Friday, April 24, 2026
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पुराने टायर से मेज और पुरानी मेज से अलमारी, कबाड़ से बनाते हैं ट्रेंडी फर्नीचर!

हैदराबाद : आपके लिए जो पुरानी घिसी-पिटी अलमारी है, उसमें जेमीयन को टेबल या फिर सोफा नज़र आता है, तो वहीं हो सकता है कि वो पुराने कबाड़े में पड़े सोफे को अपसाइकिल करके कंप्यूटर टेबल का रूप दे दें। अगर ज़िंदगी में आप समाज के लिए कुछ भी अच्छा कर रहें हैं तो ‘थोड़ा भी बहुत है।’ इसलिए यह मत सोचिए कि ‘सिर्फ मेरे एक पॉलिथीन इस्तेमाल न करने से क्या हो जायेगा?’ आपका हर छोटा कदम एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है क्योंकि बून्द-बून्द से ही तो सागर भरता है। इस सोच को अपनी ज़िन्दगी का फलसफा बनाकर हैदराबाद के एक आर्किटेक्ट और इंटीरियर डिज़ाइनर पिछले कई सालों से अपने हर एक प्रोजेक्ट में कला के नए रंग जोड़ रहे हैं।

41 वर्षीय जेमीयन राव साल 1998 से आर्किटेक्चर का काम कर रहे हैं। लेकिन उनके लिए उनका प्रोफेशन सिर्फ़ पैसे कमाने का ज़रिया नहीं है, बल्कि यह उनका पैशन है। शायद इसलिए ही वह अपने हर एक प्रोजेक्ट को बहुत ही रचनातमक और कलात्मक ढंग से करते हैं।

जेमीयन ने बताया “जब मैंने काम करना शुरू किया था तब ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज जैसे शब्द कम ही सुनने को मिलते थे। इसलिए पर्यावरण संरक्षण या फिर सस्टेनेबल लाइफ जैसे सिद्धांतों पर भी हम ज़्यादा बात नहीं करते थे। पर जैसे-जैसे काम बढ़ा और बड़े-बड़े प्रोजेक्ट किये तो मुझे एहसास हुआ कि हम ‘यूज़ एंड थ्रो’ के वातावरण में जी रहे हैं। हम अपनी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा खरीदते हैं और इससे हम सिर्फ़ वेस्ट बढ़ा रहे हैं।”

इसलिए जेमीयन ने अपने प्रोजेक्ट्स को बहुत अलग ढंग और नज़रिए से करना शुरू किया। उन्होंने ऐसा कुछ करने की पहल की जिससे कि समाज पर एक सकारात्मक प्रभाव हो। अपने हर एक प्रोजेक्ट में उनकी एक ही कोशिश रहती है – कम से कम कचरा उत्पन्न करना। वह जिन भी घरों में, ऑफिस में या फिर किसी अन्य साईट पर कोई प्रोजेक्ट करते हैं, वहां पहले से ही जो भी चीज़ें उनके क्लाइंट के पास उपलब्ध होती हैं, उसे ही रीसायकल या फिर अपसाइकिल करके  वह एक नया रूप और रंग देते हैं। वे आगे बताते हैं, “जब भी मेरे पास कोई ग्राहक आता है तो मैं उन्हें सबसे पहले पूछता हूँ कि कौन-सी चीज़ें वे ‘रिटायर’ करने वाले हैं। सबसे पहले मैं जाकर वो चीज़ें देखता हूँ, बहुत बार लोग पुराना फर्नीचर, कोई व्हीकल आदि कबाड़ में देने वाले होते हैं। पर मेरे काम की चीज़ें मुझे कबाड़ में ही मिलती हैं। रॉ मटेरियल के लिए मेरा सबसे बड़ा स्त्रोत कबाड़ी वाला ही है।”

आपके लिए जो पुरानी घिसी-पिटी अलमारी है, उसमें जेमीयन को टेबल या फिर सोफा नज़र आता है। तो वहीं हो सकता है कि वो पुराने कबाड़े में पड़े सोफे को अपसाइकिल करके कंप्यूटर टेबल का रूप दे दें। पुराने टायर की मेज बन जाती है तो खाली बोतलों से सिर्फ़ प्लांटर्स ही नहीं लैम्प भी बनाते हैं। रीसाइक्लिंग या फिर अपसाइकिलिंग से उनका मतलब साफ़ है – “किसी भी प्रोडक्ट की ज़िंदगी बढ़ाना।”

