कभी खिलौने और हाई हील शूज खरीदने के लिए की थी शुरुआत
सात साल की लिजा स्कॉट ने एक साल पहले अपनी मां की बेकरी के बाहर लेमोनेड बेचने की शुरुआत की थी। वह लेमोनेड बेचकर जमा किए पैसों से अपने लिए कुछ खिलौने और सीक्विन वाली हाई हील शूज खरीदना चाहती थी। ये छोटी सी बच्ची एक महीने पहले तक भी लेमोनेड बेच कर पैसे जमा कर रही थी। लेकिन इस बार लिजा के पैसे जमा करने की वजह कुछ और थी। उसे खिलौने और शूज नहीं बल्कि अपनी ब्रेन सर्जरी के लिए फंड इकट्ठा करना था। उसकी मां एलिजाबेथ स्कॉट ने बताया कि लिजा ने बहुत कम उम्र से अपने आसपास लोगों को छोटे-छोटे काम करके पैसे कमाते हुए देखा है। लिजा की दो सर्जरी हुई। हालांकि एलिजाबेथ नहीं चाहती कि लिजा इतनी कम उम्र में पैसे कमाए। उसने लिजा को लेमोनेड बेचने के लिए मना भी किया क्योंकि वह उसकी सर्जरी के लिए भी खुद पैसे जमा करना चाहती थी। लेकिन छोटी सी लिजा ने मां को परेशान करने के बजाय ये काम खुद करना पसंद किया। लिजा की मां एक सिंगर मदर हैं। वह खुद एक बेकरी के माध्यम से अपने बच्चों की परवरिश और घर का खर्च चलाती हैं। अपने छोटे से लेमोनेड स्टैंड से लिजा ने 8 करोड़ 74 लाख रुपए जमा किए। एलिजाबेथ ने बताया कि 30 जनवरी से पहले लिजा को ब्रेन से रिलेटेड कोई तकलीफ नहीं थी। वह पूरी तरह स्वस्थ्य थी।
(साभार – दैनिक भास्कर)
सात साल की लिजा ने अपनी ब्रेज सर्जरी के लिए लेमोनेड बेचकर जुटाये पैसे
हॉलीवुड को भाया भारत: देश के कई हिस्सों में शूटिंग की तैयारी
राजस्थान, एमपी, कश्मीर समेत कई लोकेशन पर; 2 साल में भारत में कमाई 30% बढ़ सकती है
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री हॉलीवुड को भारत भा गया है। भारतीय बाजार की क्षमता देखकर अब हॉलीवुड अपनी पहुँच बढ़ाएगा। आने वाले समय में हॉलीवुड फिल्मों में न केवल भारतीय सितारे और किरदार बढ़ेंगे बल्कि उनकी भारत में शूटिंग भी बढ़ेगी। हॉलीवुड के बड़े निर्देशक, स्टूडियो शूटिंग के लिए भारत जाने और भारतीय दर्शकों के लिहाज से फिल्म बनाने की तैयारी में हैं। उनके जेहन में कश्मीर, मुंबई, जयपुर, दिल्ली, कोलकाता, गोवा, एमपी समेत कई विकल्प शूटिंग लोकेशन के रूप में हैं। दरअसल, अमेरिका ने कोरोना के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया तो वहां के लोगों ने हॉलीवुड फिल्मों से किनारा कर लिया। वहीं, क्रिस्टोफर नोलन की ‘टेनेट’ और सुपरहीरो फिल्म ‘वंडर वुमन’ के बाद हॉलीवुड को भारतीय बाजार की ताकत समझ में आई। कोरोना के चलते अमेरिका में सिनेमाघर बंद होने के बीच भारत में रिलीज हुई इन फिल्मों ने अच्छा बिजनेस किया। टेनेट का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 12.43 करोड़ और वंडरवुमन का 15.54 करोड़ रुपए रहा। यह महामारी के लिहाज से काफी ज्यादा था। नोलन ने बीते साल सितंबर में ‘टेनेट’ फिल्म के कुछ दृश्यों की शूटिंग मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल और ताज महल पैलेस में की। फिल्म को भारतीय टच देने के लिए ‘प्रिया’ नाम के चरित्र को प्रमुखता से जगह दी। प्रिया का किरदार निभाने वाली डिंपल कपाड़िया का नाम फिल्म के पोस्टर पर भी था। फिल्म ने महामारी के दौर में दुनिया में 2,600 करोड़ रुपए का बिजनेस किया।
हॉलीवुड की 70 फीसदी कमाई विदेश से, चीन का हिस्सा 50%
हॉलीवुड फिल्मों की 2019 में हुई कमाई में 70% हिस्सा विदेश से था। जबकि 1991 में हिस्सेदारी 30% थी। वहीं, 2019 की कमाई में चीनी मार्केट की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा थी। ‘एवेंजर्सः एंडगेम’ ने चीन में 30 हजार करोड़ से ज्यादा कमाए। ऐसे में महामारी से उबरने में हॉलीवुड चीन पर निर्भर हो गया था।
भारत की ज्यादातर क्षेत्रीय भाषाओं में हो रही डबिंग
