Wednesday, April 1, 2026
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वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय, कोलकाता केंद्र में ‘विश्व मातृभाषा दिवस’

कोलकाता : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में आज ‘विश्व मातृभाषा दिवस’ का ऑनलाइन आयोजन किया गया। केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन एम.ए हिंदी साहित्य की विद्यार्थी नैना प्रसाद और धन्यवाद ज्ञापन विवेक कुमार साव ने किया। इस अवसर पर केंद्र के विद्यार्थियों द्वारा ‘बहुभाषी रचना पाठ’ के अंतर्गत विविध कविताओं और गीतों की सुंदर प्रस्तुति की गई। भारती कुमारी साव ने ‘एकला चलो रे’, पूजा कुमारी ने उर्दू गज़ल, कुमारी साक्षी ने विवेकी राय की भोजपुरी कविता, प्रीति मण्डल, सुशील कुमार सिंह और विवेक कुमार साव ने स्वरचित कविता, स्वेता कुमारी गुप्ता एवं नैना प्रसाद ने रबीन्द्र संगीत, साक्षी कुमारी झा ने मैथिली गीत, निशा बारी ने नागार्जुन की कविता, स्वाति मिश्र ने बच्चन की मधुशाला और सोनी कुमारी वर्मा ने महादेवी वर्मा की कविता की बेहतरीन प्रस्तुति की। इस अवसर पर बोलते हुए कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ ने ‘विश्व मातृभाषा दिवस’ की शुभकामनाएँ देते हुए विद्यार्थियों को उनकी सहभागिता के लिए बधाइयाँ दीं। उन्होंने कहा कि मातृभाषा का संबंध हमारी अस्मिता से होता है, इसलिए हमें सबकी मातृभाषाओं का सम्मान करते हुए अपनी मातृभाषा पर गर्व करना चाहिए। भारत जैसे बहुभाषी देश में सभी भाषाओं का सम्मान और सबके साथ तालमेल करके चलने से ही यहाँ की सांस्कृतिक विविधता को मजबूत रखा जा सकता है। डॉ सुनील ने आदिवासी मातृभाषाओं के संदर्भ को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए मातृभाषा दिवस की महता को बतलाया और बांग्लादेश में अपनी मातृभाषा के लिए शहीद होने वालों को नमन किया। इस आयोजन में दशरथ कुमार यादव, सुमन राय, मनीषा चौधरी, ममता साव, रबींद्र महतो, सोनी कुमारी प्रसाद तथा मोना कुमारी आदि की सहभागिता रही।

कोरोना काल में हमारा साहित्यिक सफर….

डॉ. किरण सिपानी *पूर्व ऐसोसिएट प्रोफेसर ए.जे.सी.बोस कॉलेज कोलकाता *कविता, संस्मरण, आलेख-लेखन में रुचि

कोरोना काल के सौ दिन। डर और फक्कड़पन का चोली-दामन का साथ रहा।मीडिया आँकड़े दिखा-दिखाकर अपने दड़बों में घुसे रहने की घूँटी दिन-रात पिलाता रहा ।डरे-डरे एक मन पर कबीर के शब्द तारी होते रहे-“फूलि-फूलि चुन लिये, काल्हि हमारी बार।” धरा कौ प्रमान यहि तुलसी, जो फरा सो झरा,जो बरा सो बुताना”-इस सच को जानते हुए भी मन प्रार्थना करता रहा-“हे भगवान!हमारी बारी न आये।”चारों तरफ हिदायतें ही हिदायतें…. यह मत करो,वह मत करो।करो तो यह….यह करो। हिदायतों का एक एनसाइक्लोपीडिया तैयार हो गया।  निराला के राम के दूसरे मन की तरह मेरा एक और मन जो दैन्य नहीं जानता–कोरोना की तपिश में फक्कड़ाना अंदाज में जीता रहा-“अरे जो होगा, देखा जायेगा।”प्रीति-प्रतीति-सुरीति से रामनाम-जप की तरह योग-प्राणायाम-प्रार्थना की संजीवनी से इकहत्तर वर्ष की उम्र में इस  युद्ध को जीतने की तैयारी में उत्साहपूर्वक लगी रही।घरेलू सहायिकाओं के अभाव में भी रोटी-कपड़ा-मकान की देखभाल के साथ-साथ अल्जाइमर-डिमेंशिया के रोगी अपने बहत्तर वर्षीय शिशु पति की पुकार और जरूरतों को जवानों की तरह दौड़-दौड़कर पूरा करती रही।और ऐसे में साहित्य-चर्चा!जी हाँ, बस…।

उफनती चाय के साथ कविता के शब्द भी उफनते रहे।थोड़ी-बहुत ही कविताएँ लिखी गयीं–विभिन्न मूडों की,छोटी-छोटी।हाँ,एक दिन तरन्नुम में आ गई और शताब्दी वर्ष में प्रखर युग चिंतक जैनाचार्य महाप्रज्ञ को संबोधित कर कुछ पंक्तियाँ रच डालीं।1992 में विश्व भारती, लाडनूँ के कक्ष में उनसे हुआ विचार-विमर्श मन को कहीं गहरे प्रभावित कर गया था।उन्होंने अपने युग के अध्यात्म को नयी ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।

महीनों से रेंग-रेंगकर चल रही जापान-यात्रा-संस्मरण-पुस्तक के खाली पृष्ठ उचक-उचककर ताक-झाँक करते रहे कि उन्हें लेखन-कक्ष में प्रवेश मिल जाये।बीच-बीच में उन्हें प्रवेश तो मिला,पर हर बार यह अल्पकालीन ही रहा। इबारागिकेन-फीजी- क्योटो-नारा-डिज़्नी सी के पड़ावों को पार करती हुई यह लेखन-यात्रा टोक्यो तक पहुँचकर सुस्ता रही है। उम्मीद है कि धीरे-धीरे यह मछुआ चाल गंतव्य तक पहुँच ही जायेगी।

कुछ मित्रों का दीर्घकालीन आग्रह था कि देवनागरी लिपि पर एक आलेख लिखूँ,वही तैयार कर डाला-“देवनागरी लिपि की लोकप्रियता और वैज्ञानिकता।”हमारे संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है। सारा संस्कृत वांगमय चाहे उत्तर भारत का हो या दक्षिण भारत का,देवनागरी में मिलता है।बहुत सा पंजाबी, गुजराती और राजस्थानी साहित्य वर्तमान युग में इस लिपि में लिखा जा रहा है। भावात्मक एकता की दृष्टि से सारी भारतीय भाषाओं के लिए एक ही लिपि के प्रयोग की वकालत बहुत बार की गई है पर अंग्रेजी शासन के दौरान हमारे प्राचीन ग्रंथों के रोमन लिपि में लिखे जाने के कारण कुछ भारतीय मनीषी रोमन लिपि के पक्षधर हो गये,जबकि जस्टिस शारदाचरण मित्र जैसे विद्वान ने लिपि विस्तार परिषद(संस्था)के माध्यम से ‘देवनागर’ पत्र निकालकर समस्त भारतीय भाषाओं को नागरी लिपि में लिखने का प्रयत्न किया था, खैर। समय-समय पर इस लिपि में सुधारों और मानकीकरण के लिए उचित प्रयास किये गये। आज यह लिपि नये यंत्र कम्प्यूटर के लिए अनुकूल प्रमाणित हुई है।अब इस विषय को यहीं विराम दिया जाये।

लॉकडाउन ने छोटे बच्चों के लिए घरों को कारागाहों में बदल दिया है। उछल-कूद के लिए न स्कूल की सीढ़ियाँ हैं, न मैदान, न पार्क, न नानी का घर। लॉकडाउन के पहले हफ्ते-दो हफ्ते में नानी से ढेरों कहानियाँ सुने बिना नानी को न छोड़नेवाले बच्चों का तेज-तर्रार दिमाग नयी  योजना में व्यस्त हो गया। उनके नवोन्मेषी दिमागों ने एक रास्ता निकाल ही लिया। नानी की  कहानियों को नानी की ही आवाज में कैद करवाकर ऑडियो बनवा डाले और यही नहीं इन ऑडियो को अपनी-अपनी स्कूल के ग्रुप में पोस्ट भी करवा दिया। मैं अपनी बनायी नयी-नयी कहानियाँ उन्हें  सुनाती जरूर रही हूँ, पर बाल-साहित्य-लेखन पर कभी गंभीरता से विचार नहीं किया। इस बार लगा कि इस बारे में भी सोचा जा सकता है ।

इस दौरान थोड़ा-बहुत पढ़ा-सुना भी। टेक्नोलॉजी के युग में ऑनलाइन कार्यक्रमों, वेबिनारों,कवि सम्मेलनों ने अंधेरे में दीये को जलाये रखा। सृजनात्मकता का ध्वज लहराता रहा।पर कभी-कभी ऐसा भी लगा कि बाढ़ आ गई। हर दिन मोबाइल पर एक लम्बी सूची… जिसे देखो,वही अपनी कविताओं-कहानियों का ऑडियो-वीडियो बनाकर परोस रहा है। प्रसिद्ध होने की सनक पागलपन में तब्दील होती सी लगी-“लपक लो मौका, दुबारा नहीं मिलेगा, न जाने कब जिन्दगी खत्म हो जाये।”बहरहाल कुछ अच्छी रचनाओं ने संपोषित भी किया।नूपुर अशोक की व्यंग्य रचनाओं के पॉडकास्ट स्तरीय लगे।

अधिकांश साहित्यकारों को यह शिकायत रहती है कि लोग उनकी रचनाएँ नहीं पढ़ते। वे चाहे किसी को न पढ़ते हों,पर उनका प्रयत्न रहता है कि लोग उनको अधिक से अधिक पढ़ें। पर जनाब! लिखने-पढ़ने की दुनिया में एक वर्ग हम जैसे अदना लेखकों का भी है जो पूरी निष्ठा के साथ दूसरों को पढ़ता ही नहीं, गंभीरता से उन पर विचार भी करता है। अब हर वक्त तो शिकायतों के तुरंत उत्तर नहीं दिये जा सकते। खैर! पढ़े जाने  की प्रतीक्षा में कतारबद्ध कुछ रचनाओं को मनोयोग से पढ़ा।प्रमोद शाह नफीस के कुछ आलेखों, साप्ताहिक स्तंभों एवं परिशिष्टों का संकलन-“कुछ सोच रहा हूँ”-को पढ़ा।प्रखर स्वतंत्र चिंतन के माध्यम से लेखक ने विभिन्न क्षेत्रों के ज्वलंत मुद्दों पर बेबाक टिप्पणियाँ की हैं। समस्याओं के कारणों पर विचार किया है, सकारात्मक सुझाव प्रस्तुत किये हैं। साप्ताहिक स्तंभ–‘खरी-खरी’में सचमुच ही खरी बात की है, मसलन-“भारत अपने घर में ही हार गया है-15जून 2008″,”कोई मदर टेरेसा पादरी नहीं बन सकती-22जून 2008” आदि -आदि।

ढेरों सम्मान -पुरस्कार प्राप्त अनेक विधाओं में लेखन करनेवाले साहित्यकार डॉ.मंगत बादल ने हिन्दी-राजस्थानी-पंजाबी भाषाओं में अनेक स्मरणीय कृतियों का सृजन किया है। साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत  उनके राजस्थानी प्रबंध काव्य ‘मीरां’के रसास्वादन का अवसर मिला था। कोरोना काल में इसके हिन्दी अनुवाद को भी दो-चार बैठकों में ही पढ़ डाला।प्रथम पुरुष  में लिखा गया यह प्रबंध काव्य स्त्री-पक्षधरता की अद्भुत कृति है। मध्यकालीन सामंती युग में कन्या-जन्म उत्सव का रूप नहीं लेता, मुर्दानगी का कहर बरपाता है–यह वर्णन-चित्रण बहुत प्रभावी बन पड़ा है। ताजगी भरे बिंबों-उपमाओं के माध्यम से कवि ने अभिव्यक्ति के नये परचम लहराये हैं। अनुवाद के माध्यम से हिन्दी पाठकों तक इस कृति को पहुँचाने के लिए अनुवादक प्रशंसा के पात्र हैं। कुछ समय पूर्व इन्हीं कवि के छोटे से खण्ड काव्य  ‘सीता’  की प्रश्नाकुलता के सौंदर्य ने मुझे अभिभूत किया था। इनका एक और प्रशंसित काव्य ‘कैकेयी’ पढ़े जाने की प्रतीक्षा में है। लेखक के एक व्यंग्य संग्रह- ‘छवि सुधारो कार्यक्रम ‘की  हास्य-व्यंग्य रचनाओं ने कोरोना काल में हँसाया-गुदगुदाया भी। ‘उधार लेकर घी पीने का सुख’ , ‘पोपटलाल जी का पर्यावरण प्रेम, ‘परीक्षा में नकल के नायाब तरीके’, ‘छवि सुधारो कार्यक्रम ‘, ‘पगड़ी उछालो कार्यक्रम’ आदि ने समाज के यथार्थ का बघिया उधेड़कर रख दिया।

