Tuesday, April 7, 2026
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सभी केंद्रीय विद्यालयों में शुरू हुई प्रवेश प्रक्रिया

नयी दिल्ली : केंद्रीय विद्यालय संगठन ने सभी केंद्रीय विद्यालय में नामांकन प्रक्रिया आरम्भ हो गयी है । इच्छुक अभिभावक एक अप्रैल से कक्षा एक के लिए नामांकन फॉर्म भर सकते हैं। कक्षा एक के लिए ऑनलाइन फार्म ही भरे जायेंगे। ऑनलाइन फार्म के लिए केवीएस ने एप भी जारी किया है। अभिभावक एप को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकते हैं। ज्ञात हो कि कोरोना संक्रमण के कारण इस बार केंद्रीय विद्यालय में नामांकन देरी से होगा। अब तक मार्च में नामांकन प्रक्रिया पूरी कर ली जाती थीय़ कक्षा एक के लिए kvsonlineadmission.kvs.gov.in पर जाकर आवेदन करना होगा। केवीएस द्वारा हर कक्षा के लिए अलग-अलग फॉर्म जारी किए गए हैं। फार्म की संख्या देखकर ही नामांकन फार्म भरना होगा।
बोर्ड रिजल्ट के बाद निकलेगा 11वीं के लिए आवेदन
केवीएस की मानें तो 10वीं बोर्ड रिजल्ट आने के दस दिन के अंदर 11वीं में नामांकन की तिथि जारी होगी। केंद्रीय विद्यालय के छात्र और छात्रा का पंजीकरण पहले होगा। गैर केवी वाले छात्रों को तभी मौका मिलेगा जब संबंधित केवी में जगह खाली रहेगी। 11वीं में प्रवेश की अंतिम तिथि दसवीं रिजल्ट जारी होने के 30 दिनों के अंदर ही रहेगा।
नामांकन के लिए निर्धारित
कक्षा एक के लिए पंजीकरण (ऑनलाइन) शुरू – एक अप्रैल
कक्षा एक के लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि – 19 अप्रैल
प्रथम लिस्ट – 23 अप्रैल को जारी
द्वितीय लिस्ट – 30 अप्रैल को जारी
तृतीय लिस्ट – पांच मई को जारी
शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत नामांकन को आवेदन – 15 मई से 20 मई
कक्षा दो तथा अन्य कक्षाओं का पंजीकरण (ऑफलाइन) – आठ अप्रैल से 15 अप्रैल तक
कक्षा दो तथा आगे की कक्षाओं के लिए सूची जारी – 19 अप्रैल को
कक्षा दो तथा आगे की कक्षाओं के लिए प्रवेश – 20 से 27 अप्रैल
कक्षा तीन से नौवीं तक प्रवेश की अंतिम तिथि – 31 मई

नासिक में बाजार जाने को घंटे के हिसाब से देने पड़ रहे हैं पैसे

कोरोना को थामने के लिए नासिक में लागू हुआ नियम
नासिक : कोरोना महामारी की शुरुआत से ही सबसे ज्यादा प्रभावित महाराष्ट्र रहा है और अब जब देश में कोरोना की दूसरी लहर ने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं तब भी महाराष्ट्र में ही रिकॉर्डतोड़ मामले सामने आ रहे हैं। लोगों को भीड़भाड़ वाले इलाकों में न जाने की हिदायत दी तो गयी है लेकिन इसका असर पड़ता नहीं दिख रहा। ऐसे में नासिक में एक नया नियम शुरू किया गया है। यहां रहने वालों को अब हर बार बाजार जाने पर प्रति व्यक्ति पांच रुपये चुकाने पड़ेंगे। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, मार्केट जाने वाले हर शख्स को 5 रुपये का भुगतान करने के बाद एक टिकट दी जाएगी जो अगले एक घंटे के लिए मान्य रहेगी। अगर कोई भी शख्स इस एक घंटे से ज्यादा समय लगाता है उसे 500 रुपये का जुर्माना भरना होगा। यह पांच रुपये नासिक नगर निगम इकट्ठा करेगी और इसका इस्तेमाल कोरोना से जुड़ी सुरक्षा जैसे सैनेटाइजेशन प्रक्रिया पर खर्च किया जाएगा। वहीं, पुलिस बाजार वाले इलाकों में नियम को सख्ती से लागू करवाने का काम करेगी। नया नियम शहर के मेन मार्केट, नासिक मार्केट कमेटी, पवन नगर मार्केट, अशोक नगर मार्केट और कलानगर मार्केट में लागू होगा।मार्केट में एंट्री के लिए सिर्फ एक ही रास्ता होगा। लोगों को एंट्री के वक्त ही 5 रुपये की टिकट लेनी होगी। वहीं, सब्जी विक्रेता, दुकानदारों के लिए पास जारी किया जाएगा। जो लोग मार्केट इलाके में रहते हैं उन्हें पहचान पत्र जांचने के बाद ही अंदर घुसने दिया जाएगा। बता दें कि मार्च महीने में ही महाराष्ट्र में कोरोना के करीब 6 लाख नए मामले दर्ज किए जा चुके हैं। यहां कोरोना से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी मार्च में 2 हजार पार हो गया है।

