लोगों ने नाम दिया ‘सड़कों का डॉक्टर’
हैदराबाद : सड़कों पर हो रहे गड्ढों की वजह से आए दिन सैकड़ों लोगों को अपनी जान गवानी पड़ती है। हैदराबाद में लोगों को ‘सड़कों का डॉक्टर’ मिल गया है। पिछले 11 सालों से यह गंगाधर और उनकी पत्नी वेंकटेश्वरी यह काम करते आ रहे हैं। गंगाधर तिलक कटनाम सेवानिवृत रेलवे इंजीनियर हैं जिनकी उम्र 73 साल है। वहीं उनकी पत्नी का नाम वेंकटेश्वरी कटनाम है जिसकी उम्र 64 साल है। इन्हें हैदराबाद की सड़कों पर जगह-जगह सड़कों के गढ्डे भरते हुए देखा जाता है। गंगाधर इस काम में अपनी हर महीने की पेंशन का पैसा भी खर्च करते हैं। वे अब तक 40 लाख खर्च कर 2000 गढ्डे भर चुके हैं। गंगाधर के अनुसार, उन्होंने ये काम रेलवे से सेवानिवृत्त होने के बाद शुरू किया। उन्होंने इस मुद्दे पर संबंधित अधिकारियों से बात भी की लेकिन जब कुछ नहीं हुआ तो खुद अपनी पत्नी के साथ इसे करने लगे। उनके काम को देखते हुए लोग उन्हें सड़कों का डॉक्टर कहते हैं। इस काम को करने से पहले गंगाधर ने 35 साल तक रेलवे में नौकरी की। उसके बाद वे इंजीनियर के तौर पर एक सॉफ्टेवयर कंपनी में काम करने लगे। इस दम्पति ने मिलकर एक संस्था की स्थापना भी की जिसे श्रमदान नाम दिया। यहां आकर कोई भी व्यक्ति सड़कों के गढ्डे भरने के लिए राशि दान कर सकता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)
हैदराबाद में दम्पति ने 40 लाख खर्च कर भरे 2000 सड़कों के गढ्डे
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता दिग्गज अभिनेत्री सुरेखा सीकरी का निधन
मुम्बई : राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री सुरेखा सीकरी का निधन शुक्रवार सुबह हृदय गति रुकने से हो गया। वह 75 साल की थीं। मीडिया से साझा किए गए एक बयान में अदाकारा के एजेंट विवेक सिधवानी ने बताया कि दूसरे मस्तिष्काघात के बाद उन्हें स्वास्थ्य संबंधी बहुत परेशानियां हो रही थीं। सीकरी तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली रंगकर्म में अपनी पहचान बनाने वाली अभिनेत्री थीं। सीकरी को पिछले साल सितम्बर में मस्तिष्काघात हुआ था और वह कुछ दिन तक अस्पताल में भर्ती रही थीं। सीकरी ने थिएटर, फिल्म से लेकर टेलीविजन तक सभी मंचों पर अपने शानदार अभिनय की छाप छोड़ी। उन्होंने ‘तमस’, ‘मम्मो’, ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’, ‘ज़ुबेदा’, ‘बधाई हो’ जैसी फिल्में की और धारावाहिक ‘बालिका वधू’ में भी नजर आईं। सीकरी आखिरी बार 2020 में ‘नेटफ्लिक्स’ की फिल्म ‘घोस्ट स्टोरीज़’ में नजर आई थीं। दिल्ली में जन्मी अदाकारा ने अपना बचपन उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की पहाड़ियों में गुजारा। उन्होंने उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) से अपनी स्नातक की पढ़ाई की और फिर 1968 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में दाखिला लिया। 1971 में एनएसडी से पढ़ाई पूरी करने के बाद, सीकरी ने थिएटर में काम करना जारी रखा और एक दशक से अधिक समय तक ‘एनएसडी रिपर्टरी कम्पनी’ से जुड़ी रहीं। वहां, उन्होंने ‘संध्या छाया’, ‘तुगलक’ और ‘आधे अधूरे’ जैसे कई मशहूर नाटक किए। इसके बाद सीकरी ने मुंबई को रुख किया और 1978 में ‘किस्सा कुर्सी का’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। 1986 में आई फिल्म ‘तमस’ में उनकी अदाकारी के लिए उन्हें अपने करियर का पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 1989 में उन्हें ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया। इसके बाद 1994 में आई फिल्म ‘मम्मो’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। अदाकारा ने टेलीविजन पर भी अपनी अदाकरी का लोहा मनवाया उन्होंने ‘सांझा चूल्हा’, ‘कभी कभी’, ‘जस्ट मोहब्बत’, ‘सीआईडी’, ‘बनेगी अपनी बात’ जैसे कई धारावाहिक किए, लेकिन ‘बालिका वधू’ में निभाए उनके ‘दादी सा’ के किरदार को काफी लोकप्रियता मिली। इसके साथ-साथ वह लगातार फिल्में भी करती रहीं और 2018 में आई फिल्म ‘बधाई हो’ के लिए उन्हें तीसरी बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नेत्रहीन युवती से विवाह के लिए अकेले ले गया बारात
अपने नहीं, गाँववाले आये साथ
