Thursday, July 2, 2026
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असहयोग आन्दोलन की पहली महिला सेनानी थीं ओजस्वी वाणी वाली सुभद्रा कुमारी चौहान

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को याद करते हुए अनेकों बार ये पंक्तियां पढ़ी गयीं। कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की लिखी कविता में देश की उस वीरांगना के लिए ओज था, करूण था, स्मृति थी और श्रद्धा भी। इसी एक कविता से उन्हें हिंदी कविता में प्रसिद्धि मिली और वह साहित्य में अमर हो गयीं।

उनका लिखा यह काव्य सिर्फ़ कागज़ी नहीं था, जिस जज़्बे को उन्होंने कागज़ पर उतारा उसे जिया भी। इसका प्रमाण है कि सुभद्रा कुमारी चौहान महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली प्रथम महिला थीं और कई दफ़ा जेल भी गयीं। सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद के पास निहालपुर में हुआ था। पिता रामनाथ सिंह ज़मींदार थे लेकिन पढ़ाई को लेकर जागरूक भी थे। अपनी प्रतिभा को दिखाते हुए सुभद्रा ने भी बचपन से ही कविता कहना शुरू कर दिया था। पहली कविता 9 साल की उम्र में छपी जिसे उन्होंने एक नीम के पेड़ पर ही लिख दिया था।

वह न सिर्फ़ कुछ ही देर में कविता लिख देती थीं बल्कि पढ़ाई में भी अव्वल थीं। ज़ाहिर था कि जितनी पसंदीदा वह अपनी अध्यापिकाओं की हो गयीं, उतनी ही सहपाठियों की भी। बचपन में कविता लिखने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो फिर ताउम्र रहा।

उनकी एक कविता है ‘वीरों का कैसा हो वसंत’

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

यह भाव सिर्फ़ उनके काव्य में ही सिंचित नहीं है। जब गांधी जी समूचे देश में अपने आंदोलन को लेकर आह्वान कर रहे थे तब सुभद्रा ने भी अपनी भागीदारी दर्ज करवायी। ज़ाहिर है कि वह एक राष्ट्रवादी कवयित्री ही नहीं एक देशभक्त महिला भी थीं। ‘जलियां वाले बाग में वसंत’ में उन्होंने लिखा-

परिमलहीन पराग दाग-सा बना पड़ा है
हा ! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
आओ प्रिय ऋतुराज? किंतु धीरे से आना
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खाकर
कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर।

सुभद्रा का विवाह लक्ष्मण सिंह के साथ तय हुआ था। लक्ष्मण सिंह एक नाटककार थे और उन्होंने अपनी पत्नी की प्रतिभा को आगे बढ़ने में सदैव उनका सहयोग किया। दोनों ने मिलकर कांग्रेस के लिए काम किया। सुभद्रा महिलाओं के बीच जाकर उन्हें स्वदेशी अपनाने व तमाम संकीर्णताएं छोड़ने के लिए प्रेरित करती थीं। अपनी गृहस्थी को संभालते हुए वह साहित्य और समाज की सेवा करती थीं।  44 साल की अल्पायु में भी उन्होंने विपुल सृजन किया। उन्होंने तीन कहानी संग्रह लिखे जिनमें बिखरे मोती, उन्मादिनी और सीधे साधे चित्र शामिल हैं। कविता संग्रह में मुकुल, त्रिधारा आदि शामिल हैं। उनकी बेटी सुधा चौहान का विवाह प्रेमचंद के बेटे अमृतराय से हुआ, उन्होंने अपनी मां की जीवनी लिखी जिसका नाम ‘मिले तेज से तेज’ है। 16 अगस्त, 1904 को जन्मी सुभद्राकुमारी चौहान का देहांत 15 फरवरी, 1948 को 44 वर्ष की आयु में ही हो गया। वह अपनी मृत्यु के बारे में कहती थीं कि “मेरे मन में तो मरने के बाद भी धरती छोड़ने की कल्पना नहीं है । मैं चाहती हूँ, मेरी एक समाधि हो, जिसके चारों और नित्य मेला लगता रहे, बच्चे खेलते रहें, स्त्रियां गाती रहें ओर कोलाहल होता रहे।”

(साभार – अमर उजाला काव्य)

