Friday, October 30, 2026
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पद्मश्री : पारंपरिक पोशाक में जब नंगे पांव पहुँचीं वनों की रक्षक तुलसी गौड़ा

कर्नाटक की 72 वर्षीय पर्यावरणविद् तुलसी गौड़ा को पेड़ों के संरक्षण में उनके अपार योगदान के लिए राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने पद्मश्री से सम्मानित किया। भारत देश में ऐसे कई लोग हैे, जो बिना किसी स्वार्थ के लिए दूसरों के जीवन में परिवर्तन लाने के लिए अपना जीवन लगा देते हैं। बिना किसी को बताए। बिना किसी लालच के। गुमनामी में। ऐसा ही एक नाम है तुलसी गौड़ा।  भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री प्राप्त करने के लिए राष्ट्रपति भवन के दरबार हाॅल में तुलसी अपनी पारंपरिक पोशाक में जब नंगे पांव पहुंची, तो उनकी इस सादगी ने सबका दिल जीत लिया। तुलसी गौड़ा के काम को भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें 8 नवंबर 2021 को दिया गया। जब तुलसी को यह सम्मान मिला तो दरबार हाॅल तालियों से गूंज उठा। तालियों की इस गूंज में सम्मान था सच्चाई के लिए। सम्मान था देश की सेवा के लिए। सम्मान था आत्मसमर्पण के लिए। सम्मान था निःस्वार्थ सेवा के लिए। सम्मान था अपने जीवन के 60 साल बिना किसी उम्मीद के देश के लिए समर्पित करने के लिए।

जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया

तुलसी गौड़ा को जंगल की ‘इनसाइक्लोपीडिया’ नाम से जाना जाता है। क्योंकि उन्हें दुनिया भर में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों और पौधों की प्रजातियों के बारे में व्यापक ज्ञान है, वे किशोर अवस्था से ही पर्यावरण की रक्षा में सक्रिय रूप से योगदाान दे रही हैं और बिना किसी आर्थिक मदद के हजारों पेड़ लगा चुकी हैं।

कौन हैं पर्यावरणविद तुलसी गौड़ा

आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा पिछले 6 दशक से पर्यावरण के लिए काम कर रही हैं। अब तक वे 30 हजार से अधिक पौधे लगा चुकी हैं। वो भी बिना किसी आर्थिक मदद के। उनकी यह समाजसेवा सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी है। गौड़ा जिन्हें वनों का ‘इंनसाइक्लोपीडिया’ माना जाता है। कर्नाटक के हेलक्की जनजाति से ताल्लुक रखती हैं। छोटी उम्र में अपने पिता को खो देने वाली तुलसी कभी स्कूल नहीं गईं। जब वह सिर्फ 12 साल की थीं, तब अपनी मां के साथ एक स्थानीय नर्सरी में काम करने लगीं गई और वहां काम करते हुए पौधों के बारे में उन्होंन अपार ज्ञान प्राप्त किया। तुलसी की शादी किशोरावस्था में पहुंचने से पहले ही हो गयी थी। लेकिन इससे प्रकृति के प्रति उनके प्रेम भावना में कमी नहीं आई। प्रक्रति की रक्षा के प्रति उनका यही समर्पण था, जिसने उन्हें वन विभाग में एक स्थायी नौकरी दिला दी। गणमान्य व्यक्तियों के साथ पद्मश्री पुरस्कार समारोह में भाग लेने के दौरान उनकी सादगी ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचा। टिवटर यूजर्स ने दिग्गज पर्यावरणविद की विनम्रता की प्रशंसा करते हुए, उन्हें देश की ‘बेयर फुट वंडर वुमन’ बताया। देश का गौरव तुलसी समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

और भी कई पुरस्कारों से नवाजी जा चुकी हैं पद्मश्री तुलसी

भारत के चाैथे सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री  के अलावा कर्नाटक वानिकी विभाग में उनके व्यापक कार्यकाल के लिए उन्हें और भी कई पुरस्कार और मान्यता मिली हैं। जैसे- 1986 में इंदिरा प्रियदर्शिनी व्रक्ष मित्र अवार्ड, 1999 में कर्नाटक राज्य सरकार का राजोत्सव अवार्ड प्रमुख हैं।

