Monday, April 27, 2026
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भवानीपुर कॉलेज, प्रोजेक्ट लाइफ फोर्स और असीम बोस की पहल पर रक्तदान शिविर

कोलकाता : कभी किसी की रगों में दौड़ कर देखो अच्छा लगता है। कोविड 19 के इस कठिन दौर से गुजर रहे रोगियों और लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रोजेक्ट लाइफ फोर्स एनजीओ द्वारा रक्तदान शिविर का आयोजन सराहनीय पहल है। इस शिविर में भवानीपुर कॉलेज और कॉन्सीलर असीम बोस की सहभागिता रही। विगत छह वर्षों से प्रोजेक्ट लाइफ फोर्स लगभग 350 कैंपों का आयोजन कर चुका है। इसके ट्रस्टी धानीश सेठ ने बताया कि वर्तमान समय में कोविड के कारण अस्पतालों में खून की भारी माँग है। संक्रमण के डर से और लॉकडाउन के कारण अभी तो शिविरों का आयोजन भी संभव नहीं है। भवानीपुर कॉलेज ने जो स्थान दिया है, उसको केएमसी के स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा सेनेटाइज करवा कर मात्र चार बेड ही लगाए गए जो संक्रमण को ध्यान में रखते हुए किया गया। चार दिन के इस शिविर में रक्तदान लेने का निरीक्षण वरिष्ठ डॉक्टरों और टेक्निशियनों की उपस्थिति में हुआ। स्थान पर हाथ धोने के लिए सेनेटाइजर की व्यवस्था थी वहीं पीपल्स ब्लड बैंक ने रक्त एकत्रीकरण का कार्य किया। प्रत्येक रक्त दानी व्यक्ति को आधे घंटे की अवधि पर अलग अलग खून देने के लिए बुलाया गया जिससे भीड़ की भी आशंका नहीं रही । सुरक्षा के सभी एहतियात रखे गए। चार दिनों तक होने वाले इस रक्त शिविर में 30 लोगों ने रक्तदान किया जिन्हें प्रमाणपत्र और नाश्ता भी प्रदान किया गया। भवानीपुर कॉलेज के उपाध्यक्ष मिराज डी शाह और कॉन्सीलर असीम बोस की सहभागिता से रक्तदान का लाभ पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में भर्ती कोविड रोगियों के लिए लाभकर है। डॉ. वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम की जानकारी दी ।

कहीं मानवता शर्मसार तो नहीं?

