Thursday, July 2, 2026
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देश प्रेम की राह से ही गुजरता है कवि गुरु का विश्व प्रेम

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

रवीन्द्रनाथ…विश्वकवि…कवि गुरु और बंगाल के प्राण हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर। रवीन्द्रनाथ के एक विचार को लेकर कहा जाता है कि उन्होंने मानवता को देश प्रेम से अधिक महत्व दिया…लेकिन लोग यह बताना भूल जाते हैं कि कवि गुरु की मानवता और विश्व प्रेम देश प्रेम के मार्ग से होकर ही गुजरते हैं। रवीन्द्रनाथ ने कभी देश प्रेम का विरोध नहीं किया…जो लोग यह कहते हैं कि वे उग्र राष्ट्रवाद के विरोधी थे…उनको एक बार महाजाति सदन जरूर देखना चाहिए जिसका शिलान्यास उन्होंने किया था और इस महाजाति सदन की स्थापना के पीछे किसी और का नहीं बल्कि हमारे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की ही परिकल्पना और योगदान था। रवीन्द्रनाथ 12 वेलिंग्टन स्क्वायर पर स्थित राजा सुबोध मलिक बासु के घर आते थे और यहीं आया करते थे अरविंद घोष…जो कि उस समय क्रांतिकारी विचारधारा से ही प्रेरित थे और इसी दिशा में काम भी कर रहे थे। रवींद्रनाथ संभवतः ऐसे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देशी और विदेशी साहित्य दर्शन संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है।
रवीन्द्रनाथ को गाते हुए हम बड़े हुए…काबुलीवाला कहानी हम सबने पढ़ी है…उसमें भी देश प्रेम अप्रत्यक्ष रूप से दिख सकता है…काबुली वाले की तड़प में काले पानी की सजा पाने वाले क्रांतिकारियों की व्यथा सी दिख पड़ती है मुझे। इस बार के बंगाल चुनाव में जिस तरह से ‘खेला होबे’ और ‘खेला शेष होबे’ के नारे उछले…जिस तरह से जय बांग्ला के राग बेसुरा किया गया…उसने मन को विचलित कर दिया है…सोचती हूँ…ऐसे नारों पर कवि गुरु की क्या प्रतिक्रिया होती, वो कवि जिसने अपने सृजन संसार में पूरे विश्व को समाहित कर लिया….वह जिसने पूरे विश्व को अपनाया…जिसने यह तक कह दिया कि “जब तक जिंदा हूं, मानवता के ऊपर राष्ट्रभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।”….उन पर क्षेत्रीयता का बोझ लाद दिया गया,…किसी भी बड़े व्यक्तित्व से प्रेरित होना कोई बड़ी बात नहीं…हम सब होते हैं…तभी तो गाँधी का चरखा देश में चल पाया…मगर आज उसी राज्य में जब इस प्रेरणा में कटाक्ष खोजा जाता है तो मन डूबकर फिर से कवि गुरु को खोजना चाहता है….इसीलिए आज पहली बार मैं लिख भी रही हूँ…रवीन्द्र संगीत को गाने के लिए भी पहले उसे पढ़ना पड़ता है…समझना पड़ता है…स्कूल के दिनों से ही रवीन्द्र संगीत गाती आ रही हूँ और कॉलेज में तो समझा भी…संगीत सीखते हुए भी रवीन्द्र संगीत गाया…’तुमि कैमोन करे गान…करो हे गुनि’…मुझे तो कभी नहीं लगा कि रवीन्द्र सिर्फ बंगाल के हैं और मैं बिहार से हूँ,,’अबांगाली’ हूँ इसलिए मेरा रवीन्द्रनाथ पर कोई अधिकार नहीं,,,,हम सबको सिखाते हुए कभी भी हमारी शिक्षिकाओं ने यह भेद नहीं किया…फिर वह कौन लोग हैं जो हमारे कवि गुरु को अपनी संकीर्णताओं में लपेट लेना चाहते हैं..?


इस देश ने भगवा वस्त्रों में आध्यात्मिकता खोजी है….आप रक्त खोज लेते हैं.. आपको राम से चिढ़ है…ठाकुर के तो नाम में ही राम है…रामकृष्ण परमहंस…भगवा स्वामी विवेकानंद समेत कई विभूतियों का गौरव है…उसे राजनीतिक हथियार बना देने का अधिकार आपको किसने दे दिया….जब लिख रही हूँ तो बादल छाए हैं….और गीत याद आ रहा है….मन मोरो मेघेर संगी….बादल की भी कोई जाति या राज्य होता है भला…कविगुरु समेत अन्य विभूतियाँ भी तो इन बादलों की तरह ही हैं….साहित्य का अमृत बरसाती हैं…समुद्र मंथन से निकला अमृत अगर समुद्र में रह जाता तो क्या होता इस संसार का….इसी तरह रवीन्द्र का गौरव अगर बंगाल तक ही रह जाए..गाँधी गुजरात तक ही रह जायें…दिनकर बिहार तक ही रह जायें तो क्या होगा इस देश का…इस देश की संस्कृति का?
भारत के राष्ट्रगान को लेकर भी कहा जाता रहा है कि यह जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा गया है…जो भी हो…जो चयनित अंश हमारे संविधान में स्वीकृत है…वह हमारा गौरव है मगर इन पंक्तियों को देखें –
रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि
पूरब-उदय-गिरि-भाले,
साहे विहन्गम, पून्नो समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
यहाँ राजेश्वर का सम्बोधन किसके लिए है…यह जानने की प्रबल इच्छा है…इन पंक्तियों को देखिए –
‘আমার সোনার বাংলা, আমি তোমায় ভালোবাসি।
চিরদিন তোমার আকাশ, তোমার বাতাস, আমার প্রাণে বাজায় বাঁশি।

आमार सोनार बांग्ला, आमि तोमाय भालोबासि
चिरदिन तोमार आकाश, तोमार बाताश, आमार प्राणे बाजाय बांशि।
क्या इसमें आपको स्वदेश प्रेम नहीं दिखता….निश्चित रूप से बंगाल की वंदना है इन पंक्तियों में, लेकिन रवीन्द्र देश की बात भी करते हैं…
‘ও আমার দেশের মাটি, তোমার ‘পরে ঠেকাই মাথা।
তোমাতে বিশ্বময়ীর তোমাতে বিশ্বমায়ের আঁচল পাতা।
তুমি মিশেছ মোর দেহের সনে, তুমি মিলেছ মোর প্রাণের সনে,
তোমার ওই শ্যামলবরণ কোমল মূর্তি মর্মে গাঁথা।
ওগো মা, তোমার কোলে জনম আমার, মরণ তোমার বুকে।’