हिन्दी कथा साहित्य की स्तम्भ वरिष्ठ कथाकार मन्नू भंडारी का निधन

‘महाभोज’ और ‘आपका बंटी’ जैसी कालजयी रचनाओं की लेखिका मन्नू भंडारी सोमवार 15 नवम्बर  को निधन हो गया।
यह खबर आते ही साहित्‍य जगत में शौक पसर गया। वे नयी कहानी आंदोलन की पुरोधाओं में थीं, जिनकी रचनायें कई दशकों से हमें अपने समय को समझने और संवारने में मदद करेगी। अपने लेखन कार्यकाल में मन्‍नू भंडारी ने कहानियां और उपन्यास दोनों लिखे हैं। ‘मैं हार गई’ (1957), ‘एक प्लेट सैलाब’ (1962), ‘यही सच है’ (1966), ‘त्रिशंकु’, ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’ और ‘आंखों देखा झूठ’ उनके द्वारा लिखे गए कुछ महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है। उन्होंने अपनी पहली कहानी ‘मैं हार गई’ अजमेर में ही लिखी थी जो काफी मशहूर हुई थी।

हिन्दी की प्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931 को मध्यप्रदेश में मंदसौर ज़िले के भानपुर गांव में हुआ था। मन्नू का बचपन का नाम ‘महेंद्र कुमारी’ था। उनके पिता सुख संपत राय उस दौर के जाने-माने लेखक और समाज सुधारक थे, जिन्होंने स्त्री शिक्षा पर बल दिया। वह लड़कियों को रसोई में न भेजकर, उनकी शिक्षा को प्राथमिकता देने के समर्थक थे। मन्नू के व्यक्तित्व निर्माण में उनके पिता का काफी योगदान रहा। उनकी माता का नाम अनूप कुंवरी था जो कि उदार, स्नेहिल, सहनशील और धार्मिक प्रवृति की महिला थी। इसके अलावा परिवार में मन्नू के चार-बहन भाई थे।

बचपन से ही उन्हें, प्यार से ‘मन्नू’ पुकारा जाता था इसलिए उन्होंने लेखन में भी अपने नाम का चुनाव मन्नू का ही किया। लेखक राजेंद्र यादव से शादी के बाद भी महेंद्र कुमारी मन्नू भंडारी ही रही। मन्नू भंडारी ने अजमेर के ‘सावित्री गर्ल्स हाई स्कूल’ से शिक्षा प्राप्त की और कोलकाता से बीए की डिग्री हासिल की थी। उन्होंने एमए तक शिक्षा ग्रहण की और वर्षों तक दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में पढ़ाया।

 

बच्चों के लिए आई नयी कोरोना वैक्सीन

देश में बच्चों के लिए कोरोना वैक्सीन जल्द लगनी शुरू हो सकती है। सरकार ने जायडस हेल्थकेयर की तरफ से बनाई गई दुनिया की पहली डीएनए बेस्ड कोरोना वैक्सीन ZyCov-D की 1 करोड़ खुराक का ऑर्डर दे दिया है। यह वैक्सीन 12 साल से ऊपर के उम्र वाले लोगों को लगाई जा सकती है। सरकार इसे 12-18 साल के बच्चों को लगाने के लिए खरीद रही है। क्या है कीमत, क्यों यह बाकी वैक्सीन से अलग है, कोरोना से बचाव में यह कितनी कारगर है…आइए जानतें हैं इससे जुड़ी बड़ी बातें।

सरकार को कितने में पड़ रहा एक डोज?