– डॉ वसुंधरा मिश्र
 कोरोना वायरस की गति को लेकर बहुत से सवाल उठ रहे हैं जो पूरे विश्व को आतंकित कर रहे हैं। कुछ देश तो तृतीय स्तर में संक्रमित हो रहे हैं और प्रति दिन के हिसाब से वहां मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है। इटली, स्पेन और अब अमरीका में आंकड़े बढ़ रहे हैं। भारत अभी तो नियंत्रण में है, कहीं उस ओर चला गया तो इस महामारी से होने वाली तबाही को रोकना बेकाबू हो जाएगा। आज हम कोरोना वायरस के पंजों की गिरफ़्त में हैं जो अदृश्य रूप से मानवता को कुचलने में लगने लगी है। बड़े बड़े देशों में कोरोना वायरस ने खलबली मचा दी है। क्या यह एकछत्र सत्ता प्राप्त करने के लिए किसी का खतरनाक खेल तो नहीं? इस वायरस को कहीं से भेजा तो नहीं गया है? और यदि ऐसा नहीं है तो पूरे विश्व में इस वायरस का प्रकोप कहीं अधिक और कहीं कम क्यों है ? साइबेरिया के पक्षियों की तरह क्या इस वायरस को स्थान विशेष के मार्ग का ज्ञान है? आधुनिक काल ने मनुष्य की अस्मिता को पहचानने में अपनी महती भूमिका निभाई थी। व्यक्ति महत्वकांक्षी और मैं यानि अहम् पर केन्द्रित होता चला गया। चरित्र आदर्श और मूल्यों का स्खलन होता चला गया। हम मनुष्य के नैसर्गिक प्रकृति को भुलाने लगे और भारतीय संस्कृति और मूल्यों से खिलवाड़ करने लगे।
आज हम उत्तर आधुनिक युग में जी रहे हैं जहाँ मनुष्यता के नाम पर संवेदना को परोसे जाने का उत्पाद आरंभ होने लगा है।यह बाजारवाद का बहुत बड़ा सिद्धांत तो नहीं है? चाहे प्राकृतिक आपदा हो या राजनीतिक सत्ताधारियों की आपसी लड़ाई हो,  आम आदमी आशंकाओं के बीच ही फंसे रहते हैं।वे त्रिशंकु की तरह बीच में लटकने को बाध्य होते हैं। सरकार और मीडिया बेचारी का भला हो, निष्पक्षता के साथ अपनी अपनी भूमिकाएं निभाते हुए उन्हें भी खबरदार रहना पड़ता है। भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है। ऐसे सरकार के पास आर्थिक मंदी नहीं है लेकिन जब आम लोगों को आपदाओं से उबरने के लिए सहायता राशि देने का समय आता है तो सरकार देश के लोगों से ही वसूल करती है। यह लोकतंत्र की खिल्ली उड़ाता दिखाई पड़ता है। समय पर आम जनता की छोटी-छोटी अनिवार्य आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पातीं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का ईनाम है। जनता को पिसना पड़ता है। वर्तमान समय में कोविद 19महामारी को संभालना अब भारी लगने लगा है। अचानक ऐसी अदृश्य आपदाओं का प्रकोप होने पर सरकार, प्रशासन और संबंधित विभाग अपने को  व्यक्त करने का तरीका भी बदल देते हैं। जनता को उन्हीं की मानसिकता में संवेदना के औजारों द्वारा सेट किया जाता है। वही दिखाया जाता है जो वे देखना चाहते हैं। बिना किसी पूर्व सुरक्षा और सुविधाओं के घर बंद कर बहुत अच्छा कदम उठाया जिसकी सराहना तो पूरे विश्व में हो रही है। भारत भी उससे अपने तरीके से लड़ रहा है। यह महामारी तृतीय विश्व युद्ध के रूप में उभर कर आई है। इसके भयंकर परिणामों को भी जनता को ही झेलना पड़ेगा।
कोविद – 19 की गतिशीलता एक ऐसे योद्धा की चाल है जो दिखाई नहीं दे रही और अपना काम तमाम करती जा रही है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, सरकार सभी अपनी बेबसी पर हैरान हैं। यह वायरस पूरी दुनिया के 190 से अधिक देशों को आक्रांत कर चुका है। जहाँ जहाँ गया वहाँ वहाँ उसने अपना संपर्क बनाया और लोगों को गुणात्मक संख्या में लपेटने लगा। कुछ खास लोगों तक गया फिर वहाँ से दूसरों तक चेन बनाता चला गया। जहाँ से शुरू हुआ वहाँ तो सामान्य जीवन भी शुरू हो गया। लोगों में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। चीन के प्रमुख शहरों में कोरोना वायरस का न फैलना कहीं कोई साजिश के तहत तो नहीं है। मानवता को अपनी मुट्ठी में रखने के स्वप्न को पूरा करने के लिए कहीं विश्व को ठगा तो नहीं जा रहा है। लोगों का मनुष्यता पर से ही विश्वास न उठता जा रहा है। यह वायरस कहीं मानव संवेदना और संस्कृति पर प्रहार तो नहीं है?  सत्ता हथियाने का दम वही देश भर सकता है  जिसके पास ताकत और अर्थतंत्र मजबूत हो।प्रतिस्पर्द्धा में वही शक्ति विजयी होती है जो मानवता की सेवा में अपने को लगाती है क्योंकि मानवीय संवेदनाओं से ही सत्ता विजयी होती है अन्यथा उसका भी विनाश होता हैऔर उसकी जगह फिर कोई दूसरा नायक जन्म लेता है। दुनिया के इतिहास में ऐसे अनेक पृष्ठ हैं जहाँ मानवता को कुचलकर अपना झंडा फहराया गया है। आधुनिक युग ने हमें जो दिया, उत्तर आधुनिकता हमसे छीन रही है। यह संकेत संकटों का है। हमारी संवेदना को खतरा है। मनुष्यता के नाम पर संवेदना का गला घोटा जा रहा है। मेरी पंक्तियां याद आ रही हैं – – संवेदनाओं को धागों में पिरोने के बीच /न जाने टूट जाती हैं कितनी ही कड़ियाँ /मैंने उसे पुचकारा /कोमल स्पर्श को फेरा /उसने हल्की- सी ली करवट /और फिर वह गया बदल – – – उसकी कुर्बानी को /भुनाने लगी रिश्तों में / मेरा शौक बढ़ता चला गया/ और मैं /अपने तानों – बानों को लगी इच्छानुसार मरोड़ने /खेलने लगी तंतुओं की नरमाई से (हर दिन नया(काव्य संग्रह) ,  ताने-बाने, पृष्ठ 28-29)
अभी तो जीने की आशा है।विश्व के बड़े-बड़े देश कोरोना वायरस से जूझ रहे हैं। कितने ही डॉक्टर और नर्स भी उसकी चपेट में आ गए हैं। हजारों की संख्या में लोग मर रहे हैं। इस भयावह स्थिति में हम घर में ही रहें तो अधिक सुरक्षित रह सकते हैं।  कोरोना वायरस से बचने की रामबाण औषधि घर में रहना है। मानवता को बचाना है तो भीतर ही रहें।

