Thursday, July 2, 2026
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दिल्ली ही नहीं, हावड़ा के लिए भी प्रयागराज से मिलेगी हाई स्पीड ट्रेन 

प्रयागराज : दिल्ली-प्रयागराज-वाराणसी के बीच हाई स्पीड ट्रेन चलाए जाने के लिए बनाए जाने वाले हाई स्पीड रेल कॉरीडोर का विस्तार अब हावड़ा तक किए जाने की तैयारी की गयी है। यानी कि प्रयागराज से सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि हावड़ाके लिए भी हाई स्पीड ट्रेन लोगों को उपलब्ध होगी। इसके लिए वाराणसी से हावड़ा तक नेशनल हाईस्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनएचआरसीएल ) द्वारा  जल्द हीसर्वे शुरू होगा।इस सर्वे के लिए भी पहले की तरह लिडार तकनीक का प्रयोग किया जाएगा।
दरअसल अहमदाबाद-मुंबई केबाद रेलवे ने दिल्ली से वाराणसी के बीच हाई स्पीड कॉरीडोर बनाने का निर्णय लिया। इसके लिए पिछले वर्ष दिसंबर माह से ही लिडार तकनीक से नई दिल्ली-आगरा-प्रयागराज-वाराणसी हाई स्पीड रेल कॉरिडोर के लिए भूमि सर्वेक्षणका कार्य शुरू हुआ। इस दौरान हेलीकॉप्टर पर लगे उपकरण के सहारे सटीक सर्वेक्षण का आंकड़ा, लेजर आंकड़ा,जीपीएस, उड़ान और तस्वीरों को इकट्टा करके एनएचआरसीएल के अधिकारियों की टीम ने रिपोर्ट तैयार की। कोरोना कीदूसरी लहर की वजह से इसका डीपीआर मई तक तैयार नहीं हो सका।
फिलहाल यह डीपीआर अब अगस्त माह तक केंद्र सरकार को सौंपे जाने की तैयारी कीगई है। इस बीच इस कॉरीडोर का विस्तार हावड़ा तक करने की योजना बनी है। यानी की दिल्ली सेहावड़ा तक आने वाले कुछ वर्षों में हाई स्पीड ट्रेन फर्राटा भरेगी।इस योजना कोलेकर हाई स्पीडरेल कारपोरेशन द्वारा संबंधित रूट पर सर्वे करवाने की तैयारी की गई है। इसकी शुरूआत रेकॉन सर्वे से होगी। उसके बाद दिल्ली-वाराणसी रूट की तर्ज पर हावड़ातक लिडार तकनीकसे भी सर्वे होगा। इस रूट के तैयार होने के बाद हाई स्पीड ट्रेन द्वारा प्रयागराज  से दिल्ली महज तीन से साढ़े तीन घंटे में तो हावड़ा साढ़े चार से पांच घंटे में पहुंचा जा सकेगा।
दिल्ली-वाराणसी रूट पर हाई स्पीड ट्रेन संचालन के लिए नेशनल हाईस्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा भले ही अभी डीपीआर तैयार किया जा रहा हो लेकिन यह रूट देश के अन्य रेल रूटों से एकदम अलग होगा। यह पूरा प्रोजेक्ट एलिवेटेड (खंभों पर) होगा। इसके अलावा हाई स्पीड रेल कॉरिडोर में हाई स्पीड ट्रेन पर्यावरण के ट्रैक से होकर दौड़ेगी। नई दिल्ली-वाराणसी के बीच प्रस्तावित 810 किमी कॉरिडोर किनारे छायादार पौधे रोपे जाएंगे।  यह हाई स्पीड कारिडोर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज समेत 22 जिलों से होकर गुजरेगा।
नेशनल हाइवे के समानांतर बनायाजाएगा हाई स्पीड रेल मार्ग
हाई स्पीड रेल कॉरीडोर दिल्ली से वाराणसी तक नेशनल हाइवे के समानांतर बनाए जाने की तैयारी की गई है। इसका सर्वे भी पूरा हो गया है। कुछ स्थानों पर हाई स्पीड रेल मार्ग यमुना एक्सप्रेस-वे के समानांतर रहेगा। इसे गौतम बुद्ध नगर जिले में बन रहे जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से भी जोड़ा जाएगा। हवाई अड्डे के पास इसे भूमिगत बनाये जाने का प्रस्ताव है।

 

सीबीएसई ने 12वीं के परिणाम की गणना में स्कूलों की मदद के लिए बनाया पोर्टल

नयी दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 12वीं कक्षा के परिणामों की गणना के लिए एक पोर्टल बनाया है ताकि अंकों/ग्रेड का व्यवस्थित ढंग से आकलन किया सके और समय की बचत हो। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
सीबीएसई ने “बारहवीं बोर्ड परीक्षा 2021 के लिए अंकों के सारणीकरण के लिए नीति” जारी की है। इस संबंध में, सीबीएसई ने अपने स्कूलों के परिणाम की तैयारी में परिणाम समिति/ स्कूलों की सहायता करने का निर्णय लिया है। इसी के तहत बोर्ड के आईटी विभाग ने एक पोर्टल तैयार किया है जो बारहवीं कक्षा के परिणामों की गणना के लिए सभी संबंधित स्कूलों को सुविधा प्रदान करेगा।
बोर्ड के आईटी विभाग के निदेशक अंतरिक्ष जौहरी ने कहा कि सीबीएसई से सबंद्ध स्कूलों के छात्रों के अंकों की गणना के लिये उपलब्ध परिणाम के आधार पर एक प्रणाली तैयार की गई है। दूसरे बोर्ड के संदर्भ में सीबीएसई क्षेत्रीय कार्यालयों की मदद से गणना करने के लिये परिणाम संबंधी आंकड़े जुटायेगी। सीबीएसई का कहना है कि यह प्रणाली गणना के काम के बोझ को कम करेगी, लगने वाले समय और कई अन्य परेशानियों को भी कम करेगी।
कोविड-19 महामारी के कारण सीबीएसई ने 10वीं और 12वीं कक्षा की परीक्षा को रद्द कर दिया था। बोर्ड ने परीक्षा परिणाम के संबंध में इन दोनों कक्षाओं के लिये वैकल्पिक मूल्यांकन नीति की घोषणा की है। स्कूलों से 10वीं कक्षा के अंक 30 जून तक जमा करने को कहा गया है जबकि 12वीं कक्षा के लिये स्कूलों को 15 जुलाई की समयसीमा दी गई है ।
सीबीएसई दसवीं कक्षा, 11वीं कक्षा और 12वीं कक्षा के परिणामों के आधार पर 12वीं कक्षा के छात्रों के अंक मूल्यांकन में क्रमश: 30:30:40 का फार्मूले पर कर रहा है ।

‘सबार ऊपरे मानुष सत्य’ के लेखक हैं रेणु’