होली आई

शशांक सिंह

हवा में मस्ती छाई!
हो! देखो होली आई!
रंग का क्या नशा चढ़ा
शत्रु भी हो गए भाई

हाथों में ले पिचकारी,
खिलखिला बच्चे दौड़े!
बड़े हैं गले लगाए,
स्वजन हो गए, पराए।

द्वेष की जले होलिका,
प्रेम की फूले मल्लिका!
पुराने मनमुटाव को,
भुलाने होली आई!

न रहो मुँह लटकाए,
नहीं है मातम छाए।
उठो, पकड़ो पिचकारी;
हो! देखो होली आई|

किन्तु मज़हब का चोला,
इसे तुम नही ओढ़ाओ;
जो बाटें इन रंगों को,
ना ऐसा पाठ पढ़ाओ!

हवा में मस्ती छाई!
हो! देखो होली आई!
रंग का क्या नशा चढ़ा
शत्रु भी हो गए भाई |

 

राष्ट्रीय कवि संगम बंगाल का होली काव्य संगम सम्पन्न

कक्षा एक से एम.ए तक के विद्यार्थियों ने भाग लिया

प्राथमिक कक्षाओं से विश्वविद्यालय तक के विद्यार्थियों ने किया काव्यपाठ 

कोलकाता :  “सभी रंगों का रास है होली/मन का उल्लास है होली” यह आनन्द का उत्सव सत्य ही एकता और भाईचारे का संदेश लेकर आता है, और इसी संदेश को साझा करने के लिए राष्ट्रीय कवि संगम पश्चिम बंगाल ने राज्य के विभिन्न विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को आभासीय मंच दिया जहाँ कक्षा प्रथम से लेकर विश्वविद्यालय तक के विद्यार्थियों ने पूरे उत्साह के साथ संकलित तथा स्वरचित कविताओं का पाठ किया । इस अवसर पर बाल वर्ग तथा युवा वर्ग की प्रस्तुति नई संभावनाओं की ओर संकेत कर रही थी जहाँ संस्कारों की सुदृढ़ नींव का परिचय प्राप्त हुआ । राष्ट्रीय कवि संगम पश्चिम बंगाल के दक्षिण कोलकाता, दक्षिण 24 परगना तथा मध्य कोलकाता इकाइयों द्वारा होली के शुभ अवसर पर एक आभासी काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ। इस गोष्ठी में कोलकाता के गणमान्य विद्यालयों कॉलेज तथा विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. गिरिधर राय (अध्यक्ष पश्चिम बंगाल), श्री आर पी सिंह(महामंत्री पश्चिम बंगाल) तथा मुख्य वक्ता बलवंत सिंह (मंत्री पश्चिम बंगाल) की उपस्थिति में मीना शर्मा (अध्यक्ष दक्षिण 24 परगना) के स्वागत भाषण से कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ। मृदुल मिश्र (डीपीएस) ने सरस्वती वंदना की तथा ओलिप्रिया मंडल (द वेदांता अकैडमी) ने श्री राधा रानी का स्तुति गायन प्रस्तुत किया । प्रतिभागी विद्यार्थियों में- अर्जिंक्य कुमार सिंह (डॉन बॉस्को बेंडिल) शशांक सिंह, आरव आर्य (ला मार्टिनियर फॉर बॉयज), अरिनेश देवनाथ (द न्यू टाउन), शुभ्रजीत मुखर्जी, साक्षी सिंह (द वेदांता अकैडमी), देवायना भौमिक (भवन्स), करिश्मा समाद्दार (ऑग्ज़ीलियम कन्वेंट),श्रांतिका मारिक (पूर्वांचल विद्या मंदिर), प्रकृति मिश्रा (वैलेंड गोल्डस्मिथ, मृदुल मिश्रा, पायल सिंह, देवांशी विमूरी (डीपीएस न्यूटाउन), वार्तिक रैना, स्वास्तिका चक्रबर्ती (बीडीएम इंटरनेशनल), अजलि रजक (प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय), अभिषेक पांडे, रवि बैठा (कलकत्ता विश्वविद्यालय), आदर्श ओझा (सुरेंद्रनाथ कॉलेज बैरकपुर) कीर्ति राय, गरिमा गुप्ता (राजस्थान विद्या मंदिर) रिद्धि पाठक, श्रेया पाठक (नेशनल इंग्लिश स्कूल) नितिक निराला, अनुष्का दत्ता (इंदिरा गांधी मेमोरियल) तथा निखिता पांडे (पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बारासात) । कार्यक्रम की विशेष बात यह थी कि कक्षा एक(1) से लेकर विश्वविद्यालय के स्तर तक के विद्यार्थियों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया।

