Thursday, July 2, 2026
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शिवभक्तिनी ममतामयी राजमाता महारानी अहिल्या बाई होल्कर

अहिल्याबाई होल्कर इंदौर घराने की महारानी थी। अहिल्याबाई होल्कर अपने देश की सेवा, सादगी एवं मातृभूमि के लिए बहुत ही अच्छी साबित हुई। अहिल्याबाई एक स्त्री होने के कारण भी उन्होंने न केवल नारी जाति के विकास के लिए कार्य किए बल्कि समस्त पीड़ित जनता के लिए कार्य किया। अहिल्याबाई होल्कर की इसी कार्यप्रणाली को देख कर के वहां के लोग अहिल्याबाई होल्कर को अपना भगवान मानते थे। अहिल्याबाई होल्कर ने पीड़ित लोगों के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। अहिल्याबाई होल्कर एक प्रखर चरित्र वाली पतिव्रता स्त्री, उदय विचारों वाली महिला और ममतामयी विभूति थीं। अहिल्याबाई होल्कर का जन्म वर्ष 1735 ईस्वी में महाराष्ट्र राज्य के चौंढी नामक गांव में हुआ था। वह एक सामान्य से किसान की पुत्री थी। उनके पिता मान्कोजी शिन्दे के एक सामान्य किसान थे। सादगी और घनिष्ठता के साथ जीवन व्यतीत करने वाले मनकोजी की अहिल्याबाई एकमात्र अर्थात इकलौती पुत्री थी। अहिल्याबाई बचपन के समय में सीधी साधी और सरल ग्रामीण कन्या थी। अहिल्याबाई होल्कर भगवान में विश्वास रखने वाली औरत थी और वह प्रतिदिन शिवजी के मंदिर पूजन आदि करने आती थी।
आपको बता दें कि एक किसान की पुत्री अहिल्याबाई होल्कर किस प्रकार से इंदौर राज्य की महारानी बनी। इंदौर के महाराजा मल्हार राव होल्कर का वहां आना जाना लगा रहता था। एक बार मल्हार राव होल्कर पुणे जा रहे थे, वह विश्राम करने के लिए पादरी गांव के एक शिव मंदिर पर विश्राम करने के लिए रुके। उसी मंदिर पर अहिल्याबाई होल्कर प्रतिदिन पूजा अर्चना करनी आती थी।
अहिल्याबाई बहुत ही सुंदर उनके मुख मंडल पर देवी जैसा तेज और सादगी एवं सुलक्ष्णता थी। अहिल्याबाई होल्कर को देखकर मल्हार राव ने उन्हें अपनी पुत्रवधू बनाने का निश्चय किया। इस कारण उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के पिता से निवेदन किया। अहिल्याबाई होल्कर के लिए मल्हार राव होल्कर के पुत्र के विवाह प्रस्ताव को सुनकर के अहिल्या की पिता ने हां कर दिया। कुछ ही दिनों बाद अहिल्याबाई होल्कर का विवाह मल्हार राव होल्कर के पुत्र खंडेराव होल्कर के साथ हो गया। इस विवाह के संपन्न होने के बाद अहिल्याबाई अब एक ग्रामीण कन्या से इंदौर राज्य की महारानी बन गई। अहिल्याबाई होल्कर राजमहल पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपनी पुराने जीवन की सादगी एवं सरलता को नहीं त्यागा। वह बहुत ही अच्छे विचारों वाली महिला थी। उनकी निष्ठा को देख कर के मल्हार राव होल्कर ने उन्हें शिक्षित बनाने के लिए उनके शिक्षा का प्रबंध उन्होंने घर पर ही कर दिया। अब अहिल्याबाई अशिक्षित अहिल्याबाई होल्कर से शिक्षित अहिल्याबाई हो गई। जब अहिल्याबाई ने अपने शैक्षणिक योग्यता प्राप्त कर ली, तब मल्हार राव होल्कर के द्वारा उन्हें राजकीय शिक्षा भी प्रदान कराया गया। मल्हार राव होल्कर अपने पुत्र की अपेक्षा अपनी पुत्रवधू पर अत्यधिक भरोसा करते थे। विवाह के कुछ वर्षों बाद अहिल्याबाई ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। अहिल्याबाई होल्कर के पुत्र का नामकरण मल्हार राव होल्कर के द्वारा किया गया उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के पुत्र का नाम मालेराव तथा उनकी पुत्री का नाम मुक्ताबाई रखा। जब अहिल्याबाई ने अपने पुत्रों को जन्म दिया था, उस समय मराठी हिंदू राज्य की विस्तार में लगे हुए थे।  मराठा साम्राज्य के शासक अन्य राजाओं से चौथ वसूला करते थे किंतु भरतपुर के लोगों ने चौथ देने से मना कर दिया। इस बात से गुस्सा हो करके मल्हार राव ने अपने पुत्र खंडेराव होल्कर के साथ भरतपुर राज्य पर आक्रमण कर दिया। मल्हार राव होल्कर ने इस युद्ध में विजय तो प्राप्त कर ली परंतु उनके पुत्र खंडेराव होल्कर की मृत्यु हो गई। खंडेराव होल्कर की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई होल्कर लगभग 29 वर्ष की उम्र में ही विधवा हो गयीं।


वह पति की मृत्यु के बाद स्वयं को समाप्त करना चाहती थी परंतु उनके ससुर ने उन्हें ऐसा करने से रोका। अहिल्याबाई होल्कर को व्यस्त रखने के लिए मल्हार राव होल्कर ने सारा राजपाट अहिल्याबाई होल्कर को सौंप दिया परंतु अहिल्याबाई होल्कर ने अपने 17 वर्ष के पुत्र मल्हार राव को सिंहासन पर बैठा दिया और स्वयं उनकी संरक्षिका बन कर उनका ध्यान रखती थी। इसी बीच उत्तर भारत में हो रहे एक अभियान में मल्हार राव ने सहभागिता की और इसी अभियान में कानवी पीड़ा के कारण महाराज मल्हार राव होल्कर की मृत्यु हो गयी।
अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा किये गये कार्य
अहिल्याबाई होल्कर ने अपने पति और ससुर की मृत्यु हो जाने पर उनकी स्मृति में इंदौर राज्य तथा अन्य राज्यों में विधवाओं, अनाथो, अपंग लोगों के लिए आश्रम बनवाएं। अहिल्याबाई होल्कर ने ही कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक अनेक मंदिर, घाट, तालाब, दान संस्थाएं, भोजनालय, धर्मशालाएं, बावरिया इत्यादि का निर्माण करवाया। अहिल्याबाई होल्कर ने ही काशी के प्रसिद्ध मंदिर काशी विश्वनाथ और महेश्वर मंदिर तथा वहां पर स्थित घाटों को बनवाया।
इसके अतिरिक्त उन्होंने साहित्यकार कलाकार और गायकों को भी बढ़ावा दिया। अहिल्याबाई होल्कर ने अपने राज्य की रक्षा करने के लिए महिला सैन्य टुकड़ीया बनवायी तथा अनुशासित सैनिकों को भी रखा। इनके इन टुकड़ियों में ऐसे प्रशिक्षित सैनिक थे जिन्हें यूरोप और फ्रांसीसी शैली में प्रशिक्षण प्राप्त करवाया गया था। राव ने अपने पुत्र के लिए अहिल्याबाई को वधू चुन लिया।
इंदौर को एक छोटे से गाँव से बढ़ा कर आज जैसा स्वरुप देना हो या करीब तीस साल के शांतिपूर्ण शासन की व्यवस्था, राजमाता अहिल्याबाई होल्कर को कई चीजों के लिए याद किया जा सकता है। मल्हार राव होल्कर को उनपर जैसा भरोसा था, वो भी आश्चर्यजनक लग सकता है। उनकी एक चिट्ठी के हिस्से कई जगह उद्धृत होते रहते हैं, इसमें वो अहिल्याबाई को चम्बल पार कर के ग्वालियर की तरफ बढऩे के आदेश दे रहे होते हैं। चिट्ठी में बड़ी तोपों और उनका पर्याप्त गोला-बारूद रखने के आदेश हैं। कितनी देर रास्ते में रुका जा सकता है, वो तो बताया ही गया है, साथ ही रास्ते की निगरानी चौकियों की व्यवस्था भी दुरुस्त करने के आदेश हैं। उनकी तारीफ में एनी बेसेंट ने काफी लिखा है तो जवाहरलाल नेहरु भी अपनी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में उनकी प्रशंसा करते मिलते हैं। उनके दरबार में मराठी कवि मोरोपंत, संस्कृत के जानकार कौशली राम प्रश्रय पाते थे तो आनंदफंडी भी थे। अपने राज्य को शांतिपूर्ण शासन देने में उन्हें भले ही कामयाबी मिली हो, लेकिन ये दौर ऐसा था जब लगातार इस्लामिक आक्रमणों में मंदिर तोड़े गए थे। हिन्दुओं की स्थिति भारत में बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसे दौर में राजमाता अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिरों का पुन: निर्माण कराना शुरू करवाया। ये उनका राजकीय खर्च भी नहीं था, यानि प्रजा पर कर बढ़ा कर मंदिर नहीं बनवाए जा रहे थे। राजमाता की अपनी जमीनों से होने वाली आय से इन मंदिरों को बनवाया जाता था।
भारतीय संस्कृति कोश के मुताबिक उनके करवाए निर्माण काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, कांची, अवन्ती, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथपुरी में हैं। महाराष्ट्र और मालवा के क्षेत्र में उनके बनवाये सैंकड़ो तालाब और धर्मशालाएं भी हैं। शेरशाह सूरी की ही तरह कलकत्ता को काशी से जोडऩे वाली सड़क की मरम्मत भी उन्होंने करवाई थी। आज के तथाकथित इतिहासकार ग्रैंड ट्रंक रोड बनवाने का मुफ्त का श्रेय शेरशाह को दे देते हैं, जिसे उसने बनवाया भी नहीं था और महिला होने के कारण विदेशी परंपरा के निर्वाह के लिए राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का नाम लेते समय हकलाने लगते हैं। भारत में तीन-चार सौ वर्ष पुराने जो भी मंदिर इस्लामिक आक्रमणों के बाद आज बचे दिखते हैं, करीब करीब हरेक के निर्माण में रानी अहिल्याबाई होल्कर का योगदान है।
अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु
अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु 13 अगस्त सन 1795 इस्वी को इंदौर राज्य में ही हुई था। अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु कब हुई थी, उस दिन की तिथि भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी थी।

