Thursday, April 2, 2026
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कोविड -19 वैक्सीन आपूर्ति : साथ आये आरडीआईएफ और स्टेलिस बायोफर्मा

कोलकाता : कोविड -19 की वैक्सीन आपूर्ति को लेकर आरडीआईएफ और स्टेलिस बायोफर्मा ने हाथ मिलाया है और दोनों स्पूतनिक वैक्सीन की 200 मिलियन खुराकों की आपूर्ति करेंगे। आरडीआईएफ (द रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड) रुस का वेल्थ फंड यानी धन कोष है जबकि स्टेलिस भारतीय कम्पनी स्ट्राइड्स का बायोफर्मास्यूटिकल शाखा है। दोनों ही कम्पनियों के बीच यह समझौता भारत में स्पूतनिक वी वैक्सीन की आपूर्ति को लेकर हुआ है। गौरतलब है कि स्पूतनिक वी कोरोना के इलाज के लिए उपयोग में लायी जाने वाली विश्व की पहली पंजीकृत वैक्सीन है जिसे 50 देशों में मान्यता मिल चुकी है। यह दो खुराकों वाली वैक्सीन है जो दो भिन्न मानव एडेनोवायरल वैक्टर टीकाकरण के दौरान इस्तेमाल करती है। एक अध्यनन के मुताबिक इस वैक्सीन की क्षमता दर 91.6 प्रतिशत बतायी जा रही है। दोनों ही पक्षों ने 2021 की तीसरी तिमाही से वैक्सीन की आपूर्ति पर सहमति जतायी है। रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड की सीईओ किरिल डिमिट्राइव के मुताबिक वैक्सीन का वैश्विक प्रसार स्टेलिस के साथ होगा। स्ट्राइड्स समूह के संस्थापक अरुण कुमार ने समझौते पर खुशी जतायी।

 

नॉर्ड एंजेलिया एडुकेशन ने किया 3 और स्कूलों का अधिग्रहण

हैदराबाद : नॉर्ड एंजेलिया एडुकेशन ने ब्रिटेन के शीर्ष डे और बोर्डिंग स्कूलों का अधिग्रहण किया है। इन तीन शिक्षण संस्थानों में ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड सिक्स्थ फॉर्म कॉलेज, डीजओवरब्रोएक स्कूल शामिल हैं जो ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल एडुकेशन ग्रुप का हिस्सा हैं। नॉर्ड एंजेलिया इन स्कूलों का अधिग्रहण ऑक्सफोर्ड इंटरनेशनल के संस्थापकों और संस्थानगत अंशधारक बोमार्क कैपिटल से कर रहा है। इस अधिग्रहण के साथ ही नॉर्ड एंजेलिया के 30 देशों में 73 स्कूल हो जाएंगे। देश के 4 शहरों (हैदराबाद, बंगलुरू, विशाखापट्टनम और मोहाली) में स्थित ओएक्रेज इंटरनेशनल स्कूल इसी समूह के अंग हैं। भारत में नॉर्ड एंजेलिया एडुकेशन के प्रबन्ध निदेशक ब्रायन कुकलिन ने इस समझौते पर खुशी जतायी।

स्थापत्य का अद्भुत सौन्दर्य है प्राचीन श्री श्री नागरेश्वर महादेव मंदिर

टीम शुभजिता

कई बार हमारे पास बहुत कुछ अद्भुत होता है मगर हमें वह नजर ही नहीं आता…कोलकाता के बड़ाबाजार इलाके में कई ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं…जो सुन्दर हैं…मनोरम हैं…मगर हम उनको या तो जानते ही नहीं और अगर अगर जानते भी हैं तो इनके महत्व को समझ ही नहीं पाते। शुभजिता की पड़ताल में बड़ाबाजार और उसके आस – पास की जगहों को छानते हुए कई ऐसी जगहें हमें मिल रही हैं…ऐसे लोगों के बारे में पता चल रहा है जिनके अवदान को सामने लाया ही नहीं गया और आज बात एक एक ऐसे शिवालय की…..जो है तो महानगर के बीचों – बीच है मगर इंटरनेट पर इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती….।


