पुणे : जानी-मानी फिल्म निर्देशक एवं लेखिका सुमित्रा भावे का फेफड़ों संबंधी बीमारियों के कारण यहां सोमवार को निधन हो गया। वह 78 वर्ष की थीं। फिल्म निर्देशक सुनील सुख्तनकर ने यह जानकारी दी। मराठी सिनेमा और रंगमंच की मशहूर हस्ती भावे पिछले दो महीने से फेफड़ों संबंधी बीमारियों से जूझ रही थीं। भावे के साथ पिछले 35 साल से काम कर रहे सुख्तनकर ने कहा कि भावे ने सोमवार की सुबह महाराष्ट्र के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। भावे को उनके बेहतरीन काम के लिए कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।
उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी होने के बाद एक समाज कल्याण संस्था के साथ काम शुरू किया और पुणे स्थित कर्वे इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में अध्यापन का काम किया। इसके बाद उन्होंने समाचार वाचक के रूप में भी सेवाएं दीं। उन्होंने 1985 में अपनी पहली लघु फिल्म ‘बाई’ बनाई, जिसे कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। भावे और सुख्तनकर ने निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखते हुए 1995 में ‘दोघी’ फिल्म बनाई, जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके अलावा, उन्होंने ‘देवराई’ (2004), ‘घो माला असाला हवा’, ‘हा भारत माजा’, ‘अस्तू – सो बीट इट’, ‘संहिता’, ‘वेलकम होम’, ‘वास्तुपुरुष’, ‘दाहवी फा’ और ‘कासव’ समेत कई अच्छी फिल्में दीं।
नहीं रहीं फिल्मकार सुमित्रा भावे
असम के पूर्व मुख्यमंत्री भूमिधर बर्मन का निधन
गुवाहाटी : असम के पूर्व मुख्यमंत्री भूमिधर बर्मन का रविवार शाम को गुवाहाटी के एक निजी अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके परिवार ने यह जानकारी दी। वह 91 वर्ष के थे। बर्मन कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता थे और दो बार अल्पकाल के लिए असम के मुख्यमंत्री रह चुके थे। असम सरकार ने बर्मन के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। बर्मन पहली बार हितेश्वर सैकिया के निधन के बाद मुख्यमंत्री बने और इस पद पर 22 अप्रैल से 14 मई 1996 तक रहे। उन्हें वर्ष 2010 में दोबारा उस समय मुख्यमंत्री बनाया गया जब तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई हृदय के ऑपरेशन के लिए मुंबई गए थे। बर्मन हितेश्वर सैकिया और तरुण गोगोई सरकार में मंत्री रहे और शिक्षा, स्वास्थ्य , राजस्व सहित विभिन्न विभागों का कार्यभार संभाला। आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक सात बार विधायक रहे बर्मन पहली बार 1967 में असम विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। उन्होंने नलबाड़ी जिले के बोरखेत्री सीट का चार बार प्रतिनिधित्व किया। वह दो बार नलबाड़ी पश्चिम और एक बार धर्मापुर से विधायक चुने गए।
गीतकार राजेंद्र राजन का निधन
सहारनपुर : देश-विदेश मे अपने गीतों से सहारनपुर की पहचान बनाने वाले प्रख्यात गीतकार राजेन्द्र राजन का गत गुरुवार की सुबह निधन हो गया। वह 65 वर्ष के थे। राजन पिछले कुछ दिनों से फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे थे। उन्हें सहारनपुर के मेडिकल कॉलेज मे भर्ती कराया गया था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली।
