Monday, April 6, 2026
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जूम को टक्कर देने आया रिलायंस का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ऐप जियो मीट

छोटी नहीं करनी होंगी ऑनलाइन कक्षाएँ

नयी दिल्ली :  फेसबुक और इन्टेल जैसी कंपनियों को अपने डिजिटल कारोबार में हिस्सेदारी बेचकर अरबों डॉलर जुटाने के बाद अब रिलायंस इंडस्ट्रीज ने जूम को टक्कर देने की तैयारी की है। मुकेश अंबानी की कंपनी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ऐप ‘जियोमीट’ पेश की है जिसमें असीमित मुफ्त कॉलिंग की सुविधा मिलेगी। रिलायंस के इस कदम को प्रतिद्वंद्वी जूम के साथ ‘कीमत युद्ध’ के रूप में देखा जा रहा है।

बीटा परीक्षण के बाद जियोमीट वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ऐप एंड्रॉयड, आईओएस, विंडोज, मैकओएस और वेब उपलब्ध है। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार जियोमीट पर एचडी ऑडियो और वीडियो कॉल की गुणवत्ता मिलेगी। इसमें एकसाथ 100 लोगों को जोड़ा जा सकता है। इसमें स्क्रीन साझा करने, पहले से बैठक का समय तय करने और अन्य फीचर्स हैं। खास बात यह है कि इसमें जूम की तरह 40 मिनट की समयसीमा नहीं है। कम्पनी ने दावा किया कि इसमें कॉल्स 24 घंटे तक जारी रखी जा सकती है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठक ‘कूटलेखन’ और पासवर्ड से संरक्षित रहेगी। कंपनी के सूत्रों ने कहा कि जूम पर 40 मिनट से अधिक की बैठक के लिए मासिक शुल्क 15 डॉलर है। सालाना आधार पर यह 180 डॉलर बैठेगा, वहीं जियोमीट इससे अधिक सुविधा मुफ्त में उपलब्ध करा रही है। इससे जूम बैठक आयोजित करने वाले को जियोमीट का इस्तेमाल करने पर सालाना 13,500 रुपए की बचत होगी।
गूगल प्ले स्टोर पर इस ऐप के कई फीचर्स की जानकारी दी गई है। इसके अनुसार जियोमीट के लिए मोबाइल नंबर या ई-मेल आईडी के जरिए आसानी से ‘साइनअप’ किया जा सकता है। इसमें तुरंत बैठक आयोजित की जा सकती है। एचडी ऑडियो और वीडियो गुणवत्ता वाली बैठक का समय पहले से तय किया जा सकता और बैठक में भाग लेने वाले लोगों को इसकी जानकारी दी जा सकती है।

 जियोमीट के जरिए 1 दिन में कितनी भी बैठकें आयोजित की जा सकती हैं और कोई भी बैठक बिना किसी बाधा के 24 घंटे चल सकती है। प्रत्येक बैठक पासवर्ड से संरक्षित है। बैठक आयोजित करने वाला व्यक्ति ‘वेटिंग रूम’ की सुविधा का इस्तेमाल कर सकता है। इससे कोई भी भागीदार बैठक में बिना अनुमति शामिल नहीं हो सकता। इसमें ग्रुप बनाने की अनुमति है। सिर्फ एक क्लिक पर कॉलिंग या चैटिंग की जा सकती है।

गूगल प्ले स्टोर और आईओएस पर इस ऐप के 5 लाख डाउनलोड पहले ही हो चुके हैं। यह ऐप ऐसे समय पेश की गई है जबकि सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा गोपनीयता पर खतरे के मद्देनजर चीन से संबंधित 59 ऐप पर रोक लगाई है। इनमें टिकटॉक भी शामिल है।

कम्पनी सूत्रों ने कहा कि जियोमीट में समय की कोई सीमा नहीं होने की वजह से शिक्षकों को अपनी ऑनलाइन कक्षाओं को छोटा करने की जरूरत नहीं होगी। इस ऐप के जरिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनार तथा सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।

अमीश त्रिपाठी ने साउथ प्वाइंट के विद्यार्थियों को दिया मजबूत बनने का सन्देश

साउथ प्वाइंट स्कूल के ऑनलाइन स्थापना दिवस समारोह में चमके विद्यार्थी
कोलकाता : कोरोना काल में साउथ प्वाइंट का स्थापना दिवस समारोह भी ऑनलाइन तरीके से मनाया गया। कार्यक्रम में लेखक और नेहरू सेंटर, लंदन के निदेशक अमिश त्रिपाठी ने मुख्य अतिथि के रूप में विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाया। वे ब्रिटेन से साउथ प्वाइंट हाई स्कूल और साउथ प्वाइंट स्कूल के वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह में शामिल हुए थे। यह समारोह स्कूल के फेसबुक पेज पर लाइव वेबकास्ट हुआ जहाँ 10,000 से अधिक उपस्थित छात्र, माता-पिता, पूर्व छात्र और अन्य शुभचिंतक इसका गवाह थे।
त्रिपाठी ने भारत के पश्चिमी तट में कोविड -19 महामारी, अम्फान चक्रवात, टिड्डी हमले, चक्रवात का उल्लेख किया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चीन सबसे बड़ी बाढ़ का सामना कर रहा था और ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ सदी की सबसे बड़ी जंगल की आग थी। इतिहास से जो सबक मिला वह यह है कि केवल मजबूत और परिस्थितियों के अनुकूल रहने वाले लोग ही बचेंगे। 5 हजार से अधिक वर्षों से भारत अभी भी खड़ा है, क्योंकि यह मजबूत और परिस्थितियों के अनुकूल बना रहता है। उन्होंने पॉइंटर्स को सलाह दी कि इन गुणों को विकसित करें। उन्होंने अपने चुने हुए क्षेत्रों में पूर्व छात्रों की बहुत उच्च गुणवत्ता की सराहना की।


