Thursday, October 29, 2026
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कन्हैया लाल सेठिया…रचनाकर्म पर कुछ बातें

– डॉ. वसुंधरा मिश्र

रेगिस्तानी धरती से निःसृत साहित्य सपूत,
विधाता ने दिया वाक् शक्ति का मंगल वरदान,
सुरभित है आपका संपूर्ण सृजन संसार,
गूंँजे विश्व में आपका सदैव यश कीर्ति गान।

बंगाल की धरती से मुझे भी जुड़ने का अवसर मिला और सेठिया जी का आशीर्वाद मिला, जिसे मैं अपना सौभाग्य समझती हूँ । राजस्थान मेरी जन्म स्थली, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय शिक्षा स्थली और बंगाल कार्य स्थली के रूप में तीन प्रदेशों की संस्कृति से जुड़ी । मातृभाषा हाड़ौती, सहयोगी हमजोली भाषा शेखावाटी, अन्य भाषाओं में भोजपुरी, बांग्ला एवं राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और संपर्क भाषा अंग्रेजी से मेरा गहरा संबंध है। बोलचाल और साहित्य में हिंदी भाषा रची बसी हुई है।
सेठिया जी बराबर कहते थे मायण भाषा कदै नहीं छोड़नी चाए। आपणी भाषा में ही सो क्यूँ है? घर में ही बोलो। पर विडंबना ऐसी रही कि मैंने किसी को नहीं छोड़ा लेकिन हिंदी ने हमपर एकाधिकार जमा लिया।
यह सच है कि मायण भाषा में बोलने वालों की कमी आती जा रही है और यही कारण है कि हम डरे हुए भी हैं कि धीरे-धीरे कहीं भाषा का भी वैश्वीकरण न हो जाए। बचाने की कोशिश तो चल रही है।
माता- पिता ही हैं, जो ये काम आगे बढा़ सकते हैं। वैसे तो परिवार, धर्म, ईश्वर, पूजा- पाठ, रीति-रिवाज भी जन्म के अनुसार नहीं हो रहे हैं और न ही कर्म अनुसार ही।
कलकत्ता में बांग्ला भाषा की स्थिति अच्छी थी। अब वह भी कोलकाता बनने में लगा हुआ है। बड़ा बाजार अभी भी मीनी राजस्थान के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। बहुत से परिवार कोलकाता के दूसरे अंचलों में बसते जा रहे हैं। आधुनिक पीढ़ी के सोचने का तरीका और सोच में परिवर्तन इसका मुख्य कारण है।
सेठिया जी के जन्म की बात करें तो उनका जन्म सुजानगढ चुरु राजस्थान में 11 सितंबर 1919 में हुआ। पिता छगनलाल सेठिया और माँ मनोहारी देवी की संतान के रूप में सुपुत्र कन्हैयालाल ने अपने कुल का नाम रौशन किया।
1937 में धापू देवी के साथ विवाह बंधन में बंधे। मात्र 19 वर्ष की आयु में ही विवाह हुआ। एक युवा का उत्साह और सपने लिए सेठिया जी उसी राजस्थान की मिट्टी के सपूत थे जिस मिट्टी में महाराणा प्रताप के आत्म गौरव और देशभक्ति के मंत्रों की ध्वनि की टंकार गूंजती रहती है।
महाकवि सेठियाजी उसी राजस्थान की धरती से जन्मे वे रत्न हैं जिनकी ये पंक्तियाँ महाराणा प्रताप के मातृभूमि प्रेम की तरह ही अजर-अमर हैं – –
धरती धोरां री
आ तो सुरगां न सरमावे
इ पर देव रमण न आवे
इरा जस नर नारी गावे
धरती धोरां री।
इस गीत में पूरा राजस्थान समाया हुआ है जो अद्भुत है।
महाकवि सेठियाजी कलम के सिपाही थे जिन्होंने राजस्थान में सामंतवाद को समाप्त करने के लिए जबर्दस्त मुहिम चलाई और पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार से सम्मानित सेठिया जी की कलम की ताकत किसी देशप्रेमी रण बांकुरे से कम नहीं थी। उनकी रचना’ जागो जीवन के अभिमानी’ की ये पंक्तियाँ – –
लील रहा मधु ऋतु को पतझर
मरण आ रहा आज चरण धर
कुचल रहा कलि कुसुम
कर रहा अपनी ही मनमानी
जागो जीवन के अभिमानी
देश वासियों को जागरूक करने का ही आह्वान इन पंक्तियों में मिलता है।