 

निहारिका सिंह (दक्षिण कोलकाता उपाध्यक्ष) ने बड़ी कुशलता और सुगमता से पूरे कार्यक्रम का संचालन किया ।पश्चिम बंगाल के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. गिरधर राय ने कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति के साथ विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया तथा प्रांतीय मंत्री बलवंत सिंह ने नई संभावनाओं को प्रोत्साहित किया । कार्यक्रम में उपस्थित विशेष अतिथि साहित्यकार लेखिका “नारी रत्न अवॉर्ड-2021” से अलंकृत मल्लिका रूद्रा जी (छत्तीसगढ़) ने विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि काव्य प्रस्तुति करते समय भाव संप्रेषण का विशेष ध्यान रखना चाहिये । रंगों की व्याख्या कररती हुई उन्होंने रंगों के विभिन्न आयामों को समझया । पश्चिम बंगाल के (महामंत्री ) राम पुकार ने भोजपुरी गीत के माध्यम से सभी को बधाइयाँ दी । मीना शर्मा (अध्यक्ष दक्षिण 24 परगना), सीमा सिंह (अध्यक्ष दक्षिण कोलकाता) , निहारिका सिंह (उपाध्यक्ष दक्षिण कोलकाता) तथा सुदामी यादव ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया । कार्यक्रम की सफलता का श्रेय प्रांतीय अध्यक्ष डॉ गिरिधर राय को, प्रांतीय महामंत्री राम पुकार सिंह को, प्रांतीय मंत्री बलवंत सिंह गौतम जी को जाता है जिनकी अनुप्रेरणा से यह कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । अन्य जिला के पदाधिकारियों ने भी इस कार्यक्रम में जुड़ कर सभी का हौंसला बढ़ाया। अंजलि मिश्रा (पश्चिम बंगाल कोषाध्यक्ष) ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए सभी प्रतिभागियों तथा उनके अभिभावकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस तरह होली का यह आभासीय कार्यक्रम सफल और सार्थक रहा l

