Thursday, July 2, 2026
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पूर्व अटार्नी जनरल और वरिष्ठ वकील सोली सोराबजी का निधन

नयी दिल्ली :   देश के पूर्व अटार्नी जनरल और वरिष्ठ वकील सोली सोराबजी (91) का गत शुक्रवार को कोरोना संक्रमण के कारण निधन हो गया है। करीब सात दशक तक कानूनी पेशे से जुड़े रहे सोराबजी की पहचान देश के बड़े मानवाधिकार वकील के तौर पर होती है।
वे गरीबों और दलितों की मदद में हमेशा आगे रहे। 70 और 80 के दशक में सोराबजी के जूनियर वकील रह चुके कपिल सिब्बल और अशोक पांडा उनकी पहचान देश के बड़े मानवाधिकार वकील के तौर पर थी
1970 से 80 के दशक में सोराबजी देश के सबसे व्यस्त और नामचीन वकीलों में शुमार थे। उन्हें कई बार सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के लिए अप्रोच किया गया, मगर उन्होंने ऑफर ठुकरा दिया। वे हर बार कहते-मैं जज कभी भी बन सकता हूं। मगर मैं ऐसा चाहता नहीं हूं क्योंकि जितना अधिक गरीब व दलितों के लिए बाहर रहकर कर सकता हूं, उतना न्यायपालिका का अंग बनकर नहीं कर सकता।
बड़े से बड़े वकील को अपनी दलीलों से पसीने छुड़ा देने वाले सोराबजी अपने जीवन में केवल एक बार आपातकाल में भावुक हुए थे। अक्सर काम का तनाव दूर करने के लिए संगीत का सहारा लेते थे। उन्हें जैज म्यूजिक काफी पसंद था। उन्होंने भारत में इस जॉनर को काफी प्राेत्साहन भी दिया। जब भी खुश होते तो क्लेरीनेट, सैक्सोफोन और पियानो बजाने लगते थे। सिब्बल बताते हैं- वे जूनियर वकील को केस की तैयारी करने के लिए कहते, फिर जांचने के लिए खुद उससे चर्चा भी करते। अगर उन्हें जूनियर की तैयारी पसंद आती तो अपनी जगह उसे ही भेजते और पसंद न आने पर खुद जिरह करते थे।

लॉकडाउन में शुरू किया ऑनलाइन एम्बुलेंस और दवाइयों का स्टार्टअप

हर महीने 10 लाख का व्यवसाय, रोज 200 मरीजों की मदद
इंद्रभूषण मिश्र

पटना : बिहार के पटना जिले के रहने वाले नीरज झा पेशे से डॉक्टर हैं। कई अस्पतालों में हेल्थकेयर को लेकर काम कर चुके हैं। कुछ अस्पतालों में हॉस्पिटल मैनेजमेंट कंसल्टेंट के रूप में भी उन्होंने काम किया है। पिछले साल जब कोरोना फैला तो स्वास्थ्य सुविधा सबसे अधिक प्रभावित हुई। किसी को दवाइयां नहीं मिलती तो किसी को एम्बुलेंस नहीं मिल रही थी। ऐसे में नीरज को लगा कि इन सरोकारों को लेकर कुछ काम करना चाहिए। इसके बाद जुलाई 2020 में उन्होंने हनुमान नाम से एक स्टार्टअप लॉन्च किया। जिसके जरिये वे लोगों को एम्बुलेंस, दवाइयां, ऑक्सीजन और होम नर्सिंग की सुविधा मुहैया करा रहे हैं। अभी वे बिहार के 22 जिलों में एम्बुलेंस सर्विस चला रहे हैं। इससे हर महीने 10 से 12 लाख उनका रेवेन्यू हो रहा है।
नीरज कहते हैं कि इस काम को शुरू करने का आइडिया दो साल पहले आया था। तब मैं एक अस्पताल में मैनेजमेंट कंसल्टेंट के रूप में काम कर रहा था। उसी दौरान आईटी एक्सपर्ट दीपक से मेरी मुलाकात हुई जो अपने पिता के इलाज के लिए इधर-उधर भटक रहे थे। दीपक बेंगलुरु में जॉब कर रहे थे। अपने पिता के लिए उन्होंने ऑनलाइन मेडिकल हेल्प की कोशिश की, लेकिन कहीं से मदद नहीं मिली तो उन्हें खुद दरभंगा आना पड़ा। उस मुलाकात के बाद हम दोनों दूर के परिचित निकले। उसी दौरान हमारे दिमाग ये आइडिया आया कि इस तरह की कोई पहल की जाए ताकि लोगों को ऑनलाइन मेडिकल सहायता मिल जाए।
इसके बाद दीपक वापस अपने काम पर लौट गए और मैं भी अपने काम में लग गया, लेकिन हमने अपने आइडिया पर बात करना जारी रखा। फिर नवंबर 2019 में हमने एक और मीटिंग की और इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया। दीपक ने अपनी नौकरी छोड़ दी और मैंने भी इस्तीफा दे दिया। दीपक को आईटी का अच्छा खासा अनुभव था तो हमें टेक्नोलॉजी डेवलप करने और ऐप तैयार करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। बाकी मैं मेडिकल सेक्टर से जुड़ा था तो नेटवर्क डेवलप करने में आसानी हो गई।

