Thursday, July 2, 2026
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मानवीय संवेदनाओं की पुल हैं कविताएं : शंभुनाथ

कोलकाता : कोलकाता की प्रतिष्ठित संस्था सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से साहित्य संवाद का आयोजन किया गया।इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से कवियों ने हिस्सा लिया। स्वागत वक्तव्य देते हुए प्रो.संजय जायसवाल ने कहा कि साहित्य संवाद एक सृजनात्मक संवाद है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक शंभुनाथ ने कहा कि कविताएं मानवीय संवेदनाओं की पुल हैं जो सबको जोड़ती है। हमें प्रेम के साथ प्रतिरोध का पाठ सुनाती है। चर्चित कवि पंकज चतुर्वेदी (कानपुर) ने अपनी कविताओं में व्यवस्था के अमानवीय पक्ष के विरुद्ध जबदस्त व्यंग्य करते हुए कहा कि कविता मानव विरोधी घटनाओं का प्रतिकार है। प्रो. मनीषा झा (उत्तर बंग विश्वविद्यालय) ने स्त्री विमर्श की कविताओं का पाठ किया। युवा कवि वीरू सोनकर (कानपुर) की कविताओं में असहमति का साहस दिखा। इसके अलावा आनंद गुप्ता, धीरेंद्र धवल,(प्रयागराज) श्रीप्रकाश गुप्त, मनीषा गुप्ता, इबरार खान (कल्याणी विश्वविद्यालय), प्रेम कुमार साव (बर्दवान विश्वविद्यालय), गायत्री वाल्मीकि (विद्यासागर विश्वविद्यालय),प्रीति साव (कलकत्ता विश्वविद्यालय) ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इस अवसर पर रामनिवास द्विवेदी, शिवनाथ पांडे, कुलदीप कौर,अल्पना नायक,राज्यवर्धन, गीता दूबे,रेखा सिंह,अनीता राय,प्रमोद प्रसाद, श्रीकांत द्विवेदी, रामप्रवेश रजक, आदित्य गिरि, गौतम लामा, रावेल पुष्प सहित भारी संख्या में साहित्य और संस्कृति प्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन मधु सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ अवधेश प्रसाद ने दिया। कार्यक्रम को सुचारू रूप से संचालन हेतु तकनीकी सहयोग उत्तम ठाकुर,सूर्यदेव राय, राहुल गौंड़ तथा रूपेश कुमार यादव ने दिया।

भक्ति और वीर रस के रंगों से सजी है सुन्दरी कुंवरी बाई की कविता

‘ऐसे उत्पादों का बहिष्कार करें जो पर्यावरण के लिए घातक हो’

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वेबिनार का आयोजन किया प्रमुख अतिथियों में हुलडेक रिसाइकलिंग प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक नंदन माल और क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम, दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशिया के निदेशक अजय मित्तल उपस्थित रहे जिन्होंने ने पर्यावरण की वर्तमान स्थितियों पर विस्तार से चर्चा की। 60 से अधिक विद्यार्थियों की उपस्थिति रही ।कार्यक्रम का उद्घाटन किया भवानीपुर कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने। अपने वक्तव्य में प्रो शाह ने पर्यावरण की सुरक्षा जैसे ज्वलंत मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए और सुंदर वन में पेड़ लगाने की बात पर जोर दिया। कॉलेज की एनएसएस टीम ने गत की वर्षों से वहाँ बड़ी संख्या में पेड़ लगाए हैं और विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रोत्साहित किया है। प्रो. उर्वी शुक्ला ने कहा कि ऐसे उत्पादों का ही बहिष्कार करें जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता हो।
अजय मित्तल ने पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग पर स्लाइड्स के द्वारा विश्व और पश्चिम बंगाल के पर्यावरण संरक्षण पर उनका संगठन विभिन्न प्रकार से कार्य कर रहा है, विस्तार से जानकारी दी। अम्फान और यास जैसे बहुत से तूफ़ान हर वर्ष पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।हम व्यक्तिगत रूप से ध्यान देकर पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं। नंदन लाल ने कूड़ा करकट और गंदगी का प्रबंधन और पुनर्निर्माण उनकी कंपनी किस प्रकार कर रही है, बताया। अगली लड़ाई जल संसाधन को लेकर है। पीने के पानी की कमी होती जा रही है। बारिश के पानी का संरक्षण करने के लिए हम अपनी छत में टंकी बना कर जल संरक्षण में मदद दे सकते हैं। भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए हमें अभी से सरकारी, गैर सरकारी और एनजीओ को बड़े स्तर पर काम करने की आवश्यकता है। नल से रिसते पानी की समस्या से भी निपटने की आवश्यकता है। अंत में पर्यावरण संबंधी प्रश्नोत्तर सेशन प्रो उर्वी शुक्ला ने विद्यार्थियों से किया और पूरे कार्यक्रम का संचालन भी किया। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने घरेलू फर्नीचर, बेड, मोबाइल औद्योगिक और कन्स्ट्रकशन आदि बेकार वस्तुओं को एक ही कूड़ा जगह पर फेंकने पर आपत्ति जताई। ई वेस्ट हटाने के लिए सरकारी नियमों के विषय में अजय मित्तल से जानकारी प्राप्त की। प्रो. दिव्या उडीसी, प्रो श्रद्धा अग्रवाल और अन्य शिक्षक उपस्थित रहे कीर्ति शर्मा और गौरव किल्ला का सहयोगी रहे। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।