हॉलीवुड स्टूडियो भारत के बहुभाषी मार्केट में पहुंच मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्मों की डबिंग का बजट दोगुना कर दिया है। ज्यादातर हॉलीवुड फिल्मों की सबटाइटल और डबिंग भारतीय क्षेत्रीय भाषा में हो रही है। अगले महीने भारत में जेम्स बांड की फिल्म ‘नो टाइम टू डाइ’ आएगी। मई में ‘ब्लैक विडो’ और फॉस्ट एंड फ्यूरिस सीरिज की ‘एफ9′, जुलाई में टॉम क्रूज की ‘टॉप गनः मेवेरिक’ रिलीज होगी। ‘मोर्टार कॉम्बैट’, ‘ए क्वाइट पैलेसः पार्ट-2′, ‘गोडजिला वर्सेज कांग’, ‘द कन्ज्यूरिंग’ भी इसी दौरान आएगी।
27 हजार करोड़ है भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का सालाना बजट
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का सालाना बजट करीब 27 हजार करोड़ रुपए है। हॉलीवुड के प्रमुख निर्माताओं के स्टूडियो वॉर्नर ब्रदर्स के प्रवक्ता ने बताया, हम इस साल के अंत या अगले साल शुरुआत तक भारत में शूटिंग की योजना बना रहे हैं। वहां शूटिंग बढ़ाने के साथ ही फिल्मों में भारतीय कैरेक्टर और पहचान भी प्रमुखता से रखेंगे। वार्नर ब्रदर्स साल में 100 से ज्यादा फिल्म बनाता है। हॉलीवुड एनालिस्ट इरिक वॉल्ड कहते हैं कि हमें नए और उभरते बाजारों की जरूरत है। भारत जैसा देश, जिसके पास खुद चार अरब डॉलर की फिल्म इंडस्ट्री है, वह चीन का स्वाभाविक विकल्प है।
2015 में बॉक्स ऑफिस में हॉलीवुड की हिस्सेदारी 8%, जो 2019 में 21% हो गई।
2018 में भारत से 921 करोड़ रुपए कमाए। यह 2019 में 1220 करोड़ रुपए हो गया।
अगले दो साल में कमाई 25 से 30% तक बढ़कर 1600 करोड़ रु. तक पहुंच सकती है।
(साभार – दैनिक भास्कर)
डेनमार्क में मिली 3000 साल पुरानी कांसे की तलवार
कोपेनहेगन : डेनमार्क में एक मैदान से पुरातत्वविदों को एक कांसे की तलवार मिली है। करीब 3 हजार साल पुरानी इस तलवार की हालत को देखकर पुरातत्वविद भी हैरत में हैं। तलवार में लगायी गयी लकड़ी और सींग की मूठ अभी भी बहुत शानदार अवस्था में है। ओडेंस सिटी म्यूजियम के मुख्य जांचकर्ता जेस्पर हांसेन ने कहा कि यह खोज बेहद खास है क्यों कि यह प्राचीन तलवार काफी सुरक्षित अवस्था में मिली है। जेस्पर ने कहा कि हम 3 हजार साल पुराने इस आश्चर्य को संभाल रहे हैं। बताया जा रहा है कि डेनमार्क के तीसरे सबसे बड़े द्वीप वेस्ट फूनेन के हारे में खुदाई के दौरान पाई गई है। इस तलवार में कांसे को जोड़ने के लिए सींग और लकड़ी को लगाया गया है। यह तलवार अलंकृत है और माना जाता है कि इसे एक प्रथा के तहत दफनाया गया था। इसे दफनाने से पहले एक खास पदार्थ से लपेटकर दफनाया गया था।
तलवार के कई मूल उपादान अभी भी मौजूद
बताया जा रहा है कि इस इलाके से एक गैस पाइपलाइन जाने वाली है और इसी को देखते हुए खुदाई की जा रही है। इससे पहले पिछले साल म्यूजियम ने 60 किमी के इलाके का सर्वेक्षण किया था। इस तलवार को अंतिम हिस्से में पाया गया है। करीब 3 हजार साल तक दफन रहने के बाद भी इस तलवार के कई मूल उपादान अभी भी पूरी तरह से बने हुए हैं। कांसे को तांबा और टिन मिलाकर बनाया जाता था। यह उस समय की बड़ी खोज थी और इससे तलवार आदि ज्यादा मजबूत हो सके। सर्बिया में कांसे के 7 हजार साल पहले इस्तेमाल के साक्ष्य मिले हैं। बताया जाता है कि उस समय मध्य यूरोप से कांसे को आयात करते थे। इस इलाके में करीब 6 हजार साल पहले ही खेती शुरू हो गई थी।
कथकली गुरु चेमांचेरी कुन्हीरमण नायर का निधन