(साभार – द सिम्पल हेल्प डॉट कॉम)

(भारतीय धरोहर डॉट कॉम)

दुनिया के सबसे अमीर शख्स बने फ्रांस के बर्नार्ड अरनॉल्ट

मुम्बई : दुनिया के सबसे अमीर शख्स की तगमा जेफ बेजोस से छिन गया है। अब फ्रांस के बिजनेसमैन बर्नार्ड अरनॉल्ट के पास सबसे ज्यादा संपत्ति है। फोर्ब्स के रियल टाइम बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक 30 मई को बर्नार्ड के पास 192.2 अरब डॉलर की संपत्ति है। वहीं, ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन के मालिक जेफ बेजोस का टोटल नेटवर्थ 487 अरब डॉलर है।
सूची में एलन मस्क और बिल गेट्स भी काबिज
बर्नार्ड अरनॉल्ट लग्जरी सामान बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एलवीएमएच के चेयरमैन हैं। साथ ही उनके पास लुई विट्टन और सैफोरा जैसे 70 ब्रांड और भी हैं। बिलियनेयर्स इंडेक्स में सबसे अमीरों की लिस्ट में बर्नार्ड और जेफ बेजोस के बाद टेस्ला के सीईओ एलन मस्क और माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स का नंबर आता है। जो समय-समय पर नंबर वन के पायदान पर काबिज रह चुके हैं।
नेटवर्थ में बढ़त की सबसे बड़ी वजह कंपनी के शेयरों में उछाल होती है। क्योंकि कंपनी में उनकी बड़ी हिस्सेदारी होती है। ऐसे में जब शेयर बाजार में कंपनी के शेयरों की वैल्यू बढ़ती है तो इसके साथ ही नेटवर्थ भी तेजी से बढ़ती है। अब अगर एलवीएमएच के शेयरों को देखें तो एक शेयर की वैल्यू मार्च 2020 में 340 यूरो के आसपास थी, जो मई 2021 में 648 यूरो के आसपास पहुँच गयी है। यानी एक साल में की पीरियड में शेयर की कीमत 90% से ज्यादा बढ़ी।
शेयरों में उछाल का फायदा यह हुआ कि अप्रैल 2020 में उनकी नेटवर्थ जो 76 अरब डॉलर थी वह अब बढ़कर 192 अरब डॉलर हो चुकी है। यानी 13 महीने में नेटवर्थ 150% से ज्यादा बढ़ा।
देश से भी निकाला गया
फ्रांस के बिजनेसमैन को देश निकाला भी दिया गया था। यह घटना 1981 की है जब सत्ता में फ्रेंच सोशलिस्ट पार्टी आई। ऐसे में बर्नार्ड ने देश से बाहर अमेरिका में समय बिताया और ठीक 3 साल बाद जब हालात सही हुए तो अपने देश लौटे।
बर्नार्ड अरनॉल्ट ग्रेजुएशन के बाद 1971 में अपने पिता की सिविल इंजीनियरिंग कंपनी का कामकाज देखने लगे। जिसे 1976 में उन्होंने एक रियल एस्टेट कंपनी में बदल दिया। लेकिन अमेरिका से वापसी के बाद बर्नार्ड ने 1984 में बर्नार्ड ने कीमती सामान और कपड़े के कारोबार में हाथ आजमाया और लग्जरी सामान बनाने वाली फ्रेंच कंपनी फायनेंसियरे अगाचे और बोसेक सेंट फरेरेस का अधिग्रहण किया। अंत में 1987 में नयी कंपनी एलवीएमएच की स्थापना की।

सेना से जुड़ीं शहीद मेजर विभूति ढौंडियाल की पत्नी निकिता कौल

भारत के वीर जवाब दिन-रात सीमाओं पर तैनात रहकर देश की सेवा करते हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं रहती कि वो अपनी जान हथेली पर लेकर चल रहे हैं। बल्कि, हर जवान केवल एक ही संकल्प के साथ अपना सबकुछ मातृभूमि की सेवा में न्यौछावर कर देता है कि लोग सुरक्षित रहें। लेकिन, कई बार वीर जवान दुश्मन के हमले में शहीद हो जाते हैं। ऐसा ही हुआ साल 2019 में। इस साल पुलवामा में सेना के जवानों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई जिसमें पांच जवान शहीद हो गए। उन्हीं में एक थे शहीद मेजर विभूति ढौंडियाल। शहीद मेजर की पत्नी निकिता भारतीय सेना में शामिल हुईं। पुलवामा में सेना के जवानों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई थी बताया जाता है कि हमले से ठीक नौ महीने पहले शहीद विभूति और नितिका की शादी हुई थी। मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था। जब उनका पार्थिव शरीर उनके गांव पहुंचा था तो उस वक्त भी नितिका की तस्वीर वायरल हुई थी। वहीं, अब जब उनके कंधों पर स्टार लगे तो भी उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है और लोग उनकी जमकर तारीफ कर रहे हैं। कई लोग ये भी कह रहे हैं कि उनके लिए यह सबसे अच्छी श्रद्धांजलि है। बता दें कि पति से प्रेरणा लेते हुए नितिका कौल ने मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ दी और सेना में शामिल होने का फैसला लिया। उन्होंने शॉर्ट सर्विस कमीशन पास करने के बाद पिछले साल ट्रेनिंग शुरू की थी। वहीं, जब वह सेना में शामिल हुईं तो सोशल मीडिया पर बधाई देने वालों का तांता लग गया है। यूजर्स अपने-अपने अंदाज में उन्हें बधाई दे रहे हैं। कोई उनकी तस्वीर शेयर कर रहा है, तो किसी का कहना है कि यह देश के लिए गर्व का पल है।

पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत घर से..लगाइए हर कमरे में दो पौधे