साहित्यकार डॉ वीरेन्द्र आजम ने पीटीआई-भाषा को बताया कि देश-विदेश के मंचों पर अपने गीतों से वाहवाही लूटने वाले राजेन्द्र राजन के निधन से साहित्यिक जगत मे शोक की लहर दौड़ गई है। आजम ने बताया कि अपने गीतों से सबको मंत्रमुग्ध करने वाले राजन को महादेवी पुरस्कार, साहित्य भूषण पुरस्कार, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर पुरस्कार से नवाजा गया था।
फेसबुक ने की क्लीनमैक्स से साझेदारी, 100 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाएगा
नयी दिल्ली : फेसबुक ने संवहनीयता उपायों के तहत भारत में शत प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने के लिए क्लीनमैक्स के साथ साझेदारी की है।
कंपनी ने गुरुवार को एक बयान में कहा कि समझौते के तहत फेसबुक और क्लीनमैक्स पवन तथा सौर परियोजनाएं तैयार करेंगे, जो भारत के बिजली ग्रिड को अक्षय ऊर्जा की आपूर्ति करेगा।
बयान के मुताबिक, ‘‘फेसबुक और क्लीनमैक्स ने आज भारत में फेसबुक के संवहनीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक साझेदारी की घोषणा की, जिसके तहत क्लीनमैक्स के पवन और सौर ऊर्जा संयंत्रों से बिजली की आपूर्ति की जाएगी।’’
बयान में कहा गया कि इस समझौते के तहत कर्नाटक में स्थित 32 मेगावाट की पवन परियोजना को चालू किया जाएगा। इस समझौते के तहत क्लीनमैक्स के पास परियोजनाओं का स्वामित्व होगा और वह संचालन करेगी, जबकि फेसबुक आने वाले वर्षों में परियोजना से मिले 100 प्रतिशत पर्यावरणीय विशेषता प्रमाणपत्र (ईएसी) को खरीदने के लिए प्रतिबद्ध होकर दीर्घकालिक समर्थन देगा।
फेसबुक में नवीकरणीय ऊर्जा की प्रमुख उर्वी पारेख ने कहा, ‘‘हम इस महत्वपूर्ण कदम की घोषणा से उत्साहित हैं, जो भारत सहित इस क्षेत्र में हमें अपने परिचालन को 100 प्रतिशत नवीकरण ऊर्जा पर आधारित करने में मदद करेगा।’’
डॉक्टर की जान बचाने के लिए बना 175 किमी लंबा ग्रीन कॉरिडोर
सागर : एमपी में हर तरह कोरोना संक्रमण से हाहाकार है। इस बीच बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में पदस्थ डॉक्टर सत्येंद्र मिश्रा की जान बचाने के लिए सरकार ने पूरी ताकत लगा दी है। कोरोना की वजह से डॉक्टर सत्येंद्र मिश्रा के फेफड़ों अधिक संक्रमण हो गया है। एमपी में इलाज संभव नहीं था। सीएम शिवराज के निर्देश पर सागर कलेक्टर डॉक्टर मिश्रा को इलाज के लिए एयर एंबुलेंस से हैदराबाद भिजवाया है, जहां उनका इलाज शुरू हो गया है।
डॉक्टर को इलाज के लिए सागर से हैदराबाद जाना था। इसके लिए एयर एंबुलेंस से संपर्क किया गया है। एयर एंबुलेंस ने किराया 18 लाख से कुछ अधिक बताया। साथ ही पहले भुगतान की मांग। रविवार होने की वजह से बैंक बंद था। उतनी बड़ी राशि बिना बैंक खुले ट्रांसफर होना संभव नहीं था। ऐसे में सागर कलेक्टर बैंक ऑफ इंडिया के मुंबई ब्रांच विशेष अनुमति लेकर सागर में बैंक खुलवाया। उसके बाद एयर एंबुलेंस को भुगतान किया गया। उसके बाद एयर एंबुलेंस के साथ हैदराबाद से डॉक्टरों की टीम भोपाल पहुंच गई। यहां से सड़क मार्ग के जरिए विशेष एंबुलेंस से डॉक्टरों की विशेष टीम रविवार रात 12 बजे सागर के भाग्योदय अस्पताल पहुंची। उसके बाद डॉक्टरों की टीम ने सागर में ही उनका संपूर्ण परीक्षण किया। सागर कलेक्टर दीपक सिंह ने बताया कि हैदराबाद की डॉक्टरों की टीम ने डॉ सतेंद्र मिश्रा का संपूर्ण परीक्षण करने के उपरांत सोमवार सुबह 5:00 विशेष एंबुलेंस उन्हें लेकर भोपाल के लिए निकली।
