Saturday, July 4, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 350

रेलवे प्लेटफॉर्म पर बनायी पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम की 7.8 फीट ऊँची प्रतिमा

नट, बोल्ट, धातु की रस्सी और डैम्पर का किया गया इस्तमाल

बंगलुरू : कर्नाटक में यशवंतपुर रेलवे डिपो ने मिसाइल मैन और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम की स्मृति को बड़ी खूबसूरती से जीवन्त किया गया। दरअसल यशवंतपुर रेलवे स्टेशन के छह साइड के प्लेटफॉर्म पर रेलवे ट्रैक के किनारे स्थापित पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की सोने से लदी प्रतिमा सभी को लुभा रही है और रेलवे कर्मियों की के लिए प्रेरणा भी बन गयी है। यशवंतपुर कोचिंग डिपो के मेकेनिकल विभाग के इंजीनियरों ने 800 किलोग्राम स्क्रैप पर 45 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद यह प्रतिमा बनायी। इस प्रतिमा को रेलवे मंत्रालय के ट्विटर हैंडल पर शेयर किया गया। मिनिस्ट्री ऑफ रेलवे के ट्विटर हैंडल ने इसे ट्वीट कर लिखा ‘मिसाइल मैन को एक सृजनात्मक श्रद्धांजलि’.
मालूम हो कि पटरियों के पास एक विशेष रूप से बनाए गए प्लेटफॉर्म पर, एयरोस्पेस वैज्ञानिक की 7.8 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा बनाई गयी है।

इस मूर्ति को यशवंतपुर से जाने वाली ट्रेनों के यात्री देखा सकते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार इस रेलवे स्टेशन से विस्टाडोम कोच और दुरंतो और संपर्क क्रांति ट्रेनों सहित दैनिक आधार पर औसतन 200 ट्रेने गुजरती है। वरिष्ठ कोचिंग डिपो अधिकारी, विकास गुरवानी ने कहा कि “डॉ. कलाम की इस प्रतिमा को मैसूर वर्कशॉप से ​​लाए गए नट, बोल्ट, धातु की रस्सी और डैम्पर को जोड़कर बनाया गया है। उन्होंने बताया कि इसे बनाने वाले मेकेनिकल डिपार्टमेंट के इंजीनियरों ने सबसे पहले एक मिट्टी का मॉडल तैयार किया था और एक प्लास्टिक ऑफ पेरिस का सांचा बनाया गया था। जिसके आधार पर इन्होंने नट, वोल्ट और धातुओं को मोल्ड कर प्रतिमा का रूप दिया।’

नहीं रहीं 105 साल की उम्र में साक्षरता परीक्षा पास करने वाली भगीरथी अम्मा

नारी शक्ति पुरस्कार से थी सम्मानित

तिरुअनंतपुरम : केरल में 2019 में साक्षरता परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली सबसे बुजुर्ग महिला भगीरथी अम्मा का निधन 107 वर्ष की उम्र में गुरुवार को हो गया। भगीरथी अम्मा के परिवार के लोगों ने शुक्रवार को उनके निधन की जानकारी दी। परिजनों के मुताबिक भगीरथी अम्मा लंबे समय से अस्वस्थ चल रही थी और उन्होंने गुरुवार देर रात अपने घर पर ही अंतिम सांस ली। उन्हें केंद्र सरकार की ओर से प्रतिष्ठित नारी शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। भगीरथी अम्मा ने 2019 में 105 वर्ष की उम्र में साक्षरता परीक्षा उत्तीर्ण की थी। भगीरथी अम्मा की इस उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनकी सराहना की थी।
कोल्लम जिले के प्रक्कुलम की रहने वालीं भगीरथी अम्मा ने 2019 में राज्य द्वारा संचालित केरल राज्य साक्षरता मिशन (केएसएलएम) की चौथी कक्षा की समकक्ष परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सबसे उम्रदराज छात्रा बनने का इतिहास रचा था। भगीरथी अम्मा राज्य साक्षरता मिशन द्वारा कोल्लम में आयोजित परीक्षा में शामिल हुई थीं और उन्होंने 275 में से 205 अंक प्राप्त कर कीर्तिमान स्थापित किया। गणित विषय में उन्हें पूरे अंक प्राप्त हुए थे।
बता दें कि, भगीरथी अम्मा को पारिवारिक परेशानियों के कारण नौ वर्ष की आयु में अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। पढ़ाई के प्रति उनके जुनून की प्रधानमंत्री मोदी ने भी प्रशंसा की थी। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए केंद्र सरकार की ओर से प्रतिष्ठित नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था