यह भयावह समय है, कठिन समय है। काल का तांडव, मृत्यु की विभीषिका है, प्रकृति के कोप से पूरा देश और पूरी पृथ्वी आक्रांत है और इस बीच बहस चल रही है, विवाद हो रहे हैं, ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी हो रही है..एक दूसरे को नीचा दिखाने और कमतर साबित करने की होड़ लगी है…मुख पर प्रेम और हृदय में घृणा है..आस – पास के ऐसे लोगों को जाते देख रही हूँ जिनको देखते हुए बड़ी हुई…सीखा…मन क्लान्त हो पड़ा है…हम दिखावे की ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ उदारता से लेकर रोग तक, सब प्रदर्शन की वस्तु बन गये हैं..
जरा सोचिए तो ईश्वर ने ऐसी ही दुनिया दी थी आपको? क्या ऐसा ही संसार दिया था..? यही देश था जहाँ लोग दीर्घायु हुआ करते थे…स्वस्थ रहा करते थे और तब आज की तरह महँगी चिकित्सा प्रणाली भी नहीं थी। यह समय देखिए सब ईश्वर को पुकार रहे हैं..कोई निर्मम बता रहा है तो कोई विश्वास रख रहा है…कोई एक दूसरे को कोस रहा है तो कोई सरकारों को दोष दे रहा है…औऱ यहीं पर कोई खुद से सवाल नहीं कर रहा है….
आज कृत्रिम ऑक्सीजन के लिए दौड़ लगाते मनुष्यों को ईश्वर ने ऑक्सीजन प्रदाता वृक्षों और वनों से लदी धरती ही दी थी तो वृक्ष काटते हाथों ने क्या यह भयावह भविष्य देखा होगा…नहीं देखा होगा..अगर ऐसा भविष्य देखते तो हाथ उठते ही नहीं कुल्हाड़ी उठाने के लिए…तो दोषी कौन?
हम बचपन से ही सुनते आए कि धूम्रपान, मदिरापान हमारे फेफड़ों को नष्ट करते हैं। हमारी प्रतिरोधक क्षमता खत्म होती है मगर आपने इन दोनों को बुरी आदत नहीं माना बल्कि कवियों ने भी महिमामंडन किया। नशे की लत ऐसी कि लॉकडाउन से पहले और लॉकडाउन के बाद पहली कतार यहीं लगती है तो ऐसे में पहले से कमजोर पड़े फेफड़े खराब होते हैं और इन पर कोविड -19 समेत अन्य बीमारियों का प्रहार होता है तो दोषी कौन?
पढ़ा – लिखा शिक्षित मध्यम वर्ग भी मानता है कि उसका काम सिर्फ टैक्स भरना है, इसके आगे कोई जिम्मेदारी नहीं मगर बात जब खुद पर आती है तो उसे लगता है कि वह अकेला ही सब कुछ क्यों करे? क्या आप किसी संस्थान के मालिक होते हैं तो वेतन दे देने से आपकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है…अगर नहीं तो सिर्फ टैक्स भर देने से आपकी जिम्मेदारी पूरी कैसे हो सकती है? प्रवासी श्रमिकों को काम से निकालने और शहर से निकालने में सुशिक्षित लोगों की बड़ी भूमिका है। इनका काम सोशल मीडिया पर 4 शब्द लिखने से या लम्बी सी कविता लिख देने से पूरा हो जाता है। ऐसे में अगर अपने जीवन की रक्षा करने के लिए हर ओर से सताये गये ये लोग राशन की दुकानों के सामने परहेज के सारे नियम भूल जाएं तो जिम्मेदारी किसकी है? नेताओं की रैलियों में 5 रुपये और भात के लिए अगर भीड़ लगा लें तो दोष किसका है? अगर प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को कोविड से पहले चुनावों की चिन्ता हो तो कोविड और चीन को दोषी कहकर क्या बिगाड़ लेंगे आप? मास्क पहनाने के लिए जहाँ पर पुलिस तैनात करनी पड़ रही हो, कोरोना योद्धाओं को सम्मान जताते हुए उनको घर से बाहर निकालने के लिए लोग खड़े हों तो क्या उस देश के लोगों को कोई अधिकार है कि वह दूसरों पर उंगली उठाए?
उपकरणों पुर निर्भर रहने की ऐसी लत लगी कि आप बात कहने के लिए भी उसे लिखते हैं…चिट्ठी लिखना आपको डाउन मार्केट लगता है। जिस देश में अड्डा. चौपाल, आंगन की परम्परा हो…जहाँ आध्यात्मिक चेतना हो…जहाँ एकान्त में सृजन की परम्परा रही हो…वहाँ के लोग कुछ दिन अलग रह जाने से घबराते हैं…आप खुद सोचिए कि आप कहाँ थे और कहाँ आ गये हैं। आज वीडियो कॉल है, सोशल मीडिया है…मगर कुछ नहीं है तो अपने लिए कुछ समय निकालने की ललक, अपने मित्रों से रूबरू होने की चाहत, हम अनौपचारिकताओं के बीच अनौपचारिक हो रहे हैं…जुड़ रह हैं ऊपर से। हमारी सारी रुचियाँ फेसबुक, सिनेमाहॉल, मल्टीप्लेक्स, मॉल, रेस्तराओं तक सिमट गयी है…छोटी – छोटी बातें पीछे छूटती गयीं। किताबों की जगह भी डिजिटल उपकरणों ने ले ली और कागज की वह सोंधी – सोंधी गन्ध भी हम भूलते जा रहे हैं…बस कितना कुछ तो है सोचने के लिए…। बच्चों को सुविधाओं के मायाजाल में ऐसा बाँधे जा रहे हैं कि एक हल्की सी चोट और हल्की सी तकलीफ भी उन पर भारी पड़ रही है।
हमारे पूर्वजों का जीवन प्रकृति के साहचर्य़ का जीवन था..वह उतना ही लेते थे जितना आवश्यक होता था…जितने की आवश्यकता होती थी, उतने की ही इच्छा रखते थे। आप किसी का भी जीवन उठाकर देखिए..वनों औऱ वनवासियों के साथ प्रकृति का संरक्षण ही किया उन्होंने..हम राम और कृष्ण को पूजते हैं…शिव की आराधना करते हैं पर उनके जीवन से हमने क्या सीखा…कुछ भी तो नहीं..वेदों में प्रकृति की आराधना है…,वेदों से प्रेम है तो प्रकृति से प्रेम करना सीखिए…संस्कृति से प्रेम है तो प्रकृति का संरक्षण करिए..,.आपने प्रकृति से खिलवाड़ किया…ईश्वर अपनी संतानों का क्रन्दन कैसे देख पाता इसलिए यह एक दंड ही समझिए…एक वृक्ष को 10 पुत्रों के बराबर माना गया है। आधुनिक युग में आचार्य़ जगदीश चन्द्र बोस ने भी प्रमाणित किया कि पौधों में जीवन होता है…आप उनको जीवन देते, वृक्ष लगाते तो सम्भवतः ऑक्सीजन प्लांट की जरूरत ही न पड़ती.. जो देता है, वही श्रेष्ठ होता है, छीनने वालों को श्रेष्ठ होने का दम्भ रहता है और वे अपनी श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र दूसरों से चाहते हैं….आप एक नकली जीवन जीते रहे और इसे अपनी उपलब्धि मानकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं पर हुआ क्या….प्रकृति के प्रतिकार ने आपको आपकी जगह दिखा दी।
हर साल की तरह इस बार भी पर्यावरण दिवस मनाने का मन बना रहे हैं। कोविड के कारण बड़े – बड़े समारोह होना कठिन है तो ऐसे में एक काम करिए न…मानते हैं हम कि सड़क पर पेड़ लगाना हमारे हाथ में नहीं है,,,मगर अपने कमरे में तो 2 पौधे लगाकर उनको पानी दे ही सकते हैं…उनका ख्याल रख ही सकते हैं। पौधे आपको ऑक्सीजन देंगे और आपको एक सन्तुष्टि मिलेगी…तो इस बार एक कमरा, दो पौधे और एक हरी -भरी सृष्टि।

वहम के रोग से खुद को दूर रखना जरूरी है

प्रो, गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। उम्मीद है, आप सब सपरिवार सकुशल होंगी और जिंदगी की हर परेशानी का सामना हँसते हुए कर रही होंगी। सखियों, एक शब्द है “वहम” और यह एक शब्द कभी -कभी हमारे जेहन और जिंदगी पर इतना गहरा असर छोड़ता है कि इस से निकलकर स्वाभाविक जिंदगी जीना हमारे लिए संभव नहीं हो पाता। हालांकि कई वहम बेहद खूबसूरत भी होते हैं जिनके साए में इंसान की जिंदगी बड़ी खुशी के साथ कट जाया करती है। शायद इसीलिए बहुत बार‌ लोग -बाग, यार- दोस्त यह राय देते भी नजर आते हैं कि जिंदगी अगर बेमजा और बेमक़सद हो जाए तो उसे खुशनुमा और आसान बनाने के लिए एक खूबसूरत वहम पाल लेना चाहिए। लेकिन दुनिया तो दुनिया है। वह भला एक सी बात कब कहती है और अगर कह भी दे तो ज्यादा देर‌ तक उस पर कायम भी नहीं रहती इसीलिए कभी- कभार यही कठोर दुनिया वाले यह कहते भी नजर आते हैं कि “चाहो तो कुत्ता पाल लो, बिल्ली पाल लो लेकिन वहम बिल्कुल ना पालना”। इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि यह वहम कभी -कभी आप की जिंदगी को इतना नकली या बनावटी बना देता है कि उस से निकलना किसी के लिए भी मुश्किल हो जाता है। 