इस समय फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती पर होनेवाले कार्यक्रमों की आभा मंद हो गई। कुछ आलेख पढ़ने को मिले।उनकी कहानियों को पढ़ने की ललक जागी।अपनी तथाकथित छोटी सी घरेलू लाइब्रेरी के कथा-संग्रहों को खंगाला।सिर्फ एक कहानी ‘तीसरी कसम’ ही उपलब्ध थी।उसे ही दुबारा पढ़कर झेंप मिटाई। बहुत पहले उनकी कुछ कहानियाँ पढ़ी थीं, फिर एक बार उनसे गुजरने का मन हुआ। पुस्तकाकार रूप में ही पढ़ना चाहती थी।पुस्तक को हाथ में लेने और पढ़ने का अपना आनंद होता है।जो देख-सुन-समझ रही हूँ… इस अभ्यास को बदलना ही होगा। ‘तीसरी कसम’ फिल्म की याद जेहन में ताजा थी। कहानी को फिर पढ़ना रोमांचित कर गया। लोकरंग के सघन जीवंत रंगों की एकतरफा अनिवेदित प्रेमकथा पाठक को संवेदनाओं के जादुई स्पर्श का अनुभव कराती है। नायक हिरामन को अपनी गाड़ी में बैठी जनानी सवारी(हीराबाई) के प्रति कभी संदेह होता है कि “कहीं डाकिनी-पिशाचिनी तो नहीं” ,कभी यह विस्मय कि “औरत है कि चम्पा का फूल” , या यह अचरज  “अरे बाप ई तो परी है”….कभी उसको लगता है कि उसकी गाड़ी पर “देवकुल की औरत सवार है”….सबकुछ रहस्यमय अजगुत-अजगुत लगता है। हिरामन की इन अनुभूतियों द्वारा कहानीकार लोक -मन और ग्रामीण-संस्कृति के रेशे-रेशे को उकेरने में सफल होते हैं। हिरामन की निश्छलता, उसकी पीड़ा- “अजी हाँ, मारे गये गुलफाम”- पाठक के मन में बस जाती है। कहानी पढ़ते हुए लगा कि रेणु की कथाभाषा में एक अनोखा कौशल है जो लोकभाषा और नागर भाषा के बीच एक संतुलन कायम करते हुए पाठक को गद्य-संगीत का आनंद देता है।

स्वाधीनता के  पश्चात् 1950-65 का डेढ़ दशक नयी कहानी की विविधता और बहुलता  का समय है। तमाम वक्तव्यों-विवादों  से परे रहकर रेणु अपनी कहानियों के परिवेश को ग्राम जीवन से लेकर शहरी जीवन तक विस्तार देते हैं। वे नयी कहानी के संधिकाल के कहानीकार हैं। उनकी पहली कहानी ‘बटबाबा’ 1944 में और उपन्यास ‘मैला आँचल’ 1954 में प्रकाशित हुआ। मैला आँचल ने हिन्दी उपन्यासों को एक नयी दिशा की ओर मोड़ा। मैला आँचल और परती परिकथा को प्रसिद्धि मिलने से बहुत  पहले उनकी कहानियों की मानवीय संवेदना, बदलते जीवन मूल्य और राजनैतिक मूल्यों की गहरी पकड़ से पाठक परिचित हो चुके थे। उपन्यासों को प्रसिद्धि मिलने के कारण आधुनिकता-प्राचीनता-ताजगी से समन्वित कहानियाँ उपेक्षित रह गयीं। डॉ.रामवचन राय के अनुसार “…अपनी आलोचनाओं का उत्तर भी उन्होंने कहानी लिखकर ही दिया “-(प्रभात खबर,26 जून 2020)।  उनकी क्रांतिकारिता, उनके जन-संघर्षों, उनकी सृजनात्मकता को नमन!

एक मई के दिन स्मरणीय सीताराम जी सेक्सरिया की स्मृति ताजा हो जाती है। इसी दिन उनके जन्मदिवस पर स्थापित भारतीय भाषा परिषद द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित होकर स्वयं को उपकृत महसूस करती हूँ। इस कोरोना काल में किसी भी सामूहिक कार्यक्रम की गुंजाइश ही कहाँ? मुझ जैसी अनेक बालिकाओं को उनकी वात्सल्य-गंगा में स्नान करने का अवसर मिला था। मेरे बाल-मन पर अंकित वह छवि आज भी सुरक्षित है, जब वे मारवाड़ी बालिका विद्यालय में 15अगस्त और 26जनवरी जैसे राष्ट्रीय उत्सवों पर सारी बालिकाओं के सिर पर हाथ फेरते हुए उनसे मिलते थे। किसी नाटक में अच्छा अभिनय देखते तो आगे बढ़कर व्यक्तिगत रूप से हौसला अफजाई करते थे।

अनेक साहित्यकारों को उनका आतिथेय उपलब्ध था,विशेषकर महादेवी वर्मा को।सीताराम जी उन्हें ससम्मान धर्म-बहन का दर्जा देते थे। उनका कलकत्ता-आगमन हमलोगों के लिए उत्सव सरीखा था। हम बड़े उत्साह से स्कूल बस में लदकर बड़ाबाजार से लॉर्ड सिन्हा रोड की यात्रा करते। उनके दर्शन, चरण-स्पर्श और दो-चार बातें कर गद्गद् हो जाते। सेक्सरिया जी के कारण ही हमारे मनों में यह संस्कार गहरे पैठ गया था कि किसी साहित्यकार का दर्शन तीर्थ-दर्शन से कम नहीं होता। उन जैसे महिलाओं की शिक्षा के हिमायती, दृढ़व्रती, निर्माण-उन्मद,संत पुरुषों के कारण ही समाज की हम जैसी महिलाएँ आज शिक्षित-आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं। एक मई को अपनी लाइब्रेरी में संजोये उनकी डायरी के पृष्ठों को पढ़ा। एक अनिर्वचनीय ऊर्जा संचरित हुई।ऐसे समर्पित, निस्वार्थ व्यक्ति ही मारवाड़ी बालिका विद्यालय, शिक्षा यतन जैसे शिक्षा-संस्थान और भारतीय भाषा जैसी संस्थाओं का निर्माण कर इतिहास रचते हैं। ये संस्थान हमारे शैक्षणिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक स्वास्थ्य का पैमाना हैं।

कोरोना काल में कई साहित्यकारों-कलाकारों ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इन खबरों ने मन को विचलित किया।रंगकर्मी उषा गांगुली खामोशी से चल दीं। उनके अमर नाटकों -कोर्टमार्शल, रुदाली, मैयत आदि ने शहर को समृद्ध -संस्कारित किया था। हमारी  पीढ़ी तो अनामिका, अदाकार और फिर रंगकर्मी के नाटकों को देखते-देखते युवा से प्रौढ़ हुई थी। संस्थाओं को पोषित करनेवाले स्मरणीय कवि नवल भी एक झटके में ही बिछुड़ गये। साहित्यकारों से संबंधित उनके व्यक्तिगत रविवारीय संस्मरणों ने,उनके एकल काव्य-पाठों ने शहर की साहित्यिक क्षुधा को शांत किया था। इन दोनों का जाना कोलकाता शहर को सूना कर गया और जब सुशांत सिंह राजपूत जैसे युवा कलाकार आत्महत्या करते हैं तो हम जैसे बुजुर्गों को पीड़ा होती है।अगर नेपोटिज्म की बात की जाये तो कौन सा साहित्य का क्षेत्र इस विषाणु से मुक्त है?कहाँ नहीं है?खैर, जो है सो है!

इस दुर्दिन में अम्फान तूफान ने हमारे बंगाल को रुला-रुलाकर छोड़ दिया-“एक करेला दूजा नीम चढ़ा।”इस भयावहता का ग्राफ चीन के घातक रवैये से और ऊपर चढ़ता चला जा रहा है। पर इन सबके साथ ही जीना है, जीने की अपनी-अपनी शैली तय करनी है।वक्त-बेवक्त मोबाइल का झुनझुना बजता रहता है, मैं भी बजाती रहती हूँ। इस दरमियान रिश्तेदारों-मित्रों, यहाँ तक कि पाताल में भी छुपे शुभचिंतकों ने हमारी खैर-खबर ली।पर मन है कि इन सबके बावजूद कभी-कभी कारण-अकारण उदास हो जाता है।ऐसे समय कबीर-तुलसी-रहीम के कुछ दोहे गुनगुना लेती हूँ ,बड़ा सुकून मिलता है।

 

पिता औरंगजेब की कैद में जिन्दगी गुजारने वाली जहीन शायरा मुगल शहजादी जेबुन्निसा

सखी सुन 18

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, स्त्री रचनाकारों का सफर किसी भी दौर में बहुत आसान नहीं रहा है।‌ यह बात और है कि इसके बावजूद लेखिकाओं ने संघर्ष की राह पर चलते हुए भी अपने रचनात्मक सफर को निरंतर जारी रखा है।

प्रो. गीता दूबे

बहुत मर्तबा हमें ऐसा लगता है कि अगर महिला किसी समृद्ध वंश से संबंध रखती है तो उसका जीवन मुश्किलों या संघर्षों से दूर होगा लेकिन प्राय: ऐसा नहीं होता, जितना बड़ा खानदान, उतनी ही ज्यादा बंदिशे उस पर लगाई जाती हैं। राजघराने की बहू मीराबाई के संघर्ष और उनके जीवन की चुनौतियों के बारे में हम जानते ही हैं।  सखियों, आज मैं आपको मुगल शाहजादी जेबुन्निसा के बारे में बताऊंगी। जेबुन्निसा औरंगजेब की बेटी थीं और “मख़फ़ी” के नाम से कविताएँ लिखा करती थीं। सवाल यह है कि उन्हें नाम बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी। इतिहासकारों ने  औरंगजेब के बारे में जो लिखा है उससे यह पता चलता है कि उनमें धार्मिक कट्टरता इतनी ज्यादा थी कि उनके शासनकाल में कला और साहित्य पर एक तरह से बंदिश ही थी। यह बात और है कि इन बंदिशों के साये में भी साहित्य और संगीत पनपता रहा। अब यह इत्तेफाक ही है कि उनके घर में ही एक ऐसी शायरा ने जन्म लिया जिनका जीवन साहित्य को पूर्णतया समर्पित था।

बादशाह औरंगज़ेब और उसकी मुख्य मलिका दिलरस बानो बेगम की सबसे बड़ी औलाद जेबुन्निसा का जन्म 15 फरवरी 1638 में दौलताबाद में हुआ था। औरंगजेब ने उनकी शिक्षा का भार अपने दरबार की एक विदुषी हाफिजा मरियम को सौंपा था। जेबुन्निसा बेहद प्रतिभाशाली थीं। उन्होंने तीन वर्ष की उम्र में कुरान कंठस्थ कर ली थी और सात वर्ष की उम्र में वह हाफिज बन गई थीं। कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने उनकी इस उपलब्धि पर सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा के साथ एक बड़ी दावत का आयोजन किया था तथा जेबुन्निसा और उनकी शिक्षिका को 30-30 हजार स्वर्ण मुद्राएँ इनाम में दी थीं। औरंगजेब की इस जहीन और अध्ययनशील बेटी ने दर्शनशास्र, गणित और खगोल- विज्ञान के साथ साहित्य और संगीत का ज्ञान भी प्राप्त किया था। वह अपने समय की एक बहुत अच्छी गायिका थीं। फारसी, अरबी और उर्दू भाषा पर उनका अच्छा अधिकार था। उनका निजी पुस्तकालय अत्यंत समृद्ध था जिसमें विभिन्न विषयों पर बड़ी संख्या में पुस्तकें थीं। इसके अलावा उन्होंने शस्त्र शिक्षा भी प्राप्त की थी और कई लड़ाइयों में हिस्सा भी लिया था। कहा जाता है कि औरंगज़ेब अपनी इस प्रतिभाशाली पुत्री से अत्यंत प्रेम करते थे और विभिन्न विषयों पर उनसे सलाह भी लेते थे। जेबुन्निसा के दादा शाहजहां ने कम उम्र में ही उनकी शादी अपने बड़े बेटे दारा शिकोह के बेटे सुलेमान शिकोह के साथ तय कर दी थी। लेकिन सुलेमान की असमय मृत्यु के कारण यह शादी नहीं हो पाई और जेबुन्निसा ताउम्र अविवाहित रहीं।

