Thursday, July 2, 2026
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प्रकृति अब मौन नहीं

वसुंधरा मिश्र
करोड़ों वर्षों से सजाया था
सपनों का ये आशियाना
मनुष्य की भावना पर कर विश्वास
सौंप दिया मनुज को यह पूरा हरा भरा संसार
सात्विक बन बैठे राजसिक तामसिक
जर्जरित विचार और चिंतन ने
घर की दिवारों में ही लगा लिया है सेंध
हवा-पानी धूप पर किया पूर्ण प्रहार
प्रकृति के संरक्षक ही बन बैठे सब भक्षक
प्रकृति नहीं रही अब मौन
कड़ी सुरक्षा के घेरे में बांध
मनुज को किया अधिकारविहीन
मृत्यु भय के पाश में जकड़ा
उसके ही हथियारों से उसको है मारा
तोड़ दिए सभी प्रेम के बंधन
प्रकृति तो जीवन प्रतीक है
उसे मारने वाले को वह
कभी क्षमा न करती
दैवीय शक्ति बन
छीन लेती उसका प्रभुत्व
आओ! आज कबूलें
जाने – अनजाने अपराध हमारे
पेड़ – पौधे नदी-नाले और पहाड़ों की भाषा को
नये सिरे से जाने-परखें
भारतीय संस्कृति तो प्रकृति पूजक है
क्यों न बचाएं फिर से अपनी धरती को
भूल आधुनिक धंधों को
आओ अपनी भूल सुधारें
जीवनदायिनी प्रकृति को गले लगाएं।

निर्गुण भक्ति धारा की कवयित्री राजस्थान की दयाबाई

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों  को नमस्कार। सखियों, हिन्दी साहित्य के मध्ययुग में बहुत सी ऐसी कवयित्रियाँ हुई हैं जिनके नाम समय के साथ इतिहास के खंडहरों में गुम हो गए हैं। कुछ के नामों का उल्लेख अवश्य मिलता है लेकिन उन पर विस्तार से चर्चा नहीं हुई है। उन सब के साहित्यिक अवदानों को याद करना और उस पर चर्चा करना भी हमारे लिए बेहद आवश्यक है। वैसे भी मध्ययुगीन कवयित्रियों में भक्त कवयित्री के रूप में मीराबाई का वर्णन ही प्रमुखता से हुआ है। बाकियों के अस्तित्व और अवदान की पर्याप्त अनदेखी या उपेक्षा हुई है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक अवदान के बारे में पता लगाएँ और उनके मूल्यांकन का प्रयास भी करें। भक्तिकाल की दो कवयित्रियों के नाम तकरीबन एक साथ लेकर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर दी है, ये हैं- सहजोबाई और दयाबाई। दोनों ही संत कवयित्रियाँ चरणदासी संप्रदाय में दीक्षित थीं। कुछ लोगों का कहना है कि ये चचेरी या मौसेरी बहनें थीं और कुछ का मानना है कि गुरुबहने थीं। लेकिन यह तथ्य निर्विवाद है कि दोनों ही संत चरण दास की शिष्या थीं। सहजोबाई के विषय में मैं अपने एक आलेख में चर्चा कर चुकी हूं, आज दयाबाई के साहित्यिक अवदान और भक्ति के स्वरूप पर चर्चा करूंगी। 

दयाबाई का जन्म मेवात के डहरा नामक गांव में सन 1693 में और मृत्यु  1773 में हुई। इन्होंने आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर दिल्ली में अपने गुरु चरणदास की सेवा में जीवन व्यतीत किया एवं ईश्वर की भक्ति एवं प्रेम में पगी कविताओं की रचना की। “दयाबोध” इनका प्रकाशित ग्रंथ‌ हैं जिसमें लेखिका ने अपने रचनाकाल का संकेत भी दिया है जिसके अनुसार इसका प्रणयन 1818 में हुआ था-

“‘‘संवत ठारा सै समै, पुनि ठारा गये बीति।

चैत सुदी तिथि सातवी, भयो ग्रंथ सुभ रीति।’’

 इसके अतिरिक्त “विनय मालिका” में भी उनके द्वारा सृजित रचनाएँ संकलित हैं। दयाबाई ने शुद्ध व परिष्कृत ब्रजभाषा में रचना की है, जिस पर मेवाती का प्रभाव सहज रूप से लक्षित किया जा सकता है। इन्होंने पद, साखी, चौपाई आदि में वैराग्य, प्रेम, सत्संग और ईश्वरीय कृपा का मार्मिक वर्णन किया है।

तमाम प्रमुख भक्त कवियों की भांति दयाबाई के काव्य में भी गुरु के प्रति अनन्य भक्ति भाव की अभिव्यक्ति हुई है। गुरु कृपा के बिना ज्ञान नहीं मिलता, इस तथ्य पर कवयित्री को पूर्णतया विश्वास है। गुरु की कृपा से ही वह अनहद नाद को सुनकर भवसागर से मुक्ति का पथ पाती हैं, जिसे अपनी कविता में उन्होंने इस भांति उकेरा है-

‘चरणदास गुरुकृपा ने मनुवां भयो अपंग

सुनत नाद अनहद ‘दया’ आठौ जाम अभंग।

गगन मध्य मुरली बजै में जु सुनी निज कान।

‘दया’ दया गुरुदेव की परस्यौ पद निर्बान।’’

गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती इसकी अभिव्यक्ति भी उनकी रचनाओं में मिलती है। मन को सांसारिक मोह माया से मुक्त करके ईश्वर की राह पर उसे ले जाने वाला गुरु ही होता है।

‘‘गुरु सब्दन कूँ ग्रहण करि विषयन कूँ दे पीठ।

गोविन्द रूपी गदा मारो कमरन ठीठ।

जग तजि हरि भजि दया गहि क्रूर कपट सब छांड

हरि सन्मुख गुरु ज्ञान गहि मनही सूं रन मांड।’’

दयाबाई निर्गुण भक्ति धारा की कवयित्री थीं और उनपर अद्वैतवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है। उन के काव्य में सांसारिक विषय वासनाओं से मुक्ति के लिए गुरु की कृपा से प्राप्त ईश्वरीय प्रकाश की भी अभिव्यक्ति हुई है जिसके प्रभाव से जीव और ब्रह्म के बीच का भेदाभेद समाप्त हो जाता है-