सखियों, आज मैं उसी “वहम” की बात कर रही हूं जो कभी- कभार हमारी जिंदगी दूभर या मुश्किल बना देता है। मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो बहुत मर्तबा वहम हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा मर्ज बन जाता है और उस मर्ज का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं होता। वहमी आदमी को‌ तरह- तरह के वहम होते हैं। किसी को‌ वहम होता है कि उसकी तबियत सही नहीं है और‌ वह जिस किसी भी बीमारी या उसके लक्षणों के बारे में सुनता है, उन पर गहराई से विचार करने के बाद उन्हें खुद में मौजूद पाता है। ऐसे वहमी आदमी को लगता है कि दुनिया की हर बीमारी उसे है और वह यकीनी और बेयकीनी के बीच डूबता -उतराता रहता है। इसी विषय पर 1979 में एक हास्य फिल्म भी बनी थी, “मेरी बीवी की शादी”। इसके मुख्य किरदार, जिसकी भूमिका अमोल पालेकर ने निभाई थी, को भी बीमारी का वहम है और उसे लगता है कि वह जल्दी ही मरने वाला है। इसी कारण वह न केवल मरणोपरांत अपनी समाधि पर लगवाने के लिए पत्थर पर अपना नाम खुदवा लेता है बल्कि अपनी पत्नी के लिए दूसरे पति की तलाश भी शुरू कर देता है। फिल्म का तो अंत सुखद होता है लेकिन इस तरह का वहम कई बार जिंदगी को जहन्नुम भी बना देता है। अब कोई रोग हो तो उसका इलाज़ मुमकिन भी है लेकिन वहम का इलाज भला कैसे हो। तभी तो किसी समझदार आदमी ने कहा है कि “वहम का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है।”

सखियों, इस दुनिया में सेहतमंद दिखाई देने वाला आदमी भी बहुत बार ऐसे घातक वहम रूपी मानसिक बीमारी का शिकार हो जाता है जो उसकी ही नहीं उसके आस- पास के लोगों की जिंदगी भी दूभर कर देता है। लोगों को तरह- तरह के वहम होते हैं। किसी को लगता है कि सारी दुनिया ही उसकी दुश्मन‌ है और‌ वह लोगों की भीड़ से भागता फिरता है। कोई अपने आप को दुनिया का सबसे खूबसूरत और दानिशमंद आदमी समझने का वहम पाल लेता है और सारी दुनिया को खुद से कमतर समझता हुआ क्रमशः लोगों से दूर हो जाता है। किसी को वहम होता है कि उस पर लगातार नजर रखी जा रही है या उसके खिलाफ साज़िश रची जा रही है और‌ वह हर घड़ी चौकन्ना रहता है। यह अतिरिक्त सतर्कता एक तरह के रोग में बदल जाती है जिसका परिणाम बहुधा घातक होता है। इसी तरह किसी -किसी को वहम हो जाता है कि दुनिया भर के लोग उसका मजाक उड़ाया करते हैं और इस कारण वह तमाम लोगों को अपना दुश्मन समझता हुआ, अकेलेपन में रहने का आदी हो जाता है। किसी को यह वहम हो जाता है कि फलां आदमी और औरत उस पर जान छिड़कता या छिड़कती हैं और यह वहम उसकी जान का अजाब बन जाता है। जब वहम टूटता है तो इसके कई घातक परिणाम भी दिखाई देते हैं। लब्बो लुआब यह है कि जब तक वहम एक खूबसूरत अहसास की तरह रहता है, वह कई बार पुरसुकून भी होता है। जैसे शायर अपने वहम की दुनिया में पड़ा हुआ अजीब से ख्यालात में डूबा हुआ फ़ानी बदायुनी की तरह कह बैठता है-

“न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम 

रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम ।”

इसका मतलब यह हुआ कि कुछ वहम ऐसे भी होते हैं जो इस मुश्किल जिंदगी को थोड़ा आसान जरूर बना देते हैं और आदमी इस बेआराम, बेरहम दुनिया में इस खूबसूरत वहम के सहारे खुद को बहलाते हुए किसी ना किसी तरह जीने का बहाना जरूर ढूंढ लेता है, ठीक उसी तरह जैसे अदा जाफ़री ढूंढ लेते हैं-

“लोग बे-मेहर न होते होंगे 

वहम सा दिल को हुआ था शायद ।”

यह बात मानने में हमें गुरेज़ नहीं होनी चाहिए कि कुछ ऐसे तसल्ली बख्श वहम न हो तो इंसान की जिंदगी दूभर हो जाए। कुछ ऐसे ही वहम समर्पित प्रेमी भी पाल‌ लेते हैं और अपने महबूब की यादों से ही अपना दिल बहला लेते हैं और उसके ना मिलने पर‌ भी झूठे वहम का बहाना बना कर खुद को तसल्ली दे देते हैं। इसी तरह के ख्यालात शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ पेश करते हुए कहते हैं-

 

“क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से 

जो ख़्वाब में भी रात को तन्हा नहीं आता ।।”

लेकिन जो वहम आप को बीमार बना दें, उनसे तो भरसक बचने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि अगर आप इसमें सुध -बुध खोकर डूब गए तो आपके लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी, तब न दवा से काम बनेगा, ना दुआ ही काम आएगी, शायर यगाना चंगेज़ी की जुबां में कहें तो-

“दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है 

 वहम की क्या दवा करे कोई ।।”

और यह वहम आदमी को कभी- कभार आदमी नहीं रहने देता, उसे गुनाह की दुनिया में भी ढकेल देता है, अब वह गुनाह उसे किस राह पर कितनी दूर तक ले जाएगा, यह तो हालात पर निर्भर करता है। हम इस वहम की गिरफ्त में आकर बीमार और‌ गुनहगार न बन जाएं इसीलिए हसरत मोहानी साहब की तजवीज पर भी गौर फरमाने की जरूरत है-

“हम जौर-परस्तों पे गुमाँ तर्क-ए-वफ़ा का 

 ये वहम कहीं तुम को गुनहगार न कर दे ।”

इसी कारण सबा अकबराबादी इस वहम नामक बीमारी से मुक्त होने की कोशिश करते हुए कुछ बेबसी के साथ कहते नजर आते हैं-

“कब तक नजात पाएँगे वहम ओ यक़ीं से हम 

उलझे हुए हैं आज भी दुनिया ओ दीं से हम ।”

सखियों, वहम के सवाल पर इतनी बात करने का कारण यही है कि आप इस बीमारी से भी अपने आप को बचा कर रखें।  शरीर के रोग का इलाज हम जितनी तत्परता से करते हैं, उतना ध्यान अगर मन के रोग पर भी दें और समय रहते उसका इलाज कर‌ लें तो हमारी जिंदगी आसान भी हो जाएगी और खुशहाल भी। इसीलिए वहम के रोग को कल्पना की दुनिया से निकलकर जिंदगी की हकीकत में तब्दील मत होने दीजिए नहीं तो जिंदगी की दुश्वारियां बेइंतहा बढ़ जाएंगी। इन्हीं दुश्वारियों से दामन बचाने की खातिर सूफी और शायर इस दुनिया और इसकी बहुत सी बातों और रवायतों को भी वहम ही मानते हुए कह बैठते हैं-

“ये तमाशा-ए-इल्म-ओ-हुनर दोस्तो

कुछ नहीं है फ़क़त काग़ज़ी वहम है।” (नईम रज़ा भट्टी)

आज विदा, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।

 

स्वातंत्र्यवीर सावरकर

   — शुभांगी उपाध्याय

जब हमारा देश परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, घायल था, जब हमारी इच्छाओं का संचालन विदेशी शासक कर रहे थे और हमारी अपार धनसंपदा को लूटलूट कर सात समुंदर पार ले जा रहे थे, तब कितने ही वीर बलिदानियों ने उन विदेशी शक्तियों तथा अत्याचारियों को ललकारा और अपने प्राणों की आहुति दे दी। परंतु फिर भी उनके नाम को इतिहास के पन्ने से मिटाये जाने के यत्न हुए, उनके यादों को भुला देने की कोशिश की गई। लेकिन आज की युवा पीढ़ी ने स्वतंत्र भारत का नया इतिहास लिखना प्रारंभ किया है, जिसमें उन सच्चाइयों का वर्णन भी है जिसे झूठ की परतों के नीचे अबतक छिपाकर रखा गया था। समय के निष्पक्ष हाथों ने उन सच्चाइयों को ढूंढ निकाला है। उन्हें प्रकाश में लाने के प्रयत्न होने लगे हैं। उस नए इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय का ही नाम हैस्वातंत्र्यवीर सावरकर

एक किशोर बालक माँ दुर्गा के समक्ष प्रण करता है, माता महिषासुर मर्दिनी तेरे पावन चरणों की सौगंध खाकर मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अपने देश की स्वतंत्रता पुनः प्राप्त करूँगा, और इसके लिये सशस्त्र क्रांति की पताका भी फहराउंगा। यदि इसमें मैं सफल हुआ तो छत्रपति शिवाजी महाराज की भांति स्वराज स्थापित करूँगा और तेरे मस्तक पर स्वतंत्रता का अभिषेक करूँगा। माँ मुझे शक्ति दो!”