175 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर बना
सागर कलेक्टर ने बताया कि जिले के भाग्योदय अस्पताल से लेकर भोपाल एयरपोर्ट तक 175 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर रोड बनाया गया। इसमें पुलिसकर्मियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भोपाल एयरपोर्ट से वह हैदराबाद के लिए रवाना हो गए हैं। वहां उनका इलाज शुरू हो गया है।
वहीं, डॉक्टर सत्येंद्र मिश्रा का इलाज कर रहे छय एवं छाती रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सौरभ जैन ने बताया कि हैदराबाद के डॉक्टरों की टीम रात्रि 12:00 बजे पहुंची। उन्होंने डॉ मिश्रा को वेंटिलेटर पर रखकर संपूर्ण परीक्षण किया। उसके बाद सुबह में उन्हें यहां से ले जाया गया है। सोमवार की सुबह साढ़े दस बजे वह हैदराबाद स्थित यशोदा अस्पताल में पहुंच गए। वहां उनका इलाज शुरू हो गया है।
स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम नायक गंगू मेहतर
गंगू मेहतर विट्ठुर के शासक नाना साहब पेशवा की सेना में नगाड़ा बजाते थे। गंगू मेहतर को कई नामों से पुकारा जाता है। भंगी जाति के होने से गंगू मेहतर तो पहलवानी का शौक़ होने की वजह कर गंगू पहलवान के नाम से पुकारा जाता था।गंगू मेहतर पर अंग्रेजो ने पचास हजार का इनाम रखा था। सती चौरा गांव में इनका पहलवानी का अखाड़ा था, कुश्ती के दांव पेच एक मुस्लिम उस्ताद से सीखने के कारण गंगूदीन नाम से पुकारे जाने लगे और लोग इन्हें श्रद्धा प्रकट करने के लिए गंगू बाबा कहकर भी पुकारते थे। गंगू मेहतर के पुरखे जिले कानपुर के अकबरपुरा गांव के रहने वाले थे। उच्चवर्णों की बेगार, शोषण और अमानवीय व्यवहार से दुखी होकर इनके पुरखे कानपुर शहर के चुन्नी गंज इलाके में आकर रहने लगे थे।
1857 के स्वाधीनता संग्राम में इन्होने नाना साहब की तरफ़ से लड़ते हुए अपने शागिर्दों की मदद से सैंकड़ो अंग्रेज़ों को मौत के घाट उतारा था। और इस क़त्ल ए आम से अंग्रेज़ी सरकार बहुत सहम सी गई थी। जिसके बाद अंग्रेज़ों ने गंगू मेहतर जी को गिरफ़्तार करने का आदेश दे दिया।गंगू मेहतर पर अंग्रेजो ने पचास हजार का इनाम रखा था! गंगू मेहतर अंग्रेज़ों से घोड़े पर सवार होकर वीरता से लड़ते रहे। अंत में गिरफ़्तार कर लिए गए। जब वह पकड़े गए तो अंग्रेज़ों नेउन्हें हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ पहनाकर जेल की काल कोठरी में रख दिया और तरह तरह के ज़ुल्म किये।
गंगू मेहतर पर इलज़ाम था के इन्होने कई महिलाओं और बच्चों का क़त्ल किया था; पर ये बात प्रोपेगंडा का हिस्सा भी थी, क्युं के अंग्रेज़ों ने उस समय मीडिया का भरपूर उपयोग प्रोपेगंडा के लिए किया था! बहरहाल गंगू मेहतर को फांसी की सज़ा सुनाई जाती है। उसके बाद कानपुर में इन्हे बीच चौराहे पर 8 सितम्बर 1859 को फाँसी के फंदे पर लटका दिया जाता है।जब उन्हे फांसी दी गई तो उनकी लाश को घोड़े में बाँधकर पूरे शहर में घुमाया! लेकिन दुर्भाग्यवश भारत के इतिहास में इनका नामो निशान नही है। यह नाम जातिवाद के कारण इतिहास के पन्नों में कहीं सिमट सा गया है।
