Thursday, October 29, 2026
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समीक्षा : आत्मकथात्मक शैली में प्रेम की संवेदनशील गाथा है ‘अंत में बारिश’

डॉ. वसुंधरा मिश्र

‘अंत में बारिश’ उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में प्रेम और विवाह के बीच होने वाली विभिन्न घटनाओं और सूत्रों को जोड़ने वाली बहुत ही संवेदनशील कथा है। एक ऐसे प्रेमी नायक की कहानी जिसकी उम्र उनतीस वर्ष की और प्रेमिका नायिका की उम्र मात्र पंद्रह वर्ष की है यानि विवाह के लिए नाबालिग है। उम्र, जाति, नैतिक, अनैतिक वैचारिक द्वंद्वों के जद्दोजहद को पार कर विवाह और फिर अंत तक का सफ़र इस उपन्यास को नया और सकारात्मक आयाम देता है। सभी घटनाएँ पत्र शैली और डायरी शैली में उजागर होती हैं। घटनाक्रम फ्लैशबैक में क्रमशः आइने की तरह साफ होता जाता है। साठ के दशक में प्रेम होना और उसकी अभिव्यक्ति करना लड़के और लड़कियों दोनों के लिए तनावपूर्ण स्थितियाँ बयां करने वाली रही हैं। प्रेम की परिभाषा पीड़ा से होकर अपना आकार लेती है। कभी प्रेमी सफल तो कभी असफल। वैसे तो इस उपन्यास में प्रेमी अपने दृढ़ प्रेम और प्रेमिका अपनी समझदारी के कारण परिणाम अर्थात विवाह तक पहुंँचते हैं।
‘अंत में बारिश’ शीर्षक अपने आप में व्यक्त करने में सक्षम है। उपन्यास की लेखिका ने यह बात ‘ प्रतिशब्द’ में स्वीकार करते हुए लिखा है कि उपन्यास के आरंभ में वर्षा की गति सुहावनी और तरल’ रिमझिम होती है और अंत में घनघोर वर्षा होती है। इस बीच कई ऋतुएँ आती-जाती रहती हैं। अंतिम बारिश में नायक की पलकें भींगती चली जाती हैं।और कथा समाप्त होती है।’ (प्रतिशब्द)
जीवन यात्रा में आई बारिश की निरंतरता इसी बात का संकेत है कि विभिन्न ऋतुओं की तरह हमारा जीवन भी कई उतार चढ़ाव से गुजरता है और हम सुख- दुख, मान – अपमान, लाभ- हानि आदि के तराजू में तुलते हुए जीवन को जीते चले जाते हैं। यही जीवन दर्शन है। प्रेम की परिणति और फिर गृहस्थ जीवन तक के विभिन्न रंगों के चित्रों को दर्शाता है ये उपन्यास। प्रमुखता से नायक-नायिका ही इस कथा के केन्द्रीय पात्र हैं।
पत्र लेखन हमारी सांस्कृतिक विरासत है। वर्तमान समय में अब वाट्सप, फेसबुक और सोशल मीडिया आदि के कारण पत्र लेखन की वैसी परंपरा समाप्तप्राय है।
लेखिका का यह पहला उपन्यास है। लेखिका चाहती है कि पत्रों के लेखन में व्यक्ति के मन की बात अधिक संवेदनशील होती है। और प्रेम पत्र तो हृदय में ही समाहित होनेवाले होते हैं। प्रेम से लिखे एक एक शब्द मानो उसके अपनेपन का अहसास कराते हैं। पत्र शैली को इस उपन्यास में आधार बनाकर कथा को क्रमशः बढ़ाया गया है।
डॉ. मुक्ता ने उपन्यास की भूमिका ‘प्रेम के ताने-बाने में बुना मनोरम उपन्यास’ में प्रेम को संबोधित करते हुए लिखा है – ‘प्रेम के बीच रिश्तों के जुड़ने में टकराव और संघर्ष की स्थितियाँ बनती हैं। मूल में प्रेम है। मैं अपना कथन प्रेम के संदर्भ से ही शुरु कर रही हूँ। प्रेम का कोई वायवीय धरातल है या वह शक्ति जो बरबस ही हमें यात्रा में सहभागी बना देता है। प्रेम बाह्य संबंधों को लेकर नहीं वरन् उसकी अंतरंगता को लेकर निश्चित किया जाता है। ‘
मेरे विचार से उपन्यास’ अंत में बारिश’ में प्रेम की एक नई परिभाषा गढ़ी गई है। आज जहाँ विवाह टूटने के कगार पर है, प्रेमी प्रेमिकाएंँ वाट्सप की डीपी देखकर और सोशल मीडिया पर प्रेम का इजहार कर रहे हैं और वहीं ब्रेकअप जैसी घटनाएँ भी लगातार घटित होती जा रही हैं। ऐसे में प्रेम को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। लेखिका ने प्रेम के विशुद्ध रूप को कहीं भी अमर्यादित नहीं होने दिया है। वरन् वह नायिका और नायक की नैतिक जिम्मेदारी को बड़े ही अंतरंगता के साथ प्रेम को स्थापित करती है जहाँ ईमानदारी और विश्वास का दृढ़ संकल्प है।
आसमान में घने काले बादल एक छोर से दूसरे छोर तक ऐसे छाये थे मानों वे अभी अवनि तल पर उतर आयेगें। ऐसी जोरदार घनी बरसात के मौसम में प्रोफेसर संजय के मन मस्तिष्क में फ्लेश बैक की घटनाओं के साथ जया का पहली बार बारिश में रिक्शे पर आना जिसमें प्लास्टिक का पर्दा लगा होता है। संजय को याद आता है कि वह भीगते हुए उससे मिलने आई थी। संजय एमबीबीएस के प्रोफेसर है और अपने अड़ोस पड़ोस में प्रसिद्ध होने के कारण जया से मिलने नहीं जा सकता था।
जया एक मासूम, नाजुक, दुबली – पतली, छरहरे बदन की, घुँघराले बालों वाली साँवलें रंग की अत्यंत खूबसूरत लड़की थी। संजय स्वयं स्वीकार करता है कि जया से पहला परिचय पटना में लगभग आठ महीने पूर्व होता है। दो मकानों में से एक मकान में संजय किरायेदार थे। वहीं मकान-मालिक यमुना प्रसाद जी की लड़की प्रभा अंकल संजय से अपनी सहेली जया का परिचय कराती है। जया के पिता बिजली विभाग में अस्सिटेंट इंजिनियर के पद पर कार्यरत थे। प्रभा के पिता उसी विभाग में चीफ इंजीनियर थे। दोनों परिवारों के बीच एक पड़ोसी का रिश्ता था। संजय की बड़ी बहन विमला दीदी जो उम्र में काफी बड़ी थी, दोनों परिवारों और दोनों सहेलियों के बीच सेतु का काम करती थीं।
जया और संजय के बीच उम्र का काफी फ़ासला होने पर भी संजय जया के प्रेम में धीरे – धीरे डूबता चला जाता है जबकि जया इस बात से बेखबर थी। लेकिन जब उसे संजय की गहरी अनुरक्ति का पता चलता है जहांँ जीवन और मृत्यु के बीच की दिवार भी ढहाई जा सकती है ऐसे में जया भी कालांतर में उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। जया का प्रेम अद्भुत, सात्विक, दुराग्रहपूर्ण मानसिक और अंतर्मुखी था।
प्रथम 28 दिसम्बर 1957 जब संजय ने अपने मित्र राजीव को अपने एकतरफा प्रेम के बारे में बताया था । नायक अपने नितांत व्यक्तिगत संघर्षों को झेलते हुए विगत पांँच छह महीनों में जया के काफी करीब आ जाता है और बाकी एक वर्ष का समय पंख पर सवार हो ऐसे बीतता जैसे आंँधी से वृक्ष के पत्ते उड़ जाते हैं। (पृ.6)
डायरी में लिखे शब्दों से नायक की व्यथा, भावावेग और प्रेम के उत्कर्ष का पता चलता है। उपन्यास में डायरी में लिखी तारीख़ और सन् को इंगित किया गया है। जैसे
1 जनवरी सन् 1959 का नववर्ष जब संजय 29 वर्ष का होता है। जया की रेशमी फ्राक और उसका गुलाबी गुलाब की पंखुरी की तरह मासूम और आकर्षक लगना उसकी उम्र को दर्शाता है। कभी नीले लंबे कोट और इंद्रधनुषी मफलर और अपेक्षाकृत अनसँवरे बालों में पहाड़ी लड़की सी लगती। जया भी उसकी तरफ अनायास ही आकर्षित होती चली गई। जया के पिता से दोनों के विवाह की बात करना और संजय का आश्वासन देना कि मैं आपकी लड़की को खुश रक्खूंँगा। ये सब कहने की हिम्मत वह नहीं जुटा सका। (पृ. 8)
4 जनवरी की शाम का वर्णन संजय अपनी डायरी में करता है। जया उससे 100 गज की ही दूरी पर रहती है लेकिन रिक्शे से आती है क्योंकि उसके पिता को उस पर शक है और वह नहीं चाहती कि उसके चरित्र पर कोई आक्षेप लगाए। वह अपने प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर सकती है लेकिन पिता उसके प्रेमी का अपमान करे, नहीं सह सकती। छिप कर आना, अपनी व्यथा को बांँटना, नाराज और फिर खुश होना, खीझना, डांँटना, कॉलेज न जाना, शरीर और मन के बीच लक्ष्मण रेखा खींचना, पीड़ित होना और पीड़ित करना आदि बहुत से सुंदर चित्र हैं जो जया के प्रेम को उदात्त रूप प्रदान करते हैं। प्रेम में बहुत अधिक निकटता से वह चौंक जाती है। वह आतंकित हो उठती है उसे लगता है शरीर के स्पर्श मात्र से कुछ हो जाता है उसके दिमाग में भरा हुआ है। (पृ. 15)
इसी तरह 20.12.1960 के पत्र में संजय प्रिय जया को लिखता है कि तुम्हारे यहाँ अफवाह है कि “मैं एक गरीब आदमी हूँ। मेरे पास कुल दस बीघे खेत हैं कौन कहता है जी? मैं गरीब अवश्य हूँ पर इतना भी नहीं।” वह अपनी हैसियत का प्रमाण देता है। वह अपने प्रेम को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता। संजय पहले भी बंद कमरे में न जाने कितनी ही बार रो चुका है। जया को भूलना बहुत ही मुश्किल है।
संजय को पटना के मेडिकल कॉलेज में अस्थाई नियुक्ति हुई थी अब भगवान की कृपा से दरभंगा के मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हो गया। दो वर्ष का प्रोबेशन के बाद वहीं परमानेंट हो जाएगा। और जया भी चाहती थी कि वह पीएचडी करे। और यहीं से पत्रों का सिलसिला शुरु होता है।