मतदान प्रक्रिया को ऑनलाइन करना भी समय की माँग है

कोविड ने एक बार फिर से परेशान करना शुरू कर दिया है। महाराष्ट्र में तो कोरोना के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, उसे देखकर मन में अनायास ही एक भय उत्पन्न होने लगता है…मगर महाराष्ट्र वह राज्य है जहाँ चुनाव नहीं हैं..सरकार तेजी से फैसले ले रही है और पाबंदियाँ लगने लगी हैं मगर जिन राज्यों में चुनाव हैं, वहाँ पर कोरोना होकर भी नहीं है। विचित्र बात यह है कि चुनाव जीत जाने की ऐसी लगन है कि किसी पार्टी के किसी नेता को कुछ भी नहीं दिख रहा…शायद 2 मई के बाद दिखना शुरू हो जाए मगर तब तक अगर हालात बिगड़े तो इसका जिम्मेदार कौन होगा…? जो लोग कल तक सामाजिक दूरी का सन्देश दे रहे थे…आज अपनी रैलियों में उमड़ती भीड़ देखकर फूले नहीं समा रहे…दवाई सबको मिली नहीं और कड़ाई को कड़ाही में डाल दिया गया है…और यह उस देश में हो जिसने एक लम्बा लॉकडाउन पिछले साल देखा…सुनसान गलियाँ. ठप कारोबार देखा…क्या ये अच्छा नहीं होता कि मतदान की प्रक्रिया को भी ऑनलाइन कर दिया जाये…मतदाता पहचान पत्र को जोड़िए आधार कार्ड से और लोग एक बटन क्लिक करके मतदान करें…यह जरूरी है क्योंकि यह न सिर्फ बीमारी से बचाएगा बल्कि चुनावी हिंसा और धांधली पर भी नियंत्रण करेगा। जो धन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर होने वाला खर्च है, वह सही जगह पर होगा। लोग अपने फोन से मतदान करेंगे तो गड़बड़ी कम होगी…सीधे एक रिकॉर्ड रहेगा…मतगणना आसान होगी…आज हमारा देश जब आजादी की 75 वीं वर्षगाँठ मनाने जा रहा है तो ऐसी स्थिति में हमें धीरे – धीरे अपने तौर – तरीके बदलने की जरूरत है..तभी तो आजादी का जश्न और भी दमदार होगा।

राष्ट्रीय पुस्तकालय कोलकाता में स्वच्छता पखवाड़ा सम्पन्न

कोलकाता :  राष्ट्रीय पुस्तकालय में 15 मार्च से 30 मार्च तक ‘स्वच्छता पखवाड़ा’ का आयोजन किया गया। इस पखवाड़े में स्वच्छता अभियान को ध्यान में रखते हुए तमाम कार्यक्रम भी हुए।
स्वच्छता के प्रति जागरूक कराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय पुस्तकालय ने ‘पर्यावरण और स्वच्छता’ को केंद्र में रखते हुए 26 मार्च को ‘ऑनलाइन प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता’ का आयोजन भी किया जिसमें देशभर के विभिन्न विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के लगभग 200 छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ‘ऑनलाइन प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता’ जूनियर्स वर्ग के विजयी प्रतिभागियों में लक्ष्मीपत सिंहानिया एकेडमी की सान्वी द्विवेदी, एशियन इंटरनेशनल स्कूल, हावड़ा के साग्निक चौधरी, लक्ष्मीपत सिंहानिया एकेडमी की दृश्या गोयल, पनव्व श्रॉफ, सिद्धार्थ पोद्दार शामिल हैं।
सीनियर्स वर्ग में डीएवी पब्लिक स्कूल जमशेदपुर के आयुष कुमार झा, लक्ष्मीपत सिंहानिया एकेडमी के श्रीकार, गौरव पोद्दार, ग्रंथ खंडेलवाल और इशान सम्माद्दर ने पुरस्कार प्राप्त किया। वहीं, मास्टर्स यानी महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय वर्ग में आईआईएसईआर, बहरमपुर के वैभव श्रीवास्तव ने प्रथम स्थान, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय की अंजलि रजक ने द्वितीय तथा उत्तीर्णा धर ने तृतीय, कर्नाटक विश्वविद्यालय के सिद्दप्पा हम्मानाइक ने चतुर्थ और अक्षय कुमार ने पंचम स्थान प्राप्त किया।