“भयो अविद्या तम को नास॥

ज्ञान रूप को भयो प्रकास।

सूझ परयो निज रूप अभेद।

सहजै मिठ्यो जीव को खेद॥

जीव ग्रह्म अन्तर नहिं कोय।

एकै रूप सर्व घट सोय॥

जगत बिबर्त सूँ न्यारा जान।

परम अद्वैत रूप निर्बान॥

बिमल रूप व्यापक सब ठाईं।”

दयाबाई की कविता में उस वैराग्य भाव का वर्णन हुआ है जिसका अवलंब लेकर भक्त सांसारिक माया से मुक्ति पाकर ईश्वरीय आभा का साक्षात्कार करता है और अंततः मोक्ष लाभ करता है। उस पावन‌ अवस्था का वर्णन दयाबाई इस प्रकार करती हैं-

“बिन दामिनि उजियार अति, बिन घन पडत फुहार।

मगन भयो मनुवां तहां, दया निहार निहार॥”

सत्संग अर्थात साधु संगति की महिमा बखान जैसे संत कबीर करते हैं उसी तरह दयाबाई भी “साध को अंग” शीर्षक के अंतर्गत संकलित वाणी में, सत्संग के साथ साधुओं या सज्जन लोगों की सेवा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए, उसे असार संसार से मुक्ति का मार्ग मानती हैं-

“साध साध सब कोउ कहै, दुरलभ साधू सेव।

जब संगति ह्वै साधकी, तब पावै सब भेव॥”

प्रेम का प्रकाश और उसके प्रभाव को दयाबाई ने अपनी गुरुबहन सहजोबाई और संत कबीर की भांति अनुभूत भी किया है और उसे शब्दों में पिरोया भी है-

“दया प्रेम प्राय्यौ तिन्है, तन की तनि न संभार।

हरि रस में माते फिरें, गृह बन कौन बिचार॥

हरि रस माते जे रहें तिनको मतो अगाध।

त्रिभुवन की सम्पति ‘दया’ , तृन सम जानत साध॥”

प्रेम के आत्मबोध के साथ ही कवयित्री उसके अटपटेपन की ओर संकेत करते हुए उस अद्भुत स्थिति का चिती करती हैं जिसमें प्रेमी या भक्त उस अवर्णनीय आनंद से साक्षात्कार करता है जिसका अनुभव मात्र वही कर सकता है, अन्य कोई नहीं –

“पथ प्रेम को अटपटो, कोइ न जानत बीर।

कै मन जानत आपनो, कै लागी जेहि पीर॥”

भक्ति काव्य में नाम- स्मरण या प्रभु सुमिरन का बहुत महत्व है। दयाबाई भी अगाध विश्वास के साथ प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए, सत्संग और भजन के माध्यम से इस भवसागर से पार उतरना चाहती हैं, जिसका सुंदर निदर्शन प्रस्तुत पद में हुआ है-

“दयादासि’ हरि नाम लै, या जग में यह सार।

हरि भजते हरि ही भये, पायो भेद अपार॥

सोवत जागत हरि भजो, हरि हिरदै न बिसार।

डोरा गहि हरि नाम की, ‘दया’ न टूटै तार।

नारायन नर देह में, पैयत हैं ततकाल।

सतसंगति हरि भजन सूँ, काढ़ो तृस्ना व्याल॥

दया नाव हरि नाम को, सतगुरु खेवन हार।

साधू जन के संग मिलि, तिरत न लागै वार॥”

“वैराग्य का अंग” शीर्षक के अंतर्गत संकलित दोहों में दयाबाई संसार की स्वार्थपरता की ओर संकेत करती हुई सांसारिक नातों से मुक्त होकर मात्र अपने प्रभु के साथ ही प्रेम का संबंध जोड़ने की बात करती हैं-

“‘‘दयाकुँवर या जगत में नहीं अपनी कोय

स्वारथ-बंधी जीव है राम नाम चित जोय।’’

सखियों, दयाबाई का काव्य हर दृष्टि से अन्यान्य भक्त कवियों के काव्य की समकक्षता कर सकता है। जरूरत है, इसके पुनर्खोज और पुनर्पाठ की। मेरा आग्रह है कि इन्हें भी भक्तिकाव्य के तमाम कवियों के साथ समान आसन और आदर मिलना चाहिए।

 

वेदों में पर्यावरण चिंतन

प्रो. श्रीराम अग्रवाल
वैदिक ॠषि कहते हैं है कि हम पृथ्वी वासी पर्यावरण को दूषित न करें, छिन्न न करें अन्यथा हमें उनसे दूषित अवगुण ही प्राप्त होंगे। यह एक ऐसा सत्य है जिसकी वर्तमान में अवहेलना कर हम पर्यावरण संतुलन को समाप्त करते जा रहे हैपर्यावरण का सीधा- सरल अर्थ है प्रकृति का आवरण। कहा गया है कि ‘परित: आवृणोति’।  प्राणी जगत को चारों ओर से ढकने वाला प्रकृति तत्व, जिनका हम प्रत्यक्षत: एवं अप्रत्यक्षत:, जाने या अनजाने उपभोग करते हैं तथा जिनसे हमारी भौतिक, आत्मिक एवं मानसिक चेतना प्रवाहित एवं प्रभावित होती है, वही पर्यावरण है। यह पर्यावरण भौतिक, जैविक एवं सांस्कृतिक तीन प्रकार का कहा गया है। स्थलीय, जलीय, मृदा, खनिज आदि भौतिक; पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव व मानव आदि जैविक एवं आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक आदि सांस्कृतिक तत्वों की परस्पर क्रियाशीलता से समग्र पर्यावरण की रचना व परिवर्तनशीलता निर्धारित होती है। प्रकृति के पंचमहाभूत-क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा- भौतिक एवं जैविक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। वेदों में मूलत: इन पंचमहाभूतों को ही दैवीय शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है। मानव कृत संस्कृति का निर्माण मानव मन, बुद्धि एवं अहं से होता है। इसीलिए गीता में भगवान कृष्ण ने प्रकृति के पांच तत्वों के स्थान पर आठ तत्वों का उल्लेख किया है। ‘भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धि रेव च। अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥” (श्रीमद्भागवद्गीता अ-7/4)