शहीद गंगू मेहतर अपनी अंतिम सांस तक अंग्रेजों को ललकारते रहे : “भारत की माटी में हमारे पूर्वजों का ख़ून व क़ुर्बानी कि गंध है, एक दिन यह मुल्क आज़ाद होगा।” एैसा कहकर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को क्रान्ति का संदेश दिया और देश के लिए शहीद हो गए।कानपुर के चुन्नी गंज में इनकी प्रतिमा लगाई गयी है।
कूड़ेदान
-विक्रम साव
कूड़ेदान
पौ फटने से पहले ही,
गमछी डाले कंधे पर निकले घर से ,
कटे फीते की चप्पल पहनी ,
और पैंट को नीचे से घुटने तक मोड़ लिया,
पहुँचे ऑफिस और लेकर गाड़ी निकल गए काम पर,
घड़घड़ाती हुए गाड़ी के स्वर में
सीटी की भी वर्णमाला जुड़ी रहती है,
मुहल्ला बंधा है केशव का,
उसी तरफ़ गाड़ी लिए चल देता हर रोज़,
वही बूढ़े बरगद के बगल वाली छपरइया गल्ली में,
पर आज सूरज की तपिश थी जानलेवा
गया एक कूड़ेदान के पास
तो वो उलटा पड़ा था,
कूड़ेदान में था
सड़ा-गला-मरा कुत्ते का बच्चा,
उठाते ही गिरा उसका आधा धड़ नीचे
उसने पूँछ की तरफ़ से हाथ से उठाया,
सड़ी पूंछ उसके हाथ में आ गयी,
पास ही पड़ा था एक प्लास्टिक पैकेट
उसे उठाया तो , उसमें भरा था मल,
गाड़ी में फेंकते ही छींटे पड़े उसके चेहरे पर,
वो स्वर्ग की कल्पना भी कभी नहीं करता,
उसे पता है वह जहाँ भी जाय
नरक ही मिलेगा
मेहतर हूँ तो नर्क ही न उठाऊँगा।
उत्तराखंड में विंडलास डेवलपर ने पूरी सबसे बड़ी रियल इस्टेट डील
मुम्बई : देहरादून के विंडलास डेवलपर को एसडब्ल्यूएएमआईएच इन्वेस्टमेंट फंड ने उसकी टाउनशिप परियोजना विंडलास रिवर वैली को पूरा करने के लिए निवेश की अनुमति दे दी है। 171 करोड़ रुपये के इस निवेश से कम्पनी को 35 एकड़ में फैली इस टाउनशिप के विभिन्न चरणों का निर्माण पूरा करने, विकास में तेजी लाने और रियल इस्टेट का पैमाना बढ़ाने में मदद मिलेगी। यह टाउनशिप विश्वस्तरीय आवास उपलब्ध करवाने वाला उत्तराखंड का सबसे बड़ा पूर्ण इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट है। कई परिवारों को उनके मकानों की चाबी सौंप दी गयी है। एसडब्ल्यूएएमआईएच केन्द्र द्वारा किफायती और मध्यम वर्ग परिवारों के लिए स्पेशल विंडो के तहत स्थापित वैकल्पिक निवेश फंड है। आशिका कैपिटल लिमिटेड इस सौदे के लिए प्रमुख सलाहकार थी। एसबीआईकैप वेंचर्स लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुरेश कोझिकोटे ने बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में किसी परियोजना का काम जल्द पूरा होना खुशी की बात है। हम देहरादून में डील करने पर ध्यान दे रहे हैं और देश भर में मौजूदगी बढ़ाना हमारा लक्ष्य है। विंडलास के सीईओ प्रणव रस्तोगी ने बताया कि सभी सुविधाओं से युक्त यह इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट चरणबद्ध तरीके से पूरा होगा। आशिका कैपिटल लिमिटेड के प्रेसिडेंट योगेश शेट्ये ने कहा कि उनकी कम्पनी रियल इस्टेट परियोजनाओं की मुश्किलें दूर करने के लिए नये – नये समाधान खोजती है।
बांग्ला फिल्म ‘जोटुगृह’ का पोस्टर जारी
कोलकाता : बांग्ला फिल्म ‘जोटुगृह’ का पोस्टर जारी कर दिया गया है। सप्तस्व बसु द्वारा निर्देशित यह फिल्म नेक्स्ट जेन वेंचर द्वारा प्रस्तुत की जा रही है। फिल्म में बॉनी सेनगुप्ता, अनामिका, सोहिनी, माही, राजदीप गुप्ता, रन्जय विष्णु नजर आएँगे।
वह अगर सफर अकेले कर रही है तो उसे सम्मान से देखिए

