Monday, April 27, 2026
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काव्य आवृत्ति – प्रीति साव

कविता – पानी से घिरे हुए लोग, कवि – केदारनाथ सिंह, शिक्षण संस्थान – खुदीराम बोस सेन्ट्रल कॉलेज

कला और हस्तशिल्प के जरिए सरस मेले में जुड़ा भारत

भारत जोड़ता है और भारत जुड़ता है अपनी हर गली से लेकर अपनी कला, हस्तशिल्प, इतिहास समेत कई ऐसी चीजों से, जिनको देखकर हमें अपने देश पर गर्व होता है। शुभजिता इन छोटी – छोटी चीजों और बातों, किस्सों से लेकर शख्सियत को आपके सामने लायी है जिनको देखकर आप भी कह उठेंगे – मेरी जान हिन्दुस्तान।
आप हमें वीडियो या आलेख भेज सकते हैं मगर मेरी जान हिन्दुस्तान आपको वीडियो के अन्त में कहना होगा और कुछ खबर या स्टोरी भेजते हैं तो भी इसको जोड़ना होगा। हम अपनी इस मुहिम में युवा साथियों को लेकर चल रहे हैं।
इस बार हमारे साथ थीं दीपा ओझा। दीपा टीएचके जैन कॉलेज की छात्रा हैं। कोलकाता में हाल ही में आयोजित सरस मेला की रिपोर्टिंग उन्होंने हमारे साथ की। शुभजिता युवा सृजन प्रोत्साहन योजना के तहत शुभजिता प्रतिनिधि के रूप में दीपा ने सरस मेला कवर किया…ये स्टोरी उनकी ही कलम से निकली है

कला और हस्तशिल्प के जरिए सरस में मेले में जुड़ा भारत

– दीपा ओझा
कोलकाता में सरस मेला 2020, सेंट्रल पार्क के विधान सभा में लगा था । यह मेला कई सालों से लगाया जाता रहा है, इस साल भी यह मेला बेहद खूबसूरत तरीके से लगाया गया और भारत के कई राज्यों से कलाकार और शिल्पी यहाँ आये थे। यहाँ हस्तशिल्प के नायाब नमूने हमें देखने को मिले । आइए दिखाते हैं आपको सरस मेला –


लकड़ी पर उकेरी गयी अद्भुत कलाकृतियाँ
सरस मेला में सबसे पहले हमारी मुलाकात हुई आंध्रप्रदेश से आये कारीगर से जो लकड़ियों से सजावटी कलाकृतियाँ बनाते हैं और साथ ही बड़ी-बड़ी मूर्तियां भी बनाते हैं। उन्होंने हमें बताया कि उन्होंने यह हुनर अपने दादा जी और पिता जी से सीखा है साथ ही वे ये कार्य बचपन से ही अपने परिवारजनों के साथ करते आये हैं और यह कार्य उनके परिवार में पिछले 100 वर्षों से किया जा रहा है। अपनी कला के विषय में बताते हुए उन्होंने हमें बताया कि लकड़ी की ज़्यादातर वस्तुएं और मूर्तियां वे नीम की लकड़ियों से बनते हैं जिससे कि वे जल्दी खराब न हो।

बंगाल का पट्ट चित्र
इसके बाद हम मिले पूर्वी मिदनापुर से आई महिलाओं से हम मिले जो बंगाल का पट्ट चित्र लेकर आयी थीं। कालीघाट पट्ट चित्र पश्चिम बंगाल की पारम्परिक कला है और इसमें आपको बंगाल की संस्कृति भी दिखती है। इन चित्रों को बनाने के लिए प्राकृतिक रंग ही उपयोग में लाये जाते हैं। इस महिला ने अपनी चित्रकारी हाथ से बने कागज पर, केतलियों,कांच के गिलास पर, टीशर्ट्स पर, और साड़ियों पर भी प्रदर्शित की थी। यह उनके रोज़गार का माध्यम बना है साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि सरकार इसमे उनको पूर्ण सहयोग देती है।


बोम्मोलता – कठपुतली कला की धरोहर
इसके पश्चात हम पहुंचे आंध्र प्रदेश के बोम्मोलता के स्टॉल पर , जो पुश्तों से कलाकृतियों के निर्माण का कार्य कर रहे हैं, यह कार्य इनके लिए पारंपरिक है । इनके परिवार को उनके कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। बोम्मोलता दरअसल चमड़े पर बनायी गयी कलाकृतिय़ाँ हैं जो प्राचीन समय में कठपुतली के खेल में इस्तेमाल की जाती थीं। इन पर किया गया बारीक काम कलाकार के धैर्य को दिखाता है। अब इनसे सजावटी सामान बनाये जाते हैं और इनकी भारी माँग भी है।


राजस्थान की जूतियाँ
राजस्थान में जितने रंग हैं, उतने ही रंग हमें राजस्थान के स्टॉल पर मिले जहाँ जूतियों पर चटकीले रंग और कढ़ाई दिखी। इन पर हाथ का काम था और जूतियाँ ऐसी कि इनको हर कोई खरीदना चाहेगा।

झारखंड के लोहरदगा में बनी दरियाँ

पेन कलाकारी
यह भी आन्ध्र प्रदेश में ही बनायी जाती है। दूर से देखने पर आप इसे मधुबनी चित्रशैली समझ सकते हैं मगर वास्तविकता में यह बिलकुल अलग है। इस चित्रशैली में कपड़े को दूध और घी में डुबोने के बाद सुखाया जाता है। इसके बाद 6 माह से भिगोकर रखे गये लोहे के चूर्ण से बनी स्याही से कलमकारी की जाती है। इसमें जो रंग इस्तेमाल किये जाते हैं. वे फूलों और फलों जैसी प्राकृतिक चीजों से बनते हैं।

