Thursday, October 29, 2026
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कृष्ण भक्ति में भौतिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्ति का मार्ग ढूंढती हैं रणछोड़ कुंवरि जी

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, राजस्थान के राजघरानों में साहित्य- संवर्धन की सुदीर्घ गौरवमय परंपरा रही है। राज- काज के साथ साहित्य, कला और संगीत को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करने में यहाँ के राजा-महाराजों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। राजघराने की रानियाँ भी इस मामले में पीछे नहीं रहीं। पुरूषों में जहाँ जोधपुर के महाराजा मानसिंह, तख्तसिंह आदि समेत कई नाम गिनाए जा सकते हैं वहीं रानियों में तीजण भटियाणी अर्थात प्रताप कुंवरि बाई सहित कई ऐसी रानियों के नाम लिए‌ जा सकते हैं जिन्होंने साहित्य- साधना में अपना जीवन न्योछावर दिया। भले ही साहित्य सृजन का रास्ता भक्ति की राह से होकर निकला लेकिन इससे न रचयिता का महत्व कम करके आंका जा सकता है ना रचना का। कुछ राम को अपना आराध्य देव मानती थीं तो कुछ कृष्ण को। रामभक्ति के प्रति समर्पित कुछ रानियों का जिक्र मैं पहले कर चुकी हूं। आज मैं एक कृष्ण भक्त कवयित्री से आपको परिचित करवाऊंगी जो इतिहास के पन्नों पर बहुत ज्यादा स्थान तो नहीं घेरतीं लेकिन साहित्य के प्रति इनके समर्पण को‌ अनदेखा नहीं किया जा सकता। सखियों, मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि ऐश्वर्य के सागर में डूबी रानियों का जीवन बहुधा बहुत से मानसिक कष्टों से घिरा होता था। साथ ही राजमहल में बहुत तरह के षडयंत्र भी हुआ करते थे। शायद इनसे मुक्ति का मार्ग भक्ति में ही दिखाई देता था। संभवतः इसीलिए राजकुल की रानियों ने राम और कृष्ण के प्रति स्वयं को समर्पित करते हुए ‌उनसे अपने उद्धार की विनती बार- बार की है। मुक्ति कामना का स्वर इन रानियों की रचनाओं में प्रमुखता से गुंजरित होता है। सुख -समृद्धि के बीच आखिर ‌वह कौन सी ऐसी छटपटाहट या वेदना थी जो भौतिक सुखों को‌ त्यागकर रानियों को आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर करती थी, इसके उत्तर इतिहास के पन्नों में ही नहीं छिपे हैं बल्कि मानव मनोविज्ञान की किताबों में भी ढूंढे जा सकते हैं। अतिव्यस्त महाराजा पतियों से प्राप्त उपेक्षा या प्रेम का अभाव इन रानियों को एक ऐसे काल्पनिक जगत में ढकेल देता था जहाँ ‌अराध्य प्रेमी में और प्रेमी अराध्य में बदल जाता था और भौतिकता के बंधनों को काटकर‌ ये रानियाँ अपने प्रभु की भक्ति में स्वयं को‌ लय कर देना चाहती थीं। रानी रणछोड़ कुंवरि के काव्य में भी बंधनों की पीड़ा और छटपटाहट को‌ स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है और मुक्ति के लिए लगाई गई गुहार भी साफ- साफ सुनाई देती है। इस गुहार में मध्ययुगीन ‌स्त्री की पीड़ा- वेदना की आवाजें ‌घुली- मिली हैं।

रानी रणछोड़ कुंवरि बाघेली जी रीवां राज्य के महाराजा विश्वनाथ प्रसाद के भ्राता बलभद्रसिंह की पुत्री थीं। इनका जन्म संवत् 1946 में हुआ था। इनका विवाह जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह से संवत 1961 में हुआ था। रणछोड़ कुंवरि जी राजस्थान की अधिकांश शिक्षित राजकुमारियों और महारानियों की तरह कृष्ण की उपासक थीं और उनकी अराधना में उन्होंने पदों की रचना की थी। राजकीय जीवन में सुख समृद्धि के प्राचुर्य के बावजूद वह अपने आराध्य गोविंद लाल से स्वयं को भौतिक कष्टों से उबारने की याचना करती हैं। मुक्ति की आकांक्षा का स्वर इनके पदों में मुखर हो उठा है। एक पद देखिए-

“गोविन्द लाल तुम हमारे, मोहे दुख में उबारे|

मै सरन हूँ कि तिहारे, तुम, काल कष्ट टारे||

हो बाघेली के प्यारे, सिरक्रीट मुकुट वारे।

छोनी छटा को पसारे, मोहिनी सूरत न निसारे।।”

