कोलकाता : वैश्विक महामारी के इस समय में राष्ट्रीय सचेतनता का प्रमाण देते हुए और जनता की सुरक्षा को ध्यान में रखकर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। इसी क्रम में शिक्षा विभाग द्वारा गैर – सरकारी विद्यालयों के सभी शिक्षकों एवं गैर शिक्षण कर्मचारियों के टीकाकरण का महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। इसके लिए पांच टीकाकरण केंद्र चुने गए जिनमें पूर्वांचल विद्यामंदिर भी एक है। गत 16 जून, बुधवार को यहां 13 विद्यालयों एवं दिनांक 17 जून, गुरुवार को कुल 11 विद्यालयों के शिक्षकों एवं गैर – शिक्षण कर्मचारियों का टीकाकरण किया गया । कोलकाता नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी स्कूलों के लिए यह टीका निःशुल्क प्रदान किया गया। इस महान कार्य को सफल एवं सटीक तरीके से संपन्न करने में पूर्वांचल विद्यामंदिर के सभी सदस्यों ने सक्रिय भूमिका निभाई और अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह किया।
विद्यालय के प्रबंधन समिति के कार्यकारिणी सदस्यों ने इस कार्यक्रम का पूर्ण समर्थन किया । इसके साथ ही पूर्वांचल नागरिक समिति के अध्यक्ष उमेश केडिया, पूर्वांचल विद्यामंदिर के संयोजक रमाकांत बेरीवाल , एवं सह – संयोजक श्री लक्ष्मी नारायण गुप्ता के सक्रिय सहयोग के बिना यह कार्य संभव नहीं हो पाता। विद्यालय की प्रधानाचार्य पुष्पिता बारिक की देखरेख में बड़ी ही सावधानी से कोरोना कालीन नियमों का पालन करते हुए यह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
पूर्वांचल विद्यामंदिर में शिक्षकों एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों का टीकाकरण
शुभजिता क्लासरूम : हिन्दी साहित्य के लिए एनटीए नेट परीक्षा
वीडियो साभार – दिल्ली नॉलेज ट्रैक
उपलब्ध करवाया है नीरज सिंह ने
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की स्मृतियों का जीवन्त प्रतीक झाँसी का किला
झांसी, यहां किला बनने और रानी लक्ष्मीबाई के आगमन के बाद इस किले में हर जगह नजर आने वाली उनकी छाप का सिलसिला कुछ इस तरह हैं। बंगरा पहाड़ी पर 15 एकड़ में बने इस विशाल किले की नींव 1602 में ओरछा नरेश वीरसिंह जूदेव द्वारा रखी गई थी। ओरछा झांसी से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित वर्तमान में मध्यप्रदेश का एक कस्बा है। कभी यह सशक्त ओरछा राज्य था और झांसी को इस काल में बलवंतनगर के नाम से जाना जाता था। उस समय बलवंत नगर में रहने वाले किसान खेती, दूध, दही और लकड़ी बेचकर अपना गुजारा करते थे।बलवंत नगर की भौगोलिक स्थिति कुछ इस प्रकार की थी कि यह स्थान बुंदेलखंड की सुरक्षा के लिए सैनिक छावनी के लिए उपयुक्त था। इसी कारण ओरछा नरेश वीरसिंह ने इस नगर की बंगरा पहाड़ी पर 1602 में किले का निर्माण शुरू कराया। किले को बनने में 11 साल का समय लगा और यह 1613 में बनकर तैयार हुआ। जब यह किला निर्माणाधीन था तब ओरछा नरेश से मिलने जैतपुर के राजा आए। जैतपुर के राजा को अपने किले की छत पर ले जाकर हाथ से इशारा करते हुए ओरछा नरेश ने पूछा ‘देखिए आपको कुछ नजर आ रहा है?’ इस पर राजा जैतपुर ने गहराई से देखते हुए कहा कि बलवंत नगर की पहाड़ी पर कुछ ‘झांइ सी’ (धुंधला सा) नजर आ रही है। ओरछा नरेश खुश होते हुए कहा कि आज से बलवंत नगर का नाम ‘झांइसी’ होगा। कालां तर में इसका नाम बदलकर झांसी हो गया।
ओरछा नरेश द्वारा बंगरा पहाडी को काटकर बनाया गया यह किला बेहद मजबूत है इसी कारण इस दुर्ग की चर्चा पूरे संसार में होती है। किले मे 22 बुर्ज और बाहर की ओर उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम दिशा में खाई है, जो दुर्ग की ओर आक्रमणकारियों को सीधे आने से रोकती हैं। ओरछा नरेश के नियंत्रण से निकलकर बाद में झांसी मराठा पेशवाओं के आधीन आई। पेशवाओं ने सूबेदारों की मदद से यहां शासन किया। ओरछा नरेश से संबंधित गुसाईं यहां के किलेदार बने, जिन्हें बाद में पेशवा के मराठा सूबेदारों ने हटा दिया। गुसाईं और मराठा पेशवाओं ने भी किले मे कई अन्य इमारतों और स्थलों का निर्माण कराया।