श्री बिरला ग्रुप के अध्यक्ष श्री एच. वी. लोढ़ा और साउथ पॉइंट एजुकेशन सोसायटी के अध्यक्ष ने समारोह को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि नकारात्मक पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय हमें सकारात्मकता पर ध्यान देना चाहिए और देखना चाहिए कि हम इस अनुभव से क्या सीख सकते हैं।
इस वर्चुअल वातावरण के कारण कार्यक्रम में कुछ पुराने विद्यार्थी भी जुड़े और अपने अनुभव साझा किये। इस आभासी वातावरण ने हमें दुनिया भर से हमारे कुछ विशिष्ट पूर्व छात्रों के साथ बातचीत करने का अवसर दिया। डॉ। देबजीत दास सरकार, सैन जोस के टेस्ला के मुख्य ऑटो पायलट हार्डवेयर आर्किटेक्ट, ने हमें “सेल्फ-ड्राइविंग कारों की चमत्कारिक दुनिया” के बारे में जानकारी दी; डॉ। अर्कदेव चटर्जी, कॉर्नेल विश्वविद्यालय के वित्तीय अर्थशास्त्री और इस विषय पर कई मान्यता प्राप्त पाठ्य पुस्तकों के लेखक, “माइक्रो इकोनोमिक्स एंड इकोनॉमिक्स ऑफ पांडेमिक्स”, आशीष तोषनीवाल, वाई-मीडिया लैब्स के सीईओ और संस्थापक, सबसे प्रशंसित कंपनियों में से एक हैं। सिलिकॉन वैली में एसएफ, पार्थ सारथी चटर्जी, शेल एनर्जी के डेटा और एनालिटिक्स प्रमुख से अपनी सफलता की कहानी के बारे में बात की, छात्रों को कुछ सूचीबद्ध करने के लिए ह्यूस्टन, यूएस से फ्यूचर के विघटनकारी प्रौद्योगिकी पर छात्रों को प्रबुद्ध किया।
प्रियंवदा बिड़ला परिसर में लॉकडाउन के कारण स्थगित पड़ा कार्य भी शीघ्र आरम्भ होगा। स्कूल ने साउथ प्वाइंट ऐप समेत अन्य डिजिटल संरचनाओं को और बेहतर बनाया है। यद्यपि कक्षा 12 वीं के लिए बोर्ड परीक्षाएं अभी तक समाप्त नहीं हुई हैं और एम. पी. बिड़ला स्मारक कोश के तहत होने वाली गतिविधियाँ आयोजित नहीं की जा सकीं, विद्यार्थियों की उपलब्धियों से जुड़ा यह समारोह रोका नहीं जा सकता था।

पुरस्कार वितरण समारोह

कार्यक्रम के दौरान 150 से अधिक पुरस्कारों की घोषणा की गयी। इनमें बड़ी बाधाओं से लड़ते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रियंवदा बिड़ला ब्रेवहार्ट्स पुरस्कार शामिल था। ऑल-राउंडर छात्रों के लिए प्रतिष्ठित संस्थापक पदक (सतीकांत गुहा मेमोरियल अवार्ड); एम। पी। बिड़ला स्मारक कोष (साउथ प्वाइंट) पुरस्कार और सांसद बिरला पूजा उत्कर्ष सम्मान 2019, जिसमें विद्यार्थी कोलकाता दुर्गा पूजा पंडालों का दौरा करते हैं और अपनी धारणा के आधार पर इन्हें रैंक करते हैं।
साउथ पॉइंट स्कूल और साउथ पॉइंट हाई स्कूल दोनों के छात्रों ने एक अनूठा सांस्कृतिक उत्पादन प्रस्तुत किया, “यादें और खोजें – एक आभासी यात्रा”। ये प्रदर्शन सभी विद्यार्थियों ने घरों में रिकॉर्ड किये थे जिसे बाद में डिजिटल रूप से मिश्रित और संपादित किया गया। प्रस्तुतियों में चालीस छात्रों ने भाग लिया।
यह समारोह महामारी के दौरान विद्यार्थियों को व्यस्त और प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। विद्यार्थियों ने इस दौरान कई मंदिरों और उनसे जुड़े कला प्रारूपो को खोजा। भरतनाट्यम और ओडिशी मंदिरों से जुड़े हैं। इस खोज में विद्यार्थी भारत की धरोहरों से रूबरू हो सके।

द हेरिटेज स्कूल का दिव्यांश बना नासा का ‘साइंटिस्ट फॉर ए डे’

