नयी दिल्ली : बिजली मंत्रालय ने क्षेत्र को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए गत शनिवार को कुछ नए नियमों की घोषणा की। इन नियमों का मकसद बिजली क्षेत्र के विभिन्न अंशधारकों से वित्तीय दबाव को कम करना और ऊर्जा उत्पादन की लागत को जल्द निकालना है।
एक बयान में कहा गया है कि मंत्रालय ने बिजली क्षेत्र में स्थिरता तथा स्वच्छ ऊर्जा को प्रोत्साहन के लिए नए नियम अधिसूचित किए हैं। इनके जरिये भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी पूरा कर सकेगा। बयान में कहा गया है कि बिजली क्षेत्र के निवेशक और अन्य अंशधारक कानून में बदलाव की वजह से लागत निकालने, नवीकरणीय ऊर्जा में कमी और इससे जुड़े अन्य मुद्दों की वजह से चिंतित हैं।
बयान में कहा गया है कि बिजली मंत्रालय ने बिजली अधिनियम, 2003 के तहत जो नियम अधिसूचित किए हैं वे उप़भोक्ताओं और अन्य अंशधारकों के हित में हैं। इन नियमों में बिजली (कानून में बदलाव की वजह से लागत की समय पर वसूली) नियम, 2021 शामिल है। दूसरा नियम बिजली (नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पादन को प्रोत्साहन) से संबंधित है। मंत्रालय ने कहा कि कानून में बदलाव की वजह से लागत की जल्द वसूली काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि समय पर भुगतान बिजली क्षेत्र के लिए जरूरी है।
मंत्रालय ने कहा, ‘‘दुनियाभर में ऊर्जा में बदलाव हो रहा है। भारत ने भी इस क्षेत्र में बदलाव की प्रतिबद्धता जताई है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 2022 तक 175 गीगावॉट और 2030 तक 450 गीगावॉट की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता की प्रतिबद्धता जताई है।’’ मंत्रालय ने कहा कि इन नियमों से देश को नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। इससे उपभोक्ताओं को हरित और स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध हो सकेगी। इनके तहत जिन बिजली संयंत्रों का संचालन अनिवार्य है उनपर बिजली उत्पादन या आपूर्ति में कटौती का नियमन लागू नहीं होगा।
बिजली मंत्रालय के नये नियम कम करेंगे अंशधारकों पर वित्तीय दबाव
10वीं, 12वीं कक्षा की टर्म-1 परीक्षा में लघु विषय होंगी क्षेत्रीय भाषाएँ : सीबीएसई
नयी दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने स्पष्ट किया कि 10वीं और 12वीं कक्षा की टर्म-1 परीक्षा के लघु विषयों की श्रेणी में सभी क्षेत्रीय विषयों को रखा गया है। सीबीएसई की ओर से यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने मुख्य विषयों से पंजाबी को बाहर रखने पर आपत्ति व्यक्त की है ।
चन्नी ने ट्वीट किया था, ‘‘मैं पंजाबी को मुख्य विषयों से बाहर रखने के सीबीएसई के तानाशाही निर्णय का विरोध करता हूं । यह संविधान की संघीय भावना के खिलाफ है और पंजाबी युवकों को अपनी मातृभाषा में सीखने के अधिकार का उल्लंघन है। मैं पंजाबी को पक्षपातपूर्ण ढंग से बाहर रखने की निंदा करता हूं । ’’ पंजाब के मुख्यमंत्री की आपत्ति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘‘ यह सभी को पता है कि सीबीएसई ने 10वीं और 12वीं कक्षा की टर्म-1 परीक्षा के तहत मुख्य विषयों की तिथियों की घोषणा की है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ यह स्पष्ट किया जाता है कि विषयों का वर्गीकरण प्रशासनिक आधार पर किया गया है जिसका मकसद विषयों में उपस्थित होने वाले उम्मीदवारों की संख्या के आधार पर टर्म-1 परीक्षा का आयोजन करना है और यह किसी भी रूप में मुख्य या लघु विषयों के महत्व से इसका कोई लेनाा-देना नहीं है।’’ अधिकारी ने कहा, ‘‘ अकादमिक दृष्टिकोण से सभी विषय समान रूप से महत्वपूर्ण है । पंजाबी क्षेत्रीय भाषा के तहत पेश की जाने वाली एक भाषा है। सभी क्षेत्रीय भाषाओं को लघु विषयों की श्रेणी के तहत प्रशासनिक सुविधा के उद्देश्य से रखा गया है जो परीक्षा आयोजित से जुड़ी व्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिये है। ’’