जेबुन्निसा का महल

जे़ब-उन-निसा या जेबुन्निसा 14 साल की उम्र से ही फ़ारसी में कविताएँ लिखने लगीं। चूंकि उनके पिता को कविता पसंद नहीं थी इसीलिए वह  “मख़फ़ी” के छद्म नाम से लिखा करती थीं। उनके शिक्षकों में से एक, उस्ताद बयाज़ ने उनकी कविताओं को पढ़कर उनकी हौसला-अफजाई की थी। चूंकि औरंगजेब के समय में, दरबार में मुशायरों के आयोजन पर प्रतिबंध था, अतः जेबुन्निसा छिप- छिपाकर अदब की गोपनीय महफ़िलों में शिरक़त करती थीं। यह बात और है कि बादशाह औरंगज़ेब से यह बात छिपी नहीं रही और उन्हें यह नागवार गुजरा। इन्हीं मुशायरों  और महफ़िलों में जेबुन्निसा की मुलाकात उस समय के मशहूर शायर अक़ील खां रज़ी से हुई जिनके व्यक्तित्व से वह बहुत प्रभावित हुईं और उन्हें उनसे प्रेम हो गया। इसकी खबर जब मुगल सम्राट् औरंगजेब तक पहुँची तो उन्होंने एक मामूली शायर से प्रेम करने के अपराध में अपनी लाडली बेटी को जनवरी 1691 में दिल्ली के सलीमगढ़ किले में नजरबंद करवा दिया । कुछ इतिहासकारों की इस विषय में अलग राय है, जिसके अनुसार औरंगजेब की दमनकारी नीतियों के खिलाफ उनके बेटे शाहजादा मोहम्मद अकबर ने बगावत कर दी थी और शाहजादी को अपने भाई के साथ गुप्त पत्र-व्यवहार करने के आरोप में औरंगजेब  ने यह सजा दी थी। कारण जो भी रहा हो, शाहजादी जेबुन्निसा ने अपने जीवन के अंतिम बीस साल वहीं गुजारे और 64 वर्ष की उम्र में 26 मई 1702 को वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली। निर्वासन के दौरान शाहजादी ने अध्ययन और लेखन में अपने को पूरी तरह से डुबो दिया। वह पढ़ती भी रहीं और गजलें, शेर और रुबाइयाँ भी लिखती रहीं। 20 सालों की कैद के दौरान उन्होंने लगभग 5000 रचनाएँ लिखीं। उनकी मृत्यु के तकरीबन 22 वर्षों के बाद 1724 में उनकी रचनाओं का संकलन “दीवान-ए-मख़फ़ी” नाम से छपा। इस दीवान के प्रकाशित होने के बाद अदब की दुनिया के लोगों को जेबुन्निसा के कलामों का महत्व समझ में आया। इस दीवान के कई संस्करण प्रकाशित हुए, जिनमें 1913 में मगनलाल व जेस्सी डंकन वेस्टब्रुक का अंग्रेजी अनुवाद बहुत महत्वपूर्ण है। जेबुन्निसा के कलामों की पाण्डुलिपियाँ पेरिस की नेशनल लाइब्रेरी, ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी, तुविंगर यूनिवर्सिटी (जर्मनी) और कोलकाता की एशियाटिक सोसायटी के आर्काइव में सहेजकर रखी गई हैं। उनकी रूबाइयों में एक कैदी का दर्द और उससे उपजा दर्शन साफ नजर आता है। अंग्रेजी से उनकी कुछ रूबाइयों का अनुवाद कवि ध्रुव गुप्त ने हिंदी में किया है। आपके लिए उसमें से एक रूबाई प्रस्तुत है-

लाल किले के पास है सलीमगढ़ का किला…जहाँ कैद की गयी थी शहजादी जेबुन्निसा…एक चित्र

” अरे ओ मख्फी, बहुत लंबे हैं

अभी तेरे निर्वासन के दिन

और शायद उतनी ही लंबी हैं

तेरी अधूरी ख़्वाहिशों की फेहरिस्त

अभी कुछ और लंबा होने वाला है

तुम्हारा इंतज़ार

शायद तुम रास्ता देख रही हो

कि उम्र के किसी मोड़ पर किसी दिन

लौट सकोगी अपने घर

लेकिन, बदनसीब !

घर कहां बच रहा है तुम्हारे पास

गुज़रे हुए इतने सालों में

ढह चुकी होगी उसकी दीवारें

धूल उड़ रही होगी अभी

उसके दरवाजों, खिड़कियों पर

अगर इंसाफ़ के दिन

ख़ुदा कहे कि मैं तुम्हें हर्ज़ाना दूंगा

उन तमाम व्यथाओं का

जो जीवन भर तुमने सहे

तो क्या हर्ज़ाना दे सकेगा वह मुझे

जन्नत के तमाम सुखों

और उसकी नेमतों के बावज़ूद

वह एक तो उधार ही रह जाएगा

ख़ुदा पर मेरा !”

उनकी कविताओं में धार्मिक कट्टरता के खिलाफ प्रेम का बेबाक स्वर सुनाई देता है। वह धार्मिक आडंबरों को जिस साहस के साथ चुनौती देती हैं कि उन्हें पढ़ते हुए अनायास मीराबाई और कबीर की कविताएँ जेहन में कौंध जाती हैं। शिव शंकर पारिजात द्वारा हिंदी में अनूदित रूबाई को पढ़ते हुए इस बात को सहजता से महसूस किया जा सकता है-

“मैं कोई मुसलमान नहीं

मैं तो हूँ एक बुतपरस्त,

झुकता है सर मेरा सज़दे में

प्रेम की देवी की मूरत के सामने।

कोई ब्राह्मण भी नहीं हूँ मैं;

पहनी थी गले में जो अपने

पवित्र धागों की माला,

निकाल कर बाहर उसे

लपेट ली है मैंने अपनी जुल्फ़ो की लटें।”

सखियों, जेबुन्निसा जैसी न जाने कितनी लेखिकाओं को इतिहास की कब्र में दफना दिया गया है। उन सबके जीवन, व्यक्तित्व और लेखन के बारे में तथ्यों के पड़ताल की जिम्मेदारी हम सबकी है और उनके द्वारा सृजित साहित्य को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की भी।

भवानीपुर कॉलेज ने की ” ईच वन टीच वन” की शुरुआत

कोलकाता :  वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा के दौरान विद्या की देवी को साक्षी मान कर भवानीपुर कॉलेज ने छोटे-छोटे बच्चों को साक्षर करने का बीड़ा उठाया। कॉलेज के एन एस एस की कोऑर्डिनेटर प्रो. गार्गी जी नियोगी और डीन प्रो. दिलीप शाह ने” ईच वन टीच वन” कार्यक्रम की शुरुआत की। इस योजना के तहत सरस्वती पूजा के उत्सव पर छह बच्चों को स्लेट और चॉप-स्टिक से मंत्र लिखवा कर आरंभ किया गया। कॉलेज के उपाध्यक्ष मिराज डी शाह और उनकी पत्नी शिवानी शाह ने बच्चों को साक्षर करने के लिए उत्साहित किया। लोकोपकार एआर एस टेक्नोलॉजी के मालिक वी सी आर आई श्रीकांतन और दीक्षा यादव के सहयोग रहा।
इसी अवसर पर कॉलेज के 29 शिक्षक और शिक्षिकाओं को “सरस्वती सम्मान समारोह” से सम्मानित किया गया जिसमें शॉल के साथ उपहार और प्रकाशित प्रति लेख ढाई हजार और प्रकाशित प्रति पुस्तक पर सात हजार की धनराशि भी दी गई। कॉमर्स, आर्ट्स, सांइस आदि विभिन्न विषयों पर प्रकाशित पुस्तकों और जर्नलों की प्रदर्शनी की गई।
सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत देव भाषा संस्कृत के प्रति विद्यार्थियों में जागरूकता लाने के लिए श्लोकों की प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसमें अंजली दूबे प्रथम,कशिश दोलानी द्वितीय,अर्नब दास तृतीय रहे। इसके अतिरिक्त पोस्टर प्रतियोगिता में वरदा श्ररीफ, श्रुति झुनझुनवाला और मुस्कान ढींगरा, रंगोली प्रतियोगिता में द्वय कोमल ठाकुर, श्रुति प्रधान, द्वय सृष्टि जालान रोशन आरा हासी, द्वय साक्षी देसाई, जलक शाह,  आरती थाली प्रतियोगिता में  ध्वनि पटेल, दृष्टि सफर, मेघालि सेनगुप्ता क्रमशः प्रथम द्वितीय और तृतीय रहे। निर्णायकों में नलिनी पारेख, रेणुका शाह और शिवानी डी शाह ने अपने निर्णय दिए जिसे दर्शकों और श्रोताओं ने तहे-दिल से स्वीकृत दी।
सरस्वती देवी की मूर्ति के समक्ष पूजा, आरती और पुष्पांजलि   अर्पित की गई जिसे कॉलेज के गैर शिक्षक वर्ग द्वारा आयोजित किया गया है जिसमें स्पोर्ट्स अॉफिसर मणिकांत चौधरी और रूपेश गांधी का सहयोग रहा। प्रो. दिलीप शाह, प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी, दिव्या ऊडीसी, डॉ. वसुंधरा मिश्र के निरीक्षण में सभी कार्यक्रम किए गए। माँ शारदा की वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।शास्त्रीय नृत्य किया अमन खुजूर ने। दिप्ती पंचारिया और रोशनी मोलानी ने सांस्कृतिक कार्यक्रम का संचालन किया।

भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार…जिन्होंने ठुकरा दिया भारत रत्न का प्रस्ताव

आमतौर पर व्यवसायी शब्द का जिक्र होते ही पूँजीवादी विचारधार वाले किसी व्यक्ति का नाम आता है क्योंकि छवि ही ऐसी विकसित की गयी है मगर सत्य यह है कि देश के स्वाधीनता संग्राम से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण में उद्योग जगत का प्रमुख योगदान है। हम ऐसे ही व्यवसायियों तथा उद्योगपतियों की जानकारी आपको देने का प्रयास कर रहे हैं और एक खास विचारधारा के लोगों द्वारा निर्मित इस छवि को तोड़कर उद्योग जगत के अवदानों को सामने लाना ही हमारा प्रयास है। गीता प्रेस, सेठ जयदयाल गोयन्दका के अतिरिक्त हम ऐसे ही चरित्रों से आपको अवगत करवाने का प्रयास कर रहे हैं। ये हैं हनुमान प्रसाद पोद्दार (1892 ई – २२ मार्च १९७१) जिनका नाम स्वतन्त्रता के आन्दोलन से लेकर पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान के लिए का नाम गीता प्रेस स्थापित करने के लिये भारत व विश्व में प्रसिद्ध है। गीता प्रेस उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर में स्थित है। उनको प्यार से भाई जी कहकर भी बुलाते हैं।

उस समय देश गुलामी की जंजीरों मे जकड़ा हुआ था। इनके पिता अपने कारोबार की वजह से कलकत्ता में थे और ये अपने दादाजी के साथ असम में। कलकत्ता में ये स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों अरविंद घोष, देशबंधु चितरंजन दास, पं, झाबरमल शर्मा के संपर्क में आए और आज़ादी के आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जब कलकत्ता आए तो भाई जी उनके संपर्क में आए इसके बाद उनकी मुलाकात गाँधीजी से हुई। वीर सावरकर द्वारा लिखे गए `१८५७ का स्वातंत्र्य समर ग्रंथ’ से भाई जी बहुत प्रभावित हुए और १९३८ में वे वीर सावरकर से मिलने के लिए मुंबई चले आए। १९०६ में उन्होंने कपड़ों में गाय की चर्बी के प्रयोग के खिलाफ आंदोलन चलाया और विदेशी वस्तुओं और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के लिए संघर्ष छेड़ दिया। युवावस्था में ही उन्होंने खादी और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना शुरु कर दिया। उस समय जब महामना पं. मदन मोहन मालवीय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए धन संग्रह करने के उद्देश्य से कलकत्ता आए तो भाईजी ने कई लोगों से मिलकर इस कार्य के लिए दान-राशि दिलवाई।

कलकत्ता में आजादी आंदोलन और क्रांतिकारियों के साथ काम करने के एक मामले में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार सहित कई प्रमुख व्यापारियों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार के हथियारों के एक जखीरे को लूटकर उसे छिपाने में मदद की थी। जेल में भाईजी ने हनुमान जी की आराधना करनी शुरु करदी। बाद में उन्हें अलीपुर जेल में नज़रबंद कर दिया गया। नज़रबंदी के दौरान भाईजी ने समय का भरपूर सदुपयोग किया वहाँ वे अपनी दिनचर्या सुबह तीन बजे शुरु करते थे और पूरा समय परमात्मा का ध्यान करने में ही बिताते थे। बाद में उन्हें नजरबंद रखते हुए पंजाब की शिमलपाल जेल में भेज दिया गया। वहाँ कैदी मरीजों के स्वास्थ्य की जाँच के लिए एक होम्योपैथिक चिकित्सक जेल में आते थे, भाई जी ने इस चिकित्सक से होम्योपैथी की बारीकियाँ सीख ली और होम्योपैथी की किताबों का अध्ययन करने के बाद खुद ही मरीजों का इलाज करने लगे। बाद में वे जमनालाल बजाज की प्रेरणा से मुंबई चले आए। यहाँ वे वीर सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महादेव देसाई और कृष्णदास जाजू जैसी विभूतियों के निकट संपर्क में आए।