संजय का पत्र ‘दुविधा, भविष्य के लिए कुछ संकल्प,’ दिनांक 5.02.1960, दिनांक 12.3.1960,भविष्य की योजना दिनांक 22.4.60, कुछ अंतराल के बाद, वही ऐतिहासिक जगह पटना – दिनांक 4.5.1960,फिर जया का एक संक्षिप्त पत्र, कुछ नोक झोंक, जया का पत्र संजय के नाम जिसमें जया की प्रेम वेदना मुखर हो उठती है – – वह लिखती है
भ्रमित हूँ आज मैं, है चतुर्दिक जो अँधेरा
बाँध लो नाँव मेरे ठाँव, न डरो कि छीन ले कोई पतवार
उस पर सवार हो हम चले जहांँ हो स्वर्णिम उजाला।
ले चलो तुम ज्योति मग में, धन्य हो मेरा सवेरा। ‘पृ 67
आदि कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है जिनमें संजय ने अपनी दादी बहन की बीमारी की बात लिखी है। संजय लिखता है कि’ हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढे़गे पृ69.’
नैराश्य भरे पत्र में संबोधन मेरी निराशा! से किया गया है। जया की माँ को भी पत्र लिखा है संजय ने जहांँ वह स्पष्ट लिखता है कि वह एक ईमानदार आदमी है, जिंदगी में अगर आवारागर्दी और मौज का खेल खेलना होता तो इतनी ठोकरें नहीं खानी पडतीं। पृ 73। बिना संबंध के जया के नाम क्या लिख दूंँ? यदि आप तैयार हों तो आप जहांँ कहें मैं चलकर अपना सब कुछ लिख देने को तैयार हूँ। पृ 74।
जया अपने निर्णय में लिखती है “मैं वहाँ तक आपका साथ दूंँगी जहाँ तक सत्य है, ईश्वर है, यह पृथ्वी है। क्या इससे भी अधिक प्रूफ की आवश्यकता है? – बहुत भावुक हो रही हूँ – बस आपकी जया। पृ 77
साथ ही प्रोफेसर संजय अपनी थीसिस के बाद की योजनाएं भी बनाता है और जया जो उसके जीवन की आधार है उसको आश्वस्त करता है कि जाति कुल की बातें करने वाला समाज पीड़ा ही देता है। वे ऊँचे कुल के राजपूत चंद्रवंशी या सूर्यवंशी की दुहाई देते हैं और बड़ी उम्र की।
21.9.1960 के इस पत्र में संजय ने जया को स्पष्ट लिखा है कि एक बार अंत में हमें किसी की खुशी, दम्भ, या झूठे अभिमान के लिए मरना नहीं है। हमें मारने वाले मार डालें तो ठीक है। दूसरी बात यह है कि यह लडाई संयोगवश पूरी की पूरी तुम्हारे हाथों में है। वे तुमसे ही हारेंगे। समय निरावधि है। हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढेंगे। ‘पृष्ठ 69
संजय जानता है कि जया और उसका विवाह समाज में मान्य नहीं है। फिर भी वह और जया अपने निर्णय पर अडिग हैं।
एक पत्र में जया को वह’ भोली बाल सखी ‘और’ बालिका वधू ‘से भी संबोधित किया है। संजय अपने को’ एक एडल्ट पुरुष’ मानते हैं।स्त्री ही अपमानित नहीं होती बल्कि पदस्थ, चर्चित, सम्मानित पुरुष को स्त्री से भी अधिक विवश किया जाता है।
5.12.1960 के पत्र से पता चलता है कि संजय की नियुक्ति फिर दरभंगा में एक वर्ष के प्रोवेशन पर हो गई है। जया हर हाल में उसका साथ ही देने का निर्णय करती है । अपना निर्णय देती है कि जहाँ सत्य है, ईश्वर है यह पृथ्वी है तब तक वह संजय की है। संजय पीएचडी भी पूरा कर लेना चाहता है।
जया उसे बराबर पत्रों में आश्वस्त करती है कि यदि वह आपकी नहीं होगी तो किसी की भी नहीं होगी, वह पलायनवादी संस्कृति की नहीं है, वह उसी ठाकुर अजीत सिंह की बेटी है जो अपने निश्चयों पर अड़े हुए हैं। वह पत्थर से टकरा सकती है। पर उन पत्थरों की चोट संजय को न लगे। पृ83। पत्रों में संजय अंत में लिखता है तुम्हारा केवल तुम्हीं में खोया हुआ।
पत्रों के सिलसिले चलते रहे। 4.4.1961 के पत्र के बाद से लगातार छ महीनों तक परिवार के रिश्तेदारों सगे-संबंधियों और कॉलेज के कुछ आत्मीय मित्रों ने मिलकर जया के पिता को मनाया। अन्ततः आकाश को धरित्रि पर झुकना ही पड़ा।जून 1961 में जया एडल्ट हो गई तब विवशतावश पिता ने धूमधाम से विवाह किया और विदाई हो गई।
यहाँ भी मर्यादा का पालन करते हुए घूंँघट में जया की विदाई होती है। संजय अपने गांँव सुदामापुर ले गए जो गाजीपुर से गंगा के पार ताड़ी घाट से 7-8 किलोमीटर दूर था। जया के चेहरे को देख संजय ने कहा दो वर्ष बाद मिली हो। ‘सिंदूर लिप्त मांग, ललाट पर बिंदी घूंँघट से अस्त व्यस्त होने के कारण काली घुँघराली लटें उसके चेहरे पर बिखरी हुई थीं और बनारसी साड़ी तथा आभूषणों से सुसज्जित उसका सौंदर्य अनिर्वचनीय था, मैं भाव विमुग्ध हो गया।’
गाँव में संजय और जया का विधि विधान से मंगल गीतों की गूँज के साथ पुश्तैनी मकान में स्वागत हुआ। दो तीन दिन बाद ही दरभंगा मेडिकल कॉलेज से संजय को कॉलेज ज्वाइन करना पड़ा जो दोनों के लिए बहुत ही कष्टप्रद रहा। बहन और भुआ के पास नई नवेली दुल्हन जया को छोड़कर जाना संजय को दुखी कर रहा था क्योंकि जया इस तरह के पिछड़े गाँव में कभी रही न थी। जया की पढाई के लिए भी संजय प्रयास कर रहा है।
फिर संजय के पत्रों से पता चलता है कि वह मकान की तलाश भी कर रहा है और शांतिनिकेतन की यात्रा के विषय में भी लिखता है। अब वह उसका पति है।
जया भी साइंस में केमेस्ट्री से एम एस सी किया। संजय का भी लखनऊ मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और वहीं गवर्नमेंट गर्ल्स डिग्री कॉलेज में जया भी प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हो गईं। दो पुत्र मन्नू और टुन्नू भी हुए। संघर्षों के दिन समाप्त हुए, में छह वर्षों तक लखनऊ में रहे।
संजय के पटना वाले पुराने मित्र राजीव रंजन भी आते हैं और 12 वर्ष के बीच कितना परिवर्तन हो गया इस पर दोनों बातचीत करते हुए खाना भी खाते हैं। राजीव हिन्दी के प्रोफेसर हैं लेकिन कुंवारे हैं। संजय अपनी रिसर्च स्कॉलर जो हार्ट पर रिसर्च कर रही है, उससे परिचय कराते हैं।हँसी मजाक में समय कट जाता है।
संजय की शादी के 15 वर्ष बीत गए। जया भी घर की जिम्मेदारी निभाते हुए खुश है और चाहती है कि संजय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में वैंकुवर जाए और अपना शोध पत्र पढ़ें । 25 सितंबर 1978 में कनाडा जाते हैं जब तक संजय चार बच्चों के पिता बन चुके थे। ये सब सपने पूरे हो रहे थे लेकिन जया संजय का विछोह सहन नहीं कर पाती थी और जार बेजार रोती रहती थी । सेंट पाल्स हॉस्पिटल में कॉन्फ्रेंस की सभी बातों को संजय ने जया को टेलिफ़ोन पर बताया। एक पत्नी की तरह उसने भी यही कहा कि किसी विदेशिनी से दिल मत लगाना। फिर तो संजय मैक्सिको में डेढ़ महीने रहे। फिर लंदन, न्यूयॉर्क आदि जगहों पर भी योग्यता के कारण जाना रहा। इसी बीच तबियत भी खराब हो जाती है। संजय उम्र के अंतिम पड़ाव की तरफ भी जा रहे थे लेकिन मन और मस्तिष्क की जिज्ञासाएं बराबर रहती थी। अपने फाइल में दबे जया को लिखी चिट्ठियों को भी पढ़ते जिसमें गाँव की पगडंडी से होते हुए शहर और विदेश यात्रा करने वाले एक व्यक्ति के प्रतिफल भोगे हुए क्षणों, मनोदशा और अपना देश, अपना शहर, अपना घर – परिवार के प्रति आकर्षण का यथार्थ चित्र भी ही जिन्हें मैं अपनी अपनी फाइल से प्रस्तुत कर रहा हूँ –
मेक्सिको प्रवास से जया को प्रेषित पत्र के विषय में संजय जया के करीब ही रहता। पृष्ठ 118।
विदेशों का वैभव पैसा रूपये सब देखने के बाद भी अमरीका यूरोप आदि से मन भर गया। बस अपने देश की ही याद आती रहती और अपने बच्चों को भी यही बताता कि गाँव की गरीबी पढ़ते समय देखी थी, यहाँ विदेश में आकर अमीरी देख ली। पृष्ठ 119। जया के बिना अब संजय एक पल भी कहीं नहीं रह पा रहे हैं। अपने 25 से उन्तीस पत्रों में मेक्सिको अमेरिका जापान आदि देशों के खान पान आदि विभिन्न विषयों पर भी उल्लेख किया है। मिस्टर सैमुएल, मिस जेसिका आदि के विषय में भी बातें लिखी। संजय विदेशों में भारतविद कहलाने लगे। योग और शरीर तंत्र पर विविध व्याख्यान देते रहे। फिल्म बनाने का निमंत्रण भी आने लगा। विदेश में बुखार, ब्लड प्रेशर, ब्लड सूगर आदि बीमारी भी हुई। सबसे बड़ी एक बात यह समझ में आई कि अध्ययन कर्म आदमी को कहाँ से कहाँ पहुंँचा देता है। पर देश की गरीबी और गंदगी के बावजूद संजय देश की मिट्टी को नहीं भूल आते। मिस्टर सैमुएल की सेवा, प्रभा ठकराल की सेवा, शशि की सेवा को संजय अविस्मरणीय बताते हैं जिन्होंने मेक्सिको में उनका ध्यान रखा। घटनाक्रम धीरे-धीरे जीवन के अंतिम पड़ाव तक आता है और संजय उन घटनाओं को सहेज कर अपने अंतर्मन में संजो कर रखता चला जाता है।