कोवड-19: कोल इंडिया की इकाइयों ने लगाए राज्यों में अपने अस्पतालों में 1,509 विशेष बेड 

नयी दिल्ली : सार्वजनिक क्षेत्र की कोल इंडिया लि. की अनुषंगी इकाइयों ने कोविड-19 संकट से निपटने के लिए आठ राज्यों में अपने अस्पतालों में विशेष रूप से 1,509 बिस्तरों (बेड) का इंतजाम किया है। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।
कोयले से संपन्न ये आठ राज्य राज्य हैं…झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और असम।
इन 1,509 बिस्तरों में से सबसे अधिक 664 महानदी कोलफील्ड्स ने ओड़िशा के भुवनेश्वर, अंगुल, झारसुगुड़ा, संबलपुर और सुंदरगढ़ में अपने अस्पतालों में स्थापित किए हैं। इसके अलावा नार्दर्न कोलफील्ड्स लि.ने मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में 200 विशेष बेड का इंतजाम किया है। भारत कोकिंग कोल लि. ने 100, सेंट्रल कोलफील्ड्स ने 180, ईस्टर्न कोलफील्ड्स ने 144, साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स ने 132, वेस्टर्न कोलफील्ड्स ने 75 और नार्थ ईस्टर्न कोलफील्ड्स ने 14 विशेष बेड का प्रबंध किया है।

पेटा ने नवीन पटनायक को दिया पुरस्कार

भुवनेश्वर : ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को पशु अधिकार संस्था पेटा इंडिया ने कोरोना वायरस महामारी को लेकर चल रहे लॉकडाउन के दौरान राज्य में सामुदायिक पशुओं को खिलाने के लिए धन आवंटित करने के लिए एक पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने पाँच नगर निगमों और सभी 48 नगर पालिकाओं में आवारा पशुओं को खिलाने के लिए 54 लाख रुपये मंजूर किया है। लॉकडाउन के दौरान पशुओं को भोजन मिलने में मुश्किलें हो रही हैं।
उनके प्रयासों का सम्मान करते हुए, पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) इंडिया ने पटनायक के लिए ‘हीरो टू एनिमल्स अवार्ड’ की घोषणा की। पुरस्कार स्वरूप उन्हें एक प्रमाण पत्र और प्रशस्ति पत्र दिया गया।
पटनायक ने पेटा इंडिया को इस सम्मान के लिए धन्यवाद दिया और सभी से इन कठिन समय में परोपकारी बनने और आसपास के जीव-जन्तुओं का ख्याल रखने की अपील की।