झाँसी की रानी बनकर अँग्रेजों से लड़कर प्राण उत्सर्ग करने वाली झलकारी बाई

जब भी भारतीय वीरांगनाओं का नाम लिया जाता है, उसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम सबसे आगे आता है। उन्हें भारत की सबसे बड़ी वीरांगना माना जाता है, जिन्होंने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया। हालांकि बहुत कम लोग ही जानते हैं कि देश में एक ऐसी भी वीरांगना रहीं हैं, जिसका नाम रानी लक्ष्मीबाई से भी पहले आता है। इस वीरांगना को भारत की दूसरी लक्ष्मीबाई भी कहा जाता है, वह दलित थीं। इनका नाम झलकारी बाई है। 1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने झांसी के युद्ध में भारतीय बगावत के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि झलकारी बाई, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की महिला सेना में ही सैनिक थीं। उनका जन्म एक गरीब कोरी परिवार में हुआ था। वह रानी लक्ष्मीबाई की सेना में एक आम सैनिक की तरह भर्ती हुईं थीं। उनमें युद्ध के साथ ही अन्य मसलों पर भी असाधारण योग्यताओं थी, इसी के दम पर वह रानी लक्ष्मीबाई की विशेष सलाहकार बनीं। कहा जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई के महत्वपूर्ण निर्णयों में झलकारी बाई की अहम भूमिका रहती थी।

इसलिए कहा जाता है दूसरी लक्ष्मीबाई
इतिहासकारों के मुताबिक 23 मार्च 1858 को जनरल रोज ने अपनी विशाल सेना के साथ झांसी पर आक्रमण कर दिया था। ये 1857 के विद्रोह का दौर था। रानी लक्ष्मीबाई ने वीरतापूर्वक अपने 5000 सैनिकों के दल संग उस विशाल सेना का सामना किया। जल्द ही अंग्रेज सेना झाँसी में घुस गयी और लक्ष्मीबाई, झाँसी को बचाने के लिए उनका डटकर सामना कर रहीं थीं। इस दौरान झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई के प्राणों को बचाने के लिये खुद को रानी बताते हुए लड़ने का फैसला किया। खास बात ये है कि इसी युद्ध में उनके पति शहीद हो चुके थे। बावजूद उन्होंने पति का शोक मनाने की जगह राज्य और अपनी रानी के लिए लड़ने को प्राथमिकता दी थी। इस तरह झलकारीबाई ने पूरी अंग्रेजी सेना को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया, ताकि दूसरी तरफ से रानी लक्ष्मीबाई सुरक्षित बाहर निकल सकें। इस तरह झलकारीबाई खुद रानी लक्ष्मीबाई बनकर लडती रहीं और जनरल रोज की सेना उनके झांसे में आकर उन पर प्रहार करने में लगी रही। काफी देर बाद उन्हें पता चला की वह रानी लक्ष्मीबाई नही हैं। झलकारी बाई की इस महानता को बुंदेलखंड में रानी लक्ष्मीबाई के बराबर सम्मान दिया जाता है। दलित के तौर पर उनकी महानता और हिम्मत ने उत्तर भारत में दलितों के जीवन पर काफी सकारात्मक प्रभाव डाला। उनकी मौत कैसे हुई थी, इतिहास में इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि ब्रिटिश सेना द्वारा झलकारी बाई को फांसी दे दी गई थी। वहीं कुछ जगहों पर जिक्र किया गया है कि वह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुई थीं। कुछ जगहों पर अंग्रेजों द्वारा झलकारीबाई को तोप से उड़ाने का जिक्र किया गया है।

झलकारी बाई, सदोबा सिंह और जमुना देवी की पुत्री थीं। उनका जन्म आज ही के दिन, 22 नवम्बर 1830 को झाँसी के भोजला गांव में हुआ था। उनकी मां के निधन के बाद पिता ने लड़कों की तरफ उनका पालन-पोषण किया था। बचपन से ही वह घुड़सवारी और हथियार चलाने में माहिर थीं। तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति में वह शिक्षा हासिल नहीं कर सकी थीं, लेकिन एक योद्धा के तौर पर वह युद्ध कला में काफी माहिर थीं।

तोपची से किया था विवाह
झलकारी बाई का युद्ध कला के प्रति इतना प्रेम था कि उन्होंने शादी भी एक तोपची सैनिक पूरण सिंह से की थी। पूरण सिंह भी लक्ष्मीबाई के तोपखाने की रखवाली किया करते थे। पूरण सिंह ने झलकारी बाई की मुलाकात रानी लक्ष्मीबाई से कराई थी। उनकी युद्ध कला से प्रभावित होकर रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें अपनी सेना में शामिल कर लिया था। जिस युद्ध में झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई बनकर लड़ी थीं, उसी युद्ध में उनके पति शहीद हुए थे। बावजूद उन्होंने पति के शोक की जगह राज्य की सुरक्षा और अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी।

 

जारी हुआ है डाक टिकट
झलकारी बाई की बहादुरी और इतिहास में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 22 जुलाई 2001 में उनके नाम का डाक टिकट भी जारी किया था। इसमें झलकारी बाई, रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही हाथ में तलवार लिए घोड़े पर सवार दिखती हैं। उनके चित्र वाला टेलीग्राम स्टांप भी जारी किया गया था। भारतीय पुरातात्विक सर्वे ने अपने पंच महल के म्यूजियम में झांसी के किले में झलकारीबाई का भी उल्लेख किया है। अजमेर, राजस्थान में उनकी प्रतिमा और स्मारक भी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी एक प्रतिमा आगरा में भी स्थापित की है। उनके नाम से लखनऊ में एक धर्मार्थ चिकित्सालय भी है।