अखिल भारतीय वाद विवाद प्रतियोगिता संपन्न

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से पत्रकार राजकिशोर की स्मृति में अखिल भारतीय वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।इस प्रतियोगिता में देशभर से सौ से ज्यादा कॉलेज और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। दस राउंड तक चली इस प्रतियोगिता के फाइनल में अर्चना शेफाली (रांची विश्वविद्यालय), नुपूर श्रीवास्तव( बोंइची कॉलेज) ,सौरभ तिवारी (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय), महेश कुमार और सिद्धार्थ कुमार (दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय), प्रियंका गोप (विद्यासागर विश्वविद्यालय),आशुतोष राऊत (जयपुरिया कॉलेज), निशंक उपाध्याय ( जिंदल ग्लोबल लॉ कॉलेज), मनीष गुप्ता (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय),षैजू के. (कोचीन विश्वविद्यालय) ने ‘कोरोना महामारी में चिकित्सा सुविधाएं रहीं दुरुस्त’ विषय के पक्ष और विपक्ष में अपनी प्रस्तुति दी। पक्ष के लिए सर्वश्रेष्ठ वक्ता षैजू के और विपक्ष के लिए सर्वश्रेष्ठ वक्ता सौरभ तिवारी को चुना गया। स्वागत वक्तव्य डॉ मिश्र ने देते हुए सभी प्रतिभागियों की प्रशंसा की। इस अवसर पर राजकिशोर के जीवन और चिंतन पर वीडियो कोलाज का प्रसारण किया गया। बतौर निर्णायक डॉ शुभ्रा उपाध्याय ने कहा कि सभी प्रतिभागियों ने प्रभावी और तथ्यात्मक ढंग से अपना पक्ष रखा। डॉ. गीता दूबे ने कहा कि सभी प्रतिभागी संभावनाओं से भरे हैं।
डॉ. इतु सिंह ने कहा कि यह मंच प्रतिभागियों के बौद्धिक चिंतन और वैचारिक संवाद से समृद्ध हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि इन प्रतिभागियों को सुनते हुए लगा कि भारत की युवा पीढ़ी में अपने साहित्य और समाज की गहरी समझ है। वे सजग और सह्रदय हैं। भारत का भविष्य ऐसे नौजवानों के हाथों गढ़ा जाएगा। इस प्रतियोगिता के क्वालीफाई चक्र में मृत्युंजय श्रीवास्तव, मनोज झा,मंजू श्रीवास्तव, मनीषा गुप्ता, अरुण कुमार,आनंद गुप्ता, विकास साव,मिथिलेश कुमार मिश्रा,चंचल सिंह,नारायण साव आदि ने निर्णायक की भूमिका निभाई। कार्यक्रम का संचालन सौमित्र आनंद, उत्तम कुमार, मधु सिंह,राहुल गौड़ ने किया। धन्यवाद ज्ञापन संजय जायसवाल ने देते हुए कहा कि मिशन का यह मंच सृजन,संवाद और सांस्कृतिक सहयात्रा का मंच है।
कार्यक्रम को सफल बनाने में विकास जायसवाल,नागेंद्र पंडित, राहुल शर्मा,पूजा गुप्ता,सुशील पांडे, पूजा सिंह, सूर्यदेव राय,रूपेश कुमार यादव,ओमकुमार चौरसिया, नेहा चौबे,गायत्री बाल्मीकि, बीरूसिंह,मुकुंद शर्मा, विनोद यादव,विशाल साव,पंकज सिंह,प्रीति साव,साक्षी झा,निशा राजभर आदि ने अपना सहयोग दिया।

श्रावण विशेष : ये हैं भारत के आश्चर्य और रहस्यों से भरे प्राचीन शिव मंंदिर

सावन आ चुका है। श्रावण माह भगवान शिव को विशेष रूप से प्रिय है। देश में काशी विश्वनाथ मंदिर, देवघर जैसे कई प्रतिष्ठित और प्राचीन मंदिर हैं और कुछ मंदिर ऐसे हैं जो आपको आश्चर्य में डाल देते हैं और उनमें छिपा होता है रहस्य। आज ऐसे ही कुछ मंदिरों से जुड़ी जानकारी हम लाए हैं आपके लिए –

 बिजली महादेव मंदिर 

यहाँ हर 12 साल में एक बार शिवलिंग पर बिजली गिरती है

यह अनोखा मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थित है कुल्लू शहर में ब्यास और पार्वती नदी के संगम स्थल के नजदीक एक पहाड़ पर शिव का यह प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां हर 12 साल में एक बार शिवलिंग पर बिजली गिरती है। बिजली गिरने के बाद शिवलिंग चकनाचूर हो जाता है। मंदिर के पुजारी शिवलिंग के अंशों मक्खन में लपेट कर रख देते हैं। शिव के चमत्कार से वह फिर से ठोस बन जाता है। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