विदेश भ्रमण में बारह वर्ष बीत गए। जया भी 30 सितंबर 2003 में सेवानिवृत्त हो जाती है। संजय तो जया से 15 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। मन्नू टुन्नू और पम्मी ने जया के प्रथम सेवानिवृत्ति पूरी होने पर केक भी काटा। बड़े खुशी से जीवन बीत रहा था पर जया के सेवानिवृत्ति के दो वर्ष भी नहीं हुए थे कि एक दिन आधी रात को उसके पेट में असह्य दर्द होता है जो गॉलब्लेडर में पथरी के कारण हुआ था। ऑपरेशन भी होता है फिर भी पेट का दर्द ठीक नहीं होता। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। संजय स्वयं उसका ऑपरेशन कर न सके। अपने मित्र द्वारा करवाया। अॉपरेशन हुआ लेकिन गॉलब्लेडर के बगल की एक नस में एक अत्यंत सूक्ष्म छिद्र हो गया था और मामला गंभीर हो चला था। आईसीयू में ले जाया गया लेकिन जया तीसरे दिन चल बसी।
संजय ने अंतिम संस्कार किया। उसके जाने के पंद्रहवें दिन बाद भरे पूरे घर में संजय को अकेला पन काट रहा था वही शाम का वक्त बरामदे में बैठे हुए संजय को जया की वही छवि याद आ रही थी जब ऐसी ही घनघोर बरसात में विवाह के पूर्व प्लास्टिक का पर्दा लगे हुए रिक्शे में मिलने आती है। अगले ही पल जया की अंतिम यात्रा के समय की छवि संजय की पनियल आँखों में तैर जाती हैं।
उपन्यास अंत में बारिश में घटनाएँ तीन भागों में बँटी हैं। पहली विवाह के पहले प्रेम को पाने की पीड़ा दूसरी विवाह के लिए कई संघर्षों का सामना और तीसरा विवाहोपरांत विदेश जाने की आकांक्षा में घर से दूर रहना।
देखा जाए तो 1960 से लेकर 2003 तक के नायक और नायिका की प्रेम यात्रा को चिट्ठियों द्वारा एक सूत्र में बांधने की कोशिश की है। और अधिकतर चिट्ठियां संजय द्वारा लिखी गई हैं। पत्नी का कल्पित नाम जया है जिसे वह चिट्ठियों में प्रेम प्रदर्शित करने और अपने कार्योँ का ब्योरा देने के लिए लिखता रहता है। जबकि जया की ओर से जो लिखा गया वह बहुत कम है लेकिन महत्वपूर्ण है। उसका प्रेम सिर्फ समर्पण है। प्रेम की पीड़ा, हर्ष, अपनापन, उदासी आदि भावनाएंँ हृदय में आत्मसात करती हैं जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्रेम की प्राप्ति होने पर प्रिय के साथ दूरियांँ समाप्त हो जाती हैं। प्रेम से उम्र की संख्या भी कोई मायने नहीं रखती। प्रेम से हर दूरी घट जाती है। जया संजय मय हो जाती है। उसकी घुटन ऊब पीड़ा और पराजय का बोध भी ऊपर उठ कर ममता स्नेहिल भावों से परिपूर्ण हो जाता है। संजय कितनी ही विपरित स्थितियों से गुजरा लेकिन प्रिय जया के साथ उसमें नवीन उत्साह और आत्मविश्वास का संचार ही भरा रहा । यही मनुष्य को पौरूष प्रदान करता है और हर प्रकार की बाधाओं से जूझने की शक्ति देता है।
जीवन के अंतिम पड़ाव पर आकर भी जया की प्रेम बारिश संजय को प्रेमासिक्त करती रही। घनघोर बारिश के पानी ने संजय के आँसुओं धो डाला और नाती- पोतों से भरा- पूरा एक परिवार छोड़ जाती है जो दोनों के प्रेम की निशानियाँ हैं। जीवन और मृत्यु मानव जीवन के चरम सत्य है परंतु उनके बीच का फासला नियती नहीं स्वयं प्रिय का है, प्रेम यही आत्मविश्वास जगाता है। उमड़ते घुमड़ते इस बारिश में भी संजय को काले बादलों के बीच चमकती हुई बिजली की रोशनी में अपने बच्चों का हँसता मुस्कुराता चेहरा नजर आता है जो उसके बचे खुचे जीवन को आश्वस्त करता नजर आता है। संजय जया के प्रेम की कसक लिए सकारात्मक होने का निश्चय करता है जबकि वह सबके साथ रहते हुए भी अकेला ही है।
लेखिका भगवंती सिंह का यह प्रथम उपन्यास है जो उनके जीवन के सत्तर दशक का परिणाम है। हिंदी साहित्यकार और कबीर मर्मज्ञ पति डॉ शुकदेव सिंह के गुजर जाने के बाद वे उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में लगी हैं। उनका लिखा कथा साहित्य यथार्थ जीवन का चित्र है। उन्होंने जीवन के बहुमूल्य अनुभवों को बहुत ही सहज बहते हुए झरने की तरह एक एक शब्द मोतियों को पिरोया है। इस उपन्यास में ऐसा लगता है कि मानो लेखिका के निजी जीवन की कहानियों की लड़ियों का गुच्छा पत्रों के माध्यम से धीरे-धीरे खुल रहा हो।
भाषा शैली बहुत ही सहज, सरल और चरित्र के अनुरूप है। बिना किसी अनावश्यक प्रयास के स्वतः स्फूर्त शब्दों ने उपन्यास का रूप ले लिया। कई घटनाओं का विन्यास और उनकी कथा तारतम्यता में प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी और माँ- पिता सभी के किरदार अपनी-अपनी सामाजिक मर्यादा और उत्तरदायित्व के प्रति सचेत हैं। कहीं-कहीं उपन्यास की कसावट में आई खामियाँ खटकती हैं जो मूक ढंग से व्यक्त हो जाती हैं। विदेश जाने के दौरान लिखे पत्र कभी-कभी औपचारिकता निभाते हुए भी लगते हैं।
समाज के झूठे दंभ को बेनकाब करने वाला यह उपन्यास अपने परिवार, बड़े कहलाने वाले तथाकथित दादा, अहंकारी लोगों की कलई खोलने वाला है। दो प्रेम करने वालों को एक नहीं होने देने के लिए कई दलीलें देता यह समाज अपनी दकियानूसी सडे़ गले विचारों में जीने वाले समय के साथ किस तरह धराशायी और अवसरवादी हो जाते हैं यह भी इस पूरे उपन्यास की पर्तें खोलते पत्र महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। एक अकेला व्यक्ति समाज की खोखली दिवारों से कब तक सिर फोड़ता रहेगा। संजय का लिखना ‘जिन्हें शीशा समझकर हम टकरा गए वे पत्थर निकले। हमने सोचा था कुछ शीशा टूटेगा, सब कुछ हम जोड़ने की कोशिश करेंगे फिर जिंदगी सामने होगी। लेकिन हम टूट गए। पत्थर तो पत्थर ठहरा। – – – जो इतने भयानक और कठोर हैं अपने हों या पराये उनके प्रति कैसी श्रद्धा? कैसी ममता? पृ69।
लेखिका ने पुरुष की संवेदनशीलता को समाज के परिप्रेक्ष्य में देखा है जो समाज के मूल्यों, आचार विचार को एक नये एंगल से देखने का आईना प्रदान करता है। प्रेम का सूत्र अंत तक अपने दामन से जुड़ा रहता है।
बहुत कुछ छूट गया है। कुछ समझने का प्रयास किया है। अभी तो “अंत में बारिश” की गहराई में छिपी बहुत सी कहानियां हैं जिन्हें उजागर करना है।