मधुबनी
बगैर मधुबनी चित्रशैली के कोई भी हस्तशिल्प मेला अधूरा सा लगता है तो बहुत खोजने के बाद हमें बिहार का स्टॉल मिला। यहाँ हमें प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से तैयार की गयी साड़ियाँ, दुप्पटे और सूटपीस मिले। यहाँ पर भागलपुरी टसर भी देखने को मिला।
इसके अतिरिक्त हमें उत्तर 24 परगना के बेंत का काम दिखा। फूड स्टॉल पर कई तरह के व्यंजन दिखे मगर एक आलेख में सबको समेटना सम्भव नहीं है। कला और शिल्प का लाजवाब संगम देखकर ही कह उठी मेरी जान हिन्दुस्तान

सिंगापुर पहला देश बनेगा, जहां फोटो आईडी नहीं बल्कि चेहरा दिखाना होगा

सिंगापुर : अभी तक ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने और बैंक में खाता खुलवाने जैसे कामों के लिए फोटो आईडी की जरूरत पड़ती थी। लेकिन आने वाले दिनों में इसकी जरूरत नहीं होगी। दरअसल, सिंगापुर दुनिया का पहला ऐसा देश बनने जा रहा है, जहाँ किसी भी काम के लिए फोटो आईडी नहीं, बल्कि चेहरा दिखाना होगा। सिंगापुर की सरकार फेशियल रिकग्निशन तकनीक पर काम कर रही है। इसके तहत देशभर के सरकारी और निजी दफ्तरो में फोटो कियोस्क सिस्टम लगाए जाएंगे। जहां चेहरा मात्र दिखाने से आपका काम हो जाएगा। इनमें देशभर के नागरिकों की पहचान और पता समेत पूरी जानकारी होगी। सरकार इसी साल जून से कियोस्क लगाना शुरू करेगी। दावा है कि 2022 तक देशभर में यह सुविधा शुरू हो जाएगी। हालांकि इस सुविधा का इस्तेमाल करने के लिए नागरिकों के ‘सिंगपास’ नाम का एप डाउनलोड करना होगा।
सुविधा से लोगों का समय बचेगा
रिपोर्ट के मुताबिक, सुविधा शुरू होने से लोगों का समय बचेगा। साथ ही कोरोनावायरस जैसा संक्रमण भी दूर रहेगा। दिलचस्प बात यह है कि सिंगापुर में यह काम स्मार्ट नेशन के प्रभारी मंत्री डॉ. विवियन बालाकृष्णन की देखरेख में हो रहा है। डॉ. बालाकृष्णन भारतवंशी हैं। उन्होंने कहा कि सिंगापुर की आबादी करीब 58 लाख है।

हेमाली देश की एकमात्र महिला डकवर्थ-लुईस मैनेजर, रणजी फाइनल में भी स्कोरिंग की

देश में 8 क्वालिफाई महिला स्कोरर में हेमाली देसाई सबसे वरिष्ठ हैं
राजकोट की हेमाली देसाई के क्रिकेट स्कोरिंग के सफर को 25 साल हो गए हैं। वेटरन महिला स्कोरर हेमाली ने 13 मार्च को राजकोट में खत्म हुए सौराष्ट्र और बंगाल के रणजी फाइनल में भी स्कोरिंग की थी। 44 साल की हेमाली बीसीसीआई के स्कोरिंग पैनल में सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन (एससीए) की ओर से हैं। वे देश की एकमात्र महिला डकवर्थ-लुईस मैनेजर हैं। हेमाली अपने करियर में अब तक दो टेस्ट, 12 वनडे, तीन इंटरनेशनल टी-20 में स्कोरिंग कर चुकी हैं। इसके अलावा वे कई आईपीएल मैचों और 100 से ज्यादा घरेलू मैच में भी स्कोरिंग कर चुकी हैं।
हरभजन सिंह चौंक गए थे
बात 2015 की है। सौराष्ट्र-पंजाब के बीच रणजी मैच राजकोट में हुआ था। हेमाली और सेजल स्कोरर थीं। हरभजन पंजाब के कप्तान थे। वे पंजाब का स्कोर जानने स्कोरर रूम में पहुंचे, जहां महिला स्कोरर को देख भौंचक्के रह गए।
‘स्टेट पैनल स्कोरर की परीक्षा 1994 में पास की’
हेमाली बताती हैं, ‘1990 से 95 तक स्कूल-कॉलेज में अंडर-16, वेस्ट जोन और ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी क्रिकेट टूर्नामेंट खेलने के बाद क्रिकेट में ही आगे बढ़ने की इच्छा थी। स्टेट पैनल स्कोरर की परीक्षा 1994 में पास की। 1997 में बीसीसीआई स्कोरर की परीक्षा पास की। शुरुआती दिनों में लगता था कि मैं बतौर स्कोरर ज्यादा टिक नहीं सकूंगी, लेकिन मैं सफल रही। अपनी इस लगन और चाहत के दम पर 100 से अधिक घरेलू टूर्नामेंट में स्कोरिंग कर चुकी हूं। मुझे 2005-06 में यूरो-एशिया कप के सभी मैचों में बतौर स्कोरर काम करने का मौका मिला था।’
देश में 8 क्वालिफाई महिला स्कोरर
हेमाली कहती हैं, ‘देश में 8 क्वालिफाई महिला स्कोरर हैं। इसमें दो राजकोट से हैं। मैं सबसे सीनियर हूं। मैं और मेरी जूनियर सहयोगी सेजल दवे महेता राजकोट के तमाम इंटरनेशनल और घरेलू मैचों में साथ ही काम करते हैं। स्कोरर की भूमिका के बाद दो साल पहले बीसीसीआई ने मुझे डकवर्थ-लुईस मैनेजर की जिम्मेदारी सौंपी है। डकवर्थ-लुईस मैनेजर के रूप में दो वनडे और 3 टी-20 में सेवा दे चुकी हूँ।’