कोझिकोड (केरल) : जाने माने कथकली नर्तक गुरु चेमांचेरी कुन्हीरमण नायर का सोमवार को तड़के कोइलांडी के चेलिया में उनके आवास पर निधन हो गया। वह 105 वर्ष के थे। नायर को कथकली नृत्य विधा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए 2017 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जब वह भगवान कृष्ण और कुचेला का मंच पर चित्रण करते थे, तो दर्शक उनकी बेहतरीन प्रस्तुति देखकर मंत्रमुग्ध हो जाया करते थे। उन्होंने 100 साल की आयु में आखिरी बार सार्वजनिक प्रस्तुति दी थी। नायर ने गुरु करुणाकरण मेनन की कथकली नृत्य मंडली में शामिल होने के लिए 14 साल की आयु में घर छोड़ दिया था। नायर के लिए आयु कभी कथकली करने में बाधक नहीं बनी और उन्होंने करीब नौ दशक तक नृत्य किया। उन्हें कथकली की ‘कल्लाडिकोडन’ शैली में महारथ हासिल थी। उन्होंने वर्षों के अभ्यास और कड़ी मेहनत के बाद भारतीय नाट्यकलालयम की 1945 में स्थापना की, जो उत्तर केरल में स्थापित किया गया नृत्य का पहला स्कूल है। इसके बाद उन्होंने यहां से करीब 30 किलोमीटर दूर अपने मूल गांव में चेलिया कथकली विद्यालयम समेत कई नृत्य स्कूलों की स्थापना की। नायर को केरल संगीत नाट्य अकादमी और केरल कलामंडलम समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। चाडयनकांडी चातुकुट्टी नायर और किनात्तिनकरा कुन्हमनकुट्टी अम्मा के घर 16 जून, 1916 को जन्मे नायर ने 1930 में कीझपायुर कुनियिल परादेवता मंदिर में अपनी पहली प्रस्तुति दी थी, जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
जाने-माने चित्रकार लक्ष्मण पाई का निधन
पणजी : जाने-माने चित्रकार और पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित लक्ष्मण पाई का गत रविवार शाम गोवा में उनके आवास पर निधन हो गया। वह 95 वर्ष के थे। उनके करीबी सूत्रों ने बताया कि डोना पाउला में अपने घर पर उन्होंने अंतिम सांस ली। वर्ष 1926 में गोवा में जन्मे पाई को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें पद्म भूषण, पद्म श्री, नेहरू पुरस्कार और ललित कला अकादमी पुरस्कार शामिल हैं। गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने पाई की निधन पर दुख व्यक्त किया।
दिग्गज मुक्केबाज मर्विन हेगलर का निधन
वाशिंगटन : मुक्केबाजी के इतिहास के महानतम मिडिलवेट मुक्केबाजों में शुमार मर्विन हेगलर का गत शनिवार को निधन हो गया। हेगलर 66 बरस के थे। हेगलर की पत्नी केन ने फेसबुक के जरिए इस दिग्गज मुक्केबाज के निधन की जानकारी दी। केन ने लिखा, ‘‘मुझे माफ कीजिए, मुझे एक दुखद घोषणा करनी है। दुर्भाग्य से आज मेरे पति मार्वलस मर्विस का यहां न्यू हैंपशर में उनके घर पर निधन हो गया। हमारा परिवार आग्रह करता है कि इस मुश्किल के समय में आप हमारी निजता का सम्मान करेंगे।’’
भटकाव से बचकर, परस्पर सख्य में बंधकर ही पूरा होगा स्त्री की मुक्ति का स्वप्न

सभी सखियों को नमस्कार और साथ ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ, देर से ही सही। सखियों, हर साल की तरह इस साल भी महिला दिवस आया और चला भी गया। कुछ संस्थाओं ने काव्य गोष्ठी का आयोजन किया तो कुछ ने परिचर्चा का और इस तरह महिला दिवस मनाने की रस्म अदायगी कर ली गई। कुछ प्रबुद्ध वर्ग की जागरूक महिलाएँ जिन्हें महिला दिवस और उसके महत्व के बारे में पता है, उन्होंने तो महिला दिवस पर कुछ लिखा, पढ़ा या बोला और अन्य महिलाओं को भी जागरूक करने की कोशिश की तो कुछ ने इसे पारंपरिक त्योहार की तरह मनाते हुए अपने और अपने परिवार के लिए खरीददारी की, कुछ अच्छा बनाया, कुछ लजीज खाया और कुछ ने सोशल मीडिया पर संदेशों को प्रसारित कर, अपने आप को तसल्ली दी कि उन्होंने भी कुछ किया। सब ने अपने अपने तौर तरीके और सामर्थ्य के अनुसार इस विशेष दिन को यादगार बनाने की कोशिश की। लेकिन जरा दिमाग पर जोर डालकर सोचिए कि साल दर साल इस कवायद के बावजूद क्या आम जिंदगी में महिलाओं की स्थिति में कोई खास फर्क आया है। कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं, अपने आस -पास ही देखें तो पता चलेगा कि बड़ी संख्या ऐसी औरतों की