गालिब : ‘ग़र नहीं है मेरे अश आ़र में माने न सही

वसुंधरा मिश्र

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है
ग़ालिब उर्दू भाषा के एकमात्र शायर और साहित्यकार हैं जिनके व्यक्तित्व और साहित्य पर सबसे अधिक लेख गए हैं। दीवान के तो इतने संस्करण हो गए हैं कि उनकी गणना भी संभव नहीं है। मिर्ज़ा असद उल्ला खां ‘गालिब’ – पहले असद और फिर ग़ालिब उपनाम से प्रसिद्ध हुए। इनका जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था।
ये बहादुर शाह जफर के जमाने में पैदा हुए थे। 1857 का गदर उन्होंने देखा था। अव्यवस्था और निराशा के उस जमाने में मानव प्रेम और दार्शनिक दृष्टि से साहित्य में आए। शुरू में तो उनकी मौलिकता की हंसी उड़ाई गई लेकिन बाद में इतना बढ़ावा मिला कि शायरी की दुनिया का नजारा ही बदल गया।
पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या।
गालिब उर्दू साहित्य के अपने युग के ‘अदबी बली’ मतलब साहित्यिक अवतार थे और आधुनिक युग के भी।
गालिब परंपराओं से विद्रोह और उस डगर से हटकर अपनी बात करते इसी कारण संसार ने वही व्यवहार किया जो हर वली मतलब अवतार से किया जाता रहा है।
गालिब ने दर्शन सिद्ध अवतार मद्यप माशूक आदि को नए आयाम दिए।
सनम सुनते हैं तेरी भी कमर है
कहां है? किस तरफ़ है? औ किधर है?
सितारे जो समझते हैं गलतफहमी है ये उनकी।
फ़लक पर (आकाश) आह पंहुची है मेरी चिनगरियां होकर।।
वे नाजुक ख्याली और शायरी का शिखर मान रहे थे, गालिब ने लिखा –
दाम हर मौज में है हल्का – ए-सदकामे नहंग।
देखें क्या गु़ज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक
जब उन्होंने नींद के मातों और माशूक की कमर की तलाश करने वाले कवियों को ललकारा तो लोग आश्चर्य में पड़ गए कि यह नया कौन कवि पैदा हुआ है। वे विरोधों को हंस हंस कर सहते रहे – कोई उन्हें मुश्किल पसंद (जटिल भाषा लिखने वाला) कोई मोह-मल-गो (अर्थ हीन शेर कहने वाला) और किसी ने सिरे से सौदाई ही कह डाला।
गालिब पर किसी का प्रभाव न पड़ा। वे कहते हैं – नमाज़ काबे की ओर मुंह करके पढ़ी जाती है पर काबा तो केवल कम्पास की सुई मात्र है जो रास्ता दिखाती है। सिजदे का वास्तविक स्थान समझ से बहुत परे है।
गजल की तंग गली (संकुचित क्षेत्र) गालिब को शेर कहने के के शौक के अनुकूल सामर्थ्य नहीं रखती, उनके बयान के लिए विशाल क्षेत्र की आवश्यकता है।
न सताइश (प्रशंसा) की तमन्ना न सिले (पुरस्कार) की परवा।
अंदाज़े – बयां (वर्णन शैली) से हटकर उन्होंने वास्तविक जीवन के रंगों को पकड़ा। 25 वर्ष की आयु में 2000 शेर ‘बेदिल’ के रंग में कह डाले जिस पर उर्दू के प्रसिद्ध शायर और उस्ताद मीर तकी मीर ने भविष्यवाणी की थी कि ‘अगर इस लड़के को कोई अच्छा उस्ताद मिल गया तो वह इसे रास्ते पर डाल देगा, यह लाजवाब शायर बनेगा वरना मोहमल (अर्थहीन) बकने लगेगा।’
‘ग़र नहीं है मेरे अश आ़र में माने न सही।’ कहते हुए जीवन के गीत गाते रहे गालिब उनके कलम की आवाज दैवीय आवाज है जो हमारे कानों में गूंजकर हृदय में उतरकर उद्भावनाओं के नये नये मार्ग सुझा रही है। खगोल, ज्योतिष, तर्क, दर्शन पदार्थ विज्ञान, संगीत तसव्वुफ सभी उनकी रचनाओं में मिलता है।
तेरह वर्ष में उमराव बेगम से विवाह किया। बीबी को वे पांवों की बेड़ी कहते हैं। दिल्ली में आकर उनकी शायरी और भी रंग लाई।
उनका मानना था कि हर पुरानी लकीर सिराते – मुस्तकीम (सीधा मार्ग) नहीं है और पूर्वज जो कह गए हैं वह पूरी तरह सनद (प्रामाणिक) नहीं हो सकती।