कोलकाता : द हेरिटेज स्कूल के सातवीं के विद्यार्थी दिव्यांश गर्ग ने नासा का साइंटिस्ट फॉर ए डे’ खिताब अपने नाम कर लिया है। इस अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के ग्रेड 7 -8 में दिव्यांश को सफलता मिली है। वहीं इस स्कूल की छठीं (6) की छात्रा सारण्या चौधरी इसी प्रतियोगिता में 5 -6 ग्रेड में फर्स्ट रनर अप बनी है। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित यह प्रतियोगिता निबन्ध लेखन पर केन्द्रित थी जहाँ विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला। प्रतियोगिता को लेकर दिव्यांश ने कहा कि इस प्रतियोगिता से उसे प्रेरणा मिली, शिक्षकों तथा परिवार ने प्रोत्साहित किया।। उसका शोध ‘कैरन, द मून ऑफ प्लूटो’ किसी भी अन्य प्रयोग जैसा था। विजेता बनकर वह उत्साहित है और उम्मीद करता है कि यह उपलब्धि उसे आगे ले जाएगी। अपनी सफलता पर उत्साहित सारण्या ने कहा कि उसे इस प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभागिता की जानकारी उसके शिक्षकों से मिली। उसने अंतिम सूची में अपना नाम आने की उम्मीद नहीं की थी और अपनी सफलता के लिए शिक्षकों को धन्यवाद कहना चाहेगी।

दिल्ली-एनसीआर परिसर में खुलेगा एक्सएलआरआई

मिली एसीआईटीई की मंजूरी
कोलकाता : एक्सएलआरआई – जेवियर्स स्कूल ऑफ मैनेजमेंट ने नये सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया आरम्भ कर दी है। एक्सएलआरआई को एसीआईटीई की मंजूरी मिल गयी और यह मंजूरी मिलने के बाद संस्थान ने 2020-2022 सत्र के लिए दिल्ली-एनसीआर परिसर के पहले बैच के लिए 120 छात्रों की प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की। व्यवसाय प्रबंधन कार्यक्रम के लिए प्रत्येक 60 छात्रों के दो वर्गों को दाखिला दिया जाएगा। एआईसीटीई ने एक्सएलआरआई I दिल्ली-एनसीआर परिसर के संचालन को शुरू करने के लिए औपचारिक मंजूरी दे दी है। यह नया परिसर देश के सबसे प्रतिष्ठित बी-स्कूलों में से एक – एक्सएलआरआई, जमशेदपुर की पहली शाखा होगा।
एक्सएलआरआई वन दिल्ली-एनसीआर परिसर झज्जर जिले में औरंगाबादपुर में स्थित है, जो गुरुग्राम से 25 किलोमीटर दूर है और दिल्ली, गुड़गांव और रेवाड़ी जैसे मुख्य जिलों से जुड़ा हुआ है। झज्जर में एक्सएलआरआई I दिल्ली-एनसीआर परिसर के लिए आधारशिला रखी गयी। 16 जनवरी 2017 को जिला का शिलान्यास किया था। जमशेदपुर और दिल्ली परिसरों में कुल 590 उम्मीदवारों को प्रवेश मिलेगा।