मराठा नरेश गंगाधर राव से विवाह के बाद मणिकर्णिका झांसी आकर लक्ष्मीबाई कहलाईं। इन रानी लक्ष्मीबाई की छाप किले में हर जगह देखने को मिलती है। किले के पश्चिमी भाग पर बना वर्तमान मुख्य द्वार वास्तव में मुख्यद्वार नहीं है किले पर अंग्रेजों के अधिकार के बाद किले की दीवार को तोड़कर यह द्वार बनाया गया था।
इसी द्वार के पास रखी है ‘कड़क बिजली तोप’ जो किले की सबसे भारी तोप थी। इस तोप को महारानी के विश्वासपात्र गुलाम गौस खाँ चलाते थे। 1857 में जब अंग्रजों ने झांसी पर हमला किया तो पश्चिमी हिस्से के सामने आने वाली पहाड़ी पर बने कैमासन देवी मंदिर की ओट का सहारा लेकर अंग्रेजी तोपों ने गोले बरसाए। उस समय तोप इस हिस्से में बने बुर्ज पर रखी थी लेकिन महारानी ने मंदिर होने के कारण उस ओर कड़क बिजली तोप नहीं चलाने का आदेश दिया लेकिन अंग्रेजों द्वारा उसी दिशा से बरसाएं गोलों के कारण बुर्ज टूट गया और तोप नीचे मलबे में आ गिरी।
इस तोप को 1852 में जनरल करेप्पा ने नीचे से मलबे से निकलवाकर किले के वर्तमान मुख्य द्वार के पास लगवाया। इस तोप में गोला फंसा हुआ है जो दागने के लिए तोप में लगाया तो गया था लेकिन रानी ने गोला दागने का आदेश नही दिया था। किले में अंदर गणेश मंदिर है यूं तो राजा गंगाधर राव और महारानी लक्ष्मीबाई का विवाह किले के बाहर बने गणेश मंदिर में हुआ था लेकिन विवाह के बाद किले में पहली पूजा रानी ने इसी मंदिर में की थी इसीलिए इसे राजा ने अपने विवाहस्थल के रूप में मान्यता दी थी।
किले में इस मंदिर का बहुत महत्व था। रानी रोज यहां पूजा अर्चना के लिए आती थीं। किले के वास्तविक द्वार इसी गणेश मंदिर के नीचे हैं जो लकड़ी के बने हैं और आज भी किले में मौजूद हैं। इन्हीं दरवाजों से रानी का किले मे आना जाना होता था। किले के मुख्य भाग में कारावास, काल कोठरी, शिव मंदिर, फांसी घर, पंच महल, पाताली कुंआ, गलाम गौस खां, मोती बाई व खुदा बख्श की समाधि स्थल और महारानी का छलांग स्थल महत्वपूर्ण जगह हैं।
गंगाधर राव बेहद सख्त राजा थे और वह गद्दारों या नाफरमानी करने वालों के प्रति बहुत सख्त रवैया अपनाते थे और कहा जाता है कि छोटी गलती पर भी फांसी की सजा दे देते थे। किले के उत्तर पूर्वी किनारे पर फांसी घर बनाया गया था जहां जल्लाद फांसी देता था और नीचे गिरने वाली लाश को उसके घर वालों को दे दिया जाता था या लावारिस होने पर ओरछा में बेतवा नदी मे फिकवा दिया जाता था।
मात्र 13 साल की उम्र में विवाह के बाद झांसी आई महारानी लक्ष्मीबाई में इतनी ऊंचे दर्जे की प्रशासनिक समझ और मानवीयता थी कि उन्होंने राजा गंगाधर राव से कहकर छोटी सी बात पर ही फांसी देने की इस प्रथा का अंत करवाया। उन्होंने किले में एक कारावास और काल कोठरी बनवाई और राजा को समझाया कि जो कर्मचारी नाफरमानी करें उन्हें पहले कारावास में रखा जाए और इतना कम खाने को दिया जाएं कि वह सही रास्ते पर आ जाएं।
गद्दारों से निपटने के लिए बनाई गई काल कोठरी ऐसी जगह है जहां जाने वाला हर कैदी हर पल अपनी मौत की दुआ मांगता था। इस बड़ी सी काल कोठरी में न तो कोई खिड़की है और न ही कोई रोशनदान। यहां बस नाममात्र के लिए बेहद छोटे रोशनदान है इस कारण इस कोठरी में सीलन और अंधेरा रहता है। इसी कारण यहां रखा जाने वाला हर कैदी हर पल अपनी मौत की दुआ मांगता था।