मुंबई में उन्होंने अग्रवाल नवयुवकों को संगठित कर मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की। इसके बाद वे प्रसिध्द संगीताचार्य विष्णु दिगंबर के सत्संग में आए और उनके हृदय में संगीत का झरना बह निकला। फिर उन्होंने भक्ति गीत लिखे जो `पत्र-पुष्प’ के नाम से प्रकाशित हुए। मुंबई में वे अपने मौसेरे भाई जयदयाल गोयन्का जी के गीता पाठ से बहुत प्रभावित थे। उनके गीता के प्रति प्रेम और लोगों की गीता को लेकर जिज्ञासा को देखते हुए भाई जी ने इस बात का प्रण किया कि वे श्रीमद् भागवद्गीता को कम से कम मूल्य पर लोगों को उपलब्ध कराएंगे। फिर उन्होंने गीता पर एक टीका लिखी और उसे कलकत्ता के वाणिक प्रेस में छपवाई। पहले ही संस्करण की पाँच हजार प्रतियाँ बिक गई। लेकिन भाईजी को इस बात का दु:ख था कि इस पुस्तक में ढेरों गलतियाँ थी। इसके बाद उन्होंने इसका संशोधित संस्करण निकाला मगर इसमें भी गलतियाँ दोहरा दी गयी थी। इस बात से भाई जी के मन को गहरी ठेस लगी और उन्होंने तय किया कि जब तक अपना खुद का प्रेस नहीं होगा, यह कार्य आगे नहीं बढ़ेगा। बस यही एक छोटा सा संकल्प गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना का आधार बना। उनके भाई गोयन्दका जी व्यापार तब बांकुड़ा (बंगाल ) में था और वे गीता पर प्रवचन के सिलसिले में प्राय: बाहर ही रहा करते थे। तब समस्या यह थी कि प्रेस कहाँ लगाई जाए। उनके मित्र घनश्याम दास जालान गोरखपुर में ही व्यापार करते थे। उन्होने प्रेस गोरखपुर में ही लगाए जाने और इस कार्य में भरपूर सहयोग देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मई १९२२ में गीता प्रेस का स्थापना की गयी।

१९२६ में मारवाड़ी अग्रवाल महासभा का अधिवेशन दिल्ली में था। सेठ जमनालाल बजाज अधिवेशन के सभापति थे। इस अवसर पर सेठ घनश्यामदास बिड़ला भी मौजूद थे। बिड़लाजी ने भाई जी द्वारा गीता के प्रचार-प्रसार के लिए किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए उनसे आग्रह किया कि सनातन धर्म के प्रचार और सद्विचारों को लोगों तक पहुँचाने के लिए एक संपूर्ण पत्रिका का प्रकाशन होना चाहिए। बिड़ला जी के इन्हीं वाक्यों ने भाई जी को कल्याण नाम की पत्रिका के प्रकाशन के लिए प्रेरित किया।

इसके बाद भाई जी ने मुंबई पहुँचकर अपने मित्र और धार्मिक पुस्तकों के उस समय के एक मात्र प्रकाशक खेमराज श्री कृष्णदास के मालिक कृष्णदास जी से `कल्याण’ के प्रकाशन की योजना पर चर्चा की। इस पर उन्होंने भाई जी से कहा आप इसके लिए सामग्री एकत्रित करें इसके प्रकाशन की जिम्मेदारी मैं सम्हाल लूंगा। इसके बाद अगस्त 1926 में कल्याण का पहला प्रवेशांक निकला। कहना न होगा कि इसके बाद `कल्याण’ भारतीय परिवारों के बीच एक लोकप्रिय ही नहीं बल्कि एक संपूर्ण पत्रिका के रुप में स्थापित हो गयी और आज भी धार्मिक जागरण में कल्याण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। `कल्याण’ तेरह माह तक मुंबई से प्रकाशित होती रही। इसके बाद गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होने लगी।

भाईजी ने कल्याण को एक आदर्श और रुचिकर पत्रिका का रुप देने के लिए तब देश भर के महात्माओं धार्मिक विषयों में दखल रखने वाले लेखकों और संतों आदि को पत्र लिखकर इसके लिए विविध विषयों पर लेख आमंत्रित किए। इसके साथ ही उन्होंने श्रेष्ठतम कलाकारों से देवी-देवताओं के आकर्षक चित्र बनवाए और उनको कल्याण में प्रकाशित किया। भाई जी इस कार्य में इतने तल्लीन हो गए कि वे अपना पूरा समय इसके लिए देने लगे। कल्याण की सामग्री के संपादन से लेकर उसके रंग-रुप को अंतिम रुप देने का कार्य भी भाईजी ही देखते थे। इसके लिए वे प्रतिदिन अठारह घंटे देते थे। कल्याण को उन्होंने मात्र हिंदू धर्म की ही पत्रिका के रुप में पहचान देने की बजाय उसमे सभी धर्मों के आचार्यों, जैन मुनियों, रामानुज, निंबार्क, माध्व आदि संप्रदायों के विद्वानों के लेखों का प्रकाशन किया।

भाईजी ने अपने जीवन काल में गीता प्रेस गोरखपुर में पौने छ: सौ से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित की। इसके साथ ही उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि पाठकों को ये पुस्तकें लागत मूल्य पर ही उपलब्ध हों। कल्याण को और भी रोचक व ज्ञानवर्द्धक बनाने के लिए समय-समय पर इसके अलग-अलग विषयों पर विशेषांक प्रकाशित किए गए। भाई जी ने अपने जीवन काल में प्रचार-प्रसार से दूर रहकर ऐसे ऐसे कार्यों को अंजाम दिया जिसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। १९३६ में गोरखपुर में भयंकर बाढ़ आगई थी। बाढ़ पीड़ित क्षेत्र के निरीक्षण के लिए पं. जवाहरलाल नेहरु -जब गोरखपुर आए तो तत्कालीन अंग्रेज सरकार के दबाव में उन्हें वहाँ किसी भी व्यक्ति ने कार उपलब्ध नहीं कराई, क्योंकि अंग्रेज कलेक्टर ने सभी लोगों को धौंस दे रखी थी कि जो भी नेहरु जी को कार देगा उसका नाम विद्रोहियों की सूची में लिख दिया जाएगा। लेकिन भाई जी ने अपनी कार नेहरु जी को दे दी।

१९३८ में जब राजस्थान में भयंकर अकाल पड़ा तो भाई जी अकाल पीड़ित क्षेत्र में पहुँचे और उन्होंने अकाल पीड़ितों के साथ ही मवेशियों के लिए भी चारे की व्यवस्था करवाई। बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम, द्वारका, कालड़ी श्रीरंगम आदि स्थानों पर वेद-भवन तथा विद्यालयों की स्थापना में भाईजी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने जीवन-काल में भाई जी ने २५ हजार से ज्यादा पृष्ठों का साहित्य-सृजन किया।

फिल्मों का समाज पर कैसा दुष्परिणाम आने वाला है इन बातों की चेतावनी भाई जी ने अपनी पुस्तक `सिनेमा मनोरंजन या विनाश’ में दे दी थी। दहेज के नाम पर नारी उत्पीड़न को लेकर भाई जी ने `विवाह में दहेज’ जैसी एक प्रेरक पुस्तक लिखकर इस बुराई पर अपने गंभीर विचार व्यक्त किए थे। महिलाओं की शिक्षा के पक्षधर भाई जी ने `नारी शिक्षा’ के नाम से और शिक्षा-पध्दति में सुधार के लिए वर्तमान शिक्षा के नाम से एक पुस्तक लिखी। गोरक्षा आंदोलन में भी भाई जी ने भरपूर योगदान दिया। भाई जी के जीवन से कई चमत्कारिक और प्रेरक घटनाएं जुड़ी हुई है। लेकिन उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि एक संपन्न परिवार से संबंध रखने और अपने जीवन काल में कई महत्वपूर्ण लोगों से जुड़े होने और उनकी निकटता प्राप्त करने के बावजूद भाई जी को अभिमान छू तक नहीं गया था। वे आजीवन आम आदमी के लिए सोचते रहे। इस देश में सनातन धर्म और धार्मिक साहित्य के प्रचार और प्रसार में उनका योगदान उल्लेखनीय है। गीता प्रेस गोरखपुर से पुस्तकों के प्रकाशन से होने वाली आमदनी में से उन्होंने एक हिस्सा भी नहीं लिया और इस बात का लिखित दस्तावेज बनाया कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य इसकी आमदनी में हिस्सेदार नहीं रहेगा।

अंग्रेजों के जमाने में गोरखपुर में उनकी धर्म व साहित्य सेवा तथा उनकी लोकप्रियता को देखते हुए तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर पेडले ने उन्हें `राय साहब’ की उपाधि से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन भाई जी ने विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद अंग्रेज कमिश्नर होबर्ट ने `राय बहादुर’ की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा लेकिन भाई जी ने इस प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया।

देश की स्वाधीनता के बाद डॉ, संपूर्णानंद, कन्हैयालाल मुंशी और अन्य लोगों के परामर्श से तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने भाई जी को `भारत रत्न’ की उपाधि से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा लेकिन भाई जी ने इसमें भी कोई रुचि नहीं दिखाई।

२२ मार्च १९७१ को भाई जी ने इस नश्वर शरीर का त्याग कर दिया और अपने पीछे वे `गीता प्रेस गोरखपुर’ के नाम से एक ऐसा केंद्र छोड़ गए, जो हमारी संस्कृति को पूरे विश्व में फैलाने में एक अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

(साभार – हिन्दी मीडिया डॉट इन)

सनातन धर्मग्रन्थों को घर – घर तक पहुँचाने वाले सेठ जगदयाल गोयन्दका

देश-दुनिया में हिंदी, संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित धार्मिक पुस्तकों, ग्रंथों और पत्र-पत्रिकाओं की बिक्री कर रही गीता प्रेस को भारत में घर-घर में रामचरितमानस और भगवद्गीता को पहुंचाने का श्रेय जाता है। जयदयाल गोयन्दका श्रीमद्भगवद् गीता के अनन्य प्रचारक थे। वे गीताप्रेस, गीता-भवन (ऋषीकेश, स्‍वर्गाश्रम), ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम (चूरू) आदि के संस्थापक थे।

जयदयाल गोयन्दका का जन्म राजस्थान के चुरू में ज्येष्ठ कृष्ण 6, सम्वत् 1942 सन् 1885 को खूबचन्द्र अग्रवाल के परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था में ही इन्हें गीता तथा रामचरितमानस ने प्रभावित किया। वे अपने परिवार के साथ व्यापार के उद्देश्य से बांकुड़ा पश्चिम बंगाल चले गए। बंगाल में दुर्भिक्ष पड़ा तो, उन्होंने पीड़ितों की सेवा का आदर्श उपस्थित किया। उन्होंने गीता तथा अन्य धार्मिक ग्रन्थों का गहन अध्ययन करने के बाद अपना जीवन धर्म-प्रचार में लगाने का संकल्प लिया। इन्होंने कोलकाता में “गोविन्द-भवन” की स्थापना की। वे गीता पर इतना प्रभावी प्रवचन करने लगे थे कि हजारों श्रोता मंत्र-मुग्ध होकर सत्संग का लाभ उठाते थे। “गीता-प्रचार” अभियान के दौरान उन्होंने देखा कि गीता की शुद्ध प्रति मिलनी दूभर है। उन्होंने गीता को शुद्ध भाषा में प्रकाशित करने के उद्देश्य से सन् 1923 में गोरखपुर में गीता प्रेस की स्थापना की। उन्हीं दिनों उनके मौसेरे भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार उनके सम्पर्क में आए तथा वे गीता प्रेस के लिए समर्पित हो गए। गीता प्रेस से “कल्याण” पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। उनके गीता तथा परमार्थ सम्बंधी लेख प्रकाशित होने लगे। उन्होंने “गीता तत्व विवेचनी” नाम से गीता का भाष्य किया। उनके द्वारा रचित तत्व चिन्तामणि, प्रेम भक्ति प्रकाश, मनुष्य जीवन की सफलता, परम शांति का मार्ग, ज्ञान योग, प्रेम योग का तत्व, परम-साधन, परमार्थ पत्रावली आदि पुस्तकों ने धार्मिक-साहित्य की अभिवृद्धि में अभूतपूर्व योगदान किया है। वे अत्‍यन्‍त सरल तथा भगवद्विश्‍वासी थे। उनका कहना था कि यदि मेरे द्वारा किया जाने वाला कार्य अच्‍छा होगा तो भगवान उसकी सँभाल अपने आप करेंगे। बुरा होगा तो हमें चलाना नहीं है।

गोविन्‍द-भवन-कार्यालय, कोलकाता

यह संस्‍था का प्रधान कार्यालय है जो एक रजिस्‍टर्ड सोसाइटी है। सेठजी व्‍यापार कार्य से कोलकाता जाते थे और वहाँ जाने पर सत्‍संग करवाते थे। सेठजी और सत्‍संग जीवन-पर्यन्‍त एक-दूसरेके पर्याय रहे। सेठजी को या सत्‍संगियों को जब भी समय मिलता सत्‍संग शुरू हो जाता। कई बार कोलकाता से सत्‍संग प्रेमी रात्रि में खड़गपुर आ जाते तथा सेठजी चक्रधरपुर से खड़गपुर आ जाते जो कि दोनों नगरों के मध्‍य में पड़ता था। वहाँ स्‍टेशन के पास रात भर सत्‍संग होता, प्रात: सब अपने-अपने स्‍थान को लौट जाते। सत्‍संग के लिये आजकल की तरह न तो मंच बनता था न प्रचार होता था। कोलकाता में दुकानकी गद्दि‍यों पर ही सत्‍संग होने लगता। सत्‍संगी भाइयों की संख्‍या दिनोंदिन बढ़ने लगी। दुकान की गद्दि‍यों में स्‍थान सीमित था। बड़े स्‍थान की खोज प्रारम्‍भ हुई। पहले तो कोलकाता के ईडन गार्डेन के पीछे किले के समीप वाला स्‍थल चुना गया लेकिन वहाँ सत्‍संग ठीक से नहीं हो पाता था। पुन: सन् 1920 के आसपास कोलकाता की बाँसतल्‍ला गली में बिड़ला परिवार का एक गोदाम किराये पर मिल गया और उसे ही गोविन्‍द भवन भगवान् का घर का नाम दिया गया। वर्तमान में महात्‍मा गाँधी रोडपर एक भव्‍य भवन ‘गोविन्‍द-भवन’ के नाम से है जहाँ पर नित्‍य भजन-कीर्तन चलता है तथा समय-समयपर सन्‍त-महात्‍माओं द्वारा प्रवचन की व्‍यवस्‍था होती है। पुस्‍तकों की थोक व फुटकर बिक्री के साथ ही साथ हस्‍तनिर्मित वस्‍त्र, काँच की चूडियाँ, आयुर्वेदिक ओषधियाँ आदि की बिक्री उचित मूल्‍य पर हो रही है।