गृहयुद्ध से जूझ रहे देश में अमेरिकी डॉक्टर बने उम्मीद की किरण , 9 साल में 1200 बच्चों की हार्ट सर्जरी की

त्रिपोली : लीबिया के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में हर साल सैकड़ों बच्चों की मौत इसलिए हो जाती थी, क्योंकि उनका सही समय पर दिल का ऑपरेशन नहीं हो पाता था। इस हालत में अमेरिका के एक डॉक्टर उम्मीद की किरण बनकर सामने आए। नाम है- डॉ. विलियम नोविक। डॉ. नोविक (66) की टीम हर साल विमान से लीबिया के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में जाती है। वह यहां बच्चों के दिल का इलाज करती है। टीम ने नौ साल में 1200 बच्चों की हार्ट सर्जरी की है। इनमें से कई बच्चे नवजात थे। साल 2011 में लीबिया में करीब 150 बच्चों की मौत हार्ट सर्जरी न हो पाने के कारण हो गई थी। तभी डॉ नोविक ने फैसला किया कि वह लीबिया जाकर बच्चों का इलाज करेंगे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी करता है इस टीम की मदद
डॉ. नोविक की टीम में 20 डॉक्टर हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी टीम की मदद करता है। वह टीम को दवा और अन्य चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराता है। राजधानी त्रिपोली में बच्चों के इलाज के लिए नेशनल हार्ट केयर सेंटर बनाया गया है। यहीं टीम बच्चों का ऑपरेशन करती है। हाल में यहां याजन नाम के बच्चे के दिल का ऑपरेशन किया गया। ऑपरेशन करीब 5 घंटे चला। याजन के परिवार ने बताया कि वे 1500 किमी दूर से ऑपरेशन के लिए सेंटर में आए थे। डॉक्टरों ने कहा है कि याजन जल्द पूरी तरह ठीक हो जाएगा।
अब तक हजारों बच्चों की हार्ट सर्जरी कर चुके डॉ. नोविक
डॉ. नोविक यूनिवर्सिटी ऑफ अलबामा में रेजीडेंट डॉक्टर और चाइल्ड हार्ट सर्जन हैं। उन्होंने टीम के लिए ऐसे डॉक्टरों को चुना, जिन्होंने गंभीर स्थिति में भी बच्चों को बचा लिया था। टीम लीबिया में ही बच्चों का इलाज नहीं करती, वह यूक्रेन, नाइजीरिया, इराक, ईरान और कोलंबिया समेत 32 देशों में जाकर हजारों बच्चों की हार्ट सर्जरी कर चुकी है।
लीबिया में 2011 से संघर्ष जारी
लीबिया 2011 से गृहयुद्ध में फंसा है। लीबिया में सत्ता-विरोधी आंदोलनों का एक सिलसिला चला, जिससे पहले गृहयुद्ध के हालात बने। फिर तानाशाह मोहम्मद गद्दाफी की विद्रोहियों ने हत्या कर दी। तभी से यह देश स्थिर शासन, आधारभूत ढांचे, शांति, सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। अभी यहां संयुक्त राष्ट्र के समर्थन वाली सरकार है।

दूध के कारोबार ने शिल्पी को बनाया करोड़पति

2 साल में 1 करोड़ रुपये का टर्नओवर
शिल्पी सिन्हा झारखंड के डाल्टनगंज से 2012 में बेंगलुरू पढ़ने के लिए आईं। वहां उन्हें गाय का शुद्ध दूध लेने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। यहीं से शिल्पी ने दूध का व्यवसाय करने का फैसला लिया। लेकिन महिला और कंपनी की इकलौती फाउंडर के तौर डेयरी क्षेत्र में काम करना आसान न था। न कन्नड़ आती थी और न तमिल। फिर भी किसानों के पास जाकर गाय के चारे से लेकर उसकी देखभाल के लिए समझाया। शुरुआत में दूध की सप्लाई के लिए कर्मचारी नहीं मिलते थे तो सुबह तीन बजे खेतों में जाना पड़ता था। सुरक्षा के लिए चाकू और मिर्ची स्प्रे लेकर जाती थीं। जैसे ही ग्राहकों की संख्या 500 तक पहुंची, शिल्पी ने 11 हजार रुपए की शुरुआती फंडिंग से 6 जनवरी 2018 को द मिल्क इंडिया कंपनी शुरू कर दी। पहले दो साल में ही टर्नओवर एक करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया।
एक से 9 साल तक के बच्चों पर फोकस
शिल्पी बताती हैं कि कम्पनी 62 रुपये प्रति लीटर में गाय का शुद्ध कच्चा दूध ही ऑफर करती है। उनके मुताबिक यह दूध पीने से बच्चों की हड्डियां मजबूत होती हैं और यह कैल्शियम बढ़ाने में भी मदद करता है। इसलिए सिर्फ एक से नौ साल तक के बच्चों पर उनका फोकस होता है। इसे गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए कम्पनी गायों की दैहिक कोशिकाओं की गणना के लिए मशीन का इस्तेमाल करती है। दैहिक कोशिका जितनी कम होगी, दूध उतना ही स्वस्थ होगा।
शिल्पी का कहना है कि किसी भी ऑर्डर को स्वीकार करने से पहले मां से उनके बच्चे की उम्र के बारे में पूछा जाता है। अगर बच्चा एक साल से कम का है, तो डिलीवरी नहीं दी जाती है। शिल्पा के मुताबिक एक बार उन्होंने देखा कि किसान गायों को चारे की फसल खिलाने की जगह रेस्तरां से मिलने वाला कचरा खिला रहे हैं। ऐसा दूध कभी भी स्वस्थ नहीं होगा। इसलिए किसानों को पूरी प्रक्रिया समझाई कि कैसे यह दूध उन बच्चों को नुकसान पहुंचाएगा, जो इसे पीते हैं। इसके साथ ही उन्हें मनाने के लिए स्वस्थ दूध के बदले में बेहतर कीमत देने का वादा किया। गायों को अब मक्का खिलाया जाता है।

पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई जाएंगे राज्यसभा, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया मनोनीत

राज्यसभा में कुल 12 सदस्य राष्ट्रपति की तरफ से मनोनीत होते हैं जो अलग-अलग क्षेत्रों की हस्तियां होती हैं
नयी दिल्ली : देश के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई राज्यसभा जाएंगे। राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने रंजन गोगोई का नाम राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है। यहां बता दें कि राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत किए जाते हैं। ये सदस्य अलग-अलग क्षेत्रों की जानी मानी हस्तियां होती हैं। गोगोई से पहले मोहम्मद हिदायतुल्लाह और रंगनाथ मिश्रा भी चीफ जस्टिस के पद से रिटायर होने के बाद राज्यसभा के लिए मनोनीत हो चुके हैं। गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है, ‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 80 के खंड (तीन) के साथ पठित खंड (एक) के उपखंड (क) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति, एक मनोनीत सदस्य की सेवानिवृत्ति के कारण हुई रिक्ति को भरने के लिए रंजन गोगोई को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत करते हैं।’
न्यायमूर्ति गोगोई देश के 46वें प्रधान न्यायाधीश रहे। उन्होंने देश के प्रधान न्यायाधीश का पद तीन अक्टूबर 2018 से 17 नंवबर 2019 तक संभाला। 18 नवंबर, 1954 को असम में जन्मे रंजन गोगोई ने डिब्रूगढ़ के डॉन बोस्को स्कूल और दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में पढ़ाई की। उनके पिता केशव चंद्र गोगोई असम के मुख्यमंत्री थे।
न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने 1978 में वकालत के लिए पंजीकरण कराया था। 28 फरवरी, 2001 को रंजन गोगोई को गुवाहाटी हाईकोर्ट का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। न्यायमूर्ति गोगोई 23 अप्रैल, 2012 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने थे और बाद में मुख्य न्यायाधीश भी बने।
रंजन गोगोई 17 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पद से रिटायर हुए थे। वह पूर्वोत्तर से सर्वोच्च न्यायिक पद पर पहुंचने वाले इकलौते शख्स हैं। रिटायर होने से पहले इन्हीं की अध्यक्षता में बनी बेंच ने अयोध्या के विवादित स्थल पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
बतौर सीजेआई सुनाए थे कई अहम फैसले
जस्टिस और चीफ जस्टिस के तौर पर न्यायमूर्ति गोगोई का कार्यकाल कुछ विवादों और व्यक्तिगत आरोपों से अछूता नहीं रहा, लेकिन यह कभी भी उनके न्यायिक कार्य में आड़े नहीं आया और इसकी झलक बीते कुछ दिनों में देखने को मिली जब उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने कुछ ऐतिहासिक फैसले दिए। अयोध्या के अलावा उन्होंने जिन प्रमुख मुद्दों पर फैसले दिए हैं, उनमें असम एनआरसी, राफेल, सीजेआई ऑफिस आरटीआई के दायरे में आदि शामिल हैं।
विवादों में भी रहा था कार्यकाल
गोगोई अपने साढ़े 13 महीनों के कार्यकाल के दौरान कई विवादों में भी रहे और उन पर यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप भी लगे लेकिन उन्होंने उन्हें कभी भी अपने काम पर उसे हावी नहीं होने दिया। वह बाद में आरोपों से मुक्त भी हुए। इसके अलावा, वह उन 4 जजों में भी शामिल थे जिन्होंने रोस्टर विवाद को लेकर ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था। उनकी अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने 9 नवंबर को अयोध्या भूमि विवाद में फैसला सुनाकर अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया। यह मामला 1950 में सुप्रीम कोर्ट के अस्तित्व में आने के दशकों पहले से चला आ रहा था।

3 सालों में बनाए 4,000 घोंसले, लगाए 7,000 पेड़, गौरेया को बचाने की है मुहिम!