एसबीएम बैंक ने मास्टरकार्ड्स से मिलाया हाथ, पैसे भेजना होगा आसान

कोलकाता : एसबीएम बैंक के ग्राहकों के लिए भुगतान करना और पैसे भेजना और आसान हो रहा है। एसबीएम बैंक (इंडिया) लिमिटेड और मास्टरकार्ड ने मास्टरकार्ड सेंडटीएम के माध्यम से घरेलू और सीमा पार से भुगतान और प्रेषण के लिए साझेदारी की । एसबीएम बैंक इंडिया के ग्राहक मास्टरकार्ड सेंडटीएम का उपयोग करके वास्तविक समय * घरेलू व्यापार-से-उपभोक्ता (B2C) स्थानान्तरण जल्दी और कुशलतापूर्वक कर सकेंगे।
प्रेषण और भुगतान व्यवसाय एसबीएम बैंक इंडिया की विकास रणनीति की आधारशिला बन गए हैं। बैंकिंग अधिक व्यक्तिगत औऱ संशय भरी रहती है। ग्राहकों की इस उलझन को समझते हुए बैंक ने यह कदम उठाया है। बैंक अपने स्विचिंग पार्टनर, वाईएपी के साथ सर्वश्रेष्ठ-इन-क्लास समाधानों का उपयोग करने के लिए सहयोग कथा का नेतृत्व कर रहा है। मास्टरकार्ड सेंड टी एम मास्टरकार्ड के भुगतान प्रवाह में विविधता लाने और ग्राहकों के लिए भुगतान अनुभव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एसबीएम बैंक (इंडिया) के हेड-रिटेल एंड कंज्यूमर बैंकिंग, नीरज सिन्हा ने साझेदारी पर टिप्पणी करते हुए कहा, “मास्टरकार्ड सेंडटीएम को पेश करने के लिए मास्टरकार्ड के साथ सहयोग करना मेरी खुशी है – एक सुरक्षित और अभिनव समाधान – जो घरेलू और सीमा पार से भुगतान और प्रेषण के आधुनिकीकरण के लिए तैयार किया गया है। ”
बिन्यामीन गिल्बी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, डिजिटल पेमेंट्स एंड लैब्स, एशिया पैसिफिक, मास्टरकार्ड ने कहा, “मास्टरकार्ड सेंड Ö द्वारा संचालित एसबीएम बैंक लिमिटेड के साथ साझेदारी उनके ग्राहक आधार को त्वरित, सुविधाजनक और सुरक्षित भुगतान अनुभव प्रदान करने की अनुमति देती है। यह साझेदारी एक अन्य उदाहरण है कि कैसे मास्टरकार्ड सेंड टी एम दुनिया भर के लोगों के लिए नए नए समाधान प्रदान कर रहा है, उन्हें पैसे भेजने और प्राप्त करने में सक्षम बनाता है, कब, कहाँ और कैसे वे चुनते हैं। ”
मास्टर र्कार्ड के मुख्य परिचालन अधिकारी, विकास वर्मा ने कहा, “जैसा कि भारत एक डिजिटल अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हो रहा है, व्यापारियों, व्यवसायों और उपभोक्ताओं को भुगतान प्राप्त करने और प्राप्त करने की अनुमति देने वाले सरल, सुरक्षित और वास्तविक समय के समाधान की आवश्यकता है । मास्टरकार्ड सेंड एटीएम इस आवश्यकता को पूरा करता है और एक बेजोड़ अनुभव प्रदान करता है। एसबीएम बैंक इंडिया के साथ मास्टरकार्ड की साझेदारी ग्राहकों को इस तकनीक की पेशकश की गई धनराशि को आसानी से स्थानांतरित करने की अनुमति देती है। ” सुविधा को और बेहतर बनाने के लिए एसबीएम ने वाई ए पी से हाथ मिलाया है।
वाई ए पी के सह-संस्थापक, मधुसूदन ने कहा, “मोबाइल की पहली दुनिया में, सुरक्षित, सुरक्षित और विश्वसनीय लेन-देन डिजिटल भुगतान को अपनाना जरूरी है, मास्टरकार्ड सेंड एक ऐसा ही उदाहरण है, जिसे याद करते हुए हमें एसबीएम के लिए यह शक्ति प्राप्त होने की खुशी है। हमारे ए पी आई प्लेटफ़ॉर्म के हिस्से के रूप में बैंक और उसके साझेदार स्वीकृत लेनदेन के लिए वास्तविक पोस्टिंग समय वित्तीय संस्थान प्राप्त करने पर निर्भर करेगा।

पीएफएस को एसबीआई से 300 करोड़ रुपये की मंजूरी

कोलकाता : पीटीसी इंडिया फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (पीएफएस) को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) से टर्म लोन – डब्ल्यूसी ऑग्मेंटेशन (टीएलडब्ल्यूसी) की मंजूरी मिली है। 300 करोड़ का यह कर्ज कम्पनी तो 3 वर्ष की अवधि के लिए 6 माह की मोरेटोरियम अवधि के साथ मिला है। टीएलडब्ल्यूसी सीमा के भीतर सीपी / एनसीडी / बांड में निवेश के लिए निवेश सीमा के रूप में 300 करोड़ रुपये मंजूर किये गये हैं । वर्तमान मंजूरी से प्राप्त होने वाले धन का उपयोग हमारी कंपनी के नकदी प्रवाह को और मजबूत करने और स्थायी अवसंरचना वित्त परियोजनाओं को आगे धन मुहैया कराने के लिए किया जाएगा। कम्पनी के मुताबिक एसबीआई ने उसे पहले ही रु। 1,400 करोड़ (लगभग Rs.999.74 करोड़ का बकाया) की क्रेडिट लाइनें दी हैं और अब वर्तमान मंजूरी के साथ उनका एक्सपोजर बढ़कर रु। 1,700 करोड़ रुपये हो जाएगा। पीएफएस द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार यह राशि कम्पनी के उधार के स्रोतों में और विविधता लाएगी। पीएफएस ने वित्तपोषण के आगे के वैकल्पिक स्रोतों जैसे ईसीबी, वाणिज्यिक पत्र, बांड आदि का प्रस्ताव किया है जिसके लिए अग्रिम प्रगति पहले ही की जा चुकी है।

प्रसून बनर्जी : ऐसा डीआईजी, जो लेखक है और फिल्मकार भी

लक्ष्मी शर्मा

वो एक लेखक भी हैं, एक साहित्यकार भी हैं, कविताएँ लिखते हैं और फिल्मकार भी हैं और ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं डीआईजी प्रसून बनर्जी। जहाँ चाह है, वहीं राह भी है और अपनी कर्मंभूमि की मिट्टी और परम्परा को सामने लाना एक बड़ा काम है। मालदा रेंज के डीआईजी हैं। जिसके तहत मालदा और दक्षिण दिनाजपुर दोनों जिले आते हैं। प्रसून बनर्जी का दक्षिण दिनाजपुर से नाता करीबन 8 साल पुराना है और उससे भी पुराना नाता उनका अपनी प्रतिभाओं से है अपने शौक से है जिनमें लेखन संस्कृति कवि फिल्म निर्देशन सब कुछ शामिल है।