भारतीय वैज्ञानिकों को मिली कामयाबी, जाँच के लिए बनाई पेपर-स्ट्रिप किट

कोरोना वायरस के फैलते संक्रमण से निपटने के लिए भारतीयों वैज्ञानिकों ने त्वरित जांच के लिए नई किट विकसित करने में सफलता पाई है। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) से जुड़े जिनोमिकी और समवेत जीव विज्ञान संस्थान (आईजीआईबी) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह पेपर-स्ट्रिप आधारित परीक्षण किट है। इसकी मदद से कम समय में संक्रमण का पता लगाया जा सकता है।
आईजीआईबी के वैज्ञानिक डॉ. सौविक मैती और डॉ. देबज्योति चक्रवर्ती की अगुवाई वाली टीम द्वारा विकसित यह किट एक घंटे से कम समय में कोरोना वायरस (एसएआरएस-सीओवी-2) के वायरल आरएनए का पता लगा सकती है। खास बात यह है कि फिलहाल परीक्षण विधियों के मुकाबले पेपर-स्ट्रिप किट काफी सस्ती है।
एक बार इसके विकसित होने और व्यापक प्रयोग से कोरोना जांच से निपटने में मदद मिल सकती है। चक्रवर्ती ने बताया, संक्रमित व्यक्ति में कोरोना के जीनोमिक अनुक्रम की पहचान के लिए पेपर-किट में जीन-संपादन की अत्याधुनिक तकनीक क्रिस्पर-कैस-9 का उपयोग है।
वैधता परीक्षण पूरा होने के बाद इसका उपयोग जाँच के लिए किया जा सकेगा। इसके उपयोग से परीक्षण की लागत करीब 500 रुपये आती है। वैज्ञानिक इस टूल पर दो साल से काम कर रहे हैं। जनवरी के अंत में, चीन में कोरोना का प्रकोप बढ़ा तो कोविड-19 का पता लगाने में इसका प्रयोग किया।
सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी मांडे के अनुसार किट के विकास से जुड़े प्राथमिक परिणाम उत्साहजनक हैं। प्राथमिक नतीजे सीमित नमूनों पर हैं। इसका परीक्षण बड़े पैमाने पर हो रहा है। दूसरे देशों से मंगाए नमूनों पर भी परीक्षण हो रहा है। नियामक निकायों से अनुमति मिलने के बाद किट का उपयोग परीक्षण के लिए किया जा सकता है।

कोरोनावायरस से निपटने के लिए आदित्य बिड़ला ग्रुप खर्च करेगा 500 करोड़

मुम्बई : कोरोनावायरस से निपटने के लिए आदित्य बिड़ला ग्रुप 500 करोड़ रुपये खर्च करेगा। समूह द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार 400 करोड़ प्रधानमंत्री राहत कोष में दिए जाएंगे। महामारी से राहत के उपायों के लिए फिक्की-आदित्य बिड़ला सीएसआर सेंटर को 50 करोड़ पहले ही दिए जा चुके हैं। इसके अलावा 50 करोड़ रुपए 10 लाख एन-95 मास्क की आपूर्ति, 2.80 लाख पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट और वेंटीलेटर्स के लिए जारी किए गए हैं। ग्रुप ने कहा है कि कपड़ा मंत्रालय की मदद से ट्रिपल लेयर वाले 10 लाख सर्जिकल मास्क और एक लाख किट का प्रोडक्शन किया जा रहा है।

गुजरात में बना सस्ता स्वदेशी वेंटिलेटर, डीआरडीओ ने बनाया पर्सनल सैनिटाइजेशन चैंबर और फेस मास्क

कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए विशेषज्ञों ने कम से कम 50 हजार अतिरिक्त वेंटिलेटर की जरूरत बताई है। अभी देशभर में केवल 40 हजार वेंटिलेटर हैं।
विदेश से आने वाले वेंटिलेटर की कीमत 6 लाख रु. होती है जबकि स्वदेशी वेंटिलेटर 1 लाख रु. में होगा तैयार
नयी दिल्ली : कोरोनावायरस के खिलाफ छिड़ी इस जंग में देश का हर शख्स अपना योगदान दे रहा है। सामाजिक संस्थानों से जुड़े लोग गरीबों की मदद कर रहे हैं। शैक्षणिक, शोध संस्थानों और निजी संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिक इलाज को लेकर तमाम तकनीक तैयार कर रहे हैं। शनिवार को देश के वैज्ञानिकों ने तीन नए इनोवेटिव प्रोडक्ट तैयार करने में कामयाबी हासिल की। एक तरफ जहां गुजरात के वैज्ञानिकों ने बेहद सस्ता वेंटिलेटर बनाया तो दूसरी ओर पुणे के वैज्ञानिकों ने कोरोना का सैंपल लेने वाला स्वाब डेवलप किया। डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने सर्जिकल सूट और फेस मास्क के बाद अब सेल्फ सैनिटाइजेशन चैंबर तैयार किया है। खास बात यह है कि तीनों उत्पाद कोरोना के खिलाफ इस लड़ाई में देश की काफी मदद कर सकते हैं।
पुणे की सेंटर फॉर मटेरियल्स फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी (सीमेट) के वैज्ञानिकों ने कम लागत वाला स्वदेशी पॉलिमर स्वाब तैयार करने में कामयाबी हासिल की है। केंद्र के डॉ. मिलिंद कुलकर्णी के मुताबिक, स्वाब का उपयोग कोरोनावायरस परीक्षण के लिए एकत्रित किए जाने वाले नमूनों को रखने में काम आता है। अभी इसे इटली, अमेरिका और जर्मनी से मंगाया जाता है। डॉ. मिलिंद ने बताया कि चूंकि, पूरी दुनिया इस समय कोरोना संकट से जूझ रही है। खासतौर पर इटली, अमेरिका और जर्मनी में इस वक्त कोरोना के सबसे ज्यादा मामले हैं। वहीं, भारत में भी संक्रमण के मामले काफी बढ़ चुके हैं। इसलिए आने वाले दिनों में स्वाब की कमी हो सकती है। मुसीबत की इस घड़ी में यह स्वदेशी स्वाब देश के काफी काम आ सकता है। डॉ. मिलिंद के अनुसार, अभी स्वदेशी स्वाब का प्रोटोटाइप तैयार हुआ है। अब इसके क्लिनिकल ट्रायल की तैयारी की जा रही है। इसकी जिम्मेदारी यूरोलॉजिस्ट डॉ. केएन श्रीधर को दी गयी है। डॉ. मिलिंद के अनुसार, आने वाले दिनों में लाखों स्वाब की जरूरत पड़ेगी। उनकी मशीन एक मिनट में 1 हजार से 2 हजार स्वाब तैयार करने में सक्षम है।