“बचपन में मुझे अपने गाँव में कहीं भी झट से गौरेया दिख जाया करती थी। हमारे अपने घर में ही इतनी सारी गौरेया का आना-जाना लगा रहता था। हम छत पर उनके लिए दाना-पानी रखते थे और वे आराम से खाया करती थीं। मैंने तो उनके नाखूनों पर नेल पॉलिश भी लगाया है ताकि मुझे पता हो कि हमारे घर वाली गौरेया कौन-सी है, “यह कहना है उत्तर-प्रदेश में वाराणसी के रहने वाले 28 वर्षीय गोपाल कुमार का।
स्कूल की पढ़ाई के बाद गोपाल ने पॉलिटेक्निक किया और फिर बनारस में ही अपना टूर एंड ट्रैवल्स का व्यवसाय शुरू कर लिया। वह बताते हैं कि उनका व्यवसाय तो चल ही रहा है लेकिन साथ में उनके पास काफी वक़्त होता था जिसे वह किसी अच्छे काम के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे।
इस बारे में उन्होंने अपने कुछ दोस्तों से बात की। “काफी बड़ा ग्रुप है हम दोस्तों का। कोई अपना काम करता है, कोई नौकरी में है तो कोई आगे पढ़ाई कर रहा है। हम लोगों ने काफी चर्चा की और सोचा कि अपने स्तर पर हम समाज के लिए क्या कर सकते हैं,” उन्होंने आगे कहा।
गोपाल और उनके दोस्तों ने काफी सोच-विचार करने के बाद तय किया कि हर कोई अपने आस-पास के इलाके में किसी भी सामाजिक कार्य के लिए दिन का एक घंटा समर्पित करेगा। समाज की भलाई से शुरू हुई उनकी चर्चा में पर्यावरण और जीव-जंतु भी शामिल हो गए।
उन्होंने साथ में बैठकर आज के हालातों पर विचार-विमर्श किया और इन्हीं चर्चाओं में गौरेया का जिक्र आया। गोपाल कहते हैं कि उनके बचपन की धुंधली यादें अचानक उनके सामने ताजा हो गईं। लेकिन जब उन्होंने इस बात पर गौर किया और अपने आसपास देखा तो उन्हें एक गौरेया तक नहीं दिखी। उन्हें लगा कि शायद उनके सोसायटी में न हो पर पूरे बनारस में कहीं न कहीं तो होंगी।
“आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन मैंने एक दिन सिर्फ गौरेया ढूंढने के लिए बनारस भ्रमण किया। पर मुझे बहुत ही कम पक्षी दिखे। इसके बाद मैंने इंटरनेट पर रिसर्च की और मुझे बहुत ही हैरान करने वाले आँकड़े पता चले कि कैसे हमारे घरों में आने-जाने वाले पक्षी एकदम लुप्त होने की कगार पर हैं,” गोपाल ने बताया।
उन्होंने ठान लिया कि वह इसी क्षेत्र में काम करेंगे और कोशिश करेंगे कि गौरेया को फिर से अपने आसपास वापस ला सकें। गोपाल की यह मुहिम आज से तीन साल पहले शुरू हुई और दो साल पहले, उन्होंने अपने संगठन, वीवंडर फाउंडेशन को रजिस्टर कराया।
वी वंडर यानी कि ‘हम घुमक्कड़’- इस नाम के बारे में गोपाल कहते हैं कि उन्होंने बहुत सोच-समझ कर यह नाम रखा। “इस मुहिम में मैं अकेला नहीं हूँ, हम एक समूह में काम कर रहे हैं इसलिए वी यानी कि हम। साथ ही, हमने तय किया था कि हम किसी एक जगह नहीं बल्कि अपनी- अपनी इच्छा से जहाँ ज़रूरत हो वहाँ काम करेंगे। इस तरह से हम घूम-घूम कर काम करते हैं और इसलिए घुमक्कड़ नाम दिया गया।”
सबसे पहले गोपाल और उनके साथियों ने अपने आसपास के लोगों को गौरेया के प्रति जागरूक करना शुरू किया। बहुत से लोगों को तो इन घरेलू पक्षियों के अस्तित्व के बारे में ही नहीं पता था क्योंकि उन्होंने कभी देखे नहीं। इसके लिए, हर दिन उन्होंने एक-दो घंटे निकाले और ग्रुप्स में लोगों को समझाया।
रहवास इलाकों के साथ उन्होंने स्कूलों तक भी अपनी पहुँच बनाई। स्कूलों में उन्होंने न सिर्फ जागरूकता के लिए भाषण दिए बल्कि बच्चों को पुराने कार्डबोर्ड, लकड़ी आदि से गौरेया के लिए घोंसला बनाना भी सिखाया। गोपाल के मुताबिक, उनकी टीम अब तक 74,000 छात्र- छात्राओं को यह ट्रेनिंग और वर्कशॉप करा चुकी है।