ललितपुर : उत्तर प्रदेश के ललितपुर में एक युवक ने मोहब्बत की मिसाल पेश की। युवक ने एक नेत्रहीन युवती वंदना से शादी की। एक नजर में वंदना उसे पसंद आई तो उसने उसके साथ शादी करने की बात अपने घर पर की। लेकिन घरवाले राजी नहीं हुए। फिर भी उसने शादी करने की बात कही तो भाई और माँ ने घर से निकाल दिया। फिर क्या था…दूल्हा बनकर मोहन अकेले ही वंदना के घर के बाहर पहुंच गया। मोहन का वंदना के प्रति प्यार देख गांव वालों ने दोनों की शादी धूमधाम से कराई।
ललितपुर के मड़ावरा के मदनपुर गाँव में रहने वाले दिव्यांग बब्बू रायकवार की बेटी वंदना दोनों आंखों से जन्म से ही अंधी है। पिता ने बेटी की शादी के लिए कई बार कोशिश की, लेकिन किसी ने बेटी का हाथ नहीं थामा। फिर पिता ने उम्मीद ही छोड़ दी थी। बेटी को मोहन जैसा जीवनसाथी मिलने से पिता भी खुश हैं। वह कहते हैं कि भगवान ने मोहन को उनकी बेटी के लिए भेजा है। मध्य प्रदेश के सागर जिले के मड़ावन गांव का रहने वाल मोहन पेशे से कारीगर है।
मोहन का परिवार इस शादी के खिलाफ था। कई बार परिवार को मनाने के बाद भी वो जब कामयाब नहीं हुआ तो अपने दोस्तों के संग अकेला ही बारात लेकर निकल आया। उसने वंदना के साथ सात फेरे लिए और हमेशा के लिए अपना बना लिया। शादी समारोह में अपनों की कमी गांव के लोगों ने पूरी कर दी। गांव वालों ने धूमधाम से दोनों की शादी कराई।
मोहन ने बताया कि वो वंदना को संसार की सभी खुशियां देना चाहता है। शादी के बाद वंदना को खाना बनाने और घर का काम करना नहीं पड़ेगा। वो खाना बनाना और घर का काम करना जानता है। वो खुद वंदना के लिए खाना बनाएगा। उसने बताया कि वो एक महीने बाद पत्नी को अपने साथ मऊ ले जाएगा। मऊ में घर का बंदोबस्त करने के लिए उसके ठेकेदार ने एक लाख रुपये दिए हैं।
ऐसे हुआ दोनों का मिलन
मोहन ने बताया कि एक महीने पहले उसके स्वर्गीय पिता के दोस्त करन सिंह ने उसे फोन पर वंदना के बारे में बताया था। इसके बाद वो वंदना को देखने मदनपुर आया था। यहां पहली नजर में ही वंदना उसे अच्छी लगी। वंदना से बातचीत की तो कहीं से रिश्ता न आने की परेशानी उसके चेहरे से साफ झलक रही थी। उसने वंदना से शादी करने का फैसला कर लिया। मोहन ने घर पहुंचकर अपने परिवार से इस बारे में बात की तो, उन्होंने साफ मना कर दिया। घर से निकाले जाने के बाद वो सीधे पिता के दोस्त करन सिंह के घर मड़ावन पहुँच गया। मड़ावन से वो बारात लेकर वंदना के घर पहुँचा।
सॉफ्टवेयर बाजार में भारत का दबदबा, इस साल 56 हजार करोड़ के कारोबार की उम्मीद
नयी दिल्ली : इंटरनेशनल डेटा कॉरपोरेशन (आईडीसी ) ने नयी रिपोर्ट जारी की है। इसके अनुसार 2021 के अंत तक भारतीय सॉफ्टवेयर बाजार ( 7.6 बिलियन डॉलर) 56 हजार करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान लगाया है। भारत का सॉफ्टवेयर बाजार 2020 में लगभग 52 हजार करोड़ रुपये (7 बिलियन डॉलर) आंका गया था, जो कि 2019 की तुलना में साल-दर-साल 13.4 प्रतिशत ज्यादा है।
एशिया में भारत की हिस्सेदारी 17.5 प्रतिशत रही
2020 में पूरे एशिया/प्रशांत (जापान और चीन को छोड़कर) (APEJC) में सॉफ्टवेयर मार्केट में भारत की हिस्सेदारी 17.5 प्रतिशत थी। माइक्रोसॉफ्ट,ओरेकल और एसएपी जैसी सॉफ्टवेयर कंपनी साल 2020 के दौरान भारतीय बाजार में सबसे आगे रहीं।
अगले 4 साल में 11.6 प्रतिशत विकास का अनुमान
आईडीसी का अनुमान है कि भारत का समग्र सॉफ्टवेयर मार्केट 2020 से 2025 तक 11.6 प्रतिशत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (सीएजीआर) से बढ़ने की उम्मीद है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय इंटरप्राइजेज टेक्नोलॉजी में निवेश करना जारी रखेगा जो उन्हें ऑपरेशन करने में सुधार होगा और कर्मचारी की काम करने की कैपासिटी में सुधार के लिए इनोवेशन को बढ़ावा देने में मदद करेगा और बदले में बिजनेस को गति मिलेगी।
आईडीसी को उम्मीद है कि प्लेटफॉर्म-एज-ए-सर्विस (पीएएएस) और सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (एसएएएस) मार्केट के सभी सॉफ्टवेयर मार्केट में 2020 में 36.8 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 57.1 प्रतिशत हो जाएगा।
आईटी और सेल्स सेक्टर में इंक्रीमेंट सामान्य से ज्यादा
