पुरानी पीढ़ी ने सिखाया है कि जो वृक्ष जितना फलदार होता है, वह उतना ही झुक जाता है। ये अलग बात है कि अपनी कही बात को ही हमारे बड़े – बुजुर्ग नहीं मानते। घर के बुजुर्गों ने जो कह दिया, वह कह दिया और उनके कहने का वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा..वह यह सोचने की जहमत नहीं उठाते। हर एक पीढ़ी खुद को आज्ञाकारी ही बताती है मगर हकीकत यह है अपने समय में सब विद्रोही ही होते हैं। इस मामले को जेनरेशन गैप कहकर नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। विनयशीलता, मर्यादा और समुचित आचरण को दुर्भाग्य से बड़ों ने अपना हथियार बना लिया है। परिवार और प्रतिष्ठा हर दिन घातक रूप से शोषण का कारक बनती जा रही है। किसी की कीमत पर युवाओं को बच्चों को झुकाने की प्रवृत्ति अगर बड़ों में विद्यमान है तो एक बार ठहरकर सोचने की जरूरत है कि बड़प्पन की परिभाषा कौन सा रूप ले रही है और खुद को उन बच्चों की जगह रखकर भी सोचें कि वह उन बच्चों की जगह होते तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होती। यह जरूरी है कि आपसी सौहार्द और साहचर्य भाव की संस्कृति बनी और बची रहे। अब तक देखा गया है कि आपसी प्रेम की इस गाड़ी में ईंधन बच्चों की इच्छाओं को राख में बदलकर डाला जाता है और यकीन मानिए ऐसी स्थिति में आपकी जिद पूरी हो भी जाए मगर प्रेम आप खो बैठते हैं, अपने बच्चों को खो बैठते हैं। यह आपकी जीत दरअसल आपकी हार होती है…क्योंकि आपकी एक जिद ने आपको उनसे दूर कर दिया जो आपके कलेजे का टुकड़ा थे। अप्रत्यक्ष रूप से अपनी अनमोल ममता और परवरिश को आप बाजार तक ले आए और आपने कीमत माँग ली। देखा जाये तो यहाँ पाने वाला ही घाटे में है, दूसरी तरफ आपने बाँहें पसारकर देखिए….आप अपने बच्चों का प्यार और विश्वास जीत सकते हैं, उन पर आपका रिश्ता और मजबूत हो सकता है…आपकी एक हाँ…आपकी सारी दुनिया में खुशियाँ भर सकती है…और यह निर्भर आप पर करता है कि आप क्या चाहते हैं…अगर जरा सा झुकने से छोटों का अपमान नहीं होता तो जरा सा झुक जाने से..बच्चों की बात मान लेने से बड़ों का भी मान कम नहीं होगा..बस यही समझने की जरूरत है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार सेवा ट्रस्ट की कार्यकारिणी का गठन
चन्द्रप्रभा भाटिया बनीं राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष
कोलकाता : राष्ट्रीय मानवाधिकार सेवा ट्रस्ट की कार्यकारिणी का गठन हो गया है। एक वर्चुअल बैठक में पदाधिकारियों को मनोनीत किया गया। राष्ट्रीय अध्यक्ष अटल बिहारी बजाज ने सभी चयनित पदाधिकारों को बधाई दी है। कोलकाता से प्रख्यात वरिष्ठ शिक्षिका चन्द्र भाटिया ट्रस्ट की राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष मनोनीत की गयी हैं। दिल्ली से प्रदीप कुमार परिहार राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी बनाये गये हैं। पश्चिम बंगाल के प्रदेश अध्यक्ष सिसिर चंद्रा दास और महिला प्रदेश अध्यक्ष भारती जैनानी बनी हैं। असम से अभिताभ दत्ता, गोवा से कैप्टन बलराम गोस्वामी प्रदेश अध्यक्ष बने हैं। कानूनी सलाहकार बोर्ड हाईकोर्ट की अध्यक्ष सीमा घोष बनायी गयी हैं। पश्चिम बंगाल के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. कल्याण हंसदा बनाये गये हैं। उत्तर 24 परगना तथा उत्तर कोलकाता के नगर अध्यक्ष राजीव खत्री तथा द.24 परगना और दक्षिण कोलकाता के नगर अध्यक्ष शम्भु नाथ राय बनाये गये हैं।
कोविड-19 : अश्वगंधा के लाभों पर भारत, ब्रिटेन मिलकर करेंगे अध्ययन