वेदों में पर्यावरण से सम्ब्न्धित अधिकतम ॠचाएं यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में प्राप्त होती हैं। ॠग्वेद में भी पर्यावरण से सम्बंधित सूक्तों की व्याख्या उपलब्ध है। अथर्ववेद में सभी पंचमहाभूतों की प्राकृतिक विशेषताओं व उनकी क्रियाशीलता का विशद्- वर्णन है। आधुनिक विज्ञान भी प्रकृति के उन रहस्यों तक बहुत बाद में पहुंच सका है जिसे वैदिक ॠषियों ने हजारों वर्ष पूर्व अनुभूत कर लिया था। इतना ही नहीं, वेदों में प्रकृति तत्वों से अनावश्यक व अमर्यादित छेड़छाड़ करने के दुष्परिणामों की ओर भी संकेत किया गया है तथा मानव को सीख भी दी गई है कि पर्यावरण संतुलन को नष्ट करने के दुष्परिणाम समस्त सृष्टि के लिए हानिकारक होंगे। यजुर्वेद में पृथ्वी को ऊजार्र् (उर्वरकता) देने वाली ‘तप्तायनी’ तथा धन -सम्पदा देने वाली ‘वित्तायनी’ कह कर प्रार्थना की गई है कि वह हमें साधनहीनता/दीनता की व्यथा व पीड़ा से बचाए ‘तप्तायनी मेसि वित्तायनी मेस्यवतान्मा नाथितादवतान्मा व्यथितात्।’-(यजुर्वेद 5/9)।अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में ‘क्षिति’-पृथ्वी- तत्व का मानव जीवन में क्या महत्व है तथा वह किस प्रकार अन्य चार प्रकृति तत्वों के संग, समायोजन पूर्वक क्रियाशील रह कर, उन समस्त जड़-चेतन को जीवनी शक्ति प्रदान करती है जिनको वह धारण किए हुए है, की विशद व्याख्या उपलब्ध है। अथर्ववेद में पृथ्वी को, अपने में सम्पूर्ण सम्पदा प्रतिष्ठित कर, विश्व के समस्त जीवों का भरण पोषण करने वाली कहा गया है। ‘विश्र्वम्भरा वसुधानी प्रतिश्ठा हिरण्यवक्षा जगतों निवेषनी’- (अथर्ववेद 12/1/6)।  जब हम पृथ्वी की सम्पदा (अन्न, वनस्पति, औषधि, खनिज आदि) प्राप्त करने हेतु प्रयास करें तो प्रार्थना कह गई है कि हमें कई गुना फल प्राप्त हो परन्तु चेतावनी भी दी गई है कि हमारे अनुसंधान व पृथ्वी को क्षत विक्षत (खोदने) करने के कारण पृथ्वी के मर्मस्थलों को चोट न पहुंचे। अथर्ववेद में पृथ्वी से प्रार्थना की गई है ‘यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु। मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्॥’-(अथर्ववेद 12/1/35)-इसके गम्भीर घातक परिणाम हो सकते हैं। आधुनिक उत्पादन व उपभोग एवं अधिकतम धनार्जन की तकनीक ने पृथ्वी के वनों-पर्वतों को नष्ट कर दिया है। खनिज पदार्थों को प्राप्त करने हेतु अमर्यादित विच्छेदन कर पृथ्वी के मर्मस्थलों पर चोट पहुंचाने के कारण पृथ्वी से जलप्लावन व अग्नि प्रज्ज्वलन, धरती के जगह – जगह फटने व दरारें पड़ने के समाचार हमें प्राप्त होते रहते हैं। खानों में खनन करते समय इसी प्रकार की दुर्घटनाओं ने न जाने कितने लोगों की जानें ही नहीं ली अपितु उन क्षेत्रों के सम्पूर्ण पर्यावरण का विनाश कर उसे बंजर ही बना दिया है।

वेदों में अग्नि (पावक) तत्व को सर्वाधिक शक्तिशाली एंव सर्वव्यापक माना गया है। उसे समस्त जड़-चेतन में ऊर्जा, चेतना तथा गति प्रदान करने वाला एवं नव सृजन का उत्प्रेरक माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि ‘यस्ते अप्सु महिमा, यो वनेशु य औशधीशु पषुश्वप्स्वन्त:। अग्ने सर्वास्तन्व: संरभस्व ताभिर्न एहिद्रविणोदा अजस्त्र:॥’ (अ. 19/3/2)-हे अग्निदेव आपकी महत्ता जल में (बड़गाग्नि रूप में), औषधियों व वनस्पतियों में (फलपाक रूप में), पशु व प्राणियों में (वैश्वानर रूप में) एवं अंतरीक्षीय मेघों में (विद्युत रूप में) विद्यमान हैं। आप सभी रूप में पधारें एवं अक्षय द्रव्य (ऐश्वर्य) प्रदान करने वाले हों। यजुर्वेद के अनुसार यही अग्नि द्युलोक (अंतरिक्ष से भी ऊपर परम प्रकाश लोक) में आदित्य (सूर्य) रूप में सर्वोच्च भाग पर विद्यमान होकर, जीवन का संचार करके धरती का पालन करते हुए, जल में जीवनी शक्ति का संचार करता है। -‘अग्निर्मूूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथ्व्यिा अयम्। अपांरेतां सि जिन्वति।’ (3/12)

पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति एवं समस्त गृह नक्षत्र मंडल सहित पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के जिस तथ्य को आधुनिक विज्ञान आज केवल लगभग 200 वर्ष पूर्व ही समझ पाया है, उस भौगोलिक व सौर्य मण्डल के रहस्यपूर्ण तथ्य को हमारे वैदिक ॠषि हजारों वर्ष पूर्व अनुभूत कर चुके थे। अथर्ववेद में ॠषियों ने कहा है -‘मल्वं विभ्रती गुरूभृद् भद्रपापस्य निधनं तितिक्षु:। वरोहण पृथिवी संविदाना सूकराय कि जिहीते मृगाय॥’(अ0वे0-12/1/48)- अर्थात गुरूत्वाकर्षण शक्ति के धारण की क्षमता से युक्त, सभी प्रकार के जड़ चेतन को धारित करने वाली, जल देने के साथ मेघों से युक्त सूर्य की किरणों से अपनी मलीनता (अंधकार) का निधन (निवारण) करने वाली पृथ्वी सूर्य के चारों ओर भ्रमण करती है।