रिपोर्ट के मुताबिक महामारी से कारोबार में आईटी का महत्व बढ़ा है। वहीं, लॉकडाउन के बाद से सेल्स वाली नौकरियों में नियुक्ति बढ़ी है। यह रिपोर्ट अहमदाबाद, बेंगलुरू, चंडीगढ़, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई और पुणे में 17 सेक्टरों के 2,63,000 प्रोफाइल्स के एनालिसिस पर तैयार की गयी है। इसमें कहा गया है कि सेल्स सेक्टर में 9.82 प्रतिशत और आईटी सेक्टर 8.55 प्रतिशत का इंक्रीमेंट मिला, जो कि सामान्य इंक्रीमेंट (7.12 प्रतिशत ) से ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की चार दशक पुरानी आईटी सर्विसेज इंडस्ट्री से जुड़े टेक्नोलॉजी एंटरप्रेन्योर्स ने हजारों स्टार्टअप्स शुरू किए हैं। यह स्टार्टअप उच्च दर्जे के सॉफ्टवेयर सॉल्यूशन उपलब्ध करा रहे हैं। इसमें बिलिंग से लेकर ग्राहक सपोर्ट जैसी सेवाएं शामिल हैं। यह स्टार्टअप क्लाउड के जरिए सब्सक्रिप्शन के आधार पर सर्विस देते हैं। चार्जबी इंक जैसे कई स्टार्टअप ग्लोबल स्तर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वहीं, फ्रेशवर्क्स जैसे स्टार्टअप शेयर बाजारों में लिस्ट हो रहे हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)
सफाईकर्मी आशा ने दो बच्चों की जिम्मेदारी निभाते हुए पास की आरएएस परीक्षा
जोधपुर : राजस्थान की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षा ( आरएएस -2018) में एक सफाईकर्मी आशा कंडारा ने सफलता हासिल कर सबको हैरान कर दिया है। सफाईकर्मी आशा कंडारा युवाओं के लिए मिसाल बनकर उभरी हैं। आशा कंडारा जोधपुर नगर निगम में बतौर सफाईकर्मी कार्यरत हैं। अपने इस काम के साथ ही वह राजस्थान प्रशासनिक सेवा जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल हुईं। इस परीक्षा में आशा कंडारा ने 728वीं रैंक हासिल की है। पिछले कई सालों से आशा नगर निगम में अस्थाई सफाईकर्मी के तौर पर कार्यरत है। उनके दो बच्चे हैं, जिनकी जिम्मेदारी वह पूरा करती हैं। इसके बावजूद उन्होंने कभी पढ़ाई का दामन नहीं छोड़ा। वह दिन में सफाईकर्मी का काम करती थीं और रात में पढ़ाई करती थीं।
अपने सपनों को पूरा करने के लिये आशा ने कड़ी मेहनत की राह को चुना और आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई। उन्होंने आरएएस परीक्षा के तीनों चरणों प्री एग्जाम, मुख्य एग्जाम और इंटरव्यू पास कर सफलता का परचम लहरा दिया। बता दें कि 8 साल पहले उनकी उन्होंने पति से मतभेदों के कारण अलग रहने का फैसला किया। वह अपने बच्चों का पालन पोषण खुद ही करती थीं. नगर निगम में अभी तक वह अस्थाई सफाईकर्मी की नौकरी करती थी। इस दौरान उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्हें 12 दिन पहले ही नगर निगम में स्थाई नौकरी की सौगात मिली थी। आशा बताती हैं कि जब वह नगर निगम में काम करने के लिए जाती थीं तो नगर निगम में बैठे अफसरों को देखकर उसके मन में भी अफसर बनने का इच्छा पैदा हूई। इसके बाद उन्होंने स्नातक किया और आरएएस की तैयारी शुरू की। आखिरकार उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई और उनका सपना पूरा हो गया।
फेसबुक 2022 तक कंटेंट क्रियेटर्स को करेगा 1 बिलियन डॉलर का भुगतान
नयी दिल्ली : फेसबुक 2022 के अंत तक अगले अपने सोशल मीडिया माध्यमों पर कंटेट क्रिएट करने वालों को कुल एक बिलियन डॉलर (करीब 7454 करोड़ रुपये) का भुगतान करेगा। कंपनी ने एक ब्लॉग पोस्ट में कहा है कि वह लाइव ऑडियो रूम्स और बुलेटिन के साथ स्टार्स और अफिलिएट जैसे क्रिएटिव टूल्स को विकसित करने में लगी है। ऐसे में कंपनी फेसबुक और इन्स्टाग्राम के ऐसे क्रिएटर्स को भी भुगतान करना चाहती है जो अपनी कम्युनिटी की बेहतरी के लिए कंटेंट क्रिएट कर रहे हैं। फेसबुक ने एक बोनस प्रोग्राम लाने का भी एलान किया है। कंपनी लोगों के लिए अच्छा कंटेंट लाने वाले क्रिएटर्स को इस प्रोग्राम के तहत बोनस देगी। फेसबुक के मुताबिक बोनस से क्रिएटर्स को यह समझने में मदद मिलेगी कि उनके लिए कौन-सा कंटेंट सबसे अच्छा परफॉर्म कर रहा है। कम्पनी ने कहा है कि बोनस प्रोग्राम सीजनल होगा और समय के साथ उसमें विस्तार देखने को मिलेगा। कुछ बोनस प्रोग्राम निमंत्रण के जरिए कुछ क्रिएटर्स के लिए पहले से उपलब्ध हैं।