हम बात कर रहे हैं 35, स्टैंड रोड पर स्थित श्री श्री नागरेश्वर महादेव मंदिर की। दक्षिण भारतीय शैली की याद दिलाता शिवालय बहुरंगी प्रतिमाओं और अद्भुत शिल्प का जीवन्त उदाहरण है। यह बताता है कि कोलकाता से रिश्ता हिन्दी भाषी प्रदेशों का ही नहीं बल्कि सुदूर दक्षिण भारत का भी है।
दक्षिण स्थापत्य शैली बना यह मंदिर 100 साल पुराना है…मंदिर को पंडित चन्द्रशेखर शास्त्री के पूर्वजों ने बनवाया था…जो मूलतः आन्ध्र प्रदेश से हैं। यहाँ पर शिवलिंग के अतिरिक्त माता पार्वती, बाल कृष्ण, हनुमान, गणेश जैसे कई देवी – देवताओं की मूर्तियाँ हैं मगर इस मंदिर की खूबसूरती को जो और बढ़ा देती है, वह है इसकी दीवारों पर उकेरी गयी अद्भुत प्रतिमाएँ…..मंदिर बहुत विशाल नहीं हैं मगर अपनी अप्रतिम सुन्दरता और बहुरंगी स्थापत्य शैली और इसकी बारीक कारीगरी के कारण यह सबको लुभाता है।

कोलकाता के प्राचीन शिव मंदिरों में इस मंदिर का नाम शामिल है। मंदिर का संरक्षण श्री श्री नागरेश्वरी नागरेश्वर महादेव मंदिर मैनेजिंग ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। चन्द्रशेखर शास्त्री खुद यहाँ पिछले 35 साल से मंदिर की देखभाल और संरक्षण समेत अन्य गतिविधियों से जुड़े हैं। यहाँ शिवरात्रि का त्योहार धूम-धाम से मनाया जाता है और इस बार भी वैसा ही उल्लास रहा है।

कहते हैं कि ज्ञान एक महासमुद्र की तरह है और इसी महासमुद्र की तरह है यह संसार…जिसका छोटा सा कण है हमारा – आपका शहर जिसे संवारने और बगैर पक्षपात के इतिहास को सामने लाने और विकसित करने की जिम्मेदारी सरकार या प्रशासन की ही नहीं….हम सबकी है….तो अगर आपको ऐसे ही खूबसूरत टुकड़े मिलें तो उनको सहेजिए और जानकारी हम तक पहुँचा दीजिए…हम इन रत्नों को बिखेरकर संसार को और सुन्दर बनाने में यह छोटा सा प्रयास अपनी शक्ति भर करते रहेंगे…।

रामचन्द्र गोयनका जनाना घाट : महिलाओं के लिए बना था…महिलाएं ही नहीं जा पातीं

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

ऐसे समय में जब महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा प्रश्न बना हुआ हो और उनको पर्दे में धकेलने की तमाम कोशिशें सदियों बाद भी चरम पर हों…वहाँ यह जानकर सुखद लगता है कि शताब्दी पूर्व कोई ऐसा शख्स रहा होगा जिसने महिलाओं को परदे में धकेलने की जगह उनके लिए सुरक्षा की व्यवस्था की। ऐसे परदेस में जहाँ…दूर -दूर तक कोई अपना नहीं था…ऐसा निर्माण करवाया जो महिलाओं की अस्मिता और उसके सम्मान को सहेज सके…सुनना तो सुखद लगता है और जब आप उस जगह को खुद देखते हैं तो जहाँ उस व्यक्ति पर गर्व होता है तो आज उसकी स्मृति की दुर्दशा को देखकर आँखें झुक जाती हैं…।

संरक्षण का अभाव साफ तौर पर दिखता है

बात 1890 की है तब अन्य राज्यों से व्यापारी कोलकाता में बसने लगे थे और ऐसे ही एक व्यवसायी थे रामचन्द्र गोयनका…तब ब्रिटिश भारत में महिलाओं की निजता की सुरक्षा एक चुनौती थी…नदी किनारे स्नान करती महिलाओं पर ब्रिटिशों की ही नहीं स्थानीय पुरुषों की भी नजर रहती थी…इस परेशानी का हल तब स्थानीय मजिस्ट्रेट के पास भी नहीं था…ब्रिटेन की रानी का राज था…और उनकी नजर पूरे शहर पर थीं। शहर अंग्रेजी रंग में रंगने लगा था….ब्रिटेन से आयी महिलाएं हाथों में दस्ताने पहनतीं, डिनर पर जातीं…सम्भ्रांत घरों की महिलाओं ने भी नये तौर – तरीके सीखने शुरू कर दिये थे…वह नदी पर जातीं तो पालकी में जातीं मगर दूसरे राज्यों से आयी महिलाओं के पास यह सुविधा तब नहीं थीं।
ऐसी स्थिति में सामने आये रामचन्द्र गोयनका और उन्होंने बनवाया जनाना घाट जो चहारीदीवारियों से घिरा था…खूबसूरत गुम्बदों से सजा यह घाट गुमनाम हो गया है…यहाँ तक कि लोग उनका नाम भी नहीं जानते…जो घाटन महिलाओं के लिए बनवाया गया था…अब वहाँ अराजक तत्वों का राज है और हर कोई यहाँ स्नान करने चला आता है…नतीजा अब महिलाओं के लिए इत्मीनान से रहना कठिन है।

