मिली एसीआईटीई की मंजूरी
कोलकाता : एक्सएलआरआई – जेवियर्स स्कूल ऑफ मैनेजमेंट ने नये सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया आरम्भ कर दी है। एक्सएलआरआई को एसीआईटीई की मंजूरी मिल गयी और यह मंजूरी मिलने के बाद संस्थान ने 2020-2022 सत्र के लिए दिल्ली-एनसीआर परिसर के पहले बैच के लिए 120 छात्रों की प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की। व्यवसाय प्रबंधन कार्यक्रम के लिए प्रत्येक 60 छात्रों के दो वर्गों को दाखिला दिया जाएगा। एआईसीटीई ने एक्सएलआरआई I दिल्ली-एनसीआर परिसर के संचालन को शुरू करने के लिए औपचारिक मंजूरी दे दी है। यह नया परिसर देश के सबसे प्रतिष्ठित बी-स्कूलों में से एक – एक्सएलआरआई, जमशेदपुर की पहली शाखा होगा।
एक्सएलआरआई वन दिल्ली-एनसीआर परिसर झज्जर जिले में औरंगाबादपुर में स्थित है, जो गुरुग्राम से 25 किलोमीटर दूर है और दिल्ली, गुड़गांव और रेवाड़ी जैसे मुख्य जिलों से जुड़ा हुआ है। झज्जर में एक्सएलआरआई I दिल्ली-एनसीआर परिसर के लिए आधारशिला रखी गयी। 16 जनवरी 2017 को जिला का शिलान्यास किया था। जमशेदपुर और दिल्ली परिसरों में कुल 590 उम्मीदवारों को प्रवेश मिलेगा।
दिल्ली-एनसीआर परिसर में खुलेगा एक्सएलआरआई
एसबीएम बैंक ने मास्टरकार्ड्स से मिलाया हाथ, पैसे भेजना होगा आसान
कोलकाता : एसबीएम बैंक के ग्राहकों के लिए भुगतान करना और पैसे भेजना और आसान हो रहा है। एसबीएम बैंक (इंडिया) लिमिटेड और मास्टरकार्ड ने मास्टरकार्ड सेंडटीएम के माध्यम से घरेलू और सीमा पार से भुगतान और प्रेषण के लिए साझेदारी की । एसबीएम बैंक इंडिया के ग्राहक मास्टरकार्ड सेंडटीएम का उपयोग करके वास्तविक समय * घरेलू व्यापार-से-उपभोक्ता (B2C) स्थानान्तरण जल्दी और कुशलतापूर्वक कर सकेंगे।
प्रेषण और भुगतान व्यवसाय एसबीएम बैंक इंडिया की विकास रणनीति की आधारशिला बन गए हैं। बैंकिंग अधिक व्यक्तिगत औऱ संशय भरी रहती है। ग्राहकों की इस उलझन को समझते हुए बैंक ने यह कदम उठाया है। बैंक अपने स्विचिंग पार्टनर, वाईएपी के साथ सर्वश्रेष्ठ-इन-क्लास समाधानों का उपयोग करने के लिए सहयोग कथा का नेतृत्व कर रहा है। मास्टरकार्ड सेंड टी एम मास्टरकार्ड के भुगतान प्रवाह में विविधता लाने और ग्राहकों के लिए भुगतान अनुभव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एसबीएम बैंक (इंडिया) के हेड-रिटेल एंड कंज्यूमर बैंकिंग, नीरज सिन्हा ने साझेदारी पर टिप्पणी करते हुए कहा, “मास्टरकार्ड सेंडटीएम को पेश करने के लिए मास्टरकार्ड के साथ सहयोग करना मेरी खुशी है – एक सुरक्षित और अभिनव समाधान – जो घरेलू और सीमा पार से भुगतान और प्रेषण के आधुनिकीकरण के लिए तैयार किया गया है। ”
बिन्यामीन गिल्बी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, डिजिटल पेमेंट्स एंड लैब्स, एशिया पैसिफिक, मास्टरकार्ड ने कहा, “मास्टरकार्ड सेंड Ö द्वारा संचालित एसबीएम बैंक लिमिटेड के साथ साझेदारी उनके ग्राहक आधार को त्वरित, सुविधाजनक और सुरक्षित भुगतान अनुभव प्रदान करने की अनुमति देती है। यह साझेदारी एक अन्य उदाहरण है कि कैसे मास्टरकार्ड सेंड टी एम दुनिया भर के लोगों के लिए नए नए समाधान प्रदान कर रहा है, उन्हें पैसे भेजने और प्राप्त करने में सक्षम बनाता है, कब, कहाँ और कैसे वे चुनते हैं। ”
मास्टर र्कार्ड के मुख्य परिचालन अधिकारी, विकास वर्मा ने कहा, “जैसा कि भारत एक डिजिटल अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हो रहा है, व्यापारियों, व्यवसायों और उपभोक्ताओं को भुगतान प्राप्त करने और प्राप्त करने की अनुमति देने वाले सरल, सुरक्षित और वास्तविक समय के समाधान की आवश्यकता है । मास्टरकार्ड सेंड एटीएम इस आवश्यकता को पूरा करता है और एक बेजोड़ अनुभव प्रदान करता है। एसबीएम बैंक इंडिया के साथ मास्टरकार्ड की साझेदारी ग्राहकों को इस तकनीक की पेशकश की गई धनराशि को आसानी से स्थानांतरित करने की अनुमति देती है। ” सुविधा को और बेहतर बनाने के लिए एसबीएम ने वाई ए पी से हाथ मिलाया है।