फेसबुक की इस घोषणा से यह स्पष्ट हो गया है कि दिग्गज सोशल मीडिया कंपनी रिकॉर्डेड वीडियो, लाइव स्ट्रीमिंग और अन्य तरह के कंटेट क्रिएट करने वालों को कितना अधिक तवज्जो दे रही है। साथ ही कंपनी उन प्रमुख सोशल मीडिया नेटवर्क कंपनियों में शुमार हो गई है, जिन्होंने यूजर इंगेजमेंट करने वाले कंटेट क्रिएटर्स में सीधने निवेश का एलान किया है। गौरतलब है कि स्नैपचैट, यू ट्यूब और टिकटॉक इस ऐसी घोषणाएँ पहले ही कर चुकी हैं। अभी मौजूद बोनस प्रोग्राम केवल निमंत्रण के जरिए उपलब्ध हैं। इससे क्रिएटर्स को ज्यादा यूजर्स को इंगेज करने से जुड़ी समझ विकसित करने के साथ कुछ ज्यादा कमाई करने का भी मौका मिल जाता है।
नहीं रहे पूर्व क्रिकेटर यशपाल शर्मा
नयी दिल्ली : पूर्व क्रिकेटर और 1983 विश्व विजेता भारतीय टीम के सदस्य रहे यशपाल शर्मा नहीं रहे। उनका 66साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यशपाल शर्मा के निधन पर पूर्व कप्तान कपिल देव अपने आंसू नहीं रोक पाए। एक टीवी चैनल पर बात करते हुए कपिल रोने लगे। शर्मा भारतीय टीम के सिलेक्टर भी रहे। शर्मा ने भारत के लिए 37 टेस्ट मैचों में 1606 रन बनाए। उनका हाईएस्ट 140 रहा और औसत 33.45 रन था। वहीं वनडे क्रिकेट में उन्होंने 42 मैचों में 28.48 के औसत से 883 रन बनाए।
भारतीय चयनकर्ता रहे
यशपाल शर्मा साल 2003 से 2006 तक भारतीय टीम के चयनकर्ता रहे। यह भारतीय क्रिकेट के लिए थोड़ा अजीब वक्त था। उन्होंने तब टीम के कोच ग्रेग चैपल के खिलाफ अपनी आवाज उठाई थी और सौरभ गांगुली का समर्थन किया था। साल 2008 में वह दोबारा चयनकर्ता बने। वह उत्तर प्रदेश की रणजी टीम के कोच भी रहेय़
1983 विश्व कप के हीरो थे शर्मा
1983 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम ने वेस्टइंडीज के खिलाफ जीत के साथ शुरुआत की। इसमें शर्मा की अहम भूमिका थी। जब वह क्रीज पर उतरे तो टीम का स्कोर तीन विकेट पर 76 रन था जो जल्द ही पांच विकेट पर 141 रन हो गया। शर्मा ने 120 गेंद पर 89 रन की पारी खेली। उन्होंने अच्छे शॉट तो लगाए ही साथ ही विकेट के बीच अच्छी दौड़ भी लगाई। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ आक्रामक 40 रन हों या फिर इंग्लैंड के खिलाफ मुश्किल हालात में खेली गई 61 रन की पारी। शर्मा ने टूर्नामेंट में 34.28 के औसत से 240 रन बनाए। भारत ने अंत में विश्व कप अपने नाम किया।
दिलीप कुमार के थे प्रशंसक
यशपाल शर्मा दिलीप कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने कहा भी था कि दिलीप कुमार ने उनका कॅरियर बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। दिलीप कुमार ने पंजाब का रणजी मैच देखने के बाद शर्मा के लिए बीसीसीआई में राजसिंह डुंगरपुर से बात की थी। यशपाल शर्मा इस बात के लिए दिलीप कुमार का बड़ा अहसान मानते थे।
पतंजलि ने पार किया 30,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर का आँकड़ा
नयी दिल्ली : योग गुरु बाबा रामदेव के नेतृत्व वाली पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2020-21 में 30,000 करोड़ रुपये के टर्नओवर का आँकड़ा पार कर एक नया रिकॉर्ड बनाया है। पतंजलि पहली ऐसी स्वदेशी एफएमसीजी कंपनी बन गई है, जिसने हिन्दुस्तान यूनिलीवर जैसी बड़ी वैश्विक कंपनियों को भी पीछे छोड़ दिया है। पतंजलि समूह द्वारा हाल ही में खरीदी गई रुचि सोया का राजस्व वित्त वर्ष 2020-21 में बढ़कर 16,318 करोड़ रुपये रहा, जो पूर्व वित्त वर्ष की तुलना में 24.4 प्रतिशत अधिक है। रुचि सोया का शुद्ध लाभ इस दौरान 681 करोड़ रुपये रहा। बाबा रामदेव ने बताया कि वित्त वर्ष 2020-21 में पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड ने 9783.81 करोड़, पतंजलि नेचुरल बिस्कुट ने 650 करोड़, दिव्य फार्मेसी ने 850 करोड़, पतंजलि एग्रो ने 1600 करोड़, पतंजलि परिवहन ने 548 करोड़ और पतंजलि ग्रामोद्योग ने 398 करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल किया। इस तरह पतंजलि समूह का कुल टर्नओवर 14,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रहा। इसमें रुचि सोया का टर्नओवर शामिल नहीं है।
बेहतरीन लेखिका और बेहद दिलकश कवयित्री ज्योत्स्ना मिलन