इसके साथ ही पखवाड़े के अंतिम दिन पुस्तकालय में स्वच्छता पर आधारित नाट्य-प्रस्तुति का आयोजन भी किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रीय पुस्तकालय के महानिदेशक प्रो. अजय प्रताप सिंह के दीप प्रज्ज्वलन से हुई। विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए सिंह ने कहा ‘स्वच्छता केवल परिकल्पनाओं तक ही सीमित न रहे बल्कि आप इसे अपने व्यवहार में भी लाने का प्रयास करें। आपका एक प्रयास गांधी के सपनों को साकार करेगा और प्रत्येक व्यक्ति को मानसिक और शारिरिक रूप से स्वस्थ करने के साथ देश को भी स्वस्थ और सुदृढ़ बनाएगा।’ इसी कड़ी में रितेश कुमार पाण्डेय के निर्देशन में हावड़ा नवज्योति संस्था की बच्चियों ने ‘कोरोना और स्वच्छता’ पर शानदार नाट्य प्रस्तुति देकर स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक होने के लिए प्रेरित भी किया। संगीत-नृत्य के पुट से स्वच्छता के प्रति जागरूक कराने वाली इस नाट्य-प्रस्तुति को काफी सराहा भी गया। इस आयोजन में कार्यक्रम के संयोजक काली चरण गौड़ (सहायक पुस्तकालय एवं सूचना अधिकारी) के साथ अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे। कार्यक्रम का सफल संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन कनिष्ट हिंदी अनुवादक, राष्ट्रीय पुस्तकालय के विनोद कुमार यादव ने किया।
(रपट – अनूप यादव)

साहित्यिकी संस्था में होली मिलन 

कोलकाता : साहित्यिकी संस्था ने जूम अॉन-लाइन पर होली मिलन मनाया जिसमें अट्ठारह से अधिक सदस्याओं ने अपनी रचनात्मक ऊर्जा से सरोबार किया। गीत संगीत कविताएं होली के विविध अनुभव और हास्य व्यंग्य की पिचकारियों ने सभी के तन मन को उमंग और उत्साह से पूर्ण कर दिया ।नमिता जायसवाल, उमा झुनझुनवाला, पूनम पाठक,  विद्या भंडारी, कुसुम जैन, सुषमा हंस, सविता पोद्दार, मंदिरा भट्टाचार्य, सुधा भार्गव, उर्मिला प्रसाद, वाणीश्री बाजोरिया, बबिता मांधडा़, उषा श्राफ, रंजना पाठक, सरिता बैंगानी, नुपूर अशोक, वसुंधरा मिश्र आदि सदस्याओं ने अपने गीत संगीत और कविताओं हास्य व्यंग्य की विविध रचनाओं से कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। साजन होली आई( फणीश्वरनाथ रेणु जी की कविता), लोक गीतों में कन्हैया कहे चलो गुंइया, अवधी, राजस्थानी, हिंदी के गीतों ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। दुर्गा व्यास, आशा जायसवाल आदि पचास से अधिक सदस्याओं और श्रोताओं ने होली मिलन समारोह में उपस्थिति दर्ज कराई। फेसबुक पर भी इस कार्यक्रम को लाइव देखा गया।
नुपूर अशोक और वाणी मुरारका तकनीकी व्यवस्था को बनाए रखने में सहायक बनीं।सचिव गीता दूबे ने कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की। अंत में, साहित्यिकी संस्था की अध्यक्ष कुसुम जैन ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन किया डॉ वसुंधरा मिश्र ने।

ट्राम में एक याद

ज्ञानेंद्रपति

चेतना पारीक कैसी हो?
पहले जैसी हो?
कुछ-कुछ ख़ुुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो?
अब भी कविता लिखती हो?

तुम्हें मेरी याद तो न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो
तुम्हारी क़द-काठी की एक
नन्ही-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है

चेतना पारीक, कैसी हो?
पहले जैसी हो?
आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग?
नाटक में अब भी लेती हो भाग?
छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर?
मुझ-से घुमन्तूू कवि से होती है टक्कर?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?
अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो?
उतनी ही हरी हो?

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है

इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है
विराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कण्ठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ााली है
वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है

फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँ
आदमियों को क़िताबों को निरखता लेखता हूँ
रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग बिरंगे लोग
रोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोग
देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है

चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो?

नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी

प्रो. गीता दूबे

नमस्कार सखियों। आप सभी को होली की हुलास और मिठास भरी रंग -बिरंगी शुभकामनाएँ। सखियों, रंगों का त्योहार फिर से आ गया, हमारे सुख से सूखे जीवन में खुशियों की थोड़ी सी उजास भरने। क्या कभी आपने त्योहारों और मनुष्य के बीच के रिश्ते पर सोचा है। त्योहार, हमारे एकरस जीवन में खुशियों की सौगात लेकर आते हैं, श्रम से थके हुए मानव के जीवन में ऊर्जा का संचार करते हैंं। अगर स्त्रियों की बात करें तो उनके जीवन की सारी नीरसता इस त्योहार में घुल जाती है। हालांकि किसी भी त्योहार में कमरतोड़ मेहनत  स्त्री को ही करनी पड़ती है, वह चाहे घर की साफ- सफाई हो या सबकी जिह्वा को तृप्त करने के लिए पुए- पकवान बनाना हो। इसके बावजूद स्त्रियाँ अमूमन त्योहारों का स्वागत खुले दिल‌ से करती हैं और वह भी होली जैसा त्योहार जिसके आगमन की महक ही फिज़ाओं में मादकता घोल देती है। मन- प्राण बौरा सा जाता है और इसी बौराहट में सदियों से सामाजिक असमानता की बेड़ियों में जकड़ी स्त्रियाँ भी अपने बंधनों से मुक्त भले न हो पाएँ लेकिन मुक्ति का थोड़ा सा आस्वाद जरूर ले‌ लेती हैं। अपने प्रेमियों की मनुहार सुनकर मन ही मन खुश भी हो लेती हैं और प्रेमी भी अपनी प्रियाओं से इसी बहाने गले‌ लगाने की गुजारिश भी कर बैठते हैं-

“गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में

बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में।” (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

तो सखियों, होली की इस ठिठोली का आनंद स्त्रियाँ भी कमोबेश दिल खोलकर लेती हैं। पूरे उत्तर भारत के सामाजिक परिदृश्य को देखें तो “झुलनी का झटका” खाकर परदेश कमाने गये जीवन धन, साजन तीज- त्योहार के मौके पर ही घर लौट कर आते हैं और हर हाल में पति के बिना अधूरी पत्नियाँ एक ओर तो होली के हुलास से मगन हो जाती हैं तो दूसरी ओर पति के आने के उल्लास और खुमार में डूबकर प्रेम के रंग में सराबोर  हो जाती हैं। पति- पत्नी के बीच के इस हुलास और दाम्पत्य प्रेम का मादक वर्णन निराला ने बहुत खूबसूरती से किया है- 

“नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !

जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,

दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-

                मली मुख-चुम्बन-रोली ।”

लब्बोलुआब यह है कि साल के बारहों महीने घूंघट की ओट से दुनिया को देखने वाली ये स्त्रियां भी होली के हुड़दंग में शामिल हो लेती हैं। अपने मन की करने का कुछ मौका उन्हें भी मिलता है और हर किसी के साथ होली के रंग में सराबोर होने का भी।  कहावत ही है कि “फागुन में बुढ़वा देवर लागे”।

लेकिन जरा सोचकर देखिए कि बूढ़े भी जब देवर की तरह छेड़छाड़ कर लेते हैं, होली के हुड़दंग में शामिल हो लेते हैं और कभी- कभी उनकी यह बुढ़भस इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि उसका जुल्म भी औरतों पर ही टूटता है। 

बात यह है सखियों कि होली के जश्न में महिलाएँ कितना भी शामिल क्यों‌ ना हो लें लेकिन फिर से‌ वही असमानता का सवाल मुँह उठाए खड़ा होता है कि इस उल्लासपूर्ण त्योहार का शिकार भी कभी -कभार औरतें ही बनती हैं, जिसके कई दृश्य किस्से- कहानियों और फिल्मों में पूरी भयावहता के साथ अंकित हुए हैं। होली की मादकता में जब नकली नशे की मात्रा ज्यादा घुल जाती है तो होली का मनभावन रंग फीका पड़ जाता है।  हालांकि साहित्य में बहुधा  इसका दूसरा ही  पक्ष पेश किया जाता है जहाँ नायिकाएँ होली में नायक के साथ जी भरकर मौज- मस्ती करती नजर आती हैं, पद्माकर की नायिका की बरजोरी तो देखने लायक है-

“फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी ।

भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी ॥

छीन पितंबर कंमर तें, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी ।

नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी ॥”

होली का इसी तरह का एक रसीला प्रसंग रसखान भी रचते हैं, जब ब्रज की गोपियां श्याम को‌ होली के रंग में रंगने के लिए ललकार कर‌ घर से बाहर निकालती हैं-

