Thursday, July 2, 2026
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एमएसएन प्रयोगशालाओं में मोलनुपिरवीर के तीसरे चरण का ​​परीक्षण शुरू

कोलकाता : एमएसएन लेबोरेटरीज प्रा। लिमिटेड (एमएसएन) ने मोलनुपिरावीर कैप्सूल के लिए तीसरे चरण का परीक्षण आरम्भ कर दिया है। गत 19 मई को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से मोलनुपिरवीर कैप्सूल की प्रभावकारिता और हल्के से मध्यम कोवि़ड -19 के रोगियों पर सुरक्षा अध्ययन करने के लिए नैदानिक ​​​​परीक्षण की मंजूरी मिली है। एमएसएन भारत भर में 40 से अधिक साइटों में अपना नैदानिक ​​परीक्षण शुरू करेगा और पहली खुराक जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है। हल्के से मध्यम COVID-19 से पीड़ित 2400 से अधिक विषयों पर नैदानिक ​​परीक्षण किए जाएंगे।
मोलनुपिरवीर एंटीवायरल गुणों वाली एक प्रायोगिक दवा है और वर्तमान में कोविड -19 उपचार के लिए नैदानिक ​​​​चरण के अध्ययन के अधीन है। एमएसएन आर एंड डी टीम ने एपीआई और फॉर्मूलेशन दोनों विकसित किए हैं, नैदानिक ​​​​अध्ययन के सफल समापन के बाद नियामक अनुमोदन के बाद जल्द ही लॉन्च होने की उम्मीद है। कोविड उपचार रेंज के हिस्से के रूप में कम्पनी पहले ही 200mg, 400mg और 800mg की क्षमता वाले फैविलो (फैविपीराविर ), 75 mg कैप्सूल के रूप में ओसेलो (ओसेल्टामीविर ) और बेरीडोज (Baricitinib) उतारा है। एमएसएन से सभी कोविड दवाओं की उपलब्धता के लिए, मरीज एमएसएन कोविड हेल्पलाइन @ 91005 91030 पर संपर्क कर सकते हैं या अधिक सहायता के लिए [email protected] पर ईमेल कर सकते हैं।

कोविड : बिड़ला हाई स्कूल के पूर्व विद्यार्थियों ने किया सहायता कार्य

कोलकाता : कोरोना आपदा के समय एक दूसरे की मदद करना जरूरी है। बिड़ला हाई स्कूल अल्मनी ने कोलकाता पुलिस के साथ कोरोना आपदा में फँसे जरूरतमंदों की मदद की। बीएचएस हाई स्कूल अल्मनी और कोलकाता पुलिस की इस पहल को सिंघी बागान के सन्तोष चौटाला का सहयोग मिला। इसके तहत 1500 लोगों को भोजन मुहैया करवाया गया। लक्ष्य कम से कम 3 हजार लोगों की मदद करना है। यास तूफान के खतरे को देखते हुए ओम नमकीन की ओर से सूखे मेवे और चॉकीवॉकी की ओर से केक भी वितरित किये गये। इसके लिए बिड़ला हाई स्कूल अल्मनी ने कोलकाता पुलिस के साथ बालीगंज, चेतला, पर्णश्री, मैदान और कस्बा पुलिस स्टेशन की भी मदद ली।

नवजागरण के इतिहास का एक जरूरी नाम हैं मतिलाल सील

बंगाल में बहुत से समाज सुधारक रहे हैं जो नवजागरण काल की आधारशिला हैं और आज तक हम उनको याद करते हैं तो कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनके योगदान को इतिहास समुचित सम्मान नहीं दे सका। वे समाज सुधारक नहीं थे…उद्योगपति थे…व्यवसाय के क्षेत्र में पूरा नाम कमाया…धन कमाया लेकिन वह सब जनता को अर्पण कर दिया। आज बात करेंगे ऐसी ही विभूति की…
बंगाल में बहुत से समाज सुधारक रहे हैं जो नवजागरण काल की आधारशिला हैं और आज तक हम उनको याद करते हैं तो कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनके योगदान को इतिहास समुचित सम्मान नहीं दे सका। वे समाज सुधारक नहीं थे…उद्योगपति थे…व्यवसाय के क्षेत्र में पूरा नाम कमाया…धन कमाया लेकिन वह सब जनता को अर्पण कर दिया। आज बात करेंगे ऐसी ही विभूति की…मतिलाल सील…उदार विचारधारा के धनी व्यवसायी, जिन्होंने धन तो खूब कमाया मगर सामाजिक एवं शैक्षणिक सुधारों के लिए दान भी उतना ही दिया।