हैदराबाद के सिकंदराबाद में सैनिकपुरी इलाके में स्थित उनका अपना ऑफिस- JNRO स्टूडियो, इस ‘बेस्ट आउट ऑफ़ वेस्ट’ का सबसे अच्छा उदाहरण है। उनके ऑफिस में सभी मेज और कुर्सियाँ, पुराने कबाड़ में पड़े लकड़ी, ग्लास, मेटल आदि को इस्तेमाल करके बनायीं गयीं हैं। प्लंबिंग पाइप्स को खूबसूरत लैंप्स का रूप दिया गया है, तो प्लाईवुड के बचे-खुचे टुकड़ों को इकट्ठा करके बर्ड-हाउस बनाया गया है। उनके दफ़्तर की छत बांस और एक ट्रांसपेरेंट ऐक्रेलिक शीट का इस्तेमाल करने बनायी गयी है। इससे उनके ऑफिस में सूरज की रौशनी ख़ूब आती है और उन्हें कोई एक्स्ट्रा लाइट ऑन करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। इतना ही नहीं, जेमीयन का ऑफिस इको-फ्रेंडली कॉन्सेप्ट पर भी खरा उतरता है। उनके ऑफिस में आपको सोलर पैनल और रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी मिल जाएंगे।

“मैं अपने ऑफिस को क्लाइंट के लिए उदाहरण की तरह इस्तेमाल करता हूँ। पर फिर भी इस तरह की एप्रोच हर किसी को समझ नहीं आती। हर एक ग्राहक को यह समझाना आसान नहीं इसलिए मैं सिर्फ़ ऐसे ही प्रोजेक्ट अपने हाथ में लेता हूँ, जहाँ मैं समाज और पर्यावरण के लिए भी कुछ कर पाऊं,” उन्होंने आगे कहा। अपने ऑफिस के अलावा उन्होंने अपने एक और ख़ास प्रोजेक्ट के बारे में बताया। इसमें उन्होंने एक कार गराज को होम ऑफिस में तब्दील किया है। वह बताते हैं कि उस गराज में जो भी पुराना, इस्तेमाल में न आने वाला सामान था, वो सभी कुछ उन्होंने इस्तेमाल कर लिया। पुराने फर्नीचर से लेकर बैलगाड़ी के पहिये तक, उन्होंने हर एक चीज़ को एक नया रूप देकर इस साईट पर लगाया। बैलगाड़ी का एक पहिया, एंट्रेंस पर डेकोर के लिए इस्तेमाल हुआ है तो दूसरे से कॉफ़ी टेबल बनायी गयी है। इसके अलावा अन्य बचे हुए भाग से हैंगिंग लाइट्स बनाई गयी हैं।

ट्रेवलिंग और फोटोग्राफी करने वाले जेमीयन एक सर्टिफाइड ड्रोन पायलट भी हैं। वह सफलतापूर्वक अपने काम में ड्रोन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। जेमीयन के मुताबिक ड्रोन टेक्नोलॉजी को लेकर अभी भी हमारे यहाँ कई सारे मिथक हैं। यह क्षेत्र अभी भी भारत में ज़्यादा एक्स्प्लोर नहीं हुआ है। पर ड्रोन टेक्नोलॉजी उनके काम में काफ़ी मददगार साबित हो रही है। अंत में जेमीयन सिर्फ़ इतना कहते हैं कि बस एक बार अपने घर में नज़र घुमाइए और परखिये कि कितना सामान आप वाकई में इस्तेमाल कर रहे हैं। और बाकी कितना कुछ बस यूँ ही पड़ा हुआ है। लेकिन फिर भी हम और चीज़ें लाते जा रहे हैं, खरीदें जा रहे हैं।“मैं सिर्फ़ यही कहूँगा कि मैं ‘डी-क्लटर’ में विश्वास रखता हूँ यानी कि हर चीज़ कम से कम में करना। अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को सिर्फ़ ज़रूरी और उचित चीजों में ही पूरा कर लेना। अपने सभी प्रोजेक्ट्स में रीसाइकिलिंग या अपसाइकिलिंग करके कम से कम कचरा करना। क्योंकि जो दूसरों को वेस्ट दिखता है, उसमें मैं एक नई ज़िंदगी तलाशता हूँ।”

(साभार – द बेटर इंडिया)

 ब्रिटिश कम्पनी प्लास्टिक कचरे से ईंधन बनाएगी, हाइड्रोजन कारों में होगा इस्तेमाल

 

ब्रिटेन से हर साल 50 लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा निकलता है, जिसमें केवल एक तिहाई ही रिसाइकिल होता है

प्लास्टिक कचरे को 1800° फैरेनहाइट तापमान पर गर्म कर सिथेंटिक गैस का उत्पादन किया जाएगा

सिथेंटिक गैस से हाइड्रोजन को अलग कर इसका इस्तेमाल ईंधन के रूप में होगा

सिथेंटिक गैस हाइड्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनो-ऑक्साइड का मिश्रण है