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान सेठिया जी करांची में थे। सन् 1943 में कवि महान नेताओं जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के संपर्क में भी रहे।
सुदूर पश्चिम से आकर बंगाल की धरती के प्रति भी सेठिया जी की सहृदयता और संवेदनशीलता एक बच्चे का अपनी माँ के प्रति जुड़ाव की तरह ही था। दोनों ही प्रदेशों की सांस्कृतिक और भाषिक धरातल से जुड़े रहे।
जिस समय सेठिया जी का रचना कर्म अपने सृजन के परवान चढ़ रहा था उस समय नवजागरण काल विकास की सीढ़ियों पर कुलांचे भर रहा था।
वैसे तो अपने लंबे सृजनात्मक अनुभवों को सेठिया जी ने अपने बहुविध काव्य संसार में समेटा है।आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक भारतेंदू हरिश्चंद्र ने भाषा की परिवर्तन शीलता को बहुत पहले ही भांप लिया था जिसका परिणाम हम देख रहे हैं – –
निज भाषा उन्नति अहै सब भाषा को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल। इसकी स्थापना तो हो रही थी। हिंदी मुख्य धारा में प्रवेश करने लगी थी। निज भाषा अर्थात् मायण भाषा को सेठिया जी ने प्रमुखता से अपने जीवन में धारण किया। भाषा भारतीय संस्कृति की आत्मा है। सेठिया जी अंत तक अपनी भाषा के गौरव के लिए तत्पर रहे। इसी कारण आज भी हम उनको पढ़ रहे हैं।
कविर्मनीषी सेठिया जी एक सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता, सुधारक परोपकारी और पर्यावरणविद भी रहे। वे स्वयं मानते हैं कि केवल रचना करके कवि अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता, उसका संदेश पूरे विश्व से जुड़े तभी उसकी सार्थकता है।
सेठिया जी समाज के साथ चलने वाले व्यक्ति रहे हैं। खादी वस्त्र धारण करना, दलित उद्धार में लगना, राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत रचनाएँ लिखना उनके लेखन के अंग रहे हैं।
मुक्तिबोध की “चकमक की चिंगारियां” की ये पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगी – – – –
नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता
नहीं होती कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है
व मैं उसका नहीं है कर्ता,
पिता धाता
कि वह अभी दुहिता नहीं होती
परम स्वाधीन है, वह विश्व शास्त्री है। (चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृष्ठ. 155)
1942 में गाँधी जी ने’ करो या मरो’ का आह्वान किया। उस समय सेठियाजी का काव्य संग्रह ‘अग्नि वीणा’ प्रकाशित हुई। बीकानेर में इस पर राजद्रोह का मुकदमा चला। बाद में तो राजस्थान सरकार ने इन्हें स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान प्रदान किया। ऐसे साहित्य सेवी और देश भक्त कवि की काव्य यात्रा को दो काल- खंडों में देखा जा सकता है – सन् 1936-1975 प्रथम और द्वितीय सन् 1976 – 2005 की रचनाधर्मिता।
14 राजस्थानी, 20 हिंदी, 2 उर्दू में रचनात्मक साहित्य के रचयिता कविर्मनीषी को सन् 1976 से जो पुरस्कार मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह सन् 2005 तक मिलता चला गया ।साहित्य अकादमी, डॉ तेस्सीतोरी स्मृति स्वर्ण पदक, साहित्य मनीषी, मूर्ति देवी पुरस्कार, सूर्य मल्ल मिश्रण शिखा पुरस्कार, टांटिया पुरस्कार, पृथ्वीराज राठौड़ पुरस्कार और अनगिनत पुरस्कार। मिले। 2004 में पद्मश्री से सम्मानित हुए।
कवि के रचना संसार पर दृष्टि डालें तो जिन देश काल की परिस्थितियों से भी गुजरना होगा।