कैसे करते हैं काम?
नीरज बताते हैं कि हमने ऑनलाइन ऐप, वेबसाइट और एक सॉफ्टवेयर डेवलप किया है। इसके जरिए कोई भी सर्विस रिक्वेस्ट कर सकता है। वे कहते हैं कि जिस तरह ओला से गाड़ियों की बुकिंग होती है। उसी तरह हमारे ऐप से एम्बुलेंस की बुकिंग होती है। इसके साथ ही वेबसाइट से भी हम लोग बुकिंग लेते हैं। अगर कोई ऐप या वेबसाइट पर नहीं जा सकता तो वो हमारी हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करके भी मेडिकल सहायता और एम्बुलेंस का अनुरोध कर सकता है। हम जल्द से जल्द उस जगह पर पहुंचने की कोशिश करते हैं। नीरज की टीम ने हेल्थ के क्षेत्र में काम करने वाली कई संस्थाओं से हाथ मिलाया है। कोई उनके लिए ऑक्सीजन मुहैया कराता है तो कोई दवाइयों और होम नर्सिंग विकसित करने के इक्विपमेंट्स की व्यवस्था करता है। जिस तरह की माँग आती है उसके हिसाब से उनकी टीम उस संस्था से बात करके ग्राहकों तक मदद पहुंचाती है।

क्या-क्या काम करते हैं?
नीरज कहते हैं कि अभी हमारे पास 350 एम्बुलेंस हैं। हमने कुछ ई रिक्शा एम्बुलेंस भी तैयार किया है जो पटना में चल रही है। इसके साथ ही हम लोग दवाइयों और दूसरे मेडिकल एसेसरीज की भी होम डिलीवरी करते हैं। हम सिर्फ दवाइयों का कॉस्ट लेते हैं, जबकि डिलीवरी चार्ज फ्री रखते हैं। इसके साथ ही ऑक्सीजन मुहैया कराने, मेडिकल टेस्ट कराने, कोरोना का टेस्ट कराने में भी लोगों की मदद करते हैं। हमारी टीम लोगों के घर जाकर यह काम करती है। साथ ही हमने 30 से ज्यादा घरों में नर्सिंग होम भी सेटअप किया है। वे बताते हैं कि एम्बुलेंस सर्विसेज का काम हम बिहार के 22 जिलों में कर रहे हैं। जबकि बाकी मेडिकल हेल्प की सर्विसेज सिर्फ पटना तक सीमित हैं। नीरज बताते हैं कि अभी हमारा स्टार्टअप नया है। साथ हम तब इसे रन कर रहे हैं, जब हेल्थ सिस्टम कोलैप्स कर गया है। इसलिए पूरे बिहार में या उसके बाहर हम अभी नहीं पहुंच सके हैं।
वे कहते हैं कि अभी देश में हालात खराब हैं। लोगों को जरूरत की चीजें नहीं मिल रहीं। इसलिए हमने तय किया है कि हम ऑक्सीजन भराने का पैसे नहीं लेंगे। कोई खाली सिलेंडर लाता है तो हम मुफ्त में उसे रिफिल करा देते हैं। साथ ही हम किसी को मेडिकल एसेसरीज प्रोवाइड करा रहे हैं, तो उसके लिए भी सिर्फ उसकी लागत ही कस्टमर्स से लेते हैं। कोई अतिरिक्त लाभ कमाने की कोशिश नहीं करते हैं।
नीरज की टीम में अभी 16 लोग काम करते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी हैं। वे कहते हैं कि हर रोज अभी हमारे पास 500 से ज्यादा सर्विस रिक्वेस्ट आ रही हैं। जिसमें से 150 से ज्यादा एम्बुलेंस की होती है। इस तरह हर दिन हम 200 से ज्यादा लोगों तक सर्विस पहुंचा रहे हैं। चूंकि अभी रिसोर्सेस की कमी है इसलिए हम सब तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

आप भी सम्पर्क कर सकते हैं हनुमान से, बस इस लिंक पर क्लिक करें।

(साभार – दैनिक भास्कर)

चुनाव खत्म, अब कोरोना को लेकर बंगाल में सख्ती, आंशिक लॉकडाउन जारी

कोलकाता : बंगाल में विधानसभा चुनाव की समाप्ति के बाद और दो मई को मतगणना के पहले राज्य सरकार ने कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के मद्देनजर ने कड़े कदम उठाने शुरू किए हैं। राज्य सरकार ने शुक्रवार को एक आदेश जारी कर एक मई से बंगाल में सभी शॉपिंग कंप्लेक्स, मॉल, ब्यूटी पार्लर, सिनेमा हॉल, रेस्टूरेंट्स, बार, स्पोर्ट्स कंप्लेक्स, जिम, स्पा और स्वीमिंग पुल बंद रखने की घोषणा की है।
वहीं, बाजार और हाट सुबह 7 बजे से 10 बजे तक और शाम को 3 बजे से पांच तक ही ही खुल रहे हैं। हालांकि आपातकालीन व्यवस्था और सेवाएं चालू रहेंगी। राज्य के मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय ने इस बाबत आदेश जारी किया है। राज्य सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा निर्देश के अनुसार यह कदम उठाया गया है। राज्य सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियों में भीड़ एकत्रित नहीं हो। इन गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है। बाजार और हाट निर्धारित उपुयक्त समय पर ही खुलेंगे, लेकिन आपातकालीन सेवाएं मेडिकल दुकानें, मेडिकल उपकरण की दुकानें, किराना दुकानें खुली रह रही हैं।