जानी मानी लेखिका ज्योत्स्ना मिलन का जन्म 19 जुलाई 1941 में मुंबई में हुआ था। 1965 में गुजराती साहित्य से एम.ए. तथा 1970 में अंग्रेजी साहित्य से एम.ए.किया। पिता वीरेंद्र कुमार जैन भी कवि और साहित्यकार थे। घर में प्राचीन ग्रन्थ, हिंदी और अंग्रेजी साहित्य सहज ही उन्हें उपलब्ध था। कई साहित्यिक पत्रिकाएँ नियमित रूप से घर में आतीं थीं। उस समय जो भी लिखा जा रहा था उससे रुबरु होने का भरपूर अवसर उन्हें प्राप्त हुआ।
एक ओर पिता ने इनका पोषण किया तो माता ने पारंपरिक नीतियों से परिचय करवाया। वह उन्हें शिक्षा देतीं कि लड़की हो और तुम्हें वे सारे काम सीखने चाहिए जो घर चलाने के लिए जरूरी है। पिता लेखन और नौकरी में व्यस्त रहते और माँ चौदह सदस्य वाले परिवार को अकेली संभालने में । निःसंदेह इतने बड़े परिवार को अकेले संभालना संभव नहीं था, इसलिए बच्चों को भी अपनी अपनी भूमिका निभानी पड़ती थी।
इनके पति- विख्यात लेखक पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह हैं।
रचना-संसार : तीन उपन्यास, छह कहानी-संग्रह, दो कविता-संग्रह, ‘स्मृति होते होते’ (संस्मरण), ‘कहते-कहते बात को’ (साक्षात्कार) प्रकाशित।
स्त्रियों के संगठन ‘सेवा’ के मासिक मुखपत्र ‘अनसूया’ का छब्बीस वर्ष तक निरंतर संपादन;
इला भट्ट की स्त्री-चिंतन की पुस्तक ‘हम सविता’ का अनुवाद तथा संपादन; इला बहन के ही उपन्यास ‘लारीयुद्ध’ का अनुवाद। गुजराती से राजेंद्र शाह, निरंजन भगत, सुरेश जोशी, लाभशंकर ठाकर, गुलाम मोहम्मद शेख, प्रियकांत मणियार, पवनकुमार जैन की कविताओं एवं कहानियों का अनुवाद।
रामानुजन तथा धारवाडकर द्वारा संपादित ‘दि ऑक्सफोर्ड एंथोलॉजी ऑफ इंडियन पोइट्री’, आरलिन जाइड द्वारा संपादित ‘इन देयर ओन वॉइस’, साहित्य अकादेमी की काव्यार्धशती, ल्यूसी रोजेंटाइन द्वारा संपादित ‘न्यू पोइट्री इन हिंदी’, सारा राय द्वारा संपादित हिंदी कहानी संकलन ‘हेंडपिक्ड हिंदी फिक्शन’, स्वीडिश में प्रकाशित भारतीय कविता संचयन में रचनाएँ संकलित।
‘घर नहीं’ (कविता-संग्रह): ‘अ अस्तु का’ (उपन्यास) और ‘खंडहर और अन्य कहानियां’ (कहानी – संग्रह) इत्यादि उनकी प्रमुख कृतियां हैं।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से उनकी रचनाएं प्रकाशित व प्रशंसित हुई थीं । अपने इस बहु-आयामी लेखन कर्म में उन्होने दो कविता संग्रह – ‘घर नहीं’ और ‘अपने आगे-आगे’, दो उपन्यास – ‘अपने साथ’ और ‘अ अस्तु का’. चार कहानी संग्रह – ‘चीख़ के आर-पार’, ‘ख़ंडहर’ तथा अन्य कहानियां, ‘अंधेरे में इंतज़ार’ और ‘उम्मीद की दूसरी सूरत। इसके साथ हीं वे अनेक मानद सम्मानों से सम्मानित भी हुईं थीं ।
वर्ष 1985-86 के लिए म.प्र. सरकार की मुक्तिबोध फेलोशिप; वर्ष 1996 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की सीनियर फेलोशिप। वे स्त्रियों के संगठन ‘सेवा’ के मासिक मुखपत्र ‘अनसूया’ की संपादक भी थीं। उन्हें महिलाओं के उत्थान तथा उनसे जुड़े संवेदनशील मुददों को अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त करने में महारत हासिल था।
1951-52 के मध्य ज्योत्स्ना मिलन ने पहली कविता लिखी, जो कि हिंदी में थी ।बाद में वह हिंदी और गुजराती दोनों में समान रूप से लिखती रहीं।
एक साक्षात्कार में वे कहती हैं – हम लोग गुजरात और राजस्थान के सीमावर्ती इलाके-वागड़ के रहने वाले थे पहले वागड़ गुजरात में था, वर्तमान में राजस्थान में है ।लेकिन मज़े की बात यह है कि हम दोनों भाषाओं पर अपना हक मानते हैं। यों भी मेरी पूरी शिक्षा गुजराती माध्यम से हुई थी। बापूजी के कवि होने से हिंदी में भी मेरी सहज गति थी। कई सालों तक दोनों भाषाओं में लिखा था, अब सिर्फ हिंदी में लिखती हूँ, कभी-कभी अपनी हिंदी कहानियों का गुजराती में पुनर्लेखन करती हूँ।
किसी भी कवि के लिए वह क्षण अलौकिक सा होता है जब उसे यह अनुभूति हो कि वह कवि हूँ। उनको कवि होने का एहसास तब हुआ जब एक शाम उनमें एक चकित सी करती हुई पंक्ति कौंधी, जो अन्य कविताओं से अलग थी। उनके जीवन में ‘कविता’ ने अपनी जगह तभी बना ली थी। जीवन के उतार-चढ़ाव में भी लेखन का साथ कभी नहीं छूटा।विख्यात लेखक रमेशचन्द्र शाह से विवाह के बाद उनकी कर्मभूमि भोपाल ही रही। वह अपने हर काम में ‘परफेक्शन’ को पसंद करतीं थीं, यहाँ तक कि विभिन्न दायित्यों के निर्वहन में भी। फलस्वरूप अन्य रचनाकारों के मुकाबले उनकी रचनाओं की संख्या कम ही रही। तमाम दायित्वों को सदैव पूर्णता के साथ ही निभाते हुए चलती रहीं और चलते-चलते 3 मई 2014 को इस दुनियांँ को ही छोड़कर चलीं गईं, हमेशा के लिए।
हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका ज्योत्स्ना मिलन स्त्रीवादी लेखन के बरक्स ‘मात्र लेखक’ होना पसंद करती हैं। उनका मानना है सबसे पहले तो लेखक लेखक होता है, स्त्री या पुरूष या कोई भी वादी-नारीवादी, जनवादी, प्रगतिवादी, रूपवादी, दलितवादी आदि जो कुछ भी होता है वह बाद में होता है। कोई भी लेखक जब लिखता है तो वह यह याद रख कर नहीं लिखता कि मैं अमुकवादी हूं इसलिए मुझे इन इन चीज़ों के बारे में लिखना चाहिए और इस तरह से लिखना चाहिए। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं कवि शमशेर बहादुर सिंह। उनकी श्रेष्ठ कविताओं में उनकी विचारधारा या वाद का कोई अंतःसाक्ष्य नहीं मिलता। किसी भी रचना का रचना की कसौटी पर रचना के तौर पर खरा उतरना ज़रूरी है।इस अर्थ में किसी भी लेखन को लेखन और किसी भी लेखक को लेखक होना चाहिए स्त्री या पुरूष नहीं। यह नहीं कि स्त्री-पुरूष के लेखन में फर्क नहीं होता। चीज़ों को देखने का स्त्री का नज़रिया अलग होता है, उसके लेखन में इन्ट्यूशन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।बुद्धितत्व भी अक्सर इन्ट्यूशन के माध्यम से सक्रिय होता है।स्त्री – पुरुष के जटिल संबंध के बीहड़ में उतरने वाली ज्योत्स्ना मिलन की की कहानियां ” बा”,” धड़ बिना चेहरे का”, और संभावित रुकना – – पढ़ने लायक हैं।
उनका मानना है कि स्त्रीवाद जैसी किसी चीज़ का अस्तित्व इस धरती पर है या नहीं, इसका कोई संबंध लेखन से है या नहीं, मालूम नहीं लेकिन इससे उनके लेखन में क्या छूटा क्या कमी रही, पता नहीं। बचपन से ही ज्योत्स्ना को घर में साहित्य का वातावरण मिला था, घर में तमाम तरह की पत्र-पत्रिकाएँ आती थीं, बापूजी के छोटे से पुस्तकालय में हिंदी, अंग्रेज़ी, बंगला की कई सारी पुस्तकें थीं। वैसे तो सभी लेखकों के यहाँ किताबों का भंडार होता है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि सभी रचनाकारों के बच्चे इसी वजह से लेखक बनते हों। यह ठीक है कि घर में अपने आसपास इन सब चीज़ों का होना और साहित्यिक वातावरण का मिलना भी एक अहम् तत्व है लेकिन उतना ही पर्याप्त नहीं है।
उनका मानना है कि उनका जन्म वीरेंद्रकुमार जैन के घर यों ही तो नहीं हुआ है। मुझे शब्द का वरदान मिला हुआ था. क्या वह वीरेंद्रकुमार जैन की देन थी या मेरी अपनी कमाई? या ऊर्जा का खेल भर था, पता नहीं.
उनके मुताबिक शब्द की कला से ऊपर कुछ भी नहीं हो सकता ध्वनि का, अर्थ का, दृश्य का, खेल का सब कुछ का मज़ा एक साथ! स्त्री होने का अनुभव एक गहरा और संपूर्ण अनुभव मानती हैं, चाहे स्त्री का जीवन जितनी भी जहालतों से, ज़्यादतियों से घिरा क्यों न हो! स्त्री स्वयं प्रकृति है, इसलिए सृजन उसका स्वभाव धर्म है और उसका जीवन एक रचनारत जीवन है।
सामाजिक अन्याय और अत्याचार को लेकर वे उत्तेजित हो जाती थीं लेकिन ख़ुद अपने लिए कुछ हासिल करने की तमन्ना या कुछ न मिल पाने का शिकवा उनके स्वभाव का हिस्सा कभी नहीं रहा।
उनकी शख़्सियत की एक बेहद ख़ूबसूरत बात यह थी कि उम्र के सालों की गिनती उनके संदर्भ में बेहद बेमानी थी. हिंदी सहित्य के विराट रूप लेखक सचिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय या फ़िर निर्मल वर्मा के साथ बैठे बैठना और या फिर नवीन सागर, उदयन वाजपेयी, राम कुमार तिवारी जैसे साहित्यिक, ज्योत्सना जी दोनों ही बार सिर्फ एक दोस्त नज़र आती थीं। न वे किसी से बड़ी थीं और न किसी से छोटी। छोटे से क़द की यह औरत हर वक़्त तेज़ कदमों से आगे बढ़कर हर फ़ासले को छोटा बना देती थीं। चेहरे पर जब चश्मा लगा होता तो अकेले होंठ मुस्कराकर एक ख़ुशनुमा अहसास से भर देते थे।
उनका घर अंदर से बहुत खुशनुमा और शांतिप्रिय था, वहाँ रिश्तों के बीच कोई फ़ासला न था. न मकानों का, और न हिजाबों का. उस एक घर के दरवाज़े के पीछे चार लोग होते थे – रमेश चन्द्र शाह, ज्योत्सना जी, शम्पा और राजुला.