वेदों में सभी ॠषियों ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सूर्य की केन्द्रीय सत्ता को वैज्ञानिकता प्रदान की है जिसे कि आधुनिक विज्ञान अब क्रमश: समझ सकने में सक्षम हो पा रहा है। ॠग्वेद में कहा है -‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुशश्र्च’-( ़ॠ.वे.-1.115.1)-सूर्य समस्त सृष्टि की आत्मा /जन्मदाता है। सूर्य से पदार्थों को पूर्णता तथा ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मानव के जन्म के समय सूर्य तथा उसके आश्रित ग्रहों की स्थिति से मानव को समस्त गुण-सूत्र प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में सूर्यदेव को समस्त सृष्टि का प्रादुर्भावकर्ता, अवलम्बनकर्ता एवं स्वामी माना गया है। ‘सवा अन्तरिक्षादजायत तस्मादन्तरिक्ष जायत’-(अ.वे.-13/7/3)-अर्थात सूर्य अंतरिक्ष से उत्पन्न हुए एवं अंतरिक्ष उनसे उत्पन्न हुआ है। आगे कहा गया है -‘तस्यामू सर्वानक्षत्रा वषे चन्द्रमसा सह’ ’-(अ.वे.-13/6/7)-अर्थात चन्द्रमा सहित समस्त नक्षत्र उनके ही वश में हैं। वे सूर्यदेव दिन, रात्रि, अंतरिक्ष, वायुदेव, द्युलोक, दिशाओं, पृथ्वी, अग्नि, जल, ॠचाओं एवं यज्ञ से प्रगट हुए हैं एवं ये सब भी सूर्य से ही प्रगट हुए हैं। उपरोक्त सभी के अंश, गुण व अणु सूर्य में विद्यमान रहे हैं एवं रहेंगे इसीलिए सूर्य से ये समस्त पदार्थ एवं पंचभूत उत्पन्न हुए हैं। सूर्य ही एक ऐसे देव हैं जिनसे आकाश (नक्षत्रलोक), जल एवं ऊर्जा एवं प्रकाश तथा कीर्ति एवं यश ( ‘यश-अपयश विधि हाथ’ -सूर्य राशि के अधीन) समस्त अन्न एवं उपभोग सामग्री, वनस्पति एवं औषधि इत्यादि सृष्टि को प्राप्त हुआ है। ‘कीर्तिश्र्च यषश्र्चाम्भश्र्च नभश्र्च ब्राह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च। य एतं देवमेकवृतं वेद। (अथर्ववेद 13/5/1 से 8)

निष्कर्ष रूप में, यह सम्पूर्ण पर्यावरण, प्रकृति आवरण, ही है जो विलक्षण दैवीय शक्तियों से व्याप्त है जिससे सृष्टि के समस्त जंगम एवं स्थावर, प्राणी व वनस्पति को चेतना, ऊर्जा एवं पुष्टि प्राप्त होती है। -‘द्योश्च म इदं पृथिवी चान्तरिक्षं चमेव्यच:। अग्नि: सूर्य आपो मेधां विश्र्वेदेवाश्र्च सं ददु:।’ (अथर्ववेद 12/1/53)-अर्थात द्युलोक, पृथ्वी, अंतरिक्ष, अग्नि, सूर्य, जल एवं विश्व के समस्त देवों (ईश्वरीय प्रकृति शक्तियों) ने सृष्टि को व्याप्त किया है॥ इसीलिए यजुर्वेद में कहा गया है कि पृथ्वी इन समस्त शक्तियों को ग्रहण करे एवं इन सभी शक्तियों के लिए भी सदैव कल्याणकारक रहे। पृथिवी-पृथिवीवासी- इन दैवीय शक्तियों को प्रदूषित न करे।

‘सन्तेवायुर्मातरिश्र्वा दधातूत्तानाया हृदयं यद्विकस्तम्। यो देवानां चरसि प्राणथेन कस्मैदेव वशडस्तु तुभ्यम्॥ (यजुर्वेद-11/39)-अर्थात् उर्ध्वमुख यज्ञकुण्ड की भांति पृथ्वी अपने विशाल हृदय को मातृवत प्राणशक्ति संचारक वायु, जल एवं वनस्पतियों से पूर्ण करें। वायुदेव दिव्य प्राणऊर्जा से संचारित होते हैं। अत: पृथ्वी (अपने दूषित उच्छवास-कार्बन उत्सर्जन) से उन्हें दूषित न करें। वर्तमान में अन्यथा की स्थिति के कारण ही वायु की प्राण पोषक शक्ति-ऑक्सीजन दूषित होकर सृष्टि के जीवन को दुष्प्रभावित कर रही है।

इस पर्यावरण के जनक इन पंचमहाभूतों से ही प्राणिमात्र की 5 ज्ञानेन्द्रियां प्रभावित एवं चेतन होती हैं। इन पंचमहाभूतों के गुण ही हमारी ज्ञानेन्दियों के माध्यम से प्राण, मन, बु़िद्ध, कौशल, अहं अर्थात् भौतिक, जैविक, आत्मिक एंव संस्कारिक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। आकाश का गुण शब्द; वायु का गुण शब्द एव स्पर्श़़; तेज (पावक-अग्नि) का गुण शब्द, स्पर्श एवं रूप; जल का गुण शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस (स्वाद) तथा पृथ्वी समस्त उपरोक्त चारों गुण सहित सुगंध गुण भी अर्थात समस्त गुणों का धारण करती है। इसी कारण पृथ्वी के प्राणी पंचमहाभूतों के 5 गुणों को धारित करते हैं एवं उनसे प्रभावित भी होते हैं। अत: आवश्यक है कि हम पृथ्वी वासी पर्यावरण को दूषित न करें, छिन्न न करें अन्यथा हमें उनसे दूषित अवगुण ही प्राप्त होंगे। यह वैदिक ॠषियों द्वारा प्रस्तुत एक ऐसा सत्य है जिसकी वर्तमान में अवहेलना कर हम पर्यावरण संतुलन को समाप्त करते जा रहे हैं।

ॠषियों ने न केवल पर्यावरण को प्रदूषित करने के मानव जीवन एवं सृष्टि पर पड़ने वाले हानिकारक विनाशक परिणामों की ओर संकेत किया अपितु पर्यावरण की रक्षा एवं, हम जो कुछ प्रकृति देवों से प्राप्त कर रहे हैं उसे उन्हें लौटा कर, पर्यावरण को प्रदूषित करने की अपेक्षा, उसे संरक्षित एवं सवंर्धित करने का भी आदेश दिया है। ”यदीमृतस्य पयसा पियानो नयन्नृृतस्य पथिभीरजिष्ठै:। अर्यमा मित्रो वरूण: परिज्मा त्वचं पृन्चन्त्युपरस्य योनौ॥”-ॠग्वेद/1/79/3-(हे अग्निदेव) आप यज्ञ के रसों से चराचर जगत का पोषण करते हैं।