उन्होंने हमसे खास बातचीत में शुरुआत की कि वह शुरू से ही इन सब चीजों के प्रति गहरी रुचि रखते हैं। लेखन उनका शौक है कविताओं में वह अपनी बात कह जाते हैं हर फिल्म में वह दिखाते हैं  इन्सान की जिन्दगी के अनुछुए पहलुओं को। स्थानीय तकनीक, लोक का संगीत चुनते हैं और बुन देते हैं एक खूबसूरत कहानी। अब तक 5 फिल्में बना चुके हैं और इनकी एक फिल्म दादा साहेब फाल्के  पुरस्कार के लिए 2018 की दौड़ में शामिल रह चुकी है। इसी साल उनकी एक फिल्म आई है जिसका नाम ‘मेन विल बी मेन’ है । यह फिल्म रूस के फिल्म फेस्टिवल में चुनी गयी है। इस फिल्म में समाज में रह रहे इंसान के कई कई रूपों के बारे में एक अलग तरीके से दिखाने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा दक्षिण दिनाजपुर जिला में रहस्य- इतिहास, बहुत कुछ खास है, जिस पर मैंने लिखा हैऔर महसूस किया है। उसे अपनी कविताओं में अपने नाटकों में मैंने जीया है। एक रोमांच सा है । जिन्हें मैं सबको दिखाना चाहता हूँ। सबके सामने लाना चाहता हूं की यह ला के कुछ खास है यहां की संस्कृति यहां का शिल्प सब अलग है।

कई किताबें लिख चुके आईपीएस अधिकारी प्रसून बनर्जी ने आगे बताया कि समय मिल पाना बहुत कठिन है इन सब चीजों के लिए अपने मन को दिमाग को काफी तैयार और ऊर्जा रखनी पड़ती है अपने अंदर लिखने के लिए सोचने के लिए लेकिन जहाँ चाह, वहाँ राह.  यह वाली कहावत तो आपने सुनी ही होगी, बस इसी कहावत के अनुसार ही मैं अपना काम, अपना शौक पूरा करता हूं। जब काम ज्यादा होता है तब थोड़ा कम समय मिलता है और जब काम कम होता है तब इन सब चीजों के लिए मुझे ज्यादा समय मिल जाता है। इस कोरोना काल में भी उनकी एक कविता की पूरी जिले में सराही जा रही है जिसका नाम ‘आमादर कोथा’ है इस कविता को आवाज दी है गौतम जी ने। इस कविता में पूरे बंगाल को परिभाषित किया है प्रसून बनर्जी ने।
भले ही जन्म से उनका कोई रिश्ता ना रहा हो दक्षिण दिनाजपुर से लेकिन अब उनकी लेखनी में उनकी फिल्मों में  वह प्रासंगिक विषय बन चुका है दक्षिण दिनाजपुर जिला यहां की संस्कृति नाट्य कला गौरव इतिहास सब कुछ अपने में समाहित कर लिया है इन आला अधिकारी आईपीएस मालदा रेंज के डीआईजी प्रसून बनर्जी ने।

पशु – पक्षियों और पर्य़ावरण को सुन्दर बना रहे हैं ‘ग्रीन मैन’ तुहिन

लक्ष्‍मी शर्मा

गंगारामपुर, (दक्षिण दिनाजपुर) : ‘दर्द तो दर्द होता है, चाहे इंसान में, या जानवरों में। वहीं जीव का वास पेड़, पैधों के साथ जीवन दायिनी नदियों में भी। बचपन से जब कभी पशु-पक्षियों को घायल होने के साथ किसी प्रकार की दर्द या पीड़ा होता देख मेरा दिल खुद को पीड़ित महसूस करने लगाता था। वहीं जीवन दायिनी नदियों के जल की दशा, जो कभी प्‍यास बुझाने का करती थी, आज इतनी प्रदूषित है और इसका पानी जहर बन रहा है।  इसी पीड़ा के बोझ से मन हमेशा विचलित रहता था। अचानक इस सभी बातों को लेकर हमेशा सोचना, इनके निराकण के उपायों पर बचपन से अध्‍ययन करना मेरा एक उद्देश्‍य बना।’  ये कहानी है तुहिन की, जो इन शब्दों में अपनी कहानी बताते हैं। अपनी यादों को ताजा करते हुए तुहिन बताते हैं कि धीरे-धीरे हम बचपन से दूर हुए और युवावस्था में कदम रखते ही पर्यावरण के सन्तुलन में अपनी भूमिका निभाने की तैयारी कर ली। इस तरफ परेशानियों ने मुझे घेर रखा था, परंतु दिल में दूसरे के दर्द का एहसास, पर्यावरण व नदियों की दयनीय दशा को देख मैं अपने पथ पर लगातार बढ़ता गया। और हुआ ये कि लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया और यहीं शुरू होती है एक यात्रा।  बताते चलें क‍ि उत्‍तर बंगाल में आज पर्यावरण का दूसरा नाम बन गया है, ‘तुहिन शुभ्र मण्डल’ हलांकि लोग उन्हें ‘ग्रीनमैन’ के नाम से भी जानते हैं।  तुहिन अपितु दक्षिण दिनाजपुर जिले के साथ-साथ पूरे उत्‍तर बंगाल में अपनी साधना के कारण पर्यावरण संरक्षण का अलख जगा रहे हैं। पर्यावरण है, तो जीवन है, पर्यावरण नहीं तो जीवन नहीं यह हम सब जानते हैं लेकिन पर्यावरण के लिए प्रकृति के लिए पशु पक्षियों के लिए आज किसी के पास समय नहीं है ऐसे में लोगों की प्रेरणा छोटे बच्चों के आइडल और पर्यावरण का रक्षक कहे जाने वाले तुहिन शुभ्र मंडल का जीवन में एक ही मकसद है कि पर्यावरण को बचाना है उसे सुरक्षित रखना है और दिन प्रतिदिन उसे बढ़ाना है।