कोलकाता : हावड़ा में नवनिर्मित हिंदी विश्वविद्यालय की ओर से ‘आपदा,मानवीय दृष्टि एवं एकजुट हम'(रेणु के विशेष संदर्भ में) विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल शिक्षक प्रशिक्षण, शिक्षण योजना एवं प्रबंधन विश्वविद्यालय एवं संस्कृत कॉलेज एवं विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो.सोमा बंद्योपाध्याय एवं हिंदी विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति प्रो.दामोदर मिश्र ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। बायोटेक्नोलोजी बीटेक की छात्रा अन्वेषा चक्रवर्ती ने ‘वर दे वीणा वादिनी’ पर उद्घाटन संगीत प्रस्तुत किया। स्वागत वक्तव्य रखते हुए प्रो.दामोदर मिश्र ने सभी आमंत्रित विद्वानों का स्वागत करते हुए कहा कि एक अहिंदी क्षेत्र बंगाल में हिंदी को पर्याप्त सम्मान एवं अधिकार मिलना हमारे लिए गर्व का विषय है। प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का यह प्रथम प्रयास है। स्वागत गीत का गायन हिंदी विश्वविद्यालय की छात्रा सीमा प्रजापति एवं ज्योति चौरसिया ने किया। उद्घाटन वक्तव्य रखते हुए प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने कहा कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना विश्वबंधुत्व की चेतना के प्रसार हेतु की गयी है । यह विश्वविद्यालय हिंदी और अहिंदी भाषियों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा जिससे सभी इस विश्वविद्यालय से जुड़कर भारत की साझा संस्कृति को प्रसारित करें । यह बंगाल और भारत की संस्कृति के समन्वय का कार्य तथा वैश्विक भाषिक समन्वय का कार्य भी हिंदी के माध्यम से करेगा । विषय पर बात रखते हुए प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने कहा कि रेणु ने सबार ऊपरे मानुष सत्य को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाया। रेणु जीवन सत्य के प्रामाणिक आख्यान रचने वाले मानवीय और संवेदनशील लेखक थे।इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि प्रो.विजय कुमार भारती ने कहा कि रेणु जीवन की कड़ी सच्चाई को व्यक्त करने वाले लेखक हैं। वे मानवीय दृष्टि के साथ सांस्कृतिक, प्रौद्योगिक और राजनीतिक मूल्यों की रक्षा करते हैं। बीज वक्तव्य देते हुए शिक्षाविद संदीप अवस्थी ने कहा कि रेणु का साहित्य मानव जीवनके सत्य की आवाज उठाने वाला साहित्य है। वे व्यवस्था की खामियों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने का साहस भी दिखाते हैं। डॉ. संदीप अवस्थी ने ही कार्यक्रम की मुख्य संयोजन की भूमिका का निर्वहन किया । प्रथम सत्र के सभी विद्वानों के प्रति धन्यवाद देते हुए हिंदी विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ सुकृति घोषाल ने कहा कि भविष्य में भी हिंदी विश्वविद्यालय ऐसे आयोजनों से वैचारिक संवाद की परंपरा को आगे ले जाएगा। दूसरे सत्र में ‘रेणु के कथा संसार में भारतीयता के सूत्र’ विषय पर अपना विचार रखते हुए नीदरलैंड से जुड़ी प्रख्यात लेखिका पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि रेणु अपने विरासत के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। वे तमाम प्रतिगामी शक्तियों से टकराते हुए आदमियत की प्रतिष्ठा के प्रति दृढ़ दिखते हैं। इस सत्र में डॉ विभा कुमारी और अनीता कुमारी ठाकुर ने शोधपत्र- सार वाचन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्व हिंदी सचिवालय,मारीशस के महासचिव प्रो.विनोद मिश्र ने कहा कि रेणु भारतीय जनमानस के सरोकारों से सम्बद्ध लेखक हैं। वे भारतीयता को मात्र संकल्पना नहीं बल्कि जीवन शैली मानते हैं। कार्यक्रम का संचालन करते हुए मधु सिंह ने कहा कि रेणु का साहित्य एवं जीवन हमें महामारी और आपदाओं से लड़ने का नैतिक बल प्रदान करता है। धन्यवाद ज्ञापन अनुवाद साहित्य विभाग के शिक्षक हेमंत कुमार यादव ने किया।

आयुर्वेद और ऐलोपैथी : उपचार पद्धति, विवाद और विचार

वसुंधरा मिश्र

आज मनुष्य उत्तर-आधुनिक युग में जी रहा है जहां परंपरा, प्रकृति, पर्यावरण और विज्ञान को मानो उसने अपनी मुट्ठी में रख लिया है। आदर्श, मूल्य और चरित्र में भी आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। विज्ञान के नये- नये आविष्कार हुए जिनमें चिकित्सा के क्षेत्र में एलोपैथी यानी आधुनिक चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ और दूसरी चिकित्सा पद्धतियाँ जैसे आयुर्विज्ञान, होम्योपैथिक, नेचरोपैथ आदि विकसित हुए।
आयुर्विज्ञान, विज्ञान अर्थात (आयु +र् + विज्ञान ) आयु का विज्ञान है। यह वह विज्ञान व कला है जिसका संबंध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु (निरोगी जीवन) बढ़ाने से है। प्राचीन सभ्यताएं मनुष्य में होने वाले रोगों के निदान की कोशिश करती रही हैं। इससे कई चिकित्सा (आयुर्विज्ञान) पद्धतियाँ विकसित हुई। इसी प्रकार भारत में भी आयुर्विज्ञान का विकास हुआ जिसमें आयुर्वेद पद्धति सबसे ज्यादा जानी जाती है अन्य पद्धतियाँ जैसे कि सिद्ध वैद्य, नेचरोपैथ, योग प्रणाली, होम्योपैथी और एलोपैथी भी भारत में विकसित हुई। प्रारम्भिक समय में आयुर्विज्ञान का अध्ययन जीव विज्ञान की एक शाखा के समान ही किया गया था, बाद में ‘शरीर रचना’ तथा ‘शरीर क्रिया विज्ञान’ आदि को इसका आधार बनाया गया।
पाश्चात्य सभ्यता में औद्योगीकरण के समय जैसे अन्य विज्ञानों का आविष्कार व उद्धरण हुआ उसी प्रकार आधुनिक आयुर्विज्ञान एलोपैथी का भी विकास हुआ जो कि तथ्य आधारित चिकित्सा पद्धति के रूप में उभरी।
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति आधुनिक चिकित्सा पद्धति है जिसकी दवाइयां बहुत जल्दी असर दिखाती हैं। एलो का अर्थ है अन्य और पैथी का अर्थ है पद्धति या विधि। इसका नाम होम्योपैथी के जन्मदाता जर्मन चिकित्सक सैमुअल हैनिमैन ने सन् 1810 में दिया था। होम्योपैथी में सही लक्षणों से सटीक इलाज होता है बशर्ते रोग की सही पहचान हो।
स्वतंत्रता के पहले आयुर्वेद उपेक्षित तो था ही किंतु स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक आयुर्वेद की उपेक्षा होती रही। स्वतंत्रता के बाद आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ही मानी गई। कोलकाता, बनारस, हरिद्वार, इंदौर, पूना, बंबई, केरल, गुजरात आदि क्षेत्रों में आयुर्विज्ञान के संस्थान बने।
वेदों में ऋग्वेद में च्यवन ऋषि को पुनः युवा करने का कथानक आता है और रोगों का निवारण जल, वायु, सौर, मानस आदि चिकित्सा पद्धति से किया जाने का विधान है।
यजुर्वेद में औषधि सूक्त, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का वर्णन है।
अथर्ववेद के प्रथम मंत्र में ही आयुर्वेद के सिद्धांत का परिचय मिलता है जो कि त्रिदोष सिद्धांत एवं सप्तधातु सिद्धांत है। तीन दोष वात पित्त और कफ़ तथा सात धातुएं रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि तथा शुक्र आदि है। ऋषि कहते हैं – – –
ये त्रिषप्ताःपरियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः।
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे।।
अर्थात तीन और सात का यह संयोग या समुच्चय विश्व के समस्त रूपों को धारण करता हुआ गतिशील है, वाणी का पति सोम या इन्द्र उनके बलों को हमें प्राप्त कराएं। अथर्ववेद को क्षत्रवेद और भैषज्य वेद भी कहते हैं, इसमें औषधि रोग चिकित्सक एवं चिकित्सा का ज्ञान है। वेदों में बहुत ही विस्तार से शल्य, गर्भाधान, बाजीकर, विष आदि प्रकरणों का विश्लेषण मिलता है। वेदों में शरीर को ब्रह्मपुरी कहा गया है। रोग निवारण के लिए सूर्य, अग्नि, जल, विद्युत, वायु आदि का सहयोग होता है। वेदों में एक रोग के लिए एक औषधि का वर्णन मिलता है।
एलोपैथी में बीमारी के लक्षण उभर नहीं पाते और धीरे-धीरे ठीक होता है। डॉक्टर नर्स फार्मासिस्ट हेल्थकेयर प्रोफेशनल डिग्री और डिप्लोमा लेते हैं। इनको प्रेक्टिस करने के लिए लाइसेंस मिलता है। इसमें दवाएँ, सर्जरी रेडियेशन कई थैरेपी शामिल हैं। एलोपैथी में दवाओं के अलावा प्रिवेंटिव मेडिसिन भी मिलती है जैसे वैक्सीन जो बीमारी होने से रोकती है। साथ ही कोई दवा देने से पहले क्लिनिकल रिसर्च और फिर ह्युमन ट्रायल होता है।
कोरोना वैक्सीन आ गई हैं और सभी को दी जा रही है।
अभी भारत कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा है। संभवतः अब महामारी अपनी ढलान की ओर है। दूसरी लहर खतरनाक रही जिसने बहुत से परिवारों को मृत्यु की ओर ढकेल दिया। तब वैक्सीन भी नहीं लग सकी थी।