घाट महिलाओं के लिए बनवाया गया और आज महिलाएं ही नहीं आ पातीं…वातावरण और गंदगी…दोनों ही जिम्मेदार हैं

महिलाओं के लिए रामचन्द्र गोयनका ने सिर्फ यह घाट ही नहीं बनवाया बल्कि कई और महत्वपूर्ण कार्य भी किये…अब आपको यह भी जानना चाहिए कि रामचन्द्र गोयनका थे कौन…तो आज जिस आरपीजी समूह को आप जानते हैं और गोयनका घराने को जानते हैं…रामचन्द्र गोयनका इस गोयनका परिवार के पूर्वज हैं। गोयनका परिवार से सबसे पहले रामदत्त गोयनका कोलकाता आए और यहाँ के स्थापित उद्योगपतियों में उनका नाम शामिल है…इनके बेटे थे रामकिसन दास गोयनका और रामकिसन दास गोयनका के ही पुत्र थे रामचन्द्र गोयनका जो अपने समय के प्रख्यात व्यवसायी होने के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता भी थे।

राजस्थान में इन्होंने प्रख्यात राम चन्द्र दत्त गोयनका छतरी डूंडल्ड में बनवायी। कलकत्ता पिंजरापोल सोसायटी के संस्थापकों में से एक थे और 1899 में इन्होंने विधवा सहायक समिति भी स्थापित की और यह संस्था 15 साल तक के अनाथ बच्चों की भी सहायता किया करताी थी। रामचन्द्र गोयनका ने जनाना घाट सिर्फ और सिर्फ महिलाओं के लिए ही बनवाया था और आज भी यह घाट इसका प्रमाण है।

पुराने दिनों की याद दिलाती तस्वीर…तब हावड़ा पुल भी नहीं था

कोलकाता को सुन्दर बनाने की बात करने वाली सरकारों ने विकास को भी दो तरीके से ही देखा…और नतीजा यह है कि हिन्दीभाषी इलाकों में बिखरे इतिहास को हाशिए पर डाल दिया गया…इस पर इतिहासकारों की नजर क्यों नहीं गयी…यह एक सवाल है…क्या यह जानबूझकर किया जा रहा है…। हावड़ा पुल के रास्ते में जो सीढ़ियाँ मल्लिक घाट फूल बाजार की ओर जाती हैं…वहीं पर यह घाट है और इसे संवारा जाये तो यह बेहद मनोरम पर्यटन स्थल बन सकता है….मगर स्थानीय लोग बताते हैं कि सुध लेना तो दूर जनाना घाट से दूसरे इलाकों को जोड़ने के लिए जो पुल था…उसे भी तोड़ दिया गया और यह एक बड़ा कारण है कि महिलाएं यहाँ नहीं आ पातीं। नतीजा यह है कि आज यह जगह आपराधिक तत्वों का अड्डा बनती जा रही है…जरूरी है कि प्रशासन नहीं तो आम संस्थाएं ही यह नेक काम करें और इस गौरवशाली स्मृति को सहेजें क्योंकि अपना इतिहास हमें खुद ही बचाना होगा।

स्त्रोत साभार – आरपीजी समूह की वेबसाइट

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घुमचक्कर्स डायरी

फिजिक्स के मोशन इन वन डायमेंशन चैप्टर में गलती कर रहे 47% विद्यार्थी

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के ऐप के आंकड़ों से पता चला

अगर आपके घर में या परिचितों में कोई बच्चा इंजीनियरिंग या मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा है या ऐसा इरादा रखता है तो यह आपके काम के आंकड़े हैं। जेईई या एनईईटी में करीब 47% छात्र फिजिक्स में ‘मोशन इन वन डायमेंशन’ और केमिस्ट्री में ‘साॅल्युशन एंड कॉलिगेटिव क्वालिटी’ पर प्रश्नों के सही उत्तर नहीं दे पाते।