यज्ञ के प्रभाव को सरल मार्गों से अंतरिक्ष में पहुंचाते हैं। तब अर्यमा, मित्र, वरूण एवं मरूद्गण, मेघों के उत्पत्ति स्थल पर इनकी त्वचा में जल को स्थापित करते हैं। प्रकृति चक्र सब जगह व्याप्त है। यह चक्र प्राणियों के लिए अन्नादि पोषक पदार्थों को, उपज रूपी शकट के माध्यम से पहुंचाता है। प्रजाओं (मानवों), को इन्द्रादि देवों द्वारा प्रदत्त अनुदानों (प्रकृति प्रदत्त संसाधनों) को यज्ञों-कर्मों के माध्यम से पुन: सब देवों तक पहुंचा कर सृष्टि चक्र संचालन में देवों का सहयोगी बनना चाहिए।

इसी कारण, ॠषियों ने सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियों को शांत करने व लोक कल्याणकारी बनाए रखने की प्रार्थना की है। अथर्ववेद में उल्लेखित शांति सूक्त का पर्यावरण रक्षण में अपरिमित महत्व है-‘षान्ता द्यौ: षान्ता पृथ्वी षान्तमिदमुर्वन्तरिक्षम्।षान्ता उदन्वतीराप: षान्ता न: सन्त्वोशधी:॥(अ.वे.-19/9/1 ) षं नो मित्र: षं वरूण: षं विश्णु: षं प्रजापति:। षं नो इन्द्रो बृहस्पति: षं नो भवत्वर्यमा॥ (अ.वे.-19/9/6) ‘पृथिवी षान्तिरन्तरिक्षं षांतिर्द्यौ: षान्तिराप: षान्तिरोशधय: षांतिर्वनस्पतय: षांतिर्विश्र्वे मे देवा: षान्ति: सर्वे में देवा: षान्ति: षान्ति: षान्ति: षान्तिभि:। ताभि: षान्तिभि: सर्वषान्तिभि: षमयामोहं यदिह घोरं यदिहक्रूरं यदिह पापं तच्छान्तं तच्छिवं सर्वमेव षमस्तु न:॥’- ( अ.वे-19/9/14)-अर्थात् घुलोक, पृथ्वी, विस्तृत अंतरिक्ष लोक, समुद,्र जल, औषधियां ये सभी उत्पन्न होने वाले अनिष्टों का निवारण करके हमारे लिए सुख शांति दायक हों। दिन के अधिष्ठाता देव सूर्य (मित्र) रात्रि के अभिमानी देव वरूण, पालनकर्ता विष्णु, प्रजापालक प्रजापति, वैभव के स्वामी इन्द्र, बृहस्पति आदि सभी देव शांत हों एवं हमें शांति प्रदान करने वाले हों। पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्युलोक, जल, औषधियां, वनस्पतियां एवं समस्त देव हमारे लिए शांतिप्रद हों। शांति से भी असीम शांति प्रदान करे। हमारे द्वारा किए गए घोर-अघोर कर्म, क्रूरकर्म, पापकर्म के फलों का शमन कर, शांत होकर हमारे लिए कल्याणकारी एवं मंगलकारी बने।

(साभार – हिन्दी विवेक)

वर्धा विश्वविद्यालय कोलकाता केंद्र कार्यालय 15 जून तक बंद

कोलकाता : कोरोना महामारी को देखते हुए प.बंगाल सरकार के दिशानिर्देशों के आलोक में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता कार्यालय 15 जून तक बंद रहेगा। केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि इस आशय का कार्यालय आदेश कुलपति के अनुमोदन से विश्वविद्यालय कुलसचिव ने जारी किया है। इस बीच ऑनलाइन कक्षाएँ पूर्ववत जारी रहेंगी तथा विद्यार्थियों के अकादमिक संवर्द्धन के लिए केंद्र के अध्यापक ऑनलाइन उपलब्ध रहेंगे।

12 सप्ताह के बाद लें कोविड -19 वैक्सीन की दूसरी खुराक : डॉ. रणदीप गुलेरिया

एमसीसीआई ने कोविड -ौ19 को लेकर आयोजित किया वेबिनार

गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित है कोविड -19 वैक्सीन

कोलकाता : मर्चेन्ट चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एमसीसीआई) ने कोविड -19 को लेकर जूम वेबिनार आयोजित किया। इस वेबिनार में एम्स, नयी दिल्ली के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कोविड -19 से बचाव.उपचार और कोविड के पश्चात होने वाले प्रभावों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस बेहद खतरनाक है जि,के कारण सर्दी से लेकर गम्भीर बीमारी तक हो सकती है। यह नया टॉपिकल वायरस चीन के वुहान में मिला था औऱ मनुष्यों में इसके विरुद्ध लड़ने के लिए एन्टीबॉडिज नहीं होने के कारण उनसे संक्रमण फैलता है। बीमारी पर चर्चा करते हुए डॉ. गुलेरिया ने बताया कि भारत में 27.5 मिलियन कोविड -19 के मामले हैं। दूसरी लहर का कारण सावधानी को हल्के में लेने औऱ भीड़ के कारण हुआ, मास्क पहनकर इससे बचना सम्भव है। इसके अतिरिक्त हाथ साफ रखना, शारीरिक दूरी रखना, वैक्सीन और सीमित लॉकडाउन कोविड -19 से लड़ने में मदद कर सकते हैं। वैक्सीन बेहद प्रभावी है, पूरी दुनिया में 1 बिलियन लोग वैक्सीन ले चुके हैं। अब तक देश की 12 प्रतिशत जनता वैक्सीन की एक डोज ले चुकी है और 3.1 प्रतिशत लोग वैक्सीन प्रक्रिया को पूरा कर चुके हैं। डॉ. गुलेरिया के मुताबिक 80 प्रतिशत लोगों को कोविड के हल्के लक्षण थे और वे घर में ही उपचार से ठीक हो गये. 15 प्रतिशत लोगों को थोड़ा अधिक संक्रमण था तो उनको अस्पताल ले जाना पड़ा जबकि 5 प्रतिशत मामलों में मरीज को गम्भीर हालत में आईसीयू ले जाना पड़ा। स्वस्थ होने के बाद थकान, सीने में परेशानी, कफ, तनाव औऱ मानसिक परेशानी हुई। कोविड के बाद की स्थिति को लेकर किये गये एक अध्यनन में पता चला है कि 60 दिनों तक स्वस्थ होने वाले मरीजों में कम से कम एक लक्षण दिखे जबकि एक अन्य अध्ययन के अनुसार 43 दिन के बाद 32 प्रतिशत लोगों में ऐसे कम से कम एक लक्षण दिखे।
एक सवाल के जवाब में डॉ. गुलेरिया ने कहा कि 12 सप्ताह के बाद वैक्सीन की दूसरी खुराक लेना अधिक उपयोगी होगा। कोविड -19 की दूसरी लहर अब कमजोर पड़ रही है। यह वायरस लहर के रूप में आएगा।। मधुमेह पर अनियन्त्रण के कारण ब्लैक फंगस की समस्या बढ़ रही है। कोविड वैक्सीन के साइड इफेक्ट कुछ समय के लिए ही रहते हैं औऱ यह गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं। स्वागत भाषण में एमसीसीआई के अध्यक्ष आकाश शाह ने कहा कि कोविड -19 के कारण देश के सामने एक चुनौती खड़ी हो गयी है। इसके साथ ही ब्लैक फंगस, व्हाइट फंगस औऱ यलो फंगस को लेकर भी उन्होंने चिन्ता जाहिर की। एमसीसीआई के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट ऋषभ कोठारी ने धन्यवाद दिया।