– ओ आमार देशेर माटि, तोमार परे ठेकाई माथा।
तोमाते विश्वमयीर तोमाते, विश्व मायेर आंचल पाता।
तुमि मिशेछो मोर देहेर सने, तुमि मिलेछो मोर प्राणेर सने,
तोमार ओई श्यामल वरण कोमल मूर्ति मर्मे गाँथा।
ओ गो मा, तोमार कोले जनम आमार, मरण तोमार बूके।

मातृ भूमि को माँ कहकर कवि गुरु ने अनेक गीत लिखे हैं और मातृभूमि का गौरव गान किया है…कवि विश्व से प्रेम अवश्य करते हैं मगर उनका यह प्रेम देश और मातृभूमि की वन्दना से होकर गुजरता है। एक उक्ति को लेकर उसका सन्दर्भ बिगाड़ देना भी अपराध ही है जो कि तथाकथित बुद्धिजीवी न जाने कब से करते आ रहे हैं। इन पंक्तियों को देखिए –
‘সার্থক জনম আমার জন্মেছি এই দেশে।
সার্থক জনম, মা গো তোমায় ভালোবেসে।
জানিনে তোর ধনরতন আছে কিনা রাণীর মতন;
শুধু জানি আমার অঙ্গ জুড়ায় তোমার ছায়ায় এসে।
কোন বনেতে জানি নে ফুল গন্ধে এমন করে আকুল,
কোন গগনে ওঠে রে চাঁদ এমন হাসি হেসে।
আঁখি মেলে তোমার আলো প্রথম আমার চোখ জুড়ালো,
ওই আলোতেই নয়ন রেখে মুদব নয়ন শেষে

सार्थक जनम आमार जन्मेछि ऐई देशे
सार्थक जनम, माँ गो तोमा. भालोबेसे
जानिने तोर धनरतन आछे किना रानीर मतन
शूधू जानि आमार अंग जुड़ाय तोमार छाया एशे।
कोन गगने उछे रे चाँद एमन हासि हेंसे।
आँखि मेले तोमार आलो प्रथम आमार चोख जुड़ालो,
ओई आलोतेई नयन रेखे मूदेर नयन शेषे।

रवीन्द्रनाथ जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड की उपाधि लौटा दी…जिन्होंने बंग भंग के विरोध में राखी बन्धन किया…उन रवीन्द्रनाथ को बंगाल और गुजरात में बाँटने चले हैं आप…लज्जा नहीं आती…? रवीन्द्रनाथ वह हैं जो असहमतियों को सम्मान देते रहे…महात्मा गाँधी से भी उनकी असहमतियाँ रहीं मगर एक दूसरे को दोनों ने सम्मान दिया…गाँधी उसी गुजरात से आते हैं जिनकी प्रतिमा के नीचे बैठकर आमरण अनशन होते हैं..आज उसी गुजरात की आलोचना करते आप नहीं थकते। यहाँ न्यूज क्लिक वेबसाइट पर मिले प्रदीप सिंह के एक आलेख का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है। लेखक कहते हैं, ‘टैगोर और गांधी के विचार, व्यवहार और समझ में जमीन-आसमान का अंतर था। दोनों का यह रिश्ता बराबरी का नहीं एक ‘शिक्षक’ और एक ‘छात्र’ के संदर्भ में है।
टैगोर एक उत्कृष्ट कवि थे जो ‘गुरुदेव’ के नाम से जाने जाते हैं और मोहनदास करमचंद गांधी ‘महात्मा गांधी’ के रूप में लोकप्रिय हुए। आइए हम यह देखते हैं कि आधुनिक भारत के दो महान शख्सियतों को ‘गुरुदेव’ और ‘महात्मा’ का पदनाम कैसे मिला ?

गांधी जी जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े तब यह आंदोलन नेतृत्वहीनता का शिकार था। अरबिंदो घोष और बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रीय आंदोलन से दूर जाने से देश की राजनीति में एक शून्य आ गया था। दरअसल, अलीपुर बम कांड के बाद अरविंदो घोष ने सक्रिय राजनीति से हट कर आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। लंबे समय से स्वराज का अलख लगाते-लगाते तिलक का निधन हो गया था।

इस परिदृश्य का चित्रण करते हुए काकासाहेब कालेलकर लिखते हैं, “एक अंधकारमय और निराशावादी समय”, “भ्रम की एक गहरी अवधि” ने और “निराशा” को जन्म दिया। इसी समय रबींद्रनाथ टैगोर की नजर गांधी पर आकर टिक गयी। जब टैगोर ने इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए गांधी को चुना था, तो वह भी केवल इसलिए की उनके सामने उपलब्ध विकल्पों में शायद वह सबसे बेहतर थे।