10 दिनों में गुजरात सरकार को मिल जाएंगे 1 हजार वेंटिलेटर
गुजरात के राजकोट की ज्योति सीएनसी कंपनी ने स्वदेशी वेंटिलेटर तैयार करने में कामयाबी हासिल की है। इसे धामन-1 नाम दिया गया है। इसके सभी हिस्से स्वदेशी हैं। कंपनी का दावा है कि इसकी कीमत महज 1 लाख रुपये है जबकि विदेश से आने वाला 1 वेंटिलेटर कम से कम 6.50 लाख रुपये का मिलता है। मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने शनिवार को गांधीनगर में धामन -1 को लॉन्च किया। रुपाणी ने बताया कि अगले 10 दिनों में कंपनी गुजरात सरकार को 1000 एयर-1 वेंटिलेटर देगी। कंपनी के पराक्रम सिंह जडेजा ने बताया, ”इसे डॉ. राजेंद्र सिंह परमार की टीम ने महज 10 दिनों में तैयार किया है। डॉ. परमार ने 5 साल तक अमेरिका में काम किया है। इस वेंटिलेटर को बनाने में 150 विशेषज्ञ इंजीनियरों की टीम जुटी थी। इसका परीक्षण अहमदाबाद के असरवा सिविल अस्पताल में भर्ती कोरोना मरीज पर किया गया। वेंटिलेटर पांच घंटे से अधिक समय तक रोगी पर अच्छा काम कर रहा है।”
डीआरडीओ ने बनाया सैनिटाइजेशन चैंबर और फेस प्रोटेक्शन मास्क
कोरोनावायरस से निपटने के लिए तैयार डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेसन (डीआरडीओ) ने एक फुल बॉडी डिसइन्फेक्शन चैंबर बनाया है। इसे सैनिटाइजेशन चैंबर भी कहा जा रहा है। साथ ही फेस प्रोटेक्शन मास्क भी बनाया है, जिसे हॉस्पिटल में सप्लाई भी किया जा रहा है। दिल्ली के अहमदनगर में डीआरडीओ की लेबोरेटरी ‘व्हीकल रिसर्च एंड डेवलपमेंट इस्टैबिलसमेंट’ने इस सैनिटाइजेशन चैंबर को डिजाइन किया है। डीआरडीओ ने कहा कि यह एक पोर्टेबल सिस्टम है। इस चैंबर में व्यक्ति को एक बार में पूरी तरह से सैनिटाइज किया जाएगा। इसमें एक पैडल के माध्यम से खुद को सैनिटाइज किया जाता है। चैंबर में पंप के माध्यम से हाइपो सोडियम क्लोराइड की तेज फुहार डाली जाती है। यह स्प्रे 25 सेकंड तक चलता है। इस चैंबर में व्यक्ति को अपनी आंखे बंद रखनी होती हैं। इस चैंबर में 700 लीटर का टैंक है। एक बार में करीब 650 लोगों को सैनिटाइज किया जा सकता है।

250 किमी दूर पहुंचकर मरीजों का इलाज कर रही 8 महीने की गर्भवती नर्स

नयी दिल्ली : कोरोना संकट के बीच ड्यूटी निभा रहे नायकों की तारीफ हर जगह हो रही हैं। इनमें दो मांएं ऐसी भी हैं, जो शारीरिक चुनौतियों के बीच भी ड्यूटी पर डटी हुई हैं। विनोथिनी और नैना, दोनों कर्मयोद्धा हैं, मुश्किल हालात में भी अपने काम से सेवा करने में जुटी हैं। वहीं, इंदौर के तुकोगंज थाने के टीआई निर्मल श्रीवास भी ऐसा ही कुछ कर रहे हैं ड्यूटी और परिवार के प्रति जिम्मेदारी को निभाने के लिए।
तमिलनाडु में एक नर्स विनोथिनी, जो खुद आठ महीने की गर्भवती हैं, कोरोना रोगियों के इलाज में मदद करने के लिए तिरुचिरा से रामनाथपुरम की 250 किमी की दूरी तय कर पहुंच गईं। 25 साल की विनोथिनी त्रिची के एक निजी अस्पताल में नर्स हैं, लेकिन हालात देखते हुए प्रशासन ने उन्हें कोरोना रोगियों के इलाज में जुटी टीम में शामिल किया है। वो बताती हैं कि अफसरों को नहीं पता था कि मैं गर्भवती हूँ। जब उन्हें पता चला तो उन्होंने मेरा नाम हटा दिया। लेकिन मैं इस संकट की घड़ी में पीछे नहीं हटना चाहती थी। मैंने अधिकारियों से बात की, लेकिन वे नहीं माने। बाद में स्थानीय मंत्री के दखल से मुझे लॉकडाउन में निकलने के लिए विशेष पास दिया गया। इसके बाद मैं पति के साथ कार से प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पहुँचीं। अब सेंटर में मरीजों की देखभाल कर रही हूँ।