नयी दिल्ली : आयुष मंत्रालय ने कोविड-19 से उबरने में परंपरागत जड़ी-बूटी ‘अश्वगंधा’ के लाभ के बारे में अध्ययन करने के लिए ब्रिटेन के लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन (एलएसएचटीएम) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) तथा एलएसएचटीएम ने ब्रिटेन के तीन शहरों- लेसिस्टर, बिरमिंघम और लंदन (साउथ हॉल और वेम्बले) में 2,000 लोगों पर अश्वगंधा के चिकित्सीय परीक्षण करने के लिए हाल में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। वक्तव्य में कहा गया कि अश्वगंधा (वैज्ञानिक नाम विथानिया सोमनिफेरा) एक परंपरागत जड़ी-बूटी है जो तनाव घटाती है और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाती है। यह आसानी से उपलब्ध है तथा ब्रिटेन में इसे पोषण के पूरक की तरह लिया जाता है और यह सुरक्षित है।
परीक्षण यदि सफलतापूर्वक पूरा होता है तो भारत की परंपरागत औषधि प्रणाली को वैज्ञानिक वैधता मिल सकती है। अश्वगंधा के विभिन्न रोगों में लाभों को समझने के लिए अनेक अध्ययन हो चुके हैं लेकिन यह पहली बार है जब आयुष मंत्रालय ने कोविड-19 के मरीजों में इसके प्रभाव का पता लगाने के लिए किसी विदेशी संस्थान के साथ समन्वय किया है। एआईआईए की निदेशक डॉ. तनुजा मनोज नेसारी और इस परियोजना में अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं के समन्वयक डॉ. राजगोपालन के साथ सह-अन्वेषक हैं। एलएसएचटीएम के डॉ. संजय किनरा अध्ययन के प्रधान जांचकर्ता हैं। डॉ. नेसारी ने कहा, ‘‘तीन महीने तक 1000 प्रतिभागियों के एक समूह को अश्वगंधा की गोलियां दी जाएंगी जबकि इतने ही लोगों के दूसरे समूह को इसी के समान दिखने वाली अन्य गोलियां दी जाएंगी। किसे कौन सी गोली दी गयी है, इस बारे में मरीजों यहां तक कि चिकित्सकों को भी नहीं बताया जाएगा।’’
मौलिक अधिकारों का हनन : देश भर की अदालतों में 7800 से ज्यादा जनहित याचिकायें दायर
नयी दिल्ली : मौलिक अधिकारों के हनन को लेकर देश की अदालतों में दायर मामलों की तादाद बढ़ती जा रही है। देश भर के उच्च न्यायालयों में 2019 से अब तक 7800 से अधिक जनहित याचिकायें दायर की गयी है । सरकारी आंकड़ों में इसकी जानकारी दी गयी है। कुछ उच्च न्यायालयों ने ऐसी जनहित याचिकाओं का अलग से रिकॉर्ड नहीं रखा है जबकि कुछ अदालतों में सलाना आधार पर आंकड़ा मौजूद नहीं है।
पिछले सप्ताह एक सवाल के लिखित जवाब में सरकार ने राज्यसभा में यह आँकड़ा जारी किया । सरकार से पिछले दो साल में उच्चतम न्यायालय एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों में दायर ऐसी जनहित याचिकाओं के बारे में, खास तौर से मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से सम्बन्धित मामले के बारे में, पूछा गया था । सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार 2019 से इस साल जुलाई तक सभी उच्च न्यायालयों में मौलिक अधिकारों के हनन से संबंधित 7832 जनहित याचिकायें दायर की गयी हैं । ”उच्चतम न्यायालय में उपरोक्त विषय श्रेणी से संबंधित लंबित मामलों की कुल संख्या {एकीकृत मामला प्रबंधन सूचना प्रणाली (आईसीएमआईएस) से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार) है।
जल शक्ति मंत्रालय की पहल से चमकेंगे देश के 12 प्रसिद्ध स्थल
वृन्दावन का बांके बिहारी मंदिर तथा बंगाल का कालीघाट भी शामिल
कोलकाता : जल शक्ति मंत्रालय की पहल से देश के 12 प्रसिद्ध स्थल चमकने जा रहे हैं। भगवान कृष्ण के करोड़ों भक्तों की आस्था नगरी वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर आने वाले दिनों में स्वच्छ होकर चमक उठेगा। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग ने स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत यह बीड़ा उठाया है।
