Monday, April 27, 2026
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पुरुषों की आर्थिक बराबरी करने में महिलाओं को लगेंगे 257 साल

72 देशों में औरतें नहीं खोल सकतीं बैंक खाता
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट बताती है कि आज भी दुनियाभर में जेंडर इक्वालिटी यानी लैंगिक समानता 68.6% ही है। बीते 50 सालों में 85 देश ऐसे हैं जहां की राष्ट्रप्रमुख कभी महिला बन ही नहीं सकी। रिपोर्ट के मुताबिक, आर्थिक सहयोग के मामले में लैंगिक अंतर को खत्म करने में अभी भी 257 साल लग जाएंगे। 2020 ग्लोबल जेंडर गेप इंडेक्स में भारत 66 प्रतिशत के साथ रैंकिंग में 112 नंबर पर है। जबकि साउथ एशिया में देश बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका के बाद चौथे नंबर पर है।
नेतृत्व
राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की हालत बदतर है। रिपोर्ट बताती है कि, 35 हजार 127 पॉलीटिकल सीट्स में से महिलाओं के पास महज 25% है। 153 में 45 देश ऐसे हैं जहां महिलाओं के पास उपलब्ध सीट्स का केवल 20% है। दो देश वनौटू और पपुआ न्यू गिनी में एक भी महिला राजनेता नहीं है। हमारे देश में ही लोकसभा में महिलाओं की संख्या 14% और राज्यसभा में 10% के आसपास ही है। रिपोर्ट के मुताबिक पॉलिटिक्स के मामले में हर साल 0.75% की दर से सुधार हो रहा है। अगर इसी दर से सुधार होता रहा तो लैंगिक भेद की खाई पाटने में 95 साल लग जाएंगे।

आर्थिक-अवसर
आर्थिक सहयोग और अवसरों के मामले में फिलहाल 42% का फर्क अब भी है। रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 64 की उम्र वाले औसतन 78% पुरुष लेबर फोर्स में हैं। महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 55% है। दुनियाभर में महिलाओं के नेतृत्व में सिर्फ 18.2% कंपनियां ही चल रहीं हैं। भारत में कंपनियों के बोर्ड में 13.8% महिलाएं शामिल हैं। चीन में यह आंकड़ा 9.7 फीसदी है। रिपोर्ट बताती है कि, ऐसे कई देश हैं जहां महिलाओं को संपत्ति खरीदने या नई कंपनी शुरू करने के लिए क्रेडिट, भूमि और अन्य आर्थिक लाभों का फायदा नहीं मिल पाता है। उदाहरण के तौर पर 153 में से 72 देश ऐसे हैं जहां पर विशेष सामाजिक समूह की महिलाओं के पास बैंक अकाउंट खोलने का भी हक नहीं है। वहीं, 25 देशों में औरतों को विरासत की प्रॉपर्टी के संबंध में पूरे अधिकार नहीं है।
शिक्षा
रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा और पढ़ाई के मामले में 4% का फर्क अब भी है। 35 देशों में शिक्षा के मामले में 100% समानता आ चुकी है। दुनिया में 15-24 साल की उम्र के 90.4% लड़कियां और 92.9% लड़के साक्षर हैं। रिपोर्ट बताती है कि, मौजूदा स्थिति के बाद भी करीब 10% लड़के और लड़कियां शिक्षा के मामले में पिछड़ रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि अगर जरूरी संस्थागत और सांस्कृतिक बदलाव होते हैं तो भी इस लैंगिक भेद को खत्म करने में कम से कम 12 साल का समय लगेगा।
स्वास्थ्य
दुनिया ने स्वास्थ्य के मामले में 95.7 फीसदी महिलाओं और पुरुषों के बीच फर्क खत्म करने में सफलता हासिल कर ली है। 71 देशों ने जहां कम से कम 97 प्रतिशत गैप खत्म किया है, वहीं 42 देश भेद को पूरी तरह से खत्म करने के करीब हैं। भारत में हेल्थ और सर्वाइवल का आंकड़ा 94.4 प्रतिशत है।
सम्पत्ति
आर्थिक मोर्चे पर दुनियाभर में महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है। 2010 में अरबपति महिलाओं की संख्या 91 थी, जो 2019 में बढ़कर 244 हो गई। इनमें अपने दम पर अमीर बनीं महिलाओं का ग्राफ भी तेजी से बढ़ा। फोर्ब्स की वर्ल्ड रिचेस्ट रैंकिंग के अनुसार भारत में सबसे अमीर महिला जिंदल ग्रुप की सावित्री जिंदल हैं। सावित्री ग्लोबल रैंकिंग में 290 नंबर पर हैं। दुनिया की सबसे अमीर महिला फ्रैंकोइस बैटनकोर्ट मेयर्स हैं।
शोषण
वर्ल्ड बैंक की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में 35% महिलाएं शारीरिक और यौन शोषण का शिकार हुईं हैं। 38% महिलाओं की हत्या उनके ही पार्टनर ने कर दी। एनसीआरबी के मुताबिक, 2018 के अंत तक देश की अदालतों में दुष्कर्म के 1 लाख 38 हजार 342 मामले पेंडिंग थे। इनमें से 17 हजार 313 मामलों का ही ट्रायल पूरा हो सका, जबकि सिर्फ 4 हजार 708 मामलों में ही सजा सुनाई गई। 2018 में सजा देने की दर यानी कन्विक्शन रेट सिर्फ 27.2% रहा जो 2017 की तुलना में 5% कम है। 2017 में कन्विक्शन रेट 32.2% था।
विश्व में विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं-पुरुषों के नौकरियों के आँकड़े
क्षेत्र पुरुष महिला
क्लाउड कम्प्यूटिंग 88% 12%
इंजीनियरिंग 85% 15%
डेटा और आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस 74% 26%
प्रोडक्ट डेवलपमेंट 65% 35%
सेल्स 63% 37%
मार्केटिंग 60% 40%
कंटेंट प्रोडक्शन 43% 57%
अन्य 61% 39%
भारत में महिलाओं की स्थिति