इसके अलावा, उन्होंने शहर भर में 4 हज़ार से ज्यादा लकड़ी और गत्ते से बने घोंसले लगाए हैं। उनके अभियानों के बाद बहुत से परिवारों ने अपने घरों की छत पर घोंसले लगाकर, पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना भी शुरू किया है।
पिछले तीन सालों से उनकी टीम लगातार काम कर रही है और अब उनकी मेहनत रंग लाने लगी है। वह बताते हैं कि उन्हें कई जगह से वीडियो मिलते हैं कि जहां उन्होंने घोंसला लगाया था वहां अब गौरेया आने लगी है।
गौरेया संरक्षण के साथ-साथ गोपाल की टीम समाज की अन्य समस्याओं को भी हल करने की कोशिश कर रही है। उनकी टीम से कुछ वॉलंटियर्स हर रोज़ झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को पढ़ाते हैं। साथ ही, इन बच्चों को कॉपी, किताब, और अन्य स्टेशनरी का सामान भी फाउंडेशन की तरफ से दिया जाता है।
गोपाल बताते हैं कि बनारस के घाट पर बच्चों को भीख मांगते हुए देखना बहुत आम बात है। हम इन बच्चों को देखते हैं, बहुत बार दुत्कारते हैं, कभी कुछ खाने को या फिर पैसे दे देते हैं और फिर अपनी राह पर बढ़ जाते हैं “लेकिन हम चाहते हैं कि ये बच्चे यह काम छोड़कर शिक्षा से जुड़ें। इसके लिए हम लगातार कोशिश कर रहे हैं। उनसे जाकर मिलते हैं, उनसे बात करते हैं और उन्हें समझाते हैं कि भीख मांगना गलत है। उन्हें स्कूल जाना चाहिए और हम उनके माता-पिता से इस बारे में बात भी करते हैं। धीरे-धीरे ही सही लेकिन हमारी कोशिशें सफल हो रहीं हैं,” उन्होंने आगे कहा।
गोपाल की टीम में आज 200 वॉलंटियर्स हैं, जो साथ में मिलकर काम कर रहे हैं। हर रविवार को ये लोग पौधारोपण भी करते हैं। अब तक उनकी टीम ने लगभग 7 हज़ार पेड़ लगाए हैं और अच्छी बात यह है कि वे पेड़ लगाकर सिर्फ छोड़ नहीं देते हैं। वह बताते हैं कि उनके लगाए हर एक पेड़ पर नाम का टैग होता है, यह नाम उस इंसान का है जिसने यह पेड़ गोद लिया है। “हम नहीं चाहते कि सिर्फ नाम के लिए पौधारोपण हो। पौधारोपण तभी सफल होगा जब आपके लगाए पेड़ पनपें और लहला उठें। इसलिए हम जो भी पेड़ लगाते हैं, हमारे सदस्य या फिर अभियान से जुड़े अन्य लोग उसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी लेते हैं।” हर साल वीवंडर फाउंडेशन अपना वार्षिकोत्सव, झलक आयोजित करती है। इसमें वे देशभर से सामाजिक कार्य कर रहे लोगों को निमंत्रित करके सम्मानित करते हैं। उनका उद्देश्य इन सामाजिक कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाना और उन्हें अपने यहाँ बुलाकर अपनी टीम और अन्य लोगों को प्रोत्साहित करना है।
अपने हर काम के लिए फंडिंग वे आपस में पैसे इकट्ठा करके करते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कभी कोई प्राइवेट फंडिंग नहीं ली। यदि कोई बाहर से उनकी मदद की इच्छा जताता है तो वे उनसे बच्चों के लिए कुछ करने को कहते हैं।
वीवंडर फाउंडेशन, भले ही बहुत छोटे स्तर पर काम कर रहा है लेकिन उनके छोटे-छोटे कदम एक बड़े बदलाव की शुरुआत हैं। उनके इन प्रयासों से बनारस के लोगों में जागरूकता फ़ैल रही है और आने वाली पीढ़ी के लिए अच्छे उदहारण स्थापित हो रहे हैं।
गोपाल अंत में कहते हैं कि उनका उद्देश्य समाज के लिए कुछ करना है और वह आजीवन सामाजिक कार्यों से जुड़े रहेंगे। उनकी यह पहल उनके दोस्तों और जानने वालों के माध्यम से अब कोलकाता, दिल्ली और उड़ीसा तक पहुँच रही है।