इफको लाया विश्व का पहला नैनो यूरिया

कोलकाता :  इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड(इफको) ऑनलाइन-ऑफलाइन मोड में हुई अपनी 50वीं वार्षिक आम बैठक में अपनी प्रतिनिधि महासभा के सदस्यों की उपस्थिति में पूरी दुनिया के किसानों के लिए विश्व का पहला नैनो यूरिया तरल लेकर आया है । मिट्टी में यूरिया के प्रयोग में कमी लाने की भारत के माननीय प्रधानमंत्री जी की अपील से प्रेरित होकर इसे तैयार किया गया है ।‌ इफको के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने सच्चे और समर्पित अनुसंधान के बाद नैनो यूरिया तरल को स्वदेशी और प्रोपाइटरी तकनीक के माध्यम से कलोल स्थित नैनो जैवप्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र में तैयार किया है । यह नवीन उत्पाद ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘आत्मनिर्भर कृषि’ की दिशा में एक सार्थक कदम है । इफको नैनो यूरिया तरल को पौधों के पोषण के लिए प्रभावी व असरदार पाया गया है । इसके प्रयोग से फसलों की पैदावार बढ़ती है तथा पोषक तत्वों की गुणवत्ता में सुधार होता है । नैनो यूरिया भूमिगत जल की गुणवत्ता सुधारने तथा जलवायु परिवर्तन व टिकाऊ उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव डालते हुए ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा । किसानों द्वारा नैनो यूरिया तरल के प्रयोग से पौधों को संतुलित मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त होंगे और मिट्टी में यूरिया के अधिक प्रयोग में कमी आएगी। यूरिया के अधिक प्रयोग से पर्यावरण प्रदूषित होता है, मृदा स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है, पौधों में बीमारी और कीट का खतरा अधिक बढ़ जाता है, फसल देर से पकती है और उत्पादन कम होता है । साथ ही फसल की गुणवत्ता में भी कमी आती है । नैनो यूरिया तरल फसलों को मजबूत और स्वस्थ बनाता है तथा फसलों को गिरने से बचाता है ।

इफको नैनो यूरिया किसानों के लिए सस्ता है और यह किसानों की आय बढ़ाने में प्रभावकारी होगा । इफको नैनो यूरिया तरल की 500 मि.ली. की एक बोतल सामान्य यूरिया के कम से कम एक बैग के बराबर होगी । इसके प्रयोग से किसानों की लागत कम होगी ।‌ नैनो यूरिया तरल का आकार छोटा होने के कारण इसे पॉकेट में भी रखा जा सकता है जिससे परिवहन और भंडारण लागत में भी काफी कमी आएगी ।

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली(एनएआरएस) के तहत 20 आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केन्द्रों में 43 फसलों पर किये गये बहु-स्थानीय और बहु-फसली परीक्षणों के आधार पर इफको नैनो यूरिया तरल को उर्वरक नियंत्रण आदेश(एफसीओ, 1985) में शामिल कर लिया गया है । इसकी प्रभावशीलता का परीक्षण करने के लिए पूरे भारत में 94 से अधिक फसलों पर लगभग 11,000 कृषि क्षेत्र परीक्षण(एफएफटी) किये गये थे । हाल ही में पूरे देश में 94 फसलों पर हुए परीक्षणों में फसलों की उपज में औसतन 8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है ।

इफको नैनो यूरिया तरल को सामान्य यूरिया के प्रयोग में कम से कम 50 प्रतिशत कमी लाने के प्रयोजन से तैयार किया गया है । इसके 500 मि.ली. की एक बोतल में 40,000 पीपीएम नाइट्रोजन होता है जो सामान्य यूरिया के एक बैग के बराबर नाइट्रोजन पोषक तत्व प्रदान करेगा । इफको नैनो यूरिया का उत्पादन जून 2021 तक आरंभ होगा और शीघ्र ही इसका व्यावसायिक विपणन भी शुरू हो जाएगा । इफको ने किसानों के लिए 500 मि.ली. नैनो यूरिया की एक बोतल की कीमत
₨ 240/- निर्धारित की है जो सामान्य यूरिया के एक बैग के मूल्य से 10 प्रतिशत कम है । समिति ने इस उत्पाद के बारे में किसानों को पूरी जानकारी देने के लिए एक व्यापक देशव्यापी प्रशिक्षण अभियान चलाने की योजना बनायी है । ये उत्पाद इफको के ई-कॉमर्स प्लेटफार्म www.iffcobazar.in.के अतिरिक्त मुख्य रूप से सहकारी बिक्री केन्द्रों और अन्य विपणन माध्यमों से किसानों को उपलब्ध कराये जाएंगे ।