रिपोर्ट के मुताबिक स्टडी में शामिल किए गए 153 देशों में भारत एकमात्र देश है जहां, महिलाओं की स्थिति राजनीतिक से ज्यादा आर्थिक तौर पर खराब है। भारत में 82 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले केवल एक चौथाई महिलाएं लेबर मार्केट में सक्रिय हैं। महिलाओं की अनुमानित आय पुरुष की कमाई का महज पांचवा हिस्सा है। स्वास्थ्य और जीवन रक्षा में भारत की रैंक 150वीं है। प्रति 100 लड़कों पर 91 लड़कियां जन्म लेती हैं। भारत में 82 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले केवल दो-तिहाई महिलाएं पढ़ी-लिखीं हैं। राजनीति में महिलाओं का दखल बेहद कम है। संसद में जहां महिलाओं की 14.4% हिस्सेदारी है, वहीं कैबिनेट में यह आंकड़ा 23% है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

बच्चों की मोबाइल की लत छुड़ाएगा 11 साल की बच्ची का स्टार्टअप

सूरत : गुजरात के सूरत की 11 साल की भाविका माहेश्वरी ने हम उम्र बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने की मुहिम शुरू की है। इसके लिए मोबाइल एडिक्शन क्लीनिक नाम से स्टार्ट-अप शुरू किया है। इस मंच से भाविकाने 24 पेज की एक ड्राइंग बुक तैयार की है। यह ड्राइंग बच्चों को समझाते हैं कि कब कितना और कैसे मोबाइल उपयोग करना उचित है। भाविका ने अपने इस स्टार्ट-अप का वाणिज्य मंत्रालय में पंजीकरण भी करवाया है। भाविका ने बताया कि मैंने 12 स्कूलों में इस बाबत सेमिनार भी किए हैं। इस दौरान मुझे महसूस हुआ कि जागरूकता के लिए सेमिनार से अलग कुछ करने की जरूरत है। ड्राइंग बुक के जरिए मेरे हिसाब से यह संदेश ज्यादा सशक्त ढंग से पहुंचाया जा सकता है। यह किताब स्कूलों को भेजने की तैयारी है।