हालांकि इस पद में कोई शिल्प का चमत्कार या भाषा की कलाबाजी नहीं है लेकिन सहज मन का प्रेम और विरही आत्मा की व्याकुल पुकार को साफ- साफ महसूस कराया जा सकता है जो अपने प्रेमी या आराध्य से प्रार्थना करती है कि उसे दुखों के दलदल से उबारकर मोक्ष प्रदान करे। अपने अराध्य देव के रूप पर मुग्ध भक्त कवयित्री एक प्रेयसी की भांति उनके नाम के साथ अपना नाम जोड़कर प्रसन्न और आश्वस्त ‌होती है।

कृष्ण के ही एक और नाम वाली रणछोड़ कुंवरि जी अपने पदों में बार- बार गोविंद को स्मरण करती हैं और बताती हैं कि किस प्रकार उन्हें सुमिरने से मन निर्मल हो जाता है और मानव मात्र को मुक्ति का पथ सहजता से प्राप्त हो जाता है। एक और पद देखिए-

“आभा तो निर्मल होय सूरज किरण उगे से,

चित्त तो प्रसन्न होय गोविन्द गुण गाये सें|

पीतल तो उज्जवल रेती के मांजे से,

हृदय में जोति होय गुरु ज्ञान पाये सें||

भवन में विक्षेप होय दुनियां की संगति से,

आनंद अपार होय गोविन्द के धाये से||

मन को जगावो अरु गोविन्द के सरन आबो,

तिरने के ये उपाय गोविन्द मन भाये सें||”

रणछोड़ कुंवरि बाघेली जी के किसी स्वतंत्र काव्य ग्रंथ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती लेकिन इनके बहुत से भक्तिभाव से पूरित पद और कवित्त मिलते हैं जिनमें कृष्ण के मनमोहक स्वरूप का वर्णन मिलता है। कृष्ण के स्वरूप और चरित वर्णन के द्वारा कवयित्री उनके प्रति अपनी निष्ठा को अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं और कृष्ण के प्रति समर्पण और उनकी सेवा में ही भौतिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्ति का मार्ग ढूंढती हैं। इनके पदों को पढ़ते हुए मध्ययुगीन स्त्री के जीवन की यंत्रणा और छटपटाहट को महसूस किया जा सकता है।

 

सत्ता और बाजार के अतिक्रमण से आस्था और उत्सव को बचाना भी होगा

शुभजिता फीचर डेस्क

आज दशमी है, विजयादशमी..और आप सभी को शुभ विजयादशमी। शुभजिता दुर्गोत्सव में कई मंडप देखे, कई प्रतिमाएँ देखीं और अब वातावरण में हर्ष और विषाद के सुर मिल गये हैं तो विचार भी उमड़ रहे हैं। दुर्गा पूजा हमारी आस्था, विश्वास और उल्लास का पर्व है। समय बदला तो इसमें मनोरंजन की मात्रा बढ़ी और इसके बाद बाजार का हस्तक्षेप भी बढ़ा और अब राजनीति का दखल भी बढ़ रहा है। जब तक सब कुछ सही अनुपात में हो, बुरा नहीं लगता। सबकी जरूरत है मगर अनुपात और हर चीज कितनी होनी चाहिए…यह शायद हम भूल रहे हैं।

मोहम्मद अली पार्क की पूजा में टीकाकरण एक थीम बना

परम्परा पर बाजार हावी हुआ मगर तब क्या करें जब आडम्बर हावी होने लगे और सारा प्रचार तंत्र उत्सव के आनन्द में इतना डूब जाये कि सही और गलत का फर्क भूलने लगे। सम्भवतः आपको लगे कि बातों को जटिल बनाया जा रहा है मगर आप खुद सोचिए तो क्या हमारी जीवन शैली ऐसी नहीं हो गयी कि हम असामान्य चीजों को भी चलन के नाम पर स्वीकार करने लगे हैं। उत्सव में राजनीति नहीं मिलनी चाहिए और विश्वास में तो बिल्कुल नहीं। सारा शहर बुर्ज खलीफा के जादू में मदहोश होता जा रहा है। माँ की प्रतिमा को सोने की साड़ी पहनायी जा रही है, करोड़ों के आभूषण पहनाये जा रहे हैं…जमकर सराहा जा रहा है मगर इसके पीछे जो अन्धेरा है, कभी उसके बारे में सोचिए…क्या मंडप बनाने वालों और माँ की प्रतिमा को बनाने वाले हाथों में हमने उम्मीद का एक भी दीया रखा है? कोई सवाल नहीं करेगा कि ये करोड़ों रुपये जो खर्च हो रहे हैं, उनका स्त्रोत क्या है.. ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारे उत्सव आडम्बर के साथ ही अब श्रद्धा के नाम पर काले को सफेद बनाने का खेल बन गये हैं।