ऑनलाइन साक्षात्कार की तैयारी पर कार्यशाला

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने ऑनलाइन इवेंट “सीवी कैसे बनाएं और ऑनलाइन साक्षात्कार की तैयारी कैसे करें” विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया। दो दिन तक जूम पर चलने वाली इस कार्यशाला में प्रथम दिन 370 और दूसरे दिन 281 विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए डीन प्रो दिलीप शाह ने कोरोना काल में हो रहे ऑनलाइन साक्षात्कार को साक्षात्कारकर्ता के लिए भी चुनौती बताई क्योंकि इसमें वर्चुअल दृष्टि से चुनाव करना होता है जो मुश्किल होता है। सामने रहने पर उम्मीदवार के हावभाव और काम करने की उत्सुकता को महसूस किया जा सकता है। वर्तमान युग की मांग होने की वजह से इस प्रकार के वर्कशॉप का आयोजन किया गया।
प्रथम दिन प्रो. मोहित साव ने सीवी बनाने की प्रक्रिया पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि साधारण रूप से हम लोगों की धारणा है कि सीवी में डिग्री और प्रतिशत देखकर ही हमें कोई कंपनी या कॉर्पोरेट नौकरी दे देगी। वर्तमान में इस धारणा में बदलाव आया है। डिग्री के साथ-साथ स्मार्ट विद्यार्थी, कम्युनिकेशन क्षमता, व्यक्तित्व और तकनीकी कुशलता पर कंपनियां अधिक ध्यान दे रही हैं। भवानीपुर कॉलेज में बहुत ही प्रसिद्ध कंपनियां जैसे टीसीएस, इन्डिगो, जिंदल ग्रुप, स्पाइसजेट, ओबराय ग्रैंड आदि प्लेसमेंट के लिए आती हैं। विद्यार्थियों को इन्टरव्यू देने के लिए तैयार किया जाता है। सीवी में दो प्रकार की योग्यता एक प्रोफेशनल और दूसरी एकेडमी योग्यता लिखी जाती है। प्रो. मोहित साव ने स्क्रीन शेयर कर सीवी बनाने के लिए व्यक्तिगत सभी जानकारियां सही देने का सुझाव दिया और कहा कि वे जिस कंपनी के इंटरव्यू की तैयारी करें उसके विषय में पूरी जानकारी रखें।
दूसरे दिन प्रो ऊर्वी शुक्ला ने विद्यार्थियों को ऑनलाइन इंटरव्यू के दौरान अपने व्यवहार को किस प्रकार रखें इस विषय पर अपने बहुमूल्य सुझाव दिए। विद्यार्थी को प्रोफेशनल रूप से लेबटॉप पर अपना इंटरव्यू देते समय तकनीकी रूप से चुस्त रखना , प्रश्नों को ठीक से सुनना,वेशभूषा, शारिरिक और मानसिक रूप से पूर्ण रूप से ध्यान देना और चेहरे पर मुस्कान रखना आदि बहुत सी बातों का ध्यान रखना चाहिए। जो कंपनी साक्षात्कार ले रही है उसका का शोधपरक अध्ययन करें। अपने व्यवहार में नम्रता रखें। ऐसे बहुत से बिंदुओं पर स्क्रीन शेयर कर प्रो ऊर्वी ने प्रकाश डाला।दोनों ही दिनों विद्यार्थियों ने प्रश्नोत्तर सेशन में अपनी जिज्ञासाओं का निराकरण भी किया। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने धन्यवाद दिया। प्रो दिव्या ऊडीसी, श्रद्धा अग्रवाल की उपस्थिति रही। तकनीकी सहयोग गौरव किल्ला और संयोजन जलक शाह और कशिश बर्मन का रहा। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

सलोनी प्रिया ने भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों को बताया रचनात्मकता का महत्व

कोलकाता :  कोरोना महामारी के इस संकटकालीन स्थितियों में उम्मीद एनजीओ की प्रमुख सलोनी प्रिया ने एंगजाइटी और डिप्रेशन के विषय पर हुए वेबिनार में भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों को सकारात्मक सोच और रचनात्मक कार्यों के प्रति जागरूक किया। दो घंटे तक चले वेबिनार में डिप्रेशन और एंग्जाइटी के अंतर को विस्तार से समझाते हुए दोनों के अंतर को स्पष्ट किया। रोज की भागदौड़ की जिंदगी से परेशान होना, छोटी-छोटी बातों को लेकर बहुत अधिक क्रोध करना, फ्रस्ट्रेशन,आशा छोड़ देना, आत्मविश्वास में कमी आना आदि बहुत से ऐसे लक्षण हैं जो व्यक्ति को निराश कर देते हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन और याश तूफ़ान ने हमारी सभी की नियमित होनेवाली रूटीन में परिवर्तन कर दिया है जिसके कारण हम चिंता करने लगे हैं कि अब क्या होगा। यह जानते हुए भी कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है।हम चिंता में पड़े रहते हैं। इसलिए हमें घर में रहते हुए अपनी रचनात्मक ऊर्जा को काम में लगाना चाहिए और बेकार की चिंता से दूर रहना चाहिए।
सलोनी ने अपनी विभिन्न स्लाइड्स द्वारा स्क्रीन शेयर करके ध्यान, व्यायाम, योग, अच्छा संगीत सुनने, बागवानी, किचन खाद बनाना, स्क्रब बुक बनाना, कविता कहानी लिखना, अच्छी फिल्में और अच्छी किताबें पढ़ना आदि के साथ अपनी रचनात्मक और सकारात्मक ऊर्जा के बारे में समझाया। रंगों का मन के भावों के सामंजस्य को बताया। जैसे गुलाबी रंग खुशी का प्रतीक है वहीं दूसरा उदाहरण काले कुत्ते का दिया जो हमारे जीवन में अदृश्य रूप हावी रहता है।
वेबिनार के आरंभ में कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि गत चार वर्षों से उम्मीद एनजीओ के काउंसिलर कॉलेज के साथ मिलकर लाइफ स्कील डेवलपमेंट के अंतर्गत विद्यार्थियों की काउंसिलिंग कर रही है जो संतोषजनक है। अभी तक 250 विद्यार्थियों ने इसका लाभ उठाया है। इस अवसर पर काउंसिलर पिंकी बनर्जी ने अपने अनुभवों को साझा किया और तृणा गुहा ठाकुर ने उम्मीद एनजीओ के विषय में जानकारी दी। निकिता जालान नियमित रूप से कॉलेज के विद्यार्थियों के काउनसिंलिग में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इस वेबिनार में जिज्ञासु विद्यार्थियों के बहुत से प्रश्नों का उत्तर दिया सलोनी प्रिया ने। इस कार्यक्रम का जूम तकनीकी सहयोग किया गौरव किल्ला ने और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।