निष्कलंक महादेव

पांडवों ने यहां अपने पापों से मुक्ति पाई थी इसीलिए इसे निष्‍कलंक महादेव मंदिर कहते हैं

यह मंदिर गुजरात के भावनगर में कोलियाक तट से 3 किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थित है। प्रतिदिन अरब सागर की लहरें यहां के शिवलिंग का जलाभिषेक करती है। ज्वारभाटा जब शांत हो जाता है तब लोग पैदल चलकर इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं। ज्वार के समय सिर्फ मंदिर का ध्वज ही नजर आता है। कहते हैं कि यह मंदिर महाभारतकालीन है और जब युद्ध के बाद पांडवों को अपने ही कुल के लोगों को मारने का पछतावा था और वे इस पाप से छुटकारा पाना चाहते थे तब वे श्रीकृष्ण के पास गए। श्रीकृष्ण द्वारिका में रहते थे। श्रीकृष्ण ने उन्हें एक काली गाय और एक काला झंडा दिया और कहा कि तुम यह झंडा लेकर गाय के पीछे-पीछे चलना। जब झंडा और गाय दोनों सफेद हो जाए तो समझना की पाप से छुटकारा मिल गया। जहां यह चमत्कार हो वहीं पर शिव की तपस्या करना।कई दिनों तक चलने के बाद पांडव इस समुद्र के पास पहुंचे और झंडा और गाय दोनों सफेद हो गया। तब उन्होंने वहां तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न किया। पांचों पांडवों को शिवजी ने लिंग रूप में अलग अलग दर्शन दिए। वही पांचों शिवलिंग आज तक यहां विद्यमान हैं। पांडवों ने यहां अपने पापों से मुक्ति पाई थी इसीलिए इसे निष्‍कलंक महादेव मंदिर कहते हैं।

अचलेश्वर महादेव मंदिर

अचलेश्वर महादेव मंदिर

राजस्थान के धौलपुर में स्थित यह मंदिर दुर्गम जंगलों में स्थित है। कहते हैं कि इस मंदिर का शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। प्रात: इस शिवलिंग का रंग लाल होता है। दोपहर में केसरिया और जैसे-जैसे शाम होती है इसका रंग सांवला हो जाता है। इस शिवलिंग की अनोखी बात यह है कि इस शिवलिंग का नीचे कोई छोर नहीं है।

 लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर 

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना भगवान राम ने खर और दूषण के वध के पश्चात अपने भाई लक्ष्मण के कहने पर की थी। इसकी स्थापना स्वयं लक्ष्मण ने की थी। इस शिवलिंग में एक लाख छिद्र हैं। इसलिए इसे लक्षलिंग भी कहा जाता है। कहते हैं कि इस लाख छिद्रों में से एक छिद्र ऐसा भी है जोकि पातालगामी है। क्योंकि उसमें जितना भी पानी डालो वह सब उसमें समा जाता है और एक छिद्र ऐसा है जिसमें जल हमेशा भरा रहता है जिसे अक्षयकुंड कहते हैं।

 स्तंभेश्वर महादेव मंदिर 

मंदिर सुबह और शाम दिन में दो बार के लिए पलभर के लिए गायब हो जाता है

गुजरात में वडोदरा से 85 किमी दूर स्थित जंबूसर तहसील के कावी-कंबोई गांव का यह मंदिर अलग ही विशेषता रखता है। मंदिर अरब सागर के मध्य कैम्बे तट पर स्थित है। इस तीर्थ का उल्लेख ‘श्री महाशिवपुराण’ में रुद्र संहिता भाग-2, अध्याय 11, पेज नं. 358 में मिलता है। इस मंदिर के 2 फुट व्यास के शिवलिंग का आकार चार फुट ऊंचा है। स्तंभेश्वर महादेव मंदिर सुबह और शाम दिन में दो बार के लिए पलभर के लिए गायब हो जाता है। ऐसा ज्वारभाटा आने के कारण होता है। इस मंदिर से तारकासुर और कार्तिकेय की कथा जुड़ी हुई है। सागर संगम तीर्थ पर विश्‍वनंद स्तंभ की स्थापना की। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खासतौर से परचे बांटे जाते हैं, जिसमें ज्वार-भाटा आने का समय लिखा होता है।

 भोजेश्वर मंदिर

मंदिर का विशाल शिवलिंग

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर दूर भोजपुर (रायसेन जिला) में भोजपुर की पहाड़ी पर स्थित है। यहां का शिवलिंग अद्भुत और विशाल है। यह भोजपुर शिव मंदिर या भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस प्राचीन शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई-1055 ई) द्वारा किया गया था। चिकने लाल बलुआ पाषाण के बने इस शिवलिंग को एक ही पत्थर से बनाया गया है और यह विश्व का सबसे बड़ा प्राचीन शिवलिंग माना जाता है। कहते हैं कि यहां पहले साधुओं के एक समूह ने गहन तपस्या की थी।