भारत में पहली तिमाही में सोने की माँग बढ़ी, 37 प्रतिशत बढ़कर 140 टन पर पहुँची: डब्ल्यूजीसी

मुम्बई : भारत में सोने की मांग जनवरी- मार्च 2021 तिमाही के दौरान इससे पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 37 प्रतिशत बढ़कर 140 टन पर पहुंच गयी। इस दौरान कोविड- 19 से जुड़ी कड़ाई में राहत मिलने, सोने के दाम नरम पड़ने और दबी मांग निकलने से इस दौरान मांग में तेजी रही। विश्व स्वर्ण परिषद (डब्ल्यूजीसी) ने यह कहा है। डब्ल्यूजीसी के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2020 की पहली तिमाही में कुल मिलाकर सोने की मांग 102 टन रही थी। मूल्य के लिहाज से सोने की माँग पहली तिमाही में 57 प्रतिशत बढ़कर 58,800 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। जो कि एक साल पहले इसी तिमाही में 37,580 करोड़ रुपये रही थी।
जनवरी- मार्च 2020 के दौरान स्वर्णाभूषणों की कुल मांग 39 प्रतिशत बढ़कर 102.5 टन पर पहुंच गई। एक साल पहले यह 73.9 टन रही थी। मूल्य की यदि बात की जाये तो आभूषणों की मांग 58 प्रतिशत बढ़कर 43,100 करोड़ रुपये पर पहुंच गई जो कि इससे पिछले साल 27,230 करोड़ रुपये पर थी।
इस दौरान सोने में निवेश मांग 34 प्रतिशत बढ़कर 37.5 टन हो गई जो कि इससे पिछले साल 28.1 टन थी। वहीं मूल्य के लिहाज से यदि बात की जाये तो एक साल पहले के मुकाबले यह 53 प्रतिशत बढ़कर 15,780 करोड़ रुपये पर पहुंच गई जो कि पिछले साल 10,350 करोड़ रुपये रही थी।

पुरुषवादी सोच को चुनौती देकर चंद्रो दादी ने बनायी अपनी जगह

संध्या द्विवेदी
नयी दिल्ली : दादी तो सबकी होती हैं। मगर चंद्रो और प्रकाशी तोमर जैसी दादियां किस्मत से ही मिलती हैं। उनके निशानेबाजी के किस्से इतने मशहूर हुए कि उनका गांव ही ‘दादी का गांव’ कहलाने लगा। बागपत पहुंचकर अगर आप ‘जोहड़ी’ गांव का रास्ता किसी स्थानीय व्यक्ति से पूछेंगे तो वह एक बार जरूर कहेगा, अच्छा आपको दादी के गांव जाना है। फिर गांव ही नहीं बल्कि दादी के घर तक का रास्ता आपको वह फौरन बता देगा। 2017 में आखिरी बार चंद्रो तोमर से मुलाकात के वक्त उन्होंने कहा था, ‘यह बात सच है कि औरतों के वोट का फैसला मर्द ही करते हैं। यह तो मर्दों का अपना फैसला है न कि औरतों को वह आगे नहीं बढ़ने देंगे, पर औरतों का भी तो कोई फैसला होगा?’
82 साल की चंद्रो का यह सवाल मर्दों की सोच से ज्यादा उन औरतों पर निशाना साधता है जो बिना कुछ कहे मर्दों के फैसले के पीछे चल पड़ती हैं। इस सवाल के जवाब में कि हर औरत आपके जैसी ताकतवर तो नहीं हो सकती? उनका जवाब था, ‘ताकत लानी पड़ती है, उसकी भी कीमत है। जब हमने बंदूक हाथों में थामी थी, तो घर के मर्दों ने क्या कुछ नहीं किया, पर मैंने भी सोच लिया कि एक बार अगर आगे बढ़ गए तो बढ़ गए। चंद्रो ने हंसते हुए बताया था, ”म्हारे घर के मरद कहवें थे कि बुढापे में तम के कारगिल में जाओगी, वहां बंदूक चलावन जाओगी, हम भी हंसते हुए जवाब देते जांगे कारगिल में भी जांगे, मगर थोड़ा टरेनिंग तो कर लें, तब तो जांगे।”
चंद्रो ने अपने संघर्ष की कहानी कुछ यूं बताई थी, ‘हम यानी मैं और मेरी देवरानी प्रकाशी तोमर ट्रेनिंग में जा सकें इसके लिए पूरी रात घर का काम करते, 2-3 घंटे ही सोने को मिलते थे। ताने अलग से, शुरुआत में तो हम चोरी छिपे जाते लेकिन एक बार अखबार में किस्सा छप गया। हमारी पिटाई भी हुई। हमने भी घर के मर्दों से कह दिया, अब ये बंदूक तो हाथ से तभी छूटेगी जब हमारे प्राण छूटेंगे। अब हमारा निशाना मर्दों की सोच पर भी लगेगा। औरतों के खिलाफ भेदभाव भरी सोच पर भी लगेगा। और वो दिन की आज का दिन हम लगातार बोर्ड पर और मर्दों की सोच दोनों पर निशाना लगा रहे हैं।’
जोहड़ी गांव में जब लड़कियां होतीं तो दादी बधाई लेकर जातीं
चंद्रो और प्रकाशी तोमर ने अपने गांव में लड़कियों को पैदा होने पर बधाई देने की प्रथा शुरू की। यह प्रथा ऐसी स्थापित हुई कि इस गांव में जब भी कोई लड़की पैदा होती है तो मोहल्ले वाले नवजात बच्ची के लिए उपहार और तोहफे लेकर उसके घर पहुंचते हैं। खूब जमकर नाच गाना होता है। गांव वालों इस परंपरा के बारे में कुछ यूं बताया था, ‘पहले लड़कियों के होने पर यहां सबके चेहरे लटक जाते थे। लेकिन दादी ने जब से बधाई देने की परंपरा डाली तो अब लड़कियों के होने पर मुंह नहीं लटकते। लोग उन्हें निशानेबाज बनाने का सपना देखते हैं, दादी की तरह और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झंडे गाड़ चुकी उनकी पोतियों सीमा और शेफाली की तरह।’
पुरुषवादी सोच पर करारा तमाचा
चंद्रो तोमर ने लड़के-लड़कियों के भेदभाव वाली बात पर अपना एक किस्सा बताया था। किस्सा कुछ यूं था, ‘बात 2004 की है। चंद्रो ने बताया कि मेरा मुकाबला एक DIG से हुआ। मैंने उनको हरा दिया। जब मीडिया वाले मेरी और उनकी फोटो ले रहे थे तो वह भड़क गए और कहने लगे कि एक औरत से हारने के बाद काहे की फोटो। उन्हें हारने से ज्यादा इस बात का दुख था कि वह एक औरत से हारे। उन्होंने न मेरी तरफ एक भी बार देखा न मीडिया को फोटो लेने दी। तो आप ही बताइये कि जब मैं DIG को हरा सकती हूं तो लड़कियां सब कुछ कर सकती हैं।’
नोट-2015 में निशानेबाज दादियों का किस्सा कवर करते वक्त और फिर 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान चंद्रो तोमर और उनकी देवरानी प्रकाशी तोमर से मुलाकात हुई थी।
(साभार – दैनिक भास्कर)