1973 में हैंडबॉल कोच ने बनायी भारत का महिला क्रिकेट एसोसिएशन

 टीम ने 3 साल बाद पहली टेस्ट सीरीज खेली
दुनिया के कई देशों में पुरुष क्रिकेट की तरह ही महिला क्रिकेट का भी क्रेज बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात करें तो वुमन इंटरनेशनल क्रिकेट एसोसिएशन 1926 में बना। हालांकि, इस एसोसिएशन के बनने के बाद पहला महिला टेस्ट मैच 1934 में खेला गया। इस दौरान भारत में महिला क्रिकेट से जुड़ी गतिविधियां शुरू ही नहीं हुई थीं। करीब चार दशक बाद हमारे देश में महिला क्रिकेट से जुड़ी हलचल शुरू हुई।
भारतीय महिला क्रिकेट एसोसिएशन
बात 1973 की है। हैदराबाद में हैंडबॉल और सॉफ्टबॉल के एक कोच और प्रशंसक थे। नाम था महेंद्र कुमार शर्मा। एक बार उनकी कुछ स्टूडेंट्स ने लड़कों को क्रिकेट खेलते देखा। उन्हें पसंद आया तो वो भी खेलने चली गईं। बस, यहीं से शर्मा के दिमाग में महिला क्रिकेट एसोसिएशन बनाने का विचार जन्मा। इसी साल भारतीय महिला क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (WCAI) अस्तित्व में आया। शर्मा ने इंग्लैंड के महिला क्रिकेट एसोसिएशन से संपर्क किया। उनके प्रयास रंग लाए। कुछ महीने बाद इंटरनेशनल क्रिकेट एसोसिएशन ने भी डब्लूसीएआई को मान्यता दे दी।
पहला दौरा और बराबरी की टक्कर
1976 में वेस्ट इंडीज की महिला क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आई। यह किसी भी विदेशी महिला क्रिकेट टीम का पहला भारत दौरा था। कुल 6 टेस्ट मैच इस सीरीज में खेले गए। तीसरा टेस्ट पटना में 25 हजार दर्शकों की मौजूदगी में खेला गया। इसे भारत ने जीता। हालांकि, छठवां और आखिरी टेस्ट जीतकर विंडीज ने सीरीज 1-1 से बराबर करा ली। इसके दो साल बाद यानी 1978 में दूसरे महिला विश्वकप का आयोजन भारत में किया गया। टीम इंडिया ग्रुप स्टेज भी पार नहीं कर सकी।
फिर बदले हालात
1997 में भारत ने दूसरी बार महिला क्रिकेट विश्वकप की मेजबानी की। हमारी टीम सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों 19 रन से हार गयी। ईडन गार्डन्स में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच फाइनल खेला गया। इसे करीब 80 हजार फैन्स ने देखा। 2005 में भारत ने पहली बार महिला विश्वकप फाइनल खेला। कप्तान थीं मिताली राज। उस वक्त राज 22 साल की थीं। 2006 में डब्लूसीएआई का विलय बीसीसीआई में हो गया। 2017 में भी टीम इंडिया विश्वकप के फाइनल में पहुंची। लेकिन, इंग्लैंड ने 9 रन से खिताबी जीत हासिल कर ली।
शांता रंगास्वामी
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पहली कप्तान थीं शांता रंगास्वामी। अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट में भारत की तरफ से पहला टेस्ट शतक भी शांता के ही नाम दर्ज है। 2017 में बीसीसीआई ने रंगास्वामी को लाइफटाइम अची‌वमेंट अवॉर्ड प्रदान किया था।