भूखी रहती हैं घरों में अन्नपूर्णा, 51.4 फीसदी महिलाएं एनेमिया से पीड़ित

एक स्त्री पहले खाना नहीं खा सकती? वह खाना तभी खाएगी, जब घर के सारे सदस्य खास तौर पुरुष खा लें। चाहे उसे कितनी ही भूख क्यों न लगी हो। कई घरों में तो बच्चियां भी बाकी सदस्यों को खाना परोसती नजर आती हैं। यह हकीकत देश के ज्यादातर घरों की है।  हमारे देश में उनको अन्नपूर्णा का दर्जा दिया गया है। वे सबका पेट तो भरती हैं, मगर अक्सर खुद भूखी रह जाती हैं या फिर उन्हें ही पर्याप्त पौष्टिक खाना नहीं मिल पाता है जबकि, देश और दुनिया में बहुत सा खाना बर्बाद भी हो जाता है।

एनीमिया से पीड़ित सबसे ज्यादा 15-49 साल की महिलाएं
फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड, 2020 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 19 करोड़ लोगों को पौष्टिक खानपान नहीं मिल पाता है। यानी देश की 14 फीसदी आबादी को अच्छा खानपान नहीं मिल पा रहा है। वहीं, 15-49 साल की 51.4 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं, जो एनीमिक हैं, यानी खून की कमी से जूझ रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि इन महिलाओं को आयरन, कैल्शियम जैसे मिनरल्स वाला खानपान नहीं मिल पा रहा है।

दुनिया में 81 करोड़ आबादी सोती है भूखे पेट, इनमें 60 फीसदी महिलाएं
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के मुताबिक, दुनिया की करीब 81 करोड़ आबादी को भूखे पेट सोना पड़ता है या फिर इन्हें पर्याप्त खाना नहीं मिल पाता है। इनमें से करीबी 60 फीसदी तो महिलाएं ही हैं। दुनिया में 5 साल की उम्र के करीब 20 फीसदी बच्चों का वजन अपने उम्र के हिसाब से कम है।

एक तिहाई खाना हाे जाता है बर्बाद, इसमें 40 फीसदी फल-सब्जियां
यह एक त्रासदी है कि एक तरफ तो बड़ी आबादी को पर्याप्त खाना नहीं मिल पा रहा है, वहीं दूसरी ओर कड़वी हकीकत यह है कि दुनिया में हर साल कुल खाने का एक तिहाई बर्बाद हो जाता है। 40 फीसदी फल और सब्जियां, 30 फीसदी अनाज तो हर साल बाजार में सही वक्त पर नहीं पहुंच पाने से और सड़ने के चलते बर्बाद हो जाता है।