भारतीय भाषा परिषद का संस्थापक दिवस कार्यक्रम संपन्न

कोलकाता :  भारतीय भाषा परिषद का संस्थापक दिवस गत 1 मई को ऑन-लाइन जूम पर मनाया गया| भारतीय भाषा परिषद के संस्थापक सीताराम सेकसरिया और भागीरथ कानोड़िया के भाषा और शिक्षा प्रेम और उसके लिए उनके सद्प्रयासों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया| परिषद के प्रांगण में सचिव डॉ. केयूर मजमुदार एवं वित्तीय सचिव घनश्याम सुगला ने माल्यार्पण किया| परिषद की अध्यक्ष डॉ कुसुम खेमानी ने कहा कि सीताराम जी यदि कल्पना थे तो भागीरथ जी उनके मूर्त रूप थे, एक दूसरे के पूरक थे| चौबीस साल की अवस्था से ही सीताराम जी सामाजिक कार्यों से जुड गए थे और दोनों ने मिलकर समाज की उन्नति के लिए शिक्षा संबंधित बहुत से ऐतिहासिक कार्य जैसे मारवाड़ी बालिका विद्यालय की स्थापना और कई संस्थाओं से जुड़े हुए थे| ८८ वर्ष की आयु में भारतीय भाषाओं की समृध्दि के लिए भारतीय भाषा परिषद की स्थापना की| उन्होंने केवल हिंदी ही नहीं सभी भाषाओं के उन्नयन पर ध्यान दिया | इस कार्यक्रम के तहत पहले सत्र में ‘परिषद की वार्ता और यात्रा’ एवं ‘कल आज और कल’ पर विशेष रूप से प्रतिभा अग्रवाल, डॉ. कुसुम खेमानी, डॉ. शंभुनाथ, ईश्‍वरी प्रसाद टांटिया, बिमला पोद्दार एवं रतनलाल शाह ने अपना विचार प्रकट किया|
परिषद के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने बताया कि परिषद का अतीत गौरवशाली रहा है और यहां से बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं| कोरोना काल के दौरान यहां से निकलने वाली पत्रिका वागर्थ अब ई – पत्रिका के रूप में निकल रही है| विश्वंभर दयाल सुरेका जी की सेवाओं के कारण ज्ञान कोष के आठ खंडों का प्रकाशन हुआ जो पचास वर्षों में किसी भी गैर सरकारी संस्था के लिए उल्लेखनीय है| भारतीय भाषा परिषद संस्था भारतीय भाषाओं के प्रति प्रेम और उत्कृष्ट योगदान का प्रतीक है| वहीं राजस्थानी भाषा के पक्षधर रतन लाल शाह ने कहा कि सीताराम सेकसरिया और भागीरथ कानोडिया  जैसे महापुरुषों पर अधिक से अधिक शोधपरक अध्ययन होना चाहिए जिससे युवा पीढ़ी भी प्रेरित हो सके| लंबे समय से जुड़ी डॉ प्रतिभा अग्रवाल ने अस्वस्थता के बावज़ूद ऑडियो द्वारा परिषद को अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं| ईश्वर बाबू जी और काको जी के संरक्षण में बचपन से ही देखती आ रही विमला पोद्दार परिषद से शुरू से जुड़ी रहीं| परिषद के वरिष्ठ ट्रस्टी सदस्य ईश्वरी प्रसाद टांटिया ने शुभकामनाएँ प्रेषित की| कार्यक्रम के प्रथम भाग ‘परिषद की यात्रा और वार्ता कल आज और कल’ के अंतर्गत वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने वक्तव्य रखे|
दूसरे सत्र के प्रारंभ में ‘वर्तमान संदर्भ में संस्कृति और साहित्य’ पर सचिव डॉ. केयूर मजमुदार ने जानकारी दी कि भविष्य में डिजिटल पटल पर भी एक साहित्यकार की खोज शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान के साझा तत्वावधान में विद्यार्थियों के बीच में युवा प्रतिभाओं को कविता, कृति नाट्‌य, कला व्यंग्य और कहानियॉं की विधा पर विश्‍वव्यापी प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी|