साहित्य व उपन्यासों में लक्ष्मीबाई की तरह है जिक्र
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही झलकारीबाई का भी साहित्य, उपन्यासों और कविताओं में जिक्र किया गया है। 1951 में बीएल वर्मा द्वारा रचित उपन्यास ‘झांसी की रानी’ में झलकारी बाई को विशेष स्थान दिया गया है। रामचंद्र हेरन के उपन्यास माटी में झलकारीबाई को उदात्त और वीर शहीद कहा गया है। भवानी शंकर विशारद ने 1964 में झलकारीबाई का पहला आत्मचरित्र लिखा था। इसका बाद कई साहित्यकारों और लेखकों ने झलकारीबाई की बहादुरी की तुलना रानी लक्ष्मीबाई से की है। लक्ष्मीबाई पर लिखी गई कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी’ की तर्ज पर मैथिली शरण गुप्ता ने झलकारी बाई के बारे में लिखा है-

जा कर रण में ललकारी थी,
वह तो झांसी की झलकारी थी।
गोरों से लड़ना सिखा गई,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी।

(साभार – दैनिक जागरण)

‘छोटे शहरों में किराना दुकानों में डिजिटल माध्यम का उपयोग 3 गुना बढ़ा’

कोलकाता : देश के छोटे शहरों में किराना दुकानों में डिजिटल माध्यम का उपयोग 3 गुना बढ़ा है। फ्लिपकार्ट होलसेल ने यह जानकारी दी। फ्लिपकार्ट होलसेल और बेस्ट प्राइस कैश-एंड-कैरी संयुक्त रूप से देश में 15 लाख से अधिक सदस्यों को सेवाएं दे रहे हैं जिनमें किराना, होरेका (होटल, रेस्टोरेंट व कैफेटेरिया) तथा ओ एंड आई (दफ्तर व संस्थान) शामिल हैं। बेस्ट प्राइस कैश-एंड-कैरी ने जनवरी 2021 से जून 2021 के बीच टियर-2 और टियर-3 शहरों में ईकॉमर्स अपनाने की दर में 3 गुना वृद्धि दर्ज की है।
बेस्ट प्राइस में दिलचस्प रुझान देखने को मिले हैं, हर तीन में से एक सदस्य बैस्ट प्राइस ऐप और वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन खरीद एवं भुगतान कर रहा है। फ्लिपकार्ट होलसेल भी अपने बेस्ट प्राइस सदस्यों के बीच ईकॉमर्स के उपयोग में तेज़ी देख रहा है तथा आधे से अधिक सदस्य अब बिना किसी मदद के खुद ऑनलाइन लेनदेन करने में सक्षम हो चुके हैं।
जनवरी 2021 से जून 2021 के बीच बेस्ट प्राइस में डेयरी और ताज़ा उपज श्रेणियों में खरीददारों की तादाद में 2 गुना इज़ाफा हुआ है जिससे किसानों की आजीविका को बल मिला है। इस अवधि में स्टेशनरी आइटम और इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों का सदस्यता आधार भी दोगुना हुआ है क्योंकि अब देश की अधिकांश आबादी घर से काम कर रही है।
फ्लिपकार्ट होलसेल के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट एवं हेड आदर्श मेनन ने कहा, ’’फ्लिपकार्ट होलसेल का बुनियाद मकसद है कि टेक्नोलॉजी की मदद से भारतीय किराना कारोबारियों को समृद्ध बनाने में योगदान दिया जाए। हमारी सभी कोशिशों का लक्ष्य छोटे कारोबारियों की मदद करना है जो खरीददारी हेतु ईकॉमर्स अपनाने के मामले में सैल्फ-स्टार्टर बन कर उभरे हैं। छोटे खुदरा विक्रेता जो फ्लिपकार्ट होलसेल (जिसमें 29 बैस्ट प्राइस कैश-एंड-कैरी स्टोर शामिल हैं) से उत्पाद खरीदते हैं वे अपने उत्पाद प्राप्त करने पर कैशलैस ’डिजिटल पेमेंट ऑन डिलिवरी’ का लाभ उठा सकते हैं। पिछले महीने फ्लिपकार्ट होलसेल ने बैस्ट प्राइस ऐप के जरिए ऑर्डर करने वाले सभी बेस्ट प्राइस सदस्यों के लिए ’कैश ऑन डिलिवरी’ भुगतान सुविधा को भी शुरु किया है। इससे किराना कारोबारियों को अपनी परिचालन लागत के बेहतर प्रबंधन एवं नकदी तरलता बढ़ाने में मदद मिल रही है। वर्तमान चुनौतीपूर्ण हालात में छोटे खुदरा विक्रेताओं की कार्यशील पूंजी को ध्यान में रखते हुए फ्लिपकार्ट होलसेल ने बैंकों और फिनटैक् कंपनियों की भागीदारी में अपने सदस्यों के लिए तत्काल, अल्पकालिक, ज़मानत से मुक्त ऋण समाधान भी प्रस्तुत किया है। इसके अंतर्गत, किराना 14 दिनों का ब्याज़ मुक्त कर्ज़ प्राप्त कर सकते हैं जिसकी सीमा रु. 10,000 से लेकर रु. 25 लाख तक है; यह कर्ज़ ऐंड-टू-ऐंड डिजिटल प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त होता है। फ्लिपकार्ट होलसेल ग्राहकों को कई सुविधाएं मिलती हैं जैसे आसान कर्ज़ सुविधा जिससे की वे अपने नकदी प्रवाह को संभाल सकें, फ्लिपकार्ट-अश्योर्ड क्वालिटी उत्पादों की विस्तृत रेंज, सरल व सुविधाजनक ऑर्डर वापसी एवं शीघ्रता से उनकी दुकानों पर डिलिवरी, ऑर्डर ट्रैकिंग की आसान सुविधा और हर उत्पाद पर बेहतर मार्जिन।