वाई ए पी के सह-संस्थापक, मधुसूदन ने कहा, “मोबाइल की पहली दुनिया में, सुरक्षित, सुरक्षित और विश्वसनीय लेन-देन डिजिटल भुगतान को अपनाना जरूरी है, मास्टरकार्ड सेंड एक ऐसा ही उदाहरण है, जिसे याद करते हुए हमें एसबीएम के लिए यह शक्ति प्राप्त होने की खुशी है। हमारे ए पी आई प्लेटफ़ॉर्म के हिस्से के रूप में बैंक और उसके साझेदार स्वीकृत लेनदेन के लिए वास्तविक पोस्टिंग समय वित्तीय संस्थान प्राप्त करने पर निर्भर करेगा।
पीएफएस को एसबीआई से 300 करोड़ रुपये की मंजूरी
कोलकाता : पीटीसी इंडिया फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (पीएफएस) को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) से टर्म लोन – डब्ल्यूसी ऑग्मेंटेशन (टीएलडब्ल्यूसी) की मंजूरी मिली है। 300 करोड़ का यह कर्ज कम्पनी तो 3 वर्ष की अवधि के लिए 6 माह की मोरेटोरियम अवधि के साथ मिला है। टीएलडब्ल्यूसी सीमा के भीतर सीपी / एनसीडी / बांड में निवेश के लिए निवेश सीमा के रूप में 300 करोड़ रुपये मंजूर किये गये हैं । वर्तमान मंजूरी से प्राप्त होने वाले धन का उपयोग हमारी कंपनी के नकदी प्रवाह को और मजबूत करने और स्थायी अवसंरचना वित्त परियोजनाओं को आगे धन मुहैया कराने के लिए किया जाएगा। कम्पनी के मुताबिक एसबीआई ने उसे पहले ही रु। 1,400 करोड़ (लगभग Rs.999.74 करोड़ का बकाया) की क्रेडिट लाइनें दी हैं और अब वर्तमान मंजूरी के साथ उनका एक्सपोजर बढ़कर रु। 1,700 करोड़ रुपये हो जाएगा। पीएफएस द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह राशि कम्पनी के उधार के स्रोतों में और विविधता लाएगी। पीएफएस ने वित्तपोषण के आगे के वैकल्पिक स्रोतों जैसे ईसीबी, वाणिज्यिक पत्र, बांड आदि का प्रस्ताव किया है जिसके लिए अग्रिम प्रगति पहले ही की जा चुकी है।
प्रसून बनर्जी : ऐसा डीआईजी, जो लेखक है और फिल्मकार भी
लक्ष्मी शर्मा
वो एक लेखक भी हैं, एक साहित्यकार भी हैं, कविताएँ लिखते हैं और फिल्मकार भी हैं और ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं डीआईजी प्रसून बनर्जी। जहाँ चाह है, वहीं राह भी है और अपनी कर्मंभूमि की मिट्टी और परम्परा को सामने लाना एक बड़ा काम है। मालदा रेंज के डीआईजी हैं। जिसके तहत मालदा और दक्षिण दिनाजपुर दोनों जिले आते हैं। प्रसून बनर्जी का दक्षिण दिनाजपुर से नाता करीबन 8 साल पुराना है और उससे भी पुराना नाता उनका अपनी प्रतिभाओं से है अपने शौक से है जिनमें लेखन संस्कृति कवि फिल्म निर्देशन सब कुछ शामिल है।
उन्होंने हमसे खास बातचीत में शुरुआत की कि वह शुरू से ही इन सब चीजों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। लेखन उनका शौक है कविताओं में वह अपनी बात कह जाते हैं हर फिल्म में वह दिखाते हैं इन्सान की जिन्दगी के अनुछुए पहलुओं को। स्थानीय तकनीक, लोक का संगीत चुनते हैं और बुन देते हैं एक खूबसूरत कहानी। अब तक 5 फिल्में बना चुके हैं और इनकी एक फिल्म दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए 2018 की दौड़ में शामिल रह चुकी है। इसी साल उनकी एक फिल्म आई है जिसका नाम ‘मेन विल बी मेन’ है । यह फिल्म रूस के फिल्म फेस्टिवल में चुनी गयी है। इस फिल्म में समाज में रह रहे इंसान के कई कई रूपों के बारे में एक अलग तरीके से दिखाने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा दक्षिण दिनाजपुर जिला में रहस्य- इतिहास, बहुत कुछ खास है, जिस पर मैंने लिखा हैऔर महसूस किया है। उसे अपनी कविताओं में अपने नाटकों में मैंने जीया है। एक रोमांच सा है । जिन्हें मैं सबको दिखाना चाहता हूँ। सबके सामने लाना चाहता हूं की यह ला के कुछ खास है यहां की संस्कृति यहां का शिल्प सब अलग है।