(स्त्रोत साभार – वेबदुनिया)

‘भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना का कहर’ विषय पर वेबिनार

कोलकाता : ‘भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना का कहर’ विषय पर वेबिनार -भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के वाणिज्य विभाग सुबह के विद्यार्थियों के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था में कोरोना का कहर’ विषय से संबंधित वेबिनार का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि कलकत्ता विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग की एसोसिएट प्रो. सुदक्षिणा गुप्ता ने ऑनलाइन भाग लेने वाले 75 से अधिक विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए वर्तमान भारत की अर्थव्यवस्था के विषय में विस्तृत जानकारी दी। यह वेबिनार आई क्यू ए सी द्वारा स्वीकृत था जिसमें अर्थशास्त्र के विद्वानों और संकाय के शिक्षक शिक्षिकाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम में स्वागत भाषण किया कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह ने दिया। इप्शिता चटर्जी ने विद्यार्थियों की रुचि और जिज्ञासाओं को समझते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था पर महामारी कोरोना के कारण पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा की। प्रमुख वक्ता के रूप में प्रो. सुदक्षिणा ने महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों के विषय में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था प्रारंभिक कोविड -19 के लॉक डाउन के कारण उत्पादन बंद होने से बुरी तरह से प्रभावित हुई। केंद्रीय और राज्य के स्तर पर सरकारें कोविड से निपटने की तैयारी में लगी रहीं। अर्थव्यवस्था में थोड़ी सी राहत आनी शुरु हुई, तभी कोरोना की दूसरी लहर ने अर्थतंत्र पर प्रहार किया। इस बीच, टीकाकरण प्रक्रिया शुरू हुई। सरकार पर यह एक आर्थिक बोझ था जिसे उसने पेट्रोल और डीजल उत्पादों पर मूल्य बढ़ाकर जनता को स्थानांतरित कर दिया, इसके कारण मुद्रास्फीति पर भी बुरा असर पड़ा। 20 मार्च के अंत तक, महामारी हर जगह थीं, जिसके परिणामस्वरूप भारत में अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों को भी बंद करना पड़ा। बहुत – सी नौकरियाँ चली गयीं। महामारी के कारण पूरे भारत में 1.5 मिलियन स्कूलों को बंद कर दिया।
उद्योग,सेवा, व्यापार, ऋण, जीडीपी, शिक्षा आदि विभिन्न क्षेत्रों की चर्चा की गयी। वर्तमान टीकाकरण ड्राइव पर भी चर्चा की गयी । प्रश्नोत्तर सत्र डॉ. दिपर्णा जाना द्वारा आयोजित किया गया। बीकॉम (सुबह) विभाग की कोआर्डिनेटर प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी ने सभी को धन्यवाद देते हुए इस कार्यक्रम को विद्यार्थियों के लिए बहुत ही सकारात्मक बताया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

नदियों की जानकारी देगा ‘नदी को जानो’ मोबाइल एप

नयी दिल्ली : भारत की नदियों की जानकारी अब आपको आपके मोबाइल पर मिलेगी। नदियों की जानकारी देने के लिए ‘नदी को जानो’ ऐप केन्द्रीय शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने जारी किया। ‘नदी को जानो’ मोबाइल एप का उद्देश्य पूरे भारत में नदियों के बारे में जानकारी एकत्र करना है। यह पहल भारतीय नदियों पर एक डेटाबेस बनाने के उद्देश्य से पुनरुत्थान फाउंडेशन के लिए अनुसंधान का एक हिस्सा है। भारत की नदियों के बारे में हर प्रकार की जानकारी आपको इस मोबाइल एप में मिलेगी। साथ ही इस एप में छात्र नदी से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी अपलोड कर सकते हैं।
गौरतलब है कि भारत सरकार ने इससे पहले मछली पालक किसानों के लिए मत्स्य सेतु एप लांच किया था। मत्स्य सेतु मोबाइल ऐप की बात करें तो इसमें अलग-अलग प्रजाति के बारे में जानने के लिए ऑनलाइन सेल्फ-लर्निंग मॉड्यूल दिया गया है। साथ ही इस ऐप में मछलियों के प्रजनन, बीज उत्पादन और ग्रो-आउट संवर्धन पर जानकारी मिलेगी। इस एप के जरिए किसानों को छोटे वीडियो के माध्यम से बेहतर प्रबंधन, जलकृषि कार्यों में भोजन और स्वास्थ्य प्रबंधन का पालन करना भी सिखाया जाएगा।

 