इस राज्य में पूजा आयोजकों को बहुत प्रोत्साहन मिला है, आर्थिक सहायता और बिजली भी मिली है मगर किस कीमत पर मिली है, यह मंडप के बाहर प्रवेश द्वार को देखने पर समझ आ जाता है जब आप सरकारी योजनाओं से लेकर राजनेताओं के बड़े होर्डिंग्स देखते हैं। बंगाल में इस बार की पूजा में सरकारी योजनाओं का प्रचार जिस तरह से हुआ और हद तो तब हो गयी जब नेत्री को देवी बना दिया गया। क्या यह देवी की आराधना है…सरकारी योजनाएं जनता के लिए होती हैं…तो उनके लिए 2-4 बैनर काफी हैं लेकिन सत्ता और बाजार दोनों ही आस्था को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, यह गलत है। इधर बांग्लादेश में एक अफवाह के कारण माँ दुर्गा की प्रतिमायें तोड़ी जा रही हैं तो दूसरी तरफ किसानों से सहानुभूति के नाम पर राजनीति की रोटियाँ सेंकी जा रही हैं। सहानुभूति जताने के और भी तरीके हैं, व्यथा दर्शाने के और भी तरीके हैं मगर पंडाल के बाहर जूते – चप्पल और पैर दिखाकर क्या साबित करने की कोशिश की गयी, यह समझ के बाहर है। दूसरी तरफ ऐसे भी मंडप हमने देखे जो थोड़े में बहुत कुछ कह गये। बजट कम था मगर सन्देश बड़ा। सामाजिक कार्यों में पूजा आयोजकों को व्यस्त देखा गया। यह अच्छी बात है मगर सबसे पहले हमें खुद से सवाल करना होगा कि हम आधुनिकता के नाम पर स्वार्थ की जो गठरी ढो रहे हैं, वह हम कब तक ढो सकेंगे? अच्छी बात यह रही है कि कार्निवल के नाम पर माँ की प्रतिमाओं को लेकर होने वाला रोड शो नहीं हो रहा, वरना यह तमाशा भी आस्था के अपमान जैसा ही लगता है कई बार।

जनता का उत्सव सत्ता और बाजार के पास रह गया है और हम सब मन में जानते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए। इस बार भी कोरोना का प्रभाव लगभग हर मंडप पर रहा…पूजा आयोजकों की थीम भी कोरोना बना तो कहीं पर माँ को कोरोनासुर का वध करते हुए दिखाया गया। हर मंडप में आयोजकों को जनता से मास्क पहनने, दूरी रखने और भीड़ से बचने का अनुरोध करते हुए देखा गया मगर हम सब जानते हैं कि पंडालों के बाहर स्थिति क्या रही। लोगों को मास्क पहनने में दिक्कत रही।

ऐसे में अगर कोरोना की तीसरी लहर दस्तक दे तो इसमें हैरत क्या? लॉक डाउन की परिस्थिति में बंगलों में रहने वालों पर शायद असर न हो मगर उनके बारे में सोचिए जो रोज कमाते हैं, तब पेट भरता है। उन बच्चों के बारे में सोचिए जो पिछले 2 साल से स्कूल का चेहरा तक नहीं देख सके हैं। शायद यह हमारे मन के विकार हैं जो इतनी बाधाएं आ रही हैं। आज विजयादशमी है, घाटों पर विर्सजन के लिए कतार लगेगी। सत्ता हो, बाजार हो या हम हों, उत्सव की गरिमा को बनाये रखना हमारा ही दायित्व है, इसे भूलना नहीं चाहिए। आश्छे बोछर में आस्था का बाजार न बने, बस यही प्रार्थना है, सुन रही हो न माँ?