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने हाल ही में घोषणा की थी कि कक्षा 10वीं के लिए पहले टर्म की बोर्ड परीक्षा 30 नवंबर से शुरू होगी, जबकि 12वीं कक्षा की परीक्षा एक दिसंबर से शुरू होगी। इसके बाद, सीबीएसई ने कक्षा 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षा के पहले टर्म के लघु (माइनर) विषयों के लिए तारीखों (डेटशीट) की घोषणा की।
दसवीं कक्षा के लिए लघु विषयों की परीक्षा 17 नवंबर से सात दिसंबर के बीच होगी जबकि 12वीं कक्षा के लिए 16 नवंबर से 30 दिसंबर के बीच परीक्षा होगी। सीबीएसई ने घोषणा की थी कि कक्षा 10वीं के लिए पहले टर्म की बोर्ड परीक्षा 30 नवंबर से शुरू होगी, जबकि 12वीं कक्षा की परीक्षा एक दिसंबर से शुरू होगी।
शैक्षणिक सत्र को विभाजित करना, दो टर्म वाली परीक्षा आयोजित करना और पाठ्यक्रम को युक्तिसंगत बनाना 2021-22 के लिए दसवीं और 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं के लिए विशेष मूल्यांकन योजना का हिस्सा था, जिसे जुलाई में कोविड-19 महामारी के मद्देनजर घोषित किया गया था।
पूर्व रेलवे ने हावड़ा स्टेशन पर लगाया डिजिटल यात्री आरक्षण चार्ट बोर्ड
कोलकाता : पूर्व रेलवे ने हावड़ा स्टेशन पर डिजिटल यात्री आरक्षण चार्ट बोर्ड लगाया है। रेल यात्रियों को उनके आरक्षित टिकट की स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी देने के लिए नई सुविधा शुरू की गई है। पूर्व रेलवे के एक वरिष्ठ कर्मचारी के हाथों इसकी शुरुआत कराई गई। यह सुविधा उन लोगों के लिए मददगार साबित होगी, जिनका टिकट कंफर्म नहीं है और वे रेलवे स्टेशन पर उसे चेक करना चाहते हैं।
डिजिटल यात्री आरक्षण चार्ट बोर्ड के तहत आठ 50 इंच वाले एलईडी टीवी का सेट हैं। इनमें से चार स्क्रीन पर विज्ञापन प्रदर्शित होंगे और चार अन्य पर ट्रेन टिकट की आरक्षण की स्थिति दिखेगी। डिजिटल आरक्षण चार्ट बोर्ड का रखरखाव एक एजेंसी द्वारा किया जाएगा।
पूर्व रेलवे के सीपीआरओ कमल देव दास ने बताया कि इससे लाइसेंस शुल्क के रूप में प्रति वर्ष 50 लाख रुपये का गैर-किराया राजस्व प्राप्त होगा। डिजिटल आरक्षण चार्ट बोर्ड को धीरे-धीरे अन्य प्लेटफार्मों में भी लगाया जाएगा। यात्री अब स्पष्ट रूप से जानकारी प्राप्त कर सकेंगे क्योंकि कई बार आरक्षण चार्ट पर मुद्रित विवरण समय के साथ धुंधले हो जाते हैं।
पूर्व रेलवे के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यात्री चार्ट प्रदर्शित करने के लिए डिजिटल चार्टिंग पर्यावरण के अनुकूल तरीका है। यह कागज की खपत को भी कम करेगा और रेलवे को पर्यावरण के अनुकूल संगठन के रूप में पेश करेगा। यह यात्रियों को मैन्युअल रूप से तैयार किए गए पेपर चार्ट की प्रतीक्षा करने के बजाय डिजिटल रूप से जानकारी प्राप्त करने में मदद करेगा, जो ट्रेन के निर्धारित प्रस्थान से ठीक पहले ट्रेनों में चिपकाए जाते हैं।
एक साल बाद बंगाल में खुले सिनेमाघर, उमड़े दर्शक
बांग्ला फिल्मों ने किया शानदार कारोबार