साड़ी पहनकर क्रिकेट खेलने उतरीं मिताली

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की अनुभवी बल्लेबाज मिताली राज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में मिताली साड़ी पहनकर क्रिकेट खेलते हुए दिखाई दे रही हैं। इस वीडियो को मिताली ने अपने ऑफिशियल इंस्टाग्राम अकांउट पर शेयर किया है, जिसके कैप्शन में उन्होंने लिखा, ‘साड़ी बहुत कुछ कहती है आपसे भी अधिक। यह आपको कभी भी फिट होने के लिए नहीं कहती, यह आपको अलग दिखना सिखाती है। चलिए इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2020 पर एक अनमोल चीज की शुरुआत करते हैं। इस महिला दिवस से अपनी शर्तों पर जीना शुरू करते हैं।’इस वीडियो को तीन लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं। 37 साल की मिताली ने पिछले साल ही टी-20 क्रिकेट से संन्यास ले लिया था। वह अभी महिला वन-डे टीम की कप्तान हैं।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को खुला खत, ‘विमेन’ और ‘सेक्सिस्ट’ की परिभाषा बदलने की माँग

नयी दिल्ली : अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) से ठीक पहले महिला कार्यकर्ता समूहों ने मिलकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को एक खुला पत्र लिखकर एक बार फिर डिक्शनरी से ‘वूमन’ शब्द के ‘सेक्सिस्ट’ होने की परिभाषा बदलने की मांग की है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में इनके पर्यायवाची शब्दों को रूप में ‘बिच’ और ‘मेड’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की निंदा की गई है। इस पर यूनिवर्सिटी ने बदलाव की बात मान ली है।
ब्रिटेन के अखबार ‘द गार्जियन’ के मुताबिक, महिलावादी पार्टी नेताओं ने 12 अन्य दलों के साथ मिलकर ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘विमन’ और ‘सेक्सिस्ट’ शब्द के अर्थ की पत्र लिखकर आलोचना की है जबकि पुरुष यानी मैन शब्द की परिभाषा बहादुरी, साहस और कठोरता जैसे उदाहरणों से की गई है। पत्र में कहा गया है कि इस तरह की परिभाषा से महिलाएं हतोत्साहित होंगी और इससे महिलाओं की नकारात्मक तस्वीर पेश होती है। पत्र में लिखा गया कि परिभाषा बदलने से लैंगिक समानता पर बड़ा असर देखा जा सकता है। इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इन दोनों ही शब्दों की परिभाषा अब बदली जा रही हैं। प्रवक्ता ने बताया कि आगामी दिनों में सभी प्लेटफॉर्मों पर ये बदलाव देखे जा सकेंगे। हालांकि उन्होंने कहा कि इसमें थोड़ा वक्त लगेगा क्योंकि ये रातोंरात नहीं बदले जा सकते हैं।
ऑनलाइन याचिका में 32 हजार हस्ताक्षर
इस संबंध में 32 हजार से भी ज्यादा लोगों ने जियोवानार्डी की ऑनलाइन याचिका पर दस्तखत भी किए हैं। इस याचिका में कहा गया है कि ऑक्सफोर्ड की इंगलिश डिक्शनरी ने वूमन को परिभाषित करने के लिए जो उदाहरण दिए हैं वे बहुत ही निराशाजनक हैं।