अर्चना संस्था ने की  माँ दुर्गा की शब्दों से आराधना

कोलकाता : अर्चना संस्था की ओर से आयोजित गोष्ठी में नवरात्र के दौरान माँ दुर्गा की शब्दों द्वारा आराधना की। इस अवसर पर आभासी माध्यम पर सदस्याओं ने सक्रिय भागेदारी कर अपनी प्रस्तुति दी। मांँ तुम्हारे रूप की छवि दिखला दो एक बार/हर भावों में हर धड़कन में गूँज उठे झंकार, हे कौमारी इस वसुंधरा पर बहता सा तुम वह निर्मल जल हो – मृदुला कोठारी, क्यों तेरी आंँखों में आंँसू दिल में इतना दर्द समाया, मेरी सूखी हुई आंँखों में अब पानी नहीं है /सुरभित थी जिंदगी अब रातरानी नहीं है-प्रसन्न चोपड़ा,इतिहास के पन्ने बताते हैं कितनी लड़ाईयां लड़ी हमने, आदि शक्ति नारायणी अम्बे जय जगदम्बे-इंदू चांडक, सीढ़ी का हर तल है प्रतीक्षारत कि उसपर चढ़ने – उतरने वाले कुछ ठिठकें और मिलें, गाय को जब बाँध दिया गया खूँटे से…भारती मेहता, जागो माँ दुर्गा का आह्वान, मैं ही वह रहस्यमयी – डॉ वसुंधरा मिश्र, उषा श्राफ और समृद्धि आदि कवयित्रियों ने विभिन्न भावों की कविताएं सुनाई। सुशीला चनानी ने हाइकू, गीत और कविताएँ सुनाई वहीं हिम्मत चौरडिया ने विभिन्न संदेशों से युक्त- करें सौ बार वंदन/रोटी तो अनमोल (मुक्तक)/चंदन माटी देश की (कुंडलिया)/मैया थारो साचो है दरबार(गीत)/ सुनाए। जूम पर होने वाले इस कार्यक्रम का संचालन और तकनीकी सहयोग इंदू चांडक ने किया।

गृह मंत्रालय ने बीएसएफ को इन राज्यों में सीमा से 50 किमी अंदर तक कार्रवाई की दी मंजूरी

नयी दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीमा सुरक्षा बल के अधिकार क्षेत्र को बढ़ा दिया है और अब बीएसएफ के अधिकारियों को गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती की शक्तियां दी गयी हैं। बीएसएफ अधिकारी पश्चिम बंगाल, पंजाब और असम में गिरफ्तारी और तलाशी ले सकेंगे. बीएसएफ को सीआरपीसी, पासपोर्ट एक्ट तथा पासपोर्ट (इंट्री टू इंडिया) के तहत ये करवाई करने का अधिकार मिला है।
50 किलोमीटर तक कर सकेंगे कार्रवाई
असम, पश्चिम बंगाल और पंजाब में पुलिस की तर्ज पर बीएसएफ को तलाशी और गिरफ्तारी का अधिकार मिला है। बीएसएफ के अधिकारी तीनों राज्यों में बांग्लादेश और पाकिस्तान बॉर्डर से 50 किलोमीटर देश के राज्यों में कार्रवाई कर सकेंगे। इससे पहले यह दायरा 15 किलोमीटर था. इसके अलावा बीएसएफ नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा, मणिपुर और लद्दाख में भी तलाशी और गिरफ्तारी कर सकेगी।
गुजरात में कम किया गया अधिकार क्षेत्र
हालांकि इसके साथ ही गुजरात में बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र को कम किया गया है और सीमा का विस्तार 80 किमी से कम होकर 50 किमी हो गया है जबकि राजस्थान में दायरा क्षेत्र पहले की तरह ही 50 किलोमीटर रखा गया है। पांच पूर्वोत्तर राज्यों मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा और मणिपुर के लिए कोई सीमा निर्धारित नहीं की गयी है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में भी सीमा निर्धारित नहीं है।
बीएसएफ के अधिकार
सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 ( बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स एक्ट 1968) की धारा 139 केंद्र को समय-समय पर सीमा बल के संचालन के क्षेत्र और सीमा को अधिसूचित करने का अधिकार देती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर सीमा से लगे इलाकों के ‘शेड्यूल’ को संशोधित किया है, जहां बीएसएफ के पास पासपोर्ट अधिनियम, एनडीपीएस अधिनियम, सीमा शुल्क अधिनियम जैसे अधिनियमों के तहत तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी की शक्तियां होंगी।

प्रवासी बिहारी श्रमिक हैं तो जरूर बनवायें लेबर कार्ड

पटना : बिहार में रोजगार का अभाव होने के चलते यहां से लोग रोजगार की तलाश में पलायन कर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चंडीगढ़, पुणे जैसे औद्योगिक शहरों में जाकर बस गए हैं। वहां वे जैसे-तैसे मेहनत कर अपना और परिवार का भरण-पोषण करते हैं। कोरोना जैसी महामारी के दौरान जब इन रोजगार देने वाले शहरों और राज्यों में सबकुछ ठप हो गया तो बिहार के इन मजदूरों और कामगारों को काफी दिक्कत हुई। इन जैसी परिस्थितियों में ये लोगों के सामने ठीक से पेट भरने तक की मुसीबत आ जाती है। अगर आप ऐसी किसी भी परिस्थिति में अपनी मुश्किल कम करना चाहते हैं तो बिहार सरकार की योजना के तहत लेबर कार्ड जरूर बनवाएं। बिहार में लेबर कार्ड बनवाने के ढेर सारे फायदे हैं जिसका लाभ लेकर आप अपना और अपने परिवार की जिंदगी को सुखमयी बना सकते हैं।