मैथ्स में भी ‘कंटीन्युटी एंड डिफरेंशिएबिलिटी’ चैप्टर से पूछे गए सवालों को 40% छात्र हल नहीं कर पाते। वहीं, 37% छात्र बायोलॉजी में ‘रेस्पिरेशन इन प्लांट’ के सवालों का सही उत्तर नहीं दे पाते। ये निष्कर्ष नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की ओर से जेईई और एनईईटी की तैयारी कर रहे छात्रों की प्रैक्टिस के लिए बनाए गए मोबाइल ऐप ‘अभ्यास’ के आंकड़ों से सामने आया है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के महानिदेशक विनीत जोशी कहते हैं कि अभ्यास ऐप के पीछे विचार ही यही था कि छात्र जान सकें कि उनसे गलतियां कहां हो रही हैं। सभी विषयों के जिन चैप्टरों में छात्र गलतियां कर रहे हैं उनमें 10 ऐसे हैं जो इस बार बोर्ड परीक्षा के सिलेबस में नहीं हैं।

जानिए…किन पाठों में कितने छात्रों को आई कठिनाई

फिजिक्स

मोशन इन वन डायमेंशन 47%
रे ऑप्टिक्स 43%
इलेक्ट्रोस्टैटिक्स 43%
थर्मोडायनेमिक्स 38%
करेंट इलेक्ट्रिसिटी 33%
रे ऑप्टिक्स, थर्मोडायनेमिक्स और करेंट इलेक्ट्रिसिटी इस बार बोर्ड परीक्षा में नहीं हैं।
मैथ्स

कंटीन्युटी एंड डिफरेंशिएबिलिटी 44%
ट्रिग्नोमैट्रिकल इक्वेशन एंड इनइक्वेशन 40%
परम्युटेशन एंड कंबिनेशन 39%
फंक्शंस 37%
इन्वर्स ट्रिग्नोमैट्रिक फंक्शंस 36%
(कंटीन्युटी एंड डिफरेंशिएबिलिटी और इन्वर्स ट्रिग्नोमैट्रिक फंक्शंस बोर्ड परीक्षा में नहीं हैं।)
केमिस्ट्री

साॅल्युशन एंड कॉलिगेटिव प्रॉपर्टीज 47%
ब्लॉक एलीमेंट्स एंड हाइड्रोजन 37%
केमिकल काइनेटिक्स 35%
एटॉमिक स्ट्रक्चर 34%
केमिकल थर्मोडायनेमिक्स 32%
(ब्लॉक एलीमेंट्स, केमिकल काइनेटिक्स व केमिकल थर्मोडायनेमिक्स बोर्ड परीक्षा में नहीं हैं)
बायोलॉजी

रेस्पिरेशन इन प्लांट 38%
फोटोसिंथेसिस इन प्लांट 36%
मिनरल न्यूट्रीशन 33%
रिप्रोडक्शन इन ऑर्गेनिज्म 31%
ह्यूमैन हेल्थ एंड डिसीज 30%
(मिनरल न्यूट्रीशन और रिप्रोडक्शन इन ऑर्गेनिज्म बोर्ड परीक्षा से बाहर है)
54 लाख ने ऐप पर नीट, 28 लाख ने जेईई का मॉक टेस्ट दिया, (मई, 2020 से अब तक)
180 मिनट है टेस्ट के लिए निर्धारित समय
155 मिनट में पूरा हो रहा है नीट मॉक टेस्ट
156 मिनट में पूरा हो रहा है जेईई मॉक टेस्ट
(छात्रों को लगने वाला औसत समय)
जिस पेपर में समय ज्यादा, उसमें अंक कम
नीट में छात्र सबसे ज्यादा समय फिजिक्स को देते हैं लेकिन इसमें सबसे कम अंक पा रहे हैं। जेईई में छात्र मैथ्स में सबसे अधिक समय दे रहे हैं फिर भी इसमें अंक कम हैं। दोनों ही परीक्षाओं में छात्रों ने केमिस्ट्री में सबसे ज्यादा अंक हासिल किए।