किले के मुख्य भाग में बना पंचमहल बेहद खूबसूरत इमारत है जो पांच मंजिला थी। इस पंचमहल में राजा और रानी रहते थे। इसकी सबसे ऊपरी मंजिल में बनी रसोई में राजा और रानी के लिए खाना बनाया जाता था। सबसे ऊपरी मंजिल को बाद में अंग्रेजों ने तुड़वा दिया और सपाट कर दिया। उसके नीचे की मंजिल वर्तमान में बंद है बीच की मंजिल में रानी दोपहर में अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलती थीं। यहां चंदन की लकड़ी का झूला टंगा था,रानी अपनी सहेलियों के साथ फुर्सत के पल बिताती थीं। इससे नीचे की मंजिल में रानी व्यायाम किया करती थीं।
बारादरी, किले में एक ऐसी जगह जो राजा रानी के मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होती थी। यहां गजराबाई का नृत्य उनके मनोरंजन के लिए होता था। इसी जगह पर सुरक्षा की दृष्टि से भवानी शंकर तोप रखी गई थी जिसे महिला तोपची मोतीबाई चलाती थीं।

किले में 1602 में बनाया गया एक पाताली कुंआ है। किले के निर्माण के दौरान सबसे पहले कुंआ और मंदिर ही बनाया गया था बाद में किले के बनने में इस्तेमाल हुआ पानी इसी कुंए से लिया गया। यह कुंआ आज भी किले में है जिसका पानी कभी नहीं सूखता। आज भी इस कुंए के पानी का इस्तेमाल साफ सफाई और हरियाली को बनाए रखने में किया जाता है।
किले मे मौजूद महत्वपूर्ण स्थानों मे सबसे महत्वपूर्ण है ‘रानी लक्ष्मीबाई का छलांग स्थल’। यह वह जगह है जहां से महारानी ने अपने दत्तक पुत्र को पीठ में बांधकर घोड़े पर सवार होकर किले से बाहर छलांग लगाई थी। जब रानी के देवर दूल्हाजी राव ने उनके साथ धोखा कर ओरछा गेट खोल दिया और अंग्रेजों को किले के अंदर प्रवेश करा दिया।
रानी और अंग्रेजों के बीच जबरदस्त लड़ाई हुई। मुंह में घोड़े की लगाम लिए, पीछे बेटे को बांधे और दोनों हाथों से तलवार चलाती रानी को युद्ध के बीच में किसी ने पीछे से बरछी मार दी, जिसमें रानी बुरी तरह घायल हो गई। रानी का बहुत खून बहने पर उनकी वफादार झलकारी बाई ने उनसे किला छोडकर जाने को कहा। झलकारी बाई की शक्ल लक्ष्मीबाई से बहुत ज्यादा मिलती थी। झलकारी बाई की बात मानकर रानी ने किले की दीवार से घोड़े पर बैठकर छलांग लगाई।
किले के बाहर स्थित भी कुछ इमारतें हैं जो रानी से संबंधित हैं। इसी ही एक इमारत है रानी महल। राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी महिला सेना के साथ रहने के लिए रानी महल में रहने चलीं गईं थी। इसके अलावा लक्ष्मी तालाब के पास गंगाधर राव की समाधि है और काली जी का बड़ा मंदिर है। रानी रोज काली जी की पूजा करने आतीं थीं।
झांसी में कोई ऐसी जगह नहीं है जो महारानी लक्ष्मीबाई के प्रभाव से अछूती रही है। वीरता और पराक्रम की प्रतिमूर्ति रानी का प्रभाव भी किले में मौजूद हर स्थान पर साफ देखा जा सकता है।
प्रख्यात आधुनिक साहित्यकार गीतांजलि श्री

असहयोग आन्दोलन की पहली महिला सेनानी थीं ओजस्वी वाणी वाली सुभद्रा कुमारी चौहान
ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को याद करते हुए अनेकों बार ये पंक्तियां पढ़ी गयीं। कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की लिखी कविता में देश की उस वीरांगना के लिए ओज था, करूण था, स्मृति थी और श्रद्धा भी। इसी एक कविता से उन्हें हिंदी कविता में प्रसिद्धि मिली और वह साहित्य में अमर हो गयीं।
उनका लिखा यह काव्य सिर्फ़ कागज़ी नहीं था, जिस जज़्बे को उन्होंने कागज़ पर उतारा उसे जिया भी। इसका प्रमाण है कि सुभद्रा कुमारी चौहान महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली प्रथम महिला थीं और कई दफ़ा जेल भी गयीं। सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद के पास निहालपुर में हुआ था। पिता रामनाथ सिंह ज़मींदार थे लेकिन पढ़ाई को लेकर जागरूक भी थे। अपनी प्रतिभा को दिखाते हुए सुभद्रा ने भी बचपन से ही कविता कहना शुरू कर दिया था। पहली कविता 9 साल की उम्र में छपी जिसे उन्होंने एक नीम के पेड़ पर ही लिख दिया था।
आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत
यह भाव सिर्फ़ उनके काव्य में ही सिंचित नहीं है। जब गांधी जी समूचे देश में अपने आंदोलन को लेकर आह्वान कर रहे थे तब सुभद्रा ने भी अपनी भागीदारी दर्ज करवायी। ज़ाहिर है कि वह एक राष्ट्रवादी कवयित्री ही नहीं एक देशभक्त महिला भी थीं। ‘जलियां वाले बाग में वसंत’ में उन्होंने लिखा-
परिमलहीन पराग दाग-सा बना पड़ा है
हा ! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
आओ प्रिय ऋतुराज? किंतु धीरे से आना
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर
कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर।
सुभद्रा का विवाह लक्ष्मण सिंह के साथ तय हुआ था। लक्ष्मण सिंह एक नाटककार थे और उन्होंने अपनी पत्नी की प्रतिभा को आगे बढ़ने में सदैव उनका सहयोग किया। दोनों ने मिलकर कांग्रेस के लिए काम किया। सुभद्रा महिलाओं के बीच जाकर उन्हें स्वदेशी अपनाने व तमाम संकीर्णताएं छोड़ने के लिए प्रेरित करती थीं। अपनी गृहस्थी को संभालते हुए वह साहित्य और समाज की सेवा करती थीं। 44 साल की अल्पायु में भी उन्होंने विपुल सृजन किया। उन्होंने तीन कहानी संग्रह लिखे जिनमें बिखरे मोती, उन्मादिनी और सीधे साधे चित्र शामिल हैं। कविता संग्रह में मुकुल, त्रिधारा आदि शामिल हैं। उनकी बेटी सुधा चौहान का विवाह प्रेमचंद के बेटे अमृतराय से हुआ, उन्होंने अपनी मां की जीवनी लिखी जिसका नाम ‘मिले तेज से तेज’ है। 16 अगस्त, 1904 को जन्मी सुभद्राकुमारी चौहान का देहांत 15 फरवरी, 1948 को 44 वर्ष की आयु में ही हो गया। वह अपनी मृत्यु के बारे में कहती थीं कि “मेरे मन में तो मरने के बाद भी धरती छोड़ने की कल्पना नहीं है । मैं चाहती हूँ, मेरी एक समाधि हो, जिसके चारों और नित्य मेला लगता रहे, बच्चे खेलते रहें, स्त्रियां गाती रहें ओर कोलाहल होता रहे।”
झाँसी की रानी बनकर अँग्रेजों से लड़कर प्राण उत्सर्ग करने वाली झलकारी बाई
जब भी भारतीय वीरांगनाओं का नाम लिया जाता है, उसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम सबसे आगे आता है। उन्हें भारत की सबसे बड़ी वीरांगना माना जाता है, जिन्होंने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया। हालांकि बहुत कम लोग ही जानते हैं कि देश में एक ऐसी भी वीरांगना रहीं हैं, जिसका नाम रानी लक्ष्मीबाई से भी पहले आता है। इस वीरांगना को भारत की दूसरी लक्ष्मीबाई भी कहा जाता है, वह दलित थीं। इनका नाम झलकारी बाई है। 1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने झांसी के युद्ध में भारतीय बगावत के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि झलकारी बाई, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की महिला सेना में ही सैनिक थीं। उनका जन्म एक गरीब कोरी परिवार में हुआ था। वह रानी लक्ष्मीबाई की सेना में एक आम सैनिक की तरह भर्ती हुईं थीं। उनमें युद्ध के साथ ही अन्य मसलों पर भी असाधारण योग्यताओं थी, इसी के दम पर वह रानी लक्ष्मीबाई की विशेष सलाहकार बनीं। कहा जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई के महत्वपूर्ण निर्णयों में झलकारी बाई की अहम भूमिका रहती थी।
इसलिए कहा जाता है दूसरी लक्ष्मीबाई