ZyCov-D तीन डोज वाली वैक्सीन है। सरकार इसके लिए 265 रुपये प्रति डोज के हिसाब से ऑर्डर दिया है। यानी 3 डोज की कीमत पड़ी 795 रुपये। नीडल-फ्री तकनीक के लिए 93 रुपये प्रति डोज अलग से लगेंगे। इसमें जीएसटी शामिल नहीं है। इस तरह सरकार के लिए तीनों डोज के लिए कीमत 1,074 रुपये होगी।
क्या आम आदमी को इसके लिए देने पड़ेंगे पैसे?
अगर सरकारी सेंटर पर वैक्सीन लगवाते हैं तो यह मुफ्त में पड़ेगी। लेकिन प्राइवेट सेंटर पर इस वैक्सीन का पूरा कोर्स यानी 3 डोज 1500-2500 रुपये के बीच हो सकता है।
किनको लगेगी ये वैक्सीन?
यह वैक्सीन 12 साल या इससे ऊपर के व्यक्ति को लगाई जा सकती है। इसका मतलब है कि इसे 12 साल से 18 साल तक के बच्चों को भी लगाया जा सकता है। यह बात इसे खास बनाती है क्योंकि फिलहाल देश में बच्चों को कोरोना की वैक्सीन नहीं लग रही है। सरकार ने इसे 12 से 18 साल के बच्चों के लिए ही खरीदा है।
तीनों डोज के बीच कितने दिनों का अन्तर ?
ZyCov-D के हर डोज के बीच कम से कम 28 दिन का अंतराल रहेगा। यानी पहला डोज लेने के 28वें दिन दूसरा डोज और 56वें दिन तीसरा डोज। इस हिसाब से भले ही इसके 3 डोज हो लेकिन इसका कोर्स कोविशील्ड से पहले ही पूरा हो जाएगा। दो डोज वाली कोविशील्ड के दोनों डोज के बीच का गैप फिलहाल 84 दिन है।
क्यों बाकी वैक्सीन से अलग है ZyCov-D?
यह भारत ही नहीं, दुनिया की भी पहली डीएनए बेस्ड कोरोना वैक्सीन है। इसके अलावा इसका कोर्स 3 डोज का है जबकि ज्यादातर कोरोना वैक्सीन दो डोज वाली हैं। इसे लगाने के लिए सूई की भी जरूरत नहीं होगी।
कैसे काम करती है डीएनए वैक्सीन?
जायडस कैडिला की यह कोरोना वैक्सीन दुनिया की पहली डीएनए वैक्सीन है। इसके जरिए जेनेटिकली इंजीनियर्ड प्लास्मिड्स को शरीर में इंजेक्ट किया जाता है। इससे शरीर में कोविड-19 के स्पाइक प्रोटीन का उत्पादन होता है और इस तरह वायरस से बचाव वाले एंटीबॉडी पैदा होते हैं। ज्यादातर कोरोना वैक्सीन के 2 डोज लगते हैं लेकिन कैडिला की इस वैक्सीन के 3 डोज लगेंगे।
सूई से नहीं लगाने का क्या फायदा है?
इस वैक्सीन के बारे में एक और खास बात है। यह सूई से नहीं लगाई जाएगी। इसे एक खास डिवाइस के जरिए लगाया जाएगा। जायडस कैडिला का दावा है कि इस मेथड से वैक्सीन लगने की वजह से दर्द नहीं होगा। कंपनी का तो यहां तक दावा है कि इससे वैक्सीन के साइड इफेक्ट भी कम हैं।
कितनी कारगर है ZyCov-D?
फेज-3 के क्लीनिकल ट्रायल में ZyCov-D 66.6 प्रतिशत कारगर पाई गई है।
ZyCov-D को किसने बनाया है?
ZyCov-D को भारतीय कंपनी जायडस कैडिला ने बनाया है। इसे मिशन कोविड सुरक्षा के तहत सरकार के बायोटेक्नॉलजी डिपार्टमेंट के साथ साझीदारी में विकसित किया गया है।