इनके परिवार की यह एक ख़ूबी रही है कि राजनैतिक और सामाजिक मसलों पर सहमति और असहमति पर एक दूसरे से खुलकर बात कर लेते मगर न कभी आवाज़ें ऊँची होतीं और न किसी चेहरे पर तनाव रह जाता।
शाह साहब और ज्योत्सना जी के बीच ही नहीं बल्कि दोनों बेटियों के बीच भी एक अद्भुत सामंजस्य हमेशा बना रहा। इस सामंजस्य की तुला को हमेशा ज्योत्सना जी ही थामे हुए लगती थीं।
ज्योत्सना मिलन की रचनाओं से – – –
संस्मरण– “है अभी कुछ और अज्ञेय” में अज्ञेय जी के विषय में व्यक्तिगत रूप से कुछ बातें जानना हो तो यह संस्मरण बहुत ही रुचिकर और प्रेरणादायक है। संस्मरण की कुछ पंक्तियां – – – –
“अज्ञेय जी मानसिक थकान को उतारने के लिए वे कई तरह के शारीरिक काम करना पसंद करते – – जैसे मिट्टी की या चीनी मिट्टी की चीजें बनाते (पॉटरी) करते , जूते बनाते, बुनाई करते, बागवानी करते, फोटोग्राफी करते, अपने और इला के कपड़े डिजाइन करते, पकवान सहित सादा खाना भी कभी-कभी बनाते। ”
कहानी – -” ऊपर से यह भी” की कुछ पंक्तियां –
” मैं उसे जानने लगी तब से यह पहला मौका था जब चुप्पी हमारे बीच आकर हनुमान जी की पूँछ की तरह बैठ गई थी कि हटा दो जिससे बने। वह हिलने का नाम नहीं ले रही थी। हालाँकि एक दूसरे को जानने का अभी एक छोटा-सा दौर ही गुजरा था हमारे बीच। बल्कि तो दौर कहलाने लंबा भी वह नहीं था। मुश्किल से दो – तीन दिन लंबा दौर। ”
कविता – -” औरत” की कुछ पंक्तियाँ – –
‘प्यार के क्षणों में
कभी-कभी
ईश्वर की तरह लगता है मर्द औरत को
ईश्वर – – ईश्वर की पुकार से
दहकने लगता है उसका समूचा वजूद
अचानक कहता है मर्द
देखो मैं ईश्वर हूँ
और औरत देखती है उसे
और ईश्वर को खो देने की पीड़ा को बिलबिलाकर
फेर लेती है – अपना मुँह’।
ज्योत्सना की हर रचना एक भिन्न कथ्य, शिल्प, भाषा और स्वरूप में दिखाई पड़ती है जो उनकी विशिष्टता है। अपनी इसी बेहतरीन इंसानी सिफ़त के साथ ही साथ या फिर इसी सिफ़त की बदौलत ही एक बेहतरीन लेखिका और बेहद दिलकश कवयित्री के तौर पर कामयाब रही हैं।
उनकी अनुपस्थिति में उनकी रचनाएँ साहित्य जगत को प्रेरित करती रहेंगी ।
डॉ. वसुंधरा मिश्र, कोलकाता
अन्याय के विरुद्ध अनवरत जारी रहेगा स्त्री का संघर्ष

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज अक्सर यह बात कही जाती है कि स्त्रियाँ निरंतर सशक्त हो रही हैं। उन्हें कमोबेश ही सही आजादी मिल रही है लेकिन आधुनिक भारत के आकाश में परचम की तरह फहराई जानेवाली इस तथाकथित आजादी के बावजूद स्त्रियों की स्थिति में कोई खास परिवर्तन होता नहीं दिखाई देता। जैसे ही स्त्रियाँ थोड़ी सी चैन की साँस लेने की सोचती हैं और अपनी आजादी की सीमा में हाथ- पैर पसार कर निश्चय करना चाहती हैं कि यह हकीकत ही है, स्वप्न नहीं, ठीक उसी समय देश में कोई ना कोई ऐसी घटना घट जाती है कि हम स्त्रियों को अपनी आजादी पर शक होने लगता है। और तब हमें ऐसा लगता है कि यह क्या, यह आज़ादी तो नकली है। अभी भी हमारे समाज के बहुसंख्यक लोग स्त्री की जगह घर की चारदीवारी के अंदर ही मानते हैं और जैसे ही वह घर से बाहर निकलकर अपने लिए कोई मक़ाम हासिल करना चाहती है, उसकी राह में रोड़े अटकाना शुरू कर देते हैं। पहले तो एक समय सारिणी तय कर दी जाती है, जिसका अनुपालन उसे करना होता है और उसका जरा सा उल्लंघन करने पर उसकी न केवल बुरी तरह आलोचना की जाती है बल्कि घर- समाज वाले उस को लांक्षित करने से भी नहीं चूकते। इन स्थितियों को देखते हुए अनायास एक प्रश्न मन में जन्म लेता है कि आखिर तमाम दावों के बावजूद स्त्री की स्थिति सुधरती नजर क्यों नहीं आती। क्यों समाज का बड़ा हिस्सा स्त्री को दोयम दरजे की नागरिक ही नहीं एक दासी से भी बदतर मानता है, जिसे जब चाहे तब लांक्षित, अपमानित या दंडित किया जा सकता है। वस्तुत: स्त्री के साथ -साथ समाज को जितनी तेजी से बदलना चाहिए था, वह बहुत कम बदला। मन में यौन कुंठा और रुढ़िवादी विचारों को छिपाए तथाकथित प्रगतिशील नागरिक स्त्री मुक्ति की बात और वकालत तो करते हैं लेकिन किसी न किसी मौके पर उनके अंदर का वनैला पशु अपने दाँत और नाखूनों से स्त्री की अस्मिता को घायल करने से बाज नहीं आता है। हालांकि हम शिक्षा के क्षेत्र में लगातार नई ऊंचाइयों को छूने की कोशिश में लगे हुए हैं, वह चाहे विज्ञान का क्षेत्र हो या तकनीक का, लेकिन सभ्यता के कई चरण पार करने के बावजूद, जंगलों और कंदराओं से निकलकर अंतरिक्ष में अपनी विजय पताका फहराने के बावजूद, हम अभी तक सही अर्थों में न सभ्य हो पाएं हैं न ही सजग और संवेदनशील नागरिक ही बन पाए हैं।