एलोपैथी चिकित्सा बहुत वर्षों से आधुनिक समाज में लागू होने के कारण हम उसे ही प्रमुखता देते आए हैं। इसका कारण है हमें रोग से तुरंत आराम चाहिए। दर्द, पीड़ा और वेदना सहने की सहनशक्ति अब हमारे भीतर नहीं है। रोग से लड़ने की शक्ति तो बिल्कुल ही नहीं है यह बात अलग है कि शरीर में अपनी प्रतिरोधक क्षमता होती है जो छोटी-मोटी और साधारण मौसमी बिमारी जुकाम, सर्दी, खांसी आदि अपने आप तीन – चार दिनों में ठीक हो जाती है लेकिन हम अपने इन रोगों की एलोपैथी दवाई लेकर तुरंत ठीक होने पर तत्काल आराम पाते हैं जो मनुष्य स्वभाव का परिचायक है । एलोपैथी में एंटी बैक्टीरिया होते हैं जो इंफेक्शन को तुरंत समाप्त कर देते हैं। इससे एक समस्या का निदान होता है तो दूसरी समस्या या अधिक समस्याओं का जन्म भी हो सकता है। एलोपैथी में कैंसर जैसे रोगों तक का इलाज है।
आयुर्वेद में भी कैंसर का इलाज है लेकिन उसमें बहुत लंबा समय लगता है और उतनी सहनशक्ति किसी भी रोगी में नहीं होती। आयुर्वेदिक दवा खाने से कभी भी नुकसान नहीं होता। यह बिमारी को जड़ से खत्म करती है। आयुर्वेद हजारों वर्षों से स्वस्थ जीवन का मार्ग प्रशस्त कर रही है। यह प्राचीन विज्ञान है जिसे सिस्टर सांइस के नाम से भी जाना जाता है। पांच हजार वर्षों से आयुर्वेद का मुख्य फोकस जीवन के भावनात्मक और भौतिक रूप को पहचान कर उसे जड़ से दूर करना है। इससे शरीर का शुद्धिकरण, स्वस्थ वजन, त्वचा बाल का रखरखाव, तनाव से बचाना, जलन सूजन को दूर करना, निम्न रक्तचाप, कोलेस्ट्राल और बहुत सी बीमारी का उपचार संभव है। आयुर्वेद सात्विक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाता है। यह जीवन का भौतिक, मौलिक तथा आत्मिक ज्ञान का नाम है। आयुर्वेद का उपचार मानव शरीर और मस्तिष्क को प्राकृतिक रूप से ठीक करता है। आयुर्वेद के प्रति यह भ्रामक धारणा प्रचलित है कि यह केवल जप, योग, पिसे हुए पदार्थ, तेल की मालिश आदि तक ही सीमित है।
संस्कृत के शब्द अयुर यानी विज्ञान और वेद का यानी ज्ञान इन दोनों से आयुर्वेद नाम आया जो वेद पुराणों में मिलता है। भारत में ही इसका उद्गम हुआ है।आयुर्वेद प्रमुख रूप से शरीर को पंचतत्वों जल पृथ्वी आकाश अग्नि वायु से निर्मित मानता है जो विज्ञान पर आधारित है।
आयुर्वेद में तीन चीजों पर अधिक ध्यान दिया जाता है–वात पित्त और कफ़। इन तीनों के संतुलन से शरीर मन चेतना ठीक रहते हैं।वात पित्त और कफ़ में परिवर्तन से शरीर में विकार आते हैं। वात शरीर की गति से जुड़ी सूक्ष्म ऊर्जा है जो अंतरिक्ष और वायु से बनी है। यह श्वास निमिष मांसपेशियों ऊतक आंदोलन हृदय की धड़कन और साइटोप्लाज्म और कोशिका झिल्ली में होने वाले सभी आंदोलनों को नियंत्रित करता है। वात संतुलित न होने पर भय चिंता पैदा होती है। पित्त शरीर के पाचन अवशोषण आत्मसात पोषण चयापचय और शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। पित्त आग और पानी की से बना है। कफ़ वह ऊर्जा है जो शरीर की संरचना हड्डियों मांसपेशियों का निर्माण करती है। कोशिकाओं को जोड़ने का काम करता है। यह पृथ्वी और जल से बनता है। यह जोड़ों में चिकनाई देता है त्वचा को नमी देता है प्रतिरक्षा को बनाए रखता है। अतः शरीर में सब घटकों को संतुलित करने के लिए आयुर्वेद चिकित्सा का महत्व है।
कोरोना महामारी के दौरान आयुर्वेद के प्रति लोगों का रुझान बढा़ है क्योंकि कोरोना महामारी के इलाज की खोज एलोपैथी में अभी तक नहीं हो पाई है। इस महामारी की वैक्सीन आ गई है लेकिन दोनों डोज़ लगने के बाद भी देखा गया कि वह व्यक्ति कोरोना ग्रसित हो गया। कोरोना का निदान एकांत वास, योग, आहार-विहार, प्राणायाम, स्वच्छ वातावरण, घर में बना स्वच्छ और हल्का सुपाच्य भोजन करना आदि सब आयुर्वेद से संबंधित इलाज पर केंद्रित है।
जब घर के अंदर इसका इलाज हो सकता है तो ऐसे में एलोपैथी की बड़ी – बड़ी कंपनियों का मुंह लटक गया। उनकी मोनोपोली कहीं समाप्त न हो जाए और अरबों का घाटा कहीं उनकी दुकानदारी को खत्म न कर दे।
इस लोकतंत्र में वैसे तो सभी को अपनी सेवाएं देने का अधिकार है।
चिकित्सा पद्धति वही अच्छी और कारगर है जो रोगी के प्राण बचाए और स्वस्थ करे।
कोरोना का प्रामाणिक इलाज तो आयुर्वेद या एलोपैथी दोनों के ही पास अभी नहीं है लेकिन भारत सरकार द्वारा दी गई सावधानियों और सुझाव जैसे मास्क लगाना, सेनेटाइजर,
से हाथों को बार बार साफ करना, दो गज की दूरी बनाए रखना, छींक, जुकाम खांसी को दूरी से करना संक्रमण को दूर करने में सहायक है। आयुर्वेद और एलोपैथी दोनों ही भारत में फले फूले, साधारण आदमी का यही मानना है। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन, फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन एफडीए आदि वैश्विक संस्थाएं एलोपैथी पर नजर रखती हैं। आयुर्वेद का सरकारी बजट भी नाममात्र का है लेकिन एलोपैथी पर सरकारी बजट लगभग 90% से भी ज्यादा है। भारत की चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। जब अथर्ववेद का मंत्र कहता है कि ” विश्वा रूपाणी विभ्रतः” तब आशय समस्त प्राणियों के शरीर से है चाहे वे मनुष्य हो अथवा पशु हो अथवा पादप स्थावर आदि। भारतीय का मंत्र “वसुधैव कुटुम्बकम” में निहित है।

सावधान, दोस्ती वाला फोन खाली करवा सकता है आपका बैंक अकाउंट

बबीता माली

यह खबर आपको सजग करने के लिए है, अपराध के लक्षणों को पहचानिए..अपराध पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाली वरिष्ठ पत्रकार बबीता माली घटनाओं का उल्लेख करते हुए बता रही हैं कि आप किस प्रकार की सावधानी रख सकते हैं। ऐसे अलग – अलग जरूरी मुद्दों पर खबरें आती रहेंगी – 