गीताप्रेस-गोरखपुर

कोलकातामें सेठजी के सत्‍संगके प्रभाव से साधकों का समूह बढ़ता गया और सभी को स्‍वाध्‍याय के लिये गीता की आवश्‍यकता हुई, परन्‍तु शुद्ध पाठ और सही अर्थकी गीता सुलभ नहीं हो रही थी। सुलभता से ऐसी गीता मिल सके इसके लिये सेठजी ने स्‍वयं पदच्‍छेद, अर्थ एवं संक्षिप्‍त टीका तैयार करके गोविन्‍द-भवन की ओर से कोलकाता के वणिक प्रेस से पाँच हजार प्रतियाँ छपवायीं। यह प्रथम संस्‍करण बहुत शीघ्र समाप्‍त हो गया। छ: हजार प्रतियोंके अगले संस्‍करण का पुनर्मुद्रण उसी वणिक प्रेस से हुआ। कोलकाता में कुल ग्‍यारह हजार प्रतियाँ छपीं। परन्‍तु इस मुद्रण में अनेक कठिनाइयाँ आयीं। पुस्‍तकों में न तो आवश्‍यक संशोधन कर सकते थे, न ही संशोधन के लिये समुचित सुविधा मिलती थी। मशीन बार-बार रोककर संशोधन करना पड़ता था। ऐसी चेष्‍टा करने पर भी भूलों का सर्वथा अभाव न हो सका। तब  प्रेस के मालिक जो स्‍वयं सेठजी के सत्‍संगी थे, उन्‍होंने सेठजी से कहा – किसी व्‍यापारीके लिये इस प्रकार मशीनको बार-बार रोककर सुधार करना अनुकूल नहीं पड़ता। आप जैसी शुद्ध पुस्‍तक चाहते हैं, वैसी अपने निजी प्रेस में ही छपना सम्‍भव है। सेठजी कहा करते थे कि हमारी पुस्‍तकों में, गीता में भूल छोड़ना छूरी लेकर घाव करना है तथा उनमें सुधार करना घाव पर मरहम-पट्टी करना है। जो हमारा प्रेमी हो उसे पुस्‍तकों में अशुद्धि सुधार करने की भरसक चेष्‍टा करनी चाहिये। सेठजी ने विचार किया कि अपना एक प्रेस अलग होना चाहिये, जिससे शुद्ध पाठ और सही अर्थ की गीता गीता-प्रेमियों को प्राप्‍त हो सके। इसके लिये एक प्रेस गोरखपुर में एक छोटा-सा मकान लेकर लगभग 10 रुपये के किराये पर वैशाख शुक्‍ल 13, रविवार, वि. सं. 1980 23 अप्रैल 1923 ई0 को गोरखपुर में प्रेस की स्‍थापना हुई, उसका नाम गीता प्रेस रखा गया। उससे गीता के मुद्रण तथा प्रकाशन में बड़ी सुविधा हो गयी। गीता के  अनेक प्रकार के छोटे-बड़े संस्‍करण के अतिरिक्‍त सेठ जी की कुछ अन्‍य पुस्‍तकों का भी प्रकाशन होने लगा। गीता प्रेस से शुद्ध मुद्रित गीता, कल्‍याण, भागवत, महाभारत, रामचरितमानस तथा अन्‍य धार्मिक ग्रन्‍थ सस्‍ते मूल्‍य पर जनता के पास पहुँचाने का श्रेय जयदयालजी गोयन्‍दका को ही है।

गीताभवन, स्‍वर्गाश्रम ऋषिकेश

गीता के प्रचारके साथ ही साथ सेठजी भगवत्‍प्राप्ति हेतु सत्‍संग करते ही रहते थे। उन्‍हें एक शांतिप्रिय स्‍थल की आवश्‍यकता महसूस हुई जहाँ कोलाहल न हो, पवित्र भूमि हो, साधन-भजन के लिये अति आवश्‍यक सामग्री उपलब्‍ध हो। इस आवश्‍यकता की पूर्ति के लिये उत्‍तराखण्‍ड की पवित्र भूमि पर सन् 1918 के आसपास सत्‍संग करने हेतु सेठजी पधारे। वहाँ गंगापार भगवती गंगा के तट पर वटवृक्ष और वर्तमान गीता भवन का स्‍थान सेठजी को परम शान्तिदायक लगा। सुना जाता है कि वटवृक्ष वाले स्‍थान पर स्‍वामी रामतीर्थ ने भी तपस्‍या की थी। फिर क्‍या था सन् 1925 के लगभग से सेठजी अपने सत्‍संगियों के साथ प्रत्‍येक वर्ष ग्रीष्‍म-ऋतुमें लगभग 3 माह वहाँ रहने लगे। प्रात: 4 बजे से रात्रि 10 बजे तक भोजन, सन्‍ध्‍या-वन्‍दन आदि के समय को छोड़कर सभी समय लोगों के साथ भगवत्-चर्चा, भजन-कीर्तन आदि चलता रहता था। धीरे-धीरे सत्‍संगी भाइयों के रहनेके लिये पक्‍के मकान बनने लगे। भगवत्‍कृपासे आज वहाँ कई सुव्‍यवस्थित एवं भव्‍य भवन बनकर तैयार हो गये हैं जिनमें 1.000 से अधिक कमरे हैं और सत्‍संग, भजन-कीर्तन के स्‍थान अलग से हैं जो शुरू से ही सत्‍संगियोंके लिये नि:शुल्‍क रहे हैं। यहाँ आकर लोग गंगा के सुरम्‍य वातावरण में बैठकर भगवत्-चिन्‍तन तथा सत्‍संग करते हैं।

श्री ऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम, चूरू

जयदयालजी गोयन्‍दका ने इस आवासीय विद्यालय की स्‍थापना इसी उद्देश्‍य से की कि बचपन से ही अच्‍छे संस्‍कार बच्‍चों में पड़ें और वे समाज में चरित्रवान्, कर्तव्‍यनिष्‍ठ, ज्ञानवान् तथा भगवत्‍प्राप्ति प्रयासी हों। स्‍थापना वर्ष 1924 ई0 से ही शिक्षा, वस्‍त्र, शिक्षण सामग्रियाँ इत्‍यादि आजतक नि:शुल्‍क हैं। उनसे भोजन खर्च भी नाममात्र का ही लिया जाता है।

गीताभवन आयुर्वेद संस्‍थान

जयदयालजी गोयन्‍दका पवित्रताका बड़ा ध्‍यान रखते थे। हिंसा से प्राप्‍त किसी वस्‍तुका उपयोग नहीं करते थे। आयुर्वेदिक औषधियों का ही प्रयोग करते और करने की सलाह देते थे। शुद्ध आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण के लिये पहले कोलकाता में पुन: गीताभवन में व्‍यवस्‍था की गयी ताकि हिमालय की ताजा जड़ी-बूटियों एवं गंगाजल से निर्मित औषधियाँ जनसामान्‍य को सुलभ हो सकें।

 

गीता प्रेस : समय की ताल के साथ शताब्दी वर्ष में प्रवेश करता अनूठा सनातन प्रयास

गीता प्रेस सदैव से लागत से कम मूल्य पर भक्ति ग्रंथों और अन्य आध्यात्मिक रुचि की पुस्तकों का प्रकाशन करती आ रही है। ये पुस्तकें लागत से भी कम मूल्य पर पाठकों को उपलब्ध कराई जाती हैं। लेकिन अब नये ‘एप’ के जरिए ये पुस्तकें जनसाधारण को मुफ्त में उपलब्ध कराई जा रही हैं। गीता सेवा ट्रस्ट का यह एप है- https://gitaseva.org/app जिसे दुनिया के किसी भी कोने में एंड्रायड फोन, लैपटाप या टैबलेट में डाउनलोड किया जा सकता है। इस एप को डाउनलोड करने के बाद कोई भी गीता प्रेस की पुस्तकें मुफ्त में पढ़ सकता है। फिलहाल इस एप पर हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, तमिल, बांग्ला और कन्नड़ भाषाओं में 213 पुस्तकें उपलब्ध हैं। अभी इस एप पर अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जाएंगी। गीता प्रेस की 1700 से अधिक पुस्तकें हैं। ये पुस्तकें हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, तमिल, बांग्ला, उर्दू, कन्नड़, असमिया, मलयालम, उड़िया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलुगु और नेपाली भाषाओं में हैं। इन सभी पुस्तकों को गीता सेवा ट्रस्ट के एप पर अपलोड किया जाएगा। यह काम बहुत बड़ा है और धीमी रफ्तार से चल रहा है, इसलिए इसमें काफी समय लग सकता है। इस एप पर गीता पाठ, सुन्दरकाण्ड, रामकथा, वाल्मीकि रामायण, भजन, कीर्तन, आरती, आदि भी हैं। अब तक 1600 से अधिक आॅडियो सामाग्री एप पर अपलोड हो चुकी है। गीता प्रेस के संस्थापक ब्रह्मलीन श्री जयदयाल गोयंदकाजी (1885-1965), ‘कल्याण’ के आदिसंपादक ब्रह्मलीन श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार उपाख्य भाईजी (1892-1971) और ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदासजी (1904-2005) के प्रवचन भी इस एप पर हैं।

गीता प्रेस 1926 से हिन्दी मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ का प्रकाशन कर रहा है। हर वर्ष ‘कल्याण’ का एक विशेषांक निकलता है। अब तक इसके 94 विशेषांक निकल चुके हैं। इनमें से 50 से अधिक विशेषांक ऐसे हैं, जिनका पुन:प्रकाशन आज भी किया जाता है। लगभग सभी विशेषांक 500 से 800 पृष्ठों के है। साथ ही, हर वर्ष गीता प्रेस की अंग्रेजी मासिक पत्रिका ‘कल्याण-कल्पतरु’ के भी विशेषांक निकलते हैं। इन सभी को भी गीता सेवा ट्रस्ट के एप पर अपलोड किया जाना है। 2021 में ‘कल्याण-कल्पतरु’ का विशेषांक उपासना-विषय पर होगा।


एप पर उपलब्ध हैं हिन्दी और संस्कृत भाषा में पुस्तकें

श्रीमद्भगवद्गीता: श्रीमद्भगवद्गीता (भाषा टीका सहित), श्रीमद्भगवद्गीता (महात्म्य हिंदी-टीका सहित), श्रीमद्भगवद्गीता (मूल), श्रीमद्भगवद्गीता पदच्छेद, श्रीमद्भगवद्गीता तत्व विवेचनी, गीता ज्ञान प्रवेशिका, गीता प्रबोधनी, श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी, गीता चिन्तन।

तुलसी साहित्य: श्रीरामचरितमानस (मूल), सुन्दरकाण्ड (मूल), श्रीरामचरितमानस (सटीक), सुन्दरकाण्ड (सटीक), बरवै रामायण, गीतावली, वैराग्य संदीपनी, कवितावली, हनुमान बाहुक, जानकी मंगल , पार्वती मंगल, रामाज्ञा प्रश्न, श्रीकृष्ण गीतावली, विनय पत्रिका।

दैनिक पूजा-पाठ: श्रीदुर्गा सप्तशती (हिन्दी अनुवाद सहित) शिवमहिम्न: स्तोत्र, श्रीनारायणकवच, संध्योपासन विधि और तर्पण एवं बलिवैश्वदेव विधि, सन्ध्या, सन्ध्या गायत्री का महत्त्व और ब्रह्मचर्य, तर्पण विधि, अमोघ शिव कवच, रामरक्षा स्तोत्रम्, बलिवैश्वदेव विधि, गजलगीता, श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् (नामावलि: सहित), आरती संग्रह, श्रीहनुमान चालीसा, मनुस्मृति:, नित्यकर्म प्रयोग, श्रीदुर्गासप्तशती (मूल), श्रीरामकृष्णलीला भजनावली, भजन संग्रह, शतनामस्तोत्र संग्रह, चेतावनी पद संग्रह, स्तोत्ररतनावली, हरेरामभजन (16 माला), श्रावणमासमहात्म्य, नित्यस्तुति: गजेन्द्रमोक्ष, संतानगोपालस्तोत्र (संतान प्राप्ति के शास्त्रीय उपाय), श्रीदुर्गा चालीसा एवं, श्रीविन्ध्येश्वरी चालीसा, श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम (मूलमात्रम), भीष्मस्तवराज:, श्रीशिवचालीसा, आदित्यहृदयस्तोत्रम। पुराण: श्रीमद्भागवत महापुराणम (मूलमात्रम्)