बिहार में कैसे बनवाएं लेबर कार्ड
– सबसे पहले http://bocw.bihar.gov.in/ वेबसाइट को लॉगिन करें।
– वेबसाइट की दाईं साइड लाल पट्टी पर आपको लिखा दिखेगा ‘नए निबंधन के लिए अनुरोध’। इसपर क्लिक करें। यहां क्लिक करते ही एक पीडीएफ फाइल अपलोड होगा। इस PDF फाइल में आप योजना से जुड़ी सारी जानकारी हासिल कर सकते हैं।
– सारी जानकारी हासिल करने के बाद आप अपने ब्लॉक में जाकर वहां श्रम संसाधन विभाग के अफसर से मिलें। उनसे लेबर कार्ड बनवाने का फॉर्म मांगे।
– आप चाहे तो अपने पंचायत के मुखिया से भी इस फॉर्म की डिमांड कर सकते हैं।
– फॉर्म अच्छे से भरने के बाद, उसके साथ सारे डॉक्यूमेंट डॉक्यूमेंट संलग्न कर अपने ब्लॉक के श्रम संसाधन विभाग में जाकर जमा करें। फॉर्म के साथ जरूरी कागजात में आधार कार्ड, बैंक पासबुक की छायाप्रति या नेम प्रिंटेड कैंसिल चेक होना अनिवार्य है।

किस पेशे से जुड़े लोग बनवा सकते हैं लेबर कार्ड
भवन निर्माण एवं रोड निर्माण कार्य में कुशल कोटि के कामगार
राज मिस्त्री
राज मिस्त्री हेल्पर
बढ़ई
लोहार
पेंटर
भवन में बिजली एवं इससे जुड़ा काम करने वाले इलेक्ट्रिशियन
भवन में फर्श/फ्लोर टाइल्स का कार्य करने वाले मिस्त्री और उसके सहायक
सेंट्रिंग एवं लोहा बांधने का कार्य करने वाले
गेट ग्रिल एवं वेल्डिंग का काम करने वाले
कंक्रीट मिक्सर मशीन चलाने वाले और कंक्रीट मिक्स ढोने वाले
महिला कामगार (रेजा) जो सीमेंट, गारा मिक्स ढोने का कार्य करती हैं
रौलर चालक
रोड पुल एवं बांधी निर्माण कार्य में लगे मजदूर
रोड, पुल, बांध, भवन निर्माण कार्य में विभिन्न आधुनिक यंत्रों को चलाने वाले मजदूर
रोड, पुल, बांध, रेलवे, भवन निर्माण कार्य स्थल पर गार्ड/चौकीदार की नौकरी करने वाले
भवन निर्माण में जल प्रबंधन का कार्य करने वाले पलम्बर के निर्माण में लगे अकुशल अस्थाई कामगार
मनरेगा कार्यक्रम के अंतर्गत (बागवानी एवं वानिकी को छोड़कर)
यहां बता दें कि कारखाना अधिनियम 1948 एवं खान अधिनियम 1952 के अंतर्गत निर्माण कार्य में संलग्न श्रमिक इसमें शामिल नहीं हैं।