देश की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्य धारा जो प्रमुख धारा रही, सेठिया जी को वहाँ से जोड़ कर देखा जा सकता । यह धारा सन् 1857 की क्रांति के बाद से ही शुरू हो गई थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हलचलों ने भी राष्ट्रीयता को प्रभावित किया। भारतेंदु युग में जहाँ औपनिवेशिक सत्ता के लूट को उजागर किया जा रहा था, वहीं द्विवेदी युग में राष्ट्र वाद को प्रतिष्ठा दी जा रही थी।
गाँधी के आगमन के बाद भारतीय राजनीति में नरमदल का प्रभाव बढा़ और कविता भी आत्मपीड़न को नरमी के साथ अभिव्यक्त करने लगी। लेकिन भारतीय राजनीति में गरम दल के प्रभाव, रूस की क्रांति की सफलता, भारत में वामपंथ की स्थापना आदि के बाद कविता ओजपूर्ण और बुलंद स्वर के साथ राष्ट्र मुक्ति में भागीदारी निभाने लगी।
रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘, गोपाल सिंह नेपाली सोहनलाल द्विवेदी आदि की राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत कविताएँ आ रही थीं।
1930-35 से लेकर 1947-48 और उससे आगे सन् 1962 तक देश के विभिन्न भूखंडों और जनवृत्तों में तरह-तरह की घटनाएँ घटीं।
बंगाल में अकाल, द्वितीय महा युद्ध का प्रभाव, नौ सेना विद्रोह आदि बहुत सी घटनाएँ घटीं।
फिर 1942 की शहादत, देश का आजाद होना विभाजन दंगे अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त हुए लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री का राजनीतिक मोहभंग आदि घटनाओं की निरंतरता।
स्वदेशी शासन व्यवस्था में जिस तरह की कामना लेकर उस समय कवि बढे़ थे, उनकी कामनाओं और सपनों पर तुषारापात हो गया। मगर प्रतिबद्ध रचनाकार विचलित नहीं हुए, डटे रहे।
मैत्री का समझौता कर लेने के बावजूद सन् 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया और लद्दाख में 15-20 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा कर लिया।
‘इस धोखे का नाम दोस्ती है और इस दोस्ती को हम चीन कहते हैं।’ ऐसी ही कविता हर देश भक्त कवि की लेखनी से निकल रही थी।
सेठिया जी ने अपने जीवन काल में आजादी से पहले, आजादी के बाद और आजाद भारत में आधुनिक भारत के बनने की प्रक्रिया को भी देखा।उनके काव्य में गाँव, प्रकृति, समाज, राष्ट्र, अनिष्ट से लड़ना वर्तमान को सुधारना, वर्ग संघर्ष, मातृभूमि के प्रति प्रेम आदि के साथ धर्म, दर्शन और अध्यात्म का सुंदर समायोजन मिलता है। कहीं कोई दुराव छिपाव नहीं है। प्रेम और उदारता का नाटक नहीं है। यही निश्छलता सेठिया जी के रचना संसार को दीर्घकालिक बनाती है।
पहला काव्य संग्रह दीपकिरण 1954 में आता है। 1947- 1967 के बीस वर्षों की नीति देखकर तैयार हुई इस नयी पीढ़ी का रोष पूर्ववर्ती की तुलना में थोड़ा तल्ख लेकिन विचार पद्धति सुदृढ़ और सुविचारित हुई। यहाँ तक आते आते कविता की भाषा में प्रहार बढ़ गया। धूमिल, रघुवीर सहाय आदि की कविताओं में वे कहते हैं –
न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का
मेरे अंदर एक कायर
टूटेगा टूट
मेरे मन टूट मत
झूठ मूठ ऊब मत रूठ
आस्था का लौट आना, मन के भीतर बैठे कायर को टूटने की आज्ञा देना उस समय की बड़ी घटना थी। कविता में कवि का यही आत्म संकल्प हिंदी को प्रगतिशील जनवाद से आगे फिर समकालीन कविता से जोड़ता है।
प्रगति चेतना लोकमंगल की भावना और मानव प्रेम की यह धारा नयी पीढ़ी भी बनी और अपनी नयी चिंतन पद्धति का उत्तरदायित्व का सौंप गए।
सेठिया जी की कविताओं में परंपरागत और आधुनिकता के बीच द्वंद्व समय परिवेश की समस्याएँ चिंता संघर्ष आदि बहुत विषयों का विस्तार है।