कोलकाता : बंगाल में दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान रिलीज हुई कई बांग्ला फिल्मों ने अच्छा कारोबार किया। उद्योग से जुड़े के सूत्रों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि देव अभिनीत ‘गोलोंदाज’ अब तक हाउसफुल चल रही थी, जीत अभिनीत ‘बाजी’, कोयल मलिक और परमब्रत चटर्जी की मुख्य भूमिका वाली ‘बोनी’, अंकुश की ‘एफआइआर’ और शाश्वत चटर्जी की ‘शोरोरिपु टू जोतुगृहो’ ने भी 10 से 20 अक्टूबर की अवधि के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया। ‘गोलोंदाज’ के निर्माताओं की एक प्रवक्ता ने शुक्रवार को बताया, ‘सिनेमाघरों में 50 प्रतिशत दर्शकों के साथ ‘गोलोंदाज’ गुरुवार लक्ष्मी पूजा और उसके अगले दिन तक बाक्स ऑफिस पर लगभग तीन करोड़ रुपये की कमाई करने वाली पूर्वी भारत की पहली फिल्म बन गई।’
उन्होंने दावा किया कि कोलकाता के अधिकांश सिनेमाघरों में पहले 4-5 दिनों तक लगातार एक के बाद एक हाउसफुल शो दिखे। वितरक एसएसआर सिनेमाज के सतदीप साहा और शहर में स्थानीय अजंता मल्टीप्लेक्स के मालिक ने कहा, ‘गोलोंदाज, बाजी, बोनी, सभी ने सिनेमाघरों में बहुत अच्छा कारोबार किया। एक के बाद एक हाउसफुल शो के कारण बाजी सिने प्रेमियों के बीच भी हिट रही।’
अभिनेता देव ने ‘कहा, ‘‘मुझे खुशी है कि लोग सिनेमा देखने के लिए सिनेमाघरों में वापस आए। पिछले दो वर्षों से इस महामारी की स्थिति में लोगों को सिनेमा हॉल में वापस लाना बहुत मुश्किल था और हम एक टीम के रूप में दर्शकों को एक के बाद एक हाउसफुल शो, तालियों की गड़गड़ाहट और सीटी के साथ सिनेमाघरों में वापस लाने के लिए बहुत खुश हैं।’
आदर्श और त्याग की आड़ में अपने अधिकारों की आहुति मत दीजिए

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज थोड़ी सी बात स्त्री के अधिकारों और उसके प्रति होने वाले शोषण पर करने का बहुत मन हो रहा है। कारण कोई विशेष तो नहीं। दरअसल स्त्री के अधिकारों को लेकर जितना हल्ला मचता है, उतना काम नहीं होता। जी हाँ हल्ला, इस शब्द का प्रयोग मैं जानबूझकर कर रही हूँ क्योंकि हल्ला मचाने से यह भ्रम जरूर तैयार होता है कि काम हो रहा है लेकिन उस हल्ले में जरूरी मुद्दे सायास दब या दबा दिया जाते हैं। आजकल इस हल्ले के हम इस कदर आदी होते जा रहे हैं कि असली सवालों से हमारा ध्यान हट सा गया है। कहने को स्त्री विमर्श तो है ही, साहित्य का एक विमर्श, जिसके तहत विद्यार्थियों को एक पेपर पढ़ाया ही जा रहा है तो स्त्रियों को उसी में खुश हो जाना चाहिए कि साहित्य के इतिहास में एक अध्याय तो उनके नाम हुआ। भले ही जमीनी तौर पर आम स्त्री ने इस विमर्श का नाम ही ना सुना हो। उसके लिए पति देवता और ससुराल स्वर्ग समान है और उसी के सपनों में वह दिन- रात खोई रहती है या फिर ऐसा करने को बाध्य होती है। अब ससुराल अगर सच का स्वर्ग अथवा स्वर्ग जैसा भी हुआ तो गनीमत है न हुआ तो चुनौती उसके सामने रख दी जाती है कि “बड़े घर की बेटी” तो वही होती है जो खंडहर को भी अपने त्याग और समर्पण से स्वर्ग में तब्दील कर दे और निष्ठुर से निष्ठुर व्यक्ति के मन में प्रेम का दीप जला दें। और इस चुनौती को स्वीकारने के सिवाय और कोई रास्ता उसके पास होता ही नहीं। लेकिन उस तथाकथित स्वर्ग में कभी- कभार उसे ऐसी नारकीय यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है कि उसके बयान के लिए शब्दों को दर्द की स्याही में डुबाने की जरूरत पड़ती है।