सरकार ने दी मंजूरी, 2022 से उड़ान भरेगी राकेश झुनझुनवाला की आकासा एयर

मुम्बई : राकेश झुनझुनवाला की आकासा एयर  को विमानन सेवाएं शुरू करने के लिए सरकार की ओर से हरी झंडी मिल गई है। आकासा एयर ब्रांड नाम से भारतीय विमानन सेक्टर में उतर रही एसएनवी एविएशन प्राइवेट लिमिटेड ने बयान में कहा कि कंपनी को भारत के नागर विमानन मंत्रालय से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी एनओसी मिल गया है। आकासा एयर की योजना 2022 की गर्मियों से अपनी विमानन सेवाएं शुरू करने की है। आकासा एयर के सीईओ विनय दुबे ने कहा कि हम बेहद खुश हैं और नागर विमानन मंत्रालय के सहयोग और उनके द्वारा एनओसी दिए जाने के लिए आभारी हैं। आकासा एयर को सफलतापर्वूक लॉन्च करने के लिए जरूरी सभी अतिरिक्त अनुपालनों पर हम रेगुलेटरी अथॉरिटीज के साथ काम करना जारी रखेंगे। आकासा एयर भारतीयों के लिए राष्ट्र की सबसे ज्यादा डिपेंडेबल, अफोर्डेबल और ग्रीनेस्ट एयरलाइन लॉन्च करना चाहती है। दुबे ने आगे कहा कि आकासा एयर में हमारा मानना है कि राष्ट्र की प्रगति के लिए एक मजबूत एयर ट्रान्सपोर्टेशन सिस्टम महत्वपूर्ण है। इसी बात ने हमें एक आधुनिक, इफीशिएंट, क्वालिटी कॉन्शियस एयरलाइन को क्रिएट करने के लिए प्रेरित किया है। आकासा एयर किसी भी भारतीय के सामाजिक-आर्थिक या सांस्कृतिक बैकग्राउंड पर ध्यान दिए बिना सभी भारतीयों की सेवा करेगी।
आने लगा है आकासा एयर में निवेश
खबर है कि राकेश झुनझुनवाला आकासा एयर में पहली किश्त के रूप में 43.75 करोड़ रुपये निवेश कर चुके हैं। रेखा राकेश झुनझुनवाला के नाम से यह निवेश किया गया है। राकेश झुनझुनवाला ने आकासा एयर में कुल 247.5 करोड़ रुपये का निवेश करने की घोषणा की थी। इसके अलावा दुबई के एक निवेशक और न्यू होराइजन इन्वेस्टमेंट फंड के संस्थापक माधव भटकुली ने आकासा एयर में 6.24 करोड़ रुपये का निवेश किया है।
हाल ही में हुई थी पीएम मोदी से मुलाकात
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राकेश झुनझुनवाला से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद पीएम मोदी ने कहा था कि झुनझुनवाला भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर काफी आशावादी हैं। उन्होंने इस बारे में ट्वीट भी किया था।

बाल विवाह के कारण रोज जान गंवा देती हैं 60 से ज्‍यादा बच्चियां

नयी दिल्‍ली : बाल विवाह से दुनियाभर में हर दिन 60 से अधिक लड़कियों और दक्षिण एशिया में एक दिन में छह लड़कियों की मौत होती है। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर जारी एक नए विश्लेषण में दावा किया गया है कि बाल विवाह के कारण गर्भधारण और बच्चे को जन्म देने की वजह से हर साल तकरीबन 22,000 लड़कियों की मौत हो रही है। ‘सेव द चिल्ड्रन’ की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में हर साल बाल विवाह से संबंधित 2,000 मौत होती हैं। इसके बाद पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 650 और लातिन अमेरिका तथा कैरेबियाई देशों में हर साल 560 मौत होती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘हर साल अनुमानित रूप से गर्भावस्था के कारण 22,000 लड़कियों की मौत हो रही है और बाल विवाह से बच्चों का जन्म हो रहा है। बाल विवाह से हर दिन 60 से अधिक लड़कियों की मौत होती है और दक्षिण एशिया में हर दिन छह लड़कियों की मौत होती है।’’
2030 एक 1 करोड़ बच्चियों की शादी की आशंका
रिपोर्ट क अनुसार, ‘‘हालांकि, पिछले 25 वर्षों में दुनियाभर में करीब आठ करोड़ बाल विवाहों को रोका गया लेकिन कोविड-19 महामारी से पहले ही इसमें प्रगति रुक गयी और महामारी से असमानताएं और ज्यादा गहरी हुई है जिससे बाल विवाह बढ़ते हैं। स्कूलों के बंद होने, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ने तथा और परिवारों के गरीबी की ओर बढ़ने के कारण महिलाओं और लड़कियों पर लॉकडाउन के दौरान हिंसा का खतरा बढ़ा। 2030 तक एक करोड़ और बालिकाओं की शादी होने की आशंका है यानी कि और लड़कियों की मौत होने का खतरा है।’’
फैसलों में लड़कियों की भूमिका हो: विशेषज्ञ
‘सेव द चिल्ड्रन इंटरनेशनल’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इंगर एशिंग ने कहा कि बाल विवाह लड़कियों के खिलाफ यौन और लैंगिक हिंसा का सबसे खराब और जानलेवा रूप है। हर साल लाखों लड़कियों को ऐसे पुरुषों से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है जो उनसे उम्र में कहीं अधिक बड़े होते हैं जिससे उनके सीखने, बचपन जीने और कई मामलों में जीवित रहने का अवसर छिन जाता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘बच्चे को जन्म देना किशोरियों के लिए पहले नंबर का हत्यारा है क्योंकि उनकी कम उम्र बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार नहीं होती। बच्चियों के बच्चे पैदा करने के स्वास्थ्य खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को बालिकाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे बाल विवाह और समय से पूर्व बच्चे को जन्म देने से होने वाली मौतों से बची रहें। यह तभी हो सकता है जब लड़कियों को प्रभावित करने वाले फैसलों में उनकी भूमिका हो।’’
सेव द चिल्ड्रन, इंडिया के सीईओ सुदर्शन ने कहा, “हम बाल रक्षा भारत’’ में बाल विवाह को संग्रहालयों और इतिहास तक ही सीमित देखना चाहते हैं। यह हमारी सामूहिक विफलता है कि इस सदी में भी मानवता के खिलाफ ऐसा प्रचलित और चिरस्थायी अपराध है। । वे सभी जो समाधान का हिस्सा नहीं हैं, उन्हें खुद को समस्या का हिस्सा समझना चाहिए।” उन्होंने कहा,”बच्चों, और विशेष रूप से बालिकाओं को उनके सीखने के मूल अधिकार और एक खुशहाल और बेफिक्र बचपन का आनंद लेने से वंचित करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है और इसकी निंदा करने की आवश्यकता है। इसे एक सांस्कृतिक तत्व के रूप में खारिज नहीं किया जाना चाहिए और इसके बजाय इसे जीवन और स्वतंत्रता के मूल अधिकार से इनकार के रूप में देखा जाना चाहिए।’’
सेव द चिल्ड्रन द्वारा सोमवार को जारी एक वैश्विक रिपोर्ट ‘‘ग्लोबल गर्लहुड रिपोर्ट 2021: संकट में लड़कियों के अधिकार’’ में संगठन, सरकारों से सभी सार्वजनिक निर्णय लेने में सुरक्षित और सार्थक भागीदारी के उनके अधिकार का समर्थन करके लड़कियों की आवाज उठाने का आह्वान कर रहा है। संगठन ने यह भी मांग की कि सरकारों को समावेशी नीतियों और कार्यक्रमों को विकसित करके सभी लड़कियों के अधिकारों की गारंटी देनी चाहिए, जिसमें असमानता और भेदभाव के विभिन्न रूप (लिंग, जाति, विकलांगता, आर्थिक पृष्ठभूमि, आदि के आधार पर) शामिल हैं।