कई किताबें लिख चुके आईपीएस अधिकारी प्रसून बनर्जी ने आगे बताया कि समय मिल पाना बहुत कठिन है इन सब चीजों के लिए अपने मन को दिमाग को काफी तैयार और ऊर्जा रखनी पड़ती है अपने अंदर लिखने के लिए सोचने के लिए लेकिन जहाँ चाह, वहाँ राह. यह वाली कहावत तो आपने सुनी ही होगी, बस इसी कहावत के अनुसार ही मैं अपना काम, अपना शौक पूरा करता हूं। जब काम ज्यादा होता है तब थोड़ा कम समय मिलता है और जब काम कम होता है तब इन सब चीजों के लिए मुझे ज्यादा समय मिल जाता है। इस कोरोना काल में भी उनकी एक कविता की पूरी जिले में सराही जा रही है जिसका नाम ‘आमादर कोथा’ है इस कविता को आवाज दी है गौतम जी ने। इस कविता में पूरे बंगाल को परिभाषित किया है प्रसून बनर्जी ने।
भले ही जन्म से उनका कोई रिश्ता ना रहा हो दक्षिण दिनाजपुर से लेकिन अब उनकी लेखनी में उनकी फिल्मों में वह प्रासंगिक विषय बन चुका है दक्षिण दिनाजपुर जिला यहां की संस्कृति नाट्य कला गौरव इतिहास सब कुछ अपने में समाहित कर लिया है इन आला अधिकारी आईपीएस मालदा रेंज के डीआईजी प्रसून बनर्जी ने।
पशु – पक्षियों और पर्य़ावरण को सुन्दर बना रहे हैं ‘ग्रीन मैन’ तुहिन
लक्ष्मी शर्मा
गंगारामपुर, (दक्षिण दिनाजपुर) : ‘दर्द तो दर्द होता है, चाहे इंसान में, या जानवरों में। वहीं जीव का वास पेड़, पैधों के साथ जीवन दायिनी नदियों में भी। बचपन से जब कभी पशु-पक्षियों को घायल होने के साथ किसी प्रकार की दर्द या पीड़ा होता देख मेरा दिल खुद को पीड़ित महसूस करने लगाता था। वहीं जीवन दायिनी नदियों के जल की दशा, जो कभी प्यास बुझाने का करती थी, आज इतनी प्रदूषित है और इसका पानी जहर बन रहा है। इसी पीड़ा के बोझ से मन हमेशा विचलित रहता था। अचानक इस सभी बातों को लेकर हमेशा सोचना, इनके निराकण के उपायों पर बचपन से अध्ययन करना मेरा एक उद्देश्य बना।’ ये कहानी है तुहिन की, जो इन शब्दों में अपनी कहानी बताते हैं। अपनी यादों को ताजा करते हुए तुहिन बताते हैं कि धीरे-धीरे हम बचपन से दूर हुए और युवावस्था में कदम रखते ही पर्यावरण के सन्तुलन में अपनी भूमिका निभाने की तैयारी कर ली। इस तरफ परेशानियों ने मुझे घेर रखा था, परंतु दिल में दूसरे के दर्द का एहसास, पर्यावरण व नदियों की दयनीय दशा को देख मैं अपने पथ पर लगातार बढ़ता गया। और हुआ ये कि लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया और यहीं शुरू होती है एक यात्रा। बताते चलें कि उत्तर बंगाल में आज पर्यावरण का दूसरा नाम बन गया है, ‘तुहिन शुभ्र मण्डल’ हलांकि लोग उन्हें ‘ग्रीनमैन’ के नाम से भी जानते हैं। तुहिन अपितु दक्षिण दिनाजपुर जिले के साथ-साथ पूरे उत्तर बंगाल में अपनी साधना के कारण पर्यावरण संरक्षण का अलख जगा रहे हैं। पर्यावरण है, तो जीवन है, पर्यावरण नहीं तो जीवन नहीं यह हम सब जानते हैं लेकिन पर्यावरण के लिए प्रकृति के लिए पशु पक्षियों के लिए आज किसी के पास समय नहीं है ऐसे में लोगों की प्रेरणा छोटे बच्चों के आइडल और पर्यावरण का रक्षक कहे जाने वाले तुहिन शुभ्र मंडल का जीवन में एक ही मकसद है कि पर्यावरण को बचाना है उसे सुरक्षित रखना है और दिन प्रतिदिन उसे बढ़ाना है।