जानिए मधुबनी चित्रशैली की रोचक बातें

मधुबनी लोककला बिहार के मधुबनी स्थान से सम्बधित है। मधुबन का अर्थ है ‘शहद का वन’ और यह स्थान राधा कृष्ण की मधुर लीलाओं के लिए मशहूर है। मधुबनी की लोक कला में भी कृष्ण की लीलाओं को चित्रित किया गया है। यह कला आम और केलों के झुरमुट में कच्ची झोपड़ियों से घिरे हरे भरे तालाब वाले इस ग्राम में सदियों पुरानी है और मधुबन के आसपास पूरे मिथिला इलाके में फैली हुई है। विद्यापति की मैथिली कविताओं के रचनास्थल इस इलाके में आज मुज़फ्फपुर, मधुबनी, दरभंगा और सहरसा जिले आते हैं।

मधुबनी की कलाकृतियों तैयार करने के लिये हाथ से बने कागज को गोबर से लीप कर उसके ऊपर वनस्पति रंगों से पौराणिक गाथाओं को चित्रों के रूप में उतारा जाता है। कलाकार अपने चित्रों के लिये रंग स्वयं तैयार करते हैं और बांस की तीलियों में रूई लपेट कर अनेक आकारों की तूलिकाओं को भी खुद तैयार करते हैं।

इन कलाकृतियों में गुलाबी, पीला, नीला, सिदूरा (लाल) और सुगापाखी (हरा) रंगों का इस्तेमाल होता है। काला रंग ज्वार को जला कर प्राप्त किया जाता है या फिर दिये की कालिख को गोबर के साथ मिला कर तैयार किया जाता है, पीला रंग हल्दी और चूने को बरगद की पत्तियों के दूध में मिला कर तैयार किया जाता है। पलाश या टेसू के फूल से नारंगी, कुसुंभ के फूलों से लाल और बेल की पत्तियों से हरा रंग बनाया जाता है। रंगों को स्थायी और चमकदार बनाने के लिये उन्हें बकरी के दूध में घोला जाता है। आधुनिक ब्रश के बजाय, चित्र बनाने के लिए पतली टहनी, माचिस, अंगुलियों और परंपरागत वस्तुओं का उपयोग उपयोग किया जाता है।