दक्षिण दिनाजपुर जिले में स्थानीय रूप से रहने वाले तुहिन पड़ोसी देश बांग्लादेश, भूटान में भी पर्यावरण अलख जगा रहे हैं। जिसके कारण पड़ोसी देश में भी बड़ी उपलब्धि हासिल कर चुके हैं। उन्होंने बातचीत में बताया कि बचपन से ही मुझे एक अजीब सा आर्कषण था, इसलिए पशु-पक्षी उन्हें भाते थे, उनकी पीड़ा उनसे देखी नहीं जाती थी। जैसे जैसे वह जीवन में बड़े होते गए उनका पर्यावरण के प्रति झुकाव बढ़ता चला गया। उम्र के 18 साल से ही पेड़ पौधे नदी पशु-पक्षी को ग्रीनमैन के नाम से बुलाता है। तुहिन ने बताया कि पहले अकेले चला था, पर अब कई संस्थाएं मेरे साथ काम करती हैं पशु पक्षियों को लेकर पेड़ पौधों को लेकर हम पेड़ों को सिर्फ लगाकर नहीं छोड़ते बल्कि उन्हें सुरक्षित बड़ा होने तक उनकी देखभाल करते हैं। क्‍योंकि सिर्फ लगाकर छोड़ देने से यह काम समाप्त नहीं होता है उनकी देखभाल करना जब तक वह मजबूत और बड़े ना हो जाए। मेरा एक सपना है कि आने वाली युवापीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। ताकि वो पर्यावरण की अनदेखा न कर सके, और नहीं तो हमे मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए जहां मुझसे स्‍थानीय लोग जुड़ रहे हैं, वहीं पर्यावरण से जुड़ी दिल्ली मुम्बई, बंगलुरु, बांग्लादेश की ढाका में पर्यावरण के सेमिनार में शामिल होने का अवसर मिला जहां पर्यावरण संरक्षण पर दिये गए मेरे संदेश को लोगों ने सराहा। उन्‍होंने कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरण असंतुलित हो रहा है, आने चक्रवती तूफानों जैसे अम्‍फान की वजह से पेड़-पौधों को काफी नुकसान भी हुआ। ऐसे में हम सबकी जिम्‍मेदारी है, पर्यावरण के लिए आगे आएं और पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें, तभी हमारी प्रकृति हमें जीवन दे पाएगी। मालूम हो कि लॉकडाउन के दौरान घायल पशुओं को इलाज के लिए तुहिन की संस्थाओं ने बीड़ा उठा रखा है। इतना ही नहीं, उनके खाने के लिए भी इंतजाम किए जाते है। वहीं जिले से गुजरने वाली सबसे बड़ी नदी आत्रेई और पुर्ननवा की प्रतिवर्ष हम कई बार हम साफ सफाई करते है। लोगों को जागरूक करते है कि को गंदगी नदियों में न फेके।

सकारात्मक दृष्टिकोण रखें, चुनौती समझकर स्वीकार करें ऑनलाइन शिक्षा

कोरोना काल में हर चीज बदली है…तो शिक्षा प्रणाली का पारम्परिक अन्दाज भी बदला है…स्मार्ट फोन शिक्षा का एक अंग बन गया है और शिक्षकों के लिए इसे अपनाना आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में कुछ शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया और आज उनकी कक्षाएँ डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध हैं। वाराणसी की नीलम सिंह ऐसी ही शिक्षिका हैं जिनके हिन्दी भाषा व साहित्य से जुड़े शैक्षणिक वीडियो ऑनलाइन उपलब्ध हैं। शुभजिता क्लासरूम में आप बच्चे पढ़ते रहे हैं तो इस बार की ओजस्विनी नीलम सिंह से शुभजिता की एक मुलाकात आपके लिए

प्र. ऑनलाइन शिक्षा के बारे में आपके क्या विचार हैं?

ऑनलाइन शिक्षा आधुनिक तकनीक है।एक समय था जब हम ऑनलाइन शिक्षा के बारे में कहानियों में पढ़ते थे। कभी सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी हमें इस दौर से गुजरना पड़ेगा। कहानियों एवं किस्सों की बातें यथार्थ धरातल पर उतर जाएंगी। परिवर्तन प्रकृति का नियम है हमें यह प्रकृति हर कदम पर नई चुनौतियों से जूझने के लिए तैयार करती है। ऑनलाइन शिक्षा भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है जिसने प्रत्येक शिक्षक को आधुनिक तकनीक से जोड़ा है तथा उसे बच्चों तक पहुंचने का एक सफल माध्यम दिया है। हमें इसे एक नई चुनौती के तौर पर लेना चाहिए तथा सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए इसका उपयोग शिक्षा के शिक्षा के आदान-प्रदान के लिए करना चाहिए।

प्र.  कोरोना काल ने शिक्षकों को किस तरह प्रभावित किया?