यह टैगोर ही हैं जिन्होंने गांधी के लिए ‘महात्मा’ शब्द का प्रयोग किया था। टैगोर ने स्पष्ट किया, “‘महात्मा एक स्वतन्त्र आत्मा को संदर्भित करता है जो स्व अब व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्व है जिसमें सभी शामिल हैं” लेकिन जब टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ कहा, तो वे अभी तक एक मुक्त आत्मा नहीं थे। इसलिए ‘महात्मा’ शब्द की व्याख्या करते हुए गांधी का वर्णन नहीं था क्योंकि वे उस समय तक ‘महात्मा’ होने के बिंदु पर थे, लेकिन अभी महात्मा बनने के लिए उन्हें अपनी क्षमताओं का और अधिक विकास करना था।गांधी ने टैगोर द्वारा दिए गए इस पदनाम पर खरा उतरने की उम्मीद के बीच अपने को असमर्थ महसूस किया और टैगोर की मदद मांगी। उन्होंने टैगोर को ‘गुरुदेव’ के नाम से संबोधित करते हुए कहा कि यदि वे चाहते हैं कि ‘गांधी’ महात्मा’ बने तो उन्हें गांधी का ‘गुरु’ बनना होगा। इस प्रकार गांधी का ‘महात्मा’ बनना गांधी और टैगोर का एक संयुक्त प्रयास था।
जब पूना में आमरण अनशन के दौरान गांधी की तबीयत खराब हो गई, तो टैगोर उनसे मिलने के लिए शांतिनिकेतन से पूना पहुंचे थे। जब गांधी ने उपवास तोड़ा, तो उनके सचिव, महादेव देसाई ने टैगोर से गांधी की पसंद की गीतांजलि की एक कविता सुनाने का अनुरोध किया। बाद में टैगोर ने बताया कि गांधी की उपस्थिति में, वह उस धुन को भूल गए थे जिसमें उन्होंने मूल रूप से कविता की रचना की थी, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे गाया।
गांधी और टैगोर विचार औऱ व्यवहार के दो भावभूमि पर खड़े थे। लेकिन दोनों का सपना एक था। वह सपना देश को पराधीनता की बेड़ी से मुक्त करके भौतिक संसाधनों से युक्त और आद्यात्मिकता से सराबोर देश बनाना था। साझा स्वप्न को साकार करने के लिए दोनों महापुरुष एक दूसरे के करीब आए। यहां विचार कभी आड़े नहीं आया। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए तो महज चुनाव जीतने के लिए विचार परिवर्तन और भिन्न मत रखने वालों पर तीखे हमले किए जा रहे हैं। जबकि दोनों पक्षों का दावा देशहित होता है।’
आपको जिस हिन्दी से शिकायत है…और जिसे लेकर आप अपनी भाषा के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं….कवि गुरु ने उस भाषा के महत्व को समझा और यही कारण है कि विश्व भारती में एक हिन्दी भवन भी स्थापित हुआ। रवीन्द्र नाथ कहा करते थे, “शान्ति निकेतन को समस्त जातिगत तथा भौगोलिक बन्धनों से अलग हटाना होगा, यही मेरे मन में है। समस्त मानव-जाति की विजय-ध्वजा यहीं गड़ेगी। पृथ्वी के स्वादेशिक अभिमान के बंधन को छिन्न-भिन्न करना ही मेरे जीवन का शेष कार्य रहेगा।” यही हिन्दी भवन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कार्यक्षेत्र रहा…उस हिन्दी को अपमानित करना क्या कविगुरु के विचारों का अपमान करना नहीं है?
अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए टैगोर ने 1921 में शान्तिनिकेतन में ‘यत्र विश्वम भवत्येकनीडम’ (सारा विश्व एक घर है) के नए आदर्श वाक्य के साथ विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) को मान देते हुए 1935 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट उपाधि से अलंकृत किया। इस आयोजन के बाद वह प्रयागराज चले गए थे। तब महामना मदन मोहन मालवीय ने स्वयं पत्र लिखकर गुरुदेव को काशी बुलाया था। रवींद्रनाथ टैगोर ने 1888 में छह महीने तक प्रवास किया और यहां का छोटा सा इतिहास भी लिखा। यहीं पर मानसी की अधिकांश कविताएं व नौका डूबी के कई अंश लिखे। उनके प्रवास स्थान पर एक पार्क है। रवींद्र नाथ टैगोर अपने दूर के रिश्तेदार गगनचंद्र राय के यहां गोराबाजार आवास पर ठहरे थे। यहां रहते गुरुदेव की घनिष्टता एक अंग्रेज सिविल सर्जन से हो गई। रवींद्रनाथ अपनी कविताओं का अनुवाद उन्हें सुनाया करते थे। गुरुदेव यहां लार्ड कार्नवालिस समाधि उद्यान में शाम को घूमने जाया करते थे।
चलिए हमने तो कवि गुरु पर अपनी बात कही….लगे हाथों आप भी बता दीजिए कि आपने प्रसाद, निराला, तुलसी, सूर…कबीर को कितना पढ़ा है…बांग्ला में प्रेमचंद को छोड़कर कितने साहित्यकारों को सम्मान मिलता है,,,,क्या आप भी हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को वैसे ही सेलिब्रेट करते हैं,,,,जैसे हम रवीन्द्रनाथ को कर रहे हैं,,,,और करते रहेंगे….। मुझे लगता है कि किसी देश का होने के लिए उस देश का जन्म लेना ही काफी नहीं है…उस देश को समझना..और अपना बनाना जरूरी है,…तभी तो सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन और मदर टेरेसा से लेकर फादर कामिल बुल्के को हम उतना ही सम्मान देते हैं..।
आप बात तो विश्व को गाँव बनाने की करते हैं मगर सत्य यह है कि अपनी कुंठाओं के गाँव को आपने दुनिया समझ लिया है। आप चाहते हैं कि आपकी भाषा, आपकी संस्कृति का जयगान हो और आप श्रेष्ठता का दर्प लिये घूमते रहें,.,,,सम्मान एक हाथ से नहीं मिलता,,,सम्मान पाने के लिए पहले सम्मान देना पड़ता है…हमारे लिए कवि गुरु, नेता जी की पहचान इसलिए नहीं है कि वे बंगाल में जन्मे,,,,वह हमारे मन में इसलिए हैं कि उन्होंने खुद को एक क्षेत्र में सीमित नहीं रखा,,,बल्कि इस भारत देश को ,,,समूचे विश्व को अपना लिया….वह कुंठित लोग नहीं थे…नेता जी ने “कोलकाता चलो’ का नारा नहीं दिया…”दिल्ली चलो’ कहा…इसलिए इस देश के लोकगीतों में वह अब तक बसे हुए हैं….ये लोग आपकी कुंठाओं से बहुत ऊपर हैं…उनको समझना पड़ता है…समझ भाषा, जाति, संस्कृति….क्षेत्र नहीं देखती…देखती तो कार्ल मार्क्स आपके पुरोधा न होते…कवि गुरु बंगाली अस्मिता से अधिक भारतीय वसुधेव कुटुम्बकम के परिचायक हैं,….अब जाते – जाते द्विजेन्द्रलाल राय का एक गीत भी आपके लिए
দ্বিজেন্দ্রলাল রায়
ধনধান্য পুষ্পভরা
ধনধান্য পুষ্পভরা আমাদের এই বসুন্ধরা;
তাহার মাঝে আছে দেশ এক- সকল দেশের সেরা;
সে যে স্বপ্ন দিয়ে তৈরি সে দেশ স্মৃতি দিয়ে ঘেরা;
এমন দেশটি কোথাও খুঁজে পাবে নাকো তুমি,
সকল দেশের রানী সে যে-আমার জন্মভূমি।

धनधान्य पुष्पभरा आमादेर एई वसुन्धरा
ताहार माझे आछे देश एक..सकल देशेर शेरा
शे जे स्वप्न दिये तेरि से देश स्मृति दिये घेरा
एमन देशटि कोथाओ खूँजे पाबे नाको तूमि,
सकल देशेर रानी से जे, आमार जन्मभूमि

स्त्रोत साभार

संस्कृत श्लोकों में अभिव्यक्त करें माँ के प्रति प्रेम

1
. ‘यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरितकी।’
(अर्थात, हरीतकी (हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली होती है।)

2. ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।’
(अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।)

3. ‘माता गुरुतरा भूमेरू।’
(अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।)

4. ‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’
(अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।)

5. ‘मातृ देवो भवः।’
(अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।)

6. ‘अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः
मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।’

(भावार्थः जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।)

7. ‘माँ’ के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है-
‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।’

(अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।)

8. ‘रजतिम ओ गुरु तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।’

(अर्थात, जिस प्रकार संसार में पाँच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पाँच प्रकार की माँ होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।)

9. ‘स्त्री ना होती जग म्हं, सृष्टि को रचावै कौण।
ब्रह्मा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन।
एक ब्रह्मा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।’

(अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।)

10. आपदामापन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् ।
मातृजङ्घा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥

(भावार्थ- जब विपत्तियां आने को होती हैं, तो हितकारी भी उनमें कारण बन जाता है । बछड़े को बांधने मे माँ की जांघ ही खम्भे का काम करती है ।)

11. नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥

(भावार्थ-माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस विश्व में कोई जीवनदाता नहीं॥)

(साभार – टाइम्स नाऊ)

माँ

  • निखिता पांडेय

जो अपने गर्भ में नौ माह तक रखती है,वह है मां
जो उंगली पकड़ कर चलना सीखाये,वह है मां
जो पहली बार मुख से बोलना सीखाये,वह है मां
जो गिरने पर डांट लगाये,वह है मां
जो अपनी संतान को सबसे पहले खाना खिलाये,वह है मां
जो घर में सबसे देर से खाये,वह है मां
जो सबकी डांट सुनकर रह जाये,वह है मां
जो सुबह से रात तक काम करे,वह है मां
जो त्याग और समर्पण की देवी है,वह है मां
जो निस्तब्ध रहकर कुछ न बोले,वह है मां
जो अपने बच्चे के घर लौटने का इंतज़ार करे,वह है मां
जो नि:स्वार्थ प्रेम करे,वह है मां
जो बिना बोले मन की बात समझ जाये,वह है मां
मां वह संसार है,जो न हो तो जीवन व्यर्थ है और
जो दर्द सहकर भी मुस्कुराये,वह है मां।

‘ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे’

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, उम्मीद है कि आप सब ठीक होंगी या ठीक ठाक रहने की कोशिश जरूर कर रही होंगी।। सखियों इन दिनों हमारे चारों ओर नाउम्मीदी, निराशा और हताशा की ऐसी लहर छाई है कि मन पर हमेशा उदासी सी पसरी रहती है। समाचार चैनल हों या अखबार या फिर सोशल मीडिया हर तरफ गुहार और चीख पुकार सी मची हुई है। लोग रोज दर रोज सैकड़ों की संख्या में बीमार हो रहे हैं और उनमें से बहुत से लोग जिंदगी की लड़ाई में हार भी जा रहे हैं। सखियों, यह स्थिति सच में बेचैन करने वाली है। हम चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते। कई मर्तबा बस सर पटक कर रह जाते हैं। हमारे अपने, हमारी आंखों के सामने से इस तरह से मौत के आगोश में समा जा रहे हैं कि लगता है जैसे किसी ने गाल पर थप्पड़ लगाकर हमारा सब कुछ हम से भरे बाजार लूट लिया हो। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों इतनी लचर हो चुकी है कि जिनकी जेब में पैसा है, वह भी डॉक्टर और दवाई के अभाव में दम तोड़ने को विवश हैं। और गरीब लोग तो दोहरी मार झेल रहे हैं। उन्हें तो हर हाल में पिसना है, या तो रोजी रोजगार के घटते या खत्म होते अवसरों के कारण रोटी के अभाव में या फिर दवाइयों की कालाबाजारी के कारण उनके अभाव में। ऐसा लगता है कि एक लंबी अंधेरी सुरंग से हम गुजर रहे हैं। हाथ को हाथ नहीं सुझाई देता। दिमाग को उपाय नहीं दिखाई देता और यह सुरंग है कि खत्म होने में नहीं आती। बीमारी की लहर पहली हो दूसरी या फिर तीसरी, इस तरह लोगों के प्राणों को अपने साथ समेट कर ली जा रही है जैसे कोई चोर रातों रात घर भर के ही नहीं देश भर के तमाम कीमती सामानों पर हाथ साफ कर दे। ऐसे में आदमी का नाउम्मीद होना स्वाभाविक ही है लेकिन सखियों, उम्मीद का दामन छोड़कर हम कैसे और कब तक जी पाएंगे। उम्मीद के डूबने का मतलब है जीते जी मौत को स्वीकार कर लेना, इसलिए लड़ना तो जरूरी है और लड़ेंगे हम तभी जब हमारे मन में उम्मीद की शिखा रौशन रहेगी। कहते हैं, रात कितनी भी गहरी क्यों ना हो सूर्य की किरणें उसके तमाम अंधकार को सोख लेती हैं इसीलिए हमें भी अपने मन में उस किरण की प्रतीक्षा की उम्मीद को जिलाए रखना है और जितना हो सके प्रेरक साहित्य, सकारात्मक संगीत या सृजनात्मक कलाओं में जीवन की उम्मीद को ढूंढकर, उसे बचाए रखने की कोशिश करनी है। शाम कितनी भी बुझी बुझी या उदास क्यों न हो ढलती जरूर है। इसीलिए तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने उम्मीद की लौ को जलाए रखते हुए कहा-

“दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है 

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है ।।

सकारात्मक ऊर्जा की तलाश में साहित्य की शरण में जाने पर हम पाते हैं कि हमारे साहित्यकार तो अपनी ओज और उत्साह भरी रचनाओं के माध्यम से हमारे मन की निराशा को छांट कर उसमें बड़े‌ यत्न और कौशल से आशा का दीपक जलाकर हमारे मन को मुरझाने से बचा लेते हैं। कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता की ये पंक्तियां तो हताशा से बोझिल मन को यकीनन नया जीवन देती हैं-

“उठी ऐसी घटा नभ में

छिपे सब चाँद और तारे,

उठा तूफ़ान वह नभ में

गए बुझ दीप भी सारे,

मगर इस रात में भी लौ लगाये कौन बैठा है?

अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है?”

इस दीपक की लौ को हमें जलाए रखने की कोशिश जरूर करनी चाहिए क्योंकि गम की शाम को तो ढलना ही है और सूरज की किरण को चमकना ही है। नरेश कुमार “शाद” के शब्दों में कहूं तो-

“इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो 

मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो ।।

सखियों, समय कैसा भी हो, बहुत दिनों तक नहीं रहता, वह चाहे सुख का हो या दुख का। तो थोड़ा धीरज तो हमें धरना ही होगा। धैर्य से हम बड़ी से बड़ी मुश्किलों का सामना भी कर‌ लेते हैं लेकिन निराशा और हताशा का शिकार होकर हम जीती हुई बाजी भी हार देते हैं। हताशा, स्वयं एक बड़ा रोग है इसीलिए हमें सावधान रहना है कि कहीं यह हमारे मन को अपनी गिरफ्त में लेकर हमारी आशा की लौ को मंद ना कर दे। यह आपदा का समय है और हमारी कठिन परीक्षा लेने पर तुला हुआ है। उम्मीद और नाउम्मीदी में जंग छिड़ी हुई है। हमें अपने मन को बड़े यत्न से साधना है ताकि उम्मीद हारने ना पाए क्योंकि वही हमारी सांसों की रफ्तार को संभालें रखती है। इसी बात को फ़ानी बदायुनी कुछ यूं बयां करते हैं-