विनायक सावरकर का जन्म महाराष्ट्र (उस समय, ‘बॉम्बे प्रेसिडेन्सी’) में नासिक के निकट भागुर गाँव में चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम राधाबाई तथा पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर था। इनके दो भाई गणेश (बाबाराव) व नारायण दामोदर सावरकर तथा एक बहन नैनाबाई थीं। विनायक का परिवार एक आदर्श राष्ट्रवादी परिवार था। तीनों भाई स्वत्रंता सेनानी थे तथा इनकी पत्नी और भाभी का भी इस संग्राम में बहुत बड़ा योगदान रहा है।

बाल गंगाधर तिलक के लेख पढ़कर प्रेरित नवयुवक विनायक नेअभिनव भारतजैसे क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य समय पड़ने पर सशस्त्र क्रांति के जरिए स्वतंत्रता हासिल करना था। इसी के साथ उन्होंने ‘मित्र मेला’ नाम की एक गुप्त संस्था भी बनाई। अंग्रेजों ने अपनी कुत्सिक मानसिकता का परिचय देते हुए 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया। सावरकर ने लोगों को जागरूक करस्वदेशीके नारे को प्रबलता प्रदान की। इस आंदोलन में पुणे में जनता ने विदेशी कपड़ों की होली जलायी गयी, अंग्रेजों द्वारा निर्मित प्रत्येक वस्तुओं का बहिष्कार कर दिया गया। सावरकर के नेतृत्व में ही भारतवर्ष में ऐसा पहली बार हुआ। तिलक जी के अनुमोदन पर १९०६ में उन्हें श्यामजी कृष्ण वर्मा के माध्यम से  छात्रवृत्ति मिली और वे कानून की पढ़ाई करने गोरों के गढ़ लंदन जा पहुंचे। वकालत की पढ़ाई लंदन में पूरी करने वाले वीर सावरकर पहले भारतीय थे।

मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी की 1500 से अधिक किताबों को पढ़ लिया था। क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उनपर लाइब्रेरी में जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। वकालत की पढ़ाई के बाद डिग्री के लिए जब उन्हें लंदन के विश्वविद्यालय में ब्रिटिश राज भक्ति की शपथ लेने को कहा गया तब उन्होंने इससे साफ इंकार कर दिया जिसके चलते उन्हें वकालत की डिग्री नहीं दी गई। सावरकर  इटली के स्वतन्त्रता सेनानी ‘जोजेफ मैजिनी और गैरीबाल्डी’ के विचारों से बहुत प्रभावित थे और देश के लिए उनके आदर्शों के प्रशंसक थे। इसलिए इंग्लैंड में लिखी उनकी पहली पुस्तक ‘मैजिनी की आत्मकथा’ का ही मराठी रूपान्तर था जिसने देशवासियों में तहलका मचा दिया था। इस पुस्तक के कुछ अंश इस प्रकार थे – ‘‘कोई भी राष्ट्र कदापि नहीं मरता। परमात्मा ने मानव को स्वतन्त्र रहने के लिए उत्पन्न किया है। जब दृढ़ संकल्प लोगे तभी तुम्हारा देश भी स्वतन्त्र हो जायेगा।’’ 

भारत में इसके प्रकाशन के लिए पर्याप्त धनराशि जुटाने में बाबाराव असफल हो गए तब क्रांति की देवियों ने, उनकी पत्नी और सावरकर की पत्नी ने अपने गहने बेच कर धन इकट्ठा करने में सहायता की। अंग्रेजों को जब इस पुस्तक का पता चला तो उन्होंने इसके प्रकाशन को बीच में ही बंद करवा कर पुस्तक भी जब्त कर ली। इस कलम के सिपाही से अंग्रेज़ी हुकूमत इतनी आक्रान्तित थी कि इनके द्वारा लिखित 1857 की क्रांति पर आधारित पुस्तक ‘1857 का सम्पूर्ण सत्य’  को प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रतिबन्धित कर दिया। विश्व इतिहास में किसी लेखक के साथ ऐसा पहली बार हुआ था। इस ग्रंथ का अंग्रेजी अनुवाद श्री वी0 वी0एस0 अय्यर एवं बैरिस्टर फड़के द्वारा किया गया और अथक प्रयास के बाद हालैंड में इस पुस्तक का प्रथम अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हो पाया। तदुपरान्त 1909 में इस पुस्तक का प्रकाशन फ्रांस से हुआ। सारे विश्व में स्वतन्त्रता-प्रेमियों ने इस पुस्तक की सराहना की और भारत के क्रांतिकारियों के लिए तो यह भगवद्गीता की तरह पवित्र धरोहर बन गई। इसी पुस्तक का तृतीय संस्करण अमर शहीद सरदार भगत सिंह ने 1929 में गुप्त रूप से कराया। विदित हो कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के मलाया पहुँचने पर उनके हाथ में भी इस पुस्तक की एक पांडुलिपि थी। मगर इस ग्रंथ का मूल मराठी संस्करण 1936 में वीर सावरकर के साहित्य से प्रतिबन्ध उठा लेने के बाद ही प्रकाशित हो सका। 

लंदन में उनका निवासइंडिया हाउसमें हुआ। वे यहाँ रहकर इंग्लैंड और भारत में रह रहे क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन किया करते थे। उन्होंने लंदन पहुंचते ही हिन्दुस्तानी छात्रों से सम्पर्क साधना शुरू कर दिया था। लाला हरदयाल और मदन लाल ढ़ींगरा के अलावा वी.वी.एस. अय्यर, डब्लू.बी.फड़के, सुखसागर दत्त, पाण्डुरंग बापट, निरंजन पाल, आशिफ अली, एम.पी.टी. आचार्य, नहुक चतुर्भुज, सिकन्दर हयात, ज्ञानचन्द वर्मा, विरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, हेमचन्द दास आदि युवा उनके साथी बन गए। इन युवा हिन्दुस्तानियों को अपने जोशिले भाषणों और प्रखर राष्ट्रवादी चिंतन से प्रेरित कर उन्हें क्रांतिकारी पथ पर अग्रसर करने के प्रयास में सावरकर कामयाब रहे।

इसी बीच सावरकर ने अपने एक साथी बापट को रूसी क्रांतिकारी से बम बनाने की विधि सीखने के लिए प्रेरित किया। काफी प्रयासों के बाद बापट अपने जानकार रूसी क्रांतिकारी से बम बनाने का मैनुअल हासिल करने में कामयाब हो गए। सावरकर ने इस मैनुअल को पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाकर भारत के क्रांतिकारियों तक पहुंचावाई, ताकि देशभर में एक साथ बम विस्फोट करके अंग्रेजी शासन का तख्ता पलट किया जा सके। बड़ी ही सावधानी से उन्होंने पिस्तौल भी भेजवायी।

22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में ’अन्तर्राष्ट्रीय समाज संघ’ की बैठक आयोजित हुई जिसने सावरकर के परामर्श से ‘मादाम कामा’ एवं ‘सरदार सिंह राणा’ को वहाँ भेजा गया। ‘मादाम कामा’ ने वहाँ जाकर भारतीय ध्वज हाथों में उठाते हुए गरज कर कहा – ‘‘यह भारतीय स्वतन्त्रता का ध्वज है। शहीदों के रक्त से सिंचित हो यह और भी पावन हो गया है। मैं आप सभी स्वतन्त्रता-प्रेमियों को आह्वान करती हूँ कि आप सब उठ कर इस भारतीय ध्वज को सम्मान दें।’’  इस ध्वज में सभी आठ प्रान्तों के प्रतीक कमल पुष्प, सूर्य, चांद और बीच में ‘वन्देमातरम’ अंकित था और सावरकर ने स्वयं इसे बनाया था।