हिंदी पत्रकारिता के प्रवर्तक के नाम पर होगा आईआईएमसी का पुस्तकालय

देश में पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम पर बनेगा पहला स्मारक

नयी दिल्ली : भारतीय जन संचार संस्थान का पुस्तकालय अब पं. युगल किशोर शुक्ल ग्रंथालय एवं ज्ञान संसाधन केंद्र के नाम से जाना जाएगा। हिंदी पत्रकारिता के प्रवर्तक पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम पर यह देश का पहला स्मारक होगा। पुस्तकालय के नामकरण के अवसर पर आईआईएमसी द्वारा 17 जून को “हिंदी पत्रकारिता की प्रथम प्रतिज्ञा: हिंदुस्तानियों के हित के हेत” विषय पर एक विशेष विमर्श का आयोजन किया जाएगा। इस कार्यक्रम में देश के प्रमुख विद्वान अपने विचार व्यक्त करेंगे। आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया कि इस वेबिनार में दैनिक जागरण (दिल्ली-एनसीआर) के संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी मुख्य अतिथि होंगे तथा पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल होंगे। कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ताओं के रूप में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की निदेशक डॉ. सोनाली नरगुंदे, पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. सी. जय शंकर बाबु, कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री स्नेहाशीष सुर एवं आईआईएमसी, ढेंकनाल केंद्र के निदेशक प्रो. मृणाल चटर्जी अपने विचार प्रकट करेंगे। प्रो. द्विवेदी ने इस आयोजन के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि भारत में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत पं. युगल किशोर शुक्ल द्वारा 30 मई, 1826 को कोलकाता से प्रकाशित समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ से हुई थी। इसलिए 30 मई को पूरे देश में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि ‘उदन्त मार्तण्ड’ का ध्येय वाक्य था, ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ और इस एक वाक्य में भारत की पत्रकारिता का मूल्यबोध स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि ये हमारे लिए बड़े गर्व का विषय है कि आईआईएमसी का पुस्तकालय अब पं. युगल किशोर शुक्ल के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने स्वाधीनता से लेकर आम आदमी के अधिकारों तक की लड़ाई लड़ी है। समय के साथ पत्रकारिता के मायने और उद्देश्य चाहे बदलते रहे हों, लेकिन हिंदी पत्रकारिता पर देश के लोगों का विश्वास आज भी है।