आयरन की कमी से जूझ रहीं महिलाएं, ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भी पिछड़ा देश
यूनाइटेड नेशंस की इस संंस्था की रिपोर्ट बताती है कि भारत जैसे विकासशील देशों में महिलाएं ज्यादा कुपोषित हैं। 15-49 साल की उम्र में जब उन्हें अच्छा खाना मिलना चाहिए तो वे मेंस्ट्रुएशन, खराब खानपान और बार-बार मां बनने की वजह आयरन की कमी से जूझ रही होती हैं। हाल ही में जारी हुई  ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2021 में भारत को 116 देशों में 101वां स्थान मिला है। 2021 की रैकिंग में भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से पीछे है।

बेहतर हो कि घर के पुरुष सदस्य दें ध्यान, साथ खाने की आदत डालें

देश में महिलाओं के खानपान को लेकर शुरू से ही जानकारियों का अभाव है। एक महिला को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा अच्छे खानपान की जरूरत होती है। वजह है, उनके शरीर में लगातार होने वाले हॉर्मोनल बदलाव और मेंस्ट्रुएशन। इससे उनमें खून की कमी हो जाती है। महिलाओं को ऐसा खाना दिया जाना चाहिए, जो आयरन, सोडियम, पोटैशियम और प्रोटीन से भरपूर हो। हालात यह है कि देश में आज भी खासकर गांवों में महिलाओं को बेहतर खानपान नहीं मिल पाता है। औरतें भरपेट खाना न होने की वजह से चौलाई के पत्तों की सब्जी खाती हैं या मांड पीती हैं। अक्सर देखा गया है कि घरों में महिलाएं सभी को खाना खिलाने के बाद ही खाती हैं। शहरों या गांवों में ज्यादातर घरों की महिलाएं सबको खिलाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही खाकर रह जाती हैं। बेहतर हो कि घर के पुरुष सदस्य इस पर ध्यान दें और साथ खाने की आदत डालें। इससे महिलाओं को एक तो पर्याप्त खाना मिलेगा और उनके खाने में पालक, पनीर, दूध, गोभी, आंवला जैसी पौष्टिक चीजों की उपलब्धता बनी रहेगी, जो उनके लिए जरूरी है।

संग्रामी सावरकर : तीनों भाई जेल गए तो महिलाओं ने सम्भाला परिवार

वीर सावरकर पर हमला हुआ तो लाठी लेकर खड़ी हुईं पत्नी

वीर सावरकर हमेशा से ही चर्चा में रहे हैं और उनके विरोधी विवाद खड़ा करते रहे हैं। आज हम बात वीर सावरकर भाइयों की करेंगे मगर विवाद की नहीं, बल्कि सावरकर परिवार की उन महिलाओं की जो उनकी प्रेरणा बनीं और स्वाधीनता संग्राम में उनकी ढाल भी बनीं।

savarkar.org के मुताबिक वीर सावरकर जब अंडमान की सेलुलर जेल में थे, तब उनकी पत्नी यमुनाबाई ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली। यमुनाबाई का साहस तब देखने को मिला, जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद भीड़ ने सावरकर को मारने के लिए उनके घर को घेर लिया। यमुनाबाई खुद लाठी लेकर भीड़ के सामने खड़ी हो गयीं। सावरकर गांधी की हत्या में आरोपी थे जिन्हें बाद में आरोप मुक्त कर दिया गया।

सावरकर महिलाओं की जिंदगी पर उपन्यास
सावरकर की जिंदगी पर छिड़ी बहस के बीच डॉ. शुभा साठे का उपन्यास ‘त्या तिघी’ चर्चा में आ गया है। इसमें उन्होंने सावरकर परिवार की तीन महिलाओं का जिक्र किया है। त्या तिघी उपन्यास के आधार पर नाटक तैयार करने वाली अपर्णा चोथे का कहना है कि यह उपन्यास स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के परिवार की महिलाओं पर आधारित है।

यमुनाबाई

सावरकर परिवार की महिलाओं की चर्चा नहीं होती
सावरकर भाइयों यानी गणेश, विनायक और नारायण सावरकर की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका की अब तक चर्चा होती रही है, लेकिन तीनों भाइयों की पत्नियों- यशोदाबाई, यमुनाबाई और शांताबाई सावरकर के बलिदान और संघर्ष को लेकर चर्चा देखने को नहीं मिलती है।

नाटक के जरिए उजागर की महिलाओं की भूमिका
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में अपर्णा चोथे ने कहा, ‘मुझे डॉ. शुभा साठे के उपन्यास ‘त्या तिघी’ के बारे में पता चला। इसमें तीनों सावरकर महिलाओं के संघर्ष और बलिदान की कहानी है। यह महत्वपूर्ण लग रहा था कि उनकी कहानी को बताया जाए। इसी इरादे से मैंने तीन सावरकर महिलाओं पर आधारित एक नाटक के मंचन का फैसला किया।’

पति को आजादी की लड़ाई में हर सहयोग दिया
अपर्णा कहती हैं, ‘कई लोगों के जीवन में संकट उनके भाग्य में होता है, लेकिन जो इन तीन महिलाओं को अलग बनाता है, वह है उनका जीवन जीने का तरीका। वो दुख, शोक, संकट और पीड़ा का जहर पीते हुए भी सोच में जीवंत थीं। उनकी देशभक्ति सच्ची थी। इन तीनों महिलाओं ने अपने पतियों से अलग होने की पीड़ा और भूख को सहने के बावजूद, स्वतंत्रता के लिए अपने पतियों के संघर्षों में साथ दिया। वे जानती थीं कि उनके पतियों ने देश की सेवा करने की शपथ ली है, इसलिए उन्होंने परिवार को संभाला, एक-दूसरे का साथ दिया। इस तरह आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई।’

सावरकर महिलाओं की कहानी कहता है त्या तिघी
अपर्णा बताती हैं, ‘त्या तिघी’ 80 मिनट का एक नाटक है। इसे मैंने तीन बहनों की भूमिका, उनके जीवन के उदाहरणों के आधार पर तैयार किया है। सबसे बड़े कपल यशोदाबाई और गणेश सावरकर ने खुद अशिक्षित होने के बावजूद अनाथ छोटे भाइयों की परवरिश की। उन्होंने विनायक को बैरिस्टर और नारायणराव को डॉक्टर बनने में मदद की। जब गणेश और विनायक सावरकर अंडमान की सेलुलर जेल में लाइफटाइम जेल की सजा काट रहे थे, तब उनकी पत्नियों को उनके घर पर लगातार पुलिस छापे के साथ रोजमर्रा की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि शांताबाई भी सबसे छोटे भाई नारायणराव से शादी करने के लिए तब भी तैयार हो गईं, जब उन्हें पता चला कि दोनों बड़े भाइयों को उनकी राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए जेल में डाल दिया गया है। इन महिलाओं का उनके रिश्तेदारों ने भी साथ नहीं दिया। फिर भी वे डटी रहीं।
कैसे हुई यमुनाबाई और सावरकर की शादी?
यमुनाबाई का जन्म 04 दिसंबर 1888 को हुआ था। वह रामचंद्र त्र्यंबक (भाउराव) और लक्ष्मीबाई (मनुताई) चिपलूनकर के चार बेटों और सात बेटियों में सबसे बड़ी थीं। उनका मायके का नाम यशोदा था, लेकिन उनके छोटे भाई-बहन उन्हें प्यार से ‘जीजी’ कहकर बुलाते थे। बाद में, उन्हें लोग ‘माई’ कहकर पुकारने लगे। भाऊराव चिपलूनकर ठाणे जिले के जवाहर रियासत में दीवान थे। यमुनाबाई का बचपन खुशनुमा बीता। हालांकि वह चौथी कक्षा तक ही पढ़ पाईं। भाऊराव को अपनी बेटी के लिए पति तलाश करने में मेहनत नहीं करनी पड़ी। असल में सावरकर और भाऊराव एक-दूसरे को जानते थे। यशोदा (सावरकर के बड़े भाई बाबाराव की पत्नी) और यमुनाबाई दोस्त थे। सावरकर से यमुनाबाई के पिता प्रभावित थे। यमुनाबाई के पिता ने सावरकर के मामा और बड़े भाई बाबाराव से अपनी बेटी की शादी की बात चलाई जिस पर सभी राजी थे, लेकिन सावरकर के मामा ने अपने भांजे की पढ़ाई की खर्च उठाने की भाऊराव के सामने शर्त रखी जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस तरह यमुनाबाई और विनायक सावरकर फरवरी 1901 में शादी के बंधन में बंध गए।