शिक्षाविद्, सामाजिक सुधारक और ब्रह्म समाज के संस्थापकों में से एक थे। शिवनाथ शास्त्री ने मतिलाल सील की प्रशंसा करते हुए उनको ईमानदार, विनम्र और दयालु परोपकारी बताते हुए कहा है कि मतिलाल सील की समृद्धि द्वारकानाथ टैगोर और रुस्तमजी चौसी जैसी थी। सील का जन्म 20 मई 1792 को कोलकाता में सुवर्ण वणिक (स्वर्ण व्यवसाय से जुड़ा वर्ग) परिवार में हुआ था। उनके पिता चैतन्य चरण सील वस्त्र व्यवसायी थे और सील जब 5 वर्ष के थे तो उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी व्यावसायिक बुद्धि काफी तीक्ष्ण थी….कुछ समय के लिए मतिलाल सील ने एक ब्रिटिश फर्म में काम किया। इस बीच 1809 में 17 साल की उम्र में मतिलाल सील का विवाह सुरती बागान के मोहन चांद दे की बेटी नागरी दासी से हुआ।
1815 में सील ने फोर्ट विलियम में काम करना आरम्भ किया…काम करते हुए मतिलाल सील के श्वसुर ने उनको ब्रिटिश सेना को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की सलाह दी जिससे सील की आय में वृद्धि हुई। बाद में उन्होंने इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया मगर व्यवसाय उनकी रगों में था। 1819 में सील ने अपना व्यवसाय शुरू किया। वे शराब के कारोबारी मिस्टर हडसन को बोतल और कॉर्क बेचा करते थे। ब्रिटिश कारोबारियों ने सील को नील, रेशम, चीनी, चावल, सॉल्टपीटर औऱ अन्य सामानों की आपूर्ति का जिम्मा भी दिया। वे प्रथम श्रेणी की एजेंसियों के 20 घरों के बनिया नियुक्त किये गये जिसमें से 50 से 60 ऐसे घर कलकत्ता में थे। मतिलाल सील ने खुद नील, रेशम, चीनी का निर्यात यूरोप को करना शुरू किया और इंग्लैंड से लोहा, सूती कपड़े के टुकड़ों का आयात करने लगे। अपनी समृद्धि से उन्होंने यूरोपियन लोगों को कड़ी टक्कर देनी शुरू कर दी। उन्होंने कार्गो नावें हासिल कीं जो उन दिनों नयी चीज थीं। सील ने पुरानी आटे की मिल में काम किया…ऑस्ट्रेलिया को बिस्कुटों से लदा पूरा जहाज भेजा। बाद में इनके पास व्यवसाय के लिए 13 जहाज थे और इसमें से एक स्टीम टग था जिसका नाम बनिया था।

मतिलाल सील जितने बड़े व्यवसायी थे, उतने ही उदारवादी भी थे। कई सामाजिक कार्य़ों के लिए उन्होंने दान किया। 1841 में बेलघरिया में एक भिक्षुकावास बनवाया जिसमें 500 लोगों को रोज खिलाया जाता था। उन्होंने मतिलाल घाट बनवाया। उन्होंने साहूकारी, बिल की गिनती जैसे कामों में हाथ लगाया और अपनी पद्धति तथा व्यावहारिक बुद्धि से काम करते है। मतिलाल सील बैंक ऑफ इंडिया के संस्थापकों में से एक थे। वे भारत में पहली जीवन बीमा कम्पनी न्यू ओरिएंटल इन्श्योरेंस की स्थापना में भी सक्रिय थे। वे एग्री हॉर्टिकल्चरल सोसायटी के महत्वपूर्ण सदस्य थे और असम टी कम्पनी के संस्थापक निदेशक भी थे।