ऑल इंडिया मार्केट क्वेस्ट बिजनेस प्लान प्रतियोगिता में एचबीएस प्रथम रनर -अप

कोलकाता : हेरिटेज बिजनेस स्कूल, कोलकाता पश्चिम बंगाल का एकमात्र बी-स्कूल बन गया, जिसने ऑल इंडिया मार्केट क्वेस्ट बिजनेस प्लान प्रतियोगिता 2021 में प्रथम रनर-अप का स्थान हासिल किया। यह कार्यक्रम बीएनपीडी इको लैब्स द्वारा 4 जून 2021 को एक रीसाइक्लिंग और अपशिष्ट प्रबन्धन कम्पनी स्टार्ट टू स्टार्टअप (Start2Startup) के सहयोग से आयोजित किया गया था और परिणाम हाल ही में घोषित किए गए थे।
हेरिटेज बिजनेस स्कूल की छात्र टीम केनेसियन के सदस्यों स्वेता झा और सुभदीप दत्ता शामिल हैं, जिनकी व्यवसाय योजना डॉ. क्लिक- (सभी चिकित्सा आवश्यकताओं के लिए एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म) को प्रतियोगिता में उपविजेता स्थान के लिए चुना गया था। पहला पुरस्कार दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिनिधित्व वाली टीम सिपर ने लिया और दूसरा उपविजेता टीम मस्किटियर्स ने संयुक्त रूप से श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स और टीम स्कूबर्स का प्रतिनिधित्व किया, जिसका प्रतिनिधित्व आईआईटी दिल्ली ने किया।
हेरिटेज बिजनेस स्कूल द्वारा प्रस्तुत परियोजना का विवरण:- डॉ. क्लिक एक दवा मंच के रूप में एक सॉफ्टवेयर है जिसका उद्देश्य नुस्खे और परीक्षण रिपोर्ट का वास्तविक समय भविष्य कहनेवाला विश्लेषण प्रदान करना है और ऑनलाइन डॉक्टर परामर्श से लेकर अंतिम मील दवा वितरण तक सभी प्रकार की फार्मेसी जरूरतों के लिए एक एकीकृत मंच प्रदान करता है।

लीवा मिस दिवा 2021 हुआ डिजिटल, भाग ले सकेंगी ट्रांसवुमन

कोलकाता :   मिस दिवा ने टाइटल स्पॉन्सर के रूप में एक फैशन इनग्रेडिएंट ब्रांड लीवा के सहयोग से अपने 9वें संस्करण के आरम्भ होने की घोषणा की है। इस बार यह प्रतियोगिता डिजिटल हो रही है, घर बैठे ही ऑडिशन दिया जा सकेगा। एमएक्स टकाटक द्वारा सह-संचालित लीवा मिस दिवा 2021 एक डाइनामिक नए फॉर्मेट में अगली ब्यूटी क्वीन को खोजने के लिए उत्साह और जुनून के समान स्तरों को साझा करेगी, जो इस बार डिजिटल मीडिया का लाभ उठाएगी। भारत ने एक से अधिक बार मिस यूनिवर्स का प्रतिष्ठित खिताब जीता है। हाल ही में एडलाइन कैस्टेलिनो की जीत के साथ, जिन्होंने लीवा मिस दिवा 2020 का प्रतिष्ठित खिताब जीता था, भारत को मिस यूनिवर्स 2020 के ग्लोबल मैप पर तीसरे रनर अप के रूप में वापस जोड़ा है।

वर्ष 2013 में शुरू हुई मिस दिवा की आज अपनी खास पहचान है। प्रतिष्ठित खिताब युवा प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान पाने के लिए उन्हें तैयार करने, प्रोत्साहित करने और सशक्त बनाने के लिए अभियान जारी रखेगा। गत 11 जून को इसकी घोषणा की गयी। इच्छुक सुंदरियां अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए भाग ले सकती हैं। इन फाइनलिस्टों की चयन प्रक्रिया में एक ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शामिल होगी, जिसमें भारत के अग्रणी शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म – एमएक्स टकाटक पर विशेष ऑडिशन कार्य प्रस्तुतियां आमंत्रित की जाती हैं। इसके बाद शॉर्टलिस्ट की गई 20 फाइनलिस्ट अक्टूबर 2021 के महीने में ग्रैंड फिनाले में प्रतिष्ठित ताज के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए मुंबई में कठोर प्रशिक्षण और सौंदर्य से गुजरेंगी। समावेशी होने की बात करते हुए, यह सौंदर्य प्रतियोगिता बिरादरी के इतिहास में पहली बार हम ट्रांसवुमन के सौंदर्य को फिर से परिभाषित करने के लिए भाग लेने को प्रोत्साहित कर और कह रहे हैं। और इस बार, सभी खूबसूरत महिलाओं के लिए ऊंचाई मानदंड को 5’4 “कर दिया गया है। लीवा मिस दिवा 2021 की विजेता सम्मानित वैश्विक मंच मिस यूनिवर्स 2021 में भारत का प्रतिनिधित्व करेगी और लीवा मिस दिवा सुप्रानेशनल में देश का प्रतिनिधित्व करेगी। यह भारत को फिर से गौरवान्वित करने का समय है। भारत में कंटेंट की खपत को बढ़ावा देने वाले आकर्षक शॉर्ट वीडियो बनाने के लिए डिजिटल उत्साही लोगों की अविश्वसनीय रूप से प्रतिभाशाली और अथक पीढ़ी को सशक्त बनाने की अपनी दृष्टि के साथ एमएक्स टकाटक इन प्रतिभागियों के लिए पीजेंट के ऑडिशन के लिए प्रवेश द्वार यानी एंट्री गेटवे है। ग्रैंड फिनाले भारत के लोकप्रिय युवा चैनलों में से एक एमटीवी (MTV) पर प्रसारित होगा।