क्रमशः

कलम सिर्फ चलती है 

डॉ. वसुंधरा मिश्र

कलम एक ऐसा माध्यम है जो दुनिया को अपनी मुट्ठी में भी कैद कर सकता है और ऐसा समाज भी निर्मित कर सकता है जहाँ लोग अमन-चैन से जीवन बिता सकते हैं। कलम चलाता कौन है? हमारे शास्त्रों को किसने लिपि दी? अलग- अलग भाषाओं में हमने पत्थरों से लेकर धातुओं पर लिखा। अपने विचारों को हर युग ने अपनी शर्तों पर लिखा।
भारत की संस्कृति बहुत पुरानी है। मुझे भाषा का बोलचाल वाला रूप याद आ रहा है। जानते हैं उसे ही सरस्वती या वाग्देवी या फिर वीणापाणी माँ भारती का रूप माना जाता है। भारत ही ऐसा देश है जहाँ लिखे शब्दों को ब्रह्म कहा गया है। लिखने के पहले कलम की पूजा करने की आवश्यकता है। ये संस्कार दिए जाते थे कि जो भी लिखा जाए समाज के कल्याण के लिए लिखा जाए।
जैसा हम सोचते हैं वैसा ही लिखते हैं। बचपन में स्लेट और बर्ता से लिखते थे, बाद में चॉक फिर बड़े हुए तो पेंसिल दी गई फिर पेन आया। कितनी ख्वाहिश रहती थी कि कब पेन मिलेगा। कभी पिताजी के पेन को चुरा लेते थे और उसकी पूरी स्याही घिस घिस कर खत्म कर देते थे।
स्याही की दवात में से पिचकू से भरते थे। कभी-कभी पेन में स्याही भरते समय जमीन पर गिर जाती थी, तब कोई छोटे कपड़े से जल्दी जल्दी पोंछ कर उस कपड़े को छिपा देते थे। स्याही का दाम 3-4 रुपया होगा। मुझे सही कीमत नहीं पता क्योंकि पिताजी लेकर आते थे।
कक्षा पाँच तक तो कलम के दर्शन नहीं हुए। क्योंकि उस समय तक हमलोग छोटे ही थे। वैसे तो बड़े होकर भी छोटे और नासमझ की ही श्रेणी में रखे जाते थे।
खैर, कक्षा छह में कलम मिली वह भी बिल्कुल सस्ती वाली। कलम की कामना करते करते कलम मिली। स्याही की नई दवात भी आई। कलम स्याही एक – दूसरे के पूरक हैं। एक नहीं, तो कलम रुक जाती थी।
लिखने-पढ़ने वाला हो या व्यवसायी हो या कवि लेखक कथाकार कोई भी हो उसकी जेब में कलम लगी रहती थी। नेताओं के कुर्तों की जेब में एक से एक महंगे और ब्रांडेड कलम करीने से लगा कर रखते हैं। ये बात अलग है कि वे लोग कौन- सी सोच से प्रजा को हांकते हैं। कोट में गोल्डन पेन का हुक बहुत अच्छा लगता था।
कलम एक बार खरीद लो और स्याही भर- भर कर चलाते रहो। हम कभी भी स्याही भरने में आलस्य नहीं करते थे। हॉं,परीक्षा के दौरान लिखते- लिखते जब स्याही खत्म हो जाती तब बहुत गुस्सा आता था। आजकल तो कलम फेंक कर दूसरे कलम ले लेते हैं।
कई बार तो नींब भी टूट जाती थी। पहले पिताजी की डांट खाओ फिर नीब लगवाकर लाते। बहुत बड़ा काम था। स्याही की तो बात ही निराली थी।
स्याही ने तो अपने रंग से हमलोगों को बहुत राहत दी थी। कक्षा में मित्रों के साथ लड़ने झगड़ने में स्याही छिड़क कर अपना बदला लेते रहते थे। काली और नीली स्याही हमलोगों के काम आती थी। बड़ा पक्का रंग था। कागज में पानी लगने से पूरा कागज नीला हो जाता था।
सुलेखा ब्रांड की स्याही की दवात न जाने कितनी खर्च हो गईं होगीं, याद भी नहीं है।
सच में, स्याही के कलम को बहुत सहेज कर रखे थे डिब्बों में, अब तो हर रोज प्लास्टिक के पेन को “यूज एंड थ्रो” के आधार पर फेंकते रहते हैं। पेन के अंदर की गाढ़ी इंक खत्म होने पर दूसरा पेन खरीद लेते हैं। पेन बहुत सस्ता और सुलभ हो गया है। अब तो वे जमाने लद गए जब कलम को पूजा में रखते थे और उसे सिर से लगाते थे। – –

“कलम के दिन अब फिर न आएंँगे
की – बोर्ड पर अंगुलियां थिरकती हैं
हवा से बात करते अनगिनत शब्द
न जाने किन किन विचारों के पुल गढ़ते हैं
लिखना कभी न होगा बंद
जब तक रहेगा मनुष्य विचार रहेंगे। “

भवानीपुर कॉलेज में मनाया गया शिक्षक दिवस

कोलकाता :  मार्क डोरेन के शब्दों में शिक्षण की कला खोज में सहायता करने की कला है। एक शिक्षक हमारे जीवन में जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, उस पर कभी संदेह नहीं किया जा सकता। वे हमारे जीवन को आकार देने और हमारे भविष्य को सुरक्षित करने में हमारी मदद करते हैं। इस प्रक्रिया में वे हमारा मार्गदर्शन करते हैं और हमें खुद को खोजने में मदद करते हैं और हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। भवानीपुर सोसायटी कॉलेज के छात्रों ने शिक्षक दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया। कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करने और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने के लिए कार्यक्रम दो सत्रों में मनाया गया, एक सुबह और दूसरा दोपहर में। कलेक्टिव फ्लेम, इन-एक्ट फैशनिस्टा और क्रिसेंडो ने शिक्षक दिवस पर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वर्तमान में शिक्षक और शिष्य के बीच किस प्रकार का संबंध है हास्य नाटक के द्वारा विद्यार्थियों ने प्रस्तुति दी। फ्लेम की टीम ने गुरु को केंद्र में रखकर शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति दी वहीं फैशनिस्टा की टीम ने हैरी पॉटर की थीम पर फैशन रेंप किया। कॉलेज का जुबली सभागार युवाओं की ऊर्जा से पूर्ण था। सभी शिक्षकों और शिक्षिकाओं ने शिक्षक दिवस पर भरपूर आनंद उठाया। कोरोना की सभी सावधानियों के साथ कार्यक्रम किया गया। फूड पेकेट और उपहार दिए गए।