मतिलाल सील घाट

मतिलाल सील्स फ्री कॉलेज (बाद में मतिलाल सील्स फ्री स्कूल एंड कॉलेज) औपचारिक तौर पर मार्च 1842 में उनके घर पर ही खोला गया था। यह संस्थान आरम्भ में सेंट एफ. जेवियर्स, चौरंगी के निदेशकों द्नारा प्रबंधित किया जाता था। जेसुएट पादरियों के लिए यह अनिवार्य था कि हिन्दू विद्यार्थियों पर इसाईयत न थोपें। इसके बावजूद जब पादरियों के विरुद्ध बहुत अधिक शिकायतें मिलने लगीं तो सील रेवरेंड कृष्णमोहन बनर्जी को संस्थान का संचालन करने के लिए कहा। उन दिनों इस कॉलेज का सालाना खर्च 12 हजार रुपये था जो मतिलाल सील ट्रस्ट से आता था। विद्यार्थियों से मात्र 1 रुपये लिये जाते थे। यहाँ पर अंग्रेजी साहित्य, इतिहास, भूगोल, आवृत्ति, लेखन, गणित, बीजगणित, दर्शन विज्ञान, उच्च गणित और गणित का व्यावहारिक प्रयोग सिखाया जाता था। एक समय तक यहाँ 500 विद्यार्थी पढ़ते थे। कॉलेज के विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और सरकारी, मिशनरी और विश्वविद्यालय की परीक्षा में सफल हुए।
वे अपने व्यावसायिक जीवन के अंतिम दिनों में भी कलकत्ता के सबसे समृद्ध नागरिक थे। मतिलाल सील के दोनों बेटों हीरालाल सील और चुनीलाल सील ने भी अपने धन का एक हिस्सा जनहित से जुड़े कार्य़ों के लिए दिया। मतिलाल सील के समय में कलकत्ता का नागरिक समाज दो भागों में बँटा था। एक तरफ राजा राममोहन राय थे तो दूसरी तरफ रूढ़िवादी सोच वाले राधाकांत देव थे और अधिकतर धनी लोग ऐसे ही थे। राधाकांत देव ने सती प्रथा और विधवा विवाह को लेकर बने कानून का जमकर विरोध किया था। सील पारम्परिक विचारों के होते हुए भी राजा राममोहन राय के पक्षधर थे। स्त्रियों की शिक्षा को उन्होंने समर्थन दिया। इतना ही नहीं उन्होंने जाति की बाधाओं को तोड़कर विधवा से विवाह का साहस रखने वाले व्यक्ति को 1 हजार रुपये दहेज देने की सार्वजनिक घोषणा की थी। सील का निधन 20 मई 1854 को हुआ। उनके नाम पर कोलकाता में एक सड़क भी है।

(स्त्रोत साभार – गेट बंगाल, मतिलाल सील डॉट कॉम, विकिपीडिया)

 

कोरोना मरीजों के लिए वेस्ट बंगाल मोशन फिल्म आर्टिस्ट फोरम ने खोला 25 बेड वाला चिकित्सा केंद्र

कोलकाता : कोरोना मरीजों की मदद के लिए वेस्ट बंगाल मोशन फिल्म आर्टिस्ट फोरम की ओर से कोलकाता में 25 बेड वाला चिकित्सा केंद्र खोला गया है। वहां उन मरीजों को रखा जाएगा, जिन्हें अस्पताल में भर्ती नहीं किया जा रहा लेकिन अविलंब ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत है। आर्टिस्ट फोरम की तरफ से यह चिकित्सा केंद्र दक्षिण कोलकाता के लेक गार्डन इलाके में खोला गया है। चिकित्सा केंद्र का नाम बांग्ला फिल्मों के महान अभिनेता दिवंगत सौमित्र चटर्जी के नाम पर ‘सौमित्र’ रखा गया है। इसे स्थानीय एक क्लब की मदद से बैडमिंटन कोर्ट में खोला गया है। दूसरी तरफ बांग्ला फिल्मों के चर्चित अभिनेता जीशु सेनगुप्ता और संगीतकार इंद्रदीप दासगुप्ता ने लेक मार्केट इलाके में स्थानीय विधायक देवाशीष कुमार के सहयोग से कोरोना मरीजों के लिए सेफ होम खोला है। इंद्रदीप ने बताया कि यहां हल्के लक्षण वाले कोरोना के मरीजों को रखा जाएगा। ऑक्सीजन की भी व्यवस्था की गयी है।