लन्दन : ब्रिटेन से हर साल लगभग 50 लाख मेट्रिक टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। इनमें से एक तिहाई से भी कम कचरा रिसाइकिल नहीं हो पाता। ब्रिटिश कम्पनी पावर हाउस एनर्जी का कहना है कि वह इन कचरों से ईंधन बनाएगी, जिसका इस्तेमाल हाइड्रोजन कारों के लिए होगा। पावर हाउस एनर्जी ने एक ऐसी प्रक्रिया विकसित की है जिसमें यह अपशिष्ट पदार्थों के छोटे टुकड़े किए जाते हैं और फिर इसे करीब 1800 डिग्री फैरेनहाइट (815° सेल्सियस) तापमान पर गर्म करते हैं। इससे सिंथेटिक गैस का उत्पादन होता है, जो हाइड्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनो-ऑक्साइड का मिश्रण है। कम्पनी के मुताबिक, सिंथेटिक गैस को जलाकर बिजली का उत्पादन किया जा सकता है या इससे हाइड्रोजन अलग कर वाहनों में ईंधन के रूप में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। हाइड्रोजन ईंधन सेल वाले वाहन इलेक्ट्रिक मोटर्स से संचालित होते हैं। जब तक सेल को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की आपूर्ति मिलती रहती है, यह बिजली पैदा करता रहता है।

हाइड्रोजन कार के फायदे –  बैटरी से चलने वाली कारों की तुलना में हाइड्रोजन ईंधन वाली कारों के दो फायदे हैं। पहला, कार को लंबी दूरी तक ड्राइव किया जा सकता है। दूसरा, ईंधन भरने में कुछ ही समय लगता हैं, जबकि बैटरी को चार्ज करने में घंटों लगते हैं।

जापान में 2025 तक 2 लाख हाइड्रोजन कारें होंगी – पावर हाउस एनर्जी के सीईओ ने कहा कि ट्रांसपोर्ट के लिए हाइड्रोजन बेहतर ईंधन है। बड़े ट्रकों और बसों के लिए भविष्य में ऐसी ही ईंधन का इस्तेमाल किया जाएगा। फिलहाल, सबसे बड़ी समस्या यह है कि हाइड्रोजन फ्यूल स्टेशन अभी बहुत कम हैं और काफी दूर-दूर हैं। ब्रिटेन में ऐसे ईंधन स्टेशन 20 से भी कम हैं। जापान का लक्ष्य है कि 2025 तक वहां की सड़कों पर दो लाख हाइड्रोजन कारें होंगी। वहां 320 फ्यूल स्टेशन लगाए जाएंगे।

कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी – अमेरिका की गैर-लाभकारी संस्था यूनियन ऑफ कंसर्नड साइंटिस्ट्स के अनुसार, हाइड्रोजन कारे पारंपरिक वाहनों की तुलना में कार्बन उत्सर्जन में 30% से अधिक की कमी कर सकती हैं। पावर हाउस एनर्जी की ब्रिटेन में 11 जगहों पर प्लास्टिक कचरे से ईंधन बनाने की प्रक्रिया शुरू करने की योजना है। कम्पनी के मुताबिक, हाइड्रोजन ईंधन के प्रयोग से कार्बन उत्सर्जन में काफी कमी आएगी।

 इटालियन गोल्डन सेंड अवॉर्ड के लिए चुने गए सुदर्शन पटनायक

नयी दिल्ली : कलाकार सुदर्शन पटनायक को इटालियन गोल्डन सेंड अवार्ड-2019 के लिए चयनित किया गया है। उन्हें यह सम्मान इटली में 13 से 18 नवंबर के बीच होने वाले इंटरनेशनल स्कोराना सेंड नेटिविटी फेस्ट के दौरान दिया जाएगा। कार्यक्रम में आठ रेत से कलाकृतियां बनाने वाले कलाकार शिरकत करेंगे। प्रोमुओवी स्कॉर्ना के अध्यक्ष विटो माराशियो ने सुदर्शन को उत्सव में भाग लेने का आमंत्रण भेजा है। सुदर्शन ने कहा, इस कार्यक्रम का हिस्सा बनकर मैं खुद को गौरवांवित महसूस कर रहा हूं।

पदमश्री से सम्मानित है पटनायक

पटनायक देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पदमश्री से 2014 में नवाजे जा चुके हैं। 2017 में पटनायक ने रूस की राजधानी मॉस्को में हुए 10वें वर्ल्ड सेंड स्कल्पचर चैपिंयनशिप में   स्वर्ण पदक जीता था। दुनियाभर में आयोजित 60 से अधिक सेंड आर्ट कॉम्पीटिशन में वे हिस्सा ले चुके हैं।

अब कीमत पर कम, लुक पर ज्यादा ध्यान दे रहे  कार खरीदने वाले 

नयी दिल्ली : समय के साथ कार खरीदने वालों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है। वे अब कीमत को लेकर फिक्रमंद कम दिख रहे हैं। इसकी जगह कार के लुक्स और स्टाइल पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। ग्लोबल कंज्यूमर एडवाइजरी फर्म जेडी पावर के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।