कोलकाता : बैंक अधिकारी बनकर बैंक का ब्योरा लेकर तो कभी ओटीपी हासिल कर ठगी करने वाले गिरोह काफी सक्रिय हैं। मगर, इन सब के बीच एक और गिरोह इन दिनों काफी सक्रिय हुआ है, वो गिरोह है फ्रेंडशिप के नाम पर ठगी करने वाला। आजकल लोगों के अकेलेपन का फायदा उठाकर फ्रेंडशिप के नाम पर ठगी करने वाले ऐसे ही एक गिरोह का बंगाल के बैरकपुर कमिश्नरेट के अंतर्गत बरानगर थाने की पुलिस ने भंडाफोड़ किया और दो युवती सहित 4 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। इनमें से एक आरोपी अमृतेश कुमार मूल रूप से बिहार के वैशाली जिले का रहने वाला है। यहां वो दमदम के सुभाष नगर इलाके में किराए के मकान में रहता है। बैरकपुर कमिश्नरेट के डीसी (साउथ) अजय प्रसाद ने बताया, 18 जून की शाम बरानगर थाने के एसआई देबनाथ घोषाल और उसकी पीसी टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर बरानगर थाने इलाके में एक किराए के मकान में अभियान चलाया और फ्रेंडशिप के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ किया। उन्होंने बताया, इस गिरोह पर दूसरे राज्यों में ऑनलाइन फ्रॉड के कई मामले दर्ज है। फिलहाल, इनके कब्जे से 37 मोबाइल, 7 क्रेडिट और डेबिट कार्ड, 88 हजार रुपए और दो नोटबुक बरामद की गयी है।

फोन कर लोगों को फांसते थे
पुलिस ने बताया, जाँच में पता चला ये गिरोह लोगों को फोन कर उन्हें दोस्ती करवाने का झांसा देते थे। इसके बाद उनसे विभिन्न प्रकार के सेवाओं के नाम पर रुपए ऐंठते थे। सिर्फ दोस्ती ही नहीं बल्कि नौकरी दिलाने के नाम पर भी ये गिरोह ठगी करते थे।

फोन पर क्या बोलना है इसके लिए स्क्रिप्ट भी रहती थी तैयार
पुलिस ने बताया, आरोपियों के कब्जे से एक स्क्रिप्ट भी मिली है। पुरुषों को फांसने के लिए युवतियां फोन करती थी। उन्हें पुरुषों से कैसे और क्या बातें करनी हैं, उसका पूरा ब्योरा एक कागज में लिखकर दिया जाता था। उदाहरण के तौर पर, ये युवतियां फोन कर कहती थी, मैं फ्रेंडशिप डेटिंग सर्विस कंपनी से बोल रही हूँ। कभी बंगलुरु तो कभी अन्य राज्यों का नाम लेती थी और कहती थी कि वो उस राज्य और शहर से बोल रही हैं। इसके बाद अपनी कंपनी के सर्विसेज के बारे में बताया करती थी। इसके बाद जो उनके झांसे में आ जाता उससे पहले कंपनी की सदस्यता  के नाम पर 2500 रुपए लिए जाते थे। इसकी मियाद 3 महीने तक की बताते थे और फिर कुछ ना कुछ बहाना बनाकर रुपए ऐंठते रहते थे लेकिन किसी को कोई सर्विस यानी सेवा नहीं मिलती थी।
डेटिंग से लेकर शारीरिक सम्बन्ध, 3 तरह की सेवाएं देने का देते थे झांसा
पुलिस ने बताया, जांच में पता चला ये गिरोह तीन तरह की सर्विस देने का झांसा देते थे। डेटिंग से लेकर शारीरिक सम्बन्ध, तक का भी वादा करते थे। दरअसल, जब ये अपने ग्राहक को ऑफर देते थे तो कहते थे कि उन्हें तीन तरह की सर्विस मिलेगी। पहली डेटिंग, दूसरी चैटिंग और तीसरी सर्विस फिजिकल रिलेशनशिप की मिलेगी। सभी सर्विस के लिए हाई प्रोफाइल महिलाएं ही मिलेगी। उनके लुभावने ऑफर में आकर कईयों के बैंक अकाउंट तक खाली हो जाते थे। इस मामले में कई लोगों ने ठगी का शिकार होने पर पुलिस से संपर्क किया और शिकायत की। शिकायत मिलने के बाद पुलिस कार्रवाई कर इस गिरोह का पर्दाफाश करने में सफल हुई। फिलहाल, पुलिस मामले की जांच कर रही है।

इन बातोंं का रखें ध्यान 

* किसी भी तरह के लुभावने फोन कॉल से रहे दूर
* फ्रेंडशिप हो या डेटिंग साइट, इन्वेस्ट यानी निवेश से पहले रहे सावधान
* फ्रेंडशिप के नाम पर पैसे मांगने वाली साइटों से रहे सावधान
* अगर किसी को कोई परेशानी हो तो सीधे पुलिस से शिकायत करें

भक्ति रस बिखेरती हैं रीतिकालीन प्रताप कुँवरी बाई की कविताएँ

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों विस्मृत कवयित्रियों की शृंखला में आज मैं आपको एक और कवयित्री के बारे में बताऊंगी। उनका नाम है, प्रताप कुंवरि बाई, जिन्हें समयकाल की दृष्टि से उत्तर मध्यकालीन कवयित्री कहा जा सकता है। इनका संबंध राजस्थान के जोधपुर से माना जाता है और जन्मकाल 1817 ई.। कहीं -कहीं यह भी उल्लेख मिलता है कि इनका जन्म देवरिया के रावलोत वंश में हुआ था और इनके पिता का नाम गोचंददास था। इसी संदर्भ के अनुसार इनका विवाह मारवाड़ के महाराजा मानसिंह के साथ हुआ था। कहीं इनका निधन वर्ष 1886 बताया जाता है तो कहीं संवत् 1900 । एक तथ्य का उल्लेख हर स्थान पर मिलता है कि इन्होंने तकरीबन 15 ग्रंथों की रचना की थी लेकिन आश्चर्य की बात है कि इतने गंर्थों की रचयिता प्रताप कुंवरि बाई के जीवन और उनकी रचनाओं का विस्तृत परिचय नहीं मिलता। इनका उल्लेख सर्वप्रथम नागरी प्रचारिणी सभा के शोध पत्रों में मिलता है, उसके बाद अन्य आलोचकों ने इस काम को आगे बढ़ाया और अपनी पुस्तकों में उन्हें शामिल किया। इन पुस्तकों में श्री रमाशंकर शुक्ल “रसाल” कृत “हिंदी काव्य की कलामयी तारिकाएँ” एवं डॉ सावित्री सिन्हा का ग्रंथ “मध्ययुगीन कवयित्रियाँ”  उल्लेखनीय है जिनमें प्रताप कु़ंवरि बाई के कुछ पद और सवैये संकलित हैं।

हालांकि कालक्रम की दृष्टि से प्रताप कुंवरि बाई रीतिकाल की कवयित्री ठहरती हैं लेकिन इनकी रचनाओं का स्वर भक्तिमय है जिनमें से वैराग्य की सुरभि से मंडित प्रशांत तरंगें प्रसारित होती है। मध्ययुग की अधिकांश कवयित्रियों ने कृष्ण की भक्ति में डूबकर पदों की रचना की है लेकिन इनकी भक्ति और निष्ठा राम के प्रति है। हालांकि राम और कृष्ण भले ही एक ही देवता के दो नाम और स्वरूप हैं लेकिन भक्त कवि कृष्ण के साथ माधुर्य भाव भी भक्ति का संबंध सहजतापूर्वक जोड़ते हैं और राम के साथ साधारणतः दास्य भाव की भक्ति का, जिसमें शरणागति का भाव सहजता से लक्षित किया जा सकता है। यही भाव प्रताप कुंवरि के पदों में भी दिखाई देता है। राम के चरणों में स्वयं को न्योछावर करते हुए उन्होंने बहुत से पदों की रचना की है। प्रस्तुत पद में भी वह राम का ध्यान करने एवं उनका नाम जपने का उपदेश देती हैं-