द्वितीय भाग ‘वर्तमान संदर्भ में संस्कृति और साहित्य’ विषय पर वागर्थ वेब की निदेशक डॉ वसुंधरा मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि कोरोना महामारी काल में किस तरह का साहित्य जन्म लेगा यह आने वाला भविष्य तय करेगा| यह मृत्यु से युद्ध का समय है| साहित्य और संस्कृति मनुष्य की भावना से अन्तर्संबंधित है| इस विषय पर इस समय भी लिखा जा रहा है और आगे आने वाले समय में भी लिखा जाएगा क्योंकि यह इस युग की एक महान घटना है| डॉ संजय जायसवाल,  परिषद के स्थापना दिवस पर विचार रखे। मधु सिंह ने कोरोना महामारी के दौरान उम्मीद लिख रही हूँ कविता सुनायी। कोलकाता रंगमंच के लोकप्रिय अभिनेता अजहर आलम के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला| पूजा सिंह ने कुंवर बैचेन जी कविता पाठ द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की और अपनी कविता की प्रस्तुति दी| वहीं आनंद गुप्ता ने समसामयिक भयावह महामारी में ‘उम्मीद’ कविता सुनाई| रावेल पुष्प ने अजहर आलम की स्मृति में बहुत ही मार्मिक कविता सुनाई| व्यंगकार नुपूर अशोक ने दो कविताएँ सुनाई| कविता ‘गेम का प्लान’ में किए व्यंग को बहुत पसंद किया गया| डॉ राजश्री शुक्ला ने परिषद को बधाई दी| विनोद कुमार ने रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की|कोरोना काल में असमय मृत्यु प्राप्त रमेश उपाध्याय, अजहर आलम, मंजूर एहतेशाम, अरविंद कुमार, अमिता शाह, विमल लाठ और कुंवर बैचेन जैसे साहित्य और रंगमंच की प्रमुख हस्तियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई| इस अवसर पर परिषद की ओर से आने वाले कार्यक्रम ‘एक साहित्यकार की खोज’ के विषय में डॉ केयुर मजमूदार और डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी दी जिसमें युवा पीढ़ी की विविध साहित्यिक- सांस्कृतिक प्रतिभाओं को स्थान दिया जाएगा और परिषद के मंच पर उनको चयनित कर विभिन्न कॉर्पोरेट जगत के सहयोग से उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा| यह प्रतियोगिता स्कूल – कॉलेज और राष्ट्रीय स्तर पर फाइनल आकार लेगी| वागर्थ वेब युवाओं और प्रबुद्ध प्रतिभाओं का डिजिटल पटल है जो भारतीय भाषा परिषद की ही इकाई है| समग्र कार्यक्रम का सुचारू संचालन परिषद के भारतीय भाषा परिषद के सचिव डॉ. केयूर मजमुदार ने किया| इस कार्यक्रम के आयोजन में कार्यकारिणी सदस्य अमित मूंधड़ा का डिजीटल पटल पर विशेष सहयोग रहा।

यह समय भी निकल जाएगा, बस साहस रखने की जरूरत है

प्रो. गीता दूबे

सखियों, बेहद मुश्किल समय है। मिल जुलकर रहना है और एक साथ मिलकर इस महामारी का सामना करना है। फिलहाल तमाम तरह की आशंकाओं से आम आदमी त्रस्त है। महामारी से संक्रमित होने की आशंका के साथ चिकित्सा व्यवस्था की अव्यवस्था ने आम और खास सभी को हिलाकर रख दिया है। इसी के साथ जिस सबसे बड़ी आशंका से आज मानव जाति त्रस्त है, वह है मृत्यु का भय। हालांकि जीवन के यथार्थ के साथ ही मृत्यु की सच्चाई भी जुड़ी हुई है। इस नश्वर संसार में सब कुछ मरणशील है, एक न एक दिन हर जीव को मृत्यु को स्वीकार करना है, वह चाहे या न चाहे। हमारे दार्शनिकों और साहित्यकारों ने इस शाश्र्वत सत्य की ओर‌ बार-बार संकेत किया है। बाबा तुलसी तो बड़ी तटस्थता के साथ कहते ही हैं –