है जिन्हें पता भी नहीं कि यह महिला दिवस है क्या और इस दिन का महत्व क्या है। न उन्हें अपनी स्थिति के बारे में पता है और न उससे निकलने का रास्ता। वे तो अपने हिस्से में आई कमरतोड़ मेहनत और उसके बाद भी मिलने वाली झिड़कियों को अपना प्राप्य समझकर हँसकर न सही झींक कर ही स्वीकार कर लेती हैं। कभी -कभी मन में जो असंतोष जन्म लेता है, वह इतना गहरा नहीं होता कि आंधी का रूप ले पाए। वह तो गाहे बगाहे उनकी आँखों से बहनेवाले आँसुओं से ही धुल जाता है। शायद इसीलिए आम स्त्री की इस नियति को रेखांकित करते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा था –
“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”
इन पंक्तियों को लिखे कई दीर्घ वर्ष बीत गए हैं लेकिन क्या नारी की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन आया है ? यह सवाल हमारे मानस को प्राय मथता रहता है जिसका जवाब ना में ही मिलता है। आँसू और उच्छवास औरतों के साथ इस तरह जुड़ गए कि उनसे अलग उनकी कल्पना ही नहीं की जा सकती और यह रोना धोना उनकी नियति ही नहीं पहचान ही बन गई। पुरुषों के लिए रोना गलत समझा गया। भले ही उनका हृदय दुख से विदीर्ण हो जाए लेकिन वे आँसू नही बहा सकते क्योंकि आँसू बहाने से उनकी मजबूत मर्दवादी छवि धूमिल हो जाती है। छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा जो दुखवाद की प्रवर्तक और वेदना की गायिका के रूप में ख्यात हैं ने भी औरतों की इसी आँसूसिक्त छवि को अपनी कविताओं में उकेरते हुए लिखा-
“मैं नीर भरी दुख की बदली!
****** ******* *******
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!”
यह सच है कि स्त्रियों का कोई इतिहास नहीं रहा इसीलिए अपना इतिहास लिखने की शुरुआत भी उन्हें करनी पड़ी और इतिहास बनाने की भी। बहुत सी स्त्रियों ने इतिहास भी बनाया और इतिहास में जगह भी बनाई लेकिन एक बड़े तबके की कामगार औरतों के पास अभी तक न शिक्षा की रोशनी पहुँची है ना जागृति का मंत्र। अतः पढ़ी लिखी जागरूक औरतों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। अपनी मुक्ति या आजादी से संतुष्ट या उल्लसित होने के स्थान पर उन्हें पिछड़े वर्ग की उन तमाम औरतों के बारे में भी सोचना चाहिए। आज जरूरत है उन तमाम औरतों को संगठित करके उन्हें शिक्षित और जागरूक बनाने की तभी स्त्री मुक्ति का स्वप्न पूरा होगा और स्त्री दिवस मनाना भी सार्थक होगा। कविताओं में वेदना को अभिव्यक्ति देने वाली महादेवी वर्मा भी अपने निबंधों में शिक्षित स्त्रियों से यही आग्रह करती हैं -“कृषक तथा अन्य श्रमजीवी स्त्रियों की इतनी अधिक संख्या है कि बिना उनकी जागृति के हमारी जागृति अपूर्ण रहेगी और हमारे स्वत्व अर्थहीन समझे जायेंगे।…..इन सबमें जागृति उत्पन्न करने, उन्हें अभाव का अनुभव कराने का भार विदुषियों पर है और बहुत समय तक रहेगा।” ( हमारी शृंखला की कड़ियां -2, शृंखला की कड़ियां, पृ.25)
सखियों, हमारी जिम्मेदारी महिला दिवस को येन केन प्रकारेण मना लेने भर से पूरी नहीं हो जाती बल्कि उन तमाम सखियों की जागृति के बारे में सिर्फ सोचना ही नहीं प्रयास करना भी, हमारा ही दायित्व है। स्त्रियों को जाति, धर्म, भाषा, वर्ग, वर्ण आदि की उपेक्षा कर परस्पर सख्य के बंधन में बंधना चाहिए तभी वे समान रूप से मुक्ति का स्वप्न देख पाएंगी और उसे यथार्थ में परिणत करने के लिए विकास के रास्ते भी तलाश पाएंगी। और यह नारी शक्ति अपने विकास पथ पर चलते हुए आँसुओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने देगी बल्कि चेहरे पर मुस्कान सजाकर हर चुनौती का सामना बेहिचक करेगी। बदलते संदर्भ और परिस्थितियों में कवयित्री अनामिका की काव्य पंक्तियाँ उसपर सही बैठती हैं-
““अबला जीवन ,
हलो, तुम्हारी यही कहानी!