पद्मश्री : खुद गरीबी के कारण पढ़ नहीं सके मगर सन्तरे बेचकर खोला स्कूल

बेंगलुरु : संतरे बेचने वाले 65 वर्षीय हरेकाला हजब्बा को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। हजब्बा को यह सम्मान शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक कार्य करने के लिए दिया गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में हजब्बा को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक पद्मश्री से नवाजा। र्नाटक के दक्षिण कन्नड़ा के न्यूपाड़ापू गांव के रहने वाले हरेकाला हजब्बा ने अपने गाँव में अपनी जमापूंजी से एक स्कूल खोला। इसके साथ ही वह हर साल अपनी बचत का पूरा हिस्सा स्कूल के विकास के लिए देते रहे। हजब्बा को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा 25 जनवरी 2020 में ही हुई थी, लेकिन फिर कोरोना वायरस महामारी के चलते समारोह का आयोजन नहीं हो सका।
कौन हैं हरेकला हजाब्बा ?
हरेकला हजब्बा कर्नाटक के मैंगलोर शहर में एक संतरा विक्रेता हैं. उनकी उम्र 65 साल है। अपने गाँव में स्कूल न होने की वजह से हजब्बा पढ़ाई न कर सके, लेकिन शिक्षा के प्रति समर्पण ऐसा था कि अब वो शिक्षितों के लिए भी मिसाल बनकर उभरे हैं।
 कैसे मिली स्कूल खोलने की प्रेरणा?
हजाब्बा पढ़े-लिखे नहीं हैं। यहां तक कि वो कभी स्कूल नहीं गए। वो बताते हैं, ‘एक दिन विदेशी कपल उनसे संतरे खरीदना चाहता था। उन्होंने कीमत भी पूछी। लेकिन मैं समझ नहीं सका। उन्होंने कहा कि यह मेरी बदकिस्मती थी कि मैं स्थानीय भाषा के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं बोल सकता। वह कपल चला गया। मुझे बेहद बुरा लगा। इसके बाद मुझे यह ख्याल आया कि गांव में एक प्राइमरी स्कूल होना चाहिए ताकि हमारे गांव के बच्चों को कभी उस स्थिति से गुजरना ना पड़े जिससे मैं गुजरा हूं।’
और फिर जब शुरू किया स्कूल
हजाब्बा ने गांववालों को समझाया और उनकी मदद से स्थानीय मस्जिद में एक स्कूल शुरू किया। इसके अलावा वो स्कूल की साफ-सफाई और बच्चों के लिए पीने का पानी भी उबालते। साथ ही, छुट्टियों के दौरान वह गांव से 25 किलोमीटर दूर दक्षिण कन्नड़ जिला पंचायत कार्यालय जाते और बार-बार अधिकारियों से शैक्षणिक सुविधाओं को औपचारिक रूप देने की विनती करते। हजाब्बा की मेहनत रंग लाई। जिला प्रशासन ने साल 2008 में दक्षिण कन्नड़ जिला पंचायत के अंतर्गत नयापुडु गांव में 14वां माध्यमिक स्कूल बनवाया।

क्या होती है सांसद निधि; क्यों ये सांसदों के बैंक खाते में नहीं भेजी जाती?

नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने अहम फैसले में सांसद निधि को बहाल कर दिया है। तकनीकी भाषा में इस योजना को संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीलैड) कहा जाता है। इस योजना के तहत देश के प्रत्येक सांसद यानी राज्यसभा और लोकसभा दोनों के सदस्यों को हर साल अपने क्षेत्र में विकास कार्य करवाने के लिए 5 करोड़ रुपये जारी किए जाते हैं। केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष की शेष अवधि से ही योजना को बहाल करने का फैसला किया है। ऐसे में चालू वित्त वर्ष की शेष अवधि के लिए सांसदों को एकमुश्त दो करोड़ रुपये जारी किए जाएंगे। उन्हें अगले वित्त वर्ष यानी 2022-23 से योजना की पूरी राशि मिलेगी।
केंद्र सरकार ने सांसद निधि को बहाल कर दिया है। एमपीलैड योजना को अप्रैल 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया था और इसका धन भारत के समेकित कोष में चला गया था। अब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फिर से इसे बहाल कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2021-22 की शेष अवधि के साथ ही योजना को बहाल कर दिया गया है। यह योजना 2025-26 तक जारी रहेगी।
कैसे शुरू हुई थी योजना
इस योजना की शुरुआत पहली बार वर्ष 1993 में हुई थी। उस वक्त देश में स्वर्गीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की सरकार थी। उस वक्त सांसदों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए एक करोड़ रुपये सालाना जारी किए जाते थे। कुछ साल बाद इस फंड को बढ़ाकर 2 करोड़ रुपये और फिर 2011-12 में मनमोहन सिंह की सरकार में पांच करोड़ रुपये कर दिया गया।
योजना का उद्देश्य
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के मुताबिक इस योजना का मुख्य उद्देश्य संसद सदस्यों को उनके निर्वाचन क्षेत्र में विकास से जुड़े कार्यों की सिफारिश करने में सक्षम बनाना है। सांसद इस पैसे से अपने क्षेत्र मे पीने के पानी, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के साथ सड़कों के निर्माण की सिफारिश कर सकते हैं।
सांसदों के खाते में नहीं जाता पैसा
इस योजना से उद्देश्य और दिशानिर्देशों से स्पष्ट है कि सांसद अपने क्षेत्र के विकास से जुड़े कार्यों की सिफारिश कर सकते हैं। इसका बिल्कुल यह मतलब नहीं हुआ कि यह पैसा सांसदों के खाते में जाता है और वह अपने हिसाब से खर्च करते हैं। सरकार के स्तर पर उनकी सिफारिश स्वीकार की जाती है और सरकार प्रशासनिक अमला उसे क्रियान्वित करता है।
इस साल कम मिलेगा फंड
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि 2021-22 की शेष अवधि के लिए हर एक सांसद को एक किश्त में दो करोड़ रुपये की राशि जारी की जाएगी। उन्होंने कहा कि 2022-23 से 2025-26 तक प्रत्येक सांसद को पांच करोड़ रुपये प्रति वर्ष दी जाएगी। इसे साल में 2.5 करोड़ रुपये की दर से दो किश्तों में जारी की जाएगी। कोविड-19 महामारी के दौरान मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया गया था कि साल 2020-21 से 2021-22 तक, एमपीलैड योजना के धन का उपयोग महामारी से निपटने में किया जाएगा।

आर्थिक स्थिति में सुधार के कारण योजना बहाल
सरकार का कहना है कि आर्थिक परिदृश्य में सुधार के मद्देनजर, जिस तरह से आर्थिक सुधार हुआ है और विभिन्न क्षेत्रों में भी विकास देखा गया है। वित्तीय वर्ष 2021-22 की शेष अवधि के लिए एमपीलैड योजना को बहाल करने का निर्णय लिया गया है। वित्‍त वर्ष 2021-22 के शेष महीनों के दौरान सांसद स्‍थानीय क्षेत्र विकास योजना को बहाल करने और 15वें वित्त आयोग की अवधि के साथ-साथ वित्‍त वर्ष 2025-26 तक इसे जारी रखने को मंजूरी दे दी है।
योजना पर 2025-26 तक 17 हजार करोड़ से अधिक खर्च
एमपीलैड को वित्त वर्ष 2021-22 की शेष अवधि के लिए फिर से शुरू करने और इसे 2025-26 तक जारी रखने पर कुल वित्तीय परिव्यय 17417 करोड़ रुपये होगा। अप्रैल 2020 से अब तक योजना निलंबित थी। इस कारण कुल 7,900 करोड़ रुपये की धनराशि का उपयोग बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे में सुधार और कोविड-19 महामारी से निपटने में किया जाएगा। सरकार ने सांसदों के वेतन में भी 30 फीसदी की कटौती की थी।
क्या है योजना
इस योजना के तहत सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों में हर साल पांच करोड़ रुपये तक के विकास कार्यों की सिफारिश कर सकते हैं। सरकार ने एक बयान में कहा है कि एमपीलैड योजना को फिर से शुरू करने और इसके क्रियान्वयन को जारी रखने से क्षेत्र में सामुदायिक विकास परियोजनाओं, कार्यों की फिर से शुरूआत होगी जो एमपीलैड के तहत धन की कमी के कारण रुक गयी थीं। इससे स्थानीय समुदाय की आकांक्षाओं और विकास संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने और स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण की फिर से शुरुआत होगी। सरकार ने कहा कि सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्‍वयन मंत्रालय ने 2021 के दौरान देश भर के 216 जिलों में एमपीलैड कार्यों का मूल्यांकन, तीसरे पक्ष के द्वारा करवाया है। मूल्यांकन रिपोर्ट में एमपीलैड को जारी रखने की सिफारिश की गयी है। बयान के मुताबिक इस योजना की शुरुआत से लेकर अब तक कुल 19.86 लाख से ज्यादा कार्य, परियोजनाएं पूरी की जा चुकी हैं जिन पर 54171.09 करोड़ रुपये की वित्तीय लागत आई है।