सावरकर सचमुच ऐसी धातु से बने हुए थे जो तपाने पर और भी निखरने लगता है, प्रतिकूल परिस्थितियों में और भी अधिक उत्साह से जूझने के लिए तत्पर होता है। जब वे लन्दन में थे तो भारत में उनके परिवार पर जुल्मों का दौर जारी हो चुका था। उनके 8 वर्षीय पुत्र प्रभाकर की मौत हो गई थी। देशभक्ति की कविताएं प्रकाशित करवाने और अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध जन-विद्रोह भड़काने के आरोप में उनके बड़े भाई को गिरफ्तार कर अण्डमान जेल भेज दिया गया था। नासिक जैक्सन हत्या केस में सावरकर के साथियों को पकड़ लिया गया था और उन्हें फांसी पर लटकाने की तैयारी की जा रही थी। सावरकर की भाभी व पत्नी को अंग्रेजी सरकार ने बेघर कर दिया था। अंग्रेजी सरकार ने लन्दन और हिन्दुस्तान में दोनों जगह सावरकर की गिरफ्तारी के वारन्ट भी जारी कर दिए। इसके बावजूद सावरकर ने स्वदेश लौटने का संकल्प लिया।

 श्रीमदन लाल ढ़ींगरा ने सावरकर से पूछा था, “व्यक्ति बलिदान के लिए कब तैयार होता है?” सावरकर ने उत्तर दिया, “जब वो अपने विवेक से प्रेरित होकर दृढ़ निश्चय कर लेता है तभी !” उनके इन्हीं वचनों से प्रेरित होकर 1 जुलाई 1909 को लन्दन के इम्पीरियल-इंस्टिच्यूट के जहाँगीर हाॅल में मदनलाल ढींगरा ने कर्जन वायली नामक एक अंग्रेज अधिकारी की गोली मार कर हत्या कर दी। अंग्रेजी सरकार बौखला उठी। 17 अगस्त 1909 को मदनलाल ढींगरा को फाँसी पर लटका दिया गया। उनके अन्तिम शब्द थे, ‘‘ईश्वर से मेरी अन्तिम प्रार्थना है कि मैं तब तक उसी भारत माता के लिए जन्मता और पुनः मरता रहूँ जब तक यह स्वतन्त्र न हो जाये।’’  उधर कुछ भारतीय नेताओं ने कैकस्टन हॉल में बैठक बुलाकर ढ़ींगरा के खिलाफ सर्वसम्मति से निन्दा प्रस्ताव पास करने की घोषणा की। इस बैठक में पहुंचकर वीर सावरकर ने ढ़ींगरा के पक्ष की जबरदस्त पैरवी की और उनके खिलाफ निन्दा प्रस्ताव पास नहीं होने दिया। इधर भारत में सावरकर के छोटे भाई श्री नारायण को भी गिरफ्तार कर लिया गया। सावरकर ने इस समाचार को सुनकर गर्व से कहा- इससे ज्यादा गौरव की बात और क्या होगी कि हम तीनों भाई ही स्वातन्त्रय लक्ष्मी की आराधना में लीन हैं।

जब वीर सावरकर 13 मई, 1910 की रात्रि को पैरिस से लन्दन पहुंचे तो स्टेशन पर ही पुलिस ने उन्हें तुरन्त गिरफ्तार कर लिया। अदालत ने उनके मुकदमे को भारत में शिफ्ट कर दिया। जब सावरकर को 8 जुलाई, 1910 को एस.एस. मोरिया नामक समुद्री जहाज से भारत लाया जा रहा था तो वे रास्ते में जहाज के सीवर के रास्ते से समुद्र में कूद पड़े और गोरे अधिकारियों की गोलियों की बौछार के बीच वे फ्रांस के दक्षिणी सागरतट पर पहुँच ही गये, मगर फ्रांस के सिपाहियों ने उन्हें अंग्रेजों को सौंप दिया।

उन्हें बम्बई लाया गया। यहाँ पर तीन जजों की विशेष अदालत गठित की गई। इसमें अपराधी की पक्ष जानने का कोई प्रावधान नहीं था। इस अदालत में सावरकर को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध शस्त्र बनाने की विधि की पुस्तक प्रकाशित करवाने का दोषी ठहराकर 24 दिसम्बर 1910 को 25 साल कठोर काला पानी की सजा सुनाई। इसके साथ ही दूसरे मुकदमें में नासिक के कलक्टर मिस्टर जैक्सन की हत्या के लिए साथियों को भड़काने का आरोपी ठहराकर अलग से 25 साल के काला पानी की सजा सुनाई गई। इस तरह सावरकर को दो अलग-अलग मुकदमों में दोषी ठहराकर दो-दो आजन्मों के कारावासों की सजा के रूप में कुल 50 साल काले पानी की सजा सुनाई गई। ऐसा अनूठा मामला विश्व के इतिहास में पहली बार हुआ, जब किसी को इस तरह की सजा दी गई।

7 अप्रैल 1911 को उन्हें अण्डमान भेज दिया गया। उन्होंने दस वर्ष अंडमान की सेल्युलर जेल में बिताए। इस दौरान उन्हें जेलर डेविड बेरी के कहर का सामना करना पड़ा क्योंकि सरकार ने उन्हें खतरनाक कैदी का बिल्ला पहनाया थाइस जेल के हर सेल का आकार 4.5 m×2.7m था। यहाँ से कोई भाग नहीं सकता था क्योंकि इस जेल के चारों तरफ पानी ही पानी है।

यहाँ भयंकर अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं जैसेकोल्हू में बैल की तरह जुत कर रोज़ाना 30 पौंड तेल निकलवाना, घड़ी की भांति घंटों दीवार में टांग देना, कई सप्ताह तक हथकड़ी पहनकर खड़े रहकर बागवानी, गरी सुखाने, रस्सी बनाने, नारियल की जटा तैयार करने, कालीन बनाने, तौलिया बुनने का काम,एकांत काल कोठरी में कैद करना, पीने को स्वच्छ जल उपलब्ध ना करना, सड़ेगले भोजन परोसना आदि। ये यातनाएं इतनी भयावह थी कि कैदी को मानसिक और शारीरिक रूप से अपाहिज बनाने में सक्षम थी। इन सबके विरूद्ध कैदियों के साथ मिलकर सावरकर ने भूख हड़ताल की और किसी प्रकार पत्र के जरिए कमिश्नर को अण्डमान जेल में कैदियों पर हो रहे अत्याचारों से अवगत करवाया। परिणामस्वरूप कार्यवाही हुई और जेलर डेविड को वहां से हटा दिया गया। इसके साथ ही कैदियों की सभी शर्तों को भी मान लिया गया। परंतु असहनीय प्रताड़नाओं को सहते हुए क्रांतिकारी इंदुभूषण ने आत्महत्या कर ली और महीने भर भूख हड़ताल के कारण 16 वर्षीय नानी गोपाल ने भी दम तोड़ दिया।

इस अण्डमान जेल में सावरकर की काव्य-प्रतिभा और निखर उठी। उन्होंने करीब दस हजार काव्य पंक्तियों की यहाँ रचना की। देशभर में सावरकर की रिहाई के लिए भारी आन्दोलन चला और उनकी रिहाई के मांग पत्र पर 75000 लोगों ने हस्ताक्षर किए। वर्ष 1921 में देशभर में भारी जन-आक्रोश के चलते उन्हें अण्डमान से वापस भारत भेजा गया और रत्नागिरी सैन्ट्रल जेल में रखा गया। इस जेल में वे तीन वर्ष तक रहे। जेल में रहते हुए उन्होंने ‘हिन्दुत्व’ पर शोध ग्रन्थ तैयार किया। उनके विचार में हिंदुत्व की परिभाषा कुछ इस प्रकार है, हिन्दू हमारा नाम है और हिंदुस्तान हमारी मातृभूमि है, सभी हिन्दू एक हैं, हमारा राष्ट्र एक है। एक राष्ट्र, एक जाति और एक संस्कृति के आधार पर ही हम हिंदुओं की एकता आधारित है। वे सभी व्यक्ति हिन्दू हैं जो हिमालय से समुद्र तक इस समग्र देश को अपनी पितृभूमि के रूप में मान्यता देकर वंदना करते हैं। जिसकी धमनियों में उस महान जाति का रक्त प्रवाहित हो रहा है जिसका मूल सर्वप्रथम सप्त सिन्धुओं में परिलक्षित होता रहा है और जो विश्व में हिन्दू नाम से सुविख्यात है। हमारा कर्त्तव्य है कि हम देश में रहने वाले हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों और यहूदियों में यह पवित्र भाव जागृत कर सकें कि हम सब सबसे पहले हिंदुस्तानी हैं और उसके बाद कुछ और।