“नाउमीदी मौत से कहती है अपना काम कर 

आस कहती है ठहर ख़त का जवाब आने को है।। 

सखियों, आज हम सबका यह फर्ज बनता है कि सिर्फ अपने बारे में न सोचें बल्कि पूरे समाज के बारे में सोचें और सब को उम्मीद की डोर में बांधने की कोशिश करें। इस समय सामूहिकता की बहुत जरूरत है। हमें एक दूसरे को हौसला देना है, एक दूसरे की हिम्मत बंधानी है और इस अंधेरी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता साथ मिलकर तलाशना है। अपने -अपने अंधेरे से अकेले लड़ने की जगह एक साथ मिलकर इस नाउम्मीदी के अंधेरे को हराना है। सामूहिकता में बड़ी शक्ति होती है और इस बात को समझने की जरूरत हर इन्सान को है। शहरयार इसी बात पर बल देते हुए कहते हैं-

“अब रात की दीवार को ढाना है ज़रूरी 

ये काम मगर मुझ से अकेले नहीं होगा ।।

आइए, हम सब मिलकर इस महामारी की आंधी का सामना करें और यकीन रखें कि आंधी कितनी भी तेज या विध्वंशक क्यों ना हो, इंसान उससे निपटकर जीने और हजारों बार‌ उजड़ने ओर बिखरने के बावजूद फिर से नव सृजन या नयी शुरुआत का हौसला जुटा ही लेता है। भरोसा रखिए, ये दुख और विनाश के दिन भी समाप्त होंगे ही। बस हमें सावधानीपूर्वक, धैर्य और उम्मीद का दामन थामकर इस समय को झेल लेना है। हमारी उम्मीद बची रही तो फिर से सुख के दिन अवश्य आएंगे, यही बात हमारा साहित्य भी कहता है-

“शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे 

ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे।।”

 

दिहाड़ी मजदूर की पत्नी चंदना बाउरी बनीं विधायक

कोलकाता :  बंगाल विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा का प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा हो,  लेकिन पार्टी की एक महिला विधायक की जीत खूब चर्चा में है। एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी 30 वर्षीय चंदना बाउरी के विधानसभा पहुंचने की कहानी से हर कोई हैरान है। भाजपा के टिकट पर बांकुड़ा जिले की सालतोड़ सीट से चुनाव लड़ने वाली चंदना बाउरी ने 4,000 वोटों से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार संतोष कुमार मंडल को शिकस्त दी है। एक झोपड़ी में रहकर गुजर करने वालीं चंदना की कहानी इंटरनेट मीडिया पर भी वायरल हो रही है। चंदना बाउरी की जीत इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि वो एक साधारण परिवार से आती हैं और संपत्ति के नाम पर उनके पास एक झोपड़ी और कुछ पैसे हैं। भाजपा नेता सुनील देवधर ने ट्वीट कर जानकारी दी कि चंदना बाउरी की जमापूंजी कुल 31,985 रुपये है। उन्होंने बताया कि चंदना अनुसूचित जाति से आती हैं, झोपड़ी में रहती हैं, वह एक मजदूर की पत्नी हैं और संपत्ति के नाम पर उनके पास तीन गाय और तीन बकरियां हैं। चुनाव आयोग में दिए गए शपथ पत्र में चंदना के बैंक खाते में सिर्फ 6335 रुपये हैं। संपत्ति के नाम पर चंदना के पास तीन गाय, तीन बकरी, एक झोपड़ी और बैंक में जमा नकद मिलाकर कुल 31,985 रुपये हैं। चंदना के घर में शौचालय भी नहीं है। पार्टी के प्रति वह इतनी ज्यादा समर्पित थीं कि प्रचार के लिए रोजाना कमल के प्रिंट वाली भगवा रंग की साड़ी पहनकर निकलती थीं।बताया जा रहा है कि चंदना बाउरी के पति श्रबन मजदूरी करते हैं। वह राजमिस्त्री का काम करते हैं। पति और पत्नी दोनों मनरेगा में पंजीकृत मजदूर हैं। उनके तीन बच्चे भी हैं। चंदना पिछले सात-आठ साल से भाजपा से जुड़ी हुई हैं। चंदना अपने क्षेत्र में लोगों के बीच गईं और भाजपा की खूबियां गिनाते हुए तृणमूल पर हमला बोला। वह गंगाजलघाटी के केलाई गांव स्थित अपने घर से रोजाना सुबह आठ बजे चुनाव प्रचार के लिए निकलती थीं। उन्होंने लोगों से महिला संबंधी अपराधों, गरीबी, शिक्षा और पीने के पानी जैसे मुद्दों पर वोट मांगा।

तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी

कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हैट्रिक जीत दर्ज करने वालीं टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी एक बार फिर से राज्य की मुख्यमंत्री बन गई हैं। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के तौर पर आज यानी बुधवार को लगातार तीसरी बार राजभवन में शपथ ग्रहण किया। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ममता बनर्जी को राज्यभवन में मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। बताया जा रहा है कि शपथ ग्रहण समारोह के लिए पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, निवर्तमान सदन के नेता प्रतिपक्ष अब्दुल मन्नान और माकपा के वरिष्ठ नेता बिमान बोस को कार्यक्रम का निमंत्रण भेजा गया था। ममता बनर्जी ने एक दशक से अधिक पहले सिंगुर और नंदीग्राम में सड़कों पर हजारों किसानों का नेतृत्व करने से लेकर आठ साल तक राज्य में बिना किसी चुनौती के शासन किया। आठ साल के बाद उनके शासन को 2019 में तब चुनौती मिली जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में 18 सीटों पर अपना परचम फहरा दिया। ममता बनर्जी (66) ने अपनी राजनीतिक यात्रा को तब तीव्र धार प्रदान की जब उन्होंने 2007-08 में नंदीग्राम और सिंगूर में नाराज लोगों का नेतृत्व करते हुए वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ राजनीतिक युद्ध का शंखनाद कर दिया और सत्ता में आईं। 292 सीटों (2 सीटों पर चुनाव नहीं हुए) में से तृणमूल  के खाते में 213 सीटें गईं, जबकि भाजपा को 77 सीटें मिली हैं।

रिक्शा चालक मनोरंजन व्यापारी बने विधायक

बचपन शरणार्थी शिविर में बीता, बहन भूख से मरी

लेखिका महाश्वेता देवी से मुलाकात ने बदली जिंदगी

प्रभाकर मणि तिवारी

कोलकाता :  देश के विभाजन के बाद छह साल की उम्र में एक बच्चा बंगाल के शरणार्थी शिविर में पहुंचता है। बचपन इतना मुश्किल कि चाय की दुकानों में काम करना पड़ा, मजदूरी करनी पड़ी। यह बच्चा थोड़ा बड़ा होता है तो बंगाल के तत्कालीन नक्सलबाड़ी आंदोलन का हिस्सा बन जाता है। लंबे समय तक जेल में रहता है, लेकिन वहां से भी मोहभंग होता है। फिर जादवपुर विश्वविद्यालय के सामने हाथ रिक्शा चलाने लगता है।