सूरदास साहित्य: सूर विनय पत्रिका, अनुराग पदावली, सूर रामचरितावली, विरह पदावली।

हनुमान प्रसाद पोद्दार साहित्य: पद रत्नाकर, गीता चिन्तन, साधन पथ, प्रार्थना, सुखी बनने के उपाय, अमृत कण, मानव जीवन का लक्ष्य, ईश्वर की सत्ता और महत्ता, श्रीरामरितमानस (सटीक), सुन्दरकाण्ड (सटीक)।

जयदयाल गोयन्दका साहित्य: श्रीमद्भगवद्गीता तत्त्व विवेचनी, गीता के परम प्रचारक, ध्यानावस्था में प्रभु से वार्तालाप, उद्धार कैसे हो?, साधन-कल्पतरु, शीघ्र कल्याण के सोपान, स्त्रियों के लिए कर्तव्य शिक्षा, सच्ची सलाह, अमूल्य वचन, आत्मोद्धार के साधन, ईश्वर और संसार, महत्त्वपूर्ण चेतावनी, नल दमयन्ती, श्रीप्रेम भक्ति प्रकाश, कर्मयोग का तत्त्व, तत्त्व चिन्तामणि, भगवत्प्रेम की प्राप्ति कैसे हो?, मनुष्य का परम कर्तव्य, परम साधन।

स्वामी रामसुखदास साहित्य: साधन सुधा सिन्धु, गीता ज्ञान प्रवेशिका, मानवमात्र के कल्याण के लिए, सार संग्रह, क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं?, गीता माधुर्य, एक संत की वसीयत, सत्संग के अमृत कण, गीता प्रबोधनी, श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी, शिखा (चोटी) धारण की आवश्यकता, कल्याणकारी प्रवचन।

बाल कल्याण हेतु पुस्तकें: सच्चे और ईमानदार बालक , गुरु और माता-पिता के भक्त बालक, लघु सिद्धान्त कौमुदी, बड़ों के जीवन से शिक्षा, एक लोटा पानी, परलोक और पुनर्जन्म की सत्य घटनाएं, पिता की सीख , बाल अमृत वचन, सती द्रौपदी, उपयोगी कहानियां, वीर बालक।

भक्त चरित्र: भक्त सप्तरत्न, भक्त रत्नाकर, भक्त नारी, भक्त कुसुम, भक्तराज ध्रुव, भक्त दिवाकर, श्रीश्रीचैतन्य चरितावली, भक्त सौरभ, श्रीजैमिनीयाश्वमेधपर्व, प्रेमी भक्त, प्राचीन भक्त, भक्त बालक, भक्त सरोज, भक्त नारी, भक्त सप्तरत्न, भक्त महिलारत्न, भक्त सौरभ, भक्त पंचरत्न, भक्त सुमन, भक्त कुसुम, भक्त सुधाकर, भक्तराज हनुमान, प्रेमी भक्त उद्धव, सत्यप्रेमी हरिश्चन्द्र, श्रीभीष्मपितामह।
(इनके अतिरिक्त एप पर तमिल भाषा में 17 पुस्तकें, कन्नड़ में 39, बांग्ला में 2 और अंग्रेजी में 24 पुस्तकें हैं।)

एप की आवश्यकता क्यों पड़ी?
संचार तकनीक में लगातार से तेजी से बदलाव आ रहे हैं। नई पीढ़ी बहुत सी चीजें अब आॅनलाइन ही पढ़ना पसंद करती है। साथ ही, लोगों के घर भी छोटे होते जा रहे हैं। घर में मोटी-मोटी पुस्तकों को सुरक्षित रखने की भी समस्या होती है।
इस समय देश के 50 से अधिक रेलवे प्लेटफार्मों पर गीता प्रेस के बुक स्टॉल हैं। इसके अतिरिक्त देश के 20 से अधिक शहरों में गीता प्रेस की निजी दुकानें या शाखाएं हैं। नेपाल में भी एक शाखा है। फिर भी देश के ग्रामीण इलाकों में लोगों को गीता प्रेस की पुस्तकें खरीदने में समस्या होती है। गीता सेवा ट्रस्ट का यह एप इन समस्याओं का निदान है। आज गांवों तक स्मार्ट फोन और इंटरनेट की पहुंच हो गई है। इसके कारण गांवों में साक्षरता भी बढ़ रही है। इसके अलावा, विदेशों में भी गीता प्रेस की पुस्तकों की मांग बनी रहती है। मोटी-मोटी किताबें विदेश भेजने में पुस्तक के मूल्य से ज्यादा डाक खर्च आ जाता है। अब यदि किसी को विदेश या देश में गीता, रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, हनुमान चालीसा, हनुमान बाहुक आदि पढ़ना है तो वह सीधे इस एप के माध्यम से पढ़ सकता है। हनुमान चालीसा की तरह हनुमान बाहुक भी गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार गोस्वामीजी की भुजा में अत्यंत पीड़ा थी। वह इस पीड़ा से बहुत परेशान थे। दर्द के निवारण के लिए उन्होंने
ईश्वर से प्रार्थना की। भगवान से उनकी यही प्रार्थना हनुमान बाहुक में है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि गीता सेवा ट्रस्ट एप के बावजूद भी गीता प्रेस अपनी सभी पुस्तकों का मुद्रण जारी रखेगी, क्योंकि अब भी देश और विदेश की बहुत बड़ी आबादी, खासतौर से बुजुर्ग किताबें पढ़ने के अभ्यस्त हैं। उन्हें मोबाइल फोन पर पढ़ना पसन्द नहीं है। औसतन प्रतिदिन गीता प्रेस में 50,000 पुस्तकें मुद्रित होती हैं।

1923 में हुई एक छोटी सी शुरुआत
1920 के आसपास की बात है। श्री जयदयाल गोयंदकाजी (1885-1965) कोलकाता में सत्संग करवाते थे। उन दिनों सत्संग के लिए न कोई मंच बनता था और न ही कोई प्रचार होता था। धीरे-धीरे सत्संगियों की संख्या बढ़ती गई और सभी को स्वाध्याय के लिए श्रीमद्भगवद् गीता अर्थात गीता की अवश्यकता हुई। परन्तु शुद्ध पाठ और सही अर्थ की गीता सुलभ नहीं हो पा रही थी। सुलभता से ऐसी गीता मिल सके, इसके लिए श्री गोयंदकाजी ने कोलकाता के वणिक प्रेस में 5,000 प्रतियां छपवार्इं। लेकिन ये प्रतियां बहुत जल्दी खत्म हो गईं। दोबारा 6,000 प्रतियों का दूसरा संस्करण छपवाया गया, पर उसमें अशुद्धियों को ठीक करने में बहुत दिक्कत हो रही थी। तब श्री गोयंदकाजी ने अपना प्रेस लगाने की सोची। गोरखपुर के दो कर्मठ मित्रों, घनश्याम दासजी जालान और महावीर प्रसादजी पोद्दार ने उन्हें सुझाव दिया कि प्रेस उनके शहर में खोली जाए जिससे प्रेस की देखभाल भी करेंगे। उनके भरोसे पर 1923 में गोरखपुर में करीब 10 रुपये में एक छोटा सा घर किराए पर लिया गया। उस घर में एक हैंडप्रेस लगायी गयी और गीता प्रेस की स्थापना हुई। लेकिन हैंडप्रेस में छपाई का काम बहुत धीरे-धीरे होता था। हैंडप्रेस में तीन कुशल व्यक्ति एक घंटे में मुश्किल से 100 पृष्ठ ही छाप सकते थे। समय के साथ प्रेस का विस्तार होता गया। श्री जयदयाल गोयंदकाजी (सेठजी) और श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी (भाईजी) द्वारा लिखित पुस्तकें, गीता (हिन्दी अनुवाद सहित) और रामचरितमानस आदि वहां से प्रकाशित होने लगीं। सेठजी, भाईजी, स्वामी रामसुखदासजी तथा कुछ अन्य लोगों के निष्काम सहयोग और समर्पण से धीरे-धीरे गीता प्रेस सनातन धर्म साहित्य का विश्व का सबसे बड़ा प्रकाशन केंद्र बन गया।
गीता प्रेस लागत से कम मूल्य पर पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराती है। गीता प्रेस की स्थापना के पहले गीता की पुस्तक मिलनी दुर्लभ थीं। मिलती भी तो उसमें काफी अशुद्धियां होती थीं और उसका मूल्य चुकाना सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं था। हिन्दू धर्म की तमाम पुस्तकें संस्कृत में है। तब महाभारत का मूलसहित हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध नहीं था। हमारे कई पुराण भी तब हिन्दी में उपलब्ध नहीं थे। गीता प्रेस ने इन सभी पुस्तकों का न केवल हिन्दी में अनुवाद कराया, बल्कि इसका प्रकाशन कर सस्ती दर पर सर्वसाधारण को सुलभ कराया। गीता प्रेस की स्थापना के पहले वाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस, आदि हिन्दू धर्म की कुछ पुस्तकें बाजार में थीं, परन्तु उनका मूल्य इतना ज्यादा होता था कि लोग इसे खरीद नहीं पाते थे। इसके अतिरिक्त उन पुस्तकों की छपाई, बाइंडिंग आदि उतनी अच्छी नहीं थी जितनी कि गीता प्रेस की थी।

मुंबई में श्री वेंकटेश्वर स्टीम मुद्रणालय था। उसकी स्थापना 1871 में हुई थी। इसने भी बड़ी संख्या में हिन्दू धार्मिक पुस्तकें छापीं, लेकिन वह एक व्यापारिक प्रेस थी। इसका उद्देश्य लाभ कमाना था। वह गीता प्रेस की तरह सनतान धर्म को समर्पित नहीं था। इसके अलावा श्री वेंकटेश्वर स्टीम मुद्रणालय की कुछ पुस्तकों को पढ़ने में भी दिक्कत होती थी। जैसे- एक श्लोक में चार पद होते हैं। पहली पंक्ति में दो पद लिखे जाते हैं और दूसरी पंक्ति में आगे के दो पद लिखे जाते हैं। इस प्रकार एक श्लोक को दो पंक्तियों में लिखा जाना चाहिए, परंतु उनकी पुस्तकों में कभी-कभी उसे एक ही पंक्ति में लिखने का प्रयास होता था। इससे छपाई में लगने वाला कागज तो बच जाता था, परंतु पुस्तक को पढ़ने में दिक्कत होती थी। दूसरी ओर गीता प्रेस ने देवी-देवताओं के मनमोहक चित्रों के साथ अपनी पुस्तकें पाठकों तक पहुंचाईं। इस कारण भी वे ज्यादा लोकप्रिय हुईं। गीता प्रेस की पुस्तकों में देवी-देवताओं के जो चित्र हैं, उनमें से अधिकतर श्री बी.के. मित्रा, श्री भगवान और श्री जगन्नाथ नामक चित्रकारों ने बनाए हैं। यहां यह बता देना भी जरूरी है कि ‘कल्याण’ के प्रारंभिक अंकों की लगभग एक वर्ष तक छपाई श्री वेंकटेश्वर मुद्रणालय में ही हुई थी। बाद में इसकी छपाई गोरखपुर में होने लगी।

इंटरनेट की दुनिया में गीता सेवा ट्रस्ट एप लाना एक महत्वपूर्ण कदम है। सबसे विशेष बात यह है कि यह एप ‘यूजर फ्रेंडली’ है। इसमें किसी भी पुस्तक, भजन या प्रवचन को आसानी से ढूंढा जा सकता है। धीरे-धीरे जब इस एप पर विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित गीता प्रेस की सभी पुस्तकें अपलोड हो जाएंगी, तब सनातन धर्म को समर्पित कुछ अन्य संस्थाओं की पुस्तकें, प्रवचन आदि भी अपलोड होंगे। एप में प्रस्तुत सामग्री में सजीवता लाने के लिए एनीमेशन तकनीक का भी प्रयोग किया जाएगा।

(साभार – पांचजन्य)

 

 

 

 