“धरा को प्रमाण यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बुताना।”

लेकिन इसके बावजूद मनुष्य को अगर लगता है कि वह सर्वशक्तिमान है और येन केन प्रकारेण मृत्यु को परास्त कर सकता है तो‌ यह उसका अहंकार ही है और शायद इसी कारण कबीर जैसे सजग और विद्रोही कवि मानव मात्र को चेतावनी देते हुए कहते हैं –

“मालिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार ।

फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ।”

अर्थात मनुष्य को याद रखना चाहिए कि मृत्यु तो अवश्यंभावी है और यह कभी टल नहीं सकती। इसीलिए मनुष्य को हमेशा इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अपने मानवीय धर्म का पालन करना चाहिए। लेकिन इसकी अनिवार्यता को जानते हुए भी हम अमरत्व की आकांक्षा करते हैं और इसके लिए तरह तरह की कोशिश भी करते हैं। इसके पीछे हमारा वही मृत्यु भय काम करता है और हम इससे प्रतिक्षण त्रस्त रहते हैं। इसी की ओर संकेत करते हुए गालिब ने लिखा है-

“मौत का एक दिन मुअय्यन है 

नींद क्यूँ रात भर नहीं आती।।”

यह स्थिति हर‌ आदमी की है। बिरला ही कोई होगा जो इस मृत्यु भय से पीड़ित न हो। बड़े -बड़े संत महात्मा भी इस मृत्यु भय पर विजय हासिल करने के लिए कठिन साधना और तपस्या करते हैं। और साधारण व्यक्ति कभी दर्शन तो कभी आध्यात्मिकता में डूबकर इससे निजात पाने की कोशिश करता है।

यह बात भी काबिले गौर है कि कुछ लोगों के लिए जिंदगी मौत से ज्यादा मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हैती है, तभी तो फ़िराक़ गोरखपुरी लिखते हैं-

“मौत का भी इलाज हो शायद 

ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं ।”

कुछ इसी तरह का फलसफा  नज़ीर सिद्दिकी साहब भी बयान करते हैं-

“जो लोग मौत को ज़ालिम क़रार देते हैं 

ख़ुदा मिलाए उन्हें ज़िंदगी के मारों से ।।”

कुछ लोग मौत से घबराते हैं तो दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो मौत को गले लगाने के लिए बेताब रहते हैं। ये दोनों ही स्थितियां और प्रवृत्तियां घातक मानी जाती हैं। मृत्यु भय जहाँ मनुष्य को बेचैनी से भर कर कई बार मृत्यु के पहले मृत्यु के दरवाजे की ओर ढकेल देता है वहीं आत्महत्या की प्रवृत्ति समाज के लिए घातक तो है ही और एक संक्रामक रोग की तरह फैलती है। अतः सखियों, जीवन को सहज रूप में स्वीकार करना चाहिए और मौत को एक हव्वे की तरह न‌ देखकर उसे भी स्वाभाविक रूप से ग्रहण चाहिए क्योंकि मौत तो अपने तय समय पर आएगी ही। मौत से पहले मौत के डर से मर जाना तो किसी तरह भी सही नहीं है। दोनों सत्य जिंदगी के दो सिरे हैं और उन्हें आपस में जुड़ना ही है। या फिर यह भी कह सकते हैं कि जीवन के साथ जो यात्रा शुरू होती है वह मृत्यु के साथ पूरी तो होती ही है और वहीं से एक नयी यात्रा की शुरुआत भी होती है जिसे गीता में बहुत सहजता के साथ व्याख्यायित किया गया है और कवियों ने भी अपने तरीके से उसी तथ्य को स्पष्ट किया है। चकबस्त ब्रिज नारायण जिंदगी और मौत के फलसफे को अपने अंदाज में बड़ी खूबसूरती से बयां करते हुए कहते हैं-

ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब 

मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना ।।”

और अहमद नदीम क़ासमी बड़े साहस से मौत की हकीकत को स्वीकार करते हुए कहते हैं-

“कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा 

मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा ।।”

इसी तरह रामनरेश त्रिपाठी भी मृत्यु को जीवन का अंत नहीं बल्कि एक नयी शुरुआत मानते हुए  निर्भय होकर मृत्यु का स्वागत करने की बात कहते हैं-

“मृत्यु एक सरिता है जिसमें,

श्रम से कातर जीव नहाकर।

फिर नूतन धारण करता है,

कायारूपी वस्त्र बहाकर।”

सखियों, इन तमाम फलसफों के बावजूद मृत्यु से पीड़ा तो होती ही है और मृत व्यक्ति से हमारा संबंध जितना गहरा होता है, पीड़ा की गहराई भी उतनी ही ज्यादा होती है। कई बार लोग लंबी उम्र पाकर दिवंगत होते हैं और तब शोक के बावजूद इसे मोक्षप्राप्ति या मुक्ति की तरह देखते हुए मृत्यु संस्कारों का पालन उत्सव की तरह धूमधाम से किया जाता है। लेकिन असामयिक मृत्यु तो तकलीफदेह होती ही है, वह किसी अपने की हो या पराये की। वर्तमान परिस्थितियों में असामयिक मृत्यु की विभीषिका किसी सुनामी की तरह हर उम्र के लोगों को निगल रही है जो निसंदेह दुखदाई है। कुछ मौतों का कारण बीमारी है तो कुछ का गरीबी या फिर चिकित्सा व्यवस्था का धराशाई होना। कारण जो भी हो, दुख और तकलीफ का शिकार हर‌ दूसरा व्यक्ति हो रहा है। 