“धर ध्यान रटो रघुवीर सदा,

 

धनुधारी को ध्यान हिये धर रे।

 

पर पीर में जाय कै वेग परौ,

 

कर ते सुभ सुकृत को कर रे॥

 

तर रे भवसागर को भजि कै,

 

लजि कै अघ-औगुण ते डर रे।

 

परताप कुंवारि कहै पद पंकज,

 

पाँव घरी मत बीसर रे॥”

कवयित्री सिर्फ राम की भक्ति में लीन नहीं होतीं, वह रसखान की तरह उस स्थान विशेष अर्थात अयोध्या नगरी को भी स्मरण करती हैं जो राम की जन्मभूमि ही नहीं, उनकी लीला भूमि भी रही है और भक्ति और प्रताप का केन्द्र भी-

“अवधपुरी घुमड़ि घटा रही छाय।

 

चलत सुमंद पवन पुरवाई नभ घन घोर मचाय॥

 

दादुर मोर पपीहा बोलत दामिनि दमकि दुराय।

 

भूमि निकुंज सघन तरुवर में लता रही लिपटाय॥

 

सरजू उमगत लेत हिलोरै, निरखत सिय रघुराय।

 

कहत प्रतापकुंवरि हरि ऊपर बार-बार बलि जाव॥”

प्रस्तुत पद में सिर्फ आराध्य के प्रति भक्ति का संस्पर्श ही नहीं है लोकगीतों का पुट और माधुर्य भी है। इसे पढ़ते हुए मन भक्ति की मंदाकिनी में अवगाहन ही नहीं करता, लोक रस के माधुर्य से भी सिक्त हो जाता है। अलंकारों की छटा भी प्रताप कुंवरि के पदों में अपना सौंदर्य बिखेरती हुई दिखाई पड़ती है। प्रस्तुत पद में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है जिसमें होली खेलने का रूपक बांधते हुए कवयित्री जगत के प्राणियों को भक्ति के रंग -रस में डूबने की सीख देती हैं-

“होरी खेलन की सत भारी।

 

नर-तन पाय अरे भज हरि को मास एक दिन चारी।

 

अरे अब चेत अनारी॥

 

ज्ञान-गुलाल अबीर प्रेम करि, प्रीत तणा पिचकारी।

 

लास उसास राम रंग भर-भर, सुरत सरीरी नारी।

 

खेल इन संग रचा री॥

 

उलटो खेल सकल जग खेलै, उलटो खेलै खिलारी।

 

सत गुर सीख धार सिर ऊपर सत संगत चल जा री।

 

भरम सब दूर गुमा री॥

 

ध्रुव प्रहलाद विभीषण खेले, मीरा करमा नारी।

 

कहै प्रताप कुंवरि इमि खेले सो नहिं आवै हारी।

 

सीख सुन लीजै अनारी॥”

पदों के अतिरिक्त इन्होंने सवैया छंद में भी रचना की है। प्रस्तुत सवैये में उन्होंने सांसारिक विषय वासनाओं से मुक्त होकर राम के नाम की भक्ति में डूबने का संदेश दिया है क्योंकि उसे ही वह मुक्ति का मार्ग मानती हैं-

आस तो काहू की नाहिं मिटी, जग में भये रावण से बड़ जोधा।

 

साँवत सूर-सुयोधन से, बल से नल से रत वादि विरोधा।

 

केते भये नहिं जाय बखानत, जूझ मुये सब ही करि क्रोधा।

 

आस मिटै परताप कहै, हरिनाम जपेरु बिचारत बोधा॥

सखियों, आप से आग्रह है कि आप भी प्रताप कुंवरि बाई जैसी विस्मृत लेकिन सशक्त भक्त कवयित्री के पदों को पढ़ें और स्वयं इनका साहित्यिक मूल्यांकन करें। अगर इनकी कविता आपको प्रभावित करे तो इन्हें औरों तक भी पहुँचाने का प्रयास करें। आज के लिए विदा, सखियों।

पूर्वांचल विद्यामंदिर में शिक्षकों एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों का टीकाकरण

कोलकाता :  वैश्विक महामारी के इस समय में राष्ट्रीय सचेतनता का प्रमाण देते हुए और जनता की सुरक्षा को ध्यान में रखकर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। इसी क्रम में शिक्षा विभाग द्वारा गैर – सरकारी विद्यालयों के सभी शिक्षकों एवं गैर शिक्षण कर्मचारियों के टीकाकरण का महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। इसके लिए पांच टीकाकरण केंद्र चुने गए जिनमें पूर्वांचल विद्यामंदिर भी एक है। गत 16 जून, बुधवार को यहां 13 विद्यालयों एवं दिनांक 17 जून, गुरुवार को कुल 11 विद्यालयों के शिक्षकों एवं गैर – शिक्षण कर्मचारियों का टीकाकरण किया गया । कोलकाता नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी स्कूलों के लिए यह टीका निःशुल्क प्रदान किया गया। इस महान कार्य को सफल एवं सटीक तरीके से संपन्न करने में पूर्वांचल विद्यामंदिर के सभी सदस्यों ने सक्रिय भूमिका निभाई और अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह किया।
विद्यालय के प्रबंधन समिति के कार्यकारिणी सदस्यों ने इस कार्यक्रम का पूर्ण समर्थन किया । इसके साथ ही पूर्वांचल नागरिक समिति के अध्यक्ष उमेश केडिया, पूर्वांचल विद्यामंदिर के संयोजक रमाकांत बेरीवाल , एवं सह – संयोजक श्री लक्ष्मी नारायण गुप्ता के सक्रिय सहयोग के बिना यह कार्य संभव नहीं हो पाता। विद्यालय की प्रधानाचार्य पुष्पिता बारिक  की देखरेख में बड़ी ही सावधानी से कोरोना कालीन नियमों का पालन करते हुए यह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की स्मृतियों का जीवन्त प्रतीक झाँसी का किला

झांसी, यहां किला बनने और रानी लक्ष्मीबाई के आगमन के बाद इस किले में हर जगह नजर आने वाली उनकी छाप का सिलसिला कुछ इस तरह हैं। बंगरा पहाड़ी पर 15 एकड़ में बने इस विशाल किले की नींव 1602 में ओरछा नरेश वीरसिंह जूदेव द्वारा रखी गई थी। ओरछा झांसी से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित वर्तमान में मध्यप्रदेश का एक कस्बा है। कभी यह सशक्त ओरछा राज्य था और झांसी को इस काल में बलवंतनगर के नाम से जाना जाता था। उस समय बलवंत नगर में रहने वाले किसान खेती, दूध, दही और लकड़ी बेचकर अपना गुजारा करते थे।बलवंत नगर की भौगोलिक स्थिति कुछ इस प्रकार की थी कि यह स्थान बुंदेलखंड की सुरक्षा के लिए सैनिक छावनी के लिए उपयुक्त था। इसी कारण ओरछा नरेश वीरसिंह ने इस नगर की बंगरा पहाड़ी पर 1602 में किले का निर्माण शुरू कराया। किले को बनने में 11 साल का समय लगा और यह 1613 में बनकर तैयार हुआ। जब यह किला निर्माणाधीन था तब ओरछा नरेश से मिलने जैतपुर के राजा आए। जैतपुर के राजा को अपने किले की छत पर ले जाकर हाथ से इशारा करते हुए ओरछा नरेश ने पूछा ‘देखिए आपको कुछ नजर आ रहा है?’ इस पर राजा जैतपुर ने गहराई से देखते हुए कहा कि बलवंत नगर की पहाड़ी पर कुछ ‘झांइ सी’ (धुंधला सा) नजर आ रही है। ओरछा नरेश खुश होते हुए कहा कि आज से बलवंत नगर का नाम ‘झांइसी’ होगा। कालां तर में इसका नाम बदलकर झांसी हो गया।