इस चित्रकला की 5 शैलियां हैं- भरनी, कचनी, तांत्रिक, गोदना और कोहबर। हालांकि मुख्य रूप से मधुबनी पेंटिंग दो तरह की होतीं हैं- भित्ति चित्र और अरिपन। भित्ति चित्र विशेष रूप घरों में तीन स्थानों पर मिट्टी से बनी दीवारों पर की जाती है जिसमें कुलदेवता, लोकदेवता, नए विवाहित जोड़े (कोहबर) के कमरे और ड्राइंग रूम में की जाती है। अरिपन अर्थात अल्पना या मांडना को चित्रित करने के लिए आंगन या फर्श पर लाइन खींचकर सुंदर रंगोली जैसी बनाई जाती है। अरिपन कुछ पूजा-समारोहों जैसे पूजा, वृत, और संस्कार आदि अवसरों पर की जाती है।
इस चित्रकला में पौराणिक घटनाओं के वर्णन के साथ ही ज्यामितिक आकार और डिज़ाइन भी इस चित्रकारी देखने को मिलती है। चित्र के खाली स्थानों को अधिकतर समय फूल-पत्तों और बेलबुटों से भर दिया जाता है। इन चित्रों में कमल के फूल, बांस, शंख, चिड़ियां, सांप आदि कलाकृतियां भी होती है।
इस चित्रकला चित्रण का फोकस खासतौर पर रामायण, महाभारत और पौरणिक ग्रंथों की कथाओं के साथ ही हिन्दू उत्सव, 16 संस्कार, राज दरबार और विवाह जैसे सामाजिक कार्यक्रम के इर्द-गिर्द ही रहता है।
मथुबनी चित्रकला रामायण काल में भी होती थी, क्योंकि वाल्मीकि रामायण अनुसार सीता के पिता राजा जनक ने अपने चित्रकारों से अपनी बेटी की शादी के लिए मधुबनी चित्र बनाने के लिए कहा था। इन चित्रों से संपूर्ण महल और नगर को सजाया गया था।
इस पारंपरिक मधुबनी कला को पहले बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाएं ही किया करती थीं। लेकिन आज, यह शैली न केवल भारत के लोगों के बीच लोकप्रिय है, बल्कि अन्य देशों के लोगों के बीच भी लोकप्रिय हो चली हैं। अब इसकी अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर मांग है।
अब दीवार, आंगन, पेड़ या मंदिर ही नहीं बल्कि मनुबनी चित्रकारी को साड़ी, कुशन, परदे, डोरमेट, मूर्ति, चूड़ियां, बर्तन, कपड़े, एंटिक और कैनवास पर भी चित्रित कर रहे हैं। मास्क पर भी मधुबनी चित्रशैली दिखायी दी।
मधुबनी चित्रकला में जिन देवी-देवताओं को दिखाया जाता है, वे हैं- मां दुर्गा, काली, सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, गौरी-गणेश और विष्णु के दस अवतार।
मधुबनी शहर में एक स्वतंत्र कला विद्यालय मिथिला कला संस्थान (एमएआई) की स्थापना जनवरी 2003 में ईएएफ द्वारा की गई थी, जो कि मधुबनी चित्रों के विकास और युवा कलाकारों का प्रशिक्षण के लिए है और ‘मिथिला संग्रहालय’, जापान के निगाटा प्रान्त में टोकामाची पहाड़ियों में स्थित एक टोकियो हसेगावा की दिमागी उपज है, जिसमें 15,000 अति सुंदर, अद्वितीय और दुर्लभ मधुबनी चित्रों के खजाने को रखा गया है। दरभंगा में कलाकृति, मधुबनी में वैधी, मधुबनी जिले के बेनिपट्टी और रंती में ग्राम विकास परिषद, मधुबनी चित्रकला के कुछ प्रमुख केंद्र हैं, जिन्होंने इस प्राचीन कला को जीवित रखा है।

(स्त्रोत साभारदैनिक जागरण तथा वेबदुनिया )