किसी भी आवेदक के लिए भागीदारी मानदंड में शामिल हैं:
⦁ कद: 5’4″ और ऊपर
⦁ उम्र: 18 -27 वर्ष के बीच (31 दिसंबर 2021 तक 27 होना चाहिए)
⦁ वैवाहिक स्थितिः सिंगल, अविवाहित और जिसने एंगेजमेंट नहीं किया हो
⦁ भारतीय पासपोर्ट धारी
⦁ ओसीआई कार्डधारक और एनआरआई रनर अप के लिए भाग ले सकती हैं
⦁ ट्रांसवुमन को भाग लेने की अनुमति रहेगी

 

 

विद्या मंदिर सोसायटी द्वारा टीकाकरण अभियान

बीएचएस और सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल भी हुए शामिल

 कोलकाता : विद्या मंदिर सोसाइटी ने अपनी सभी इकाइयों के लिए हाल ही में टीकाकरण अभियान का आयोजन किया। इसमें बिड़ला हाई स्कूल, बिड़ला हाई स्कूल-मुकुंदपुर, सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल, जेडीबीआई और शिक्षायतन फाउंडेशन के कुछ कर्मचारी भी शामिल हैं। यह अभियान बिड़ला हाई स्कूल के परिसर में आयोजित किया गया था। यह अभियान टेक्नो इंडिया दामा के सहयोग से चलाया गया। यह टीकाकरण अभियान कर्मचारियों, शिक्षकों, उनके परिवारों और आश्रितों के लिए था। Covisheild के 300 से अधिक जैब्स प्रशासित किए गए। सभी कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए कार्यक्रम की सुचारू शुरुआत हुई। विद्या मंदिर सोसाइटी का उद्देश्य अपने फ्लैगशिप के तहत अधिक से अधिक लोगों को टीकाकरण करना था, जिससे न केवल अपने कर्मचारियों बल्कि उनके परिवार के सदस्यों और उनके आश्रितों तक भी पहुंच सके।

कहीं आपका बच्चा आत्ममुग्धता का शिकार तो नहीं

कई अध्ययनों ने साबित किया है कि जो माता-पिता अपने बच्चों को ‘अत्यधिक अहम’ मानते हैं, यानी ओवर वैल्यू करते हैं, उन बच्चों में आत्ममुग्धता यानी नार्सिस्टिक बिहेवियर देखने को मिलता है, जो डिसऑर्डर में बदल सकता है।

नार्सिसिस्टिक डिसऑर्डर क्या है?
व्यक्ति जब ख़ुद के प्रति बहुत ज़्यादा प्रेम करे, ख़ुद की तारीफ़, ख़ुद को ही महत्व देे और ख़ुद की आवश्यकताओं, इच्छाओं और ख़ुद से ही मतलब रखे, तो इसे नार्सिसिस्टिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर (एनपीडी) कहा जाता है।

क्या नतीजे हो सकते हैं?
}अगर बच्चे में आत्ममुग्धता आ जाए, तो वो किसी से नज़दीकी और भरोसे के रिश्ते नहीं बना पाता। समानुभूति यानी दूसरों के भावों को ना समझने की उसकी प्रवृत्ति उसे किसी के करीब नहीं आने देती।
}ऐसे बच्चे किसी और की राय से कभी इत्तेफ़ाक नहीं रख पाते। उन्हें उनकी राय ही सबसे उचित और सही लगती है।
}आत्ममुग्ध बच्चे ख़ुद को बहुत स्पेशल मानते हैं। उनकी प्रतिभाएं विशेष हैं और उनके जैसा कोई और हो ही नहीं सकता -यह विचार उनमें गहरे जमा रहता है।
}ऐसे बच्चे सामाजिक नहीं हो पाते क्योंकि वे किसी और को कुछ नहीं समझते।

कहां है आत्ममुग्ध व्यवहार की जड़ ?
जो चाहिए मिलेगा ही, वे सबसे बेहतर हैं, कोई और मुझे कुछ समझा नहीं सकता, हारना तो हमें आता ही नहीं- ऐसी भावनाएं बच्चों में डालने वाले अभिभावकों के व्यवहार में होती हैं आत्ममुग्धता की जड़ें।