यह सब तो हुईं पुरानी बातें। ताजा जानकारी यह है कि मनोरंजन व्यापारी नाम का हाथ रिक्शा खींचने वाला वह व्यक्ति तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीतकर विधायक बन चुका है। बहुत उम्मीद है कि ममता की आने वाली सरकार में उसे मंत्री भी बनाया जाए। रिक्शा वाले से लेकर माननीय विधायक हो चुके मनोरंजन व्यापारी की उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी को अब जरा तफसील से जानते हैं। हुगली की बालागढ़ सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान मनोरंजन व्यापारी। मनोरंजन देश के बंटवारे के बाद छह साल की उम्र में पश्चिम बंगाल आए और बांकुड़ा के शरणार्थी शिविर से अपनी जिंदगी शुरू की। फोटो- संजय

बहन को अपनी आंखों के सामने भूख से दम तोड़ते देखा था
देश के विभाजन के करीब छह साल बाद 1953 में मनोरंजन अपने परिवार के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बरीशाल (अब बांग्लादेश में) से पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा स्थित शरणार्थी शिविर में पहुंचे थे। कुछ दिनों बाद ही उन लोगों को दंडकारण्य जाने निर्देश दिया गया, लेकिन मनोरंजन के पिता ने वहां जाने से मना कर दिया। उसके बाद शुरू हुआ संघर्ष का अंतहीन सिलसिला। मनोरंजन छोटी उम्र में ही चाय की दुकान पर काम करने लगे।

मनोरंजन बताते हैं कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने भूख से बड़ी बहन को दम तोड़ते देखा। उसके बाद दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, गुवाहाटी, लखनऊ और बनारस जैसे शहरों में जाकर बेगारी की, लेकिन कहीं मन नहीं रमा तो कोलकाता लौट आए। साठ के दशक में पश्चिम बंगाल में जब नक्सली आंदोलन चरम पर था, तो वह भी इससे जुड़े थे। 26 महीने जेल में बिताने पड़े, लेकिन नक्सल नेताओं की कार्यशैली को देखकर उनका मोहभंग हो गया। जेल से बाहर आने के बाद वे कोलकाता के जादवपुर रेलवे स्टेशन के सामने रिक्शा चलाने लगे।

मनोरंजन बांग्ला साहित्य लेखन में जाना-पहचाना नाम हैं। वे बताते हैं कि कोलकाता में रिक्शा चलाते हुए उनकी मुलाकात बांग्ला की महान लेखिका महाश्वेता देवी से हुई। उन्होंने ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। फोटो- संजय
मनोरंजन बांग्ला साहित्य लेखन में जाना-पहचाना नाम हैं। वे बताते हैं कि कोलकाता में रिक्शा चलाते हुए उनकी मुलाकात बांग्ला की महान लेखिका महाश्वेता देवी से हुई। उन्होंने ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। फोटो- संजय

प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी से मुलाकात के बाद बन गए लेखक
यहीं रिक्शा चलाते समय एक दिन अचानक एक महिला सवारी से मुलाकात हुई और उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। वह महिला थी आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने वाली जानी-मानी लेखिका महाश्वेता देवी। मनोरंजन ने हिम्मत जुटाते हुए उस महिला यात्री से जिजीविषा शब्द का अर्थ पूछा। इससे वह महिला हैरत में पड़ गई। उसने शब्द का अर्थ तो बताया ही, रिक्शेवाले के अतीत के पन्ने भी पलटे।
महाश्वेता ने उस रिक्शा वाले से अपनी पत्रिका बार्तिका में अब तक के जीवन और संघर्ष की कहानी लिखने को कहा और उसे अपना पता भी बताया। वह वर्ष था 1981। मनोरंजन बताते हैं, ‘महाश्वेता देवी से उस मुलाकात ने मेरी जीवन की दशा-दिशा ही बदल दी। अगर उनसे मुलाकात और बात नहीं हुई होती तो मैं शायद अब तक रिक्शा ही चला रहा होता।’

दर्जनों पुस्तकें प्रकाशिक हो चुकी हैं
महाश्वेता देवी की पत्रिका में छपने के बाद धीरे-धीरे उनके लेख कई बांग्ला पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे और पूरा बंगाल उनको पहचानने लगा। नक्सल आंदोलन के दौरान जेल में रहने के दौरान एक कैदी और जेलर ने भी पढ़ने-लिखने की प्रेरणा दी। मनोरंजन का लिखना अलीपुर जेल से ही शुरू हो चुका था, लेकिन महाश्वेता से मुलाकात के बाद मनोरंजन बाकायदा साहित्यकार बन गए।

आखिर महाश्वेता देवी से जिजीविषा का अर्थ पूछने का ख्याल कैसे आया था? इस सवाल पर मनोरंजन कहते हैं, ‘मुझे लगा कि वे कोई प्रोफेसर होंगी। इसलिए हिम्मत जुटा कर पूछ लिया।’ महाश्वेता देवी का मनोरंजन के जीवन पर इतना गहर असर है कि उन्होंने अपनी पुत्री का नाम भी महाश्वेता ही रखा है।

वर्ष 1981 में लेखक-साहित्यकार के तौर पर शुरू हुआ उनका सफर अब कई ऊंचाइयां हासिल कर चुका है। इस दौरान उनकी आत्मकथा समेत दर्जनों पुस्तकें तो प्रकाशित हुई ही हैं, दर्जनों पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उनकी कई पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी हो चुका है। मनोरंजन की पुस्तकों में दलित वर्ग के संघर्ष नक्सल आंदोलन का विस्तार से जिक्र मिलता है। मनोरंजन पिछले साल तक बंगाल के एक सरकारी स्कूल में बच्चों के लिए खाना पकाने का काम करते थे। उनके अनुरोध पर ममता ने उनका ट्रांसफर लाइब्रेरी में कर दिया था और फिर उन्हें दलित अकादमी का अध्यक्ष भी बनाया गया। फोटो- संजय

ममता के टिकट देने के फैसले पर किसी को हैरत नहीं हुई थी
मनोरंजन कहते हैं, ‘मेरा बचपन जिन हालात में बीता है, उसमें मैंने यहां तक पहुंचने की कल्पना तक नहीं की थी। खासकर बीते एक साल के दौरान मेरा जीवन पूरी तरह बदल गया है। किताबें लिखते हुए एक सरकारी स्कूल में बच्चों के लिए खाना पकाना और उसमें से समय निकाल कर पुस्तकें लिखना मेरी दिनचर्या हो गई थी। अब मुझे इस बात का संतोष है कि विधायक बन कर मैं उस समाज को कुछ लौटाने के काबिल रहूंगा जिसने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब मैं खासकर दलितों और पिछड़े तबके के लोगों के लिए कुछ कर सकूंगा ताकि किसी और को वह सब नहीं झेलना पड़े जो मुझे झेलना पड़ा था।’