ओरछा नरेश द्वारा बंगरा पहाडी को काटकर बनाया गया यह किला बेहद मजबूत है इसी कारण इस दुर्ग की चर्चा पूरे संसार में होती है। किले मे 22 बुर्ज और बाहर की ओर उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम दिशा में खाई है, जो दुर्ग की ओर आक्रमणकारियों को सीधे आने से रोकती हैं। ओरछा नरेश के नियंत्रण से निकलकर बाद में झांसी मराठा पेशवाओं के आधीन आई। पेशवाओं ने सूबेदारों की मदद से यहां शासन किया। ओरछा नरेश से संबंधित गुसाईं यहां के किलेदार बने, जिन्हें बाद में पेशवा के मराठा सूबेदारों ने हटा दिया। गुसाईं और मराठा पेशवाओं ने भी किले मे कई अन्य इमारतों और स्थलों का निर्माण कराया।

मराठा नरेश गंगाधर राव से विवाह के बाद मणिकर्णिका झांसी आकर लक्ष्मीबाई कहलाईं। इन रानी लक्ष्मीबाई की छाप किले में हर जगह देखने को मिलती है। किले के पश्चिमी भाग पर बना वर्तमान मुख्य द्वार वास्तव में मुख्यद्वार नहीं है किले पर अंग्रेजों के अधिकार के बाद किले की दीवार को तोड़कर यह द्वार बनाया गया था।

इसी द्वार के पास रखी है ‘कड़क बिजली तोप’ जो किले की सबसे भारी तोप थी। इस तोप को महारानी के विश्वासपात्र गुलाम गौस खाँ चलाते थे। 1857 में जब अंग्रजों ने झांसी पर हमला किया तो पश्चिमी हिस्से के सामने आने वाली पहाड़ी पर बने कैमासन देवी मंदिर की ओट का सहारा लेकर अंग्रेजी तोपों ने गोले बरसाए। उस समय तोप इस हिस्से में बने बुर्ज पर रखी थी लेकिन महारानी ने मंदिर होने के कारण उस ओर कड़क बिजली तोप नहीं चलाने का आदेश दिया लेकिन अंग्रेजों द्वारा उसी दिशा से बरसाएं गोलों के कारण बुर्ज टूट गया और तोप नीचे मलबे में आ गिरी।

इस तोप को 1852 में जनरल करेप्पा ने नीचे से मलबे से निकलवाकर किले के वर्तमान मुख्य द्वार के पास लगवाया। इस तोप में गोला फंसा हुआ है जो दागने के लिए तोप में लगाया तो गया था लेकिन रानी ने गोला दागने का आदेश नही दिया था। किले में अंदर गणेश मंदिर है यूं तो राजा गंगाधर राव और महारानी लक्ष्मीबाई का विवाह किले के बाहर बने गणेश मंदिर में हुआ था लेकिन विवाह के बाद किले में पहली पूजा रानी ने इसी मंदिर में की थी इसीलिए इसे राजा ने अपने विवाहस्थल के रूप में मान्यता दी थी।
किले में इस मंदिर का बहुत महत्व था। रानी रोज यहां पूजा अर्चना के लिए आती थीं। किले के वास्तविक द्वार इसी गणेश मंदिर के नीचे हैं जो लकड़ी के बने हैं और आज भी किले में मौजूद हैं। इन्हीं दरवाजों से रानी का किले मे आना जाना होता था। किले के मुख्य भाग में कारावास, काल कोठरी, शिव मंदिर, फांसी घर, पंच महल, पाताली कुंआ, गलाम गौस खां, मोती बाई व खुदा बख्श की समाधि स्थल और महारानी का छलांग स्थल महत्वपूर्ण जगह हैं।

गंगाधर राव बेहद सख्त राजा थे और वह गद्दारों या नाफरमानी करने वालों के प्रति बहुत सख्त रवैया अपनाते थे और कहा जाता है कि छोटी गलती पर भी फांसी की सजा दे देते थे। किले के उत्तर पूर्वी किनारे पर फांसी घर बनाया गया था जहां जल्लाद फांसी देता था और नीचे गिरने वाली लाश को उसके घर वालों को दे दिया जाता था या लावारिस होने पर ओरछा में बेतवा नदी मे फिकवा दिया जाता था।

मात्र 13 साल की उम्र में विवाह के बाद झांसी आई महारानी लक्ष्मीबाई में इतनी ऊंचे दर्जे की प्रशासनिक समझ और मानवीयता थी कि उन्होंने राजा गंगाधर राव से कहकर छोटी सी बात पर ही फांसी देने की इस प्रथा का अंत करवाया। उन्होंने किले में एक कारावास और काल कोठरी बनवाई और राजा को समझाया कि जो कर्मचारी नाफरमानी करें उन्हें पहले कारावास में रखा जाए और इतना कम खाने को दिया जाएं कि वह सही रास्ते पर आ जाएं।

गद्दारों से निपटने के लिए बनाई गई काल कोठरी ऐसी जगह है जहां जाने वाला हर कैदी हर पल अपनी मौत की दुआ मांगता था। इस बड़ी सी काल कोठरी में न तो कोई खिड़की है और न ही कोई रोशनदान। यहां बस नाममात्र के लिए बेहद छोटे रोशनदान है इस कारण इस कोठरी में सीलन और अंधेरा रहता है। इसी कारण यहां रखा जाने वाला हर कैदी हर पल अपनी मौत की दुआ मांगता था।

किले के मुख्य भाग में बना पंचमहल बेहद खूबसूरत इमारत है जो पांच मंजिला थी। इस पंचमहल में राजा और रानी रहते थे। इसकी सबसे ऊपरी मंजिल में बनी रसोई में राजा और रानी के लिए खाना बनाया जाता था। सबसे ऊपरी मंजिल को बाद में अंग्रेजों ने तुड़वा दिया और सपाट कर दिया। उसके नीचे की मंजिल वर्तमान में बंद है बीच की मंजिल में रानी दोपहर में अपनी सहेलियों के साथ झूला झूलती थीं। यहां चंदन की लकड़ी का झूला टंगा था,रानी अपनी सहेलियों के साथ फुर्सत के पल बिताती थीं। इससे नीचे की मंजिल में रानी व्यायाम किया करती थीं।

बारादरी, किले में एक ऐसी जगह जो राजा रानी के मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होती थी। यहां गजराबाई का नृत्य उनके मनोरंजन के लिए होता था। इसी जगह पर सुरक्षा की दृष्टि से भवानी शंकर तोप रखी गई थी जिसे महिला तोपची मोतीबाई चलाती थीं।

किले में 1602 में बनाया गया एक पाताली कुंआ है। किले के निर्माण के दौरान सबसे पहले कुंआ और मंदिर ही बनाया गया था बाद में किले के बनने में इस्तेमाल हुआ पानी इसी कुंए से लिया गया। यह कुंआ आज भी किले में है जिसका पानी कभी नहीं सूखता। आज भी इस कुंए के पानी का इस्तेमाल साफ सफाई और हरियाली को बनाए रखने में किया जाता है।

किले मे मौजूद महत्वपूर्ण स्थानों मे सबसे महत्वपूर्ण है ‘रानी लक्ष्मीबाई का छलांग स्थल’। यह वह जगह है जहां से महारानी ने अपने दत्तक पुत्र को पीठ में बांधकर घोड़े पर सवार होकर किले से बाहर छलांग लगाई थी। जब रानी के देवर दूल्हाजी राव ने उनके साथ धोखा कर ओरछा गेट खोल दिया और अंग्रेजों को किले के अंदर प्रवेश करा दिया।

रानी और अंग्रेजों के बीच जबरदस्त लड़ाई हुई। मुंह में घोड़े की लगाम लिए, पीछे बेटे को बांधे और दोनों हाथों से तलवार चलाती रानी को युद्ध के बीच में किसी ने पीछे से बरछी मार दी, जिसमें रानी बुरी तरह घायल हो गई। रानी का बहुत खून बहने पर उनकी वफादार झलकारी बाई ने उनसे किला छोडकर जाने को कहा। झलकारी बाई की शक्ल लक्ष्मीबाई से बहुत ज्यादा मिलती थी। झलकारी बाई की बात मानकर रानी ने किले की दीवार से घोड़े पर बैठकर छलांग लगाई।