तीन अमेरिकी अर्थशास्त्रियों को नोबेल पुरस्कार

स्टाकहोम : तीन अमेरिकी अर्थशास्त्रियों को एक अग्रणी शोध के लिए अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गयी। इनमें से एक ने साबित किया कि न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी से कर्मचारियों की नियुक्ति में कमी नहीं आती है और प्रवासियों के चलते मूल निवासी श्रमिकों का वेतन कम नहीं होता। ये निष्कर्ष सामान्य धारणा के विपरीत हैं। इसके अलावा दो अन्य अर्थशास्त्रियों ने इस तरह के सामाजिक मुद्दों का अध्ययन करने का तरीका बताने के लिए नोबेल सम्मान प्राप्त किया। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाले अर्थशास्त्रियों में बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डेविड कार्ड, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के जोशुआ डी. एंग्रिस्ट और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के गुइडो इम्बेन्स शामिल हैं। कनाडा में जन्मे कार्ड ने अपने शोध में बताया कि न्यूनतम मजदूरी, आव्रजन और शिक्षा श्रम बाजार को कैसे प्रभावित करते हैं, जबकि उसके साथ नोबेल पुरस्कार पाने वाले एंग्रिस्ट और इम्बेन्स ने परंपरागत वैज्ञानिक पद्धतियों पर शोध किया।
प्राकृतिक प्रयोग, ज्ञान का एक समृद्ध स्रोत
रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने कहा कि तीनों ने ‘‘आर्थिक विज्ञान में अनुभवजन्य कार्य को पूरी तरह से बदल दिया है।’’आर्थिक विज्ञान समिति के अध्यक्ष पीटर फ्रेड्रिक्सन ने कहा, ‘‘समाज के लिए अहम सवालों के संबंध में कार्ड के अध्ययन और एंग्रिस्ट और इम्बेन्स के पद्धतिगत योगदान से पता चला है कि प्राकृतिक प्रयोग ज्ञान का एक समृद्ध स्रोत हैं।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘उनके शोध ने महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देने की हमारी क्षमता में काफी सुधार किया है, जो समाज के लिए बहुत फायदेमंद है।’’
क्या था कार्ड का शोध
कार्ड ने देखा कि क्या हुआ जब न्यू जर्सी ने न्यूनतम वेतन 4.25 डॉलर से बढ़ाकर 5.05 डॉलर कर दिया। शोध में तुलना समूह के रूप में उन्होंने पूर्वी पेंसिल्वेनिया की सीमा पर स्थित रेस्टोरेंट का उपयोग किया। पिछले अध्ययनों के विपरीत उन्होंने और उनके दिवंगत शोध साथी एलन क्रुएगर ने पाया कि न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी का कर्मचारियों की संख्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कार्ड ने बाद में इस मुद्दे पर और काम किया। नोबेल समिति ने कहा कि कुल मिलाकर शोध का निष्कर्ष यह है कि न्यूनतम वेतन में वृद्धि के नकारात्मक प्रभाव 30 साल पहले की तुलना में काफी कम हैं। कार्ड ने यह भी पाया कि किसी देश के मूल निवासियों की आय नए प्रवासियों से लाभान्वित हो सकती है।
एंग्रिस्ट और इम्बेन्स का शोध
एंग्रिस्ट और इम्बेन्स ने पद्धति संबंधी मुद्दों पर काम करने के लिए पुरस्कार प्राप्त किया, जिसकी मदद से अर्थशास्त्री कारण और प्रभाव के बारे में ठोस निष्कर्ष निकाल सकते हैं, भले ही वे इसके लिए सख्त वैज्ञानिक तरीकों से अध्ययन न करें। इम्बेन्स ने मैसाचुसेट्स में अपने घर से फोन पर बात करते हुए संवाददाताओं से कहा कि जब इस बारे में खबर आई, तब वह व्यस्त सप्ताहांत के बाद सो रहे थे। उन्होंने कहा कि वह इस खबर को सुनकर रोमांचित हो गए।
अन्य नोबेल पुरस्कारों के विपरीत अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत में स्थापित नहीं किया गया था बल्कि स्वीडिश केंद्रीय बैंक द्वारा 1968 में उनकी स्मृति में इसकी शुरुआत की गई थी, जिसमें पहले विजेता को एक साल बाद चुना गया था। यह प्रत्येक वर्ष घोषित नोबेल का अंतिम पुरस्कार है।