मॉडल चुनने में टेक्नोलॉजी जैसे पहलू भी अहम

रिपोर्ट के मुताबिक ओवरऑल सेल्स सेटिस्फेक्शन में ह्युंडई पहले स्थान है। इसके बाद महिंद्रा एंड महिंद्रा और टोयोटा का क्रम है। इन्हें 1,000 अंक में से क्रमश: 873, 872 और 873 अंक मिले। जेडी पावर के सेल्स सेटिस्फेक्शन इंडेक्स में इस साल कार खरीदने वालों ने मॉडल चुनते वक्त बाहरी और अंदरूनी लुक को अधिक महत्व दिया। यह पिछले साल की तुलना में 9% अधिक है। इसके अलावा मॉडल चुनने में परफॉर्मेंस-रिलायबिलिटी के साथ-साथ टेक्नोलॉजी जैसे पहलुओं की भी अहम भूमिका रही, जो पिछले साल की तुलना में क्रमश: 7% और 5% अधिक है। वाहन की कीमत, कर्ज हासिल करने की क्षमता और ईएमआई के महत्व में कमी आई है। इसमें पिछले साल के मुकाबले 4% की गिरावट देखने को मिली है। हालांकि ग्राहकों ने माना कि पिछले 3 साल में खासकर छोटी कारों की कीमतें बढ़ी हैं। यह पिछले साल की तुलना में 5% और 2017 की तुलना में 11% अधिक हैं। छोटी कारों के सेगमेंट में कीमत 2017 की तुलना में 9% अधिक है। जबकि एसयूवी सेगमेंट में महज 3% इजाफा हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे ग्राहक जिनकी मासिक आमदनी 75,000 रुपए से अधिक है कार खरीदने वाले कुल ग्राहकों में उनकी संख्या 33% रही। यह पिछले दो साल में 15% बढ़ी है। वर्ष 2017 में इसका आँकड़ा 18% था। जहां ग्राहक 2017 में औसतन 18 महीनों में गाड़ी की कीमत चुका रहे थे। अब वह 15 महीनों में गाड़ी की कीमत चुकाने में सक्षम हैं।

नयी लॉन्च होने वाली गाड़ियों को हाथोंहाथ ले रहे ग्राहक

एमजी मोटर्स की 27 जून को लॉन्च एसयूवी हेक्टर की मांग इतना अधिक थी कि कंपनी को 18 जुलाई को ही बुकिंग पर रोक लगानी पड़ी। 29 सितंबर को फिर से बुकिंग शुरू होने के बाद मात्र 10 दिन में ही 8,000 से ज्यादा हेक्टर की बुकिंग हो चुकी थी। इसका वेटिंग पीरियड बढ़कर 10 महीने तक पहुंच चुका है। जुलाई से सितंबर के बीच 6,116 हेक्टर बिक चुकी हैं। इसी तरह, किया मोटर्स ने 22 अगस्त को सेल्टोस लॉन्च की थी। इसकी बुकिंग 50,000 यूनिट के पार चली गई है। वेटिंग पीरियड बढ़कर छह हफ्तों से अधिक हो गया है। कंपनी अब तक 14,000 से ज्यादा सेल्टोस बेच चुकी है।

जीडीपी में ऑटो उद्योग का योगदान घट सकता है

इस वित्त वर्ष में वाहन निर्माता कंपनियों का राजस्व 6% तक गिर सकता है। इससे देश के जीडीपी में ऑटो सेक्टर का योगदान घटकर 7% रह सकता है। पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में 7.5% था। अक्वाइट रेटिंग्स एंड रिसर्च ने यह अनुमान जताया है। इसके मुताबिक ऑटो उद्योग की कुल घरेलू बिक्री, जिसमें यात्री वाहन, कॉमर्शियल वाहन, दोपहिया और तिपाहिया वाहन शामिल हैं, इस साल 6-7% तक घट सकती है। पिछले वित्त वर्ष में 2.5 करोड़ वाहन बिके थे।

शादी करने जा रहे हैं तो अपने इन अधिकारों के बारे में जरूर जान लें

शादी दो दिलों के साथ ही दो परिवारों का भी मिलन है, इसलिए विवाह तय करते हुए ऐसे हर पहलू पर ध्यान देना आवश्यक है, जिससे व्यक्ति के साथ ही परिवार या समाज प्रभावित होता हो। विवाह तय करते समय कुछ बातों को ध्यान में रखा जाए तो बाद में पछतावे से बचा जा सकता है। वर्ष 1955 में जब हिंदू विवाह कानून बना तो वह उस समय के हिसाब से माकूल था। समय के साथ-साथ विवाह कानूनों में संशोधन होते रहे। अब समाज में स्त्री-पुरुष काफी हद तक बराबरी की स्थिति में हैं तो दोनों के लिए समान कानून हैं।