(साभार – न्यूज 18 डॉट कॉम)

भूली बिसरी यादें –2

डॉ. एस. आनन्द

उस समय की एक घटना याद आ गयी। बढ़ती बेरोजगारी और गिरते शिक्षा मूल्य को केन्द्रित कर मुझे एक व्यंग्य लिखना था और मैंने लिखा भी मगर जब वह गुप्ता जी के पास गया पढ़ने के लिए तो वह पढ़ने के बाद प्रूफ को रोककर मुझे अपने चेंबर में बुलाया और बोले- यह क्या लिख दिया? क्यों मारना चाहते हो अपने बाप को? अगर वह तुम्हारा बाप है तो मेरा मित्र भी और मैं अपने ही अख़बार में उसे भला कैसे मार सकता हूं। तुम इस कविता के कोटेशन को बदलो।
दरअसल वह कविता की पंक्तियां थीं-
ऐ मेरे बाप!
कब मरेंगे आप?
अब तक तो मैं हो जाता इंगेज
अगर करने दिया होता इंटरकास्ट मैरेज!
मैंने दलील दी-सर! यह तो कविता है, कोई हकीकत नहीं। उन्होंने कहा-चाहे जो भी हो, या तो तुम इसे बदलो या हटा दो। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैंने कहा- इसे बदल देते हैं सर! फिर मैंने उसे इस तरह कर दिया-
ऐ मेरे बाप!
कितने नालायक हैं आप?
यह बदलाव देखने के बाद गुप्ता जी एक पल के लिए मुस्कुराते हुए कहा- यह कुछ हद तक ठीक है इसलिए कि महेन्द्र शंकर तुम्हारे पिता हैं, अब वे लायक हैं या नालायक, इसका आकलन तुम खुद करो, यह कहकर वह जोर से हंसने लगे और मैं प्रूफ लेकर लेजर डिपार्टमेंट में आ गया।
आदरणीय गुप्ता जी सहज, सरल स्वभाव के धनी एक कुशल मार्गदर्शक रहे। वे एक जिज्ञासु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। एक बार का वाकया है। मैंने लस्टम पस्टम में एक ग़ज़ल की चा पंक्तियां लिखी थीं-
ये नये दौर के मसीहा हैं
एक रेशे का जाल करते हैं
रिन्द ऐसे कि देवता को भी
पेश जामे सिफाल करते हैं।
प्रूफ पढ़ने के बाद उन्होंने मुझे अपने चेम्बर में बुलाया। मै डरा सहमा हाजिर हुआ तो उन्होंने बैठने का इशारा किया। दराज खोलकर दो बिस्किट निकाल कर मुझे देते हुए बोले-जानदार है तुम्हारा यह व्यंग्य, काफी मारक है मगर एक बात बताओ, रिन्द माने क्या होता है? मैंने कहा सर! इसके माने होता है -पीने वाला। यह सुनते ही उन्होंने अपनी डायरी निकाली और उसमें इसे लिखा। चलते-चलते उन्होंने अपने पाकेट से 200 रुपये निकाल कर देते हुए कहा-लो इससे मिठाई खा लेना। मैंने कहा-सर जी! इस कालम के लिखने का पैसा तो मुझे मिलता है तो उन्होंने कहा-यह मैं दे रहा हूं, वह आफिस देता है। मैं उनकी बात सुनकर निरुत्तर हो बाहर निकल आया।
सन्मार्ग के सम्पादकीय और विज्ञापन व सर्कुलेशन तथा एकाउंट विभाग में काम करने वाले प्राय: उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान के लोग थे। विज्ञापन में रमेशचंद्र अग्रवाल, मुन्नीलाल सिंह व राजेश अग्रवाल तीन लोग ही मुख्यतया काम करते थे। सन्मार्ग विज्ञपनों के मामले में काफी धनी था क्योंकि वह नम्बर एक था। हर कर्मचारी अपने दायित्व को बखूबी समझता और उसका निर्वहन करता। गुप्ता जी का प्रोत्साहन इसमें संजीवनी का काम करता था। उन्हें अखबार का सारा हिसाब किताब जुबानी याद था। संपादकीय में रमाकांत उपाध्याय, रामखेलावन त्रिपाठी रुक्म, राधाकृष्ण प्रसाद, हरिराम पाण्डेय, अजय सिंह तोमर, मोतीलाल चौधरी, महमिया अजय, रवीन्द्र पांडेय, विमल कुमार राय, ओमप्रकाश मिश्र तथा रिपोर्टिंग में राजेंद्र उपाध्याय, राज मिठौलिया कार्यरत थे। प्रूफ सेक्शन में राजीव नयन, जे.चतुर्वेदी चिराग और पार्ट टाइमर वहशी जी। इतने ही लोगों ने अपनी मेहनत और ईमानदारी से अपने दायित्व को बखूबी निभाया और दिनों दिन सन्मार्ग प्रगति के पथ पर तेजी से आगे बढ़ता रहा। (क्रमश:)