किले के बाहर स्थित भी कुछ इमारतें हैं जो रानी से संबंधित हैं। इसी ही एक इमारत है रानी महल। राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी महिला सेना के साथ रहने के लिए रानी महल में रहने चलीं गईं थी। इसके अलावा लक्ष्मी तालाब के पास गंगाधर राव की समाधि है और काली जी का बड़ा मंदिर है। रानी रोज काली जी की पूजा करने आतीं थीं।

झांसी में कोई ऐसी जगह नहीं है जो महारानी लक्ष्मीबाई के प्रभाव से अछूती रही है। वीरता और पराक्रम की प्रतिमूर्ति रानी का प्रभाव भी किले में मौजूद हर स्थान पर साफ देखा जा सकता है।

(साभार – वेबदुनिया)

प्रख्यात आधुनिक साहित्यकार गीतांजलि श्री

वसुंधरा मिश्र
जन्म स्थान -12 जून, 1957 , मूल नाम गीतांजलि पांडेय।
जन्म स्थान – उत्तर प्रदेश का मैनपुरी
संक्षिप्त पारिवारिक परिचय –
पिता का नाम – अनिरुद्ध पांडेय आईएएस अधिकारी,
माता का नाम – श्री कुमारी पांडेय
पति का नाम – सुधीर पंत, इतिहासकार
आपकी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से हुई . पिता आई ए एस बनाना चाहते थे। माँ चूंकि हिंदी भाषी थीं इसलिए हिंदी से प्रेम स्वाभाविक था। माँ पिता दोनों से ही अलग- अलग विश्वास और नजदीकी का रिश्ता रहा। मर्ज़ी से विवाह किया, पति का पूरा सहयोग मिला।
#शिक्षा –
प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों मथुरा, अलीगढ़, मुज्जफरनगर में,दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए, महाराज सयाजी राव विवि वडोदरा से प्रेमचंद और उत्तर भारत के औपनिवेशिक शिक्षित वर्ग विषय पर शोध की उपाधि प्राप्त की जामिया मिल्लिया इस्लामिया विवि में अध्यापन कार्य भी किया, सूरत के सेंटर फॉर सोशल स्टडीज में पोस्ट-डॉ क्टरल रिसर्च के लिए गईं।
#कृतियाँ –
उपन्यास- ‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘खाली जगह’ रेत की समाधि
कहानी संग्रह- ‘अनुगूँज’, ‘वैराग्य’, ‘मार्च माँ और साकुरा’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘यहाँ हाथी रहते थे’
थियेटर के लिए भी लिखा हैंं जिसके नाट्य रूपांतरणों का मंचन देश-विदेशों के कई शहरों में हो चुका है।
#पुरस्कार –
इन्दु शर्मा कथा सम्मान, हिन्दी अकादमी साहित्यकार सम्मान-2000-2001 , यू के कथा सम्मान – 1994 अनुगूंज के लिए। द्विजदेव सम्मान, कृष्ण देव बलदेव सम्मान के अलावा जापान फाउंडेशन, चार्ल्स वॉलेस ट्रस्ट भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और नॉन्त स्थित उच्च अध्ययन संस्थान की फ़ैलोशिप ।
स्कॉटलैंड, स्विट्ज़रलैंड और फ्रांस में राइटर इन रैजि़डैंस भी रही हैं.
उनकी रचनाओं के अनुवाद अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, जापानी, सर्बियन, बांग्ला, गुजराती, उर्दू आदि भाषाओं में हो चुके हैं।
गीतांजलि का एक शोध-ग्रंथ ‘बिट्वीन टू वर्ल्ड्स: एन इंटलैक्चुअल बायोग्रैफ़ी ऑव प्रेमचन्द’ भी प्रकाशित हो चुका है।
#विशेष_टिप्पणी –
गीतांजलि श्री अपनी तरह की एक अनूठी रचना कार हैं। आधुनिक स्त्री साहित्यकारों में उनकी पहचान है। स्त्रीवादी साहित्यकारों की परंपरा से हटकर विश्वस्तरीय विषयों की चर्चा उनके साहित्य में जरूर है। लेखिका की खास पहचान सिग्नेचर ट्यून उन्हें अन्य स्त्री लेखिकाओं से अलग पहचान देती हैं। उनका कथा साहित्य और उसकी खास शैली परंपरा से हटकर और परंपरा में समाहित भी है।
गीतांजलि श्री का मानना है कि साहित्य तो है ही व्यंजना और लक्षणा का खेल।
हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘रेत समाधि’को सब बंधन तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है। वे मानती हैं कि फ़्रेंच में अनुदित किताब अलग जीवन शैली व संस्कृति वाले लोग पढ़ेंगे और उनकी सोच व समझ कृति में नए आयाम खोलेगी। कृति नए सिरे से जीवन पाएगी। ये लेखिका उपलब्धि मानती हैं ।
#ख़ास
अच्छा तब लगता है जब विदेशी पाठक अपनी संस्कृति से भिन्न जीवन में वह पाते हैं जो अलग दिखता है पर उनके अनुभव का हिस्सा भी है, यानी वे बातें जो विशेष होकर भी सार्वजनिक हैं और महज़ इंसानी। पराया भी अपना है!
इसके पहले उनके दो और उपन्यास फ्रेंच में आ चुके हैं और वे अपने को ख़ुशक़िस्मत मानती हैं क्योंकि दोनों अनुवादकों से उनका अच्छा सम्बंध बन गया है। एक हैं जानी मानी हिंदी की विदुषी प्रोफ़ेसर आनी मौंतो जो पेरिस में हैं, और दूसरे हिंदी पढ़ाते हैं स्विटज़रलैंड में, निकोला पोत्ज़ा। दोनों हिंदी साहित्य और हिंदुस्तान से ख़ूब परिचित हैं और कुछ हद तक भारतीय बन चुके हैं
#रचना_अंश –
गीतांजलि श्री की पहली कहानी ‘बेलपत्र’ 1987 में ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित हुई।
उनकी पुस्तक ‘सांस लेती अपनी दुनिया’ में भी ‘वास्तविक जीवन’ की हार्दिक बात ही है। सर्जन क्रिया में कल्पना और वास्तविक जीवन का विचित्र खेल चलता है और अगर एकदम सपाट साधारण लेखन की बात छोड़ दें तो ऐसा नहीं होता कि बस जीवन से सीधे सीधे चरित्र उठाया और साहित्य में बैठा दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत से तत्व मिलते हैं और साहित्य और उसमें आते चरित्र, घटनाएं, इत्यादि जन्मते हैं। अक्सर वास्तविक जीवन के अनेक चरित्र मिलके एक चरित्र निर्मित हो जाता है। सर्जक की कल्पना वहां काम करती है।
उनका मानना है कि साहित्यकार को जीवन की सम्भावनाएं, जो हो सकता है अभी हासिल में नहीं आयी हों, भी प्रेरित करती हैं। ये सम्भावनाएं अच्छाई की भी हो सकती हैं और बुराई की भी। साहित्यकार उत्साहित भी कर सकता है, चेतावनी भी दे सकता है। यही कारण है कि भविष्य अक्सर साहित्य में प्रतिध्वनित होने लगता है। जॉर्ज ओरवेल का साहित्य हो या हमारे यहां टैगोर का गोरा । हिंदू समाज को अभी तक उसका गोरा नहीं मिला है, पर है वह कितना परिष्कृत, परतदार, गहरा चरित्र, और कितना ज़रूरी हमारे उद्धार के लिए।
बहुचर्चित उपन्यास ‘रेत समाधि’ में वे एक जगह लिखती हैं कि- “बेटियां हवा से बनती हैं। निस्पंद पलों में दिखाईं नहीं पड़ती और बेहद बारीक एहसास कर पाने वाले ही उनकी भनक पाते हैं।”