जेईई और सीईटी  के लिए फिजिक्स, केमेस्ट्री मैथ्स अनिवार्य रहेंगे
इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जेईई या राज्यों में होने वाली सीईटी जैसी परीक्षा के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स की अनिवार्यता बनी रहेगी। एआईसीटी के चेयरमैन प्रो. अनिल दत्तात्रेय सहस्रबुद्धे ने साफ किया कि नियमों में बदलाव कर उन छात्रों के लिए दाखिले का विंडो खोला गया है जिन्होंने 12वीं में ये विषय नहीं पढ़े। बिना इन विषयों को पढ़े किसी को इंजीनियरिंग में दाखिला देने का फैसला विश्वविद्यालय, तकनीकी संस्थान और राज्यों को करना होगा। हालांकि ऐसे छात्रों को पहले वर्ष में अनिवार्य रूप से तीनों विषयों का ब्रिज कोर्स करना होगा। प्रो. सहस्रबुद्धे ने तर्क दिया कि 10वीं के बाद पॉलीटेक्निक से मेकेनिकल, सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में तीन साल का डिप्लोमा कर चुके छात्रों को BE या B.Tec में सीधे सेकंड इयर में लेटरल एंट्री दी जाती रही है। एक दशक पहले इंजीनियरिंग में केमिस्ट्री को ऑप्शनल बनाया गया था। इसके तहत किसी ने फिजिक्स, मैथ्स के साथ इंजीनियरिंग ड्राइंग, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, स्टैटिस्टिक्स या वोकेशनल एजुकेशन विषय लिया है तो उसे इंजीनियरिंग में दाखिला मिल सकता है। कंप्यूटर इंजीनियरिंग के छात्रों का कैरियर में केमिस्ट्री से वास्ता नहीं पड़ता। बायोटेक्नोलॉजी या बायोइंफोर्मेटिक्स ऐसी ब्रांच हैं जिसमें बायोलॉजी होने से ज्यादा फायदा है। सीबीएसई और ओपन स्कूल में 12वीं में एग्रीकल्चरल केमिस्ट्री विषय है, जबकि एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए केमिस्ट्री अनिवार्य है। प्रो. सहस्रबुद्धे ने कहा, नई शिक्षा नीति के मुताबिक ही नियमों में लचीलापन लाया गया है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

 

74% लड़के चाहते हैं, अगर मौका मिले तो अंग्रेजी नहीं, अपनी भाषा में करेंगे इंजीनियरिंग

लड़कियां ऐसा कम चाहती हैं
देश के 74 प्रतिशत लड़कों ने इच्छा जताई है कि यदि उन्हें मौका मिले तो वे अपनी भाषा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करेंगे। हालांकि इस तरह की इच्छा रखने वालों में लड़कियां कम हैं। महज 26 प्रतिशत ही। एआईसीटीई (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद) के एक सर्वे में ऐसे कुछ रोचक तथ्य सामने आए हैं। दरअसल, नयी शिक्षा नीति (2020) में इंजीनियरिंग और मेडिकल सहित सभी पढ़ाई क्षेत्रीय व मातृ भाषा में पढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसी के मद्देनजर एआईसीटीई ने प्रो. प्रेम व्रत की अध्यक्षता में एक समिति बनाई है। उसे बीटेक/बीई की पढ़ाई मातृभाषा में कराने की संभावना तलाशने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
83,195 छात्र-छात्राओं के बीच सर्वे
इस समिति ने देश के 83,195 छात्र-छात्राओं के बीच सर्वे कराया। इस सर्वे में 10वीं, 12वीं सहित इंजीनियरिंग के चारों वर्षों के बच्चों की राय ली गई है। इसके निष्कर्षों के मुताबिक 10वीं की पढ़ाई कर रहेे 72 फीसदी तो 12वीं में पढ़ रहे 74 फीसदी लड़के अपनी भाषा में तकनीकी शिक्षा लेना चाहते हैं। जबकि लड़कियों में 10वीं की 28% और 12वीं की 26% ही ऐसी मिलीं, जो मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा लेने की इच्छा रखती हैं। कुल 44 फीसदी (36,432) बच्चों ने मातृभाषा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की इच्छा जताई है। इनमें सबसे बड़ी तादाद तमिलभाषियों (90%) की है। जबकि हिंदी में करीब 60%, तेलुगु में 30%, मराठी में 27% और कन्नड़ व गुजराती के 10-10% बच्चों ने मातृभाषा में बीई/बीटेक करने के लिए ‘हां’ कहा है।
मलयालम, बंगाली और उड़िया बोलने वाले 5% से भी कम बच्चे ऐसा चाहते हैं। यह सर्वे 22 क्षेत्रीय भाषाओं के विद्यार्थियों के बीच किया गया। इस बाबत एआईसीटीई के अध्यक्ष प्रो. अनिल सहस्रबुद्धे ने कहा कि मातृभाषा में उच्च शिक्षा मुहैया कराने के लिए अच्छी गुणवत्ता की किताबें और शिक्षकों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। इस दिशा में एआईसीटीई ने बड़ी संख्या में स्थानीय भाषाओं में पुस्तक लेखन व अनुवाद शुरू करा दिया है।
देश में उच्च शिक्षा में नामांकन की दर अभी सिर्फ 27 फीसदी
सहस्रबुद्धे के मुताबिक देश में उच्च शिक्षा की नामांकन दर 27% है। इसकी बड़ी वजह ये है कि मातृभाषा में पढ़ रहे 10वीं-12वीं के बच्चों में ये डर रहता है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई उन्हें समझ में नहीं आ आएगी। ऐसे में, अगले 15 वर्षों में यदि हमें उच्च शिक्षा में नामांकन की दर को 50% तक ले जाना है तो मातृभाषा में शिक्षा का विकल्प मुहैया कराना ही होगा।
(साभार – दैनिक भास्कर)