नहीं रहे प्रसिद्ध पर्यावरणविद और चिपको आन्दोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा

देहरादून : प्रसिद्ध पर्यावरणविद और चिपको आंदोलन नेता सुंदरलाल बहुगुणा का एम्स, ऋषिकेश में कोविड-19 से निधन हो गया । वह 94 वर्ष के थे । उनके परिवार में पत्नी विमला, दो पुत्र और एक पुत्री है ।
एम्स प्रशासन ने बताया कि कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद गत आठ मई को बहुगुणा को एम्स में भर्ती कराया गया था । ऑक्सीजन स्तर कम होने के कारण उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई थी । चिकित्सकों की पूरी कोशिश के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका । नौ जनवरी, 1927 को टिहरी जिले में जन्मे बहुगुणा को चिपको आंदोलन का प्रणेता माना जाता है ।

चिपको आन्दोलन

उन्होंने सत्तर के दशक में गौरा देवी तथा कई अन्य लोगों के साथ मिलकर जंगल बचाने के लिए चिपको आंदोलन की शुरूआत की थी । पद्मविभूषण तथा कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित बहुगुणा ने टिहरी बांध निर्माण का भी बढ़-चढ़ कर विरोध किया और 84 दिन लंबा अनशन भी रखा था । एक बार उन्होंने विरोध स्वरूप अपना सिर भी मुंडवा लिया था । टिहरी बांध के निर्माण के आखिरी चरण तक उनका विरोध जारी रहा । उनका अपना घर भी टिहरी बांध के जलाशय में डूब गया । टिहरी राजशाही का भी उन्होंने कडा विरोध किया जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पडा । वह हिमालय में होटलों के बनने और लक्जरी टूरिज्म के भी मुखर विरोधी थे । महात्मा गांधी के अनुयायी रहे बहुगुणा ने हिमालय और पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए कई बार पदयात्राएं कीं ।

गूगल ने भारत में पेश किया न्यूज शोकेस , 50 हजार पत्रकारों, छात्रों को मिलेगा प्रशिक्षण

नयी दिल्ली : गूगल ने भारत में 30 समाचार संगठनों के साथ अपने न्यूज शोकेस की पेशकश की, जिसका मकसद गूगल के समाचार और खोज मंचों पर गुणवत्तापूर्ण सामग्री प्रदर्शित करने के लिए प्रकाशकों को प्रोत्साहित करना और समर्थन देना है। इसके साथ ही गूगल भारत में अगले तीन वर्षों के दौरान समाचार संगठनों और पत्रकारिता विद्यालयों के 50,000 पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों को डिजिटल हुनर सिखाएगा। गूगल के उपाध्यक्ष (उत्पाद प्रबंधन) ब्रैड बेंडर ने कहा, ‘‘हम अब प्रकाशकों की मदद के लिए न्यूज शोकेस पेश कर रहे हैं, ताकि लोगों को भरोसेमंद खबर मिल सके, विशेष रूप से इस महत्वपूर्ण समय में जब कोविड संकट जारी है। समाचार शोकेस दल प्रकाशकों की पसंद के अनुसार लेखों को बढ़ावा देता है, और उन्हें खबर के साथ अतिरिक्त संदर्भ देने की अनुमति भी देता है, ताकी पाठकों में इस बात की बेहतर समझ बन सके कि उनके आसपास क्या हो रहा है।’’
उन्होंने कहा कि ये समाचार दल ब्रांडिंग सुनिश्चित करते हैं, और उपयोगकर्ताओं को प्रकाशकों की वेबसाइट पर ले जाते हैं। गूगल न्यूज शोकेस भारत में 30 राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय समाचार संगठनों के साथ शुरू किया गया है और आने वाले दिनों में इस संख्या में बढ़ोतरी की जाएगी। गूगल की यह सेवा जर्मनी, ब्राजील, कनाडा, फ्रांस, जापान, यूके, ऑस्ट्रेलिया, चेकिया, इटली और अर्जेंटीना सहित एक दर्जन से अधिक देशों में उपलब्ध है।
भारत में गूगल के कंट्री हेड और उपाध्यक्ष संजय गुप्ता ने कहा कि प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल में समाचारों की खपत बढ़ रही है, वहीं उपभोक्ता आदतों में बदलाव भी आ रहा है, जिसमें अधिक युवा उपभोक्ता समाचार के लिए डिजिटल पहुंच का इस्तेमाल कर रहे हैं। गुप्ता ने कहा कि कंपनी अगले तीन वर्षों में 50,000 से अधिक पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों को प्रशिक्षित करेगी और इसके तहत खबरों के सत्यापन, फेक न्यूज से निपटने के उपायों और डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल पर खासतौर से ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