(साभार – द बेटर इंडिया)

केले के पत्ते से इस युवा ने बनाये 30 तरह के उत्पाद और कटलरी

हमारे देश में ऐसे बहुत से युवा हैं, जो समस्या पर नहीं बल्कि उनके समाधान पर बात कर रहे हैं। तमिलनाडु के विरुधुनगर के एक गाँव में रहने वाले 21 वर्षीय टेनिथ आदित्य इन युवाओं में से एक हैं। कंप्यूटर साइंस में स्नातक की डिग्री हासिल करने वाला यह युवा समस्याएं हल करने में विश्वास रखता है।
आदित्य ने अब तक 19 आविष्कार किए हैं और उनके नाम 17 अंतरराष्ट्रीय, 10 राष्ट्रीय और 10 राज्य-स्तरीय सम्मान हैं। एक आविष्कारक, एक प्रोफेशनल कॉइन कलेक्टर, एक सॉफ्टवेयर डेवलपर, एक शिक्षक और मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में अपनी पहचान बना चुके आदित्य हर दिन कुछ नया सीखने की कोशिश करते हैं। उनका उद्देश्य अपने ज्ञान और अपनी प्रतिभा को देश के हित में लगाना है।
आदित्य के अविष्कारों का सफ़र 8 साल की उम्र में शुरू हुआ। वह बताते हैं कि उन्हें बचपन में अपने खिलौनों को खोलकर देखने की और उनकी तकनीक समझने की बहुत जिज्ञासा होती थी। उनकी इसी जिज्ञासा से उनकी दिलचस्पी विज्ञान में हुई और बहुत ही कम उम्र से ही उन्होंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया। हमेशा से ही वह अपने बाकी साथियों और सहपाठियों से एकदम अलग रहे। उनका ज़्यादातर वक़्त अपनी प्रयोगशाला में बीतता था।
“मैंने अपने घर को ही अपनी प्रयोगशाला बना ली थी। अलग-अलग किताबें पढ़ता और कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करता। इस वजह से अक्सर मुझे अपने कुछ शिक्षकों और अन्य लोगों से बातें सुननी पड़तीं थीं क्योंकि उन्हें लगता था कि मैं अपनी पढ़ाई का वक़्त बर्बाद कर रहा हूँ। लेकिन मेरे माता-पिता ने हमेशा मेरा साथ दिया,” उन्होंने बताया।
एक बार प्रयोग करते हुए उन्होंने कोई हानिकारक केमिकल सूंघ लिया और उनकी तबियत बिगड़ गयी। उनके माता-पिता ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया और जब उन्हें होश आया तो उन्होंने कहा ‘विज्ञान बलिदान माँगता है।’ आदित्य की इस बात ने उनके माता-पिता को परेशान कर दिया और उन्होंने उन्हें केमिकल्स से दूर रहने की हिदायत दी।
इसके बाद, उन्होंने विज्ञान के दूसरे क्षेत्र जैसे एनर्जी, बायोलॉजी आदि पर ध्यान दिया। आदित्य को अपने प्रयोगों के लिए जो चाहिए होता, वो चीज वह खुद बना लेते। वह कहते हैं कि उन्हें काम करते हुए अक्सर बहुत से डिवाइस को चलाने के लिए कई सारे प्लग पॉइंट्स चाहिए होते थे। लेकिन कई सारे एक्सटेंशन बोर्ड इस्तेमाल करने का मतलब था बहुत सी वायर्स, जिन्हें हैंडल करना मुश्किल था। इसलिए उन्होंने अपनी ज़रूरत के मुताबिक एडजस्टेबल इलेक्ट्रिसिटी एक्सटेंशन बनाया। इसे 3 मीटर की दूरी तक आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।
आदित्य के सभी आविष्कार अलग-अलग क्षेत्रों में रहे हैं। उन्होंने पहले एनर्जी को समझकर एक्सटेंशन बनाया और उसके बाद, उन्होंने बायोलॉजी विषय पर पढ़ना शुरू किया। वह बताते हैं,
“मैंने जब बायोलॉजी पर फोकस किया तो मुझे एक बात समझ में आई कि हर एक ऑर्गनिक मैटर डीकम्पोज होता है, क्योंकि हर एक ऑर्गनिक मैटर की सेल (कोशिका) होती हैं और इनकी उम्र बढ़ती रहती है। इसी कॉन्सेप्ट से मैंने एक सेल टेक्नोलॉजी पर काम किया जिससे कि हम सेल की बढ़ती उम्र कुछ वक़्त के लिए रोक सकते हैं।”
आदित्य ने अपनी इस सेल टेक्नोलॉजी को केले के पत्तों पर प्रयोग करके ‘बनाना लीफ टेक्नोलॉजी‘ तैयार की। इससे केले के पत्ते की ज़िंदगी बढ़ गई। वैसे तो पेड़ से टूटने के बाद पत्ते मात्र तीन दिन में ही सूख जाते हैं, लेकिन अगर उन्हें आदित्य की तकनीक से प्रिज़र्व किया जाए तो ये पत्ते तीन साल तक सही-सलामत रहेंगे।
इन पत्तों को कप-कटोरी जैसे प्रोडक्ट्स बनाने के बाद एक केमिकल- फ्री और इको- फ्रेंडली बायोमटेरियल के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इन प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल के बाद यह जैविक तरीकों से डीकंपोज़ भी हो जाएंगे और इससे हमारा पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होगा।
“इस तकनीक से मैंने पत्ते का लाइफ स्पैन बढ़ा दिया और साथ ही, इनकी सहनशीलता, लचीलापन जैसे अन्य गुणों को भी बढ़ाया है। बनाना लीफ टेक्नोलॉजी से प्रिज़र्व किए गए पत्ते कोई भी तापमान झेल सकते हैं और साथ ही, इनकी भार उठाने की क्षमता भी बढ़ जाती है,” उन्होंने आगे कहा।
आदित्य का यह इनोवेशन सिंगल यूज प्लास्टिक और पेपर का बेहतरीन विकल्प है। प्रिज़र्व करके रखे गए इन केले के पत्तों से रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल होने वाले 30 तरह के उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इन प्रोडक्ट्स में प्लेट, गिलास, स्ट्रॉ, कटोरी, टम्बलर, पैकिंग बॉक्स आदि शामिल हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इस तकनीक को सिर्फ केले के पत्ते पर ही नहीं बल्कि अन्य पेड़ों के पत्तों पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