‘मुख पर डारे’ छोटी-सी मुस्कान
सुनो सब आनी-बानी!”
और कभी न कभी यह अबला जिसे बहुत से तथाकथित हास्य कवि ‘बला’ कहकर संबोधित करते हैं, सबला जरूर बनेगी। लेकिन यह भी सच है कि यह रास्ता बहुत आसान भी नहीं है और इसके अपने खतरे हैं। भ्रम और भटकाव भी हैं, उन सबसे बचकर ही वह अपना संघर्ष जारी रख सकती है। एक बात हमें हमेशा याद रखनी होगी कि स्त्री मुक्ति का यह संघर्ष अपनी जमीन खोकर मात्र किताबी न रह जाए, इसी खतरे की ओर संकेत करती है, कात्यायनी की यह कविता-
“कई वर्षों से
बेहतर है मानसून
ज़िन्दगी की तमाम परेशानियों के बीच।
तमाम फ़सलों-वनस्पतियों,
खर-पतवार के बीच उग आए हैं
स्त्री-मुक्ति के तमाम पैरोकार।
लड़ने का स्वाद
कहीं भूल न जाए स्त्री
ज़िन्दगी के दंशों
और अकादमिक बहसों की
आदी होती हुई।”
आज विदा, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी बहस के साथ।
स्त्रियों को लेकर क्या कहती है मनु स्मृति
वैदिक काल में स्त्रियों को लेकर बहुत सी बातें कही जाती हैं। मनु स्मृति का हवाला देकर बहुत से बन्धन स्त्रियों पर लादे गये पर इस आलेख पर हमारी नजर गयी तो लगा कि शुभजिता के पाठकों को इसे पढ़वाया जाना चाहिए। इसे पढ़िए और सोचिए कि वास्तव में क्या लिखा था, क्या छुपाया गया और क्या तोड़ – मरोड़कर बताया गया…मगर सवाल तो अब भी यही है कि जब स्त्रियों का इतना ही सम्मान रहा तो वह कौन था जिसने इस ग्रंथ से खिलवाड़ कर स्त्रियों के शोषण का उपकरण बनाया होगा…सुरक्षा और संरक्षण से अधिक आवश्यक आत्मनिर्भरता और सम्मान से अधिक स्त्री के अस्तित्व को सम्मानजनक स्वीकृति जरूरी है। निजी तौर पर कहूँ तो यह स्पष्ट है कि इस स्वतन्त्रता के पीछे भी स्त्री का स्वतन्त्र अस्तित्व या उसकी इच्छा का होना …उतना महत्वपूर्ण नहीं है…बल्कि उसे संरक्षण में रखने की बात कही गयी है मगर आज स्त्री का अस्तित्व और उसकी इच्छा…दोनों पर बात हो रही है…यह एक अच्छा सकारात्मक बदलाव है.. सम्पादक
मनुस्मृति ३.५६ (3.46)– जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का आदर– सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्य गुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका आदर- सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं भले ही वे कितना ही श्रेष्ठ कर्म कर लें, उन्हें अत्यंत दुखों का सामना करना पड़ता है।
- यह श्लोक केवल स्त्री जाति की प्रशंसा करने के लिए ही नहीं है बल्कि यह कठोर सच्चाई है जिसको महिलाओं की अवमानना करने वालों को ध्यान में रखना चाहिए और जो मातृशक्ति का आदर करते हैं उनके लिए तो यह शब्द अमृत के समान हैं. प्रकृति का यह नियम पूरी सृष्टि में हर एक समाज, हर एक परिवार, देश और पूरी मनुष्य जाति पर लागू होता है।
- परिवार में स्त्रियों का महत्त्व–
- ३.५५(3.55)– पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर- भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए।
- ३.५७(3.57)– जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्रीजन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है।
- ३.५८(3.58)-अनादर के कारण जो स्त्रियां पीड़ित और दुखी: होकर पति, माता-पिता, भाई, देवर आदि को शाप देती हैं या कोसती हैं– वह परिवार ऐसे नष्ट हो जाता है जैसे पूरे परिवार को विष देकर मारने से, एक बार में ही सब के सब मर जाते हैं|
- ३.५९(3.59)– ऐश्वर्य की कामना करने वाले मनुष्यों को हमेशा सत्कार और उत्सव के समय में स्त्रियों का आभूषण, वस्त्र, और भोजन आदि से सम्मान करना चाहिए।
- ३.६२(3.62)– जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार खुशहाल रहता है।
- इसे भी देखें – वैदिक वाङ्मय स्त्री विमर्शः भाग-३ (मनुस्मृति)