दहेज की परिभाषा

‘दहेज निषेध अधिनियम’ 1961 के अनुसार ‘दहेज’ वह है, जिसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चल-अचल संपत्ति, बहुमूल्य दस्तावेज, रुपए या सामान के रूप में एक पक्ष द्वारा दूसरे को विवाहपूर्व, विवाह के समय या बाद में दिया जाए, इस शर्त पर कि इसे न देने परविवाह नहीं हो सकेगा। यह सब वधू पक्ष यानी लड़की के पिता, रिश्तेदारों या जान-पहचान वालों द्वारा दिया जाए और इसमें किसी तरह की धमकी शामिल हो तो वर पक्ष पर वर्ष 1986 से निर्धारित कानून के तहत मुकदमा चलाया जाएगा। अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत इसके लिए पाँच वर्ष तक का जुर्माना (कम से कम 15,000) या उतना जितना कि दहेज मांगा गया, लागू होगा। अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत दहेज मांगना अपराध है, जिसकी सजा 6 महीने तक की हो सकती है। विवाह में दोनों पक्षों के रिश्तेदारों, घर वालों और मित्रों द्वारा उनकी मर्जी से दिए गए उपहार स्त्री धन हैं और इन पर केवल वधू का अधिकार है।

घरेलू हिंसा कानून

शादी के बाद एक परिवेश से दूसरे परिवेश में जाने पर लड़कियों के सामने कई समस्याएं आती हैं। कई बार उसके साथ घरेलू हिंसा की शिकायतें भी की जाती हैं। ऐसे में यह जानना भी अनिवार्य है कि घरेलू हिंसा वास्तव में क्या है और अगर नियमित मारपीट की जाती हो तो उसके लिए देश में बकायदा एक घरेलू हिंसा कानून 2005 है। इसके तहत हर स्त्री आती है, चाहे वह घर की बेटी-बहू, नानी-दादी, चाची, पत्नी, बुआ, काम वाली बाई…ही क्यों नहो।

इसकी धारा 3 कहती है कि शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, मौखिक और यौन हिंसा होने पर स्त्री सरकार द्वारा नियुक्त सुरक्षा अधिकारी (धारा4) के पास जाकर शिकायत कर सकती है। शिकायत न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास निचली अदालत में की जाती है, जहां वह खुद भी मुकदमा कर सकती है। अगर स्वयं ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं है तो वह सुरक्षा अधिकारी द्वारा ऐसी शिकायत दर्ज करवा सकती है।

विवाह पंजीकरण : विवाह अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत अब शादी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया है। इसके लिए ‘रजिस्ट्रार ऑफ मैरिज’ के यहां विवाह को रजिस्टर कराना पड़ता है। विवाह की रजिस्ट्री दोनों पक्षों के हित में है। इसके जरिए सरकार के पास पूरी जानकारी उपलब्ध हो जाती है, ताकि पता चल सके कि कब और कहां किसका विवाह हुआ था। दरअसल, इस रजिस्ट्रेशन से विवाह में होने वाली धोखाधड़ी से भी लोगों को बचाने का प्रयास किया गया है। मैरिज सर्टिफिकेट एक बड़ा साक्ष्य है। नौकरी पाने, विदेश जाने और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों में यह सर्टिफिकेट बहुत महत्वपूर्ण है।

अगर बात बिगड़ जाए… यदि किसी कारणवश पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग रहने लगते हैं तो एक पक्ष दूसरे पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत वैवाहिक संबंधों की वापसी के लिए मुकदमा कर सकता है। यदि स्थिति इतनी बुरी हो कि साथ रहना मुश्किल हो तो धारा 13 के तहत इन आधारों पर तलाक लिया जा सकता है – पति या पत्नी के रहते किसी तीसरे व्यक्ति से स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाने पर,  विवाह के पश्चात किसी एक पक्ष के शारीरिक और मानसिक क्रूरता करने पर, एक पक्ष दूसरे को लगातार दो वर्षों के लिए छोड़कर चला गया हो, यदि एक पक्ष ने अपने धर्म का त्याग कर किसी और धर्म का वरण कर लिया हो, एक पक्ष मानसिक तौर पर विक्षिप्त हो और यह पागलपन इस हद तक हो कि दूसरे का उसके साथ रहना ही मुश्किल हो, लाइलाज व संक्रामक रोग से ग्रस्त हो।