दक्षिण दिनाजपुर जिले में स्थानीय रूप से रहने वाले तुहिन पड़ोसी देश बांग्लादेश, भूटान में भी पर्यावरण अलख जगा रहे हैं। जिसके कारण पड़ोसी देश में भी बड़ी उपलब्धि हासिल कर चुके हैं। उन्होंने बातचीत में बताया कि बचपन से ही मुझे एक अजीब सा आर्कषण था, इसलिए पशु-पक्षी उन्हें भाते थे, उनकी पीड़ा उनसे देखी नहीं जाती थी। जैसे जैसे वह जीवन में बड़े होते गए उनका पर्यावरण के प्रति झुकाव बढ़ता चला गया। उम्र के 18 साल से ही पेड़ पौधे नदी पशु-पक्षी को ग्रीनमैन के नाम से बुलाता है। तुहिन ने बताया कि पहले अकेले चला था, पर अब कई संस्थाएं मेरे साथ काम करती हैं पशु पक्षियों को लेकर पेड़ पौधों को लेकर हम पेड़ों को सिर्फ लगाकर नहीं छोड़ते बल्कि उन्हें सुरक्षित बड़ा होने तक उनकी देखभाल करते हैं। क्योंकि सिर्फ लगाकर छोड़ देने से यह काम समाप्त नहीं होता है उनकी देखभाल करना जब तक वह मजबूत और बड़े ना हो जाए। मेरा एक सपना है कि आने वाली युवापीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। ताकि वो पर्यावरण की अनदेखा न कर सके, और नहीं तो हमे मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए जहां मुझसे स्थानीय लोग जुड़ रहे हैं, वहीं पर्यावरण से जुड़ी दिल्ली मुम्बई, बंगलुरु, बांग्लादेश की ढाका में पर्यावरण के सेमिनार में शामिल होने का अवसर मिला जहां पर्यावरण संरक्षण पर दिये गए मेरे संदेश को लोगों ने सराहा। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरण असंतुलित हो रहा है, आने चक्रवती तूफानों जैसे अम्फान की वजह से पेड़-पौधों को काफी नुकसान भी हुआ। ऐसे में हम सबकी जिम्मेदारी है, पर्यावरण के लिए आगे आएं और पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें, तभी हमारी प्रकृति हमें जीवन दे पाएगी। मालूम हो कि लॉकडाउन के दौरान घायल पशुओं को इलाज के लिए तुहिन की संस्थाओं ने बीड़ा उठा रखा है। इतना ही नहीं, उनके खाने के लिए भी इंतजाम किए जाते है। वहीं जिले से गुजरने वाली सबसे बड़ी नदी आत्रेई और पुर्ननवा की प्रतिवर्ष हम कई बार हम साफ सफाई करते है। लोगों को जागरूक करते है कि को गंदगी नदियों में न फेके।
सकारात्मक दृष्टिकोण रखें, चुनौती समझकर स्वीकार करें ऑनलाइन शिक्षा
कोरोना काल में हर चीज बदली है…तो शिक्षा प्रणाली का पारम्परिक अन्दाज भी बदला है…स्मार्ट फोन शिक्षा का एक अंग बन गया है और शिक्षकों के लिए इसे अपनाना आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में कुछ शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया और आज उनकी कक्षाएँ डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध हैं। वाराणसी की नीलम सिंह ऐसी ही शिक्षिका हैं जिनके हिन्दी भाषा व साहित्य से जुड़े शैक्षणिक वीडियो ऑनलाइन उपलब्ध हैं। शुभजिता क्लासरूम में आप बच्चे पढ़ते रहे हैं तो इस बार की ओजस्विनी नीलम सिंह से शुभजिता की एक मुलाकात आपके लिए
प्र. ऑनलाइन शिक्षा के बारे में आपके क्या विचार हैं?
ऑनलाइन शिक्षा आधुनिक तकनीक है।एक समय था जब हम ऑनलाइन शिक्षा के बारे में कहानियों में पढ़ते थे। कभी सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी हमें इस दौर से गुजरना पड़ेगा। कहानियों एवं किस्सों की बातें यथार्थ धरातल पर उतर जाएंगी। परिवर्तन प्रकृति का नियम है हमें यह प्रकृति हर कदम पर नई चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार करती है। ऑनलाइन शिक्षा भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है जिसने प्रत्येक शिक्षक को आधुनिक तकनीक से जोड़ा है तथा उसे बच्चों तक पहुंचने का एक सफल माध्यम दिया है। हमें इसे एक नई चुनौती के तौर पर लेना चाहिए तथा सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए इसका उपयोग शिक्षा के शिक्षा के आदान-प्रदान के लिए करना चाहिए।
प्र. कोरोना काल ने शिक्षकों को किस तरह प्रभावित किया?