इतिहासकारों के मुताबिक 23 मार्च 1858 को जनरल रोज ने अपनी विशाल सेना के साथ झांसी पर आक्रमण कर दिया था। ये 1857 के विद्रोह का दौर था। रानी लक्ष्मीबाई ने वीरतापूर्वक अपने 5000 सैनिकों के दल संग उस विशाल सेना का सामना किया। जल्द ही अंग्रेज सेना झाँसी में घुस गयी और लक्ष्मीबाई, झाँसी को बचाने के लिए उनका डटकर सामना कर रहीं थीं। इस दौरान झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई के प्राणों को बचाने के लिये खुद को रानी बताते हुए लड़ने का फैसला किया। खास बात ये है कि इसी युद्ध में उनके पति शहीद हो चुके थे। बावजूद उन्होंने पति का शोक मनाने की जगह राज्य और अपनी रानी के लिए लड़ने को प्राथमिकता दी थी। इस तरह झलकारीबाई ने पूरी अंग्रेजी सेना को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया, ताकि दूसरी तरफ से रानी लक्ष्मीबाई सुरक्षित बाहर निकल सकें। इस तरह झलकारीबाई खुद रानी लक्ष्मीबाई बनकर लडती रहीं और जनरल रोज की सेना उनके झांसे में आकर उन पर प्रहार करने में लगी रही। काफी देर बाद उन्हें पता चला की वह रानी लक्ष्मीबाई नही हैं। झलकारी बाई की इस महानता को बुंदेलखंड में रानी लक्ष्मीबाई के बराबर सम्मान दिया जाता है। दलित के तौर पर उनकी महानता और हिम्मत ने उत्तर भारत में दलितों के जीवन पर काफी सकारात्मक प्रभाव डाला। उनकी मौत कैसे हुई थी, इतिहास में इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि ब्रिटिश सेना द्वारा झलकारी बाई को फांसी दे दी गई थी। वहीं कुछ जगहों पर जिक्र किया गया है कि वह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुई थीं। कुछ जगहों पर अंग्रेजों द्वारा झलकारीबाई को तोप से उड़ाने का जिक्र किया गया है।
झलकारी बाई, सदोबा सिंह और जमुना देवी की पुत्री थीं। उनका जन्म आज ही के दिन, 22 नवम्बर 1830 को झाँसी के भोजला गांव में हुआ था। उनकी मां के निधन के बाद पिता ने लड़कों की तरफ उनका पालन-पोषण किया था। बचपन से ही वह घुड़सवारी और हथियार चलाने में माहिर थीं। तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति में वह शिक्षा हासिल नहीं कर सकी थीं, लेकिन एक योद्धा के तौर पर वह युद्ध कला में काफी माहिर थीं।
तोपची से किया था विवाह
झलकारी बाई का युद्ध कला के प्रति इतना प्रेम था कि उन्होंने शादी भी एक तोपची सैनिक पूरण सिंह से की थी। पूरण सिंह भी लक्ष्मीबाई के तोपखाने की रखवाली किया करते थे। पूरण सिंह ने झलकारी बाई की मुलाकात रानी लक्ष्मीबाई से कराई थी। उनकी युद्ध कला से प्रभावित होकर रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें अपनी सेना में शामिल कर लिया था। जिस युद्ध में झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई बनकर लड़ी थीं, उसी युद्ध में उनके पति शहीद हुए थे। बावजूद उन्होंने पति के शोक की जगह राज्य की सुरक्षा और अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी।

जारी हुआ है डाक टिकट
झलकारी बाई की बहादुरी और इतिहास में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 22 जुलाई 2001 में उनके नाम का डाक टिकट भी जारी किया था। इसमें झलकारी बाई, रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही हाथ में तलवार लिए घोड़े पर सवार दिखती हैं। उनके चित्र वाला टेलीग्राम स्टांप भी जारी किया गया था। भारतीय पुरातात्विक सर्वे ने अपने पंच महल के म्यूजियम में झांसी के किले में झलकारीबाई का भी उल्लेख किया है। अजमेर, राजस्थान में उनकी प्रतिमा और स्मारक भी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी एक प्रतिमा आगरा में भी स्थापित की है। उनके नाम से लखनऊ में एक धर्मार्थ चिकित्सालय भी है।
साहित्य व उपन्यासों में लक्ष्मीबाई की तरह है जिक्र