अपना व्यवसाय शुरू करने में मदद करेंगी ये सरकारी योजनाएं

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार यानी कंज्यूमर मार्केट है। पिछले दशक में
यहां फूड, ब्यूटी, ट्रैवल, ऑटोमोबाइल, इंटरटेनमेंट और इनोवेशन जैसे सेक्टर में बिजनेस की सफलता की लाखों कहानियां हैं, लेकिन एनएसएसओ के एक सर्वे के मुताबिक भारत में महिलाओं की बिजनेस में भागीदारी महज 8% है। आमतौर पर देश में पुरुषों को तो कारोबार करने में परिवार मदद कर देता है, लेकिन महिलाओं के साथ ऐसा कम होता है। कोविड-19 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आपदा में अवसर’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का मंत्र दिया है। ऐसे में महिलाओं के लिए अपना व्यवसाय शुरू करने का ये सही मौका है। महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने में पैसे की कमी आड़े न आए, इसलिए सरकार कई तरह की योजनाएं चला रही है। हम यहां आपको ऐसी ही कुछ योजनाओं की जानकारी दी जा रही है

1. अन्नपूर्णा योजनाः फूड कैटरिंग के व्यवसाय के लिए 50 हजार का कर्ज
इस स्कीम के तहत भारत सरकार महिला उद्यमियों को फूड कैटरिंग के बिजनेस के लिए 50 हजार रुपए तक का लोन देती है। इस राशि का इस्तेमाल बर्तन खरीदने, गैस कनेक्शन लेने, फ्रिज, मिक्सर, टिफिन बॉक्स और खाने की टेबल जैसे सामान खरीदने के लिए किया जा सकता है। इस कर्ज के लिए एक गारंटर की जरूरत पड़ेगी। इस लोन को 36 महीने में वापस करना होगा। अन्नपूर्णा स्कीम के तहत लिए गए लोन पर ब्याज की दर बाजार के हिसाब से तय होगी। फिलहाल भारतीय स्टेट बैंक से इस स्कीम का फायदा लिया जा सकता है।

2. स्त्री शक्ति पैकेजः महिलाओं को कर्ज पर मिलती है छूट
ये स्कीम ऐसी महिलाओं के लिए है जो किसी व्यवसाय में 50% से ज्यादा हिस्सेदारी रखती हैं। इसके अलावा उन महिलाओं को राज्य के उद्यम विकास प्रोग्राम में रजिस्टर करना जरूरी होगा। छोटे बिजनेस के लिए इस पैकेज के जरिए 50 हजार से 2 लाख रुपए तक का लोन दिया जाता है। एमएसएमई में रजिस्टर्ड कंपनियों को 50 हजार से 25 लाख रुपए तक का लोन दिया जा सकेगा। 5 लाख रुपए तक के लिए कोई सिक्योरिटी नहीं देनी होगी। साथ ही लोन की ब्याज दर पर छूट भी दी जाएगी। स्त्री शक्ति पैकेज का लाभ लेने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से संपर्क करना होगा।