ममता बनर्जी ने जब तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची जारी की तो उसमें मनोरंजन का नाम देख कर किसी को खास हैरत नहीं हुई थी। इसकी वजह भी थी। ममता बनर्जी ने बीते साल ही उनको खाना पकाने के काम से हटा कर लाइब्रेरी में नियुक्त कर दिया था। उसके बाद सरकार ने जिस नई दलित अकादमी का गठन किया, उसका अध्यक्ष भी उनको ही बनाया गया।

रिक्शे पर जाकर पर्चा भरा, रिक्शे पर ही प्रचार
सड़क से सत्ता का सफर तय करने के बावजूद मनोरंजन अपना अतीत नहीं भूले हैं। उन्होंने रिक्शे पर जाकर ही अपना नामांकन पत्र दाखिल किया और ज्यादातर चुनाव अभियान भी रिक्शे पर ही किया। चुनाव अभियान के दौरान उनके समर्थकों का नारा था-एक रिक्शावाला अब विधानसभा पहुंचेगा। वे अपने हाथों में हमेशा एक अंगूठी पहने रहते हैं, जिस पर जिजीविषा शब्द लिखा है। इस बारे में वे बताते हैं, ‘एक बार मैंने बांग्ला की महान साहित्यकार महाश्वेता देवी से इसका अर्थ पूछा था। उन्होंने जिस अद्भुत तरीके से इसका अर्थ समझाया था, उसने एक लेखक के तौर पर मेरा पुनर्जन्म किया।’

आप आखिर चुनाव प्रचार या नामांकन पत्र दायर करते समय रिक्शा क्यों चला रहे थे? इस सवाल पर मनोरंजन कहते हैं, ‘देश में डीजल और पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसके प्रति विरोध जताने के लिए ही मैंने रिक्शा को चुना। रिक्शा मेरे जीवन का अभिन्न अंग रहा है। मैं इसे कैसे भूल सकता हूं?’

पश्चिम बंगाल में दलितों का चेहरा और आवाज बन चुके मनोरंजन अपने चुनाव प्रचार के दौरान लगातार कहते रहे थे, ‘मैं भी आपकी तरह ही एक सामान्य व्यक्ति हूं। सिर पर छत नहीं होने की वजह से मैंने अनगिनत रातें रेलवे प्लेटफार्म पर सोकर काटी हैं।’ मनोरंजन नामशूद्र समुदाय से आते हैं। भाजपा इस चुनाव में नामशूद्र वोटरों को सीएए के जरिए लुभाने की कोशिश कर रही थी क्योंकि बड़ी नामशूद्र आबादी को अभी स्थायी नागरिकता नहीं मिली है। ममता ने भाजपा की काट के लिए इस वर्ग में लोकप्रिय मनोरंजन को टिकट दिया था।

नामशू्द्र जाति के हैं मनोरंजन, भाजपा इस वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रही थी
दरअसल, मनोरंजन नामशूद्र जाति के हैं, जिसे दलित माना जाता है। इस समुदाय के ज्यादातर लोग बांग्लादेश से आए हैं और उनको अभी स्थायी नागरिकता नहीं मिली है। भाजपा ने ध्रुवीकरण और जातिगत पहचान की राजनीति के साथ इस समुदाय को लुभाने के लिए कहा था कि उसे सीएए के जरिए नागरिकता दी जाएगी। इसकी काट के तौर पर ही ममता ने मनोरंजन को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया था। बालागढ़ विधानसभा क्षेत्र में दलित तबके के अच्छे-खासे वोटर हैं। उन सबका समर्थन मनोरंजन को मिला और वे विधानसभा पहुंच गए।

वर्ष 1997 से दक्षिण कोलकाता के एक मूक बधिर स्कूल में छात्रों के लिए खाना पकाने वाले मनोरंजन बताते हैं, ‘बढ़ती उम्र, घुटनों में दर्द रहने और ऑपरेशन होने की वजह से खड़े होकर खाना पकाना मुश्किल हो गया था। इसलिए मैंने बीते साल ममता दीदी को अपने तबादले का अनुरोध करते हुए एक पत्र भेजा था। ममता ने तुरंत उसका संज्ञान लेते हुए लाइब्रेरी में ट्रांसफर कर दिया।’ उसके बाद बीते साल के आखिर में ममता ने जब दलित अकादमी के गठन का ऐलान किया तो मनोरंजन को ही उसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

मनोरंजन फिलहाल ममता दीदी के शपथ कार्यक्रम के लिए व्यस्त हैं। अपनी प्राथमिकता के बारे में वे कहते हैं कि कमजोर तबके के लिए काम करता रहा हूं, आगे भी करूंगा। इसके अलावा राज्य में एनआरसी और सीएए जैसे कानूनों का बड़े पैमाने पर विरोध जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो सरकार असम की तर्ज पर यहां भी दशकों पहले सीमा पार से आने वाले तमाम लोगों को डिटेंशन सेंटर भेजेगी।

(साभार – दैनिक भास्कर)

राज्य आपदा राहत कोष के लिए राज्यों को केंद्र से 8,873.6 करोड़ रुपये जारी

नयी दिल्ली : वित्त मंत्रालय ने राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) के लिए 8,873.6 करोड़ रुपये की पहली किश्त अग्रिम तौर पर जारी की है। मंत्रालय के अनुसार एसडीआरएफ राशि के 50 प्रतिशत तक का उपयोग राज्यों द्वारा कोविड-19 की रोकथाम संबंधी उपायों के लिए किया जा सकता है। सामान्य तौर पर एसडीआरएफ की पहली किश्त जून में जारी की जाती है। वित्त आयोग की इस बारे में ऐसी ही सिफारिश है।
मंत्रालय ने एक बयान में कहा, ‘व्यय विभाग ने गृह मंत्रालय की सिफारिश पर एक विशेष व्यवस्था के तहत सभी राज्यों को वर्ष 2021 के लिए राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) के केंद्रीय हिस्से की पहली किस्त को निर्धारित समय से पहले अग्रिम तौर पर जारी किए हैं। राज्यों को 8,873.6 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।’’
बयान में कहा गया है , ‘ सामान्य तौर पर एसडीआरएफ की पहली किस्त वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार जून में जारी की जाती है। सामान्य प्रक्रिया की छूट देते हुए न केवल एसडीआरएफ की पहली किश्त को अग्रिम तौर पर जारी किया गया है बल्कि पिछले वित्त वर्ष में राज्यों को प्रदान की गई राशि के लिए उपयोग प्रमाण पत्र की प्रतीक्षा किए बिना यह रकम जारी की गई है। ’’ मंत्रालय ने कहा है कि जारी की गई रकम के 50 प्रतिशत यानी 4,436.8 करोड़ रुपये तक का उपयोग राज्यों द्वारा कोविड-19 की रोकथाम संबंधी उपायों के लिए किया जा सकता है। इसमें अस्पतालों में ऑक्सीजन उत्पादन एवं भंडारण संयंत्रों की लागत, वेंटिलेटर, एयर प्यूरिफायर, एम्बुलेंस सेवाओं, कोविड-19 अस्पताल, कोविड केयर सेंटर, उपभोग सामग्री, थर्मल स्कैनर, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, जांच प्रयोगशाला, जांच किट, कंटेनमेंट जोन आदि की व्यवस्था शामिल हैं।