भवानीपुर कॉलेज में ‘बायोडाटा नहीं अब सीवी’ विषय पर वेबिनार

कोलकाता : भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज ने जूम पर ऑनलाइन वेबिनार विषय ‘ सीवी कैसे बनाएं ‘पर वेबिनार का आयोजन किया गया। नौकरी के लिए अपने व्यक्तिगत परिचय को आधुनिक और पारदर्शिता के साथ लिखने के प्रारूप सीवी के विषय में जानकारी दी। बायोडाटा नाम पहले परिचित था अब उसी को सीवी कहा जाता है।
इस वेबिनार का उद्घाटन किया भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने जिन्होंने विद्यार्थियों को अपने कैरियर पर अभी से ही ध्यान रखने को कहा। कॉलेज में हर वर्ष टीसीएस, इन्डिगो जैसी बहुतेरी कंपनियां आती हैं इसलिए अपनी दृष्टि को विस्तृत आयाम देने का प्रयास करें जो कैरियर बनाने में सहायक होगा। सीएस प्रो मोहित साव ने सीवी बनाने के लिए विद्यार्थियों के लिए कई बिंदुओं पर विचार विमर्श किया।
सरकारी या गैरसरकारी संगठनों, कॉरपोरेट, कम्पनियों में आवेदन करने के लिए किस प्रकार से अपनी सीवी कैसे बनाएं जिससे कंपनी सीवी को देख कर इंटरव्यू के लिए बुलाए। यह एक कला है। हमारे पास डिग्री है, कौशल है लेकिन उसको ठीक से प्रदर्शित करना नहीं आता है तो आई हुई नौकरी भी हाथ से निकल जाती है। प्रो साव लाइफ कोच, लेक्चरार और इंटरप्रिनर है, ने विद्यार्थियों को सकारात्मक, उत्साहवर्धन और गहन ज्ञान दिया। वर्तमान युग चुनौतियों का युग है जहां सजगता और पारदर्शिता के साथ अपना आत्मविश्वास रखना चाहिए। सीवी के प्रारूप के उदाहरण दिए जिसमें नाम संपर्क नम्बर प्रोफेशनल और शैक्षणिक योग्यता और कौशल आदि के लिखने के विषय में जानकारी दी। इसी संदर्भ में कैरियर विशेषज्ञ प्रो उर्वी शुक्ला ने विद्यार्थियों को अॉन-लाइन इंटरव्यू के दौरान किस प्रकार की सावधानियां और व्यक्तित्व को अॉन-लाइन कैसे प्रदर्शित करना चाहिए, विस्तृत जानकारी दी।
अंत में, प्रश्नोत्तर सेशन में सभी 150 विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी जिज्ञासाओं को रखा और जिसका निवारण प्रो मोहित साव और प्रो उर्वी शुक्ला ने किया। इस कार्यक्रम में रिपोर्ट और तकनीकी सहयोग कीर्ति शर्मा और गौरव किल्ला का रहा। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