होली खेलें मगर सुरक्षित रंगों के साथ

रंगों का त्योहार होली में अब कुछ ही दिन रह गए हैं। इसको लेकर लोगों ने तैयारियां शुरू कर दी है। बात चाहे पकवान बनाने की हो या फिर रंगों और पिचकारियों की खरीदारी की, सभी तैयारियों में लगे हैं। होली का बाजार भी सज कर तैयार हो चुका है। हम सभी जानते हैं कि बाजार में कई तरह के केमिकल वाले रंग बिकते हैं, जिससे होली खेलने पर हमारी त्वचा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में हमें हर्बल रंगों का चुनाव करना चाहिए। अब चुनौती ये है कि हर्बल रंगों की पहचान कैसे करें। रंगों की खरीदारी करते हुए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, जिससे दुकानदार हमें केमिकल युक्त रंग देकर ठग ना पाए।रंगों की खरीदारी की बात आती है, तो हमारी टेंशन इस बात को लेकर बढ़ जाती है कि हम असली रंगों की पहचान कैसे करें! आइए, जानते हैं इस बारे में विस्तार से और साथ ही शुभजिता प्रतिनिधि दीपा ओझा ले चल रही हैं रंगों के बाजार में –

पैकेजिंग को जाँचें
रंग खरीदते वक्त उसकी पैकेजिंग की अच्छे से जांच करें। पैकेजिंग पर रंगों को बनाने में उपयोग हुई सामग्रियों को ध्यान से पढ़ें। अगर उसमें यह लिखा है कि रंग का निर्माण गुलाब, हल्दी, आदि सामग्रियों को लेकर किया गया है, तो वह कलर नैचुरल होगा। आप उसे खरीद सकते हैं।

रंगो को ध्यान से देखकर उसका चुनाव करें
केमिकल वाले रंगों में स्पार्कल होता है, जिससे ये रंग काफी चमकीले दिखते हैं। चमकीलेपन से इसका पता दूर से ही देखकर लगाया जा सकता है। ऐसे में खरीदारी के दौरान आप रंगों को हाथ में उठाकर देखें कि उसमें स्पार्कल तो नहीं है। कुदरती रंग हल्के होते हैं। डिब्बाबंद रंगों के बारे में पता करना है कि यह कुदरती है या नहीं, तो आप इस बाबत दुकानदार से पूछ सकते हैं।
पैच टेस्ट
अगर आपको पता करना है किन-किन रंगों के प्रयोग से आपकी त्वचा पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे में आप अपना स्किन पैच टेस्ट करवाइए। इससे आप को पता चल जाएगा किस तरह के रंगों से आपकी स्किन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
एक्सपायरी डेट को जरूर जाँचें
रंगों की खरीदारी के दौरान इस बात का जरूर ध्यान रखिए कि उस पर एक्सपायरी डेट लिखी हुई है या नहीं। आमतौर पर नैचुरल रंगों में प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए इसकी एक्सपायरी डेट 6-7 महीने की होती है।
लैब टेस्ट सर्टिफिकेट
रंग खरीदते हुए इस बात का जरूर ध्यान रखें कि उसके पैकट पर लैब टेस्ट सर्टिफिकेट नंबर जरूर लिखा हो। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऑर्गेनिक कलर्स बनाने वाले निर्माता रंगों को लेकर की गयी जाँच के बाद पैकेट पर लैब टेस्ट सर्टिफिकेट नंबर दर्ज करते हैं।