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, गर्मी कहर बरपा रही है और करोना की दूसरी लहर भी अपना सितम ढा रही है। तकरीबन साल भर से यह महामारी हमारे साथ लुकाछिपी खेल रही है। जैसे ही हम थोड़ा सा आश्वस्त होकर मुक्ति की साँस भरने की सोचते हैं वह बहुरूपिए की तरह हर बार नये रंग- रूप में हमारे सामने आकर अपनी भयंकरता से हमें चौंका देती है। करोना काल में लोगों ने और बहुत सारी बंदिशों के साथ घर में रहने की आदत भी डाल ली। हमारे घूमने फिरने या स्वतंत्रता पूर्वक विचरने पर पूरी तरह से पाबंदी लग गई थी। बाद में हालात थोड़े से सामान्य होने लगे तो लोगों ने सैर की अपनी योजनाओं पर अमल करना आरंभ कर दिया। विभिन्न कारणों से सफर करने की जरूरत के मद्देनजर भी लोग घर से बाहर निकलने लगे। बात जब सफर की चलती है तो महिलाओं के अकेले सफर करने के मुद्दे पर भी अनायास नजर चली जाती है। सोचकर देखा तो समझ में आया कि न जाने किस काल से जाने किस अलिखित नियम के तहत महिलाओं के अकेले सफर करने की मनाही सी रही है। जब लड़कियाँ छोटी होती हैं तब तो यह समझ में आता है कि वह माता- पिता या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ घर से बाहर निकलती हैं या सफर करती हैं लेकिन हमारा समाज लड़कियों को कभी भी, कुछ क्षेत्रों में बड़ा होने का अहसास करने का मौका नहीं देता। सुरक्षा के बहाना हो अथवा कोई और कारण, लड़की हो या स्त्री वह कभी इस लायक नहीं समझी जाती कि अकेले सफर पर निकल सके। समय बदला और उसके साथ ही बहुत कुछ बदला। डोली- पालकी के सुरक्षा घेरे या बैलगाड़ी के पर्दों के बीच यात्रा करनेवाली स्त्रियाँ भी अन्य मनुष्यों की भांति ट्राम, बस, रिक्शे, टैक्सी आदि में यात्रा करने लगीं। अपने- अपने स्कूल या महाविद्यालय जहाँ कभी वह पैदल, तांगे, रिक्शे या गाड़ी में, घर के किसी सदस्य या दाई की निगहबानी में जाती थीं, वहाँ अकेली भी जाने लगी। हालांकि वह अकेले जाना भी बिल्कुल अकेला होना नहीं था क्योंकि बहुधा वे समूह में बाहर निकलती थीं। ठीक जंगल के नियम के अनुसार जिसमें शारीरिक दृष्टि से कमजोर जानवर जैसे हिरण आदि झुंड में ही रहते या विचरते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि जंगल का नियम अभी भी स्त्रियों पर लागू है। चूंकि वह शारीरिक दृष्टि से कमजोर मानी जाती हैं इसीलिए झुंड में रहना उनकी आदत बन जाती है या दूसरे शब्दों में कहें तो हमारा समाज ठोंक -पीटकर उन्हें उस जीवन शैली में ढाल देता है जहाँ अकेले कहीं भी जाने, विचरने या घूमने आदि में उन्हें असुरक्षा बोध का अहसास होता है। और इसी असुरक्षा बोध के कारण आज की आधुनिक जीवन शैली में भी स्त्रियाँ, जो अपने दफ्तर आदि का काम बड़ी कुशलता से अपने दम पर संभाल लेती हैं, भी अकेली सफर पर निकलने से परहेज़ करती हैं। अगर कुछ स्त्रियाँ इस रवायत को बदलने या तोड़ने की कोशिश करती भी हैं तो हमारा तथाकथित सभ्य या आधुनिक समाज उन्हें कोंच -कोंच कर यह अहसास करा देता है कि उन्हें अकेले सफर पर निकलने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए अन्यथा उनके साथ कोई भी दुर्घटना घट सकती है। वैसे दुर्घटनाएँ तो कभी भी किसी के साथ घट सकती हैं। हालांकि आज के समय में छात्राएँ हों या नौकरीपेशा महिलाएँ, अकेले सफर पर निकल ही