हमेशा से सभी का प्रिय रहा है बिहार की पहचान लिट्टी – चोखा

लिट्टी – चोखा, आज इसे अगर सुपर इन्स्टेंट फूड कहा जाए तो गलत नहीं होगा। बड़ी हस्तियाँ इसे चाव से खाती रही हैं और इसे बिहार की पहचान भी माना जाता है, पर यह लिट्टी – चोखा…आया कहाँ से, इस पर शायद ही हमने सोचा हो…आज हम इस पर ही बात करेंगे –
लिट्टी चोखा मूलत: बिहार का व्यंजन है. हालांकि इसे झारखंड और पूर्वी उत्तर में भी खाया जाता है. लिट्टी बनाने में सत्तू और आटे का प्रयोग किया जाता है. इसके साथ टमाटर की चटनी और आलू और बैंगन का चोखा भी खाया जाता. ठंड के दौरान इसका उपयोग और भी बढ़ जाता है..
विश्वामित्र ने भगवान राम के साथ खाया था लिट्टी-चोखा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लिट्टी चोखा त्रेतायुग के समय से ही बिहार में खाया जाता था। महर्षि विश्वामित्र ने पंचकोसी यात्रा के दौरान राम-लक्ष्मण के साथ चरित्रवन( अभी बक्सर) में लिट्टी-चोखा खाया था। यह परम्परा आज भी बक्सर में पंचकोसी मेले के दौरान निभाई जाती है।
मगध काल में प्रसार बढ़ा
लिट्टी चोखा का प्रचार प्रसार मगध काल में तेजी से बढ़ा.हालांकि इतिहास में यह लिखित रूप से कहीं दर्ज नहीं मिलता है कि लिट्टी-चोखा का विस्तार कैसे हुआ। ग्रीक यात्री मेगास्थनीज जब 302 ईसापूर्व में पाटलीपुत्र आया था तो वो वहां की भव्यता देखकर हैरान रह गया था. मेगास्थनीज ने लिखा था कि इस भव्य शहर में 64 गेट, 570 टावर और कई बाग-बगीचे हैं. यहां महलों और मंदिरों की भरमार है। मेगास्थनीज ने लिखा था- मैंने पूरब के एक भव्य शहर को देखा है। मैंने पर्सियन महलों को भी देखा है लेकिन ये शहर दुनिया का सबसे विशाल शहर है। मगध साम्राज्य के उसी बेहतरीन दौर में लिट्टी चोखा सबसे पहली बार अस्तित्व में आया।
अंग्रेज काल में चोखा का स्थान मटन ने ले लिया
1757 के बाद भारत में अंग्रेजों का वर्चस्व बढ़ने लगा। इसी के साथ ही लिट्टी चोखा में नये प्रयोग भी होने लगे। अंग्रेजों ने लिट्टी-चोखा साथ मटन का प्रयोग शुरू किया. आज भी बड़े-बड़े कार्यक्रमों में लिट्टी-मटन बड़े चाव से खाया जाता है। लिट्टी चोखा को युद्ध का खाना भी कहा जाता है। प्राचीन काल से युद्ध के दौरान सैनिक खाने के सामान के तौर पर लिट्टी लेकर चलते थे। लिट्टी की खासियत है कि ये जल्दी खराब नहीं होती। इसे बनाना भी आसान है और ये काफी पौष्टिक भी होता है। 1857 के विद्रोह में सैनिकों के लिट्टी चोखा खाने का जिक्र मिलता है। तात्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई ने इसे अपने सैनिकों के खाने के तौर पर चुना था। इसे फूड फॉर सरवाइवल कहा गया. उस दौर में ये अपनी खासियत की वजह से युद्धभूमि प्रचलन में आया. इसे बनाने के लिए किसी बर्तन की जरूरत नहीं है। इसमें पानी भी कम लगता है और ये सुपाच्य और पौष्टिक भी है। सैनिकों को इससे लड़ने की ताकत मिलती थी। इसके साथ ही अप्रवासी श्रमिक भी जहाँ गये, लिट्टी वहाँ पहुँचती रही। ये जल्दी खराब भी नहीं होती।
कैसे बनता है लिट्टी-चोखा
लिट्टी-चोखा बनाने के लिए गोयठा(उपले) वाली आग सबसे उपयुक्त माना जाती है। इसमें लिट्टी यानी आटे की लोई में मसालेदार सत्तू को भरा जाता है, फिर उसे इस आग में सेंका जाता है। साथ ही बैंगन और टमाटर को भी आग में सेंका जाता है। फिर चोखा के लिए बैगन, टमाटर और हरी मिर्च का प्रयोग किया जाता है। समय के साथ लिट्टी बनाने के तरीके में काफी परिवर्तन आ जा चुका है लेकिन नहीं बदला तो इसका स्वाद और इसके प्रति लोगों की दीवानगी।
बिहार की पहचान है लिट्टी-चोखा
लिट्टी चोखा को बिहार का व्यंजन माना जाता है। बिहार के लोग ही नहीं बल्कि देसी और विदेशी भी इस व्यंजन को बड़े चाव से खाते हैं। बिहार के लोगों ने इसे दूसरे राज्यों में भी फैलाया है। आज लिट्टी चोखा के स्टॉल हर शहर में दिख जाते हैं। लिट्टी चोखा खाने में स्वादिष्ट तो होता ही है, ये सेहत के लिए भी फायेदमंद है।
गेहूं के आटे में सत्तू को भरकर इसे आग पर पकाया जाता है. फिर देसी घी में डुबोकर इसे खाया जाता है। जिन्हें कैलोरी की फिक्र है, वो बिना घी में डुबोये लिट्टी का स्वाद ले सकते हैं। तला-भुना नहीं होने की वजह से ये सेहत के लिए अच्छा है। इसके साथ बैंगन, आलू – टमाटर का चोखा खाया जाता है। बैंगन को आग में पकाकर उसमें टमाटर, मिर्च और मसाले को डालकर चोखा तैयार किया जाता है। आलू भी आग पर पकाकर या फिर उसे उबालकर चोखा बनाया जाता है। टमाटर भी आग में पकाकर ही बनाया जाता है। बहुत से लोग परवल का चोखा भी बनाते हैं। बगैर सत्तू डाले जो लिट्टी बनती है, वह डोंगी के आकार की होती है, तो बहुत से लोग उसे गोलाकार भी देते हैं। इसे खखड़ी कहा जाता है। चोखा और सत्तू, दोनों के लिए ही सरसो तेल ही इस्तेमाल किया जाता है। बहुत से लोग बासी लिट्टी ऐसे ही खाते हैं या फिर चाय के साथ नाश्ते की तरह खाते हैं। वहीं, लिट्टी को छान भी लिया जाता है यानी फ्राइड लिट्टी भी बनती है जो सफर के दौरान काम आती है क्योंकि यह कई दिनों तक खराब नहीं होती। बिहार का ये व्यंजन राजस्थान के बाटी-चूरमा की तरह है. बिहार में ये खासा लोकप्रिय है. इसे बनाना भी आसान है और ये पौष्टिक भी है।