गीतांजलि श्री के लेखन में ढेरों गूंज अनुगूंज हैं। एक बात यह कि बेटियों/औरतों को पुरुष-प्रधान समाज में अनदेखा किया जाता है या ख़ास ‘नज़र’ से देखा जाता है, उस नज़र से नहीं जो स्त्रियां चाहती हैं और जिसकी वे हक़दार हैं। उनका मानना है कि नयी नज़र हो,लड़की पहचानी जाए, उसकी बारीकी दिखे।
वे मानती हैं कि महिलाएं पुरुष से अलग हैं, कितनी अलग, किन बातों में अलग, इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है और वो निर्णायक बात से ज़्यादा एक चर्चा और बहुतेरे आयाम खोलने की बात है। समाज और संस्कृति ने किस तरह उन्हें अलग अलग जीव और पहचान बनाया है, वह चर्चा भी होनी होगी। उसकी जगह यहां नहीं है। अभी नहीं।
वे अलग हैं, किन मायनों में हैं, किन मायनों में नहीं, इससे बराबरी की मांग पर फ़र्क़ नहीं ज़रूरी। मैं अलग हूं तो भी बराबरी मांगूंगी। बराबरी यह नहीं कि औरत के भी शिश्न हो और पुरुष के भी स्तन। बल्कि यह कि किसी भी सूरत में दोनों के समान अधिकार हों, समान विकल्प हों, चुनाव की एक-सी आज़ादी हो।
हिंदी साहित्य में किसी नए क्राफ्ट,नए शिल्प या बुनाई के प्रयोग कम ही होते हैं। लेकिन’ रेत समाधि’ में उन्होंने सब बंधन को तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है। वे मानती हैं कि रचना तब सशक्त होती है जब वह अपना विशिष्ट स्वर पा लेती है,अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है,अपनी चाल निर्धारित कर लेती है। रचनाकार को अपने को निमित्त बनने देना पड़ता है। वे ख़ुद को स्वतंत्र छोड़ने का उपक्रम करती हैं और कृति कोख रस्ते, भाषा, शिल्प-शैली चुनने देती हैं। मगर यह किसी अराजकता का पालन करना नहीं है। उनका अंतर्मन, लेखक-मन, चेतन-अवचेतन, संवेदना, सूझबूझ, कल्पना-शक्ति, प्रज्ञा, यह सब रचना शक्ति को तराशते रहते हैं और अभी भी तराश रहे हैं। उनका अंतर्मन अनजाने उन्हें गाइड करता है। अराजक होने से रोकता है, साहस करने को उकसाता है, जोखिम लेने को भी, मगर धराशायी होने के प्रति चेताता भी है, पांसा ग़लत भी पड़ सकता है, पर वह सृजनधर्म में निहित है। और चैलेंज वही है कि संतुलन मिले पर ऊबा हुआ, रगड़ खाया, सपाट घिसा पिटा अन्दाज़ और ढब न बने।
उन्हें रामानुजन का यह कथन बेहद प्रिय है कि मैं कविता का पीछा नहीं करता,अपने को ऐसे ‘माहौल’ या ‘जगह’ में स्थित कर देता हूँ कि कविता मुझे ढूंढ़ लेती है।
जैसा उस्ताद अली अकबर ख़ां ने कहा है – शुरू करता हूं तब सरोद मैं बजाता हूं, फिर सरोद मुझे बजाने लगता है।
जहां उपन्यास रेत समाधि ने बंधन तोड़े हैं तो वह उसका अपना तलाशा और पाया हुआ सत्य है। अगर वह विश्वसनीय, ज़ोरदार बन गया, अपना व्यक्तित्व पा लेता है । सात साल बाद रेत समाधि राजकमल से प्रकाशित हुआ जो ‘डूबना’ डुबा नहीं गया, कोई ‘मोती’ तल से भंवरता आख़िरकार ऊपर आया और हाथ लगा। शायद पाठकों के भी।
‘ तिरोहित ‘ उपन्यास के एक अंश में उनकी भाषा की बानगी देखिए – – तिरोहित टेबल फैन वह वाला जिसे एक बार चोर ने चलता हुआ उठाने की कोशिश की थी, छत से आँगन में रस्सी डालकर, मानो तालाब से मछली पकड़ता हो! उसी के बाद चाचा ने, कि ललना ने, या फिर चच्चों ने, आँगन पर टटूटर डलवा दिया.गर्मी की रात!गर्मी की रातों में क्या किया जाता है ?छत पर सोया जाता है.पर छत तो पूरे मोहल्ले की है, मार भीड़-भाड़, शोर-शराबा, चाँद की तरह ताकाझांकी. चुपके चुपके सहली-सहली. हवा की तरह शरारतें. कहीं मुंडेर पर सुराही रखी है कि रात को उठकर सोंधी मिट्टी की महक का पानी पी लो. कहीं खाट पर कोरी चादरें बिछी हैं, तकियों को गोल मरोड़कर मसनद बना डाला है, ठहाके लगा रहे हैं. जरा अलग किसी ने अंगीठी भी जला ली है और परात से नर्म लोइयाँ लेकर बेल रहा है, गर्म-गर्म फुल्के सेंक रहा है. गिलहरी सोते-सोते जग गई है और उम्मीद नहीं छोड़ पा रही कि आटे में उसके नाम भी हिस्सा है, दो कदम आगे डर-डर के, बीस कदम पीछे और डर के.लेबरनम हाउस की छत. अभी भी कभी-कभी सर्राफों की छत कहलाती है. अठारहवीं शती में यह सर्राफों का मोहल्ला था और उनके राजा ने एक छत के नीचे यह रहने-बेचने की जगह कर दी. कहीं ऊँची, कहीं नीची छत. हर मौसम की निराली छत. हर रिश्ते की हिमायती छत. दबावों से मुक्त छत. असीम से असीम को लाँघती हुई.अट्ठारह सौ सत्तावन में इन घरों में न जाने कितने बाग़ी छिपे कि अंग्रेजों की टुकड़ी आई तो छत की राह घर-दर-घर लाँघते हुए मोहल्ले नीचे कूद जाएँ और फ़रार! सुनते हैं कि चमनजी के दो परदादा भाइयों में एक बाग़ियों के साथ था, दूसरा अंग्रेजों के, और उन मारपीट के दिनों में दोनों एक दूसरे से छिपाकर अपनी टोलीवालों को शरण देते. एक दिन एक इधर का छिपा छत के रास्ते भाग रहा था और उधर का एक, छत के उसी रास्ते छिपने आ रहा था. राह में टकरा गए दोनों और ऊपर से नीचे की छत पर जा गिरे जिससे एक के पैर में पड़ गई मोच. ऐसे में दूसरे ने दोनों हाथों से सहारा देकर उसे छज्जे से ऊपर खींचा और तब फिर ग़ायब हो गया.ग़ायब होना आज भी आसान है इस छत पर. किसी का घर दो-मंजिला, किसी का तीन, कहीं पौर से लगा ज़ीना, कहीं आँगन की दीवार से सटी लोहे की सीढ़ी. छत पर बढ़ी आई दरख्तों की डालें, खम्बे, छज्जे, टंकियां. एक कदम इस ओट, दूसरा कदम उस ओट और नौ-दो-ग्यारह.यही जानकर सुधीरचन्द्र 1942 में भागे, जब पुलिस पहुँच गई उनके बाबा को पकड़ने, जो आंदोलन में सक्रिय थे. अरे बचवा भाग, उनकी दादी चिल्लाई. तोहार बाबा ते है नहीं, ये जल्लादन तोहिके भूँज देंगे. लगीं देने गालियाँ फिर देशद्रोही, वर्दीपोश, अंग्रेजों के टट्टुओं को.मजा यह कि देशद्रोही नहीं तो बड़े देशप्रेमी भी नहीं थे सुधीरचन्द्र. इन्टर, बीए कुछ कर रहे थे और बस इतनी-सी आकांक्षा थी कि अच्छी-भली कोई नौकरी, काले, गोरे, पीले, लाल, जिसके तले, पा जाएँ. ऊधमी बाबा फ्यूचर न बिगाड़ दें, सिर पर पाँव रखकर भागे. पर अबके जो छत पर उधर से दौड़ा आ रहा था, उसने ऐसे किसी रुख का संकेत नहीं दिया कि पास आ, सहारा दे हट जाऊँगा. एक तरफ नीम की डाल दूसरी तरफ दारोगा की मूँछ!