आदित्य – तस्वीर – साभार – द बेटर इंडिया

“हमारे यहां केले के पत्ते आसानी से मिल जाते हैं और यह ऐसा रॉ मटेरियल है जो आपको कम लागत में बहुत ज़्यादा मात्रा में मिल जाएगा। इस वजह से हमने केले के पत्ते पर तकनीक का इस्तेमाल करके बायोमटेरियल बनाया। अन्य जगहों पर जो पेड़ काफी मात्रा में मिल सकते हैं, वहां पर उसके पत्तों पर इस तकनीक का इस्तेमाल करके बायोमटेरियल बना सकते हैं। इनसे बने प्रोडक्ट्स एकदम इको-फ्रेंडली और कम लागत वाले हैं, जो आज की ज़रूरत भी है,” उन्होंने बताया।
आदित्य सिर्फ 10-11 साल के थे जब उन्होंने यह आविष्कार किया। उन्हें इस आविष्कार के लिए न सिर्फ भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर सम्मान और पहचान मिली है।
इसके अलावा, आदित्य आज 35 कंप्यूटर एप्लीकेशन और 9 कंप्यूटर लैंग्वेजेज के मास्टर हैं। उन्होंने 13 साल की उम्र में सबसे लम्बा चलने वाला कंप्यूटर प्रोग्राम बनाया, जिसका नाम है पॉवर माइंड और यह 570 साल तक चल सकता है। उनके नाम पर एक गिनीज़ बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड भी दर्ज है।
अब आदित्य सिर्फ एक आविष्कारक नहीं हैं बल्कि उद्यमी भी हैं। उन्होंने अपने कई स्टार्टअप शुरू किए हैं, जिनमें टेनिथ इनोवेशन्स, अलट्रू सोशल नेटवर्क, लेट्स इनोवेट युथ मूवमेंट, और अलट्रू इनोवेशन सेंटर शामिल है। इंटरनेशनल फेडरेशन साइंस के प्रेसिडेंट होने के साथ-साथ आदित्य 5 इंटरनेशनल जूरी के सदस्य भी हैं। अपने स्टार्टअप्स के बारे में बताते हुए, उन्होंने सबसे पहले ‘लेट्स इनोवेट यूथ मूवमेंट’ का जिक्र किया।
“साल 2009 में मैंने इसे एक अभियान की तरह शुरू किया था, जिसका उद्देश्य पहले देश में और अब विश्व स्तर पर बच्चों को विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है। मैं चाहता हूँ कि बच्चे अपनी कल्पनाओं को सच्चाई में बदलें और इसमें हम उनकी मदद करें,” आदित्य ने कहा।
उन्होंने भारत के ग्रामीण हिस्सों के स्कूलों में वर्कशॉप और माइंड स्ट्रॉमिंग सेशन किए ताकि बच्चों को तकनीक के बारे में समझने की प्रेरणा मिले। उनका यह अभियान शुरुआत के पहले साल से ही काफी सफल रहा। आदित्य बताते हैं कि यह प्रोग्राम अब तक 30 देशों में 90 हज़ार बच्चों तक पहुंचा है और इसके ज़रिए 23 इनोवेशन निकलकर आएं हैं।
आदित्य ने एक ग्लोबल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, अलट्रू सोशल नेटवर्क भी बनाया है। उनके मुताबिक, यह एक ग्लोबल ट्रैक फ्री सोशल नेटवर्क और एक सर्च इंजन है, जहां आपको सत्यापित जानकारी मिलेगी।
(साभार – द बेटर इंडिया)

कहर ए कोरोना : बिन बुलाये बेमियादी बंद के बीच चल रही है जंग

शहर के शहर बगैर हड़ताल के ही बंद हैं। छुट्टियाँ हो गयी हैं मगर इस बार सब घर में हैं…गर्मियों ने तो कदम भर रखा है मगर गर्मियों के पहले ही शिक्षण संस्थान बंद हो चुके हैं। भारत में आँकड़ा 100 के पार हो चुका है मगर कोरोना को लेकर अफरा -तफरी है तो उसके खिलाफ जंग भी जारी है। एहतियातन शिक्षण संस्थान और पर्यटन स्थल बंद हो रहे हैं। हवाई अड्डों पर हर एक यात्री की जाँच हो रही है और 15 अप्रैल तक हर गतिविधि टाल दी गयी है। सिनेमाघर से लेकर मल्टीप्लेक्स तक, सब खाली हो रहे हैं। इस वर्ष का आईपीएल भी अभी नहीं होगा।

इस वर्ष का गोइन्का पुरस्कार समारोह निरस्त
कमला गोइन्का फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी श्री श्यामसुन्दर गोइन्का ने बताया है कि इस वर्ष बेंगलुरू में आयोजित पुरस्कार व सम्मान समारोह “कोरोना वायरस” को मद्दे नजर रखते हुए व भारत सरकार की तरफ से जारी विज्ञप्ति को आधार मान कर व जन-हित के लिए रद्द किया जा रहा है। विज्ञप्ति द्वारा यह भी सूचित किया है कि उपरोक्त सभी पुरस्कृत साहित्यकारों को नगद राशि के संग प्रदत्त प्रतीक चिन्ह व अन्य सम्मान्य सामग्री समारोह में न देकर अब उन्हें कुरियर द्वारा भिजवायी जायेगी।

शिक्षण संस्थानों में कक्षाएँ स्थगित
देश भर के कई राज्यों में शिक्षण संस्थान 31 मार्च तक बंद रहेंगे और कई राज्यों में यह तिथि बढ़ाई भी जा सकती है। पश्चिम बंगाल में न सिर्फ शिक्षण संस्थान बंद हुए बल्कि निगम चुनाव भी फिलहाल नहीं होने जा रहे हैं।  कोरोना वायरस से उत्पन्न संकट को देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी निर्देश के आलोक में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में 16 मार्च से 31 मार्च तक के लिए कक्षाएँ स्थगित कर दी गई हैं। केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति के अनुमोदन से कुलसचिव ने इस आशय का एक कार्यालय आदेश कोलकाता केंद्र के लिए जारी किया है। इस दौरान केंद्र कार्यालय पूर्ववत खुला रहेगा।
जरूरी है कि हम सजग रहें, सावधान रहें और बगैर आतंकित हुए स्थिति का सामना करें तो हालात शीघ्र ही नियंत्रण में लाये जा सकेंगे।