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देश की प्रतिष्ठित धरोहरों, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्थलों को स्वच्छ पर्यटन स्थलों में बदलने की सोच के तहत जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग ने स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के तहत देश के 12 प्रतिष्ठित स्थलों को चुना है। इसका मकसद इन महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों और इनके आसपास स्वच्छता सफाई के मानकों में सुधार कर यहां पहुंचने वाले घरेलू और विदेशी पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं और अनुभव प्रदान करना है। मंत्रालय के अनुसार, पेयजल और स्वच्छता विभाग ने स्वच्छता व साफ-सफाई के लिहाज से नए मानदंड स्थापित कर पर्यटकों को बेहतर सुविधा देने के लिए जिन एक दर्जन प्रतिष्ठित स्थलों का चयन किया है। इनमें उत्तरप्रदेश के बांके बिहारी मंदिर और आगरा किले के अतिरिक्त महाराष्ट्र के अजंता की गुफाएं, मध्यप्रदेश का सांची स्तूप, राजस्थान का कुंभलगढ़ किला, जैसलमेर किला और रामदेवरा, हैदराबाद स्थित गोलकुंडा किला, ओडिशा के कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर, चंडीगढ़ का रॉक गार्डन, श्रीनगर की डल झील तथा पश्चिम बंगाल का कालीघाट मंदिर शामिल है। देश के महत्वपूर्ण धार्मिक, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक स्थलों को स्वच्छता की दृष्टि से बेहतर बनाकर न केवल चमकाया जाएगा बल्कि यहां आने वाले सैलानियों की संख्या में भी वृद्धि की जा सकेगी। केन्द्रीय जल शक्ति मंत्रालय का पेयजल और स्वच्छता विभाग, स्वच्छता से संबंधित इस योजना का कार्यान्वयन आवास और शहरी कार्य मंत्रालय, पर्यटन मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और संबंधित राज्य अथवा केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों के सहयोग से कर रहा है।
जम्मू – कश्मीर में देशद्रोहियों और पत्थरबाजों को नहीं मिलेगी सरकारी नौकरी
श्रीनगर : जम्मू – कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ कड़ा प्रहार जारी है। इसका प्रभाव भी दिखायी पड़ रहा है, अब देश विरोधी तत्वों और पत्थरबाजों के प्रति सरकार ने अंकुश कड़ा कर दिया है। ऐसे लोगों पर सरकार अब सख्त कार्रवाई करेगी। देश के खिलाफ षड्यंत्र रचने वालों पर नकेल कसने के लिए एक आदेश जारी किया गया है। जिसमें कहा गया है कि देश के खिलाफ नारेबाजी और पत्थरबाजी करने वालों को सरकारी नौकरी नहीं दी जाएगी। इतना ही नहीं ऐसे लोग पासपोर्ट सेवा का भी लाभ नहीं उठा सकेंगे। सीआईडी ने सभी इकाइयों को इस संबंध में आदेश जारी कर दिया है। आपराधिक जांच विभाग, विशेष शाखा-कश्मीर की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि सभी क्षेत्रीय इकाइयों को निर्देशित किया जाता है कि पासपोर्ट सेवा या अन्य किसी सेवा से संबंधित सत्यापन के दौरान कानून और व्यवस्था, पथराव के मामलों और अन्य अपराधों में संलिप्तता को विशेष रूप से देखा जाए। स्थानीय पुलिस थाने के रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि होनी चाहिए। डिजिटल साक्ष्य जैसे सीसीटीवी फुटेज, फोटो, वीडियो और ऑडियो पुलिस के रिकॉर्ड में उपलब्ध क्लिप, क्वाडकॉप्टर इमेज को भी खंगाल जाए। ऐसे किसी भी मामले में शामिल होने पर स्वीकृत देने से इनकार किया जाना चाहिए।