कॉलेज के डायरेक्टर जनरल डॉ. सुमन मुखर्जी ने अपने वक्तव्य में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा विद्यार्थियों को देश के लिए अच्छे नागरिक तैयार करती है जो परिवार समाज देश के लिए अच्छा काम करे। डॉ समीर दत्ता ने शिक्षक दिवस पर सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन को याद किया जिनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। कोआर्डिनेटर प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी और दिव्या उदेशी ने दोनों सत्रों के शिक्षक दिवस के कार्यक्रम का आयोजन किया। कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह ने वर्तमान में शिक्षक के बदलते स्वरूप पर अपनी बात रखी और विद्यार्थियों को भविष्य में आने वाली चुनौतियों से सामना करने के लिए सकारात्मक सोच के प्रति जागरूक किया। यह कार्यक्रम चार सितंबर को रखा गया। बी कॉम, बीए, बीबीए और एम कॉम के शिक्षक और शिक्षिकाओं की उपस्थिति रही। विद्यार्थियों को सभी शिक्षकों ने अपना परिचय भी दिया। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ. वसुंधरा मिश्र ने।

भवानीपुर कॉलेज में केस स्टडीज पर कार्यशाला का आयोजन 

कोलकाता :नकेस स्टडी से तात्पर्य है किसी भी वस्तु, स्थिति का भलीभांति बारीकी से जाँच पड़ताल करना व जानना। इसका बुनियादी आधार विद्यार्थी की जिज्ञासु प्रवृत्ति को माना जाता है। दूसरे शब्दों में मनुष्य का सम्पूर्ण ज्ञान उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति का परिणाम है और केस स्टडी किसी ज्ञान, अनुभव को पाने का साधन है।
क्या केस स्टडी इतना सफल बनाती है? केस स्टडी किसी को आगे सोचने में कैसे मदद करती है? आदि सवालों को
आईबीएस आईसीएफएआई बिजनेस स्कूल के सहयोग से भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज इकोफॉर सामूहिक ने “केस स्टडीज एंड मोर” पर एक सत्र आयोजित किया।

सत्र के वक्ता प्रो. मुरलीधर जीवी थे, जो वर्तमान में कैंपस हेड और निदेशक, आईबीएस आईसीएफएआई बिजनेस स्कूल, बैंगलोर के रूप में कार्यरत हैं। वह मैकेनिकल इंजीनियर, पीजीडीएम और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बैंगलोर से गोल्ड मेडलिस्ट और चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट हैं, जिन्हें उन्तीस से अधिक वर्षों का उद्योग अनुभव है और उन्होंने प्रतिष्ठित सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के संगठनों में कई वरिष्ठ पदों पर कार्य किया है। आईबीएस बंगलुरु में कैंपस हेड के रूप में अपने कार्यकाल से पहले, वह आईबीएस  हैदराबाद में डीन-केस रिसर्च सेंटर थे। उन्होंने विश्व स्तर पर प्रसिद्ध सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में प्रतिभाशाली केस राइटर्स की एक टीम का नेतृत्व किया और कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और उपलब्धियाँ हासिल कीं।
प्रो. मुरलीधर ने प्रबंधन में सौ से अधिक केस स्टडीज का लेखन/सह-लेखन किया है। इनमें से कई ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीते हैं और अंतरराष्ट्रीय पाठ्यपुस्तकों में पुनर्मुद्रित भी हैं। वह कई प्रतियोगिताओं के लिए जूरी सदस्य रहे हैं और कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के दर्शक हैं। उन्होंने कई संकाय विकास कार्यशालाओं के साथ-साथ प्रबंधन विकास कार्यक्रम भी आयोजित किए हैं।
कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह ने कार्यशाला की शुरुआत में परिचयात्मक वक्तव्य रखा । 95 से अधिक प्रतिभागियों के साथ, स्वागत भाषण के बाद,प्रमुख वक्ता प्रो. मुरलीधर ने अपने ओलंपिक में हुए भारत पर केस स्टडी पर एक इंटरैक्टिव सत्र के साथ अपनी बात रखी। मामले के प्रश्न पर कई प्रश्नोत्तर सत्र हुए जिनमें प्रतिभागियों को 10 छात्रों के 10 ब्रेकआउट समूहों में विभाजित करने से पहले कुल 30 मिनट तक परिचर्चा सत्र जारी रहा। प्रत्येक समूह को मामले में पूर्व-प्रदान किए गए तीन प्रश्नों के समाधान का पता लगाने और ब्रेकआउट सत्र के 10 मिनट बाद अपने विचार और समाधान प्रस्तुत करने का कार्य सौंपा गया था। 10 मिनट के ब्रेकआउट सत्र के दौरान, प्रत्येक कमरा एक-दूसरे के साथ अत्यधिक संवादात्मक था, केस स्टडी के समाधान पर चर्चा और योजना बना रहा था।
10 मिनट के बाद, प्रत्येक समूह ने एक अनूठा समाधान प्रस्तुत किया और सभी को अपने विचारों से अवगत कराया। कुल मिलाकर, प्रतिभागियों ने ब्रेकआउट सत्र के माध्यम से परे देखना, अलग तरह से सोचना और एक-दूसरे के विचारों और विचारों का सम्मान करना सीखा।
सत्र के अंतिम खंड में प्रो. मुरलीधर जी.वी. ने प्रतिभागियों को केस स्टडी के लाभ के बारे में बताया और बताया कि उन्हें केस कब उठाना चाहिए। केस स्टडीज और अधिक पर अपरंपरागत कार्यशाला खंड कशीश बर्मन के धन्यवाद ज्ञापन के साथ समाप्त हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने चैट बॉक्स में अपनी संतुष्टि और आभार व्यक्त किया।कार्यक्रम के स्वयंसेवक वंशिका जैन, अर्पणा गुप्ता, हार्दिक वोरा थे। शुभम तिग्रानिया और कशिश बर्मन ने रिपोर्ट बनाई ।कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला का निधन