यह बात तो हुई ससुराल रूपी स्वर्ग की। अब थोड़ी सी बात उस घर की भी कर लें जहाँ की मिट्टी में खेल -कूदकर वह बड़ी होती है। वहाँ क्या उसके लिए फूलों की चादर बिछी होती है या उन फूलों में कांटे भी छिपे होते हैं ? चलिए फूलों और कांटों को तितलियों और भंवरों के लिए छोड़ देते हैं और बात करते हैं लड़कियों की जिन्हें बचपन से ही यह मंत्र घुट्टी में पिलाया जाता है कि यह घर तो उनके लिए पराया है और उन्हें किसी और बगिया को अपने परिश्रम से महकाना है। और इसी पराए या किसी और स्थान में बसने के साथ ही जुड़ा होता है एक पारंपरिक और तथाकथित पवित्रता मंडित शब्द “विवाह” जो लड़कियों के लिए लगभग अनिवार्य स्थिति होती है। अर्थात लड़की के जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, विवाह। और विवाह के उपरान्त जिस घर में वह जाएगी वह होगा उसका स्वर्ग या ??? इस बहस को अगर छोड़ भी दें तो भी यह प्रश्न तो अधर में टंगा ही रहेगा कि क्या लड़की को विवाह करना ही होगा ? हाँ सो तो करना होगा अन्यथा इधर- उधर डोलती फिरेगी और खानदान का नाम डुबाएगी। और यही सब कह- कह कर, लड़कियों को विवाह की वेदी पर होम किया जाता है। लेकिन अगर लड़की विवाह न करना चाहे तो क्या समाज इसे सहजता से स्वीकार करेगा ? शायद क्या बिल्कुल नहीं। दरअसल परायेपन और पराया धन बनाने का षडयंत्र इसलिए रचा गया था ताकि लड़की को संपत्ति के अधिकार से वंचित किया जा सके। चूंकि वंश परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अलिखित संविधान के तहत लड़कों की होती है इसीलिए संपत्ति का उत्तराधिकारी भी वही होता है। हालांकि भारत में समान नागरिक संहिता की मांग 1930 में ही उठाई गई थी। उसके बाद 19848 में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल का जो प्रारूप तैयार किया था, उसमें स्त्रियों के लिए विरासत के अधिकार का मुद्दा भी शामिल था लेकिन कट्टरपंथियों के भय से सरकार ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। लंबी लड़ाई के बाद उत्तराधिकार कानून 2005 में हुए संशोधन के अनुसार पिता की संपत्ति में पुत्रियों को भी पुत्रों के समान हक मिला। 5 सितंबर 2005 को संसद ने अविभाजित हिंदू परिवार के उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में संशोधन किया जो 9 सितंबर 2005 से देश भर में लागू हुआ। लेकिन हम जानते हैं कि कानून बनने से भारत जैसे देश में कुछ भी नहीं बदलता। बदलाव तो तब आएगा जब हमारी सोच बदलेगी। अक्सर शादीशुदा लड़कियों से कह दिया जाता है कि उनकी शादी में जो खर्च किया गया वही उनका प्राप्य है गोया लड़कों की शादी तो बिना किसी खर्च के हो जाती है। और संबंधों को टूटने से बचाए रखने के लिए प्राय: विवाहित लड़कियाँ सारी संपत्ति भाई के लिए त्याग कर खुश होने का भ्रम पाल लेती हैं। इस प्रसंग को सुधा अरोड़ा ने अपनी कविता “राखी बांधकर लौटती हुई बहन” में बड़ी मार्मिकता से पिरोया है। उनकी पंक्तियाँ त्याग और संतोष के पीछे छिपे असंतोष को बड़ी कुशलता से उभारती हैं। देखिए-
“कितना अच्छा है राखी का त्यौहार !
बिछड़े भाई -बहनों को मिला देता है
कोठी के एक हिस्से पर हक जताकर
क्या वह सुख मिलता
जो मिला है भाई की कलाई पर राखी बांधकर !
मायके का दरवाजा खुला रहने
का मतलब क्या होता है
यह बात सिर्फ वह बहन जानती है
जो उम्र के इस पड़ाव पर भी इतनी भोली है
कि चुका कर इसकी बहुत बड़ी कीमत
अपने को बड़ा मानती है।”
अब रही बात अविवाहित लड़की को तो उसे हमेशा तानों से छीला जाता है कि वह परिवार वालों की छाती पर मूंग दलने के लिए बैठी है। इन परिस्थितियों के मद्देनजर बहुत सी खुदमुख्तार लड़कियाँ संपत्ति का मोह त्याग अपना अलग रास्ता चुन लेती हैं। मजबूत पंखों के सहारे उड़ जाती हैं, आकाश की ऊंचाइयों तक और अगर न उड़ पाईं तो भाइयों और भाभियों की चाकरी बजाती हैं। लेकिन यह तो कोई विकल्प नहीं है क्योंकि इससे संपत्ति में अधिकार का सवाल हल नहीं होता। इसके बावजूद हमारे यहाँ इन सवालों को इसी तरह हल करने की मानसिकता