(स्त्रोत साभार – न्यूज 18 तथा प्रभात खबर)

कबीर के दोहे

1-जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

2-धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

3 – तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखीन पड़े, तो पिर घनेरि होय।

4 – काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी, बहुरी करेगा कब ।।

5 – साईं इतना दीजिये, जा के कुटुम्ब समाए ।
मैं भी भुखा न रहू, साधू ना भुखा जाय ।।

6 – दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय ।
जो सुख मे सुमीरन करे, तो दुःख काहे को होय ।।

7 – साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गही रहै, थोथी देई उड़ाय ।

8 – पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।

9 – ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए।
औरन को शीतल करे , आपहु शीतल होए ।।

10 – निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

11 – करता था तो क्यूं रहय, जब करि क्यूं पछिताय ।
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय ॥

12 – कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

13 – दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

14 – जल में कुम्भ कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी ।
फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कह्यौ गयानी ॥

15 – मन के हारे हार है मन के जीते जीत ।
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत ॥

माल्या, नीरव, चोकसी की 9371 करोड़ की संपत्ति सरकारी बैंकों को ट्रांसफर

नयी दिल्ली :  भारत में बैंकिंग घोटालों के मामलों में सरकारी एक्शन का असर अब दिखने लगा है। विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी पर सरकार की चौकसी का असर यह हुआ है कि सरकारी बैकों को करीब 9371 करोड़ रुपए की संपत्ति ट्रांसफर हो गए हैं। ईडी के मुताबिक, भगोड़े आरोपी विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी की 9,371 करोड़ रुपये की संपत्ति सरकारी बैंकों को ट्रांसफर कर दी गई है, ताकि धोखाधड़ी के कारण हुए नुकसान की भरपाई की जा सके। ईडी ने कहा कि विजय माल्या और पीएनबी बैंक धोखाधड़ी मामलों में बैंकों की 40 फीसदी राशि पीएमएलए के तहत जब्त किए गए शेयरों की बिक्री के जरिए वसूली गयी। प्रवर्तन निदेशालय ने ट्वीट कर कहा कि ईडी ने न केवल पीएमएलए के तहत विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के मामले में 18,170.02 करोड़ (बैंकों को कुल नुकसान का 80.45%) रुपये की संपत्ति जब्त की है, बल्कि 9371.17 करोड़ की कीमत वाली संपत्ति सरकारी बैंकों को ट्रांसफर भी की है।

दरअसल, मेहुल चोकसी और उसके भतीजे नीरव मोदी पर कुछ बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) के साथ कथित तौर पर 13,500 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी करने का आरोप है। नीरव मोदी अभी लंदन की एक जेल में बंद है, जबकि मेहुल चोकसी डोमिनिका की जेल में बंद है। दोनों के खिलाफ केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जांच कर रहा है और उसे भारत प्रत्यर्पित करने की कोशिश जारी है। वहीं, विजय माल्या पर लगभग 9,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। इस मामले में उसकी बंद हो चुकी किंगफिशर एयरलाइंस शामिल है। किंगफिशर एयरलाइंस के पूर्व मालिक और 65 वर्षीय कारोबारी विजय माल्या अप्रैल 2019 में अपनी गिरफ्तारी के बाद से प्रत्यर्पण वारंट पर ब्रिटेन में जमानत पर है। फिलहाल विजय माल्या इंग्लैंड में है, जहां से उसे वापस लाने के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है।