एनआरआई से शादी : ‘नॉन रेजिडेंट इंडियन’ यानी एनआरआई से विवाह करने के लिए कई बातों की जानकारी होना अनिवार्य है। अपने बुद्धि-विवेक से पता लगाया जाए कि व्यक्ति का वैवाहिक स्टेटस क्या है? क्या उसकी नौकरी वही है, जो उसने बताई है? उसकी कंपनी में पूछताछ करने के अलावा उसके पासपोर्ट-वीसा की जाँच करें। विदेश में रहनेवाले सम्बन्धियों से जाँच कराएं। यहाँ विवाह के बाद उसका रस्ट्रिेशन ऑफ मैरिज यानी विवाह पंजीकरण होना अनिवार्य है।

(कमलेश जैन, सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता)

(साभार –  नयी दुनिया)

ऑपरेशन माँ : जेहादी आतंक पर भारी पड़ी माँ की पुकार, घर लौटे घाटी के 50 युवा

श्रीनगर : कश्मीर में आतंकी संगठनों में शामिल हुए युवाओं को वापस घरों में बुलाने और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए सेना का ऑपरेशन माँ सफल होता दिख रहा है। एक साल में ही आतंकवादी बन चुके करीब 50 युवा घर लौट आए हैं। सेना भी इससे उत्साहित है। यह ऑपरेशन माँ सेना की चिनार कोर ने शुरू किया था। इस ऑपरेशन में चिनार कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग केजेएस ढिल्लो के निर्देश पर घरों से गायब हो चुके युवाओं का पता लगाना और उनके परिजनों से सम्पर्क कर उन्हें वापस घर लाना। पुलवामा हमले के बाद सेना ने घाटी में सभी माताओं से अपने बच्चों को वापस लौटने के लिए अपील करने को कहा था। सेना ने कहा था कि माँ एक बड़ी भूमिका में होती है और वे अपने बच्चों को वापस बुला सकती है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे मारे जाएंगे।

कई बार बीच में रोकी मुठभेड़

सेना की चिनार कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लो का कहना है कि अपनी मातृभूमि की सेवा करो। अपनी माँ और पिता की सेवा करो। इस संदेश ने सभी को प्रेरित किया। कई अभिभावकों के उन्हें संदेश भी आए और यही उनके लिए सबसे बड़ा तोहफा है। यही कारण है कि सेना ने कई बार बीच में ही मुठभेड़ रोकी, ताकि गुमराह हुए इन युवकों को आत्मसमर्पण के लिए मौका दिया जा सके।

कई बार माँ के गले मिलने से खत्म हुई मुठभेड़

उन्होंने कहा कि जब भी यह जानकारी मिलती है कि कोई स्थानीय आतंकी मुठभेड़ में फंसा हुआ है तो उसकी माँ की तलाश कर उसे लाया जाता है। कई बार तो मुठभेड़ मां और गुमराह हुए युवक के गले मिलने से ही खत्म हो जाती है। इस साल करीब 50 ऐसे युवा आतंकी संगठनों को छोड़कर वापस लौटे हैं। कई आतंकी आत्मसमर्पण करने के बाद पढ़ रहे हैं। कुछ अपने पिता का हाथ बंटा रहे हैं तो कुछ खेतों में काम कर रहे हैं। पाकिस्तान का प्रयास रहता है कि ऐसे युवाओं को निशाने बनाए। ऐसे में इनकी पहचान छुपाई जाती है।

सेना ने जो डाटा बनाया है उसके अनुसार आतंकी की उम्र एक साल से अधिक नहीं होती है। आतंकी संगठनों में शामिल होने वाले 83 प्रतिशत युवा पत्थरबाज थे। इसका मतलब यह है कि आज का पत्थरबाज कल का आतंकी है। ले. जनरल ढिल्लो के अनुसार आतंकी संगठनों में शामिल होने वाले सात प्रतिशत युवाओं की मौत दस दिनों के भीतर हो जाती है। नौ प्रतिशत की मौत एक महीने के भीतर, 17 प्रतिशत की तीन महीने के भीतर, 36 प्रतिशत की छह महीनों के भीतर और अन्य की एक साल के भीतर मौत हो जाती है।

सेना के अधिकारियों के अनुसार माँ के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे, इसी को देखते हुए ऑपरेशन माँ शुरू हुआ था। ले. जनरल ढिल्लो के अनुसार कई बार ऐसे ऑपरेशन हुए जहाँ पर स्थानीय कश्मीरी आतंकियों के साथ विदेशी आतंकी भी थे। सेना के जवानों ने अपनी ¨जिन्दगी को दांव पर रखते हुए आत्मसमर्पण के लिए तैयार स्थानीय आतंकियों को विदेशियों से अलग करवाया। विदेशी आतंकियों को ऐसे मौके नहीं दिए जाते हैं, लेकिन अगर कोई आत्मसमर्पण करना चाहे तो उसका स्वागत है।