- .९.२६(9.26)– संतान को जन्म देकर घर का भाग्योदय करने वाली स्त्रियां सम्मान के योग्य और घर को प्रकाशित करनेवाली होती हैं। शोभा, लक्ष्मी और स्त्री में कोई अंतर नहीं है. यहां महर्षि मनु उन्हें घर की लक्ष्मी कहते हैं।
- ९.२८(9.28)– स्त्री सभी प्रकार केसुखों को देने वाली हैं. चाहे संतान हो, उत्तम परोपकारी कार्य हो या विवाह या फ़िर बड़ों की सेवा – यह सभी सुख़ स्त्रियों के ही अधीन हैं। स्त्री कभी माँ के रूप में, कभी पत्नी और कभी अध्यात्मिक कार्यों की सहयोगी के रूप में जीवन को सुखद बनाती है। इस का मतलब है कि स्त्री की सहभागिता किसी भी धार्मिक और अध्यात्मिक कार्यों के लिए अति आवश्यक है।
- ९.९६(9.96)– पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत:साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति -पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।
- ४. १८०(4.180)– एक समझदार व्यक्ति को परिवार के सदस्यों– माता, पुत्री और पत्नी आदि के साथ बहस या झगडा नहीं करना चाहिए।
- ९ .४(9.4)– अपनी कन्या का योग्य वर से विवाह न करने वाला पिता, पत्नी की उचित आवश्यकताओं को पूरा न करने वाला पति और विधवा माता की देखभाल न करने वाला पुत्र– निंदनीय होते हैं।
- स्त्रियों के स्वाधिकार–
- ९ .११(9.11)– धन की संभाल और उसके व्यय की जिम्मेदारी, घर और घर के पदार्थों की शुद्धि, धर्म और अध्यात्म के अनुष्ठान आदि, भोजन पकाना और घर की पूरी सार -संभाल में स्त्री को पूर्ण स्वायत्ता मिलनी चाहिए और यह सभी कार्य उसी के मार्गदर्शन में होने चाहिए।
- इस श्लोक से यह भ्रांत धारणा निर्मूल हो जाती है कि स्त्रियां वैदिक कर्मकांड का अधिकार नहीं रखतीं। इसके विपरीत उन्हें इन अनुष्ठानों में अग्रणी रखा गया है और जो लोग स्त्रियों के इन अधिकारों का हनन करते हैं– वे वेद, मनुस्मृति और पूरी मानवता के ख़िलाफ़ हैं।
- ९.१२(9.12)– स्त्रियां आत्म नियंत्रण से ही बुराइयों से बच सकती हैं, क्योंकि विश्वसनीय पुरुषों (पिता, पति, पुत्र आदि) द्वारा घर में रोकी गई अर्थात् निगरानी में रखी हुई स्त्रियां भी असुरक्षित हैं (बुराइयों से नहीं बच सकती). जो स्त्रियां अपनी रक्षा स्वयं अपने सामर्थ्य और आत्मबल से कर सकती हैं, वस्तुत: वही सुरक्षित रहती हैं.
- जो लोग स्त्रियों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें घर में ही रखना पसंद करते हैं, उनका ऐसा सोचना व्यर्थ है. इसके बजाय स्त्रियों को उचित प्रशिक्षण तथा सही मार्गदर्शन मिलना चाहिए ताकि वे अपना बचाव स्वयं कर सकें और गलत रास्ते पर भी न जाएं| स्त्रियोंको चहारदिवारी में कैद रखना महर्षि मनु के पूर्णत: विपरीत है।
- स्त्रियों की सुरक्षा–
- ९ .६(9.6)– एक दुर्बल पति को भी अपनी पत्नी की रक्षा का यत्न करना चाहिए.
- ९ .५(9.5)– स्त्रियां चरित्र भ्रष्टता से बचें क्योंकि अगर स्त्रियां आचरणहीन हो जाएंगी तो सम्पूर्ण समाज ही विनष्ट हो जाता है.
- ५ .१४९(5.149)– स्त्री हमेशा स्वयं को सुरक्षित रखे| स्त्री की हिफ़ाजत– पिता, पति और पुत्र का दायित्व है.
- इस का मतलब यह नहीं है कि मनु स्त्री को बंधन में रखना चाहते हैं।
- श्लोक ९.१२(9.12) में स्त्रियों की स्वतंत्रता के लिए उनके विचार स्पष्ट हैं. वे यहां स्त्रियों की सामाजिक सुरक्षा की बात कर रहे हैं क्योंकि जो समाज, अपनी स्त्रियों की रक्षा विकृत मनोवृत्तियों के लोगों से नहीं कर सकता, वह स्वयं भी सुरक्षित नहीं रहता।
- इसीलिए जब पश्चिम और मध्य एशिया के बर्बर आक्रमणकारियों ने हम पर आक्रमण किए तब हमारे शूरवीरों ने मां- बहनों के सम्मान के लिए प्राण तक न्यौछावर कर दिए! महाराणा प्रताप के शौर्य और आल्हा- उदल के बलिदान की कथाएं आज भी हमें गर्व से भर देती हैं.