ज़रूरत से ज़्यादा लाड़
बच्चे की ग़लती न देखना, उसकी ग़लतियों पर पर्दा डालना, मुंह मांगी चीज़ तुरंत ला देना, ग़लत करने पर भी हमेशा साथ देना ये कुछ सामान्य कारण हैं जो बच्चों को इस समस्या का शिकार बनाते हैं। बच्चों को लगने लगता है कि वे कुछ भी करेंगे तो अभिभावक उनका साथ तो देंगे ही। इसलिए वे कुछ भी ग़लत करने में हिचकिचाते नहीं हैं।
जीत हर क़ीमत पर
इस तरह के बच्चे हमेशा अव्वल आना चाहते हैं, फिर चाहे बेईमानी से ही क्यों न आएं। हारना या पीछे रहना उन्हें मंज़ूर नहीं होता। बचपन में जब बच्चे कोई खेल खेलते हैं, तो अभिभावक उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए हमेशा जिता देते हैं और फिर यही उनकी मांग बन जाती है। असल ज़िंदगी में या किसी खेल में जब ये बच्चे पिछड़ने लगते हैं तो पीछे रहने के कारण तनाव और अवसाद से घिरने लगते हैं।
ओवर प्रोटेक्टिव
कई माता-पिता बच्चों को लेकर ओवर केयरिंग व ओवर प्रोटेक्टिव होते हैं। किसी अन्य व्यक्ति का उनके बच्चे को समझाना या डांटना उन्हें रास नहीं आता। इसलिए कई बार देखा जाता है कि बच्चों के कारण माता-पिता आसपड़ोस के लोगों से झगड़ने तक पहुंच जाते हैं। फिर बच्चा किसी भी बड़े से मार्गदर्शन लेना पसंद ही नहीं करता।
बढ़ती अपेक्षाएं
जब माता-पिता अपने बच्चे से बहुत ज़्यादा अपेक्षाएं रखते हैं तो बच्चे को ख़ुद को बहुत होशियार या कहें कि समझदार समझने लगते हैं और वे ख़ुद के सामने बाक़ी लोगों को कुछ नहीं समझते। इस कारण उनके दोस्त नहीं बनते और दोस्त बनते भी हैं तो जल्द ही दूर हो जाते हैं।

क्या है निदान?
जितनी कम उम्र में इस व्यवहार की पहचान कर ली जाए, निदान करना उतना ही आसान हो जाता है। बड़े बच्चों के साथ व्यक्तित्व की दूसरी जटिलताएं भी सिर उठाने लगती हैं। कॉग्निटिव बिहेवियर थैरेपी निदान का रास्ता है।

बच्चे की सीमाओं को पहले बड़ों को स्वीकार करना होगा – बच्चे की सीमाओं को जानें, हरफनमौला बनाने या परफेक्ट बनाने की जबरन कोशिश ना करें।
जबरन प्रशंसा ना करें – तुमने बहुत शानदार काम किया’ कहने के बजाय ‘यह काम अच्छा रहा’ जैसी तारीफ़ करें ताकि बच्चा हक़ीक़त से जुड़ा रहे।

वर्तमान में रहें – ‘तुम हमेशा अच्छा काम करते हो’ कहने की बजाय जिस काम की बात हो रही है, बस उसका उल्लेख करें।
 जैसे को तैसा – उसे सिखाएं कि वो दूसरों से वैसा व्यवहार करे, जैसे वो चाहता है कि लोग उसके साथ करें। इससे उसमें भावनाओं की समझ विकसित होगी।
तुरंत कुछ नहीं – बच्चे की हर मांग पर तुरंत खड़े हो जाने की बजाय उन्हें एक टाइम फ्रेम दें कि इतने समय में यह काम पूरा होगा और उन्हें सब्र रखना होगा।
 हारना कोई बुरी बात नहीं – खेल हो, पढ़ाई के नतीजे या कोई भी काम, कोशिश करके जीत जाना या उच्चांक पाना अच्छी बात है लेकिन किसी और की मेहनत या उसकी जीत से ईर्ष्या करना, उसे नकारना सही नहीं है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