करोना काल ने ना केवल शिक्षकों बल्कि उन सभी लोगों को प्रभावित किया है जो नौकरी पेशा है। आप प्रवासी मजदूरों को देख लीजिए या किसी फैक्ट्री और कंपनी में काम करने वाले लोगों को देख लीजिए किसी न किसी हद तक सभी लोग इसकी चपेट में आए हैं। छोटी मोटी दुकान या फिर सड़क के किनारे खोमचे लगाने वाले ,सब्जियां बेचने वाले, जो रोज कुआं खोदते थे और पानी पीते थे, रिक्शा चालक हो या फिर ऑटो रिक्शा चालक हो सभी इससे प्रभावित हुए हैं जहां तक शिक्षकों की बात है,कोरोना ने शिक्षकों की शिक्षण शैली को जहां एक तरफ विस्तृत किया है वही दूसरी तरफ निजी विद्यालयों में शिक्षण करने वाले शिक्षकों के आर्थिक स्थिति को कमजोर किया है ।इसके पीछे कारण है कि अभिभावक ऑनलाइन शिक्षा को उतनी महत्ता नहीं दे रहे हैं जितनी कि वे विद्यालय में दी गई शिक्षा को महत्व देते हैं । निजी विद्यालय बच्चों के अभिभावकों द्वारा दी गई मासिक शुल्क से चलता है किंतु ज्यादातर अभिभावक कोरोना काल में शुल्क देने से आनाकानी कर रहे हैैं। परिणाम यह है कि विद्यालय की आर्थिक व्यवस्था डगमगा रही है जिसके कारण विद्यालय में काम करने वाले कर्मचारी एवं शिक्षक समय पर अपना वेतन प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं जिससे उनकी जीवन शैली प्रभावित हो रही है। मेरी अभिभावकों से प्रार्थना है कि इस विषम परिस्थिति में जिस प्रकार वे अपनी प्रत्येक जरूरत पूरी कर रहे हैं उसी प्रकार बच्चों की फीस भी यदि समय पर जमा करें तो इस समस्या का निराकरण कुछ हद तक हो सकता है।

प्र.   आज व्याकरण पर जोर क्यों नहीं दिया जा रहा?

भाषा और व्याकरण का संबंध अटूट है। प्रत्येक भाषा का अपना एक व्याकरण होता है। ऐसा नहीं है कि भाषा सिखाते समय व्याकरण पर जोर नहीं दिया जाता। लेकिन कभी कभी देखा जाता है कि रोजगार की तलाश में कुछ लोग भाषा का शिक्षक ना होते हुए भी विद्यालय में यह कह कर नौकरी पा जाते हैं कि अमुक भाषा को वह आसानी से पढ़ा लेंगे किंतु उस भाषा विशेष में दक्षता ना होने के कारण वे कहानी ,कविता आदि पढ़ाकर कोर्स तो पूरा कर देते हैं किंतु जब व्याकरण की बात आती है तब वे डगमगा जाते हैं तथा येन केन प्रकारेण कोर्स को भगाते हैं। छात्रों को व्याकरण की जड़ तक नहीं ले जा पाते जिससे प्राथमिक विद्यालय से ही छात्रों की नीव कमजोर होती जाती है और अंततः वे व्याकरण गत अशुद्धियां अंत तक करते रहते हैं तथा धीरे धीरे भाषा से दूर होते जाते हैं। अतः विद्यालय को चाहिए कि शिक्षकों का चयन करते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि जिस प्रकार वे गणित विज्ञान आदि पढ़ाने के लिए उस विषय में पारंगत शिक्षकों का चयन करते हैं उसी प्रकार भाषा के शिक्षक का चयन करते समय भी पारंगत शिक्षकों का ही चयन करें।

प्र.  हिन्दी को रोजगार से किस तरह जोड़ा जाये?

देखिए, जहां तक हिंदी को रोजगार से जोड़ने की बात है मैं मानती हूं कि हिंदी स्वयं अपने आप में रोजगार परक भाषा है । दूरदर्शन पर अपनी नज़र घुमाइए,फिल्म जगत पर अपनी नज़र घुमाइए, बाजारों में घुमकर जरा लोगों की लेन -देन की बातें सुनिए आपको समझ में आ जाएगा कि हमारी उन्नति की बुनियाद क्या है? विदेशों से लोग हमारे देश‌ में आ रहे हैं, हमारी भाषा सीख रहे हैं,धन कमा रहे हैैं और एक हम हैं जो अंग्रेजी का मुलम्मा चढ़ाएं घुम रहे हैं। दुख होता है मुझे जब मैं लोगों को यह कहते हुए सुनती हूं कि ‘अरे हिंदी पढ़ कर क्या होगा’ मैं पूछती हूँ हिंदी पढ़ कर क्या नहीं होगा?  दूसरे की माता को इज्जत देने का अर्थ यह तो नहीं होता कि हम अपनी मां को ही दरकिनार कर दे।
हिंदी हमारी मां है आत्मा भी व्यक्ति का जो सुख इसमें है वह अन्य किसी भाषा में नहीं और रही रोजगार की बात तो जब आप अपनी मां को आगे ही बढ़ाना नहीं चाहेंगे उसे आधुनिक तकनीक से जोड़ना ही नहीं चाहेंगे दूसरे की मां की तरफ भाग लेंगे तो वह मैली कुचैली तो होगी ही।

प्र.  अपनी संघर्ष यात्रा के बारे में बताइये?