3 साल में 24,000 से ज्यादा बच्चों ने की आत्महत्या
एनसीआरबी के हैरान करने वाले आँकड़े
नयी दिल्ली : सरकार के एक आंकड़े के मुताबिक देश में वर्ष 2017-19 के बीच 14-18 आयु वर्ग के 24 हजार से अधिक बच्चों ने आत्महत्या की है, जिनमें परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने से आत्महत्या करने के चार हजार से अधिक मामले शामिल हैं। संसद में हाल में पेश राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से यह बात सामने आई है।
एनसीआरबी के मुताबिक 14-18 आयु वर्ग के कम से कम 24,568 बच्चों ने वर्ष 2017-19 के बीच आत्महत्या की। इनमें 13,325 लड़कियां शामिल हैं। अगर इन्हें वर्ष वार देखा जाए तो 2017 में 14-18 आयु वर्ग के कम से कम 8,029 बच्चों ने आत्महत्या की थी, जो 2018 में बढ़कर 8,162 हो गई और 2019 में यह संख्या बढ़कर 8,377 हो गई। इस आयु वर्ग में आत्महत्या के सबसे अधिक मामले मध्य प्रदेश से सामने आए जहां 3,115 बच्चों ने आत्महत्या की, इसके बाद पश्चिम बंगाल में 2,802, महाराष्ट्र में 2,527 और तमिलनाडु में 2,035 बच्चों ने आत्महत्या की। आंकड़ों में कहा गया कि 4,046 बच्चों ने परीक्षा में फेल होने से, 639 बच्चों ने विवाह से जुड़े मुद्दों पर आत्महत्या की, इनमें 411 लड़कियां शामिल हैं। इसके अलावा 3,315 बच्चों ने प्रेम संबंधों के चलते और 2,567 बच्चों ने बीमारी के कारण, 81 बच्चों ने शारीरिक शोषण के तंग आ कर आत्महत्या कर ली।
आत्महत्या के पीछे किसी प्रियजन की मौत, नशे का आदी होना, गर्भधारण करना, सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होना, बेरोजगारी, गरीबी आदि वजहें भी बताई गईं। बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था ‘क्राई- चाइल्ड राइट्स एंड यू’ की मुख्य कार्यकारी अधिकारी पूजा मारवाह ने कोरोना वायरस संक्रमण के कारण हालात खराब होने पर चिंता जताते हुए स्कूल पाठ्यक्रमों में जीवन कौशल प्रशिक्षण को शामिल करने और स्वास्थ्य देखभाल और कुशलता के एजेंडे में मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, ‘छोटे बच्चे अक्सर आवेग में आ कर आत्महत्या की कोशिश करते हैं। ये भाव दुख से, भ्रम से, गुस्से, परेशानी, मुश्किलों आदि से जुड़े हो सकते हैं। किशोरों में आत्महत्या के मामले दबाव, खुद पर विश्वास की कमी, सफल होने का दबाव आदि बातों से जुड़े हो सकते हैं और कुछ किशोर आत्महत्या को समस्याओं का हल मान लेते हैं।’ उन्होंने कहा, ‘हमारा मानना है कि प्रत्येक बच्चा और किशोर गुणवत्तापरक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और मानसिक-सामाजिक सहयोग तंत्र पाने का हकदार है। उनका अच्छा मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करके उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह से निखर कर सामने लाने में मदद मिलेगी और वे समाज के जिम्मेदार सदस्य बनेंगे।’
मशरूम की खेती ने बदल दी ओडिशा के इस गाँव की तस्वीर
भुवनेश्वर : ओडिशा के कालाहांडी जिले का कुतेनपडार गाँव 1980 के दशक में भुखमरी और इससे होने वाली मौतों के लिए जाना जाता था लेकिन आज यह ‘मॉडल गाँव’ बन गया है और गाँव की बदली हुई तस्वीर के साथ ही यह महिला सशक्तीकरण का उदाहरण भी है। गाँव के अधिकतर लोग जीवन यापन के लिए वन्य उत्पाद पर निर्भर थे लेकिन अब वे 45 वर्षीय आदिवासी महिला बनदेई माझी के शुक्रगुजार हैं जिन्हें लोग जिले में ”मशरूम मां” के नाम से बुलाते हैं। अपने परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने की उनकी मजबूत इच्छाशक्ति समूचे