कोरोना वैरिएंट का नया नाम : डेल्टा कहा जाएगा भारत में पहली बार मिला स्ट्रेन

नयी दिल्ली : विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के नए वेरिएंट ऑफ कंसर्न वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट (वीओआई का नाम ग्रीक अल्फाबेट्स का इस्तेमाल करते हुए रखने की घोषणा की है। इसके तहत सबसे पहले जो कोरोना वेरिएंट भारत में मिला, उसे डेल्टा कहा जाएगा। जबकि, इससे पहले मिले वर्जन को कप्पा कहा जाएगा।
डब्ल्यूएचओ की कोविड-19 टैक्निकल हेड डॉ. मारिया वेन करखोवे ने कहा कि इन लेवल से मौजूदा वैज्ञानिक नामों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनसे अहम वैज्ञानिक जानकारियां मिलती हैं और रिसर्च में इनका इस्तेमाल जारी रहेगा। किसी भी देश को कोरोना के वेरिएंट खोजने या उसकी जानकारी देने की सजा नहीं मिलनी चाहिए।
वायरस को इंडियन वैरिएंट कहने पर सरकार ने जताई थी आपत्ति
कोरोना के नए स्ट्रेन को भारतीय बताने पर सरकार ने आपत्ति जताई थी। सरकार की तरफ से कहा गया था कि B.1.617 वैरिएंट को दुनिया के लिए चिंताजनक बताने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ ) के बयान को कई मीडिया रिपोर्ट्स में कवर किया गया। इनमें से कुछ रिपोर्ट्स में इस वैरिएंट को भारतीय कहा गया, लेकिन ये रिपोर्ट्स बेबुनियाद हैं। सरकार का दावा है कि WHO ने अपने 32 पेज के डॉक्यूमेंट्स में B.1.617 वैरिएंट के साथ कहीं भी इंडियन नहीं जोड़ा है।
डब्ल्यूएचओ के साउथ-ईस्ट एशिया ऑफिस की तरफ से कहा गया है कि वह वायरस या वैरिएंट्स को किसी देश के नाम से नहीं जोड़ता है। बल्कि उनके साइंटिफिक नाम से ही पहचानता है और सभी को ऐसा ही करना चाहिए। इससे पहले डब्ल्यूएचओ ने कोरोना की दूसरी लहर में भारत में फैल रहे B-1617 स्ट्रेन को वैश्विक स्तर पर चिंताजनक (वैरिएंट ऑफ कंसर्न) घोषित किया था। उसका कहना था कि यह वैरिएंट ज्यादा संक्रामक लग रहा है और यह आसानी से फैल सकता है।
कोरोना पर डब्ल्यूएचओ की प्रमुख मारिया वैन केरखोव के मुताबिक एक छोटे सैंपल साइज पर की गई लैब स्टडी में सामने आया है कि इस वैरिएंट पर एंटीबॉडीज का कम असर हो रहा है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इस वैरिएंट में वैक्सीन के प्रति ज्यादा प्रतिरोधक क्षमता है।
B.1.617 वैरिएंट, जिसे डबल म्यूटेंट स्ट्रेन भी कहा जाता है, महाराष्ट्र और दिल्ली में बड़े पैमाने पर मिला है। इसकी वजह से यहां आई महामारी की दूसरी लहर ने बुरी तरह प्रभावित किया है। देश के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र के कई शहरों में जीनोम सिक्वेसिंग किए गए आधे से ज्यादा सैंपल में B.1.617 वैरिएंट मिला है।

महाकाल परिसर में मिले 1 हजार साल पुराने मंदिर के अवशेष

उज्जैन : उज्जैन में महाकाल मंदिर के विस्तारीकरण के दौरान खुदाई में एक प्राचीन मंदिर के अवशेष मिले हैं। माना जा रहा है कि प्राचीन मंदिर करीब एक हजार साल पुराना है, जिसके बाद महाकाल मंदिर की खुदाई रोक दी गई। ऐसे में केंद्रीय पर्यटन मंत्री प्रह्लाद पटेल के निर्देश पर तीन सदस्यीय पुरातत्व विभाग की टीम ने खुदाई स्थल का निरीक्षण किया। जांच के बाद टीम ने महाकाल मंदिर में खुदाई जारी रखने की इजाजत दे दी। हालांकि, खुदाई कर रहे लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी है। पुरातत्व विभाग की टीम का मानना है कि प्राचीन मंदिर से नए इतिहास का पता लगेगा।

25 फीट गहरे गड्ढे में उतर किया निरीक्षण
जानकारी के मुताबिक, केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भोपाल शाखा के पुरातत्वविद पीयूष दीक्षित, खजुराहो संग्रहालय के सहायक अधीक्षक केके वर्मा और मांडू में तैनात इंजीनियर प्रशांत पाटनकर को भेजा। तीनों विशेषज्ञों ने कलेक्टर द्वारा गठित कमेटी के विशेषज्ञ डॉ. रमण सोलंकी और डॉ. आरके अहिरवार के साथ महाकाल मंदिर जाकर खुदाई स्थल का अवलोकन किया। उन्होंने 25 फीट गहरे गड्ढे में उतरकर मंदिर के अवशेषों का निरीक्षण किया।

एएसआई की टीम ने दिए निर्देश
एएसआई की टीम का मानना है कि कलेक्टर ने विक्रम विश्वविद्यालय और शासकीय अधिकारियों की जो कमेटी बनाई है, उसकी निगरानी में खुदाई में निकले मंदिर को सुरक्षित तरीके से निकालकर संरक्षित किया जाएगा। यह कमेटी खुदाई की निगरानी करेगी। यदि कोई पुरातत्व सामग्री मिलती है तो उसका संरक्षण किया जाएगा। विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्वविदों ने इन अवशेषों को एक हजार साल पुराना बताया।

परमार काल का मंदिर होने का अनुमान
बताया जा रहा है कि खुदाई के बाद मिले इस प्राचीन मंदिर के फिलहाल कुछ जानकारी नहीं मिली हैं। अभी सिर्फ अवशेष दिख रहे हैं। ऐसे में मंदिर कहां तक है, यह कहना मुश्किल होगा। ऐसे में विशेषज्ञों की टीम हर चीज की बारीकी से मुआयना कर रही है। इसके बाद ही मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी मिल पाएगी। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अवशेषों पर नक्काशी परमार काल की लग रही है। यह एक हजार साल पुरानी हो सकती है।