सावरकर नहीं करते थे पूजा, पर पत्नी को करने से नहीं रोका
​​​यमुनाबाई को उस समय लोग माई बुलाते थे। वह एक साधारण महिला थीं जो सावरकर का बहुत ख्याल रखती थीं। उन्होंने उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखा, यह सुनिश्चित किया कि सारवरकर के कपड़े दुरुस्त हों। वह जब भी मौका मिलता सावरकर के साथ समय बितातीं। वह एक धार्मिक महिला थीं। वह प्रतिदिन पूजा करती थीं। सावरकर स्वयं पूजा पाठ करने में विश्वास नहीं रखते थे, लेकिन कभी भी यमुनाबाई को पूजा करने से नहीं रोका।

(साभार – दैनिक भास्कर)

सिविल इंजीनियर ने बनायी पराली और राख से ईंटें

10 महीनों में ही मिले 3.5 करोड़ के ऑर्डर

रुड़की :   उत्तराखंड में रुड़की के रहने वाले तरुण जैमी पेशे से सिविल इंजीनियर हैं, लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के समय या उसके बाद, उन्होंने कभी नौकरी के बारे में नहीं सोचा। वो लगातार ऐसा काम करने के बारे में सोचते थे, जिससे न सिर्फ कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में बदलाव आए बल्कि उन्हें भी अच्छी कमाई हो। हुआ भी यही।

तरुण ने ग्रीनजैम्स नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया। इसके जरिए उन्होंने कृषि और फ्लाई ऐश (राख) से ईको-फ्रेंडली ईंटें बनाने का काम शुरू किया। ऐसी ईंटों को एग्रोक्रिट कहा जाता है। दिसंबर 2020 में इसकी शुरुआत और सिर्फ 10 महीनों में उनके स्टार्टअप को 3.5 करोड़ के ऑर्डर मिल चुके हैं।
31 साल के तरुण जैमी सिविल इंजीनियर हैं और फिलहाल सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ( सीएसआईआर – सीबीआरआर) से सिविल इंजीनियरिंग में पीएचडी कर रहे हैं। तरुण बताते हैं मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने ये तय किया था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वो कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में बदलाव लाएंगे और वो ऐसा कर भी रहे हैं।

तरुण बताते हैं ‘ग्रीनजैम्स’ स्टार्टअप का आइडिया दिल्ली की एक घटना से आया। “मैं 2019 में दिल्ली में ड्राइव कर रहा था। स्मॉग और पॉल्यूशन के कारण के कार के शीशे से बहार साफ दिखाई नहीं दे रहा था और इस वजह से मेरी कार लगभग दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। मैंने वापस आने के बाद दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण का कारण जानना चाहा। एक रिसर्च से पता चला कि हरियाणा और पंजाब में फसल की कटाई के बाद जलने वाली पराली दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता के लिए 44% तक जिम्मेदार है।

पराली यानी फसल काटने के बाद बचा बाकी हिस्सा होता है, जिसकी जड़ें धरती में होती हैं। अगली फसल बोने के लिए खेत खाली करना होता है, तो सूखी पराली को आग लगा दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में बहुत ज्यादा मात्रा में कार्बन निकलता है और पर्यावरण को नुकसान ​​​​होता है। कुछ महीनों की रिसर्च के बाद 2020 में तरुण ने अपने भाई और पिता के साथ मिलकर ‘ग्रीनजैम्स’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया, जिसका मकसद एग्रोक्रीट यानी ईको- फ्रेंडली बिल्डिंग मटेरियल तैयार करना है।

क्या होती है कार्बन नेगेटिव ईंट?

ईको फ्रेंडली या एग्रोक्रीट ईंट बनाने की लिए पराली का इस्तेमाल किया जाता है। तरुण बताते हैं, “हर सीजन में फसल काटने के बाद पराली बच जाती है। इसको हमारी टीम किसानों से खरीदती है। इसके छोटे-छोटे टुकड़े किये जाते हैं और गरम पानी में उबला जाता है। उबली हुई पराली को थर्मल पावर से निकलने वाली राख और बाइंडर  (जो सीमेंट की तरह ही काम करता है और ये इको फ्रेंडली होता है) के साथ मिलाकर कार्बन नेगेटिव या एग्रोक्रीट ईंटे तैयार करते हैं।” इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा पराली का इस्तेमाल होता है। इस स्टार्टअप की वजह से किसान पराली को जलाने के बजाय तरुण की कंपनी को बेच देते हैं। “अब तक हमने 20-25 किसानों के साथ टाई अप किया है, जो फसल काटने के बाद पराली जलाने के बजाय हमें बेच देते हैं। हर एक एकड़ पराली के लिए किसानों को तीन हजार रुपये दिए जाते हैं।” एग्रोक्रीट ईंट किसान और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है।

भट्ठे वाली ईंट से बेहतर
तरुण बताते हैं कार्बन नेगेटिव ईंटें बनाने से सबसे ज्यादा फायदा पर्यावरण को होता है। इन ईंटों को बनाने में पराली का इस्तेमाल होता है, जिसे पहले जला दिया जाता था और उसकी वजह से पर्यावरण में कार्बन की मात्रा और ज्यादा बढ़ती है।तरुण बताते हैं, “भट्ठे वाली ईंटों की तुलना में ये कार्बन निगेटिव ईंटें बहुत मजबूत होती हैं । ये ऐसी ईंटें हैं जिससे बनाने वाली बिल्डिंग गर्मी में न ज्यादा गरम होगी और न ही ठंड में ज्यादा ठंडी। भट्ठे वाली ईंट की तुलना में इसको बनाने में 50% कम लागत और 60% कम समय लगता है। कार्बन नेगेटिव ईंटों से बनाने वाली इमारत या मकान में सीमेंट का इस्तेमाल भी 60% तक कम होता है। ऐसे ही कई खूबियां के कारण ये भट्ठे वाली ईंटों से कहीं ज्यादा बेहतर हैं।” तरुण बताते हैं, “ ‘ग्रीनजैम्स’ में तकरीबन 10 स्थायी कर्मचारी हैं जो साल भर काम करेंगे। इसके अलावा हमें सीजनल एम्प्लॉई की भी जरूरत होती है, जो फसल काटने के समय काम करते हैं। हमारे स्टार्टअप से किसानों को भी रोजगार मिल रहा है। अब तक हमने 20-25 किसानों के साथ टाई-अप कर लिया है, जबकि तकरीबन 100 से अधिक किसानों से अगले सीजन में काम करने के लिए बात हो गयी है।” तरुण का कहना है कि आने वाले समय में कई लोगों को खास कर किसानों को इस काम से फायदा होगा।
(साभार – दैनिक भास्कर)

तुर्रम खान को लेकर कहावत तो सुनी है, आज उनको जान भी लीजिए

बड़ा तुर्रम खां बन रहा है.’ ‘ज्यादा तुर्रम खां मत बनो.’ ‘खुद को तुर्रम खां समझ रहा है.’ इस तरह के संवाद आपने अक्सर सुने होंगे. जब कोई हीरो या रंगबाज बनता है तो उसे तुर्रम खां बोल दिया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसके नाम पर इतने डायलॉग बन गए असल में वो कौन थे? चलिए आज जान लेते हैं –