गांव के लिए एक आंदोलन बन गई है। बनदेई ने 2007-08 में नाबार्ड शिविर में प्रशिक्षण लेने के बाद धान के भूसे से मशरूम की खेती शुरू की। बनदेई के परिवार में पति और चार बच्चे हैं। वह एक गरीब परिवार से आती हैं जिन्हें दो एकड़ सरकारी जमीन मिली थी ,जो सिर्फ बाजरे के फसल के लिए उपयुक्त थी। दशकों पहले अन्य ग्रामीणों की तरह उनका परिवार भी दो वक्त के भोजन के लिए वन और मजदूरी पर निर्भर था। मूलभूत प्रशिक्षण और दो साल तक प्रायोगिक खेती के बाद बनदेई ने व्यक्तिगत रूप से मशरूम की खेती शुरू की और जल्द ही रोल मॉडल बन गईं। उन्होंने कहा, ”मशरूम की खेती से जून से अक्टूबर के दौरान मुझे एक लाख रुपये का शुद्ध लाभ हुआ।” इसके अलावा उन्हें सब्जियों, दाल और तिलहन की खेती से भी 50 से 60 हजार रुपये की आमदनी हुई।
वर्ष 2010 में उन्होंने 500 रुपये में एक बकरी खरीदी थी और अब परिवार के पास 45 बकरियां हैं। उनके पति जगबंधु और बेटी जज्ञेनसेनी दैनिक कामकाज में उनकी मदद करते हैं। उनकी एक बेटी की दो साल पहले शादी हुई थी और दो बेटे कॉलेज में पढ़ते हैं। बनदेई अब एक नया पक्का घर बना रही हैं और उनके पति ने बाजार जाने के उद्देश्य से मोटरसाइकिल खरीदी है। बनदेई से प्रेरित होकर अब गांव के 50 अन्य परिवार भी मशरूम की खेती कर रहे हैं और सब्जी की खेती के अलावा सालाना करीब 50,000 रुपये कमा रहे हैं। बनदेई ने आस पास के करीब 10 गांवों की महिलाओं को प्रशिक्षित किया है। मशरूम की खेती में उनके योगदान और महिला सशक्तीकरण के लिए उन्हें नाबार्ड से पुरस्कृत भी किया गया है। वह महिला सशक्तीकरण की असली मॉडल हैं। नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक मलाया कुमार मेहर ने कहा, ”यह एक आदिवासी महिला की प्रतिबद्धता और समर्पण की सफलता की कहानी हैं।” बनदेई ने कहा कि मशरूम और सब्जियों की खेती ने उनका और ग्रामीणों का जीवन बदल दिया है। भवानीपटना के जिला मुख्यालय से 10 किमी दूर कुतेनपदार गांव आदिवासी बहुल है जहां करीब परिवार हैं और इनमें से 40 परिवार आदिवासी हैं।
नहीं बदलेगा महिला अफसरों की स्थायी कमिशन में तैनाती का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अर्जी दायर करने से मना किया
नयी दिल्ली : सेना में शॉर्ट सर्विस कमिशन पर तैनात महिलाओं को सुप्रीम कोर्ट ने स्थायी कमिशन में नियुक्त करने का आदेश दिया है, जिन्हें आकलन में 60 फीसदी नम्बर मिले हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि स्पेशल 5 चयन बोर्ड के आकलन में 60 फीसदी अंक हासिल करने वाली महिला सैन्यकर्मियों को स्थायी कमिशन में नियुक्ति दी जाए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने 25 मार्च को दिए अपने आदेश में किसी भी तरह के बदलाव की याचिका पर सुनवाई करने से भी इनकार कर दिया। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और एमआर शाह की बेंच ने कहा कि सरकार को हमारे पिछले आदेश के पालन के लिए जमीनी स्तर पर काम करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार को आदेश में किसी भी तरह के बदलाव के लिए अर्जी नहीं दाखिल करनी चाहिए। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या 60 फीसदी से ज्यादा अंक हासिल करने वालीं जो अफसर अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना कर रही हैं, उन्हें भी स्थायी कमिशन दिया जाए? इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि यह फैसला आर्म्ड फोर्सेज ट्राइब्यूनल को करना है कि ऐसी महिला सैन्यकर्मियों को तैनाती मिलनी चाहिए या नहीं।