करोना काल ने ना केवल शिक्षकों बल्कि उन सभी लोगों को प्रभावित किया है जो नौकरी पेशा है। आप प्रवासी मजदूरों को देख लीजिए या किसी फैक्ट्री और कंपनी में काम करने वाले लोगों को देख लीजिए किसी न किसी हद तक सभी लोग इसकी चपेट में आए हैं। छोटी मोटी दुकान या फिर सड़क के किनारे खोमचे लगाने वाले ,सब्जियां बेचने वाले, जो रोज कुआं खोदते थे और पानी पीते थे, रिक्शा चालक हो या फिर ऑटो रिक्शा चालक हो सभी इससे प्रभावित हुए हैं जहां तक शिक्षकों की बात है,कोरोना ने शिक्षकों की शिक्षण शैली को जहां एक तरफ विस्तृत किया है वही दूसरी तरफ निजी विद्यालयों में शिक्षण करने वाले शिक्षकों के आर्थिक स्थिति को कमजोर किया है ।इसके पीछे कारण है कि अभिभावक ऑनलाइन शिक्षा को उतनी महत्ता नहीं दे रहे हैं जितनी कि वे विद्यालय में दी गई शिक्षा को महत्व देते हैं । निजी विद्यालय बच्चों के अभिभावकों द्वारा दी गई मासिक शुल्क से चलता है किंतु ज्यादातर अभिभावक कोरोना काल में शुल्क देने से आनाकानी कर रहे हैैं। परिणाम यह है कि विद्यालय की आर्थिक व्यवस्था डगमगा रही है जिसके कारण विद्यालय में काम करने वाले कर्मचारी एवं शिक्षक समय पर अपना वेतन प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं जिससे उनकी जीवन शैली प्रभावित हो रही है। मेरी अभिभावकों से प्रार्थना है कि इस विषम परिस्थिति में जिस प्रकार वे अपनी प्रत्येक जरूरत पूरी कर रहे हैं उसी प्रकार बच्चों की फीस भी यदि समय पर जमा करें तो इस समस्या का निराकरण कुछ हद तक हो सकता है।
प्र. आज व्याकरण पर जोर क्यों नहीं दिया जा रहा?
भाषा और व्याकरण का संबंध अटूट है। प्रत्येक भाषा का अपना एक व्याकरण होता है। ऐसा नहीं है कि भाषा सिखाते समय व्याकरण पर जोर नहीं दिया जाता। लेकिन कभी कभी देखा जाता है कि रोजगार की तलाश में कुछ लोग भाषा का शिक्षक ना होते हुए भी विद्यालय में यह कह कर नौकरी पा जाते हैं कि अमुक भाषा को वह आसानी से पढ़ा लेंगे किंतु उस भाषा विशेष में दक्षता ना होने के कारण वे कहानी ,कविता आदि पढ़ाकर कोर्स तो पूरा कर देते हैं किंतु जब व्याकरण की बात आती है तब वे डगमगा जाते हैं तथा येन केन प्रकारेण कोर्स को भगाते हैं। छात्रों को व्याकरण की जड़ तक नहीं ले जा पाते जिससे प्राथमिक विद्यालय से ही छात्रों की नीव कमजोर होती जाती है और अंततः वे व्याकरण गत अशुद्धियां अंत तक करते रहते हैं तथा धीरे धीरे भाषा से दूर होते जाते हैं। अतः विद्यालय को चाहिए कि शिक्षकों का चयन करते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि जिस प्रकार वे गणित विज्ञान आदि पढ़ाने के लिए उस विषय में पारंगत शिक्षकों का चयन करते हैं उसी प्रकार भाषा के शिक्षक का चयन करते समय भी पारंगत शिक्षकों का ही चयन करें।
प्र. हिन्दी को रोजगार से किस तरह जोड़ा जाये?
देखिए, जहां तक हिंदी को रोजगार से जोड़ने की बात है मैं मानती हूं कि हिंदी स्वयं अपने आप में रोजगार परक भाषा है । दूरदर्शन पर अपनी नज़र घुमाइए,फिल्म जगत पर अपनी नज़र घुमाइए, बाजारों में घुमकर जरा लोगों की लेन -देन की बातें सुनिए आपको समझ में आ जाएगा कि हमारी उन्नति की बुनियाद क्या है? विदेशों से लोग हमारे देश में आ रहे हैं, हमारी भाषा सीख रहे हैं,धन कमा रहे हैैं और एक हम हैं जो अंग्रेजी का मुलम्मा चढ़ाएं घुम रहे हैं। दुख होता है मुझे जब मैं लोगों को यह कहते हुए सुनती हूं कि ‘अरे हिंदी पढ़ कर क्या होगा’ मैं पूछती हूँ हिंदी पढ़ कर क्या नहीं होगा? दूसरे की माता को इज्जत देने का अर्थ यह तो नहीं होता कि हम अपनी मां को ही दरकिनार कर दे।
हिंदी हमारी मां है आत्मा भी व्यक्ति का जो सुख इसमें है वह अन्य किसी भाषा में नहीं और रही रोजगार की बात तो जब आप अपनी मां को आगे ही बढ़ाना नहीं चाहेंगे उसे आधुनिक तकनीक से जोड़ना ही नहीं चाहेंगे दूसरे की मां की तरफ भाग लेंगे तो वह मैली कुचैली तो होगी ही।
प्र. अपनी संघर्ष यात्रा के बारे में बताइये?
जब भी मुझसे कोई मेरी संघर्ष यात्रा के बारे में पूछता है तो मुझे जयशंकर प्रसाद की यह पंक्तियां याद आ जाती है…..…. सुनकर क्या तुम भला करोगे ,मेरी भोली आत्मकथा। अभी समय भी नहीं थकी सोई है मेरी मौन व्यथा ।
प्र. क्या आप मानती हैं की साहित्य में स्त्रियों को दरकिनार किया गया? अगर हाँ, तो उनको सामने कैसे लाया जाय?