दिखाई देती है। भरण- पोषण के वायदे के नाम पर उम्र भर की गुलामी करने को, अविवाहित या विधवा औरतों को बाध्य होना पड़ता है। इसके बावजूद अगर कोई लड़की अधिकारों के नाम पर पैतृक घर और संपत्ति में हिस्सा मांगती है तो पहले तो उसे तानों से छेदा जाता है कि वह भाई- भाभी और उनके बच्चों के हिस्से और सुख- समृद्धि पर कुंडली मारकर बैठी है और इतने पर भी अगर वह अपनी मांग से पीछे नहीं हटती तो कदम- कदम पर उसके लिए मुश्किलें खड़ी की जाती हैं। परिस्थितियों को इतना दुसह्य बना दिया जाता है कि उसका जीना मुश्किल हो जाता है। कहा जा सकता है कि लड़की कानूनी सहायता ले सकती है लेकिन व्यवहारिक स्तर पर उतरकर देखें तो वह भी बहुत आसान नहीं होता । पहले तो अपने ही पिता -भाइयों के खिलाफ खड़ी होने वाली लड़की की बेतरह लानत- मलामत की जाती है और अगर इसके बावजूद वह अपने इरादों पर दृढ़ रही तो बैलगाड़ी की रफ्तार से चलने वाली भारतीय न्याय व्यवस्था उसकी हिम्मत तोड़ देती है। और उसी बीच पारिवारिक, सामाजिक और भावनात्मक दबाव अपना काम करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में डटे रहने के लिए बड़ी हिम्मत की जरूरत होती है। जो डटी रहती हैं, वे इतिहास लिखती हैं और औरों के लिए मिसाल बनती हैं। लेकिन ऐसी लड़कियाँ अंगुलियों पर गिनी जाने लायक ही हैं क्योंकि लड़कियों को तो बचपन से ही अधिकारों से वंचित रखा जाता है, ऐसे में वे अपने हक की बात करें भी तो कैसे करें। अक्सर हम कहते हैं कि लड़कियों को विवाहोपरांत शोषण का शिकार होना पड़ता है लेकिन शोषण का चक्र तो उनके जन्म के साथ आरंभ हो जाता है। लिंगभेद की राजनीति की यंत्रणाओं को झेलने की शुरुआत उनके अपने घर या मायके में ही हो जाती है ताकि वह दीर्घकालिक शोषण को बर्दाश्त करने के लिए, हर हाल में खुश रहने या एडजस्ट करने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हो सकें। हत्या का सिलसिला भी ऐसे ही शुरू होता है- भ्रूण हत्या, सम्मान हत्या से लेकर दहेज हत्या तक के सुनियोजित षड्यंत्र का सिलसिला परंपरा के महिमा मंडन के नाम पर सुचारू रूप से चलता है। हमें इन षड्यंत्रों को पहचान कर उससे बचने और उसका तोड़ खोजने की जरूरत है अन्यथा सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के प्रचार के विज्ञापनों पर धन लुटाकर महिला उत्थान का छद्म रचती रहेगी और लड़कियाँ परंपरागत आदर्शों की रक्षा के नाम पर अपनी अस्मिता की हत्या की गवाह बनती रहेंगी। वर्तमान समय में उम्मीद की किरण इस रूप में नजर आती है कि इस स्थिति को लड़कियाँ – स्त्रियाँ अपने जीवट से बदलने की मुहिम में लग चुकी हैं। आज की स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, वह लड़ रही है, सवाल पूछ रही है, देर तक टिके रहने के भरोसे और जीत की उम्मीद के साथ वह अपने अधिकारों के लिए लड़ने की शुरुआत कर चुकी है। कात्यायनी इस जागरूक स्त्री की छवि को अपनी कविता में बेबाकी से उकेरती हैं-
“यह स्त्री
सब कुछ जानती है
पिंजरे के बारे में
जाल के बारे में
यंत्रणागृहों के बारे में।
उससे पूछो
पिंजरे के बारे में पूछो
वह बताती है
नीले अनन्त विस्तार में
उड़ने के
रोमांच के बारे में।
जाल के बारे में पूछने पर
गहरे समुद्र में
खो जाने के
सपने के बारे में
बातें करने लगती है।
यंत्रणागृहों की बात छिड़ते ही
गाने लगती है
प्यार के बारे में एक गीत।
रहस्यमय हैं इस स्त्री की उलटबासियाँ
इन्हें समझो,
इस स्त्री से डरो।”
इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि कानूनी अधिनियमों के संशोधन किताबों के पन्नों से निकलकर व्यवहारिक जिंदगी का हिस्सा बने और कानून के रखवाले इस दिशा में क्रियाशील हों तो यह लड़ाई थोड़ी आसान जरूर हो जाएगी।