रतन टाटा को नए स्टार्टअप्स में निवेश की टिप्स देते हैं शांतनु नायडू

28 साल के शांतनु नायडू ने छोटी उम्र में ही बिजनेस इंडस्ट्री में एक नया मुकाम हासिल कर लिया है। शांतनु नायडू ने अपने आइडियाज से देश के दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा को भी अपना फैन बना लिया है। शांतनु नायडू की एक कंपनी है, जिसका नाम है मोटोपॉज और ये कंपनी कुत्तों के कॉलर का निर्माण करती है।
ये कॉलर अंधेरे में चमकते हैं ताकि कोई वाहन उन्हें ठोककर मार ना दे। इस कंपनी का आरोप चार देशों में 20 से ज्यादा शहरों में फैला हुआ है। ऐसी खबरें हैं कि रतन टाटा अपना पर्सनल निवेश जिन स्टार्टअप्स में करते हैं, उनके पीछे 28 साल के शांतनु नायडू का दिमाग होता है। आइए शांतनु नायडू के बारे में और जानते हैं…
कुत्तों के लिए बनाया चमकने वाला कॉलर
शांतनु नायडू का कहना है कि उन्होंने कई बार गाड़ियों के नीचे आकर कुत्तों के मरते देखा है। शांतनु का कहना है कि अंधेरे में गाड़ियां कुत्तों को नहीं देख पाती, जिस वजह से ये दुर्घटनाएं होती हैं। इसके बाद शांतनु को रिफलेक्टर कॉलर बनाने का आइडिया आया और मोटोपॉज कॉलर बना दी। इस कॉलर की मदद से ड्राइवर बिना स्ट्रीट लाइट के भी कुत्तों को दूर से देख सकता है।
टाटा को पसंद आया शांतनु का अविष्कार
बता दें कि रतन टाटा को भी कुत्तों से काफी लगाव है और टाटा समूह के न्यूज लेटर में इसके बारे में लिखा गया। बाद में रतन टाटा पर इसकी नजर पड़ी। शांतनु ने अपने पिता के कहने पर रतन टाटा को पत्र लिखा और जवाब में उन्हें रतन टाटा से मिलने का न्योता मिला। शांतनु से पहले उनकी चार पीढ़िया रतन टाटा के साथ काम कर चुकी थीं लेकिन किसी को भी उनसे मिलने का मौका नहीं मिला। रतन टाटा ने स्ट्रीट डॉग्स प्रोजेक्ट की मदद के लिए शांतनु से पूछा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। हालांकि रतन टाटा ने जोर देकर निवेश किया और उसके बाद मोटोपॉज की पहुंच 11 अलग-अलग शहरों तक हो गई। अब शांतनु लगातार रतन टाटा से मिलते रहते हैं।
एमबीए के बाद रतन टाटा के साथ काम करने का मौका मिला
मोटोपॉज की शुरुआत करने के बाद शांतनु ने कॉर्नेल में दाखिला लिया। यहां से शांतनु ने एमबीए किया। एमबीए के दौरान उद्यमिता, निवेश, नए स्टार्टअप के साथ-साथ क्रेडिबल स्टार्टअप्स की खोज, इंटरेस्टिंग बिजनेस आइडिया और मुख्य इंडस्ट्री ट्रेंड्स पर पूरा ध्यान लगाकर पढ़ाई की। कोर्स खत्म करने के बाद उन्हें रतन टाटा के साथ काम करने का मौका मिला। शांतनु का कहना है कि ऐसा मौका जिंदगी में पहली बार मिलता है और रतन टाटा के साथ रहकर हर मिनट कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है।
स्टार्टअप्स में रतन टाटा की रुचि ज्यादा
81 साल के रतन टाटा देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम में खासा रुचि रखते हैं। जून 2016 में रतन टाटा की प्राइवेट निवेश कंपनी आरएनटी असोसिएट्स और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने स्टार्टअप को मदद करने के लिए हाथ मिलाया था। इसके अलावा उद्यमियों को रतन टाटा के साथ काम करने का मौका भी मिलता है। यही वजह है कि जिन स्टार्टअप्स को रतन टाटा का सपोर्ट मिलता है उनकी वैल्यू तुरंत बढ़ जाती है।

कोरोना : बंगाल में बढ़ी 1 जुलाई तक सख्ती

दफ्तरों में नहीं आएंगे 25 प्रतिशत से अधिक कर्मी
कोलकाता : पश्चिम बंगाल सरकार ने कोरोना से जुड़ी पाबंदियों को 1 जुलाई तक बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि 1 जुलाई तक रात 9 बजे से सुबह 5 बजे के बीच लोगों की आवाजाही पर रोक रहेगी। हालांकि, जरूरी सेवाओं को छूट दी गयी है। सभी सरकारी दफ्तरों में 25 प्रतिशत कर्मचारी ही आएंगे। निजी और कॉर्पोरेट ऑफिस सुबह 10 से शाम 4 बजे तक खुले रहेंगे। इनमें भी भी 25 प्रतिशत से ज्यादा स्टाफ नहीं बुलाया जा सकेगा। प्राइवेट कंपनियां अपने स्टाफ के लिए ई-पास के जरिए ट्रांसपोर्ट सर्विस का इंतजाम कर सकती हैं। इसके अलावा शॉपिंग मॉल और कॉम्प्लेक्स में दुकानें सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक खोली जा सकेंगी। इनमें 50 प्रतिशत कर्मचारी ही मौजूद रहेंगे। खेलों का आयोजन बिना दर्शकों के कराया जा सकेगा। सभी शिक्षण संस्थान बंद रहेंगे। निजी वाहनों की आवाजाही इमरजेंसी को छोड़कर बंद रहेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि बार वाले रेस्टोरेंट दोपहर 12 से रात 8 बजे के बीच खुल सकते हैं। इनमें क्षमता से आधे लोग ही मौजूद रहे सकेंगे।