ज्यादातर ऑनलाइन ग्राहकों को लुभाती है ई-कॉमर्स कंपनियों की भारी छूट : सर्वे

नयी दिल्ली : ज्यादातर उपभोक्ता ई-कॉमर्स मंचों द्वारा दी जाने वाली भारी छूट के पक्ष में हैं। एक सर्वे में 72 प्रतिशत ऐसे उपभोक्ताओं ने कहा कि सरकार को ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा दी जाने छूट पर रोक नहीं लगानी चाहिए और न ही उनकी ‘सेल्स’ की पेशकश में हस्तक्षेप करना चाहिए। सामुदायिक सोशल मीडिया मंच लोकलसर्किल्स के एक सर्वे के अनुसार पिछले 12 माह में देश में ऑनलाइन खरीदारी मुख्यधारा में आ गई है। 49 प्रतिशत उपभोक्ता ऑनलाइन खरीदारी कर रहे हैं।
सर्वे में देश के 394 जिलों के 82,000 उपभोक्ताओं की राय को शामिल किया गया है। इनमें 62 प्रतिशत पुरुष और शेष महिलाएं हैं। सर्वे में कहा गया है कि बड़ी संख्या में उपभोक्ता आज खरीदारी के लिए इस चैनल का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि यह एक सुरक्षित तथा सुविधाजनक तरीका है। ऑनलाइन मंच पर प्रतिस्पर्धी कीमतों की पेशकश की जाती है।

सर्वे में ई-कॉमर्स कंपनियों की सेल पर भी उपभोक्ताओं के विचार लिए गए। 72 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने कहा कि वे नहीं चाहते कि सरकार ई-कॉमर्स मंचों पर दी जाने वाली छूट या सेल आदि पर किसी तरह की रोक लगाए या कोई हस्तक्षेप करे। सर्वे में शामिल लोगों का कहना था कि ऑनलाइन सेल्स में खरीदारी सस्ती होती है और इसमें उन्हें बचत करने का मौका मिलता है। ऐसे कठिन समय में यह काफी महत्वपूर्ण है। सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 में संशोधन का प्रस्ताव किया है। माना जा रहा है कि इन संशोधनों से ऑनलाइन साइटों की छूट या सेल्स पर अंकुश लग सकता है।