बंगीय हिंदी परिषद में स्थापना दिवस एवं निराला-सुकुल जयंती समारोह

कोलकाता : वसंत पंचमी के पावन अवसर पर बंगीय हिंदी परिषद में “परिषद स्थापना-दिवस एवं निराला-सुकुल जयंती समारोह”का भव्य आयोजन किया गया।उक्त कार्यक्रम की अध्यक्षता कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राक्तन अध्यक्ष प्रो.अमरनाथ ने की।प्रधान अतिथि के रूप में बाल्डविन महाविद्यालय, बेंगलुरु की डॉ. उषारानी राव तथा प्रधान वक्ता के रूप में जाने माने कवि बोधिसत्व ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम को समृद्ध किया।मुम्बई से ही प्रसिद्ध कवि अजय बनारसी भी मुख्यवक्ता के रूप में कार्यक्रम से जुड़े रहे।कार्यक्रम का आयोजन गूगल मीट के माध्यम से ऑनलाइन ही किया गया, जिसमें कतिपय तकनीकी समस्याएँ भी आईं किन्तु कार्यक्रम बेहद सफल रहा।कार्यक्रम का शुभारंभ श्री रमाकांत सिन्हा की सरस्वती वंदना से हुआ।अपना प्रधान वक्तव्य रखते हुए श्री बोधिसत्व जी ने आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल की रचनाओं और उनके कार्यों के आधार पर उनका अभिनव मूल्यांकन प्रस्तुत किया।सन 1932 से ही सुकुल जी ने हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं और कार्यों से समृद्ध करना शुरू कर दिया था और मृत्यु पर्यंत उनका यह सारस्वत प्रयास अनवरत चलता रहा लेकिन आज की पीढ़ी आचार्य सुकुल के बारे में कम ही जानती है।बोधिसत्व ने बताया कि उनके पास सुकुल जी की प्रायः सभी पुस्तकें उपलब्ध हैं और उनकी अन्य पुस्तकों को खोजकर एक साथ प्रकाशित करने की आवश्यकता है ताकि लोग सुकुल जी के साहित्यिक अवदानों से परिचित हो सकें।परिषद की कार्यकारी अध्यक्ष प्रो.राजश्री शुक्ला ने बोधिसत्व के उस प्रस्ताव का स्वागत किया और आश्वस्त किया कि परिषद इस दिशा में शीघ्र ही अग्रसर होगी। अजय बनारसी ने अपने वक्तव्य में निराला जी के व्यक्तित्व के विविध पक्षों की चर्चा की और अपनी एक कविता का पाठ भी किया जो निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ से प्रेरित होकर लिखी गई थी!उक्त अवसर पर श्रीमती दीपा ओझा ने निराला जी की कविता की आवृत्ति प्रस्तुत की।डॉ. उषारानी राव ने अपने वक्तव्य में निराला जी के साहित्य का विशद विवेचन किया और बताया कि निराला जी को जितनी बार पढ़ा जाए उतनी बार उनकी विशिष्टताएँ नए रूपों में उभर कर सामने आती हैं।निराला का व्यक्तित्व और उनका कृतित्व अगाध था।अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में अमरनाथ ने सुकुल जी के कार्यों की विशद चर्चा की और बताया कि किस प्रकार सुकुल जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्वतंत्र हिंदी विभाग की स्थापना को लेकर संघर्ष किया और बाद में बंगीय हिंदी परिषद की स्थापना की जिसे उनदिनों हिंदी का तीर्थ भी कहा जाता था और समस्त समकालीन रचनाकार परिषद से जुड़े हुए थे।उन्होंने सुकुल जी के संस्थागत कार्यों को उनके लेखकीय अवदान से भी अधिक महत्वपूर्ण माना।प्रो.अमरनाथ ने इस बात पर अपनी चिंता भी व्यक्त की कि अंग्रेजी माध्यम के बच्चे निरंतर हिंदी साहित्य से दूर होते जा रहे हैं और आने वाले समय में यदि हिंदी को रोजगार से नहीं जोड़ा गया तो स्थिति चिंताजनक हो सकती है।कार्यक्रम का संचालन परिषद के मंत्री डॉ. राजेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन परिषद के संयुक्त मंत्री डॉ. रणजीत कुमार ने दिया।
कार्यक्रम में परिषद की कार्यकारी अध्यक्ष प्रो.राजश्री शुक्ला , सुषमा राय पटेल, पुष्पा मिश्रा, निखिता पांडेय, रावेल पुष्प, अनूप यादव, दिलप्रसाद, फरहत परवीन, गीता शास्त्री, कृष्णकुमार दूबे, किरण वर्मा, मीना प्रसाद, प्रतिभा विश्वकर्मा, प्रीति साव,ऋतु साव, संगीता शुक्ला, श्रीहरि वाणी, श्रीपर्णा तरफदार, सुनीता दूबे, सुदर्शन पुजारी, सिद्धार्थ कुमार त्रिपाठी, डॉ. वसुमति डागा, राजीव कुमार रावत, दुर्गा व्यास, सुषमा दास, आशीष गुप्ता, भानु पांडेय, वीरेंद्र सिंह आदि ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज़ कराई और इस सारस्वत अनुष्ठान को समृद्ध किया।

जकरिया स्ट्रीट से मेफेयर रोड तक : रेणु गौरीसरिया के बहाने मित्र परिक्रमा

डॉ. किरण सिपानी

सन् 2020 गतिविधियों पर पाबंदियों का वर्ष तो जरूर साबित हुआ, पर लेखन और कहूँ तो कुछ अंशों तक प्रकाशन भी कमोबेश चलता रहा, रुका नहीं। तीन पुस्तकें मेरी टेबल पर हैं – ‘कोलाज’, ‘जकरिया स्ट्रीट से मेफेयर रोड तक’ और ‘स्पन्दन’। तीनों ही रेणु दी से किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई हैं। ‘कोलाज’ स्व. सुर्कीति गुप्ता की आत्मकथा है। जनवरी में 2020 में मेरे द्वारा प्रकाशित इसके लोकार्पण समारोह में एक वक्ता के रूप में मैंने रेणु दी को चुना था। कई मायनों में यह एक सार्थक सृजनात्मक उत्सव था। नवम्बर में प्रकाशित ‘जकरिया स्ट्रीट से मेफेयर रोड तक’, प्रथम पृष्ठ पर एक हस्तलिखित नोट के साथ पहुँची –

प्रिय किरण जी,
साहित्यिकी के साथ भी और उसके बाद भी, आपसे मेरा सम्पर्क कभी टूटा नहीं। आपने हमेशा संचालन, समीक्षा या कुछ भी लिखते रहने की प्रेरणा दी। उसी प्रेरणा का फल है यह आत्मकथ्य। अपने जीवन की सुख – दुख की इस यात्रा में आपको सम्मिलित करके बड़ी प्रसन्नता हो रही है।
सस्नेह, रेणु दीदी
1.11.2020