दरकिनार तो स्त्रियों को हर जगह ही किया गया है फिर साहित्य उससे अछूता कैसे रह सकता है। किंतु हम स्त्रियों को भी हठी कहा गया है हम हर क्षेत्र में अपना अपना श्रेष्ठ देने में कभी भी पीछे नहीं रहीं। समय-समय पर महादेवी वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, सुभद्रा कुमारी चौहान तथा आप जैसी कई लेखिकाओं एवं कवयित्रियों ने अपनी लेखनी से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। हम तथा आप जैसे लोग हैं नई पीढ़ी को मौका देकर उन्हें इस परिपाटी से जोड़कर इसे और सुदृढ़ बना सकते हैं।
प्र. आपका सन्देश क्या होगा?
मेरा संदेश सभी विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के लिए है कि माना कि परिस्थितियां विषम परिस्थितियां विषम है किंतु इस विषम परिस्थिति में भी हमें धैर्य से काम लेना है तथा अपने आप को और अधिक ऊर्जावान बनाए रखते हुए इसका सामना करना है तथा निखर कर सामने आना है। न केवल आत्म निर्भर सामान लेने देने के मामले में बनना है बल्कि अपनी भाषा को सम्मान देकर उसे ऊपर लाकर भी आत्मनिर्भर बनना है।
हमारे साथ साझा करें…अपनी स्टार्टअप स्टोरीज
हम सब जानते हैं कि कोरोना काल के कारण देश और अर्थव्यवस्था किस स्थिति से गुजर रहे हैं। खासकर देश भर में श्रमिकों की जो स्थिति है, वह वाकई दिल दहला देने वाली है लेकिन यह बात ध्यान में रखनी होगी कि श्रमिक सबसे बड़ा संसाधन हैं और वह आधार हैं किसी उद्योग का। आज नौकरियों की समस्या विकराल है और कोरोना के लॉकडाउन ने स्थिति को और बिगाड़कर रख दिया है। इतनी समस्याओं के बावजूद यह भी सच है कि आपदा में भी अवसर होते हैं, जरूरत उसे पहचानने की है। आज जो श्रमिक घर लौटे हैं, वह कोई न कोई हुनर सीखकर लौटे हैं, वर्षों काम करने के बाद लौटे हैं इसलिए उनका अनुभव और उनकी कार्यक्षमता ही सबसे बड़ा संसाधन है जो कि इनसे जुड़े राज्यों में उद्योग को एक नयी दिशा दे सकती है और श्रम संसाधन न मिलने के कारण जो उद्यमी निराश बैठे हैं, उनके लिए भी यह एक अवसर है जो इन श्रमिकों के हुनर का लाभ उठाकर राज्य की क्षमता और संसाधनों तथा माँग के अनुसार उद्यम स्थापित करें। उद्योग के अनुकूल वातावरण बनाने के लिए उद्यमी को सुविधाएँ, सरकारी संरक्षण, पूँजी, जानकारी और प्रचार की भी जरूरत है। ये अवसर है कि हम साथ आएँ।
शुभ सृजन सम्पर्क स्टार्टअप स्टोरीज
शुभजिता मानती है कि आज रोजगार सृजन की जरूरत है और यह काम उद्योग से ही सम्भव है। उद्यमी स्तम्भ हम पहले ही आऱम्भ कर चुके हैं..अब बाजार में नया…नव उद्यमी स्तम्भ भी ला रहे हैं। अलग -अलग उद्योग, सरकारी योजनाएँ, पर्यावरण अनुकूल उद्योग के अतिरिक्त बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और बंगाल के साथ महिलाएँ हमारे केन्द्र में हैं और स्टार्टअप का वर्गीकरण हमने वर्गों में किया है –
स्थापित उद्यम
1. उद्यमी – तीन साल से अधिक पुराना उद्योग (महिला व पुरुष, दोनों के लिए)
स्टार्टअप
2. नव उद्यमी – अगर आपका स्टार्टअप 1 साल पुराना है…।
3. नव्या (महिलाओं के लिए) – अगर आपका स्टार्टअप 1 साल पुराना है।
शुभ सृजन सम्पर्क एक हिन्दी डायरेक्टरी है
पंजीकरण शुल्क – तीन साल से कम 100 रुपये। तीन साल से अधिक 200
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- आपको स्टोरी के साथ एक डिजिटल सम्मान पत्र भी मिलेगा।
भारत आत्मा : विवेकानंद

इंग्लैंड से विदा लेने से पूर्व एक अंग्रेज मित्र ने उनसे पूछा, “स्वामीजी, चार वर्षों तक विलासिता, चकाचौंध तथा शक्ति से परिपूर्ण इस पश्चिमी जगत का अनुभव लेने के बाद अब आपको अपनी मातृभूमि कैसी लगेगी ?”
स्वामीजी ने उत्तर दिया, “यहाँ आने से पूर्व मैं भारत से प्रेम करता था परंतु अब तो भारत की धूलिकण तक मेरे लिए पवित्र हो गयी है। अब मेरे लिए वह एक पुण्यभूमि है – एक तीर्थस्थान है!”