असली नाम था तुर्रेबाज खान
तुर्रम खां का असली नाम तुर्रेबाज खाऩ था। तुर्रम खां कोई मामूली शख्स नहीं थे, बल्कि 1857 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई के क्रांतिकारी थे। मंगल पांडे ने बैरकपुर में जिस आजादी की लड़ाई की शुरुआत की थी, हैदराबाद में उसका नेतृत्व तुर्रम खां ने किया था।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में किया था हैदराबाद नेतृत्व
1857 के स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी मंगल पांडे ने बैरकपुर में फूंकी थी, यह चिंगारी जल्दी ही दानापुर, आरा , इलाहाबाद, मेरठ, दिल्ली , झांसी होते हुए पूरे भारत में आग की तरह फैल गयी। इसी क्रम में हैदराबाद में अंग्रेजों के एक जमादार चीदा खान ने सिपाहियों के साथ दिल्ली कूच करने से मना कर दिया। उसे निजाम के मंत्री ने धोखे से कैद कर अंग्रेजों को सौंप दिया जिन्होंने उसे रेजीडेंसी हाउस से कैद कर लिया गया। उसी को छुड़ाने के लिए जांबाज तुर्रम खां अंग्रेजों पर आक्रमण को तैयार हो गए। 17 जुलाई 1857 की रात की रात को तुर्रम खान ने 500 स्वंतंत्रता सेनानियों के साथ रेजीडेंसी हाउस पर हमला कर दिया।

रात में ही कर दिया अंग्रेजों पर हमला
तुर्रम खां ने रात को हमला इसलिए किया क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि रात के अचानक हमले से अंग्रेज हैरान रह जाएंगे और उन्हें फतेह हासिल होगी लेकिन उनकी इस उम्मीद और योजना एक गद्दार ने विफल कर दिया। दरअसल, दरअसल निजाम के वजीर सालारजंग ने गद्दारी करते हुए अंग्रेजों को पहले ही सूचना दे दी थी। अंग्रेज पूरी तरह से तुर्रम खां के हमले के लिए तैयार थे। उनके तोप गोलों से भरकर तैनात थे और हजारों सिपाही बंदूक भर कर तुर्रम खां और उसके साथियों का ही इंतजार कर रहे थे।

नहीं आए अंग्रेजों की गिरफ्त में
अंग्रेजों के पास बंदूकें और तोपें थीं, जबकि तुर्रम खां और उनके साथियों के पास केवल तलवारें थीं। इसके बावजूद तुर्रम खां ने हार नहीं मानी. तुर्रम खान और उसके साथी अंग्रेजों पर टूट पड़े। तुर्रम की तलवार अंग्रेजों के तोप और बंदूक पर भारी पड़ने लगी लेकिन अंग्रेज संख्या बल और हथियारों में ज्यादा थे। तुर्रम खां और उनके साथी पूरी रात अंग्रेजों का मुकाबला करते रहे। अंग्रेजों की भरपूर कोशिश के बाद भी वे तुर्रम खां को पकड़ नहीं पाए।

धोखे से की हत्या
उस युद्ध के बाद अंग्रेजों ने तुर्रम खां के ऊपर 5000 रुपये का इनाम रख दिया। कुछ दिनों बाद एक गद्दार तालुकदार मिर्जा कुर्बान अली बेग ने तूपरण के जंगलों में धोखे से तुर्रम खान को मार गया।  तुर्रम खां की बहदुरी के चलते लोग आज भी उन्हें याद करते हैं।

(साभार – जी न्यूज)

जैविक खेती में 1.5 लाख रुपये लगाकर 50 करोड़ कमाते हैं योगेश

नयी दिल्ली : बदलते वक्त के साथ खेती-किसानी के क्षेत्रों में भी आधुनिक तकनीक एवं पद्धति की जरूरत महसूस हो रही है। इन्हीं बदलाव पर अमल करते हुए राजस्थान के जालोर के योगेश जोशी ने किसानों को मदद करने का बीड़ा उठाया था। आज योगेश अपने 50 करोड़ रुपये के ऑर्गेनिक खेती व्यवसाय के ज़रिये हजारों किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में काम कर रहे हैं। 1.5 लाख रुपये के निवेश से शुरू हुई योगेश की कंपनी अब 50 से अधिक स्टाफ की मदद से 50 करोड़ से भी ज्यादा का कारोबार कर रही है।
कृषि विज्ञान में अपनी डिग्री पूरी करने के बाद योगेश जोशी ने जैविक खेती में डिप्लोमा के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की। साल 2006 में 8000 रुपये महीने की नौकरी के साथ योगेश ने अपने करियर की शुरुआत की। करीब चार साल तक काम करने के बावजूद योगेश का वेतन केवल 12,000 रुपये महीने पर ही पहुंच पाया, इससे योगेश निराश हो गए और साल 2010 में उन्होंने नौकरी छोड़ जैविक खेती का व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया।
योगेश ने बताया कि जैविक खेती शुरू करने के पीछे उनका मकसद लोगों को मधुमेह, कैंसर जैसी बीमारियों से सुरक्षा दिलाना भी है। पश्चिमी देशों में लोग पहले ही जैविक फल-सब्जियों का सेवन कर रहे हैं। भारत में इसका प्रचलन हाल ही में शुरू हुआ है, कोरोना महामारी के बाद शरीर की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के उद्देश्य से लोग जैविक भोजन पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
योगेश किसानों को बेहतर दाम देकर जैविक फल-सब्जियां खरीदते और फिर उन्हें बड़ी कंपनियों को बेचते जो महंगे भाव पर जैविक खाद्य पदार्थ खरीदना चाहती हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने सात किसानों के साथ मिलकर जीरे की जैविक खेती शुरू की। व्यावहारिक अनुभव की कमी के कारण योगेश ने खेत की मिट्टी में मिले रसायन को खत्म करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया और इस वजह से उनकी पहली फसल बेकार हो गई।

सही तरीका सीखा
तीन साल बाद योगेश ने किसानों के खेत को रसायन से पूरी तरह मुक्त करने में सफलता हासिल की। जोशी के पास ऑर्गेनिक खेती के प्रोजेक्ट में निवेश करने के लिए ज्यादा पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने दोस्तों की मदद ली और 1.5 लाख रुपये का निवेश करके काम शुरू किया।

10 साल में मिली कामयाबी
10 साल पहले शुरू हुई योगेश की एक छोटी शुरुआत बड़े संगठन का रूप ले चुकी है। योगेश की कंपनी रैपिड ऑर्गेनिक अब 3,000 से अधिक किसानों के साथ काम कर रही है। किसानों को बीज, प्रौद्योगिकी, जैविक उर्वरक और संपूर्ण सहायता प्रदान करती है। किसान जैविक उत्पाद उगाकर योगेश को देते हैं। वित्तीय समस्या से जूझ रहे किसानों को लोन भी मिलता है और फिर कंपनी उनसे उचित मूल्य पर फसल भी खरीदती है।

विदेश में जाती है उपज
योगेश ने अब तक 10,000 किसानों को जैविक खेती प्रमाणपत्र हासिल करने में भी मदद की है। योगेश की कंपनी किसानों से 2-3 हजार टन जैविक फसल खरीदती है और उन्हें भारत और विदेशों में बेचती है। योगेश के जैविक खाद्य पदार्थ की बिक्री जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और अन्य देश में होती है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