वीडियो कॉल से सीखकर शुरू किये 4 साल से बंद पड़े आईसीयू के 4 वेंटिलेटर

7 मरीजों की जान बचाई, बिहार सरकार ने भी मॉडल को सराहा
औरंगाबाद : मेडिकल स्टाफ ने कम संसाधनों के बावजूद वीडियो कॉल पर दिल्ली एम्स से तकनीक सीखी और चार साल से बंद पड़े के आईसीयू चार वेंटिलेटर को फिर से शुरू कर दिया। बिहार में औरंगाबाद प्रशासन और सदर अस्पताल के कर्मचारियों ने अपनी सूझबूझ से कबाड़ बन चुके वेंटिलेटर को फिर से चालू कर दिया। इससे अब तक 7 मरीजों की जान भी बचाई जा चुकी है। बताया जाता है कि एक डॉक्टर और कुछ नर्सों ने कम संसाधनों के बावजूद वीडियो कॉल पर दिल्ली एम्स से तकनीक सीखी और चार साल से बंद पड़े एम्स के चार वेंटिलेटर को फिर से शुरू कर दिया। अब इस मॉडल को राज्य सरकार ने भी बेहतर बताया है। साथ ही औरंगाबाद डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से इससे जुड़ी हर जानकारी दो दिनों के अंदर मांगी है।
वेंटिलेटर पर रखे गए सभी मरीज सुरक्षित
सौरभ जोरवाल ने बताया कि आईसीयू को किन हालत में और कैसे शुरू किया गया? इसके लिए कौन-कौन से उपाय किए गए? इस संबंध में हर एक जानकारी सरकार ने मांगी है। इसे तैयार कर भेजा जा रहा है। आईसीयू के वेंटिलेटर पर रखे गए 7 मरीज पूरी तरह सुरक्षित हैं। इनमें से कई मरीजों का ऑक्सीजन लेवल काफी कम था। पावर ग्रिड कंपनी के सहयोग से सदर अस्पताल में करीब चार साल पहले पौने तीन करोड़ की लागत से आईसीयू का निर्माण हुआ था। बाद में इसके चार वेंटिलेटर कबाड़ बन गए। अधिकांश सामान भी खराब हो गए थे। तारों को चूहों ने कुतर दिया। 2 साल पहले हीट स्ट्रोक से 70 लोगों की जानें गई थीं। तब स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने अपने दौरे में आईसीयू शुरू कराने की बात कही थी, लेकिन डॉक्टरों और तकनीशियन की कमी के कारण यह हो न सका।
इधर, कोरोना की दूसरी लहर का पीक जिले में 20 अप्रैल से पांच मई तक रहा। इस दौरान सिस्टम के भी कई लोगों की जानें गई। हर रोज कोविड सेंटर से लाशें निकल रही थी। फिर जान बचाने के हर एक बिंदु पर विचार किया गया। तत्काल बंद पड़े आईसीयू का वेंटिलेटर शुरू कराने का विचार आया। इसके एसपी सुधीर कुमार पोरिका, डीडीसी अंशुल कुमार, सिविल सर्जन डॉ. मो. अकरम अली, डीपीएम व कुछ अन्य अधिकारियों के साथ आपात बैठक हुई। इसमें सदर अस्पताल के डॉ. जन्मेजय का नाम सामने आया। तुरंत उन्हें तलब किया गया। अचानक बताया गया कि आपको आईसीयू का इंचार्ज बनाया जाता है। डॉक्टर नौकरी छोड़ने वाले थे, लेकिन डीएम के कहने पर मान गए। इसके बाद सिविल सर्जन, डीपीएम को सहयोग करने की जिम्मेदारी दी गई। डीडीसी को स्पेशल देखरेख के लिए नियुक्त किया गया। इस संबंध में 20 मीटिंग हुई। फिर डीएम ने डब्ल्यूएचओ और दिल्ली एम्स के डॉक्टरों से संपर्क किया। वीडियो कॉल और वर्चुअल तरीके से आईसीयू इंचार्ज डॉक्टर और नर्स को ट्रेनिंग दिलाई। ट्रेनिंग के बाद पांच मॉक ड्रिल हुआ। इसके बाद 10 मई से आईसीयू शुरू कर दिया गया। अभी भी चार कोविड मरीजों को भर्ती किया गया है, जिनकी हालत खतरे से बाहर है।