जब निभाना हो सासू माँ से रिश्ता

शादी केवल दो इंसानों को नहीं बल्कि दो परिवारों को जोड़ती है। शादी के बाद जब लड़की अपने ससुराल आती है तो उस दौरान वह परिवार का केंद्र बन जाती है। ऐसे में रिश्तों के भीतर तारतम्यता स्थापित करना उसके लिए एक चुनौती भरा काम हो जाता है। नए परिवार के साथ घुलने-मिलने में थोड़ा समय तो जरूर लगेगा। शादी के बाद नए परिवार में आने के बाद लड़की को सास अगर बहु समझदारी और प्रेम का परिचय दे तो सास के साथ एकजोड़ता स्थापित हो सकती है और कोशिश करिए कुछ इस तरह –
अपना रवैया बदलें
अगर आपकी सास आपके हर काम में कमियां ढूंढतीं हैं और उनकी ये आदत खत्म होने की बजाए दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में जरुरत है कि आप अपने रवैये में बदलाव करें। हर काम में आप उनको सफाई देने की बजाए शांत रहने की कोशिश करें। बेवजह की नोकझोंक उनके साथ बंद कर दें। हो सकता है कि आपके द्वारा प्रतिउत्तर ना करने से आपकी सास का व्यवहार बदल जाए। ऐसे में संयम से काम लेना बेहतर होगा।
तारीफ करने दें
ज्यादा से ज्यादा अपनी सास की तारीफ कीजिए। अगर वो अपनी तारीफ खुद करती हैं तो उनकी हां में हां मिलाइए। ऐसे में आप दोनो की नोकझोंक कब खत्म हो जाएगी पता भी नही चलेगा।
तकरार से बचें पर बात जरूर करें
आपको ऐसा लगता है कि ज्यादा बात करने से सास के साथ झगड़े की आशंका बन जाती है तो समझदारी इसी में है कि चुप रहें। उनको बहस करने का एक भी मौका मत दीजिए। उनके साथ तकरार से करने से बचिए मगर बात बन्द न करें। उनके साथ उनकी तरह बनें….आपसी समझदारी बढ़ेगी।
जरूरत पड़े तो बच्चे को लेकर बात करें
अपने बच्चे और सास के बीच के रिश्ते में बाधा ना बनें मगर जरूरत पड़े तो बात जरूर करें। दादी और पोता-पोती के बीच का रिश्ता काफी मधुर होता है। वो आपसे ज्यादा आपके बच्चों को प्यार करेंगी।  बच्चे अपने ग्रैंड पैरेंट्स से बहुत कुछ सीखते भी हैं। वो उन्हें सही गलत की समझ भी हमेशा देते हैं मगर कई बार लाड़ – प्यार में गलतियाँ नजरअन्दाज भी करते हैं। ऐसी स्थिति में विनम्रता और समझदारी के साथ अपनी बात समझाएँ। बात जरूर बनेगी।
आदेश न दें मगर मदद लें
आप घर की बहू हैं कोई मशीन नहीं कि सारे काम एकसाथ कर लेंगी। आप उतना ही काम करें जितना आप कर सकती हैं। जरूरत से ज्यादा काम की वजह से तनाव, थकान और चिड़चिड़ापन होगा। आप सासू माँ से बात करके अपनी परेशानी बाँट सकते हैं। बात करने के लहजे पर ध्यान दें। प्रेम और विनम्रता से बात करेंगी तो उनको अच्छा लगेगा और वह बिन कहे ही आपकी परेशानी को समझकर आपकी मदद के लिए आ जायेंगी…मगर पहल आपको करनी होगी।

 

