास को पूर्वाभास हो गया कि रानी साहिब की शहादत किसी भी क्षण हो सकती है। उन्होंने अपने विश्‍वस्त साधुओं की प्रशस्त्र टुकड़ी तथा रानी साहिब के एक सरदार के साथ युवराज दामोदर राव को सुरक्षित स्थान पर पहुँवा दिया।
युद्ध अब भयावह रूप ले चुका था। आकाश में गिद्ध उड़ रहे थे और चहूँ ओर लाशें बिछी हुई थी। जनरल ह्यूरोज़ धीरे-धीरे रानी साहिब की तरफ बढ़ रहा था। शेरनी अब गीदड़ों से घिरी हुई थी। कायर फिरंगियों ने रानी साहिब पर पीछे से प्रहार किया और ह्यूरोज ने उन पर गोलियाँ बरसा दी। वे अचेत हो गयी।
बबा गंगादास ने अपनी वीर संतों को पहले ही यह सूचित कर दिया था कि रानी साहिब के पवित्र देह को अंग्रेज स्पर्श भी न कर सके। लिहाजा उनके अंतिम क्षण में साधुओं की टोली ने उन्हें सुरक्षित आश्रम तक पहुँचा दिया। इस महासंग्राम रूपी यज्ञ में कुल 745 वीर संतों ने अपनी आहुति दे दी।
बाबा गंगादास जी ने रानी साहिब को गंगाजल पिलाया। उनकी चेतना कुछ-कुछ वापस आ गयी थी। दर्द से पूरा शरीर पीला पड़ चुका था। उनके शरीर की चोटों से रक्त प्रवाहित होकर इस देश की माटी में सदा-सदा के लिए घुल गया। रानी साहिब ने अश्रुपुरित नेत्रों तथा भारी कंठ से कहा कि- ‘‘हे माँ! तेरी ये बेटी बस इतनी ही सेवा कर पायी।’’
मात्र 23 वर्ष की अल्पायु में ही रानी साहिब समस्त भारतवर्ष को जगाकर स्वयं चिर निद्रा में लीन हो गयी। आश्रम में लकड़ियों के अभाव के कारण बाबा गंगादासजी ने अपनी कुटिया तुड़वाकर चिता तैयार की और रानी सिाहब का अंतिम संस्कार कर दिया। बौखलाए अंग्रेजों को सिवाय राख के कुछ भी हासिल न हुआ किन्तु भारतवासियों के हृदय में क्रांति की अग्निशिखा पीढ़ियों तक धधक रही है।
– कोलकाता

जिंदल स्टेनलेस स्टील और बीसीएल के संरचनात्मक अधिरचना के लिए मिलाया हाथ

अखिल भारतीय स्तर पर कम्पनी  अगले दो साल में दो लाख एम टी स्टेनलेस स्टील की आपूर्ति करेगी

नयी दिल्ली : संरचनात्मक बुनियादी ढांचे के अनुप्रयोगों में अपने आगमन के उद्देश्य से, जिंदल स्टेनलेस ने आज रेल मंत्रालय के तहत भारत सरकार के ब्रेथवेट एंड कम्पनी लिमिटेड (बीसीएल) के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए, ताकि स्टेनलेस स्टील फुट-ओवर-ब्रिज (एफओबी), रोड-ओवर-ब्रिज (आरओबी) और नई दिल्ली में चल रहे अंतर्राष्ट्रीय रेलवे उपकरण प्रदर्शनी (आईआरईई) के माध्यम से यह और विस्तार पाए। यह समझौता ज्ञापन भारत के सबसे बड़े स्टेनलेस स्टील निर्माता, जिंदल स्टेनलेस और भारतीय रेलवे के विश्वसनीय निर्माण विशेषज्ञ, बीसीएल की विशेषज्ञता का समन्वय करके देश में विश्व स्तरीय रेलवे बुनियादी ढांचे की दृष्टि को विकसित करने की ओर अग्रसर है। यह परस्पर सहयोग करार उचित समय पर हुआ, रेलवे अभी वर्तमान में बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में है।भारतीय रेलवे जिंदल स्टेनलेस के लिए एक प्रमुख ग्राहक बनी हुई है, कंपनी के पास रेलवे वैगन सेगमेंट में 70% और कोच सेगमेंट में 60% की हिस्सेदारी है।
इस सहयोग पर टिप्पणी करते हुए , निदेशक, जिंदल स्टेनलेस, श्री विजय शर्मा ने कहा , “हम बीसीएल के साथ इस सहयोग का हिस्सा बनकर खुश हैं , जो संरचनात्मक बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में जिंदल स्टेनलेस के योगदान को दर्शाता है |बीसीएल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, , श्री यतीश कुमार ने कहा, ”  “यह गतिशील संरचनात्मक बुनियादी ढांचे की स्थापना के लिए जिंदल स्टेनलेस के साथ सहयोग करने का एक रोमांचक अवसर है। बीसीएल टिकाऊ और विश्वसनीय कच्चे माल के माध्यम से पुलों और संबंधित बुनियादी ढांचे के जीवन चक्र में सुधार करने के लिए समर्पित है, जिससे किसी भी अप्रिय घटनाओं को कम किया जा सके। स्टेनलेस स्टील एक निर्विवाद विकल्प के रूप में उभरता है। बीसीएल में संरचनात्मक निर्माण और स्टेनलेस स्टील निर्माण से जुड़े वैगनों के विभिन्न मॉडलों के निर्माण में विशेषज्ञता है। हम जिंदल स्टेनलेस से विशेष गुणवत्ता वाले उत्पादों और तकनीकी सहायता द्वारा समर्थित दीर्घकालिक सहयोग के लिए तत्पर हैं। ” जंग प्रतिरोध, उच्च शक्ति-से-भार अनुपात, और कम से कम रखरखाव की आवश्यकता के अपने अंतर्निहित लाभों के कारण, स्टेनलेस स्टील बुनियादी ढांचे के विकास के लिए पसंदीदा संरचनात्मक कच्चे माल के रूप में प्रमुखता प्राप्त कर रहा है

दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्ती में 10 करोड़ दीये बनते हैं, कारोबार 1000 करोड़ रुपये

मुम्बई : 1932 में गुजरात से विस्थापित होकर आए कुम्हार परिवारों ने दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्ती धारावी के कुम्हारवाड़ा को सबसे बड़ा दीयों का बाजार बना दिया है। 12.5 एकड़ में फैले इस इलाके में एक हजार परिवार मिट्टी के दीये, बरतन और सजावट की दूसरी चीजें बनाते हैं। इन दिनों यहां दिवाली की खरीदी के लिए बड़ी संख्या में व्यापारी गोवा, शोलापुर, नागपुर, नासिक, सूरत और बड़ौदा से आ रहे हैं। सालभर में यहां करीब 10 करोड़ दीये बनाए जाते हैं। इसके चलते कुम्हारवाड़ा को नया नाम भी मिला है-पॉटरी विलेज। कुम्हारवाड़ा के सबसे बड़े दीया ट्रेडर नरोत्तम टांक बताते हैं ‘हम यहां बने डिजाइनर दीयों को अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और खाड़ी देशों तक भेजते हैं। इनकी ऑनलाइन बिक्री भी होने लगी है।’ इतना ही नहीं, स्कूल-कॉलेज छात्र भी इन कारीगरों से हुनर सीखने आ रहे हैं। प्रशिक्षण के लिए क्लासेस लगने लगी हैं।
हर परिवार साल में एक लाख दीए बनाता है
धारावी प्रजापति सहकारी उत्पादक संघ के अध्यक्ष कमलेश चित्रोदा बताते हैं कि यहां हर कुम्हार परिवार सालभर में औसतन 1 लाख दीये बनाता है। इससे महीने में 15 से 20 हजार रुपए की आय होती है। हर साल यहां से 8 से 10 करोड़ दीये बिकते हैं। करीब 50 लाख दीये विदेश जाते हैं। यहां दीयों, पॉटरी और अन्य सजावटी सामान का सालाना व्यापार 1000 करोड़ रुपए का है।
आर्किटेक्ट, इंटीरियर डेकोरेटर यहां पॉटरी आर्ट सीखते हैं
ऐसी ही क्लास चलाने वाले युसूफ गलवानी बताते हैं कि आर्किटेक्ट, इंटीरियर डेकोरेटर और पॉटरी आर्टिस्ट काम सीखने आ रहे हैं। इनके लिए इन दिनों हम छह महीने की क्लासेस चला रहे हैं, जिसमें फीस 7000 रुपये महीना तक है। धारावी प्रजापति सहकारी उत्पादक संघ के उपाध्यक्ष देवजी चित्रोदा को कुम्हारवाड़ा इन दिनों परिवर्तन की ओर बढ़ता नजर आता है। वे बताते हैं ‘पर्यावरण को ध्यान में रख यहां जैव ईंधन से चलने वाली बिना धुएं की 7 भट्टियां लग भी चुकी हैं। पुरुष सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक चाक (पहिया) चलाते हैं और महिलाएं मिट्टी का गोला बनाने और दीयों की सजावट कर उनकी मदद करती हैं। रोजाना एक परिवार 2 से 5 हजार तक दीए बना लेता है। स्कूल-कॉलेजों से लौटकर बच्चे भी हाथ बंटाते हैं। भट्टियों की देखरेख, दीयों और पॉट्स को गेरू में रंगना और चित्रकारी का काम नई पीढ़ी करती है। वेशॉवर फाउंडेशन यहां बने डिजाइनर दीये बड़ी कंपनियों तक पहुंचाने का काम कर रहा है।

दिवाली स्पेशल पोटली तथा बटुआ संग्रह

हस्तशिल्प ऐसी चीज है जो आपके लुक को बदल सकती है और बात जब फैशन की हो तो कपड़ों के साथ एक्सेसरीज का सही तालमेल भी जरूरी है। मसलन आपकी कांजीवरम या बनारसी साड़ी या सूट के साथ पोटली या जीन्स के साथ जूट बैग। शुभादि आपके लिए लायी है दिवाली के खास मौके पर पोटली, पाउच व बटुआ संग्रह। आपने अगर शुभ सृजन सम्पर्क में पंजीकरण करवाया है या आप शुभजिता के विज्ञापनदाता हैं तो आपके उत्पाद हम यहाँ फीचर करेंगे –

कॉटन जूट ट्रेंडी बैग। रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए परफेक्ट। 80 रुपये प्रति पीस
ट्रेंडी मोबाइल कवर, कीमत 20 रुपये
कॉटन जूट मोबाइल कवर, कीमत – प्रति पीस 30 रुपये
ट्रेंडी पोटली, कीमत 50 रुपये
पोटली, कीमत -50 रुपये
नेट, बनारसी, जूट पोटली, कीमत – 50 रुपये
ट्रेंडी छोटा पर्स, कीमत 50 रुपये
खूबसूरत जरी पोटली, कीमत – 50 रुपये
स्लिंग बैग – कीमत – 70 रुपये
कढ़ाई लेस जूट पर्स, कीमत – 75 रुपये
नेट वाला पर्स, कीमत – 80 रुपये

आदि क्रिएशन

सम्पर्क करें – श्रुति तिवारी

9831022689

(प्रायोजित)