कोटाक महिन्द्रा ने नदिया के अस्पताल में दिए 2 एम्बुलेंस
कोलकाता : कोटाक महिन्द्रा बैंक ने नदिया में 2 एम्बुलेंस उपलब्ध करवाये हैं। बैंक की सीएसआर गतिविधि के तहत सानंद और मुम्बई के बाद नदिया में यह पहल की गयी। कोटाक महिन्द्रा बैंक के वरिष्ठ सदस्य बी. एस. शिवकुमार ने एम्बुलेंस इंटरनेशमल सोसायटी ऑफ कृष्णा कॉन्शशियस को यह एम्बुलेंस सौंपी। उन्होंने कहा कि एम्बुलेंस सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त हैं। कोटाक महिन्द्रा ने ये 2 एम्बुलेंस श्री मायापुर कम्यूनिटी हॉस्पिटल को प्रदान किये हैं।
लेखन और लेखकों से जुड़ीं सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की छात्राएँ
कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में हाल ही में मेमोरियल डे मशहूर लेखक रस्किन बांड के साथ मनाया गया। इस कार्यक्रम में लेखक से सुजय प्रसाद चटर्जी ने बात की। यह कार्यक्रम एक लिटरेरी फेस्ट यानी साहित्य उत्सव का हिस्सा था। इस साहित्य उत्सव में रीडिंग सेशन य़ानी पाठ्य रचना पाठ सत्र और रचनात्मक लेखन जैसे सत्र हुए। इन कार्यक्रमों में सम्पूर्णा चटर्जी, तिलोत्तमा गोस्वामी, हिमांजलि शंकर, प्रो. सैकत मजुमदार और डॉक्टर साधना झा ने भाग लिया। थिंक आर्ट द्वारा विद्यार्थिय़ों के लिए रचनात्मक लेखन की कार्यशाला भी आयोजित की गयी। प्राथमिक स्तर की छात्राओं स्वाति खेरिया और सोनम मंत्री के साथ कहानी सुनाने का सत्र हुआ। चौथी से बारहवीं कक्षा की छात्राओं द्वारा लिखी गयी यूटोपिया इन डिस्टोपिया नामक पुस्तक का लोकार्पण हुआ। पुस्तक में चित्र भी छात्राओं द्वारा ही बनाये गये हैं। पुस्तक का ई संस्करण स्कूल की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है। विद्यार्थियों ने रीडिंग सेशन में अगाथा क्रिस्टी, एच. जी. वेल्स और रोनॉल्ड दहल जैसे लेखकों की कृतियों के अंश पढ़े गये। इन सभी लेखकों की जयन्ती सितम्बर में पड़ती है। इन लेखकों के जीवन पर आधारित स्लाइड्स भी दिखायी गयीय़
जानिए लक्ष्मी और महालक्ष्मी का अन्तर
शुभजिता स्वदेशी : टाटा की एयर इंडिया वापस टाटा के पास
एयर इंडिया अब टाटा की हो गयी। 68 साल बाद घर वापसी हुई। टाटा ने भी बाहें फैला कर स्वागत किया। 68 साल के लम्बे इंतजार के बाद बार एयर इंडिया की कमान टाटा ग्रुप के पास फिर से वापस आ गई है। इस मौके पर रतन टाटा काफी भावुक नजर आये। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ‘वेलकम बैक, एयर इंडिया’। इसके साथ ही उन्होंने एक बहुत ही पुरानी तस्वीर और मैसेज भी शेयर किया। सरकार ने अपनी पूरी 100 फीसदी हिस्सेदारी टाटा संस को बेच दी है। टाटा इस सौदे में कुल 18000 करोड़ रुपये खर्च करेगी। एक हिस्से से कर्ज चुकाएगी और दूसरा सरकार की हिस्सेदारी का भुगतान होगा। कुल मिलाकर एयर इंडिया अब टाटा ग्रुप की हो चुकी है। मालिक वही पुराना, लेकिन अंदाज अब नया होगा पर क्या आप जानते हैं कि एयर इंडिया की शुरुआत टाटा समूह ने ही की थी और उस वक्त इसका नाम टाटा एयरलाइंस हुआ करता था। य
एयर इंडिया के इतिहास की बात करें तो इसकी शुरुआत अप्रैल 1932 में हुई थी। एयर इंडिया की स्थापना उद्योगपति जेआरडी टाटा ने की थी। उस वक्त नाम टाटा एयरलाइंस हुआ करता था। जेआरडी टाटा ने महज 15 की उम्र में साल 1919 में पहली बार शौकिया तौर पर हवाई जहाज उड़ाया था लेकिन शौक जुनून बन गया और जेआरडी टाटा ने अपना पायलट का लाइसेंस ले लिया।