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही झलकारीबाई का भी साहित्य, उपन्यासों और कविताओं में जिक्र किया गया है। 1951 में बीएल वर्मा द्वारा रचित उपन्यास ‘झांसी की रानी’ में झलकारी बाई को विशेष स्थान दिया गया है। रामचंद्र हेरन के उपन्यास माटी में झलकारीबाई को उदात्त और वीर शहीद कहा गया है। भवानी शंकर विशारद ने 1964 में झलकारीबाई का पहला आत्मचरित्र लिखा था। इसका बाद कई साहित्यकारों और लेखकों ने झलकारीबाई की बहादुरी की तुलना रानी लक्ष्मीबाई से की है। लक्ष्मीबाई पर लिखी गई कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी’ की तर्ज पर मैथिली शरण गुप्ता ने झलकारी बाई के बारे में लिखा है-
जा कर रण में ललकारी थी,
वह तो झांसी की झलकारी थी।
गोरों से लड़ना सिखा गई,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी।
‘छोटे शहरों में किराना दुकानों में डिजिटल माध्यम का उपयोग 3 गुना बढ़ा’
कोलकाता : देश के छोटे शहरों में किराना दुकानों में डिजिटल माध्यम का उपयोग 3 गुना बढ़ा है। फ्लिपकार्ट होलसेल ने यह जानकारी दी। फ्लिपकार्ट होलसेल और बेस्ट प्राइस कैश-एंड-कैरी संयुक्त रूप से देश में 15 लाख से अधिक सदस्यों को सेवाएं दे रहे हैं जिनमें किराना, होरेका (होटल, रेस्टोरेंट व कैफेटेरिया) तथा ओ एंड आई (दफ्तर व संस्थान) शामिल हैं। बेस्ट प्राइस कैश-एंड-कैरी ने जनवरी 2021 से जून 2021 के बीच टियर-2 और टियर-3 शहरों में ईकॉमर्स अपनाने की दर में 3 गुना वृद्धि दर्ज की है।
बेस्ट प्राइस में दिलचस्प रुझान देखने को मिले हैं, हर तीन में से एक सदस्य बैस्ट प्राइस ऐप और वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन खरीद एवं भुगतान कर रहा है। फ्लिपकार्ट होलसेल भी अपने बेस्ट प्राइस सदस्यों के बीच ईकॉमर्स के उपयोग में तेज़ी देख रहा है तथा आधे से अधिक सदस्य अब बिना किसी मदद के खुद ऑनलाइन लेनदेन करने में सक्षम हो चुके हैं।
जनवरी 2021 से जून 2021 के बीच बेस्ट प्राइस में डेयरी और ताज़ा उपज श्रेणियों में खरीददारों की तादाद में 2 गुना इज़ाफा हुआ है जिससे किसानों की आजीविका को बल मिला है। इस अवधि में स्टेशनरी आइटम और इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों का सदस्यता आधार भी दोगुना हुआ है क्योंकि अब देश की अधिकांश आबादी घर से काम कर रही है।
फ्लिपकार्ट होलसेल के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट एवं हेड आदर्श मेनन ने कहा, ’’फ्लिपकार्ट होलसेल का बुनियाद मकसद है कि टेक्नोलॉजी की मदद से भारतीय किराना कारोबारियों को समृद्ध बनाने में योगदान दिया जाए। हमारी सभी कोशिशों का लक्ष्य छोटे कारोबारियों की मदद करना है जो खरीददारी हेतु ईकॉमर्स अपनाने के मामले में सैल्फ-स्टार्टर बन कर उभरे हैं। छोटे खुदरा विक्रेता जो फ्लिपकार्ट होलसेल (जिसमें 29 बैस्ट प्राइस कैश-एंड-कैरी स्टोर शामिल हैं) से उत्पाद खरीदते हैं वे अपने उत्पाद प्राप्त करने पर कैशलैस ’डिजिटल पेमेंट ऑन डिलिवरी’ का लाभ उठा सकते हैं। पिछले महीने फ्लिपकार्ट होलसेल ने बैस्ट प्राइस ऐप के जरिए ऑर्डर करने वाले सभी बेस्ट प्राइस सदस्यों के लिए ’कैश ऑन डिलिवरी’ भुगतान सुविधा को भी शुरु किया है। इससे किराना कारोबारियों को अपनी परिचालन लागत के बेहतर प्रबंधन एवं नकदी तरलता बढ़ाने में मदद मिल रही है। वर्तमान चुनौतीपूर्ण हालात में छोटे खुदरा विक्रेताओं की कार्यशील पूंजी को ध्यान में रखते हुए फ्लिपकार्ट होलसेल ने बैंकों और फिनटैक् कंपनियों की भागीदारी में अपने सदस्यों के लिए तत्काल, अल्पकालिक, ज़मानत से मुक्त ऋण समाधान भी प्रस्तुत किया है। इसके अंतर्गत, किराना 14 दिनों का ब्याज़ मुक्त कर्ज़ प्राप्त कर सकते हैं जिसकी सीमा रु. 10,000 से लेकर रु. 25 लाख तक है; यह कर्ज़ ऐंड-टू-ऐंड डिजिटल प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त होता है। फ्लिपकार्ट होलसेल ग्राहकों को कई सुविधाएं मिलती हैं जैसे आसान कर्ज़ सुविधा जिससे की वे अपने नकदी प्रवाह को संभाल सकें, फ्लिपकार्ट-अश्योर्ड क्वालिटी उत्पादों की विस्तृत रेंज, सरल व सुविधाजनक ऑर्डर वापसी एवं शीघ्रता से उनकी दुकानों पर डिलिवरी, ऑर्डर ट्रैकिंग की आसान सुविधा और हर उत्पाद पर बेहतर मार्जिन।