सिर्फ एक बार खाना खाने घर जाते हैं टीआई, बेटी दूर खड़ी बस देखती है

डिलीवरी करीब, फिर भी रोज 6 घंटे ड्यूटी पर रहती हैं सफाईकर्मी नैना
हीरे की नगरी सूरत इन दिनों लॉकडाउन है, लेकिन सफाई कर्मचारी नैना परमार 9 माह की गर्भवती होने के बावजूद रोज ड्यूटी पर पहुंच जाती हैं। वो भी तब, जब उनकी डिलीवरी कभी भी हो सकती है। वे अपनी 5 से 6 घंटे की ड्यूटी के दौरान लोगों से लॉकडाउन का पालन करने की अपील भी करती हैं। साथ ही यह भी बताना नहीं भूलती कि कोरोनावायरस को हराने के लिए यह कितना जरूरी है। नैना की पांच साल की एक बच्ची भी है। पति स्कूल वैन चलाते हैं, लेकिन इन दिनों घर पर ही हैं। नैना का कुल 6 लोगों का परिवार है, जिनकी जिम्मेदारी भी वे बखूबी निभा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान से प्रेरित होकर उन्होंने यह काम चुना था। वे कहती हैं- ‘मेरे लिए ड्यूटी सबसे पहले हैं। कोरोना तो अब आया है, लेकिन साफ-सफाई रखना भविष्य में भी कई बीमारियों से बचाता है इसलिए मुझे अपना काम करने की प्रेरणा मिलती है।’
इंदौर में तुकोगमज के टीआई निर्मल श्रीवास का घर थाने के पास ही है। लेकिन कोरोनावायरस की ड्यूटी के चलते रात में घर न जाकर होटल में रुकते हैं। पिछले 5 दिन से ऐसा ही कर रहे हैं। दिन में सिर्फ एक बार भोजन करने घर जाते हैं। इस दौरान भी परिवार से दूर बैठते हैं। शनिवार को जब वे भोजन करने घर पहुंचे, तब पत्नी ने ये मार्मिक पल कैमरे मे कैद किया। रात को पापा को अपने बिस्तर पर ना पाकर मासूम बेटी काफी देर तक सोती नही है।

आईआईटी मद्रास ने शुरू किया साइबर सिक्‍योर‍िटी कोर्स

  चेन्नई : इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी (आईआईटी) मद्रास ने एक साइबर सिक्‍योर‍िटी कोर्स लॉन्‍च किया है। इंस्‍टीट्यूट के डिजिटल स्किल्‍स एकेडमी में शुरू हुए इस कोर्स का फायदा कानून विभाग, नेटवर्क एडमिनिस्‍ट्रेशन, प्राइवेट और पब्‍लिक सेक्‍टर के नेटवर्क सिक्‍योरिटी एक्‍सपर्ट, सिक्‍यूरिटी प्रोफेशनल के साथ ही आम जनता को भी मिलेगा। ‘सर्टिफाइड साइबर वॉरियर्स (सीसीडब्ल्यू) 3.0’ नामक यह कोर्स 120 घंटे का होगा, जिसके लिए वीकएंड में लाइव ऑनलाइन क्‍लासेज होंगी।”
सिक्‍योरिटी सेट-अप टूल की मिलेगी जानकारी
इस कोर्स का मकसद डेटा चोरी और संवेदनशील सूचनाओं को लीक होने से रोकना है। इसकी महत्‍ता के बारे में फोरेंसिक इंटेलिजेंस सर्विलांस और सिक्‍योरिटी टेक्‍नोलॉजी (एफआईएसएसटी) के चीफ मिशन इंटीग्रेटर और इनोवेटर सी मोहन राम ने कहा, “सीसीडब्‍ल्‍यू 3.0 कोर्स के तहत सिक्‍योरिटी सेट-अप टूल के बारे में जानकारी दी जाएगी। साथ ही किसी भी तरह के हमले को जल्‍दी कैसे ठीक किया जाए, इसके बारे में भी बताया जाएगा।
कोर्स के लिए 16 मार्च से ही रजिस्‍ट्रेशन प्रोसेस शुरू हो चुकी है। आईआईटी-एम और आईआईआईडीएम- कांचीपुरम की विशेषज्ञ फैक्‍लटी इस कोर्स को पढ़ाएंगी। वहीं, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने बुधवार को इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी के निदेशकों के साथ बैठक कर ऑनलाइन शिक्षण के लिए सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को प्रशिक्षित करने के लिए कहा है।