मुम्बई : मशहूर अभिनेता एवं ‘बिग बॉस-13’ के विजेता सिद्धार्थ शुक्ला का बृहस्पतिवार को निधन हो गया। वह 40 वर्ष के थे। धारावाहिक ‘बालिका वधू’ में निभाई गई उनकी भूमिका के लिए उन्हें काफी लोकप्रियता मिली थी और वह घर-घर में पहचाने जाने लगे थे। वे बिग बॉस के विजेता भी रहे। अभिनेता को सुबह करीब 10 बजकर 20 मिनट पर कूपर अस्पताल ले जाया गया था। अस्पताल के अधिकारियों ने बताया कि जब उन्हें अस्पताल लाया गया, तब उनकी मौत हो चुकी थी। अचानक हुई मौत का कारण अभी तक पता नहीं चल पाया। शुक्ला के परिवार में उनकी मां और दो बहने हैं। उन्होंने एक मॉडल के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। ‘बाबुल का आंगन छूटे ना’ धारावाहिक के साथ छोटे पर्दे पर उन्होंने कदम रखा और बाद में ‘जाने पहचाने से … ये अजनबी’, ‘लव यू जिंदगी’ जैसे धारावाहिकों में भी वह दिखाई दिए, लेकिन ‘बालिका वधू’ से वह घर-घर में पहचाने जाने लगे। इनके अलावा, वह ‘झलक दिखला जा 6‘, ‘फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी 7‘ में भी नजर आए। 2014 में शुक्ला ने करण जौहर की फिल्म ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियां’ के साथ बॉलीवुड में करियर की शुरुआत की थी।

मशहूर बांग्ला लेखक बुद्धदेव गुहा का निधन

कोलकाता : जाने-माने बंगाली लेखक बुद्धदेव गुहा का कोरोना वायरस संक्रमण से उबरने के बाद हुई समस्याओं के कारण निधन हो गया। वह 85 साल के थे। लेखक के परिवार ने बताया कि कोरोना वायरस संक्रमण से उबरने के बाद उत्पन्न हुई समस्याओं के कारण उन्हें यहां के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था और गत 30 अगस्त को दिल का दौरा पड़ने के बाद देर रात 11 बजकर 25 मिनट पर उनका निधन हो गया। उनके परिवार ने बताया कि गुहा कोरोना वायरस संक्रमण से उबरने के बाद उत्पन्न हुई समस्याओं से परेशान थे और सांस लेने में तकलीफ तथा पेशाब में संक्रमण की शिकायत के बाद उन्हें इस माह के शुरु में अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
गुहा अप्रैल में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए थे और करीब 33 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहे थे। गुहा के परिवार में उनकी पत्नी रितु गुहा और दो बेटियां हैं। लेखक की बड़ी बेटी मालिनी बी गुहा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि बुद्धदेव गुहा नहीं रहे। गुहा का जन्म 29 जून 1936 को कोलकाता में हुआ था। उनका बचपन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के रंगपुर और बारीसाल जिलों में बीता। उनके बचपन के अनुभवों और यात्राओं ने उनके दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी, जो बाद में उनके लेखन में दिखाई दी। उन्हें 1976 में आनंद पुरस्कार, इसके बाद शिरोमन पुरस्कार और शरत पुरस्कार के अलावा उनके अद्भुत काम के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