वसीम जाफर ने कहा क्रिकेट को अलविदा

नयी दिल्ली : वसीम जाफर ने गत शनिवार को खेल के सभी प्रारूपों से संन्यास की घोषणा कर दी। भारतीय टीम के लिए सलामी बल्लेबाजी का मोर्चा संभाल चुके मुंबई के इस खिलाड़ी ने 41 साल की उम्र में क्रिकेट को अलविदा कहा। भारतीय टीम के लिए 2000 में डेब्यू करने वाले जाफर ने 31 टेस्ट में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए एक दोहरा शतक, पांच शतक और 11 अर्द्धशतकों के बूते 1944 रन बनाए थे। 2006 में वेस्टइंडीज के खिलाफ सेंट जोंस में उन्होंने अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ 212 रन की पारी खेली थी। हालांकि उन्हें सिर्फ दो ही वन-डे में खेलने का मौका मिला। 2008 में आखिरी बार टीम इंडिया के लिए खेलने के बाद वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट में सक्रिय हो गए। वहां उन्होंने जमकर बवाल मचाया। अपने पूरे करियर में वसीम जाफर ने 434 मैच (टेस्ट, वन-डे, प्रथम श्रेणी, लिस्ट ए) खेलते हुए 72 शतक और 26, 213 रन बनाए। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में दमदार प्रदर्शन से कई रिकॉर्ड अपने नाम करने वाले जाफर का जन्म 16 फरवरी 1978 को मुंबई में हुआ था। दाएं हाथ के इस शानदार बल्लेबाज को घरेलू भारतीय क्रिकेट का भगवान भी कहा जाता है। करीब दो दशक तक खेलने के बाद भी इस खिलाड़ी के भीतर कभी रन बनाने की भूख खत्म नहीं हुई।
1996/97 में मुंबई की ओर से अपना कॅरियर शुरू करने वाले वसीम ने 9 दिसंबर 2019 को घरेलू क्रिकेट का सबसे बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम किया था। 41 साल की उम्र में 2019-20 का सीजन खेलते हुए जाफर 150 रणजी मैच खेलने वाले भारत के पहले और इकलौते क्रिकेटर बने थे।
यह कारनामा उन्होंने विदर्भ की ओर से आंध्र के खिलाफ किया था। इस सूची में उनके बाद सबसे ज्यादा रणजी मैच खेलने का रिकॉर्ड देवेंद्र बुंदेला के नाम है, जबकि अमोल मजूमदार 136 मैचों के साथ तीसरे स्थान पर हैं। घरेलू क्रिकेट में रिकॉर्ड 40 शतक जड़ने वाले वसीम साल 2018 में रणजी ट्रॉफी के इतिहास में 11000 रन बनाने वाले पहले क्रिकेटर बने थे। जाफर ने टेस्ट क्रिकेट में साल 2000 में द. अफ्रीका के खिलाफ अपना इंटरनेशनल डेब्यू किया था। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने अपना पहला शतक नागपुर (2006) में लगाया था। वसीम जाफर ने पहला फाइनल 1996-97 सीजन में खेला था। मुंबई के लिए 18 साल खेलने के बाद उन्होंने 2015-16 में विदर्भ की तरफ से खेलना शुरू किया।
फर्स्ट क्लास और लिस्ट ए में खेले कुल 342 मैचों में उन्होंने 23,457 रन बनाए हैं। फर्स्ट क्लास (57) और लिस्ट ए (10) दोनों मिलाकर जाफर ने 67 शतक लगाए हैं। वसीम जाफर घरेलू क्रिकेट के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने कभी कोई फाइनल मुकाबला नहीं हारा है।
जाफर 1996-97 से 2012-13 के बीच 8 बार रणजी ट्रॉफी जीतने वाली मुंबई टीम का हिस्सा रहे और फिर लगातार दो बार से (2017-18, 2018-19) उन्होंने विदर्भ को खिताब जितवाने में अहम भूमिका निभाई। बीते सीजन भी उनके बल्ले से 11 मैचों में 69.13 की औसत से 4 सेंचुरी के साथ 1037 रन निकले थे। मई 2019 में वसीम जाफर को बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) ने मीरपुर स्थित अपनी अकादमी के लिए बल्लेबाजी सलाहकार नियुक्त किया था, उनका कार्यकाल अप्रैल 2020 तक का है। बीसीबी ने उनके साथ एक वर्ष का अनुबंध किया था। शुरुआत में वह अंडर-16 और अंडर-19 आयुवर्ग के क्रिकेटरों को टिप्स देते थे। उसके बाद उन्हें भारत के एनसीए की तर्ज पर हाई परफोर्मेंस यूनिट का दायित्व सौंपा जाना था।