हालात सामान्य होने तक किसी भी ई-नीलामी से परहेज करेगी कोल इंडिया 

नयी दिल्ली : बिजली उत्पादन संयंत्रों में कोयले के कम भंडार के बीच सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया ने अपनी सहायक कंपनियों से हालात सामान्य होने तक बिजली क्षेत्र के लिए विशेष फॉरवर्ड ई-नीलामी को छोड़कर कोयले की किसी भी तरह की ई-नीलामी आयोजित करने से परहेज करने को कहा है।
गौरतलब है कि बिजली संकट की खबरों के मद्देनजर कोयले की आपूर्ति के लिए बिजली क्षेत्र को प्राथमिकता दी जा रही है। कोल इंडिया ने अपनी सहायक इकाइयों को भेजे एक पत्र में कहा, ‘‘बिजली घरों में भंडार की मौजूदा स्थिति को देखते हुए घटते स्टॉक को फिर से भरने के लिए बिजली क्षेत्र को कोयले की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा रही है। कोयला कंपनियों को सलाह दी जाती है कि बिजली क्षेत्र के लिए विशेष फॉरवर्ड ई-नीलामी को छोड़कर हालात सामान्य होने तक किसी भी ई-नीलामी से परहेज करें।’’
इन सहायक कंपनियों में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल), भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) और सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) शामिल हैं। पत्र में कहा गया कि यदि कोई कोयला कंपनी बिजली क्षेत्र को भेजे जाने वाले कोयले को प्रभावित किए बिना किसी अन्य क्षेत्र को ई-नीलामी करना चाहती है तो ऐसी किसी भी नीलामी की योजना से पहले उचित कारण के साथ कोल इंडिया पहले बताया जा सकता है।
कोल इंडिया ने कहा कि राष्ट्र के हित में यह केवल एक अस्थायी प्राथमिकता है और इसका आशय ई-नीलामी प्रारूप को रोकना नहीं है।

भवानी देवी ने फ्रांस में जीती तलवारबाजी स्पर्द्धा

नयी दिल्ली : ओलंपिक के लिये क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला तलवारबाज भवानी देवी ने फ्रांस में चार्लेलविले राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में महिला व्यक्तिगत साबरे वर्ग में खिताब जीता । भवानी ने इसके बारे में ट्वीट करके जानकारी दी ।
उन्होंने लिखा ,‘‘ फ्रांस में चार्लेलविले राष्ट्रीय टूर्नामेंट में महिलाओं के साबरे व्यक्तिगत वर्ग में जीत दर्ज की । कोच क्रिस्टियन बाउर, अर्नाड श्नाइडेर और सभी साथियों को धन्यवाद । सत्र की अच्छी शुरूआत के लिये बधाई ।’’ तोक्यो में भवानी ने राउंड आफ 64 का मुकाबला जीता था लेकिन अगले दौर में हार गई थी । वह इस समय विश्व रैंकिंग में 50वें स्थान पर है और फिलहाल एशियाई खेल 2022 की तैयारी में जुटी है ।

श्रीलंका के पहले टेस्ट कप्तान बांदुला वर्णपुरा का निधन

कोलंबो : श्रीलंका के पहले टेस्ट कप्तान बांदुला वर्णपुरा का निधन हो गया। वह 68 बरस के थे। स्थानीय मीडिया की खबरों के अनुसार शरीर में शर्करा का स्तर काफी अधिक बढ़ने के चलते रक्त संचार में समस्या के कारण इसी महीने उनका दायां पैर काटना पड़ा था। ठोस तकनीक वाले सलामी बल्लेबाज वर्णपुरा मध्यम तेज गति की गेंदबाजी करने में भी सक्षम थे।
फरवरी 1982 में इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट में श्रीलंका की अगुआई करने के अलावा वह देश की ओर से टेस्ट क्रिकेट में पहली गेंद का सामना करने वाले और पहला रन बनाने वाले बल्लेबाज भी थे। इसी मैच में बल्लेबाजी और गेंदबाजी (दूसरी पारी में) दोनों में श्रीलंका के लिए आगाज करने का कारनामा भी उन्होंने किया। श्रीलंका क्रिकेट (एसएलसी) ने उनके निधन पर शोक जताया है।
वर्णपुरा ने 1975 से 1982 तक चार टेस्ट और 12 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में देश का प्रतिनिधित्व किया। वर्णपुरा ने हालांकि विद्रोही टीम के साथ 1982-83 में रंगभेद दौर में दक्षिण अफ्रीका का दौरा करने का फैसला किया था जिसके बाद श्रीलंका क्रिकेट ने उन पर आजीवन प्रतिबंध लगाया था। उन्होंने बाद में राष्ट्रीय टीम के कोच और श्रीलंका क्रिकेट में प्रशासक की भूमिका निभाई।

महिलाओं के लिए नये अवसर लाया वर्क फ्रॉम होम का चलन

‘वर्क फ्रॉम होम’ … कोरोना काल में यह नया शब्द हमारी बोलचाल का हिस्सा बना गया है। भले ही महामारी के चलते नौकरियों पर संकट छाया रहा, लेकिन चुनौतियों के साथ बहुत से अवसर भी आए हैं। इस दौरान जो नौकरियां उपलब्ध हुईं, उनमें महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है। ‘कॅरियर प्लेटफॉर्म जॉब्स फॉर हर’ की रिसर्च बताती हैं कि 2019 में महिलाओं को काम पर रखने वाली कंपनियों की संख्या 18% थी, वहीं ये आंकड़ा 2021 में 33% हो गया। इस शोध में यह बात भी सामने आई कि कंपनियां हर भूमिका के लिए महिला कर्मचारियों पर भरोसा जता रही हैं। उन्हें मैनेजमेंट से लेकर सीनियर लेवल तक की जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। करीब 300 कंपनियों पर किए गए इस सर्वे में यह भी पता चला कि जो महिलाएं पढ़ी-लिखी होने के बावजूद शादी के बाद अपने कॅरियर को छोड़ देती हैं उनके लिए वर्क फ्रॉम होम का कल्चर नया अवसर बनकर उभरा है।

कॅरियर को लेकर महिलाएं ज्यादा केन्द्रित
वॉशिंगटन में प्यू रिसर्च सेंटर की मानें तो युवा महिलाएं पुरुषों से ज्यादा कॅरियर पर ध्यान दे रही हैं। महिलाओं के लिए सफल कॅरियर ही पहली प्राथमिकता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि वे अपने कॅरियर के अलावा परिवार की जरूरतों के बारे में नहीं सोचती हैं। आधुनिक दौर की महिलाएं अपनी इस पारंपरिक छवि को भी बनाए रखती हैं। वे परिवार और करियर, दोनों पर ही ध्यान देती हैं। इसी सर्वे में महिलाओं और पुरुषों दोनों ने माना कि वे शादी और पैरेंटिंग को भी जीवन की महत्वपूर्ण चीजों में एक मानते हैं। पीडब्ल्यूसी की खोज के अनुसार कोरोनाकाल में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं अपने करियर की संभावनाओं के बारे में ज्यादा अलर्ट रही हैं।

फिर वेतन कम क्यों?
देश में जेंडर पे गैप पर लंबे समय से बहस चल रही है। ए जर्नल ऑफ इकोनॉमी एंड सोसाइटी में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि आमतौर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम कमाती हैं। वेतन को लेकर बात करने में महिलाएं काफी पीछे हैं इसलिए उनकी तनख्वाह कम होती है। महिलाओं की प्रोमोशन और वेतन की मांग की बात को भी अनसुना किया जाता है। वहीं, द जेंडर नेचर ऑफ ऑथरशिप के अनुसार अकादमिक और शोध के काम का श्रेय महिलाओं को उनके पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले में कम मिलता है।

क्या महिलाओं के लिए तनाव बन रहा गर्भधारण करना?
फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि ज्यादातर कामकाजी महिलाओं को लगता है कि प्रेग्नेंट होने से उनकी जॉब को खतरा हो सकता है या फिर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जा सकता है। वहीं, इस मामले में पिता बनने वाले पुरुषों को कार्यस्थल पर ज्यादा बढ़ावा मिलता है।

फर्जी नौकरियों के प्रलोभन से रहें दूर
अधिकतर महिलाएं इंटरनेट सर्फिंग के दौरान कई बेहतर नौकरियाँ देखती हैं। कई बार फोन कॉल्स भी आते हैं, लेकिन इसमें बहुत सी फर्जी होती हैं। ऐसे में अलर्ट रहना जरुरी है, क्योंकि गोपनीय सूचनाओं का फायदा उठाकर कोई भी ब्लैकमेल कर सकता हैं। इस स्थिति से बचने के लिए कंपनी के बारे में अच्छी तरह से रिसर्च करना जरुरी है।

इन क्षेत्रों में भविष्य संवार सकती हैं महिलाएं

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