देशभर में सावरकर की रिहाई को लेकर चले आंदोलनों के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें इन शर्तों के साथ रिहा कर दिया कि वे न तो रत्नागिरी से बाहर जाएंगे और न ही किसी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेंगे। जेल से रिहा होने के बाद देश के बड़े-बड़े नेता और यहाँ तक कि महात्मा गांधी भी उनसे मिलने आए और उनकी देश-भक्ति की मुक्त-कंठों से प्रशंसा की। किन्तु दोनों के विचारों में जीवन-पर्यन्त अन्तर बना रहा। मार्च, 1925 में उनसे मिलने डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार पहुंचे और 22 जून, 1940 को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस उनसे मिलने आए।

देश की आजादी के सम्बन्ध में दोनों महान् नेताओं में विशद चर्चा हुई। सावरकर ने जापान से आये क्रन्तिकारी रास बिहारी बोस के पत्र की भी चर्चा की। सावरकर हिन्दू नवयुवकों से अंग्रेज़ी सेना में भर्ती होने को इसलिए कहते थे, ताकि अवसर आने पर जब हाथ में बंदूकें होंगी तब उसकी नोक किस दिशा में मोड़नी है वो यह भी सोच लेंगे। वे सभी विद्यालयों/महाविद्यालयों में सैनिक शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। सावरकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सशक्त क्रान्ति का प्रयास किये बिना अब भारत को स्वतन्त्र नहीं कराया जा सकता। इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर नेताजी जर्मनी होते हुए सिंगापुर पहुँच गये और वहीं पर ‘आजाद हिन्द सेना’ की स्थापना की। सिंगापुर रेडियो पर नेताजी ने कहा था कि, भारत के सभी नेताओं में केवल सावरकर ही दूरद्रष्टा हैं।

अन्त में श्री जमुनादास मेहता के प्रयास से 10 मई 1937 को रत्नागिरी की नजरबन्दी से वीर सावरकर को मुक्ति मिली तथा 27 वर्षों का वनवास काटकर अब वे पूर्णतः स्वतंत्र थे। वे छुआछूत, जात पात के सख़्त विरोधी थे। फरवरी, 1931 में वीर सावरकर के प्रयासों से बम्बई में पतित पावन मन्दिर की स्थापना हुई। यह मन्दिर हर जाति, धर्म व वर्ग के लोगों के लिए खुला रहता था। सावरकर ने देश से जातिपाति, धर्म-मजहब के भेदभाव मिटाने के लिए राष्ट्रव्यापी जागरूकता आन्दोलन चलाए। देशभक्तों के अटूट स्वतंत्रता संघर्ष की बदौलत 15 अगस्त, 1947 को देश को आजादी नसीब हुई। लेकिन, देश का विभाजन हो गया। सावरकर इस विनाशकारी विभाजन के बिल्कुल विरूद्ध थे। वे लाख प्रयास करने के बावजूदी इस विभाजन की त्रासदी को रोक नहीं पाए।

वीर सावरकर एक महान क्रांतिकारी के साथ-साथ प्रखर वक्ता, दूरदृष्टा, भाषाविद, कवि, लेखक, कूटनीतिक, राजनेता, इतिहासकार और समाज सुधारक भी थे। वीर सावरकर ने अपने जीवनकाल में ‘भारतीय स्वातांत्रय युद्ध’, ‘मेरा आजीवन कारावास’, ‘अण्डमान की प्रतिध्वनियां’, ‘हिन्दुत्व’, ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेस-1857’ जैसी कालजयी पुस्तकों की रचनाएं कीं। वीर सावरकर हिन्दू संगठनों के कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे और कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों में मुख्य वक्ता भी बने। 8 अक्तूबर, 1959 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी.लिट. की उपाधि से नवाजा। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेई वी सावरकर के संदर्भ में लिखते है – “सावरकर माने तेज, सावरकर माने त्याग, सावरकर माने तप, सावरकर माने तत्व, सावरकर माने तर्क, सावरकर माने तारुण्य, सावरकर माने तीर, सावरकर माने तलवार

26 फरवरी, 1966 के दिन मुम्बई में प्रातः दस बजे, क्रांतिकारियों के सिरमौर वीर सावरकर ने नश्वर संसार को हमेशा के लिए त्याग दिया। इन्होंने जीवन भर देश की आजादी और उसके उत्थान के लिए अटूट संघर्ष किया और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। इस वीर अमर होतात्मा का यह राष्ट्र सदैव ऋणी रहेगा।

 

(लेखिका विवेकानंद केंद्र के पश्चिम बंग प्रान्त में विभाग युवा प्रमुख हैं और कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोधार्थी भी।)

कोरोना योद्धा : पंकज प्रसून की मुहिम से जुड़े सोनू सूद, मालिनी अवस्थी और कुमार विश्वास

राशन और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर से लेकर कोविड सेंटर की व्यवस्था की
रायबरेली के कवि पंकज प्रसून ने अपने पैतृक गांव सहजौरा समेत 8 ग्राम पंचायतों में ‘आओ गांव बचाएं’ मुहिम की शुरुआत की है और इस मुहिम से बड़ी हस्तियाँ जुड़ गयी हैं। उत्तर प्रदेश के 33 गांवों की कमान अब मशहूर कवि कुमार विश्वास, फिल्म स्टार सोनू सूद और लोक गायिका मालिनी अवस्थी
पिछले एक महीने के अंदर इन तीनों हस्तियों ने रायबरेली और सुल्तानपुर के 33 गाँवों तक लोगों को मदद पहुंचाई है। लोगों को मुफ्त में दवाइयां और जांच की सुविधा दी जा रही है। कुमार विश्वास ने 8 गांवों में विश्वास कोविड केयर सेंटर भी खोले हैं। इन सेंटर्स में हल्के लक्षण वाले कोरोना मरीजों का इलाज किया जा रहा है।
रायबरेली की 8 ग्राम पंचायतों में कवियों की फौज जुटी
रायबरेली के कवि पंकज प्रसून ने अपने पैतृक गांव सहजौरा समेत 8 ग्राम पंचायतों में ‘आओ गांव बचाएं’ मुहिम की शुरुआत की है। इसी के तहत कवि कुमार विश्वास भी जुड़े और उन्होंने 8 गांवों में विश्वास कोविड केयर सेंटर की स्थापना करवाई। पंकज प्रसून ने बताया कि इस अभियान में अभिनेता सोनू सूद और लोक गायिका मालिनी अवस्थी भी जुड़े गए हैं। इन लोगों की मदद से 4 ग्राम पंचायतों के 30 गांवों को कोरोना की मुफ्त दवाइयां, राशन किट और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर पहुंचाया गया।
डॉक्टरों से परामर्श दिला रहे
कवि पंकज प्रसून ने बताया कि विश्वास कोविड केयर सेंटर्स पर पहुंचने वाले मरीजों को डॉक्टर पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी, पीजीआई के डॉक्टर ज्ञान चन्द्र, राजीव दीक्षित अस्पताल के डॉ. दीना नाथ पटेल, एनबीआरआई के डॉ. संजीव ओझा हमेशा मॉनिटर करते हैं। वीडियो कॉल और फोन कॉल के जरिए मरीजों को परामर्श दिया जाता है। उन्हीं के प्रिस्किप्शन के अनुसार मरीजों को दवा दी जाती है।
सुल्तानपुर के 3 गाँवों में खुले केंद्र
कुमार विश्वास की टीम ने सुल्तानपुर के कई गांवों में भी कोविड किट पहुंचाई है। यहां तीन गांवों में विश्वास कोविड केयर सेंटर बनाया गया है। इन सेंटर्स पर हल्के लक्षण वाले मरीजों को दवा दी जा रही है। इसके अलावा ग्रामीणों को कोविड केयर किट भी दी जा रही है। इस किट में दवा, मेडिकल उपकरण होते हैं।

स्वतन्त्रता के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाले शहीद सआदत खां