पत्नी की सहमति के बिना कोई व्यक्ति किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि पत्नी की सहमति के बिना कोई व्यक्ति किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकता है। बच्चे को गोद लेने के लिए व्यक्ति को पत्नी की इजाजत लेनी होगी। साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि विधिवत समारोह के बगैर बच्चे को गोद लेने को ‘गोद लेना’ नहीं कहा जा सकता।
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि गोद लेना तभी वैध माना जा सकता है जब हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956 की धारा 7 और 11 का पालन किया गया हो। किसी बच्चे को गोद लेने के लिए पत्नी की सहमति लेना जरूरी है। साथ ही गोद लेने के समारोह का प्रमाण भी होना चाहिए। पीठ ने आंध्र प्रदेश की महिला एम वानजा द्वारा गोद लिए जाने के समारोह का प्रमाण न देने पर यह मानने से इनकार कर दिया कि उसे किसी ने गोद लिया था। यह कहते हुए पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। याचिकाकर्ता वानजा ने अपने मौसा को ही अपना पिता बताया था लेकिन उसकी मौसी का दावा था कि याचिकाकर्ता उसकी गोद ली हुई बेटी नहीं है।
याचिकाकर्ता ने सम्पत्ति में माँगी थी हिस्सेदारी
दरअसल, यह मामला सम्पत्ति विवाद से जुड़ा है। वानजा ने याचिका दायर कर अपनी मौसी के कब्जे वाली सम्पत्ति पर हिस्सेदारी माँगी थी। याचिकाकर्ता के जैविक माता-पिता की मौत उसके बचपन में ही हो गयी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि माता-पिता की मौत के बाद उसकी मौसी व मौसा ने उसे गोद लिया था। वर्ष 2003 में उसके मौसा की मौत हो गयी। वह गोद ली हुई बेटी के नाते सम्पत्ति में अपनी हिस्सेदारी माँग कर रही थी।
मौसी ने सम्पत्ति का बँटवारा करने से किया इनकार
उसकी मौसी ने अपनी सम्पत्ति का बंटवारा करने से इनकार कर दिया तो वानजा ने ट्रायल कोर्ट में याचिका दायर की लेकिन कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए उसके दावे को नकार दिया। इसके बाद आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भी उसकी याचिका खारिज कर दी थी। लिहाजा उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो यह साबित करता हो कि तय प्रावधानों के तहत उसे गोद लिया गया था। यहाँ तक कि याचिकाकर्ता की दादी का भी यह कहना था कि उसके मौसा व मौसी ने उसे गोद नहीं लिया था बल्कि उसकी परवरिश की थी।

जम्मू-कश्मीरः स्कूली पाठ्यक्रम में जुड़ा नया अध्याय, बच्चे पढ़ेंगे राज्य पुनर्गठन कानून

जम्मू : जम्मू-कश्मीर स्कूल शिक्षा बोर्ड (जेकेबीओएसई) ने दसवीं कक्षा के राजनीति विज्ञान विषय के पाठ्यक्रम में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून 2019 से जुड़ा एक अध्याय शुरू किया है। किताब सामाजिक विज्ञान लोकतांत्रिक राजनीति-2 के अध्याय आठ के चौथे खंड में राज्य के पुनर्गठन से संबंधित अध्याय को शामिल किया गया है। पिछले साल पांच अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को हटा दिया था और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था।
जोड़े गए नए अध्याय में पिछले साल अगस्त में संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद उपनियम (1) को छोड़कर अनुच्छेद 370 के सभी खंड निष्प्रभावी होने की जानकारी दी गई है।
पुनर्गठन कानून 31 अक्तूबर, 2019 से प्रभावी हुआ और राज्य दो केंद्र शासित हिस्सों में बंटने के बाद सीधे केंद्र के नियंत्रण में आ गया। अध्याय में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद राज्य पर पड़ने वाले इसके प्रभाव के बारे में भी विस्तार से बताया गया है।
इसी अध्याय में जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के भारत के साथ आने से लेकर अनुच्छेद 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा को मिली शक्तियों और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के बारे में भी जानकारी दी गयी है।
ज्ञात हो कि शीत सत्र में फरवरी के अंत में स्कूल खुलने के साथ ही दसवीं कक्षा का नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुआ है, जबकि जम्मू के गर्म क्षेत्रों में दसवीं कक्षा की परीक्षाएं चल रही हैं। इन क्षेत्रों में नया सत्र अप्रैल से शुरू होगा।