मेहरबाई टाटा…जिन्होंने अपना बेशकीमती हीरा बेचकर टाटा कम्पनी को डूबने से बचाया

टाटा समूह का नाम आज सारी दुनिया जानती है…पर कोई समूह एक दिन में नहीं बनता,,उसके पीछे बड़ी तपस्या होती है औऱ त्याग होता है। आप कंगूरों को देखते हैं, नींव की ईंट का त्याग अक्सर भुला दिया जाता है। टाटा समूह की सफलता के पीछे भी एक ऐसी ही महिला का त्याग है जिन्होंने कम्पनी को सम्भालने के लिए अपने गहने तक बेच दिये थे। हम बात कर रहे हैं, लेडी मेहरबाई टाटा की, जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक स्मरणीय नाम हैं पर हम अक्सर उनको याद करना भूल जाते हैं। बाल विवाह उन्मूलन से लेकर महिला मताधिकार तक और लड़कियों की शिक्षा से लेकर पर्दा प्रथा तक को हटाने के लिए जानी जाती हैं मेहरबाई टाटा। आज हम बात करेंगे उनकी दूरदर्शिता की जिसने टाटा को डूबने से बचाया। दरअसल, हरीश भट्ट की एक किताब आई है टाटा स्टोरीज, जिसमें इस बारे में बात की गयी है।
मेहरबाई जमशेद जी टाटा के बड़े बेटे सर दोराब जी टाटा की पत्नी थीं। सर दोराबजी टाटा ने अपनी पत्नी लेडी मेहरबाई के लिए लंदन के व्यापारियों से 245.35 कैरेट जुबली हीरा खरीदा था जो कि कोहिनूर (105.6 कैरेट, कट) से दोगुना बड़ा है। 1900 के दशक में इसकी कीमत लगभग 1,00,000 पाउंड थी। यह बेशकीमती हार लेडी मेहरबाई के लिए इतना खास था कि वह इसे खास मौकों पर पहनने के लिए रख दिया था लेकिन हालात साल 1924 में हालात ने कुछ यूं करवट ली कि लेडी मेहरबाई ने इसे बेचने का फैसला ले लिया। हुआ यूं कि उस समय टाटा स्टील के सामने नकदी की कमी हो गयी। हालत यह थी कि कम्पनी के कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए पैसे नहीं बचे थे। उस वक्त लेडी मेहरबाई के लिए कंपनी के कर्मचारी और कम्पनी को बचाना ज्यादा सही लगा और उन्होंने जुबली डायमंड सहित अपनी पूरी निजी संपत्ति इम्पीरियल बैंक में गिरवी रख दी। इससे वह टाटा स्टील के लिए फंड जुटाना चाहती थीं। लंबे समय के बाद, कम्पनी ने रिटर्न देना शुरू किया और स्थिति में सुधार हुआ। भट ने कहा कि गहन संघर्ष के उस समय में एक भी कार्यकर्ता की छंटनी नहीं की गयी थी.
टाटा समूह के अनुसार, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की स्थापना के लिए सर दोराबजी टाटा की मृत्यु के बाद जुबली हीरा बेचा गया था। लेडी मेहरबाई टाटा उन लोगों में से एक थीं, जिनसे 1929 में पारित शारदा अधिनियम या बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम के लिए परामर्श किया गया था। उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी इसके लिए सक्रिय रूप से प्रचार किया। वह राष्ट्रीय महिला परिषद और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन का भी हिस्सा थीं। 29 नवंबर, 1927 को लेडी मेहरबाई ने मिशिगन में हिंदू विवाह विधेयक के लिए एक मामला बनाया। उन्होंने 1930 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में महिलाओं के लिए समान राजनीतिक स्थिति की माँग की। लेडी मेहरबाई टाटा भारत में भारतीय महिला लीग संघ की अध्यक्ष और बॉम्बे प्रेसीडेंसी महिला परिषद की संस्थापकों में से एक थीं.लेडी मेहरबाई के नेतृत्व में भारत को अंतरराष्ट्रीय महिला परिषद में शामिल किया गया था।
सर दोराबजी टाटा पार्क की रजत जयंती और लेडी मेहरबाई टाटा की जयंती के अवसर पर, टीवी नरेंद्रन, सीईओ और एमडी, टाटा स्टील द्वारा जमशेदपुर के लोगों के लिए पार्क को फिर से तैयार किया गया। 2020 तक पट्टिका का अनावरण और डायमंड स्ट्रक्चर और मंडप को रोशन किया। इस अवसर पर, रूचि नरेंद्रन ने लेडी मेहरबाई टाटा की प्रतिमा का अनावरण किया। 2.5 एकड़ में फैले, अपग्रेड इस पार्क में अब सर दोराबजी की पत्नी, लेडी मेहरबाई टाटा और एक शानदार स्टील ट्यूबलर संरचना और मंडप की प्रतिमा शामिल है, जिसके माध्यम से प्रसिद्ध “जुबली डायमंड” की विरासत को स्टील में अमर कर दिया गया है।
लेडी मेहरबाई की मूर्ति पार्क के दक्षिणी छोर पर खड़ी है, सीधे सर दोराबजी की प्रतिमा के सामने है। 1900 के दशक की शुरुआत में “जुबली डायमंड” टाटा की कहानी का हिस्सा बन गया था जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद की गंभीर वित्तीय कठिनाइयों से टिस्को को खींचने के लिए डायमंड को सर दोराबजी टाटा और उनकी पत्नी की पूरी व्यक्तिगत संपत्ति के साथ गिरवी रख दिया गया था।

प्रसिद्ध वास्तुकार, नूरू करीम, डायमंड स्ट्रक्चर और मंडप द्वारा डिज़ाइन किया गया, सर दोराबजी टाटा पार्क के समग्र रीडिज़ाइन का एक अभिन्न अंग है। पार्क के पश्चिमी छोर पर स्थित, पैवेलियन “जयंती डायमंड” की कालातीत लालित्य को कैप्चर करते हुए अपने टिकाऊ और सामंजस्यपूर्ण डिज़ाइन के लिए उधार देता है। 16 से 12 मीटर की दूरी पर, संरचना एक जटिल जाली बनाने के लिए टाटा स्ट्रक्चरुरा ट्यूबलर स्टील खोखले अनुभागों का उपयोग करके बनाया गया है। 45 मीट्रिक टन वजनी, संरचना लौकिक “हीरे” टिप पर टिकी हुई है, आकाश से मिलने के लिए जमीन से बाहर की ओर बढ़ती है।
( स्त्रोत साभार – वन इंडिया 24 लाइव, टाटा समूह की वेबसाइट. लोक आलोक न्यूज)