तोता मछली ने तैयार किए दुनिया में सफेद रेत वाले समुद्री तट

नयी दिल्ली : सफेद रेत वाले समुद्री तट दुनियाभर में पर्यटकों की पसंदीदा जगह हैं। इस श्रेणी के समुद्री तट अपने आप ही तैयार नहीं हुए, बल्कि इन्हें समुद्री जीव पैरेट फिश (तोता मछली) ने बनाया है। मछली की इस प्रजाति का मुँह तोते की तरह नुकीला होता है। इसी कारण इन्हें तोता मछली नाम से जाना जाता है।

पर्ल एक्वाकल्चर क्षेत्र के विख्यात वैज्ञानिक डॉ. अजय सोनकर के मुताबिक, पैरेट फिश मुख्य रूप से उन्हीं क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जहां समुद्र तल में मूंगे के पहाड़ (कोरल रीफ) होते हैं। दुनिया में जितने भी सफेद रेत कण वाले समुद्री तट हैं, वे इसी मछली द्वारा बनाए गए हैं। सुनामी की घटना के बाद अंडमान प्रशासन ने समुद्र तल में आए बदलाव का अध्ययन करने के लिए एक शोध दल बनाया और उस दौरान पता लगा कि कोई ऐसा समुद्री जीव है जो सीपों को मार रहा है।

बाद में समुद्र के अंदर कुछ स्थानों पर कैमरे का उपयोग किया गया तो पता लगा कि पैरेट फिश ही अपने स्वभाव के विपरीत इन सीपों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार है। आम तौर पर पैरेट फिश सीपों से संबद्ध प्रजाति ही मानी जाती हैं और मूंगे के पहाड़ वाले स्थानों पर सीपों के संग ही पाई जाती हैं। पैरेट फिश के व्यवहार में आया यह परिवर्तन विचार करने योग्य था। डॉ. अजय ने बताया कि पैरेट फिश मूंगे की सतह को खुरचकर गले में लेकर उसे पीसती हैं और सीप के कैल्शियम से बने सतह पर चिपके एल्गी को अलग कर उसे खा लेती हैं। शेष बचे हिस्से को अपने गलफड़े से बाहर निकाल देती हैं, जिसके कारण काफी समय के बाद सफेद रेत कण का समुद्री तट अस्तित्व में आ जाता है। सुनामी के बाद समुद्र तल में जमे रेत कणों के ऊपर आने से मूंगे के पर्वत दब गए और पैरेट फिश के लिए भोजन का संकट हो गया। इस कारण उसने सीप के कैल्शियम कवच के ऊपर चिपके एल्गी को खाने के लिए इन सीपों को मारना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि सामान्य तौर पर एक पैरेट फिश साल भर में साढ़े चार से पांच किलोग्राम रेत पैदा करती हैं।

खुले में सूखते कपड़ों से अब बनेगी बिजली, आईआईटी शोधकर्ताओं ने विकसित की तकनीक

 

नयी दिल्ली : धोबीघाट पर एक साथ ढेरों कपड़े सूखते तो आपने देखे होंगे लेकिन कभी यह नहीं सोचा होगा कि खुले में सूख रहे इन कपड़ों से बिजली भी तैयार की जा सकती है। यह बात सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन IIT खड़गपुर के रिसर्चर्स ने यह कारनामा कर दिखाया है। उनका दावा है कि एक ऐसी तकनीक विकसित की गई है जिसकी मदद से खुले में सुखाए जाने वाले कपड़ों से बिजली बनाई जा सकेगी। हालांकि इस तकनीक से बड़े पैमाने पर तो बिजली नहीं बनेगी लेकिन इससे उन इलाकों में जरूर राहत मिल सकती है जहां बिजली की उपलब्धता आज भी ना के बराबर बनी हुई है। इस तकनीक को लेकर जानकारी देते हुए आईआईटी प्रोफेसर सुमन चक्रवर्ती ने बताया कि ‘यह पॉवर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए पर्याप्त नहीं होगी मगर यह ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए फायदेमंद रहेगा।’ चक्रवर्ती ने बताया कि ‘कपड़े सेल्यूलोज फाइबर्स से बने होते हैं जिनकी दीवारों पर चार्ज होता है। अगर कपड़े के टुकड़े को नमक के घोल में डाला जाएगा तो यह फाइबर्स और आइयोनाइज से उर्जा पैदा करेगा। यह लगातार वोल्टेज को उत्पन्न  करेगा। इसे अगर एक्सटरनल रजिस्टर से जोड़ा जाएगा तो यह थोड़ा सा पॉवर जनरेट करेगा।’ प्रोफेसर चक्रवर्ती ने यह भी बताया कि ‘हमने अपनी टेक्नालॉजी के जरिये बिजली उत्पन्न करने की यह प्रणाली ‘धोबीघाट’ पर प्रयोग की है जहाँ कपड़े सुखाए जाते हैं।’

40 फीसदी आबादी प्रदूषण के कारण छोड़ना चाहती है दिल्ली

 