ऐसी थी हमारे परम पूजनीय स्वामी विवेकानंद की भारत भक्ति। १२ जनवरी १८६३ को कलकत्ता में जन्में, ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के परमप्रिय शिष्य, गुरुदेव के आशीर्वाद से साधारण नरेन्द्र से असाधारण स्वामी विवेकानंद बन गए। परिव्राजक सन्यासी के रूप में स्वामीजी भारत भ्रमण करते हुए अंत में भारतवर्ष के अंतिम छोर, ध्येयभूमि कन्याकुमारी पहुँचते हैं। १८९२, दिसंबर माह की २५,२६ और २७ तारीख को महासागर के मध्य स्थित शिला पर भारत के भूत, भविष्य, वर्तमान का ध्यान करते हुए उन्हें साक्षात जगतजननी भारत माता के दिव्य स्वरूप के दर्शन होते हैं और साथ ही अपना जीवनोद्देश्य भी प्राप्त होता है।
शिकागो (अमेरिका) में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में पहुंचने से पूर्व स्वामीजी को अनगिनत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। तत्पश्चात ११ सितंबर १८९३ के पावन दिवस पर गुरु रामकृष्ण प्रेरित ऐसी ओजस्वी वाणी गूंजी की आज भी दुनिया याद करती है। यह केवल स्वामीजी की दिग्विजय ही नहीं अपितु भारतवर्ष के पुनरुत्थान का शंखनाद भी था। सम्पूर्ण विश्व भारत के प्रति, यहां की सभ्यता-संस्कृति के प्रति नतमस्तक हो गया। स्वामीजी रातों – रात लोकप्रिय और प्रसिद्ध हो गए। उनके सम्मान में राजोचित सत्कार का आयोजन किया गया। स्वामीजी का कक्ष भौतिक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था, किन्तु उस विलासितापूर्ण बिछौने पर एक सन्यासी को नींद कहां आने वाली थी! उनका हृदय तो भारत के लिए क्रंदन करता रहा और वे फर्श पर लेट गए। द्रवित होकर सारी रात एक शिशु के समान फूटकर रोते रहे और ईश्वर के सम्मुख भारत के पुनरुत्थान की प्रार्थना करते रहे। भारत के प्रति उनका ऐसा ही ज्वलंत प्रेम था।
चार वर्षों के विदेश प्रवास के पश्चात भारत लौटने के लिए अधीर होते स्वामीजी, जब भारत की मिट्टी पर १५ जनवरी १८९७ को अपना पहला कदम रखते हैं। अपने मन के आवेग को वे रोक नहीं पाते और स्वदेश की मिट्टी में लोट-पोट होने लगते हैं तथा भाव-विभोर होकर रोते हुए कहने लगते हैं कि, “विदेशों में प्रवास के कारण मुझमें यदि कोई दोष आ गए हों तो हे धरती माता! मुझे क्षमा कर देना।”
एक बार किसी ने स्वामीजी से कहा की सन्यासी को अपने देश के प्रति विशेष लगाव नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे तो प्रत्येक राष्ट्र को अपना ही मानना चाहिए। इस पर स्वामीजी ने उत्तर दिया – “जो व्यक्ति अपनी ही माँ को प्रेम तथा सेवा नहीं दे सकता, वह भला दूसरे की माँ को सहानुभूति कैसे दे सकेगा ?” अर्थात पहले देशभक्ति और उसके बाद विश्वप्रेम!
स्वामीजी की महान प्रशंसिका तथा उन्हें अपना मित्र माननेवाली अमेरिकी महिला “जोसेफिन मैक्लाउड” ने एक बार उनसे पूछा था, “मैं आपकी सर्वाधिक सहायता कैसे कर सकती हूँ?” तब स्वामीजी ने उत्तर दिया था, “भारत से प्रेम करो।”
स्वयं के विषय में बोलते हुए उन्होंने एकबार कहा था कि वे “घनीभूत भारत” हैं। वस्तुतः उनका भारत-प्रेम इतना गहन था कि आखिरकार वे भारत की साकार प्रतिमूर्ति ही बन गए थे। कविश्रेष्ठ रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उनके विषय में कहा था कि, “यदि आप भारत को समझना चाहते हैं, तो विवेकानंद का अध्ययन कीजिये।”
स्वामीजी और भारत एकाकार हो गए थे। भगिनी निवेदिता के शब्दों में यही विश्वास प्रतिध्वनित होता है – “भारत ही स्वामीजी का महानतम भाव था। भारत ही उनके हृदय में धड़कता था, भारत ही उनकी धमनियों में प्रवाहित होता था, भारत ही उनका दिवा-स्वप्न था और भारत ही उनकी सनक थी। इतना ही नहीं वे स्वयं ही भारत बन गए थे। वे भारत की सजीव प्रतिमूर्ति थे। वे स्वयं ही – साक्षात भारत, उसकी आध्यात्मिकता, उसकी पवित्रता, उसकी मेधा, उसकी शक्ति, उसकी अन्तर्दृष्टि तथा उसकी नियति के प्रतीक बन गए थे।”
स्वामीजी सभी दृष्टियों से अतुल्य थे। ऐसा कोई भी न था, जो भारत के प्रति उनसे अधिक लगाव रखता हो, जो भारत के प्रति उनसे अधिक गर्व करता रहा हो और जिसने उनसे अधिक उत्साहपूर्वक इस राष्ट्र के हित के लिए कार्य किया हो। उन्होंने कहा था, “अगले ५० वर्षों तक के लिए सभी देवी-देवताओं को ताक पर रख दो, पूजा करो तो केवल अपनी मातृभूमि की, सेवा करो अपने देशवासियों की, वही तुम्हारा जाग्रत देवता है।”