अब शत प्रतिशत क्षमता के साथ उड़ान भरेंगी एयरलाइन्स

सरकार ने प्रतिबंध हटाकर 100 फीसदी क्षमता से उड़ने की दी इजाजत

नयी दिल्ली : केन्द्र सरकार ने घरेलू विमानन कंपनियों की क्षमता उपयोग को लेकर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है। 18 अक्टूबर से घरेलू सेक्टर में विमानन कंपनियां 100 फीसदी क्षमता के साथ उड़ान भर सकेंगी। मौजूदा समय में घरेलू क्षेत्र में कंपनियां सिर्फ 85 फीसदी क्षमता के साथ ही उड़ान भर सकती हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करने के लिए सरकार ने ये प्रतिबंध लगाया था।
सस्ती हो सकती है हवाई यात्रा
सरकार के प्रतिबंध हटाने के इस फैसले से यात्रियों को भी काफी राहत मिलेगी। इसका सीधा असर हवाई यात्रा की टिकट पर पड़ सकता है। अभी क्षमता कम होने की वजह से एयरलाइन कंपनियों को टिकट की कीमत अधिक रखनी पड़ रही थी, जिसमें अब राहत दी जा सकती है।
बढ़ती मांग और घटते संक्रमण के चलते लिया फैसला
उड्डयन मंत्रालय ने कोरोना वायरस के घटते संक्रमण और त्योहारी सीजन से पहले बढ़ती मांग को देखते हुए ये फैसला किया है। भले ही 18 अक्टूबर से तमाम घरेलू विमानों को पूरी क्षमता के साथ उड़ने की इजाजत मिल चुकी है, लेकिन सभी एयरलाइन्स को कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए बनाये गये निर्देशों को मानना होगा।

सहायक प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए पीएचडी की अनिवार्यता टली

नयी दिल्ली : यूजीसी ने विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसरों की सीधी भर्ती के लिए योग्यता के रूप में पीएचडी की अनिवार्यता को लेकर तारीख आगे बढ़ा दी है। यह फैसला कोविड-19 महामारी के मद्देनजर लिया गया है। यूजीसी द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने कोविड-19 महामारी के मद्देनजर विश्वविद्यालयों के विभागों में सहायक प्रोफेसरों की सीधी भर्ती के लिए योग्यता के रूप में पीएचडी की अनिवार्यता के संबंध में तारीख को एक जुलाई 2021 से बढ़ाकर एक जुलाई 2023 करने का निर्णय लिया है।’