नए मध्य वर्ग में 6.33 लाख भारतीय, करते हैं 20 लाख की बचत

देश में बढ़ते अरबपतियों के बीच ‘नए मध्य वर्ग’ की पहचान की गई है। हुरुन इंडिया वेल्थ रिपोर्ट-2020 के मुताबिक, इनकी संख्या 6.33 लाख है। इस वर्ग में उन लोगों को शामिल किया गया है, जिनकी सालाना औसत बचत 20 लाख रुपये है।

जमीन, मकान और गाड़ियों पर करते हैं सबसे ज्यादा खर्च
खास बात है कि ये अपनी संपत्ति का सबसे ज्यादा हिस्सा जमीन, मकान और गाड़ियों पर खर्च करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 4.12 लाख ऐसे लोग भी हैं, जिनकी कुल संपत्ति कम-से-कम 7 करोड़ रुपये है। इनमें डॉलर में कमाई करने वाले करोड़पति भी शामिल हैं।

5.64 करोड़ हैं देश में मध्य वर्ग, जिनकी सालाना आय 2.5 लाख रुपये से ज्यादा
1,000 करोड़ की संपत्ति वालों की संख्या 3,000 है। ‘मध्य वर्ग’ में सालाना 2.5 लाख रुपये कमाने वाले परिवारों को रखा गया है, जिनकी संख्या 5.64 करोड़ है। इनकी कुल संपत्ति 7 करोड़ रुपये से कम है।

दो तरह से कमाई करने वाले सबसे ज्यादा
रिपोर्ट में देश के सभी आय वर्ग को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है। पहला- कम कमाई वाला वर्ग, जिसकी ज्यादातर आय नौकरी, बैंक एफडी, रियल एस्टेट और शेयर बाजार में निवेश पर निर्भर है। दूसरा- ज्यादा कमाने वाला वर्ग, जिसकी आय का मुख्य जरिया रियल एस्टेट में बड़े स्तर पर निवेश, कारोबार और घरेलू एवं विदेशी शेयर बाजार में निवेश है।

अति धनवानों में चौथे स्थान पर भारत 
हुरुन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कुल 9.12 लाख करोड़पति हैं। यह संख्या दुनिया के कुल 5.19 करोड़ करोड़पतियों के मुकाबले महज दो फीसदी है। इसके अलावा, अति धनवानों की संख्या के मामले में अमेरिका, चीन और जर्मनी के बाद भारत चौथे स्थान पर है। देश में कुल 4,593 अति धनवान हैं।

10 राज्यों में 70.3 फीसदी करोड़पति
राज्य                         संख्या
महाराष्ट्र                    56,000
उत्तर प्रदेश               36,000
तमिलनाडु                35,000
कर्नाटक                   33,000
गुजरात                    29,000
पश्चिम बंगाल             24,000
राजस्थान                 21,000
आंध्र प्रदेश               20,000
मध्य प्रदेश               18,000
तेलंगाना                  18,000

शहरों में मुम्बई सबसे आगे 
शहरों के लिहाज से मुंबई में सबसे ज्यादा 16,933 करोड़पति हैं, जबकि दिल्ली 16,000 करोड़पतियों के साथ दूसरे स्थान पर है। कोलकाता 10,000 के साथ तीसरे, बंगलूरू 7,582 के साथ चौथे और चेन्नई 4,685 करोड़पतियों के साथ पांचवें स्थान पर है।

हैप्पीनेस इंडेक्स : खुशियों में आई कमी
सर्वे में शामिल 72 फीसदी करोड़पतियों ने अपने काम और जीवन के प्रति प्रसन्नता जताई है। 2019 में यह आंकड़ा 85 फीसदी था। महामारी के दौरान उनकी खुशियों में 13 कमी आई है।
भारतीय करोड़पति प्राथमिक रूप से रियल एस्टेट और शेयर बाजार में निवेश करना पसंद करते हैं।
विदेश में ब्रिटेन जाना सबसे ज्यादा पसंद। स्विट्जरलैंड दूसरे और अमेरिका तीसरे स्थान पर।
निवेश और शिक्षा के लिहाज से अमेरिका सर्वाधिक पसंदीदा देश। इसके बाद भारतीय करोड़पति सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात में निवेश करना पसंद करते हैं।
लग्जरी कारों में मर्सडीज सबसे ज्यादा पसंद। बीएमडब्ल्यू दूसरी और जगुआर तीसरी पसंदीदा कार। लग्जरी स्पोर्ट्स कार ब्रांड में लैम्बॉर्गिनी पहली पसंद।