दिल्ली तक के अधिकारियों ने मीटिंग कर मॉडल समझा
इस मॉडल को समझने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग के नेशनल कोऑर्डिनेटर अजीत सिंह, दिल्ली एम्स और एशिया लेवल के ट्रॉमा एक्सपर्ट डॉ. संजीव कुमार घई, दिल्ली एम्स में कोविड को लीड कर रहे डॉ. तेज प्रकाश ने तीन दिन पहले औरंगाबाद डीएम, डीडीसी, सिविल सर्जन, आईसीयू इंचार्ज समेत करीब 30 डॉक्टरों की वर्चुअल मीटिंग की। अधिकारियों ने पूरे मॉडल को समझा। उन्होंने इस मॉडल को बिहार के साथ देश के अन्य जिलों में लागू कराने की बात कही।

जहां डॉक्टर्स की कमी, वहां इसका इस्तेमाल करेंगे
जानकारी के मुताबिक, यह तकनीक वहां लागू होगी, जहां वेंटिलेंटर तो हैं, लेकिन डॉक्टर्स और टेक्निशियन की कमी है। ऐसे में राज्य और केंद्र सरकार इस मॉडल को लागू कराकर खराब पड़े वेंटिलेटर्स को शुरू कराएगी, जिससे मरीजों की जान बचाई जा सके।