पड़ती हैं लेकिन समाज इस नयी रवायत के प्रति अभी भी सहज नहीं हो पाया है इसीलिए सफर के दौरान उनके इस दुस्साहस पर टीका टिप्पणी करने से बाज नहीं आता। वह बेझिझक कभी उस अकेली लड़की या स्त्री के चरित्र पर सवाल उठाता है, खुसफुसाहट में ही सही तो कभी उसके माता-पिता की दायित्वबोध को प्रश्नांकित करता है जिन्होंने अपनी बेटी को अकेले सफर की अनुमति दे दी है। सखियों, आप सबके साथ किसी ना किसी समय इस तरह की घटना अवश्य घटी होगी या न भी घटी हो तो आपने सुना अवश्य होगा। सोचकर आश्चर्य होता है कि दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी है और औरतों ने भी विकास की अनगिनत सीढ़ियों को लांघते हुए आसमान में अपनी विजय पताका फहरा दी है लेकिन हमारा समाज अभी भी उनके प्रति इतना उदार नहीं हो पाया है कि उनके अकेले सफर करने को सहज दृष्टि से देखें। 1907 में प्रकाशित बंगमहिला की कहानी “दुलाईवाली” में नवल किशोर की पत्नी रेल के सफर में अचानक अपने साथ चल रहे पति को गायब देख कर और अपने को अकेली पाकर रोने लगती है तो आस -पास की स्त्रियाँ उसके प्रति सहानुभूति जताती हैं और सहयात्री बंशीधर उन्हें सही ठिकाने पर पहुंचाने का दायित्व ओढ़ लेते हैं। लेकिन आज समय बदल गया है। आज की स्त्री ने बदलती हुई परिस्थितियों के मद्देनजर अपने- आपको नये वातावरण और चुनौतियों के अनुरूप ढाल लिया है और अकेली सफर पर अकुंठ भाव से निकल पड़ती हैं। यह बात और है कि आज भी स्त्रियों की एक बड़ी जमात अकेली सफर पर निकलने का साहस नहीं करती। निदा फ़ाज़ली ने अपनी ग़ज़ल में सफर की मुश्किलों की ओर संकेत करते हुए भी लोगों को सफर के लिए उत्साहित करते हुए लिखा-
“सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।”
लेकिन उन्हें भी कहाँ अहसास था कि यह धूप औरत के लिए और भी तीखी हो जाती है क्योंकि उसमें लोगों की दृष्टि का कौतूहल या अनकही लेकिन अत्यधिक चुभने वाली आलोचना भी शामिल हो जाती है शायद इसीलिए उसका सफर कर निकलना आम लोगों की तुलना में काफी मुश्किल होता है। लेकिन इन मुश्किलों के बावजूद आज बहुत सी स्त्रियाँ अकेली सफर पर निकल रही हैं और जिंदगी को नये सिरे से देखने, समझने की कोशिश कर रही हैं। वह अकेली अपने आप के साथ आनंद से समय बिताना भी सीख ही लेती है, तभी तो अनुराधा अनन्या अपनी कविता “एकांत” का सृजन करती हैं जिसमें एक औरत तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने अकेलेपन का आनंद उठाती दिखाई देती है । सखियों, आप से भी अनुरोध है कि गाहे बगाहे अकेली सफर पर निकल पड़िए और अगर न भी निकल पाएं तो भी इसका सपना जरूर देखिए। साथ ही किसी भी लड़की या औरत को अकेली सफर करती देखकर उसे स्नेह और सराहना की दृष्टि से देखिए, आलोचना और तिरस्कार से नहीं। फिलहाल अनुराधा अनन्या की इस कविता का आनंद लीजिए –
” मैं अपने साथ हूँ—अकेली—
ख़ुद के खोल से उधड़ती हुई
मन की गाँठें खोलती
अपने आपसे सुलझती हुई
अपने अकेले जंगल में
अपनी अकेली धरती पर
चलती
रुकती
दम भरती
अपनी धुन पर थिरकती हुई
इस जहाँ से दूर
किसी और जहाँ में
जो सिर्फ़ मेरा है
मैं जिसमें मैं हूँ
और मैं अपने साथ हूँ—अकेली—
अपने ही मन के आँगन में
बेपरवाह
बेलिबास
बेलिहाज़
अपने पूरे बदन के साथ—अकेली—
ख़ुद अपनी रूह में उतरती हुई
मैं अपने साथ हूँ—अकेली।”