जब भी मुझसे कोई मेरी संघर्ष यात्रा के बारे में पूछता है तो मुझे जयशंकर प्रसाद की यह पंक्तियां याद आ जाती है…..…. सुनकर क्या तुम भला करोगे ,मेरी भोली आत्मकथा। अभी समय भी नहीं थकी सोई है मेरी मौन व्यथा ।

प्र.  क्या आप मानती हैं की साहित्य में स्त्रियों को दरकिनार किया गया? अगर हाँ, तो उनको सामने कैसे लाया जाय?

दरकिनार तो स्त्रियों को हर जगह ही किया गया है फिर साहित्य उससे अछूता कैसे रह सकता है। किंतु हम स्त्रियों को भी हठी कहा गया है हम हर क्षेत्र में अपना अपना श्रेष्ठ देने में कभी भी पीछे नहीं रहीं। समय-समय पर महादेवी वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, सुभद्रा कुमारी चौहान तथा आप जैसी कई लेखिकाओं एवं कवयित्रियों ने अपनी लेखनी से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। हम तथा आप जैसे लोग हैं नई पीढ़ी को मौका देकर उन्हें इस परिपाटी से जोड़कर इसे और सुदृढ़ बना सकते हैं।

प्र.  आपका सन्देश क्या होगा?

मेरा संदेश सभी विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के लिए है कि माना कि परिस्थितियां विषम परिस्थितियां विषम है किंतु इस विषम परिस्थिति में भी हमें धैर्य से काम लेना है तथा अपने आप को और अधिक ऊर्जावान बनाए रखते हुए इसका सामना करना है तथा निखर कर सामने आना है। न केवल आत्म निर्भर सामान लेने देने के मामले में बनना है बल्कि अपनी भाषा को सम्मान देकर उसे ऊपर लाकर भी आत्मनिर्भर बनना है।

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हम सब जानते हैं कि कोरोना काल के कारण देश और अर्थव्यवस्था किस स्थिति से गुजर रहे हैं। खासकर देश भर में श्रमिकों की जो स्थिति है, वह वाकई दिल दहला देने वाली है लेकिन यह बात ध्यान में रखनी होगी कि श्रमिक सबसे बड़ा संसाधन हैं और वह आधार हैं किसी उद्योग का। आज नौकरियों की समस्या विकराल है और कोरोना के लॉकडाउन ने स्थिति को और बिगाड़कर रख दिया है। इतनी समस्याओं के बावजूद यह भी सच है कि आपदा में भी अवसर होते हैं, जरूरत उसे पहचानने की है। आज जो श्रमिक घर लौटे हैं, वह कोई न कोई हुनर सीखकर लौटे हैं, वर्षों काम करने के बाद लौटे हैं इसलिए उनका अनुभव और उनकी कार्यक्षमता ही सबसे बड़ा संसाधन है जो कि इनसे जुड़े राज्यों में उद्योग को एक नयी दिशा दे सकती है और श्रम संसाधन न मिलने के कारण जो उद्यमी निराश बैठे हैं, उनके लिए भी यह एक अवसर है जो इन श्रमिकों के हुनर का लाभ उठाकर राज्य की क्षमता और संसाधनों तथा माँग के अनुसार उद्यम स्थापित करें। उद्योग के अनुकूल वातावरण बनाने के लिए उद्यमी को सुविधाएँ, सरकारी संरक्षण, पूँजी, जानकारी और प्रचार की भी जरूरत है। ये अवसर है कि हम साथ आएँ।
शुभ सृजन सम्पर्क स्टार्टअप स्टोरीज
शुभजिता मानती है कि आज रोजगार सृजन की जरूरत है और यह काम उद्योग से ही सम्भव है। उद्यमी स्तम्भ हम पहले ही आऱम्भ कर चुके हैं..अब बाजार में नया…नव उद्यमी स्तम्भ भी ला रहे हैं। अलग -अलग उद्योग, सरकारी योजनाएँ, पर्यावरण अनुकूल उद्योग के अतिरिक्त बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और बंगाल के साथ महिलाएँ हमारे केन्द्र में हैं और स्टार्टअप का वर्गीकरण हमने वर्गों में किया है –
स्थापित उद्यम
1. उद्यमी – तीन साल से अधिक पुराना उद्योग (महिला व पुरुष, दोनों के लिए)
स्टार्टअप
2. नव उद्यमी – अगर आपका स्टार्टअप 1 साल पुराना है…।
3. नव्या (महिलाओं के लिए) – अगर आपका स्टार्टअप 1 साल पुराना है।
शुभ सृजन सम्पर्क एक हिन्दी डायरेक्टरी है
पंजीकरण शुल्क – तीन साल से कम 100 रुपये। तीन साल से अधिक 200
महिलाओं के लिए 100 रुपये

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