3. मुद्रा योजनाः हर तरह के उद्यम के लिए कर्ज

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना छोटे उद्यमियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने शुरू की है। इस योजना के जरिए 50 हजार से 50 लाख रुपए तक का लोन किसी भी राष्ट्रीय बैंक से लिया जा सकता है। इन पैसों की मदद से महिलाएं ब्यूटी पॉर्लर, ट्यूशन सेंटर,सिलाई वगैरह के बिजनेस शुरू कर सकती हैं। 10 लाख रुपए तक के लोन के लिए कोई गारंटर या सिक्योरिटी की जरूरत नहीं पड़ेगी।
मुद्रा योजना में तीन तरह की योजनाएं हैं-
शिशुः नए बिजनेस के लिए 50 हजार रुपए तक का लोन दिया जाता है। इसमें 12% सालाना ब्याज लगता है। इसे 5 साल में अदा किया जा सकता है।
किशोरः इसमें पहले से चल रहे व्यवसाय को बढ़ाने के लिए 50 हजार से पांच लाख रुपये तक का ऋण दिया जाता है। ऋण जमा करने और ब्याज की दरें आपके क्रेडिट हिस्ट्री के हिसाब से बैंक तय करता है।
तरुणः इसमें बिजनेस बढ़ाने के लिए 5 लाख रुपए से 10 लाख रुपये तक का कर्ज दिया जाता है। ऋण जमा करने और ब्याज की दरें आपके क्रेडिट हिस्ट्री के हिसाब से बैंक तय करता है।
4. महिला उद्यम निधिः 10 साल के लिए 10 लाख तक का कर्ज
महिला उद्यमियों की आर्थिक मदद के लिए पंजाब नेशनल बैंक (PNB) और स्मॉल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (SIDBI) 10 लाख रुपए तक का ऋण देते हैं। इसे 10 साल की अवधि में अदा किया जा सकता है। इसके लिए ब्याज की दरें बाजार के आधार पर तय होती हैं।
इस योजना के तहत SIDBI ब्यूटी पार्लर खोलने, डे केयर सेंटर चलाने, ऑटो रिक्शा खरीदने, बाइक और कार खरीदने के लिए अलग-अलग प्लान चलाता है। इस स्कीम की मदद से पहले से चल रहे प्रोजेक्ट को भी बढ़ाया जा सकता है।
5. महिला समृद्धि योजनाः पिछड़ी महिलाओं को उठाने का प्रयास
आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए इस स्कीम की शुरुआत की गई है। अपना बिजनेस शुरू करने में होने वाले खर्च के लिए बैंक 60 हजार रुपए तक का लोन देता है। इसे 3 साल 6 महीने में चुकाना होता है। इसके लिए सालाना महज 4% ब्याज देना होता है।
गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन गुजार रही महिलाएं इस योजना का लाभ उठा सकती हैं। इसके लिए कोई गारंटर या सिक्योरिटी जमा करने की जरूरत नहीं है। इस योजना का लाभ लेने के लिए अपने नजदीकी बैंक से संपर्क करना होगा।
(साभार – दैनिक भास्कर)

 

नहीं रहे ऑडियो कैसेट लाने वाले ओटेन्स

1963 में बनाया था पहला कैसेट
ऑडियो कैसेट के डच आविष्कारक लोऊ ओटेन्स का हाल में 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने पहला कैसेट 1963 में बनाया था। अब तक दुनियाभर में 10,000 करोड़ कैसेट टेप बिकने का अनुमान है। कैसेट ने लोगों को चलते-फिरते भी संगीत सुनने की सुविधा दी। ओटेन्स ने बीते सप्ताहांत में नीदरलैंड्स स्थित अपने होम टाउन डाइजल में अंतिम सांस ली। ओटेन्स 1960 में फिलिप्स के प्रोडक्ट हेड डिपार्टमेंट के प्रमुख बने थे। ओटेन्स की टीम को भारी-भरकम रील टेप रिकॉर्डर को पोर्टेबल गैजेट में तब्दील करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसका परिणाम कैसेट के रूप में आया। 37 वर्षीय ओटेन्स ने 30 अगस्त 1963 को बर्लिन में ऑडियो कैसेट को दुनिया के सामने पेश किया। वर्ष 2013 में कैसेट के आविष्कार के 50 साल पूरे होने के मौके पर एक इंटरव्यू में ओटेन्स ने कहा था, मैंने जब कैसेट को पहली बार दुनिया के सामने इसे पेश किया, तो यह ‘सनसनी’ बन गई थी। कैसेट का दौर आने से पहले रिकॉर्डिंग के लिए रील-टू-रील डिवाइस इस्तेमाल होती थी। लेकिन इसे इस्तेमाल करना कठिन था। इसके लिए ट्रेनिंग और विशेषज्ञता की जरूरत पड़ती थी।
फिलिप्स और सोनी के साथ डील के बाद ओटेन के कैसेट मॉडल को पेटेंट मिल गया। हालांकि, कैसेट वास्तव में उस समय मशहूर हुई जब 1979 में सोनी ने वॉकमैन पेश किया। वॉकमैन एक पोर्टेबल कैसेट प्लेयर था। इस प्रोडक्ट ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया। ओटेन्स अपने इस आविष्कार के लिए सोनी के वॉकमैन को सबसे मुफीद माध्यम बताते थे, न कि फिलिप्स को। जबकि उन्होंने इसे फिलिप्स के लिए विकसित किया था।