सीमित मुद्रित प्रतियों में से एक मेरी झोली में गिरी – आभार उनका। उम्र के इस पड़ाव पर इस सकारात्मक सक्रिय कदम के लिए वे स्पृहणीय हैं।
तीसरा प्रकाशन ‘स्पन्दन’ – मेरी बेटियों – दामादों द्वारा अपने जीवित माँ – पापा को अर्पित अनोखा उपहार है। बच्चों ने गुपचुप तरीके से हमें भनक लगाये बिना दोनों तरफ के परिवारों, हम दोनों की मित्र – मंडलियों एवं हर बच्चे से सबकी रंगीन तस्वीरों के साथ उनकी भावनाओं, आलेखों, कविताओं, शुभकामनाओं की अनमोल धरोहर बना दिया है इसे। पृष्ठ 51 पर अपने आलेख की अंतिम पंक्तियों में रेणु दी ने बहुत कुछ कह दिया है – ‘कवयित्री, गायिका, अध्यापिका, अन्य गुणों से बढ़कर है आपका मित्रता का गुण। मुझे गर्व है कि मैं आपकी मित्र हूँ। सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहते हुए कर्मरत रहें।’ सुखद है कि रेणु दी व मेरे बच्चों ने इन पुस्तकों का मुद्रित एवं ऑनलाइन प्रकाशन किया।
साहित्य़िकी से बीस वर्षों के जुड़ाव ने विभिन्न मनोभूमियों के मित्रों से सूत्र जोड़ दिये। साहित्यिकी परिवार के हर सदस्य का जन्मदिन मेरी स्मृति में अंकित रहा – ऐसा बहुत कम ही हुआ होगा कि मैंने समय पर अपनी शुभकामनाएं प्रेषित न की हों। मैं कभी साहित्यिकी पत्रिका की सम्पादक नहीं रही, पर सुर्कीति दी की आज्ञानुसार विशेष सहयोगी के रूप में हर तरह के कार्य मेरी संलग्नता रही। पत्रिका के लिए सबसे पहले रचना प्रेषित करने में विनोदिनी गोयनका, आशा जायसवाल, रेणु गौरीसरिया, अग्र पंक्ति में शामिल रहीं। विनोदिनी जी आज हमारे बीच नहीं हैं – उनका सहज स्नेह मुझे हमेशा भिगोता रहा। आशा दी की मित्रता तो 2012 में जायसवाल भाई साहब के परलोकगमन के बाद परवान चढ़ती गयी। साहित्य – अध्यापन – परिवार – दिनचर्या, कोई भी विषय हो, हम दो – चार दिनों पर खुलकर बातें करते रहते हैं। हाँ, शारीरिक रूप से न मिल पाने पर भी दूरियों का कोई अर्थ नहीं। मेरी भावनाओं का सम्मान करते हुए वे कभी आज्ञा देती रहीं, कभी सुझाव। उनके माध्यम से चिन्मय ट्रांसफॉर्मेशन सर्कल के कई अकादमिक कार्यक्रमों में मेरी सकारात्मक अग्रणी भूमिका रही। उनकी जीवटता बरकरार रहे – यही कामना है।
2020 का चौथा प्रकाशन, जो मुद्रित एवं ऑनलाइन – दोनों ही रूप में उपलब्ध हुआ मुझे – नुपुर जायसवाल की व्यंग्य़ रचनाओं का संकलन – ‘पचहत्तरवाली भिंडी’ – जो गुदगुदाता भी है, मर्म को भेदता भी है, आत्मलोचन के लिए प्रेरित भी करता है। उसकी कविताएं, समीक्षाएं, व्यंग्य, चित्र और उद्यमिता के लिए आयोजित कार्यशालाएं…सब मिलकर उसके व्यक्तित्व को विशिष्ट बना देते हैं। साथ काम करने एवं एक दूसरे के सहयोग -सुझावों ने रिश्तों को प्रगाढ़ किया है। गीता दूबे उम्र में बहुत छोटी है मुझसे, पर हमने बहुत कुछ साझा किया है। कई बिन्दुओं पर एक दूसरे को समझते हुए, सम्मान देते हुए एक दूसरे की कद्र की है। उसकी वाक स्पष्टवादिता, अध्ययनशीलता, समीक्षा -लेखन की मैं कायल रही हूँ। ‘स्पन्दन’ में व्यक्त अपनी भावनाओं में माँ का सा दर्जा देने वाली – इस बिटिया मित्र को ढेरों आशीर्वाद। जन्मदिन साझा करने वाली वसुंधरा मिश्र को डाँट – डपटकर घर से बाहर निकालकर अध्यापन की डोर पकड़वा पाने पर संतोष हुआ। उसकी श्रद्धा – स्नेह – सम्मान मेरा सम्बल बनते रहे हैं। सुधा भार्गव और राज जैन दूसरे शहरों में बस गई – फोन पर लम्बी वार्ताएँ हमारी अंतरंगता की साक्षी रही हैं। बयासी वर्षीय प्रतिभा खंडेलवाल की सक्रियता मुझे अंचभित करती हैं।
साहित्यिकी, हनुमान मंदिर अनुसंधान संस्थान, आचार्य जगदीश चंद्र बोस कॉलेज, स्टूडेंट्स डे होम फॉर गर्ल्स, जैन कॉलेज आदि विभिन्न संस्थानों एवं अपने स्कूल – कॉलेज – यूनिवर्सिटी के मित्रों की लम्बी परिक्रमा करूँ तो सीमाओं का लंघन होगा। कुछ मित्र पानी के बुलबुले की तरह जीवन में अल्पकाल के लिए आये। कुछ ने मौसमी फूलों की तरह अपनी खुशबू बिखेरी और चले गये पर कुछ पत्थर की लकीर की तरह टिके रह गये। कुछ की मित्रता के छद्म रूपों – सदमों ने मुझे व्यथित किया। वर्ष बीत गये, पर उस पीड़ा से स्वयं को मुक्त न कर पायी। खैर! साहित्यिकी की परिक्रमा तो पूरी हुई। स्कूल के मित्रों में बिमला अग्रवाल बिछुड़ कर फिर मिल गयी। अपनी सगाई के दिन उसी के कपड़े – गहने पहने- इतना अपनत्व था…सिर्फ कुछ घंटों के अंतराल पर तैयार होना था, नये कपड़े बनवाने – खरीदने का समय नहीं था। उषा मेहरा (सग्गी) भी वर्षों खोई रही। मिली तो ऐसी मिली कि जैसे खोयी ही नहीं थी। जड़ों में पानी पड़ा, फिर हरी हो गयीं डालियाँ। कॉलेज की एकमात्र सखी उषा लड्ढा (चांडक) के सारे भाई- बहनों का परिवार कब मेरा परिवार बन गया, पता ही नहीं चला। उसके जीजाजी बालकृष्ण गर्ग मेरे राखीबंद भाई बन गये और उनके बच्चों की मैं बुआ – मासी बनकर आज तक सम्मान पाती रही हूँ। बड़ी भाभी जी के गुजर जाने पर अकेली हो गई बबली – टिंकू को सिंधारा – दीपावली पर बुलाना मेरी सूची में शामिल रहता है। सूचना मिलने पर मेरे विवाह की सालगिरह में घर की बड़ी – बूढ़ियों की तरह बबली मिठाई भेजने में चूकती नहीं। उषा का बड़ा बेटा मुन्ना सपरिवार केदारनाथ की लहरों में कहीं खो गया। चमत्कार भी होते हैं न! उषा के सब्र और जज्बे को सलाम।
हनुमान मंदिर का प्रसाद है विजयलक्ष्मी मिश्र। हर आँधी – तूफान में साथ खड़ी रही। सहज – सरल – मिलनसार हनुमान की तरह हर संकट के समाधान को तत्पर – बिल्कुल निष्कपट। उम्र में एक ही वर्ष छोटी, मेरे प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा से भरपूर, जिससे आधी रात को उठाकर दिल की बात कही जा सके। उसका स्नेह मेरी धाती है। आचार्य जगदीश चंद्र बोस कॉलेज की अंग्रेजी प्रवक्ता संजुक्ता दासगुप्त और मैं विभिन्न विषयों और विभिन्न पृष्ठभूमियों से जुड़े थे – पर कुछ रुचियों ने हमें करीब ला दिया। मित्रता का आलम यह था कि जब वह 13 -14 वर्षों बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय में हमेशा के लिए जा रही थी तो कॉलेज के प्रिंसिपस डॉ. देवतोष मजूमदार के मुँह से पहला वाक्य निकला था – ‘एखन मिसेज सिपानीर कि होबे?’ (‘अब मिसेज सिपानी का क्या होगा?’ ) वह अब कलकत्ता विश्वविद्यालय के ह्यूमैनिटीज के डीन पद से सेवानिवृत होकर साहित्य अकादमी से जुड़ गयी हैं।
कविता मेहरोत्रा भी हनुमान मंदिर के माध्यम से ही जुड़ी और औपचारिकता की सीमाएं पारिवारिक आत्मीयता में विलीन हो गई। नवरात्रि के समय मेरी बेटियाँ – भतीजी रामलाल जी मेहरोत्रा के घर पर पूजी जातीं। अन्नकूट के अवसर पर रामलाल जी भाई साहब हमें बुलाना नहीं भूलते। हम सब भाभी जी के द्वारा बनाये पकवानों से छक कर आते।
साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत राजस्थानी – हिन्दी पंजाबी के साहित्यकार डॉ. मंगत बादल से परिचय हुआ। उनके राजस्थानी काव्य ‘मीरा’ के संदर्भ में और हम अच्छे मित्र बन गये। हम कभी मिले नहीं। कुछ – कुछ अंतराल पर हम विभिन्न साहित्यिकी विषयों पर लम्बी चर्चायें करते हैं फोन पर ही। उनके काव्यों की मार्मिक शैली पाठक को बाँधे रखती है। व्यंग्य – लेखन में भी माहिर हैं वे। निबन्धों की छटा भी निराली है। लिखने के लिये निरन्तर मुझे प्रेरित करते हैं। मेरी रफ्तार तेज नहीं हो पाती और वे तो दिन के कई घंटे लेखन में डूबे रहते हैं। उन्हें मेरी पुस्तकों की प्रतीक्षा है। 2020 में ही कोरोना काल में उनके नये काव्य संग्रह ‘साक्षी रहे हो तुम’ का लोकार्पण हुआ, जिसे मैं पढ़ नहीं पाई।
मेरी मित्र -परिक्रमा रेणु दी से शुरू हुई और अब उन पर ही समाप्त कर रही हूँ। साहित्यिकी की गोष्ठियों में परिचय हुआ। सफेद लिबास में लिपटी एक सौम्य मूर्ति – कोई बनाव – श्रृंगार, कोई दिखावा नहीं। साहित्यिकी की गोष्ठियों के संदर्भ में प्रायः हर सदस्या से मेरा संपर्क रहता। ज्यों- ज्यों रेणु दी से सम्पर्क सघन होता गया, मैं उनके साहित्यिक रुझान से परिचित होती गयी। उनके ना – नुकुर करने पर भी मैं उन्हें सक्रिय करने की ताक में रहती और किसी सृजनात्मक गतिविधि में जोड़ने का सफल प्रयास करती। मुझे उनके जीवन की कुछ घटनाएँ उन्हीं के द्वारा ज्ञात हुई थीं। उनकी दायित्वशीलता, अनुशासनप्रियता और साहित्यिक रुचि अनुकूल लगी थी साहित्यिकी के विकास के लिये। मैंने उनके सामने सह सचिव के पद का प्रस्ताव रखा था और बहुत विचार – विम्रर्श के बाद झिझक के साथ स्वीकृति दी थी उन्होंने। हमारा तालमेल अच्छा ही रहा। कोरोना काल में भी मेरे संस्मरणों को पढ़ती रही हैं वे।
मैंने बच्चन की बहुचर्चित आत्मकथा के सारे भाग पढ़े थे। आत्मकथा पढ़ने का पहला अनुभव था। एडवोकेट माँगीलाल भूतोड़िया की डायरीनुमा आत्मकथा – ‘ख्वाब से अधिक हसीन जिन्दगी’ को भी पढ़ने का अवसर मिला। यह आत्मकथा अपने खुले वर्णनों के कारण बहुत आलोचित हुई थी। यथार्थ के सारे रूप सहज स्वीकार्य नहीं होते। तीसरी अप्रकाशित आत्मकथा जो मैंने पढ़ी, वह थी सुकीर्ति गुप्ता की ‘कोलाज’, जिसका प्रकाशन उनकी मृत्यु के बाद बहुत मुश्किल से हुआ। वैसे तो इसके पूर्व छपा उनका चक्रव्यूह उपन्यास भी आत्मकथात्मक ही है, मेरी समीक्षा ‘स्त्री लेखन : स्त्री दृष्टि ‘ आलोचनात्मक ग्रन्थ में संकलित है। ‘जकरिया स्ट्रीट से मेफेयर रोड तक’ रेणु दी की आत्मकथा है। बड़ी बेबाकी से, बिना लाग – लपेट के अपने अंतर्मन की तहों को खोल दिया है उन्होंने। उत्तर आधुनिक युग में स्त्री का बोलना सहज सह्य नहीं है। उनकी चुप्पी शालीनता का लेबल है। आत्मकथा खुलेपन की माँग करती है। ईमानदार अभिव्यक्ति को पाठकों का विश्वास और स्नेह सहज ही प्राप्त हो जाता है। अपनी तथाकथित इमेज के टूटने के डर से लेखक खुलेपन से बचते हैं। रेणु गौरीसरिया ने इस डर को धता बता दी – बड़े साहस की बात है।
यह रेणु गौरीसरिया के लेखन का प्रथम प्रकाशन है। उन्होंने साबित कर दिया कि बूढ़ी उम्र का लेखन भी धारदार हो सकता है। किसी भी उम्र के लेखन का स्वागत किया जाना चाहिए। तन से बूढ़ा हो जाना ही ‘चुक जाना’ नहीं होता। आशा है कि इस प्रथम प्रकाशन की संतुष्टि उन्हें नयी उर्जा से भर देगी औऱ वे इस क्षेत्र में निरन्तर गतिमान रहेंगी।
कई पीढ़ियों के परिवारों का आपस में जुड़े रहना – जीवन को अनोखा संबल प्रदान करता है – यह कथ्य इस आत्मकथा में उभर – उभर कर आता रहा है जिसके तार बचपन के सूत्रों में गुँथे रहते हैं। भव्य बचपन के चित्र कई पुराने भारतीय परिवारों की याद दिलाते गये मुझे। छोटी उम्र में विवाह की मासूमियत के रंग कुछ अलग ही होते हैं – यह सच्चाई बहुत ही सहजता के साथ अभिव्यक्त हुई बै। पहले विवाह का लाड़ – प्यार बहुत ही निर्मम तरीके से दूसरे विवाह के अपमान – तिरस्कार – उपेक्षा में कैसे बदल जाता है….शायद इसे ही नियति कहेंगे। नाजों – हथेलियों में पली विवाहित बेटियों का दुःख पिता को किस कदर तोड़ देता है, ससुराली अत्याचारों एवं निकम्मे पतियों से मुक्ति दिलाने के लिए मायके वाले कितना तड़पते हैं, कई स्थितियों में स्त्री कितनी लाचार – विवश हो जाती है, ममता खून के आँसू रोती है….वर्णन – दर – वर्णन पाठक की संवेदना झंकृत होती रहती है।
कलाकारों – साहित्यकारों के संसर्ग में संस्कारवान होती, अपनी रुचियों को विकसित करती कथा- नायिका मारवाड़ी समाज के जागरण – बदलाव को अपने चरित्र में रुपांतरित करती है। कई पड़ावों को पार करते, रुक – रुक कर चलते – चलते आखिरकार शिक्षा के आलोक से जीवन को आलोकित करती हुई अपनी प्रगतिशील सोच का प्रमाण देती है। स्कूल में अध्यापन से जुड़कर आत्मनिर्भरता का बिगुल बजाती है। कई संस्थाओं से जुड़कर बौद्धिक तृप्ति की राह तलाशती है। अवसर मिलने पर अपनी यायावरी के शौक को पूरा करने का लोभ नहीं छोड़ पाती और सिलसिलेवार यात्रा – स्मृतियों के लेखन से नहीं चूकती।
इस आत्मकथा में मार्गदर्शन करने वालों के प्रति आभार प्रकट करती हुई वे एक स्थान पर प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह का स्मरण करती हैं। बिना किसी प्रचार के स्त्री को बदलने की ‘सर’ की सकारात्मक तत्परता के ढेरों उदाहरण मेरी आँखों के सामने हैं। सबसे बड़ा प्रमाण है – डॉ. विजयलक्ष्मी मिश्र, जिसे उन्होंने नवजीवन प्रदान किया। वे मेरे मानस – पिता थे जिनके वात्सल्य- आशीर्वाद से मैं आप्लावित होती रही।
अंत में इस आत्मकथा की तटस्थता का उल्लेख न करूँ तो बात अधूरी रह जायेगी। संबंधों के विश्लेषण में तटस्थ दृष्टि हमेशा सक्रिय रही हैं, विशेषकर अपने बच्चों – पम्मी और अर्जुन के नाम लिखे गय़े पत्रों में। दूरियों – नजदीकियों के धागों में पिरोये ये पत्र किसी माँ की चिंताओं – पीड़ाओं को बड़ी निस्संगता से अभिव्यक्त करते हैं। संबंधों की गर्मजोशी एवं कड़वाहटों के रेखाचित्र आँकती यह आत्मकथा पग – पग पर अपने आस – पास से रूबरू होकर समस्याओं के समाधान की प्रेरणा देती है।
मैं यह मानकर चलती हूँ कि मेरे इस मित्र – संस्मरण में बहुत गहरे मित्र छूटे हैं, जैसे कि रेणु दी की आत्मकथा में मैं। सबसे क्षमा याचना।

सखी वसंत आया……

कोलकाता :  निराला को याद करते हुए अर्चना संस्था कोलकाता की ओर से सूर्य कांत त्रिपाठी निराला जी की कविताओं की आवृत्ति और गीतों का गायन जूम ऑनलाइन पर किया गया। वसंतपंचमी के दिन निराला का जन्म 21फरवरी 1899 बंगाल के महिषादल रियासत मेदिनीपुर में वसंत पंचमी के दिन हुआ था।  छायावाद के चार स्तंभों में निराला हिंदी जगत में कवि, निबंधकार, उपन्यासकार , कहानीकार आदि साहित्यिक विषयों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।इस अवसर पर “अर्चना” की कई सदस्याओं ने निराला की कई रचनाओं का गायन किया।  हिम्मत चौरडिया, मृदुला कोठारी, इंदू चांडक, सुशीला चनानी, शशि कंकानी, संगीता चौधरी, बनेचंद मालू, भारती मेहता, नौरतनमल भंडारी, , डॉ वसुंधरा मिश्र, उषा श्राफ आदि ने भाग लिया। सखि वसंत आया-हिम्मत चौरडिया , स्नेह निर्झर बह गया-विद्या भंडारी , अभी न होगा मेरा अंत-सुशीला चनानी , गीत गाने दो मुझे-भारती मेहता ,केशर की कली की पिचकारी-इंदु चांडक और राम की शक्ति पूजा की आवृत्ति “होगी जय होगी जय पुरुषोत्तम नवीन” डॉ वसुंधरा मिश्र द्वारा की गई। वसंतोत्सव के अवसर पर स्वरचित कविताओं का भी पाठ किया गया। सुशीला चनानी की ये पंक्तियाँ बहुत पसंद की गईं – – गीजर हुए बंद /समेटी रजाई/शीत लहरों की हुई विदाई। नौरतन भंडारी की रचना” कह दे सारी अनकही बातें” , शशि कंकानी का मधुर गीत कृष्ण, बनेचंद मालू की रचनाएं, वसंत और बहार हैं दोनों जुडवा बहने, पंक्तियां श्रोताओं को पसंद आई। “ऋतुराज वसंत” और” वसंत की अनुभूति” सुनाई। संगीता चौधरी ने “चले आओ हम बेकरार हैं” , उषा सराफ ने बालमुकुंद गुप्त की वसंत विषयक कविता, शशि कंकानी ने” देखो आई वसंत बहार /कोयलिया कुहुक उठी”, भारती मेहता (अहमदाबाद) ने निराला के गीत की प्रस्तुति दी । विद्या भंडारी ने संचालन करते हुए निराला की प्रसिद्ध रचना “वर दे वीणा वादिनी वर दे “से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।