डाकिया आपके घर लाएगा बदरीनाथ-केदारनाथ सहित चारधाम का प्रसाद

डाक विभाग चारधाम का प्रसाद डाक के माध्यम से श्रद्धालुओं के घर पहुंचाने की योजना बना रहा है। इसके लिए देवस्थानम बोर्ड से बातचीत चल रही है। गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ और केदारनाथ विश्वविख्यात धाम हैं। इन धामों के प्रति लोगों की अटूट आस्था है और हर साल लाखों श्रद्धालु चारधाम के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। जब से कोरोना संकट पैदा हुआ है, चारधाम यात्रा बंद है। बावजूद इसके, कई ऐसे श्रद्धालु हैं, जो घर बैठे चारधाम का प्रसाद मंगवाना चाहते हैं। अब डाक विभाग पहल करने जा रहा है। श्रद्धालु घर बैठे डाक विभाग की वेबसाइट या दूरभाष नंबर पर प्रसाद की मांग कर सकेंगे। विभाग प्रसाद डाक के माध्यम से घर भिजवाएगा। विभाग की देवस्थानम बोर्ड और मंदिर समितियों से बातचीत चल रही है। डाक से प्रसाद भेजने का प्रयोग विभाग देश के बाकी स्थानों पर भी कर रहा है। काशी विश्वनाथ का प्रसाद भी डाक के माध्यम से भेजा जा रहा है। सहायक पोस्टमास्टर जनरल एके कंडवाल ने बताया कि देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों का प्रसाद डाक से भेजने की तैयारी चल रही है। इसमें उत्तराखंड के चारधाम भी शामिल हैं। यदि देवस्थानम बोर्ड से बात बनती है तो जल्द इस प्रयोग को शुरू कर दिया जाएगा।
उत्तराखंड में डाक विभाग ने 2016 में डाक से गंगाजल भेजने की सुविधा शुरू की। इसके अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। हर साल करीब चार लाख बोतलें गंगाजल की डाक के माध्यम से श्रद्धालुओं तक भेजी जा रही हैं। बोतल 250 एमएल की हैं, जिसके दाम 30 रुपये हैं। इसके अलावा इसमें डाक का खर्चा अलग से लगता है। पहले बोतलों में गंगाजल ऋषिकेश और हरिद्वार से भरा जाता था, लेकिन अब सीधे गंगोत्री से भरा जा रहा है।

 

सिर्फ 7 रुपये के खर्च में 100 कि.मी. चलती है ये बाइक

ड्राइविंग लाइसेंस की भी जरूरत नहीं
नयी दिल्ली : रोज पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने लोगों को परेशान करके रख दिया है। ऐसे में लोग इलेक्ट्रिक वाहनों को खरीदने में दिलचस्पी ले रहे हैं। इसी वजह से मार्केट में कई वाहन निर्माता कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों को पेश करने में लगी हैं, ख़ासकर दोपहिया सेग्मेंट में इनकी भरमार है। जहां एक तरह दिग्गज प्लेयर्स इस सेग्मेंट में नए मॉडलों को पेश कर रहे हैं वहीं स्टार्टअप्स भी पीछे नहीं हैं। हैदराबाद बेस्ड स्टार्टअप Atumobile प्राइवेट लिमिटेड ने भी हाल ही में अपनी नयी इलेक्ट्रिक बाइक Atum 1.0 पेश की, जिसकी शुरुआती कीमत 49,999 रुपये (एक्स-शोरूम) तय की गई है।
ये देश की सबसे किफायती कैफे रेसर इलेक्ट्रिक बाइक है, जो कि कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से पूरे देश में उपलब्ध है। कंपनी ने इस बाइक में पोर्टेबल लिथियम-आईऑन बैटरी का प्रयोग किया है, जिसे फुल चार्ज होने में महज 4 घंटे का समय लगता है। कंपनी का दावा है कि ये बाइक सिंगल चार्ज में 100 किलोमीटर तक का ड्राइविंग रेंज देती है।
इस बाइक की बैटरी के साथ 2 साल की वारंटी भी दी जा रही है। इस बाइक की एक और ख़ास बात ये है कि इसे चलाने के लिए आपको ड्राइविंग लाइसेंस की भी जरूरत नहीं है। दरअसल, इस बाइक की टॉप स्पीड को कम से कम रखा गया है। इसमें 6 किलोग्राम की बैटरी दी गयी है और इसे फुल चार्ज होने में महज 1 यूनिट बिजली खर्च होती है। जिसके लिए आपको सामान्य तौर पर 6 से 7 रुपये खर्च करने होंगे। इस लिहाज से ये बाइक महज 7 रुपये में 100 किलोमीटर तक का रेंज देगी।

बुजुर्गों को नहीं भरना होगा आयकर रिटर्न

नयी दिल्ली : आयकर विभाग ने 75 वर्ष और उससे अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों को वित्त वर्ष 2021-22 के लिए आयकर रिटर्न दाखिल करने की छूट के लिए घोषणा फॉर्म को अधिसूचित कर दिया है। यह फॉर्म वरिष्ठ नागरिकों को बैंकों में जमा कराना होगा। वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में पेंशन आय और उसी बैंक में सावधि जमा (एफडी) पर ब्याज पाने वाले 75 साल और अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों को कर रिटर्न दाखिल करने से छूट का प्रावधान पेश किया गया है। इन वरिष्ठ नागरिकों को एक अप्रैल से शुरू हुए वित्त वर्ष के लिए आयकर रिटर्न दाखिल करने की जरूरत नहीं होगी। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने ऐसे वरिष्ठ नागरिकों के लिए नियमों और घोषणा फॉर्म को अधिसूचित कर दिया है। वरिष्ठ नागरिकों को यह फॉर्म बैंक में जमा कराना होगा, जो पेंशन और ब्याज आय पर कर काटकर उसे सरकार के पास जमा कराएंगे। आयकर दाखिल करने की छूट उन्हीं मामलों में मिलेगी जिनमें ब्याज आय उसी बैंक से प्राप्त होगी जहां पेंशन जमा होती है। आयकर कानून के तहत एक निर्धारित सीमा से अधिक की आय वाले सभी लोगों को रिटर्न दाखिल करना होता है। वरिष्ठ नागरिकों (60 साल या अधिक) और अत्यंत वरिष्ठ नागरिकों (80 साल और अधिक) के लिए यह सीमा कुछ अधिक है। कर रिटर्न दाखिल नहीं करने पर जुर्माना तो लगता है और साथ ही संबंधित व्यक्ति को अधिक स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) देना पड़ती है। नांगियां एंड कंपनी एलएलपी के निदेशक इतेश दोधी ने कहा कि अनुपालन के बोझ को कम करने के लिए 75 साल और अधिक के वरिष्ठ नागरिकों को बजट में कुछ राहत दी गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 के अपने बजट भाषण में कहा था कि आजादी की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर सरकार 75 साल और अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों पर अनुपालन के बोझ को कम करेगी।