“मोहन हो-हो, हो-हो होरी ।

काल्ह हमारे आँगन गारी दै आयौ, सो को री ॥

अब क्यों दुर बैठे जसुदा ढिंग, निकसो कुंजबिहारी ।

उमँगि-उमँगि आई गोकुल की , वे सब भई धन बारी ॥

तबहिं लला ललकारि निकारे, रूप सुधा की प्यासी ।

लपट गईं घनस्याम लाल सों, चमकि-चमकि चपला सी ॥

काजर दै भजि भार भरु वाके, हँसि-हँसि ब्रज की नारी ।

कहै ’रसखान’ एक गारी पर, सौ आदर बलिहारी ॥”

 ऐसा नहीं कि आम जिंदगी में ऐसे चित्र बिल्कुल विरल हैं। आम जीवन में भी गंवई गाँव की भाभियाँ दल बाँधकर अपने- अपने देवरों पर कई बार ऐसी ही बरजोरी करती हैं लेकिन ज्यादा संख्या ऐसी घटनाओं की है जहाँ देवरों की ज्यादतियों का शिकार भाभियां ही नहीं गरीबों की जोरूएँ भी होती हैं। वस्तुत: जो रस्में बीच की दूरियों को पाटकर आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिए बनी थीं, वे कब ज्यादतियों का सबब बन गईं यह हमें पता ही नहीं चला। रंग के बहाने एक दूसरे पर बहुत बार कीचड़ भी पोता जाता है जिससे त्योहार दागदार हो जाता है। हास्य कवि माणिक वर्मा की पंक्तियां में कीचड़ और गुलाल दोनों मिलते हैं-

“कीचड़ उसके पास था, मेरे पास गुलाल

जो कुछ जिसके पास था, उसने दिया उछाल।”

वर्मा जी इस सद्भावनापूर्ण त्योहार के नकारात्मक पहलू की ओर भी संकेत करते हुए देश की वर्तमान परिस्थिति पर अत्यंत सूक्ष्म व्यंग्य करते हैं-

“जलीं होलियां हर बरस, फिर भी रहा विषाद,

जीवित निकली होलिका, जल-जल मरा प्रहलाद।”

तो सखियों, इस रंगों के त्योहार की यह खूबी होनी चाहिए कि हम एक-दूसरे को प्यार की बौछार से सराबोर करें और अपने मन में सदियों से जड़ जमाकर बैठी हुई हर प्रकार की असमानता को दूर करें। रंगों की बारिश में सब नहाकर अपने मन की कालिमा को धो डालें और एक दूसरे को स्नेह और सौहार्द्र के रंग से रंग दे। जिस तरह प्रकृति फागुन में चारों ओर‌ खुशनुमा रंग बिखेरती है, ठीक उसी तरह मानव को भी खुशियों के रंग ही बिखेरने चाहिए। कवि हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में कहें तो-

“होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,

होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,

भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,

होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!”

सखियों, होली का त्योहार मनाते हुए हमें कवि तारा सिंह की इस समझाइश को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए-

“मिटे धरा से ईर्ष्या, द्वेष, अनाचार, व्यभिचार

जिंदा रहे जगत में, मानव के सुख हेतु

प्रह्लाद का प्रतिरूप बन कर, प्रेम, प्रीति और प्यार

बहती रहे, धरा पर नव स्फूर्ति की शीतल बयार

भीगता रहे, अंबर-ज़मीं, उड़ता रहे लाल, नीला

पीला, हरा, बैंगनी, रंग – बिरंगा गुलाल।”

आज विदा सखियों, अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी। तब तक आप लोग रंगों का त्योहार मनाइए और इन महानुभावों की पंक्तियों पर गौर फरमाइए। सोचेंगे तो जिंदगी अपने आप सुधर और निखर जाएगी। 

रिपोर्टर दीदी की क्लास – पत्रकारिता के विभाग (भाग -2)

विषय – पत्रकारिता, पाठ – पत्रकारिता के विभाग – भाग – 2, यू ट्यूब चैनल – सुषमा कनुप्रिया

आज जानेंगे अपराध, राजनैतिक और प्रशासनिक विभाग की पत्रकारिता के बारे में