शहीद सआदत खां इन्दौर रियासत के महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) के फौजी थे। 10 मई 1857 का वह संकल्प भरा दिन जब पूरा देश भारत के अन्तिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हो गया था। मेरठ में क्रांति की चिंगारी सुलग पड़ी जिसमें दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल आदि सभी को अपनी आगोश में जकड़ लिया।
दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर, बेगम ज़ीनत महल, बख्त खान, झांसी में महारानी लक्ष्मीबाई, बैरकपुर में मंगल पांडे, मेरठ में धनसिह गुर्जर, जगदीशपुर में बाबू कुंवर सिंह, रेवाड़ी में राव तुलाराम सिंह, बल्लभगढ़ में राजा नाहर सिंह, बड़कागढ़ में राजा विश्वनाथ शाहदेव कानपुर में नाना साहब – अज़ीमुल्ला खान, लखनऊ में बेगम हज़रत महल, बांदा स्टेट में नवाब अली बहादुर, फैज़बाद में मौलवी अहमदुल्लाह, इलाहाबाद में मौलवी लियाकत अली, बरेली में खान बहादुर, तो इन्दौर में महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) के फौजी एवं मालवा के पठान सआदत खां ने फिरंगियों के खिलाफ हल्ला बोल दिया।
जब फिरंगियों के खिलाफ मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर द्वारा क्रांति की तारीख तय कर दी गई तो पूरे देश में फिरंगियों के खिलाफ जंग शुरू हो गई। छावनियों और रेजीडेंसियो पर हमले हुए अंग्रेज़ इधर उधर भागते नज़र आ रहे थे और मारे जा रहे थे ।
इन्दौर रियासत की सुरक्षा हेतु सआदत खां ने महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) से अर्ज़ किया : हमने आपका नमक खाया है, ये एक अच्छा मौका आया है आप हमारे सर पर हाथ रखें, हम आपको महेश्वर, महू रेजीडेंसी का इलाका वापस दिलाकर रहेंगे और आपको अंग्रेज़ी शिकंजे से आज़ाद करा देंगे। अगर आप 1818 में हुए महाराजा मल्हार राव (तृतीय) के सुलहनामे के कारण ऐसा नहीं कर सकते तो आप अंग्रेज़ो को बता दीजिए कि मेरे सारे फौजी बागी हो गये हैं। बगावत की खबरें सुनकर इन्दौर खामोश ना रहसका और 1 जुलाई 1857 को सआदत खां ने क्रांति का बिगुल बजा डाला।
1 जुलाई 1857 को सआदत खां के नेतृत्व में क्रांति कि तोपें गड़गड़ा उठीं और सआदत खां, भागिरथ सिलावट, वंश गोपाल, भाई सरदार खां और अन्य साथी रेजीडेंसी जा पहुंचे। उस समय कर्नल एच• एम• डुरान्डु रेजीडेंसी कोठी में अपनी टेबल पर काम कर रहे थे।
सआदत खां रेजीडेंसी पहुंच कर्नल डुरान्डु से बात करना चाहा पर वह अनाप-शनाप बकने लगा जिसका उन्होंने विरोध किया। इस पर डुरान्डु ने तमंचे से उन पर वार किया जो उनके कान को छूता हुआ निकल गया। सआदत खां बचते हुए सीधे अपने घोड़े पर बैठना चाहा तो इसी बीच कर्नल ट्रेवर्स आ पहुंचा और धमकाते हुए तलवार से मुकाबला करना चाहा जिसमें एक गहरा घाव सआदत खां के गाल पर लगा जिससे वह लहुलुहान हो गये ।
अपने सरदार को लहुलुहान देख क्रांतिकारी भड़क गए। उधर सआदत खां ने यलगार भरी : ” तैयार हो जाओ फिरंगियों को मारने के लिए महाराज साहिब का हुक्म है ! कुछ घंटों की मुठभेड़ के बाद इन्दौर को अंग्रेजों से आज़ाद करा लिया गया। कुछ ही देर में पूरे शहर में खबर फैल गई और इसी जगह रेजीडेंसी में देखते देखते हज़ारों लोगों की भीड़ जमा हो गयी। सआदत खां ने सभी को संबोधित किया और क्रांति को आगे बढ़ाते हुए अपने कदम दिल्ली की ओर मोड़ दिये। यहां से मिली सफलता के बाद वह अपने साथियों के साथ दिल्ली की ओर कूच कर गए। दिल्ली में शहज़ादा फिरोज़शाह अपनी सेना के साथ सआदत खां की फौज में शामिल हो गए और सआदत खां की फौज अंग्रेजों को परास्त करती रही।
20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया और मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को बंदी बना लिया गया। इस प्रकार क्रांति असफल हो जाती है और क्रांतिकारी समूह बिखर जाते हैं। इसके बाद अंग्रेज़ो द्वारा क्रांतिकारी नेताओं को ढूंढ ढूंढकर कालापानी, फांसी और तोपें से उड़ाने का काम करने लगे।
इसी बीच सआदत खां फरार हो जाते हैं और छुपते छुपाते बांसवाड़ा पहुंचे जातें हैं और वहां अपना नाम बदलकर अकबर खां के नाम से रहने लगते हैं। उनकी तलाश में 5,000 का इनाम घोषित किया जाता है, पर उनका पता नहीं चल पाता है।
17 साल बाद अर्थात 1874 में सआदत खां को उनके चेहरे के ज़ख्म के निशान की वजह से पहचान लिया जाता है और बांसवाड़ा में गिरफ्तार कर इन्दौर लाया जाता है और 1 अक्टूबर 1874 को सआदत खां को फांसी पर लटका दिया जाता है। सआदत खां की याद में इन्दौर लोकसेवा आयोग की कोठी के सामने ” स्मारक ” है जो हमेशा उनके योगदान को याद दिलाता रहेगा।

कोविड -19 :  ए बिट मोर फाउंडेशन और मानव ज्योत एनजीओ का सहायता कार्य

भवानीपुर पुलिस स्टेशन के साथ मिलकर कोरोना को लेकर जागरूक किया

कोलकाता :  ए बिट मोर फाउंडेशन के संस्थापक युवा क्षितिज मिराज शाह ने छोटी सी उम्र में ही समाज के प्रति अपने सामाजिक दायित्व को समझा है। कोरोना काल के इस दुष्कर समय में भवानीपुर पुलिस स्टेशन के साथ मिलकर ए बिट मोर फाउंडेशन और मानव ज्योत एनजीओ ने फुटपाथ पर रहने वाले लोगों के लिए और अखबार बेचकर अपना गुजारा करने वाले योद्धाओं को जो सुबह-सुबह हर घर में अखबार पहुंचाने का दायित्व निभाने का कार्य करते हैं, ऐसे लोगों के लिए कोरोना से संबंधित सुरक्षा और सावधानीपूर्वक रहने के लिए जागरूकता का संदेश दिया और कुछ आवश्यक सामग्री का वितरण भी किया। भवानीपुर पीएस के सार्जेंट पल्लव कुलाचार्य ने पुलिस स्टेशन के परिसर में दोपहर 12 बजे से दोनों संस्था के साथ मिलकर सभी जरूरतमंदों की सहायता के लिए अपने हाथ बढ़ाए। युवा क्षितिज ने इस अवसर पर लगभग 5000 मास्क 2500 सेनेटाइजर और सूखे नाश्ते जिसमें मूडी़, चिडंवा, बिस्किट, चनाचूर, सत्तू, केक आदि के पैकेट वितरित किए गए। इसके पूर्व क्षितिज मिराज शाह ने तिलजला अग्नि कांड में असहाय लोगों की मदद की थी। भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज ने भी इस कार्यक्रम में योगदान दिया जिसमें सोहिला भाटिया की सक्रिय भूमिका रही। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।

क्वान्टम तकनीक को लेकर गम्भीर है सरकार : आशुतोष शर्मा

कोलकाता : केन्द्र सरकार क्वान्टम तकनीक और इसकी सम्भावनाओं को लेकर गम्भीर है। इस तकनीक को लेकर काम करने वाले लोगों, समूहों, संसाधनों की खोज भी शुरू हो गयी है। ऐसोचेम द्वारा क्वान्टम तकनीक को लेकर आयोजित एक वेबिनार को सम्बोधित करते हुए विज्ञान एवं तकनीक विभाग के सचिव आशुतोष शर्मा ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि इसके लिए अगले तीन सालों में 200 करोड़ रुपये की लागत से परियोजना पर काम चल रहा है। केन्द्रीय बजट में भी अगले 5 साल में 800 करोड़ रुपये का आवंटन इस क्षेत्र के लिए किया गया है। वेबिनार को सम्बोधित करते हुए इसरो के वैज्ञानिक सचिव आर. उमामहेश्वरन ने इस तकनीक के महत्व को समझाया। माइक्रोसॉफ्ट इंडिया की राष्ट्रीय तकनीक अधिकारी डॉ. रोहिणी श्रीवत्स ने कहा कि इस क्षेत्र में डेवलपरों, विद्यार्थियों और कम्पनिय़ों के लिए बहुत सम्भावनाएं हैं। ऐसोचेम के महासचिव दीपक सूद ने कहा कि देश में और अधिक क्वान्टम कम्प्यूटिंग एप्लिकेशन लैब की जरूरत है। विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, अकादमिक क्षेत्र के लोगों की जरूरत है। क्वान्टम तकनीक का उपयोग स्वास्थ्य, निर्माण, एयरोस्पेस और इंजीनियरिग जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। इस वेबिनार में ऐसोचेम के अन्य गण्यमान्य अधिकारी भी उपस्थित थे।