(साभार – दैनिक भास्कर)

 

उद्यमी विधि सिंघल के व्यवसाय की कमान महिलाओं के हाथ में

विधि का फैशन के प्रति लगाव बचपन से था। एक फैशन उद्यमी बनने से पहले वे डाटा एनालिटिक्स के तौर पर नौकरी करती थीं। उन्हें दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपने क्लाइंट्स के साथ मिलने जाना होता था। उन्हें अपने लिए किसी ब्रांड के ऐसे कपड़े कभी नहीं मिले जिसे पहनकर वे पूरी तरह संतुष्ट हो जाएं। यहीं से उन्हें ये लगा कि महिलाओं के लिए एक ऐसे ब्रांड की शुरुआत करना चाहिए जो हर बॉडी आकार पर फबें। इसके बाद विधि ने अपने सस्टेनेबल लेबल की शुरुआत की। वे अपने लेबल के लिए लिनेन, ऑर्गेनिक कॉटन, रिसाइकल्ड वुल और बांस से बने फैब्रिक का उपयोग करती हैं। इन परिधानों को पैक करने के लिए प्लास्टिक बैग के बजाय रिसाइकल्ड पेपर बैग्स का इस्तेमाल किया जाता है।

विधि का ब्रांड शत-प्रतिशत महिलाओं द्वारा संचालित किए जाने वाला ब्रांड है जहां 100% महिलाएं ही सिलाई का काम करती हैं, वहीं 90% स्टाफ मेंबर्स भी महिलाएं ही हैं। विधि अपने प्रयासों से एक ऐसा समाज बनाना चाहती हैं जहां महिलाएं एक दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ें। जहां वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें। जो महिलाएं फैशन की दुनिया में आगे बढ़ना चाहती हैं, उनसे विधि कहती हैं – ”बहुत सारे विकल्पों को साथ लेकर चलने के बजाय किसी एक काम पर फोकस करें। आपके लिए ये भी जरूरी है कि फैशन की दुनिया में हो रहे उतार-चढ़ावों पर नजर रखें। इसके लिए पढ़ने पर ध्यान दें। इस क्षेत्र से जुड़ी बारीकियों को जानने के लिए अलग-अलग उम्र के लोगों से मिलें और उनके विचार जानें। इसके साथ ही अगर आपको परिवार का सपोर्ट मिले तो निश्चित रूप से कामयाबी आपके कदम चूमेगी”।
(साभार – दैनिक भास्कर)

केरल की के सी रेखा हैं भारत की पहली फिशर वुमन

दस साल पहले पति की मदद के लिए की थी फिशिंग की शुरुआत

भारत के पारंपरिक फिशिंग समुदाय में महिलाएं मछुआरन के तौर पर कम ही देखी जाती हैं। आमतौर पर वे घर में ही रहती हैं और अपने पति के समुद्र किनारे से लौटने का इंतजार करती हैं। वहीं केरल के थ्रिशूर जिले के चवक्कड़ गांव की रहने वाली रेखा भारत की पहली फिशर वुमन हैं। उन्हें भारत सरकार की ओर से इंटरनेशनल बॉर्डर पर समुद्र की गहराईयों में जाकर मछली पकड़ने का लाइसेंस प्राप्त है।

 

रेखा ने इस काम की शुरुआत दस साल पहले की थी। रेखा के पति कार्तिकेयन समुद्र में मछली पकड़ने जाते थे। एक बार समुद्र में उनकी मदद करने वाली दोनों मछुआरे यह काम छोड़कर चले गए। आर्थिक तंगी के चलते कार्तिकेयन के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वे अपनी मदद के लिए किसी को रख सकें। जब ये बात उसने अपने घर में रेखा को बताई तो वह खुद पति की मदद के लिए तैयार हो गई।
रेखा ने कभी तैराकी नहीं की थी। यहां तक कि इससे पहले उन्हें समुद्र के किनारे