- हमारी संस्कृति के इस महान इतिहास के बावजूद भी हम ने आज स्त्रियों को या तो घर में कैद कर रखा है या उन्हें भोग- विलास की वस्तु मान कर उनका व्यापारीकरण कर रहे हैं।
- अगर हम स्त्रियों के सम्मान की रक्षा करने की बजाय उनके विश्वास को ऐसे ही आहत करते रहे तो हमारा विनाश भी निश्चित ही है।
- संपत्ति में अधिकार-
- ९.१३०(9.130)– पुत्र के ही समान कन्या है, उस पुत्री के रहते हुए कोई दूसरा उसकी संपत्ति के अधिकार को कैसे छीन सकता है?
- ९.१३१(9.131)– माता की निजी संपत्ति पर केवल उसकी कन्या का ही अधिकार है।
- मनु के अनुसार पिता की संपत्ति में तो कन्या का अधिकार पुत्र के बराबर है ही परंतु माता की संपत्ति पर एकमात्र कन्या का ही अधिकार है।
- महर्षि मनु कन्या के लिए यह विशेष अधिकार इसलिए देते हैं ताकि वह किसी की दया पर न रहे, वो उसे स्वामिनी बनाना चाहते हैं, याचक नहीं।
- क्योंकि एक समृद्ध और खुशहाल समाज की नींव स्त्रियों के स्वाभिमान और उनकी प्रसन्नता पर टिकी हुई है।
- ९.२१२(9.212) – २१३(213) – यदि किसी व्यक्ति के रिश्तेदार या पत्नी न हो तो उसकी संपत्ति को भाई – बहनों में समान रूप से बांट देना चाहिए। यदि बड़ा भाई, छोटे भाई– बहनों को उनका उचित भाग न दे तो वह कानूनन दण्डनीय है।
- स्त्रियों की सुरक्षा को और अधिक सुनिश्चित करते हुए, मनु स्त्री की संपत्ति को अपने कब्जे में लेने वाले, चाहें उसके अपने ही क्यों न हों, उनके लिए भी कठोर दण्ड का प्रावधान करते हैं।
- ८.२८(8.28)- २९(29)– अकेली स्त्री जिसकी संतान न हो या उसके परिवार में कोई पुरुष न बचा हो या विधवा हो या जिसका पति विदेश में रहता हो या जो स्त्री बीमार हो तो ऐसे स्त्री की सुरक्षा का दायित्व शासन का है. और यदि उसकी संपत्ति को उसके रिश्तेदार या मित्र चुरा लें तो शासन उन्हें कठोर दण्ड देकर, उसे उसकी संपत्ति वापस दिलाए।
- विवाह –
- ९.८९(9.89) – चाहे आजीवन कन्या पिता के घर में बिना विवाह के बैठी भी रहे परंतु गुणहीन, अयोग्य, दुष्ट पुरुष के साथ विवाह कभी न करे।
- ९.९०(9.90) – ९१(91)– विवाह योग्य आयु होने के उपरांत कन्या अपने सदृश्य पति को स्वयं चुन सकती है।यदि उसके माता -पिता योग्य वर के चुनाव में असफल हो जाते हैं तो उसे अपना पति स्वयं चुन लेने का अधिकार है।
- भारतवर्ष में तो प्राचीन काल में स्वयंवर की प्रथा भी रही है।
- अत: यह धारणा कि माता – पिता ही कन्या के लिए वर का चुनाव करें, मनु के विपरीत है।
- महर्षि मनु के अनुसार वर के चुनाव में माता- पिता को कन्या की सहायता करनी चाहिए न कि अपना निर्णय उसपर थोपना चाहिए, जैसा कि आजकल चलन है।
- ९ .४(9.4) – अपनी कन्या का योग्य वर से विवाह न करने वाला पिता, पत्नी की उचित आवश्यकताओं को पूरा न करने वाला पति और विधवा माता की देखभाल न करने वाला पुत्र – निंदनीय होते हैं।
- ९.१२(9.12) – स्त्रियां आत्म नियंत्रण से ही बुराइयों से बच सकती हैं, क्योंकि विश्वसनीय पुरुषों (पिता, पति, पुत्र आदि) द्वारा घर में रोकी गई अर्थात् निगरानी में रखी हुई स्त्रियां भी असुरक्षित हैं (बुराइयों से नहीं बच सकती)। जो स्त्रियां अपनी रक्षा स्वयं अपने सामर्थ्य और आत्मबल से कर सकती हैं, वस्तुत: वही सुरक्षित रहती हैं।
- जो लोग स्त्रियों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें घर में ही रखना पसंद करते हैं, उनका ऐसा सोचना व्यर्थ है। इसके बजाय स्त्रियों को उचित प्रशिक्षण तथा सही मार्गदर्शन मिलना चाहिए ताकि वे अपना बचाव स्वयं कर सकें और गलत रास्ते पर भी न जाएं। स्त्रियों को चारदिवारी में कैद रखना महर्षि मनु के पूर्णत: विपरीत है।