एयरलाइन की पहली व्यावसायिक उड़ान 15 अक्टूबर को भरी गई थी। तब सिर्फ सिंगल इंजन वाला ‘हैवीलैंड पस मोथ’ हवाई जहाज था, जो अहमदाबाद-कराची के रास्ते मुम्बई गया था। जानकर हैरानी होगी कि हवाई जहाज में उस वक्त एक भी यात्री नहीं था बल्कि 25 किलो चिट्ठियां थीं।
चिट्ठियों को लंदन से ‘इम्पीरियल एयरवेज’ से कराची लाया गया था। इम्पीरियल एयरवेज ब्रिटेन का राजसी विमान वाहक था। इसके बाद साल 1933 में टाटा एयरलाइन्स ने यात्रियों को लेकर पहली उड़ान भरी। टाटा ने दो लाख रुपये की लागत से कंपनी स्थापित की थी। इस एयरलाइन ने अपने पहले साल में 155 यात्रियों और 10.71 टन चिठ्ठियों को लेकर 2,60,000 किलोमीटर की उड़ान भरी। इस दौरान इसने 60,000 रुपये का मुनाफा कमाया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह एयरलाइन एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी में बदल गई और इसका नाम एयर इंडिया हो गया।

एयर इंडिया (उस वक्त टाटा एयरलाइंस) ने इसके बाद लगातार चिट्ठियां पहुँचाने का काम किया। पूरी तरह भारतीय एयरलाइन होने के नाते उस वक्त की अंग्रेजी हुकूमत ने एयरलाइंस को कोई आर्थिक मदद भी नहीं की। एयरलाइन से चिट्ठियां ले जाने के लिए टाटा को हर चिट्ठी पर सिर्फ चार आने मिलते थे। टाटा एयरलाइंस के लिए मुंबई के जुहू में ऑफिस बनाया गया. लेकिन, ये ऑफिस मिट्टी के मकान में था। प्लेन को उड़ाने के लिए ‘रनवे’ का इस्तेमाल पास के ही एक मैदान का होता था।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद भारत से सामान्य फ्लाइट्स शुरू की गईं और तब इसका नाम एयर इंडिया रखा गया। सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी बनाया गया। साल 1947 में आजादी के बाद एक नेशनल एयरलाइंस की जरूरत थी। भारत सरकार ने एयर इंडिया में 49% हिस्सेदारी अधिग्रहीत कर ली। इसके बाद 1953 में भारत सरकार ने एयर कॉरपोरेशन एक्ट पास किया और टाटा समूह से इस कंपनी में बहुलांश हिस्सेदारी खरीद ली। इस तरह एयर इंडिया पूरी तरह से एक सरकारी कंपनी बनी।
आजादी के बाद 1953 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जब इसका राष्ट्रीयकरण किया तो जेआरडी टाटा को खासा झटका लगा लेकिन नेहरू ने उन्हें आश्वस्त किया कि वो हमेशा एयरइंडिया के सर्वेसर्वा रहेंगे। इसके बाद 1978 तक टाटा लगातार इसके चेयरमैन बने रहे। जब जनता पार्टी के शासनकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें पद से हटाया और जिस तरह हटाया, उससे जेआरडी बहुत आहत हुए। 33 सालों तक अवैतनिक चेयरमैन रहे।
शायद जेआरडी अपनी जगह सही थे. उन्होंने 1953 में एयर इंडिया का चेयरमैन बनने के लेकर हटाए जाने तक सरकार से अपने काम के बदले कोई वेतन नहीं लिया था। वह खुद अवैतनिक तौर पर ये जिम्मेदारी संभाल रहे थे। जेआरडी को इस तरह हटाए जाने का असर एयरलाइंस के कर्मचारियों के मनोबल पर भी पड़ा। देश में भी इसका विरोध हुआ. लंदन के “द टेलीग्राफ” अखबार ने खबर छापी, “अनपेड एयर इंडिया चीफ इन सेक्ड बाई देसाई”. प्रधानमंत्री देसाई की इस मामले पर काफी किरकिरी हुई।

1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में जब वापस लौटीं तो उन्होंने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस दोनों में प्रमुख के पद पर फिर जेआरडी की नियुक्ति कर दी. वो 1986 में वो तब तक काम करते रहे जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रतन टाटा को एयर इंडिया का चेयरमैन बना दिया। 1982 में जब टाटा के विमान सेवा में उतरने के 50 साल पूरे हो रहे थे जब टाटा ने एक और गजब का काम किया। उन्होंने फिर पस मोट विमान को कराची से मुंबई तक उड़ाया. तब वो 78 साल के हो रहे थे.