होगी महाभारत के रहस्यों की खोज, हस्तिनापुर में होगी खुदाई

मेरठ : महाभारत से जुड़े रहस्यों की खोज अब आरम्भ होगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की टीम हस्तिनापुर में खुदाई करने जा रही है। मेरठ जिला मुख्‍यालय से 40 किलोमीटर दूर महाभारत के गवाह हस्तिनापुर एएसआई ने खुदाई की तैयारी शुरू कर दी है। महाकाव्य ‘महाभारत’ में कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर की कथा से जुड़े रहस्‍यों को जानने के लिए एएसआई ने यह कदम उठाने का फैसला किया है। इससे पहले पिछले साल अगस्त में लगातार बारिश के बाद हस्तिनापुर टीले में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मिट्टी के बर्तनों की खोज की गयी थी।
एएसआई के नव-निर्मित मेरठ सर्कल के सुपरिटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट ब्रजसुंदर गडनायक के अनुसार अभी तक टीले वाले क्षेत्रों के संरक्षण और पुराने मंदिरों को नया रूप देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। थोड़ा निर्माण भी हुआ है। सितम्बर के बाद जब मानसून खत्म हो जाएगा तब खुदाई पर गौर करेंगे। हस्तिनापुर उन पांच स्थलों में शामिल है, जिनका विकास केंद्र की ओर से प्रस्तावित किया गया है। 2020 के केंद्रीय बजट में राखीगढ़ी (हरियाणा), शिवसागर (असम), धोलावीरा (गुजरात) और आदिचल्लानूर (तमिलनाडु) के साथ हस्तिनापुर को मिसाल बनने वाली साइटों के रूप में विकसित करने के लिए चिह्नित किया गया था।
गंगा की बाढ़ में शहर बहने की आशंका
हस्तिनापुर में पहली खुदाई 1952 में हुई थी। जब आर्कियोलॉजिस्ट प्रोफेसर बीबी लाल ने निष्कर्ष निकाला कि महाभारत काल लगभग 900 ईसा पूर्व था और शहर गंगा की बाढ़ से बह गया था। दरअसल बीबी लाल अयोध्‍या में विवादित ढांचे बाबरी मस्जिद के नीचे 12 मंदिर स्तंभों की ‘खोज’ के लिए जाने जाते हैं। मोदीनगर के मुल्तानिमल मोदी कॉलेज में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. केके शर्मा ने कहा कि 1952 के बाद कोई ठोस विकास नहीं हुआ। फिर 2006 में हस्तिनापुर से लगभग 90 किमी दूर सिनौली में एक प्राचीन कब्रगाह की खोज और 2018 में एक तांबे के घोड़े से चलने वाले युद्ध रथ की खोज ने इस सिद्धांत को दर्शाया कि वे महाभारत काल के थे क्योंकि महाकाव्य में रथों का जिक्र किया गया है। शर्मा 2006 की सिनौली खुदाई का हिस्सा थे।

 

इतिहास के पन्नों में कहीं खो गयीं लेखनी की धनी चंपा दे भटियाणी

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, बहुत बार बड़ी और प्रतिष्ठित प्रतिभाओं के प्रकाश में कुछ प्रतिभाओं पर दुनिया की नजर‌ नहीं पड़ती और अगर पड़ती भी है तो प्रायः उंन पर सरसरी निगाह डालकर लोग आगे बढ़ जाते हैं। और जहाँ तक बात स्त्री प्रतिभाओं की है तो उनकी प्रतिभा तो घर- गृहस्थी के घेरे में बहुधा घुट कर रह जाती है। साथ ही अगर उनके पिता या पति बहुत अधिक प्रतिष्ठित या स्वनामधन्य हों तो भी स्त्री की रचनात्मकता और प्रतिभा को उस तरह से चिह्नित नहीं किया जाता। इसी सन्दर्भ में आज मैं बात कर रही हूँ, चंपा दे भटियाणी की जो पीथल नाम से प्रसिद्ध डिंगल और ब्रजभाषा के प्रख्यात कवि पृथ्वीराज राठौड़ की दूसरी पत्नी थीं। चंपादे जैसलमेर के रावल मालदेव की पौत्री और रावल हरराज की पुत्री थीं। रावल हरराज को साहित्य और कला से विशेष प्रेम था। राजस्थानी छंद शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ “पिंगल सिरोमणि” एवं श्रृंगार रस के काव्य “ढोला मारू री चौपाई के रचयिता जैन मुनि कुशललाभ उनके काव्य गुरु थे। ऐसे पिता के संरक्षण में पलने वाली बेटियों के ह्रदय में काव्य प्रेम का स्फुरण होना स्वाभाविक ही था।

रावल हरराज की बड़ी पुत्री गंगाकुंवर का विवाह बीकानेर के राजा राजसिंह तथा मंझली लीलादे का उनके छोटे भाई  पृथ्वीराज से हुआ था। लीलादे भी कविता करती थीं। लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के पश्चात जब शोक विह्वल हो पृथ्वीराज अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतने लगे तो लीलादे से छोटी चंपादे का ब्याह पृथ्वी राज के साथ कर दिया गया। रानी चंपादे राजस्थानी और ब्रज भाषा में कविता लिखती थीं। हालांकि उनका कोई स्वतंत्र ग्रंथ तो नहीं मिलता लेकिन उनके द्वारा रचित मुक्तक अवश्य मिलते हैं जिन्हें पढ़कर उनकी प्रतिभा और रचनात्मकता का परिचय सहज ही मिल जाता है।  