हिंदी पत्रकारिता के प्रवर्तक के नाम पर होगा आईआईएमसी का पुस्तकालय
देश में पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम पर बनेगा पहला स्मारक
नयी दिल्ली : भारतीय जन संचार संस्थान का पुस्तकालय अब पं. युगल किशोर शुक्ल ग्रंथालय एवं ज्ञान संसाधन केंद्र के नाम से जाना जाएगा। हिंदी पत्रकारिता के प्रवर्तक पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम पर यह देश का पहला स्मारक होगा। पुस्तकालय के नामकरण के अवसर पर आईआईएमसी द्वारा 17 जून को “हिंदी पत्रकारिता की प्रथम प्रतिज्ञा: हिंदुस्तानियों के हित के हेत” विषय पर एक विशेष विमर्श का आयोजन किया जाएगा। इस कार्यक्रम में देश के प्रमुख विद्वान अपने विचार व्यक्त करेंगे। आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया कि इस वेबिनार में दैनिक जागरण (दिल्ली-एनसीआर) के संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी मुख्य अतिथि होंगे तथा पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल होंगे। कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ताओं के रूप में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की निदेशक डॉ. सोनाली नरगुंदे, पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. सी. जय शंकर बाबु, कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री स्नेहाशीष सुर एवं आईआईएमसी, ढेंकनाल केंद्र के निदेशक प्रो. मृणाल चटर्जी अपने विचार प्रकट करेंगे। प्रो. द्विवेदी ने इस आयोजन के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि भारत में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत पं. युगल किशोर शुक्ल द्वारा 30 मई, 1826 को कोलकाता से प्रकाशित समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ से हुई थी। इसलिए 30 मई को पूरे देश में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि ‘उदन्त मार्तण्ड’ का ध्येय वाक्य था, ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ और इस एक वाक्य में भारत की पत्रकारिता का मूल्यबोध स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि ये हमारे लिए बड़े गर्व का विषय है कि आईआईएमसी का पुस्तकालय अब पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने स्वाधीनता से लेकर आम आदमी के अधिकारों तक की लड़ाई लड़ी है। समय के साथ पत्रकारिता के मायने और उद्देश्य चाहे बदलते रहे हों, लेकिन हिंदी पत्रकारिता पर देश के लोगों का विश्वास आज भी है।
ऑल इंडिया मार्केट क्वेस्ट बिजनेस प्लान प्रतियोगिता में एचबीएस प्रथम रनर -अप
कोलकाता : हेरिटेज बिजनेस स्कूल, कोलकाता पश्चिम बंगाल का एकमात्र बी-स्कूल बन गया, जिसने ऑल इंडिया मार्केट क्वेस्ट बिजनेस प्लान प्रतियोगिता 2021 में प्रथम रनर-अप का स्थान हासिल किया। यह कार्यक्रम बीएनपीडी इको लैब्स द्वारा 4 जून 2021 को एक रीसाइक्लिंग और अपशिष्ट प्रबन्धन कम्पनी स्टार्ट टू स्टार्टअप (Start2Startup) के सहयोग से आयोजित किया गया था और परिणाम हाल ही में घोषित किए गए थे।
हेरिटेज बिजनेस स्कूल की छात्र टीम केनेसियन के सदस्यों स्वेता झा और सुभदीप दत्ता शामिल हैं, जिनकी व्यवसाय योजना डॉ. क्लिक- (सभी चिकित्सा आवश्यकताओं के लिए एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म) को प्रतियोगिता में उपविजेता स्थान के लिए चुना गया था। पहला पुरस्कार दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिनिधित्व वाली टीम सिपर ने लिया और दूसरा उपविजेता टीम मस्किटियर्स ने संयुक्त रूप से श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स और टीम स्कूबर्स का प्रतिनिधित्व किया, जिसका प्रतिनिधित्व आईआईटी दिल्ली ने किया।