इसी सिलसिले में एक और बात जोड़ना चाहती हूँ कि हम अपने इतिहास और प्राचीन साहित्य से भी कुछ नहीं सीखते। बार -बार उन गलियारों से गुजरने के बावजूद उससे प्राप्त सीख की कोई पुख्ता छाप हमारे मन पर अगर नहीं पड़ती तो यह दोष हमारे मन में छिपकर बैठे, नाग की तरह फुंफकारते अहंकार का है, जिसके कारण शिक्षा के प्रकाश में नहाने के बावजूद हम मन में छिपे मैल से पीछा नहीं छुड़ा पाते। लॉकडाउन के कारण इन दिनों हमारे घर के छोटे पर्दे पर हमारे दो पौराणिक आख्यानों रामायण और महाभारत का पुनर्प्रसारण हो रहा है। मैंने पाया कि लोग बड़े भक्ति भाव से उस सुनी हुई कथा और हाल फिलहाल में देखें गये धारावाहिक को पुनः बड़े मनोयोग से तयशुदा समय पर देखते हैं। उन आख्यानों में घटित हुई अन्यायपू्र्ण घटनाओं की प्रत्यक्ष आलोचना करते हुए सत्य के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। अन्याय चाहे रावण का हो या कौरवों का उनके पक्ष में जनमत नहीं बनता। लोग रावण वध का समर्थन करते हैं और कौरव सेना के विनाश पर खुश होते हैं। साथ ही हर गलत बात की निंदा भी करते हैं, वह चाहे सीता की अग्निपरीक्षा हो या निष्कासन, द्रौपदी का दांव पर लगाया जाना हो या भरी सभा में किया गया, उसका चीरहरण जो सिद्ध करता है कि जब मनुष्य के अंदर का राक्षस जाग जाता है तो उसके लिए रिश्तों की मर्यादा भी कोई मायने नहीं रखती। इस प्रसंग में एक और बात कहना चाहूंगी कि रामायण और महाभारत की कथा में एक विशेष अंतर अवश्य दिखाई देता है कि त्रेता से द्वापर तक का सफर करते हुए समाज की नैतिकता और मूल्यों में कफी परिवर्तन आ गया था। रावण परस्त्री अर्थात सीता का हरण अवश्य करता है लेकिन उसका शीलभंग करने का प्रयत्न नहीं करता। यह बात और है कि इसके बावजूद सीता को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी। वहीं महाभारत में सामाजिक और पारिवारिक नैतिकता बहुधा खंड- खंड होती नजर आती है। वह चाहे दुर्योधन, दुशासन हों या जरासंध, सभी अपनी भाभी या सलहज पर न केवल कुदृष्टि डालते हैं बल्कि भरे समाज में उसकी मर्यादा का हनन करते हुए जरा भी लज्जित नहीं होते। और तब से लेकर आज तक हमारा समाज बहुत आगे बढ़ गया है, इसी कारण नैतिकता के बंधन और भी शिथिल हो चुके हैं, विशेषकर स्त्री के प्रति अनैतिक आचरण में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई हैं। हालांकि आज हम यह दावा करते नहीं अघाते कि भारत विश्वगुरु है लेकिन यह अहंकार पू्र्ण घोषणा करते हुए हम यह भूल जाते हैं कि गुरू बनने से पहले बहुत कुछ सीखना पड़ता है। पहले हम सही तरीके से आचरण करना तो सीख जाएं तब दूसरों को सिखाने का भरम पालने का जोखिम उठाएं। इसी संदर्भ में मैं पुनः उन पौराणिक आख्यानों की कथा याद दिलाते हुए कहूंगी कि हमने पढ़ा और देखा कि स्त्री के प्रति हुए अन्याय के कारण महाभारत जैसा युद्ध घटित हुआ जिसमें दोनों ही पक्षों ने बहुत कुछ खोया। लेकिन उससे भी हमने कुछ नहीं सीखा। हमारी सहानुभूति धारावाहिक देखते हुए भले ही द्रौपदी के साथ होती है लेकिन सभ्य समाज के ऐसे बहुत से शिक्षित पुरुष हैं जिनके अंदर छिपे दुर्योधन और दुशासन किसी सक्षम और सबल स्त्री को सामने चुनौती के रूप में खड़ी देखकर जाग जाते हैं और वे उसे उसी तरह अपमानित करते हैं जैसे हस्तिनापुर की भरी सभा में द्रौपदी को अपमानित किया गया था। तकलीफ इस बात की है कि आज भी भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे लोग चुप्पी साधे बैठे हुए हैं। निश्चित तौर पर यह चुप्पी शांति की द्योतक नहीं बल्कि कायरता और निर्लज्जता का प्रतीक है।
सखियों, आखिर कब तक स्त्रियों को यह अपमान झेलना होगा। आज राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है लेकिन इस लोकतंत्र में बहुधा उसी को न्याय मिलता है जो हर प्रकार से समर्थ हो। तो बाकी लोगों के पास क्या घुट- घुट कर जीने और रोते- रोते मर जाने का विकल्प ही बचता है। लेकिन इस विकल्प से न तो मनुष्य बचेगा ना मनुष्यता, न देश बचेगा ना सभ्यता। इसलिए हर किस्म के अन्याय के प्रति विरोध का बिगुल बजाने की जरूरत है, वह चाहे स्त्री के प्रति हो या किसी भी जाति, धर्म या देश के व्यक्ति के प्रति।
सखियों, जहाँ तक बात स्ती के प्रति होनेवाले अन्याय या अत्याचार की है तो मुझे लगता है कि स्त्रियों को इस तरह की घटनाओं के खिलाफ डटकर खड़ा होना चाहिए और तमाम स्त्रियों को उन जुझारू स्त्रियों की हिम्मत बढ़ानी चाहिए जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। तथाकथित सामाजिक मान- अपमान के सवाल को दरकिनार कर स्वाभिमान की लड़ाई लड़ना मुश्किल भले ही है लेकिन इस लड़ाई को स्थगित नहीं किया जा सकता। सखियों, स्त्री को अपनी इस लड़ाई को पूरे दम- खम के साथ जारी रखना होगा क्योंकि इसके अलावा हमारे सामने को रास्ता भी नहीं है। रंजना जायसवाल की कविता “संघर्ष” की इन पंक्तियों के साथ मैं आज अपनी बात समाप्त करती हूँ लेकिन यह उम्मीद करती हूँ कि हर अपमान और अन्याय के विरुद्ध स्त्री का संघर्ष अनवरत जारी रहेगा। स्त्री शक्ति न झुकेगी, न हारेगी बल्कि अन्याय के थपेडों का सामना अपनी अपराजेय जिजीविषा शक्ति के साथ करेगी।
“समुद्र की लहरें
बहा ले जाना चाहती हैं
अपने साथ
मेरा अस्तित्व
और मैं
अटल खड़ी
समेट लेना चाहती हूँ
पूरे समुद्र को
अपने भीतर।”