सखियों, इतना ही कहूंगी कि इस समय हमें धैर्य नहीं खोना है। यह समय भी निकल जाएगा और एक बार फिर से हम सामान्य स्थितियों की ओर लौटेंगे। ज़रूरत है, साहस के साथ इस आपदा का सामना करने की। स्त्रियों में जो जन्मजात जुझारूपन और संघर्ष शक्ति होती है, उसकी आज पूरे समाज को बहुत जरूरत है। बस हिम्मत बनाए रखें। कवि शैलेन्द्र के एक गीत की पंक्तियां बरबस याद आ रही हैं, जिन्हें आप के साथ साझा करना चाहती हूं-

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,

ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन।”

 

सृजन के सामने यह प्रलय भी पराजित होगा

यह ऐसा समय है जिसे आधुनिक समाज ने देखा न था..कल्पना नहीं की थी…हर ओर त्रासदी है…कोरोना की दूसरी लहर के कारण पूरी दुनिया में हाहाकार मचा है…। परम्परागत मीडिया से लेकर सोशल मीडिया…हर जगह स्थिति यही है…हालात कठिन हैं…ऑक्सीजन और दवाओं की कमी से परेशान हैं सब…हम मानते हैं कि यह समय कठिन है…कालाबाजारी हो रही है पर क्या आपने ध्यान दिया कि इस समय आलोचनाओं के बीच लोग एक दूसरे की मदद कर रहे हैं,….जिसकी जितनी क्षमता है…वह मदद को आगे आ रहा है….दुनिया में अच्छे और बुरे लोग थे, हैं और रहेंगे….मगर इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि अच्छे लोग और अच्छाई है….क्या यह हमारे लिए सुकून वाली बात नहीं है….?
बड़े कहते हैं कि जीवन में तूफान आए तो उसे गुजर जाने देना चाहिए….क्योंकि तूफान कैसा भी हो…स्थायी नहीं होता…..कोरोना संकट भी स्थायी नहीं है, भले ही यह तूफान हो या सुनामी ही क्यों न हो,…खुद ईश्वर को भी यह सृष्टि चलानी है क्योंकि यह सृष्टि हमारे ही नहीं बल्कि उनके अस्तित्व की परिचायक है….विश्वास रखिए…..कोरोना संक्रमित होने पर भी पर भी सकारात्मक सोच, किताबें, संगीत, सांस से जुड़े व्यायाम, गर्म पानी, भाप…दोस्तों से गप… और सबसे अधिक उस ईश्वर पर विश्वास…..आपकी रक्षा करेगा…..कोरोना से अधिक कोरोना का भय लोगों को परेशान कर रहा है…कोरोना तो है ही….महामारी और संकट के बीच है….फिर भी कहती हूँ प्रलय के महाजाल पर सृजन का बीज भारी है…।
अपनी कमान उसके हाथ में दीजिए …..अपने जीवन के रथ का सारथी उसे बनाइए…फिर वही आपकी रक्षा का भार लेगा और सही कर्म का रास्ता दिखाएगा….जीवन में एक अच्छी रुचि का होना बहुत आवश्यक है…कुछ न हो तो यू ट्यूब पर डीआईवी देखकर चीजें बनाइए…आपको पता ही नहीं चलेगा कि समय कितनी जल्दी समय बीत रहा है….हर सुबह नयी उम्मीद लेकर आती है…और हर रात के बाद सुबह होती है…यह सुबह भी जरूर होगी और सृजन के सामने यह प्रलय भी पराजित होगा।

 

मजदूर का श्रम…

-प्रीति साव

मजदूर अपना श्रम बेचता है,
मजदूर किसी भी क्षेत्र में
परिश्रम करता है,

मजदूर अपने घर परिवार का
दो वक्त रोटी के लिए ईंटें ढोता है,
वह सड़कों, पुलों, भवनों के निर्माण में
अपना भरपूर योगदान देता है ।

वह मजदूर जो कड़कती धूप में भी
नंगे पाँव कुछ दो पैसे लाने के लिए
निकल पड़ता ,
तालाब, कुओं, नहरों और
झीलों के निर्माण में भी
वह कठिन परिश्रम करता।

रिक्शाचालक, कर्मचारी,
बढ़ई, लोहार,हस्तशिल्पी,
दर्जी और पशुपालन
वास्तव में ये सब
मजदूर ही है,
जो हर क्षेत्र में योगदान दें रहें है।

तब भी एक वह वर्ग
जो पूंजीपति है,
वह मजदूरों पर कितना अत्याचार और
शोषण करता है,
फिर भी वह सह लेते है ।

एक वह मजदूर जो
एक छोटे से घर में भी अपना
जीवन यापन सुख से कर लेते हैं ,
केवल छोटे घरों में ही नहीं,
वह फुटपाथों पर भी रह लेते है ।