वह अत्यंत रूपवती एवं बुद्धिमती स्त्री थीं और कठिन परिस्थितियों को अपनी बुद्धिमत्ता और विनोदप्रियता से सरस बनाने का हुनर भी जानती थीं। जब चंपादे पृथ्वीराज के जीवन में शामिल हुईं उस समय पृथ्वीराज खिन्न और निराश ही नहीं थे बल्कि वार्धक्य की ओर भी कदम बढ़ा रहे थे। एक दिन दर्पण में अपना प्रतिबिंब निहारते हुए उन्होंने अपना एक श्वेत केश तोड़ा तभी उन्हें चंपादे की मुस्कराती छवि दर्पण में दिखाई दी और उन्होंने अपने और चंपादे के बीच के उम्र के पार्थक्य को खेद के साथ स्वीकार करते हुए कहा-

“पीथल धोता आबियाँ, बहुली लग्गी खोड़।

पूरे जोवन मदमणी, अभी मूह मरोड़।।”

चंपादे ने इस पार्थक्य को अपनी सहृदयता और बुद्धि कौशल से किस तरह पाट दिया, यह दृष्टव्य है-

“प्यारी कहे पीथल सुनों, धोलां दिस मत जोय। 

नरां माहरां दिगम्बरां, पाकां हि रस होय।।

खेड़ज पक्का घोरियां, पंथज गधधां पाव।

नरां तुरंगा वन फ़लां, पक्कां पक्कां साव।।”

अर्थात खेती प्रौढ़ बैलों से और मार्ग की दूरी पके ऊँटों के पैरों से ही तय होती है। माना जाता है कि मर्द, घोड़े और वनफलों के पकने पर ही उनमें रस संचार होता है और स्वाद उत्पन्न होता है।

चंपादे की कविता में उनके ह्दय की गहन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति बड़ी सघनता के साथ हुई है। हालांकि उनकी कविताओं के संकलन का कोई प्रयास नहीं हुआ है लेकिन यत्र तत्र प्राप्त उनके स्फुट छंदों में उनके जीवनानुभवों का निचोड़ मिलता है। उनके पति पृथ्वीराज राजा अकबर के दरबार में रहते थे। एक बार लंबी अवधि के उपरांत जब वे बीकानेर लौटे तो रानी चंपादे ने अपनी विरह वेदना के साथ- साथ विछोह के कारण ढलते यौवन को बड़ी मार्मिकता से निम्नलिखित कविता में पिरोया-

“बहु दीहां बल्ल्हो, आयो मंदिर आज। 

कंवल देख कुमलाइया, कहोस केहई काज।।

चुगै चुगावै चंच भरि, गए निलज्जे कग्ग।

काया पर दरियाव दिल, आइज बैठे बग्ग।।”

अर्थात केश रूपी काले कौवों की खूब देखभाल की लेकिन फिर भी वे उड़ ही गए और अब उनके स्थान पर शरीर रूपी सागर में श्वेत केश रूपी बक आ बैठे हैं, अर्थात युवावस्था तो बीत गयी और शरीर में वार्धक्य ने डेरा जमा लिया है।

ब्रजभाषा में लिखे गए चंपादे के कवित्त सहजता से प्राप्त नहीं होते जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी कविताओं को सहेजा नहीं गया। चंपादे की मृत्यु भी जल्दी ही हो गयी। वह भी पृथ्वी राज की पहली रानी की तरह पृथ्वी राज को अकेला छोड़ गयीं। पृथ्वीराज ने चंपादे की मृत्यु की मर्मांतक व्यथा में डूबकर कई दोहों की रचना की, जिनमें चंपादे के रूप लावण्य का सजीव चित्रण तो है ही, पृथ्वीराज का उनके प्रति अथाह प्रेम भी प्रकट हुआ है। उनमें से कुछ दोहे यहाँ प्रस्तुत हैं-

“चंपा पमला च्यारि, साम्हां दीजै सज्जणा।

हिंडोले गलिहारि, हंसते मुंहि हरिराजउत।।

चांपा चडीज वास,मौ मन मालाहर तणी। 

सैण सुगन्धि सांस, हियै आवै हरिराजउत ।।

चांपा चमकंनेह, दांतोई अनतै दामिणी । 

अहर अनै आभेह, होमि पड़ी हरिराजउत।।

हंसौ चीतै मानसर, चकवौ चीतै भांण ।

नितहु तुनै चीतखूं, भावै जांण म जाण ।।

चख रत्ते नख रतडे, दंसड़ा खड़ा खड़ देह । 

कहै पित्थ कल्याण रो, आरिख सिघ्घी अह ।।