नयी दिल्ली : जहरीली हवा के चलते दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले लोगों ने दूसरे शहरों में जाने की इच्छा जताई है। नौकरियों या अन्य वजहों के चलते यहां रहने पर मजबूर तकरीबन 40 फीसदी लोग दूसरे शहरों का रुख करना चाहते हैं। एक सर्वे से यह खुलासा हुआ है। 17 हजार से ज्यादा लोगों पर कराए गए इस सर्वे के मुताबिक, 13 फीसदी निवासियों का मानना है कि उनके पास प्रदूषण की चुनौतियों से पार पाने का कोई  विकल्प नहीं है। वहीं, 31 फीसदी लोगों ने दिल्ली-एनसीआर में रहने की बात कही है। उनका कहना है कि वे प्रदूषण से पार पाने के लिए एयर प्यूरीफायर, मास्क जैसे उपकरणों का सहारा लेंगे। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लोकल सर्कल द्वारा कराए गए इस सर्वे के मुताबिक, 16 फीसदी लोगों ने कहा, वे दिल्ली-एनसीआर में ही रहना चाहेंगे, मगर ऐसे माहौल में वे कुछ समय के लिए कहीं और जाना चाहेंगे।  जब लोगों से पूछा गया कि क्या बीते दिनों में प्रदूषण के चलते उन्हें और उनके परिवार वालों को स्वास्थ्य संबंधी शिकायत आई है तो 13 फीसदी लोगों ने कहा, एक या उससे ज्यादा लोग पहले ही अस्पताल जा चुके हैं। वहीं, 29 फीसदी ने कहा, वे इस दौरान कम से कम एक डॉक्टर को तो दिखा ही चुके हैं। 44 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें तो आईं, मगर वे किसी डॉक्टर के पास या अस्पताल नहीं गए। वहीं, सिर्फ 14 फीसदी लोगों ने कहा, उन्हें प्रदूषण के चलते स्वास्थ्य संबंधी कोई शिकायत नहीं हुई।

कोलकाता में आरम्भ हुई भारत की पहली वैश्विक मेगा विज्ञान प्रदर्शनी ‘विज्ञान समागम’

कोलकाता : विश्व की महत्वपूर्ण विज्ञान परियोजनाओं एक छत के नीचे लाने वाली भारत की पहली मेगा विज्ञान प्रदर्शनी विज्ञान समागम कोलकाता में आरम्भ हो चुकी है। इस बहुस्थलीय प्रदर्शनी को लेकर की फंडिंग के लिए परमाणु उर्जा विभाग, विज्ञान एवं तकनीक विभाग ने सहयोग किया है जबकि वेन्यू पार्टनर यानी स्थान उपलब्ध करवाने के लिए नेशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूजियम्स तथा संस्कृति मंत्रालय ने सहयोग का हाथ बढ़ाया है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह को सम्बोधित करते हुए केन्द्रीय विज्ञान एवं तकनीक मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन ने किया। उन्होंने दैनन्दिन जीवन में विज्ञान के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि प्रदर्शनी के माध्यम से दुनिया भर के कई वैज्ञानिकों के बीच वैज्ञानिक साझेदारी बढ़ेगी और वे अपनी परियोजनाओं से प्राप्त अनुभवों का उपयोग समाज को बेहतर बनाने के लिए करेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसी परियोजनाओं में निवेश का 70 प्रतिशत उपयोग देश में खासकर उद्योगों में होता है। विज्ञान एवं तकनीक विभाग (डीएसटी) के सचिव प्रो. आशुतोष शर्मा ने विज्ञान पत्रकारिता को प्रोत्साहन देने पर जोर दिया और कहा कि विज्ञान के प्रसार के लिए वैज्ञानिकों तथा पीएचडी शोधार्थियों से भी आलेख लिखवाये जा रहे हैं। अब तक 3500 विज्ञान सम्बन्धी आलेख प्राप्त हो चुके हैं और इनकी संख्या बढ़ाकर 5 हजार करना लक्ष्य है। 31 दिसम्बर तक चलने वाली
विज्ञान समागम मेगा प्रदर्शनी में विश्व की प्रमुख विज्ञान परियोजनाओं में भारत की भागेदारी को प्रदर्शित किया जाएगा। प्रदर्शनी में ब्रम्हाण्ड से लेकर हिज पार्टिकल के आविष्कार समेत कई विविध परियोजनाओं व आविष्कार दिखेंगे। भारत जिन विज्ञान परियोजनाओं में शामिल है, उनमें यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर स्थित लार्ज हैड्रन कॉलिडर, फैसिलिटी फॉर एंटी प्रोटोन एंड आयन रिसर्च समेत कई अन्य विज्ञान योजनाएँ शामिल हैं। श्रीवास्तव के मुताबिक इसके पहले मुम्बई और बंगलुरू में यह प्रदर्शनी आयोजित हो चुकी है।