13 साल पहले जिन स्कूलों को नक्सलियों ने तोड़ा था, अब उन्हीं के हाथों दोबारा रखी जाएगी नींव

दंतेवाड़ा : पोटाली इलाके के आश्रम-स्कूलों को 13 साल पहले जिन नक्सलियों ने ध्वस्त किया था, अब उन्हीं के हाथों दोबारा इन आश्रमों की नींव रखी जाएगी और इन्हीं की सुरक्षा में काम भी होगा। ईंट पर इनके नाम और शिक्षा का संदेश देने वाले स्लोगन भी होंगे। इतना ही नहीं, जिस जगह आश्रम भवन तोड़ा था, नया भवन भी उसी जगह ही बनाया जाएगा। पुलिस ने इसके लिए खास रणनीति तैयार की है।
जिन पूर्व नक्सलियों के हाथों आश्रम भवन की नींव रखी जाएगी। उनमें क्षेत्र के पूर्व बड़े नक्सली लीडर संजय पोटाम उर्फ बदरू, किरण शामिल हैं। इनमें सबसे पुराना बदरू है। जिसने 2013 में सरेंडर किया था। वह इस इलाके का पहला नक्सली है जिसने आत्मसमर्पण किया है। अभी ये पुलिस की डीआरजी टीम में निरीक्षक है। दंतेवाड़ा के नक्सल ऑपरेशन में बदरू की सबसे बड़ी भूमिका है। एसपी डॉ. अभिषेक पल्लव ने बताया कि पोटाली में आश्रम बनाने के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है। जिन्होंने स्कूल-आश्रम को तोड़ा था, उन्हीं सरेंडर नक्सलियों से नींव रखवाई जाएगी। टेंडर प्रक्रिया पूरी होते ही जल्द काम शुरू होगा।
सलवा जूड़ूम की शुरुआत के बाद नक्सलियों ने तोड़ा था आश्रम : सलवा जुड़ूम की शुरुआत के बाद नक्सलियों ने बस्तर के कई इलाकों में जमकर उत्पात मचाया था। इनमें से पोटाली का इलाका भी है। यहां के आश्रम-स्कूल, अस्पताल, बिजली खंभों को तोड़ दिया था। आश्रम टूटने के बाद पोटाली इलाके व अन्य जगहों के 800 से ज़्यादा बच्चों के सामने पढ़ाई का बड़ा संकट खड़ा हुआ। इन्हें दूसरे आश्रमों में शिफ्ट करना पड़ा था।
इस इलाके के युवाओं को जोड़ने और नक्सलियों को सरेंडर कराने की कवायद : पोटाली-बुरगुम इलाके के नए युवाओं को जोड़ने व नक्सलियों को सरेंडर कराने की भी कवायद साथ-साथ चल रही है, ताकि इस इलाके में तेज गति से विकास काम हों और नक्सलियों की जड़ें उखड़ जाएं। पुलिस के लिए गोपनीय सैनिक के रूप में काम कर रहे अभी 14-15 युवा व सरेंडर नक्सली इसी इलाके के हैं, जिनकी मदद ली जा रही है।
सुरक्षा की गारंटी मिली तो 8 ठेकेदारों ने दिखाई रुचि
दंतेवाड़ा के जो 11 आश्रम व स्कूल शिफ्टिंग में चल रहे हैं, उनमें ज्यादातर पोटाली इलाके के ही हैं। पोटाली में कैंप खुलते ही आश्रम बनाने की स्वीकृति मिली, टेंडर हुआ। दो बार टेंडर के बाद भी किसी ने जहमत नहीं उठाई। लेकिन एसपी ने जब सुरक्षा की गारंटी दी तो 8 ठेकेदारों ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया। अब इसे जल्द ही शुरू कराने की तैयारी है। इस इलाके के ग्रामीण भी लगातार दोबारा आश्रम शुरू कराने की मांग लगातार कर रहे थे।