टी रविशंकर बनाए गए आरबीआई के डिप्टी गवर्नर

मुम्बई : टी रविशंकर को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का डिप्टी गवर्नर बनाया गया है। वह केंद्रीय बैंक की अनुषंगी कंपनी इंडियन फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी एंड एलाइड सर्विसेज के चेयरमैन थे।
रविशंकर आरबीआई के चार डिप्टी गवर्न स्तर के अधिकारियों में एक होंगे। बीपी कानूनगो के दो अपैल को सेवानिवृत्त होने के बाद से डिप्टी गवर्नर का चौथा पद खाली था। कानूनगो एक साल सेवा विस्तार के बार सेवानिवृत्त हुए। केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने शनिवार को रविशंकर की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दी। वह कानूनगो के विभाग की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं जो फिनटेक, सूचना प्रौद्योगिकी, भुगतान प्रणाली और लोखिम निगरानी के प्रभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
उनकी नियुक्ति तीन वर्ष या उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि में जो भी पहले होगा, तब तक के लिए की गयी है। आरबीआई के अन्य तीन डिप्टी गवर्नर में माइकल डी पात्रा, मुकेश जैन और राजेश्चर राव शामिल हैं। रविशंकर सितंबर 1990 में आरबीआई में अनुसंधान अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए थे। उन्होंने बीएचयू से विज्ञान एवं सांख्यिकी में स्नात्कोत्तर स्तर की पढ़ाई की। वह इंस्टिट्यूट आफ इकोनामिक ग्रोथ से विकास योजना का डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी किए हुए हैं।
वह पिछले साल इंडियन फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी एंड एलाइड सर्विसेज के चेयरमैन बनाए गए थे। इससे पहले वह अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक के साथ भी भारत सरकार की ओर से काम कर चुके हैं।

राहुल बजाज ने छोड़ा बजाज ऑटो का चेयरमैन पद

नीरज बजाज होंगे नये चेयरमैन
नयी दिल्ली : देश के सफलतम उद्योगपतियों में शामिल राहुल बजाज ने आखिरकार बजाज ऑटो के चेयरमैन का पद छोड़ने का फैसला कर लिया है। राहुल बजाज ने दुपहिया और तिपहिया वाहनों के क्षेत्र में बजाज ऑटो को खड़ा किया और उसे अग्रणी स्थान तक पहुंचाया।
पुणे स्थित दुपहिया और तिपहिया वाहन बनाने वाली कंपनी बजाज ऑटो ने शेयर बाजारों को भेजी नियामकीय सूचना में कहा है कि उसके गैर- कार्यकारी चेयरमैन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका इस्तीफा 30 अप्रैल 2021 को कामकाज समाप्त होने के समय से प्रभावी हो जायेगा।
कंपनी ने राहुल बजाज के स्थान पर नीरज बजाज को नया चेयरमैन नियुक्त किया है। राहुल बजाज कंपनी के चेयरमैन एमरीटस बने रहेंगे। उन्हें एक मई 2021 से पांच साल के लिये कंपनी का चेयरमैन एमरीटस बनाया गया है। राहुल बजाज वर्ष 1972 से ही कंपनी के गैर- कार्यकारी चेयरमैन का कार्यभार संभाले हुये हैं। वह बजाज आटो समूह से पिछले पांच दशकों से जुड़े हुये हैं।
कंपनी ने नियामकीय सूचना में कहा है कि राहुल बजाज की आयु 83 साल हो गई है। अपनी बढ़ी उम्र को देखते हुये उनहोंने कंपनी के गैर- कार्यकारी निदेशक और चेयरमैन के पद से इस्तीफा दे दिया। कंपनी ने कहा है कि बजाज ऑटो समूह की सफलता में राहुल बजाज का बहुत अधिक योगदान रहा है। उनके पिछले पांच दशकों के लंबे अनुभव और कंपनी के हित में उनके अनुभव, ज्ञान और बुद्धि का एक सलाहकार के तौर पर समय समय पर लाभ उठाते हुये कंपनी के निदेशक मंडल ने उन्हें कंपनी का चेयरमैन एमेरीटस नियुक्त करने को मंजूरी दे दी।
राहुल बजाज ने 1965 में बजाज समूह की कमान संभाली थी। उस समय भारत एक बंद अर्थव्यवस्था थी। उन्होंने कंपनी का नेतृत्व करते हुये बजाज चेतक नाम का स्कूटर बनाया। इस स्कूटर को काफी नाम मिला और इसे भारत के मध्यम वर्गीय परिवार की आकांक्षा का सूचक माना गया। इसके बाद कंपनी लगातार आगे बढ़ती चली गई।
नब्बे के दशक में जब भारत में उदारीकरण की शुरुआत हुई और भारत एक खुली अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ गया और जापानी मोटर साइकिल कंपनियों से भारतीय दुपहिया वाहनों को कड़ी टक्कर मिलने लगी, उस समय भी राहुल बजाज ने कंपनी को आगे बढ़ाया। बजाज समूह की अग्रणी कंपनी बजाज ऑटो का कारोबार एक समय 7.2 करोड़ रुपये था जो कि आज 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और उसके उत्पादों का पोर्टफोलियो भी बढ़ा है। राहुल बजाज के नेतृत्व में ही उनके उत्पादों को वैश्विक बाजार में स्थान मिला।
देश के सबसे सफलतम उद्योगपतियों में से एक राहुल बजाज को उनके खुलकर बोलने के लिये जाना जाता है और वह 2006 से लेकर 2010 तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे। नवंबर 2019 को मुंबई में इकोनोमिक टाइम्स के एक कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वाणिजय मंत्री पीयूष गोयल की उपस्थिति में इस जाने माने उद्योगपति ने सरकार की आलोचना को लेकर उद्योगपतियों के डर के बारे में चुटकी लेते हुये कहा, ‘‘डर का यह माहौल, पक्के तौर पर हमारे दिमाग में है। आप (केन्द्र सरकार) अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद हमारे भीतर यह विश्वास नहीं है कि आप आलोचना को सराहेंगे।’’