पैरा ओलम्पिक्स पांच स्वर्ण सहित भारत ने जीते 19 पदक

समापन समारोह में ‘गोल्डन गर्ल’ अवनि ने लहराया तिरंगा
टोक्यो : टोक्यो में 13 दिनों तक चलने वाला पैरा खेलों का ‘महाकुंभ’ गत रविवार यानी 5 सितम्बर को समाप्त हो गया। खेलों के इस महाकुंभ में भारत पांच स्वर्ण, आठ रजत और छः कांस्य पदक अपने नाम किए। आज के समापन समारोह में ‘गोल्डन गर्ल’ अवनि लेखरा ने तिरंगा थामकर भारतीय दल की अगुवाई की। समापन समारोह में कुछ ही खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। भारतीय दल में 11 प्रतिभागी शामिल हुए थे। बता दें कि टोक्यो पैरालंपिक के उद्घाटन समारोह में भारतीय दल की अगुवाई टेक चंद ने की थी। बता दें कि 24 अगस्त से पांच सितंबर तक चलने वाले पैरालंपिक खेलों के दौरान 163 देशों के लगभग 4500 खिलाड़ी 22 खेलों की 540 स्पर्धाओं में हिस्सा लिया था। टोक्यो पैरालंपिक में अवनि ने कामयाबी की नई इबारत लिख दी। गोल्ड जीतकर तो उन्होंने इतिहास रचा ही था, इसके बाद उन्होंने एक और कांस्य पदक अपने नाम किया। एक ही पैरालंपिक में दो पदक जीतने वाली वह पहली भारतीय महिला बन गई। पहले अवनि ने 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में स्वर्ण जीता। इसके बाद 19 साल की इस निशानेबाज ने 50 मीटर राइफल थ्री पॉजिशन एसएच1 स्पर्धा में 445.9 अंक के साथ कांस्य पदक अपने नाम किया। बता दें कि अवनि से पहले जोगिंदर सिंह सोढी ने 1984 पैरालंपिक में एक रजत और एक कांस्य पदक जीता था।

पदक विजेता भारतीय खिलाड़ियों की सूची

स्वर्ण पदक विजेता:

1. अवनि लेखरा (वुमेंस 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग स्टैंडिंग एसएच1)

2. सुमित अंतिल (मेंस जेवलिन थ्रो एफ64)

3. मनीष नरवाल (पी4 मिक्स्ड 50 मीटर पिस्टल एसएच1)

4. प्रमोद भगत (बैडमिंटन मेंस सिंगल्स एसएल3)

5. कृष्णा नागर (बैडमिंटन मेंस सिंगल्स एसएच6)

रजत पदक विजेता:

1. भाविनाबेन पटेल (वुमेंस सिंगल्स टेबल टेनिस – क्लास 4)

2. निशाद कुमार (मेंस हाई जंप टी47)

3. देवेंद्र झाझरिया (मेंस जेवलिन थ्रो एफ46)

4. योगेश काथुनिया (मेंस डिस्कस थ्रो एफ56)

5. सिंघराज अधाना (पी4 मिक्स्ड 50मीटर पिस्टल एसएच1)

6. मरियप्पन थंगावेलु (मेंस हाई जंप टी63)

7. प्रवीण कुमार (मेंस हाई जंप टी64)

8. सुहास एल यतिराज (बैडमिंटन मेंस सिंगल्स एसएल4)

कांस्य पदक विजेता:

1. सुंदर सिंह गुर्जर (मेंस जेवलिन थ्रो एफ46)

2. सिंघराज अधाना (मेंस 10 मीटर एयर पिस्टल शूटिंग एसएच1)

3. शरद कुमार (मेंस हाई जंप टी63)

4. अवनि लेखरा (वुमेंस 50मीटर राइफल 3 पोजिशन शूटिंग एसएच1)

5. हरविंदर सिंह (मेंस इंडिविजुअल रिकर्व आर्चरी)

6. मनोज सरकार (बैडमिंटन मेंस सिंगल्स एसएल3)