महामारी के बीच आँखों की सेहत का रखें ध्यान

कोरोना काल में घर में रहकर काम करने से जहां स्क्रीन टाइम बढ़ा है, वहीं ज़ाहिर है, आंखों पर ज़ोर भी ज़्यादा बढ़ा है। आंखों की सुरक्षा व सेहत के लिए किन बुनियादी बातों का ध्यान रखना है।
आँखों को आराम दें
घर में ही रहने से सब हर समय किसी ना किसी स्क्रीन के सामन डटे रहते हैं, जैसे टीवी देख रहे हैं, कम्प्यूटर पर काम कर रहे हैं, या मोबाइल पर आंखें गड़ाए हैं। आँखों को बीच-बीच में थोड़ा आराम दें। लगातार स्क्रीन पर नज़र रहेगी, तो आँखें प्रभावित होंगी। 20 मिनट के स्क्रीन टाइम के बाद 5 मिनट आँखों को बंद करके आराम दें। आंखों को ठंडक देने के लिए खीरे का टुकड़ा या टिश्यू पेपर को गुलाब जल से गीला करके आँखों पर रखें। इससे ये हाइड्रेटेड रहेंगी, थकान उतरेगी और ताज़गी महसूस होगी।
आँखों के लिए व्यायाम
शरीर की तरह आँखों को भी व्यायाम कराएं। आंखों को चारों तरफ़ गोल-गोल घुमाएं। ऊपर और नीचे घुमाएं। कम से कम तीन से चार सेकेंड तक अपनी पलकों को लगातार झपकाएं और फिर आँखें तेज़ी से बंद कर लें। कुछ सेकंड बाद आंखें खोलें। इसके अलावा नज़रें तेज़ करने वाली पहेलियां जैसे दो तस्वीरों में अंतर ढूंढना या अलग वस्तु पहचानें आदि भी आंखों के लिए व्यायाम का काम करेंगी।
तरीक़े बदलिए
रोशनी बंद करके और लेटकर टीवी देखने से आँखों पर तनाव बढ़ता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हमेशा बैठकर, समुचित दूर से और थोड़ी रोशनी में टीवी देखना चाहिए। टीवी न दाईं ओर और न बाईं ओर बैठकर देखें, हमेशा सामने ही बैठकर देखें। इसके लिए कमरे की व्यवस्था भी उसी प्रकार करें। किताब या मोबाइल देखते वक़्त आंखों को छोटी करके और ज़ोर देकर न देखें, न पढ़ें। आइड्रॉप ज़रूर डालें, लेकिन चिकित्सक के निर्देशानुसार।
रोशनी का ध्यान रखें
केवल स्क्रीन पर काम करते वक़्त ही नहीं बल्कि आँखों का कोई भी काम करते वक़्त रोशनी की अच्छी उपलब्धता ज़रूर रखें, चाहे पढ़ाई कर रहे हों, या मोबाइल का इस्तेमाल या सिलाई-कढ़ाई। भरपूर रोशनी नहीं होगी तो आंखों पर ज़ोर पड़ेगा। अपनी वर्क डेस्क खिड़की के पास बनाएं। यह भी ध्यान रखें कि बाहर की रोशनी सीधे कम्प्यूटर या लेपटॉप पर न पड़े क्योंकि इससे स्क्रीन साफ़ नज़र नहीं आएगी और आंखों पर ज़ोर देकर देखना पड़ेगा। बैठक ऐसे व्यवस्थित करें कि रोशनी हो लेकिन स्क्रीन पर निगाह टिकाते समय आपको आंखों पर अतिरिक्त ज़ोर न देना पड़े।

(साभार – दैनिक भास्कर)

डीआरडीओ ने बनायी किफायती और त्वरित कोरोना एंटीबॉडी टेस्टिंग किट

75 रुपये कीमत, 75 मिनट में मिलेगी जाँच रिपोर्ट

नयी दिल्ली : रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ( डीआरडीओ) ने एंटीबॉडी की जांच के लिए डिप्कोवैन (Dipcovan) किट बनाई है। डीआरडीओ के मुताबिक, यह किट शरीर में SARS-CoV-2 के वायरस और इससे लड़ने वाले प्रोटीन न्यूक्लियो कैप्सिड (S&N) दोनों की मौजूदगी का पता लगा सकती है। यह 97% की हाई सेंसिटिविटी और 99% स्पेसिफिसिटी के साथ मात्र 75 रुपए की कीमत पर 75 मिनट में आपको रिपोर्ट भी दे देगी।
दिल्ली के अस्पतालों में करीब 1000 मरीजों पर परीक्षण के बाद इसे बाजार में उतारने की अनुमति दी गयी है। पिछले एक साल के दौरान इस किट के तीन बैच का अस्पतालों में अलग-अलग परीक्षण किया गया है। डीआरडीओ के लैब डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोलॉजी एंड एलायड साइंसेस लेबोरेटरी ने दिल्ली की एक निजी कंपनी वैनगार्ड डायगनोस्टिक के सहयोग से इस किट को तैयार किया है। यानि यह पूर्ण रूप से स्वदेशी किट है।
जून के पहले हफ्ते से बाजार में मिलेगी किट
आईसीएमआर ने इसी अप्रैल में डिप्कोवैन किट को अनुमति दी और इसी महीने ड्रग्स कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया ( डीसीजीआई) ने इसके निर्माण और बाजार में बेचे जाने की मंजूरी दी है। वैनगार्ड लिमिटेड व्यावसायिक तौर पर जून के पहले हफ्ते में इस किट को बाजार में उतारेगा।