- (साभार – माइ वॉयस डॉ़ट ओ पी इंडिया)
बनारस – जिसके कण कण में पारस

बनारस ! भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी काशी नगरी ! ज्ञान की नगरी, मंदिरो की नगरी, दीपों का शहर, घाटों का शहर …. चाहे किसी भी नाम से इस शहर को बुलाओ … इसकी हर बात अनोखी है, निराली है ।ये सिर्फ एक शहर नहीं ,एक अहसास है जो बनारसियों की ही नही हर भारतीय की दिल की धडकन है ।भक्ति, विश्वास और आस्था की पराकाष्ठा यहाँ दिखायी देती है।भोले बाबा की नगरी ,चंद्राकार बहती हुई माँ गंगा की प्रवाहधानी , अद्भुत है इसकी बनावट ! आधा जल में , आधा मंत्र में , आधा फूल में , आधा शव में , आधा नींद में , आधा शंख में ! कहीं जन्म का उत्सव मना रहा कोई , कहीं किसी की चिता जल रही है , यहाँ जीवन और मृत्यु का अजीब मेल देखा जा सकता है ।यहाँ मृत्यु सौभाग्य से ही प्राप्त होती है।इस घाट पर अग्नि कभी नहीं बुझती । बनारस को अविमुक्त क्षेत्र भी कहा जाता है। यहाँ जन्म सत्य है , मृत्यु शिव है , मुक्ति सुन्दर है ।यहाँ कण– कण शंकर है — इसलिए बनारस युगों युगों से ‘सत्यम शिवम् सुन्दरम’ है ! इसकी हर गली में एक कहानी है । इसकी हवा में एक कहानी है । गंगाजी के बहते पानी में भी कहानी है ।हिंदू तथा जैन धर्म में इसे सात पवित्र नगरों (सप्तपुरी) में से सबसे पवित्रतम नगरी कहा गया है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रमुख यहाँ वाराणसी में स्थापित है। प्रजापति दक्ष के द्वारा शिव की उपेक्षा किए जाने पर बनारस के मणिकर्णिका घाट पर ही माता सती ने अपने शरीर को अग्नि को अर्पित कर दिया था और यहीं उनके कान का गहना भी गिरा था।गोस्वामी तुलसीदास जी ने बनारस के तुलसी घाट पर ही बैठ कर रामचरितमानस की रचना की थी।आज भी उनकी खड़ाऊँ वहाँ रखी है । ब्रह्म मुर्हूत में मंगलाआरती ! एक स्वर्गिक अनुभूती ! काशी विश्वनाथ दर्शन ।फिर अस्सी घाट ! भगवान रूद्र ने एक बार अस्सी असुरों का वध करवा दिया था बनारस के एक घाट पर, तभी से उस घाट को अस्सी घाट कहा जाता हैं।यहां की धरती में ही शक्ति है, यहां की बोली में अपनापन हैं।यहा की बात ही कुछ और है ! सब कुछ अपनी ओर खींचता है।एक बनारस चौक पे भी बसता है जनाब ! हैरान कर देने वाली संकरी गलियों में आनंद लीजिये मीठे से लेकर तीखे, हर तरह के स्वादिष्ट पकवानो का , राज बंधु की मिठाइयाँ , लाल पेड़े, गरम गरम जलेबी , लस्सी, दीनानाथ केसरी की लाजवाब टमाटर चाट ,गुलाब जामुन ,बनारसी पान की तो ,या फिर यहां की बनारसी साड़ी ।सब कुछ अतुनलीय ! संस्कारधानी माँ गंगा की गोद पर नाव की सवारी । देव दीपावली का अकल्पनीय दृश्य , अनुपम छटा ! घाट पर जलते हुए लाखों दियों की रोशनी में झिलमिलाती माँ गंगा ! अनवरत शंखध्वनि से संपूर्ण वातावरण में प्रणव ध्वनि गुंजायमान रही है । काशी का प्रभाव ही कुछ ऐसा है, जो देखने को मिलता है:- भक्तों की भक्ति में, देवों की शक्ति में , गंगा की धार में, घाटों की पुकार में , दीपों की ज्योत में, फूलों के हार में , हर मुमुक्षु ह्रदय की पुकार में !’हर हर महादेव शंभु काशी विश्वनाथ गंगे’।।
रिपोर्टर दीदी की क्लास – मीडिया में जब कदम रख रही हों आप
इस बार मीडिया में महिलाओं पर बात। आज की क्लास उन लडकियों के लिए जो पत्रकारिता की दुनिया में कदम रख रही हैं या रखना चाहती हैं…जो है विशुद्ध अनुभव के आधार पर कहा गया है –