फिर भी इनके दर्द को समझने वाला
कोई नहीं होता,

कौन समझे इस मजदूर के दर्द को
कौन जाने इस मजदूर के श्रम को ।।

भवानीपुर कॉलेज के स्नातक सम्मान समारोह 2020 में एक हजार विद्यार्थी सम्मानित

कोलकाता :  भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में ग्रेजुएट के प्रथम श्रेणी प्राप्त एक हजार विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया जिसने सभी पिछले रिकार्ड तोड़ दिए। गत सात वर्षों से यह कार्यक्रम कला मंदिर और जी डी बिरला अॉडिटोरियम जैसे बड़े सभागारों में होता था और विद्यार्थियों के अभिभावकों को भी आमंत्रित किया जाता था। गत वर्ष 300 विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया था। इस वर्ष 1000 विद्यार्थियों को कॉलेज के नवनिर्मित कॉन्सेप्ट हॉल में दस सत्रों पमें विभाजित कर डिग्री और प्रमाणपत्र दिए गए जो एक रिकार्ड है। कोविड काल में पूरी तरह से सावधानी के साथ कॉलेज मैनेजमेंट ने सीटों की व्यवस्था एवं मास्क सेनेटाइजैशन आदि पर पूरी तरह ध्यान देते हुए किया ।
कॉमर्स विभाग के सर्वोच्च अंक प्राप्त क्रमशः शिवम दीक्षित, काशीनाथ महापात्र, प्राची बजाज, मैत्री चटर्जी और कौशल सिंह, आर्ट्स विभाग के सर्वोच्च अंक प्राप्त क्रमशः स्वरूप सरकार, दृष्टि साहा, नीना घोष, सुतीर्थ राय, रीथिका चक्रवर्ती,
साइंस विभाग से सौमाल्य प्रकाश, अभिषेक अधिकारी, निशिता रहमानी, मृगांक अग्रवाल, मौप्रिया मुखर्जी, नफीसा सिद्दीकी, बीबीए से युनिवर्सिटी रैंक होल्डर्स मुदित डागा, विनीता अध्यालका, कुनाल डागा, रिथिका लुनिया, तुषार वेणुगोपाल रहे। इस अवसर पर कॉमर्स विभाग के 690,मैनेजमेंट विभाग के 108,साइंस विभाग के 108,बीबीए के 92 विद्यार्थियों को ग्रेजुएट की डिग्री और प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।
रेणुका भट्ट, जोगेश साहा, टीआईसी डॉ. शुभब्रत गंगोपाध्याय और कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम के प्रथम सत्र ग्रेजुएशन सम्मान समारोह 2020 का उद्घाटन किया। प्रो दिलीप शाह ने सभी विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि कॉलेज से उनके रिश्ते सदैव रहेंगे, यह विदाई नहीं है बल्कि अब आपको समाज के एक बड़े वर्ग से जुड़ने का समय है। प्रो शाह ने गुजराती शब्द “आऊजू” द्वारा उन्हें शुभकामनाएं दीं जिसका अर्थ है फिर आना।
दूसरे सत्र में कॉलेज के डायरेक्टर डॉ. सुमन मुखर्जी, अमिता पटेल आदि विशिष्ट व्यक्तित्व उपस्थित रहे जिन्होंने सभी विद्यार्थियों को सम्मानित किया। इस सत्र में शुभलक्ष्मी की टीम ने रवींद्र संगीत की सुमधुर प्रस्तुति दी। डॉ सुमन ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस संसार में सभी पूर्ण नहीं होते जो कठिन परिश्रम करते हैं वे अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।
तीसरे सत्र में प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, नलिनी पारेख और दी इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट के चैयरमैन सुनील गोयल बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
चौथे सत्र में प्रमुख अतिथि विंग कमांडर विष्णु शर्मा ने अपने प्रेरक अपने पायलट बनने के सपने को पूरा करने के लिए किन किन संघर्षों का सामना करना पड़ा और फिर सपना साकार हुआ, अपने विचारों को विद्यार्थियों से साझा किया।
पांचवें सत्र में प्रमुख अतिथि इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरी ईस्टर्न रीजन के प्रमुख सुधीर भरतिया ने अपने विद्यार्थी काल के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने वेबसीरीज स्कैम 1992 का भी जिक्र किया। छठें सत्र में एबीपी ग्रुप के डायरेक्टर शास्वत चक्रवर्ती और लोकप्रिय रेडियो जॉकी जिम्मी टेंगरी प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के कॉमर्स विभाग के डीन प्रो सिद्धार्थ शंकर साहा ने अपने वक्तव्य में वर्तमान समय में मैनेजमेंट का महत्व और उसके व्यापक आयामों की चर्चा की और हार्दिक शुभकामनाएं दीं। प्रथम पांच उच्चतम अंक प्राप्त विद्यार्थियों को सम्मानित किया। सुचैता मुंशी साहा, सुपर्णा मुखर्जी, सोमी चटर्जी की टीम ने लोक नृत्य एवं ओडिसी आदि नृत्य प्रदर्शन प्रस्तुति दी।  खुशाली गांधी ने अंग्रेजी में कार्यक्रम की रिपोर्ट लिखी और संचालन दीप्ति पंचारिया और हर्ष दवे ने किया। कार्यक्रम में गांधी जी के प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए जी पीर पराई जाने रे की धुन से सभागार गूंजता रहा। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।