स्वामीजी ने देशभक्ति का ऐसा राग छेड़ा, कि वह आज भी गुंजायमान है। बहुत से क्रांतिकारी, देशभक्तों ने उन्हें अपना आदर्श मानकर, उनके बताए रास्ते पर चलकर अपना सर्वस्व, भारत माँ को समर्पित कर दिया। इनमें वीर सावरकर, महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह, बाल गंगाधर तिलक, महर्षि अरविंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, बिपिन चंद्र पल, जमशेद जी टाटा, विनोबा भावे, ब्रह्मबांधव उपाध्याय और अनेकों अन्य महापुरुषों के नाम उल्लिखित हैं।
उन्होंने भारत ही नहीं अपितु समस्त विश्व को राष्ट्रभक्ति का मर्म समझाया। जॉन हेनरी राइट, मैक्स म्युलर, जे.जे.गुडविन, जॉन हेनरी बैरोज़, मार्क ट्वैन, रोमा रोला, भगिनी क्रिस्टीन, भगिनी निवेदिता आदि इनसे सर्वाधिक प्रेरित हुए।
वर्तमान में भी कुछ प्रसिद्ध हस्तियाँ जैसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, योग गुरु स्वामी रामदेव, श्री अन्ना हजारे, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा आदि अनेकों महान विभूतियाँ स्वामीजी को अपना आदर्श मानती हैं।
स्वामी रामतीर्थ जैसे महानुभाव ने भी स्वामीजी से ही प्रेरित होकर एक श्रेष्ठ रचना की –
“भारत की यह भूमि मेरा अपना शरीर है। कन्याकुमारी है मेरे पद। हिमालय मेरा मस्तक। मेरे ही केशकलापों से बहती है गंगा, मेरे मस्तक से निकलती है सिन्धु और ब्रह्मपुत्र। विंध्याचल है मेरा कौपीन। कोरमंडल है मेरी वाम जंघा और मलबार दक्षिण। मैं ही सम्पूर्ण भारत हूँ, पूर्व और पश्चिम मेरे बाहु और मैंने उन्हें फैलाया है मानवता का आलिंगन करने के लिए। जब मैं चलता हूँ, मानो भारत चलता है, जब मैं बोलता हूँ, भारत बोलता है। मैं श्वास लेता हूँ भारत श्वास लेता है। मैं ही भारत हूँ।”
(कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम. फिल की छात्रा और विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी के पश्चिम बंग प्रान्त, विभाग युवा प्रमुख)
अब एनपीएस खाता खोलना हुआ और आसान
नयी दिल्ली : पेंशन कोष नियामक पीएफआरडीए ने कहा है कि उसने राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) से जुड़ने के लिए वन-टाइम पासवर्ड सुविधा पेश की है। नियामक पहले से ई-हस्ताक्षर के जरिये बिना किसी कागजी दस्तावेज के ऑनलाइन एनपीए खाता खोलने की सुविधा उपलब्ध करा रहा है। अब नियामक ने एनपीएस खाता खोलने तथा उसे और आसान बनाने के लिए कदम उठाया है।
इसके तहत अंशधारक अब ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) के जरिये अपना एनपीएस खाता खोल सकते हैं। इसमें पीओपी के लिए पंजीकृत बैंक के ग्राहक अगर संबंधित बैंक के इंटरनेट बैंकिंग के जरिये एनपीएस खाता खोलना चाहते हैं, वे पंजीकृत मोबाइल नंबर पर ओटीपी प्राप्त कर खाता खोल सकते हैं। पीएफआरडीए राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के तहत 3.60 करोड़ अंशधारकों के खातों का नियमन कर रहा है। इसके तहत कुल प्रबंधन अधीन परिसपंत्ति 4.55 लाख करोड़ रुपये है।
क्या है एनपीएस
राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली एक पेंशन सह निवेश योजना है जिसे भारत सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को वृद्धावस्था सुरक्षा प्रदान करने के लिए शुरू किया गया है। भारत का कोई भी नागरिक (आवासीय और प्रवासी दोनों) जिसकी आयु 18 से 65 वर्ष की आयु (एनपीएस आवेदन जमा कराने की तिथि के अनुसार) है, एनपीएस में शामिल हो सकता है।
यह योजना सुरक्षित और विनियमित बाजार आधारित रिर्टन के जरिए प्रभावशाली रूप से आपकी सेवानिवृत्ति की योजना बनाने हेतु एक आकर्षक दीर्घकालिक बचत मार्ग से प्रारंभ होती है। इस योजना का विनियमन पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) द्वारा किया जाता है। पीएफआरडीए द्वारा स्थापित राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली न्यास (NPS Trust) एनपीएस के अंतर्गत सभी आस्तियों का पंजीकृत मालिक है।