‘हार्वर्ड कॉलेज विजन’ में बीएचएस का देवांशु सम्मानित

इस ग्लोबल हेल्थ एंड लीडरशिप कॉन्फ्रेंस में सारी दुनिया से भाग लेते हैं विद्यार्थी

कोलकाता :  महानगर के बिड़ला हाई स्कूल के विद्यार्थी देवांशु चौधरी ने ग्लोबल हेल्थ सोसाइटी द्वारा ग्लोबल हेल्थ एंड लीडरशिप कॉन्फ्रेंस’ ‘हार्वर्ड कॉलेज विजन में भाग लिया और उसे सम्मानित किया। आइए देवांशु से जानते हैं उसका अनुभव –

‘हार्वर्ड कॉलेज विजन’ ग्लोबल हेल्थ सोसाइटी द्वारा ग्लोबल हेल्थ एंड लीडरशिप कॉन्फ्रेंस’ द्वारा आयोजित किया जाता है।  यह हार्वर्ड कॉलेज में आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त संगठन है और हर यह हार्वर्ड विश्वविद्यालय में आयोजित होता है। हाई स्कूल के विद्यार्थियों को वैश्विक स्वास्थ्य के प्रति सजग बनाने और जागरुक बनाने के उद्देश्य से साथ लाया जाता है। मूल वक्ता के भाषणों की श्रृंखला. परिचर्चा और कार्यशालाओं के जरिए विद्यार्थी वैश्विक स्वास्थ्य को लेकर पेशेवरों तथा अकादमिक जगत के लोगों से काफी कुछ सीखते हैं। वे कम्यूनिटी प्रोजेक्ट पिच कम्पटिशन और केस स्टडी कम्पटिशन से काफी कुछ सीखते हैं। कोरोना महामारी के कारण यह आयोजन इस बार जूम ऑनलाइन माध्यम से गत 22 और 23 मई को आयोजित हुआ। सम्मेलन 22 और 23 मई को आयोजित किया गया था। एक अत्यंत विचारोत्तेजक सत्र, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य के कई पहलुओं पर हार्वर्ड के प्रोफेसरों के व्याख्यान और वैश्विक स्वास्थ्य के लिए अपनी परियोजनाओं पर हार्वर्ड के स्नातक छात्रों द्वारा आयोजित कार्यशालाएं भी शामिल थीं। पुरस्कार समारोह से पहले सभी विजेताओं को अंतिम बार अपनी पिच प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था, इसके बाद दर्शकों द्वारा एक प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया था।
वैश्विक स्वास्थ्य और नेतृत्व सम्मेलन का मिशन लोगों की भलाई और गरिमा को बढ़ावा देने वाले प्रमाणित, प्रभावी, किफायती और टिकाऊ आयोजनों के जरिए युवाओं को सजग करना है। युवाओं को नागरिक विचारधारा वाले नेताओं के रूप में विकसित करने के लिए प्रेरित करना है। व्यक्तिगत परियोजनाओं में स्थानीय समुदायों को प्रभावित करने वाले वास्तविक जीवन के मुद्दों के बारे में शोध करना और गंभीर रूप से सोचना शामिल है।
मेरा प्रस्ताव “समाज के आर्थिक रूप से अक्षम वर्गों के लिए मासिक धर्म स्वास्थ्य जागरूकता पैदा करना और सैनिटरी पैड बैंकों की स्थापना” पर आधारित था। हमारे देश में मासिक धर्म स्वास्थ्य स्वच्छता प्रबंधन की भयानक स्थिति ने मुझे इस तरह के मंच पर इसके बारे में विचार रखने को प्रेरित किया। मेरी पिच 5 मिनट लंबी वीडियो थी और इसके साथ ही मैंने अपने प्रस्ताव से संबंधित तकनीकी को समझाते हुए एक लिखित “अनुदान प्रस्ताव” प्रस्तुत किया था। मेरे दृष्टिकोण में मूल रूप से तीन महत्वपूर्ण कदम शामिल थे- जागरूकता पैदा करना, बैंकों की स्थापना करना और दक्षता में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना। इसके लिए मुझे विजेताओं में से एक के रूप में चुना गया था, अंत में तीसरा स्थान हासिल किया।