भारत सरकार ने एयरलाइन का नाम बदलकर एयर इंडिया इंटरनेशनल कर दिया और इसकी घरेलू उड़ान सेवा को रिस्ट्रक्चरिंग के तहत इंडियन एयरलाइंस को ट्रांसफर कर दिया गया। अगले 40 सालों तक एयर इंडिया की गिनती केंद्र सरकार के रत्नों में होती रही और डोमेस्टिक एयरलाइन के मार्केट शेयर का अधिकतर हिस्सा इसके पास बना रहा।
हालांकि 1994 में सरकार ने एयर कॉरपोरेशन एक्ट 1953 को निरस्त कर दिया और एविएशन सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों को भी भाग लेने की इजाजत दे दी। 1994-95 के अंत तक 6 प्राइवेट एयरलाइन ने इस सेक्टर में एंट्री की। इनमें जेट एयरवेज, एयर सहारा, मोदीलुफ्त, दमानिया एयरवेज, एनईपीसी एयरलाइन और ईस्ट-वेस्ट एयरलाइंस शामिल हैं।
एयर इंडिया का लोगो लाल रंग का उड़ता हुआ हंस है। इसमें नारंगी रंग का कोणार्क चक्र है। प्लेन के पिछले हिस्से पर लोगो को जगह दी जाती है. कंपनी का शुभंकर ‘महाराजा’ पहली बार 1946 में दिखा था। यह एयरलाइन की खास पहचान रहा है।
एयर इंडिया ने इस दौरान प्रीमियम सेवाएं देना जारी और देश के इंटरनेशन ट्रैफिक के अधिकांश हिस्से पर उसका कंट्रोल बना रहा है। हालांकि घरेलू मार्केट में उसने जेट एयरवेज और सहारा एयरलाइंस के हाथों मार्केट शेयर खोना शुरू कर दिया। यह दोनों एयरलाइंस लक्जरी सेवाएं नहीं मुहैया करा रही थीं, लेकिन वे किफायती रेट पर घरेलू उड़ान ऑफर कर रही थीं, जो लोगों को आकर्षित कर रहा था।

2000-01 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए सरकार ने फंड जुटाने की कोशिशों के तहत एयर इंडिया में अल्पांश हिस्सेदारी (40 प्रतिशत) बेचने की कोशिश की। 2000-01 में सरकार ने 27 सरकारी कंपनियों को निजीकरण के लिए आगे किया था, लेकिन इनमें से कोई भी कंपनी उस साल बिक नहीं पाई थी।
जून 2017 में सरकार ने एयरइंडिया के निजीकरण को मंजूरी दी और मार्च 2018 में इसने एयर इंडिया की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) मंगाएं। इसमें एयर इंडिया के साथ एयर इंडिया एक्सप्रेस की हिस्सेदारी सहित एयर इंडिया SATS एयरपोर्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी भी शामिल थी। एयर इंडिया एसएटीएस एयरपोर्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, एयर इंडिया और सिंगापुर एयरपोर्ट टर्मिनल सर्विसेज का ज्वाइंट वेंचर है।
एयर इंडिया की निजीकरण की दूसरी कोशिश के तहत, सरकार ने एयरलाइन के नए मालिक को इसका 33,392 करोड़ का कर्ज लेने और मई के मध्य तक बोली जमा करने का निर्देश दिया। सरकार की मंशा 2018 के अंत तक एयरइंडिया का निजीकरण पूरा करने की थी। हालांकि किसी भी प्राइवेट कंपनी ने घाटे में चल रही इस सरकारी एयरलाइन को खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।
टाटा समूह को एयर इंडिया में शत प्रतिशत हिस्सेदारी मिली है। वहीं, विस्तारा एयरलाइन, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड और सिंगापुर एयरलाइंस लिमिटेड (एसआईए) का एक साझा उपक्रम है। इसमें टाटा संस की 51 फीसदी हिस्सेदारी है तो सिंगापुर एयरलाइन का स्टेक 49 फीसदी है। अगर एयर एशिया की बात करें तो इसमें टाटा संस की हिस्सेदारी 83.67 फीसदी है।
(स्त्रोत साभार – जी बिजनेस, हिन्दी मनीकंट्रोल, न्यूज 18)
नहीं रहीं हिमोजी’, ‘अलबेली’, ‘चित्रगीत’ की सर्जक अपराजिता शर्मा
नयी दिल्ली : मिरांडा हाउस कालेज में हिंदी की एसोसिएट प्रोफेसर अपराजिता शर्मा का हृदयाघात से निधन हो गया। अपराजिता अपने विद्यार्थियों के बीच तो लोकप्रिय रहीं और हिन्दी में भावाभिव्यक्ति वाले स्टीकर देकर उन्होंने भाषा की प्रगति में बड़ा योगदान दिया। उनका बनाया हिमोजी एप बहुत चर्चित हुआ था। कुछ साल पहले हिमोजी एप लांच हुआ था। दरअसल, इमोजी तो सिर्फ भावनाओं का संचार करता है लेकिन हिमोजी में एक चरित्र के साथ कुछ शब्दों के जरिए भावनाओं को व्यक्त किया जाता है। अपराजिता ने 270 से अधिक हिमोजी बनाए। जो गुस्सा, नाराजगी, प्यार, दोस्ती आदि पर आधारित हैं। अपराजिता एक कलाकार थीं और कला के जरिए महिलाओं की व्यथा को समाज के सामने रखती थी। इंटरनेट मीडिया खासकर फेसबुक पर अपराजिता द्वारा ईजाद वर्चुअल कैरेक्टर अलबेली खासी लोकप्रिय है। कारण, अलबेली महिलाओं के हक की आवाज बुलंद करती है।