हेरिटेज बिजनेस स्कूल द्वारा प्रस्तुत परियोजना का विवरण:- डॉ. क्लिक एक दवा मंच के रूप में एक सॉफ्टवेयर है जिसका उद्देश्य नुस्खे और परीक्षण रिपोर्ट का वास्तविक समय भविष्य कहनेवाला विश्लेषण प्रदान करना है और ऑनलाइन डॉक्टर परामर्श से लेकर अंतिम मील दवा वितरण तक सभी प्रकार की फार्मेसी जरूरतों के लिए एक एकीकृत मंच प्रदान करता है।
लीवा मिस दिवा 2021 हुआ डिजिटल, भाग ले सकेंगी ट्रांसवुमन
कोलकाता : मिस दिवा ने टाइटल स्पॉन्सर के रूप में एक फैशन इनग्रेडिएंट ब्रांड लीवा के सहयोग से अपने 9वें संस्करण के आरम्भ होने की घोषणा की है। इस बार यह प्रतियोगिता डिजिटल हो रही है, घर बैठे ही ऑडिशन दिया जा सकेगा। एमएक्स टकाटक द्वारा सह-संचालित लीवा मिस दिवा 2021 एक डाइनामिक नए फॉर्मेट में अगली ब्यूटी क्वीन को खोजने के लिए उत्साह और जुनून के समान स्तरों को साझा करेगी, जो इस बार डिजिटल मीडिया का लाभ उठाएगी। भारत ने एक से अधिक बार मिस यूनिवर्स का प्रतिष्ठित खिताब जीता है। हाल ही में एडलाइन कैस्टेलिनो की जीत के साथ, जिन्होंने लीवा मिस दिवा 2020 का प्रतिष्ठित खिताब जीता था, भारत को मिस यूनिवर्स 2020 के ग्लोबल मैप पर तीसरे रनर अप के रूप में वापस जोड़ा है।
वर्ष 2013 में शुरू हुई मिस दिवा की आज अपनी खास पहचान है। प्रतिष्ठित खिताब युवा प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान पाने के लिए उन्हें तैयार करने, प्रोत्साहित करने और सशक्त बनाने के लिए अभियान जारी रखेगा। गत 11 जून को इसकी घोषणा की गयी। इच्छुक सुंदरियां अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए भाग ले सकती हैं। इन फाइनलिस्टों की चयन प्रक्रिया में एक ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शामिल होगी, जिसमें भारत के अग्रणी शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म – एमएक्स टकाटक पर विशेष ऑडिशन कार्य प्रस्तुतियां आमंत्रित की जाती हैं। इसके बाद शॉर्टलिस्ट की गई 20 फाइनलिस्ट अक्टूबर 2021 के महीने में ग्रैंड फिनाले में प्रतिष्ठित ताज के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए मुंबई में कठोर प्रशिक्षण और सौंदर्य से गुजरेंगी। समावेशी होने की बात करते हुए, यह सौंदर्य प्रतियोगिता बिरादरी के इतिहास में पहली बार हम ट्रांसवुमन के सौंदर्य को फिर से परिभाषित करने के लिए भाग लेने को प्रोत्साहित कर और कह रहे हैं। और इस बार, सभी खूबसूरत महिलाओं के लिए ऊंचाई मानदंड को 5’4 “कर दिया गया है। लीवा मिस दिवा 2021 की विजेता सम्मानित वैश्विक मंच मिस यूनिवर्स 2021 में भारत का प्रतिनिधित्व करेगी और लीवा मिस दिवा सुप्रानेशनल में देश का प्रतिनिधित्व करेगी। यह भारत को फिर से गौरवान्वित करने का समय है। भारत में कंटेंट की खपत को बढ़ावा देने वाले आकर्षक शॉर्ट वीडियो बनाने के लिए डिजिटल उत्साही लोगों की अविश्वसनीय रूप से प्रतिभाशाली और अथक पीढ़ी को सशक्त बनाने की अपनी दृष्टि के साथ एमएक्स टकाटक इन प्रतिभागियों के लिए पीजेंट के ऑडिशन के लिए प्रवेश द्वार यानी एंट्री गेटवे है। ग्रैंड फिनाले भारत के लोकप्रिय युवा चैनलों में से एक एमटीवी (MTV) पर प्रसारित होगा।
किसी भी आवेदक के लिए भागीदारी मानदंड में शामिल हैं:
⦁ कद: 5’4″ और ऊपर
⦁ उम्र: 18 -27 वर्ष के बीच (31 दिसंबर 2021 तक 27 होना चाहिए)
⦁ वैवाहिक स्थितिः सिंगल, अविवाहित और जिसने एंगेजमेंट नहीं किया हो
⦁ भारतीय पासपोर्ट धारी
⦁ ओसीआई कार्डधारक और एनआरआई रनर अप के लिए भाग ले सकती हैं
⦁ ट्रांसवुमन को भाग लेने की अनुमति रहेगी