पद्मश्री : मजदूरी के साथ की चित्रकारी, विदेश जाते हैं भूरी बाई के चित्र

भोपाल : भील जनजाति की संस्कृति को दीवारों और कैनवास पर उकरने वाली एमपी की भूरी बाईको पद्मश्री पुरस्कार मिला है। राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया है। इसके बाद भूरी बाई काफी खुश नजर आई हैं। भुरी बाई का बचपन काफी गरीबी में गुजरा है। वह भोपाल स्थित भारत भवन में कभी मजदूरी करती थीं। साथ ही साथ पेटिंग भी करती थीं।
पद्मश्री से सम्मानित होने के बाद भूरी बाई ने कहा कि ये पुरस्कार मुझे आदिवासी भील पेंटिंग करने के लिए मिला है, मैंने मिट्टी से पेंटिंग की शुरुआत की थी। मैं भोपाल के भारत भवन में मजदूरी करती थी और उसके साथ पेंटिंग भी बनाती थी। मेरी पेंटिंग आज देश विदेश में जाती है। मैं बहुत खुश हूँ।
ठीक से हिंदी नहीं बोल पाती भूरी बाई
गौरतलब है कि पिछड़े इलाके से आने वाली भूरी बाई आज भी सही से हिंदी नहीं बोल पाती हैं। लेकिन इस पुरस्कार के मिलने के बाद वह अभिभूत हैं। भूरी बाई अभी जनजातीय संग्रहालय भोपाल में कलाकार के पद पर पदस्थ हैं।
गरीबी में बीता बचपन
भूरी बाई बरिया का जीवन गरीबी में बीता है। अवॉर्ड की घोषणा होने के बाद उन्होंने कहा था कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी चित्रकारी का शौक ही मेरी पहचान बन जाएगी। उन्होंने कहा था कि मेरे लिए बाहर जाना तो दूर की बात है, मुझे तो ठीक से हिंदी भी बोलनी नहीं आती है। मेरा बचपन गरीबी में बीता है, लेकिन अब खुशी है कि मैं अपने बच्चों के लिए कुछ पाई हूं।
अमेरिका तक पेटिंग की माँग
भूरी बाई जनजातीय संग्रहालय के बगल में स्थित भारत भवन में कभी मजदूरी करती थीं। वहीं, अब प्रदेश की मशहूर चित्रकार बन गयी हैं। उनकी बनाई पेंटिंग्स मध्यप्रदेश संग्रहालय से लेकर अमेरिका तक अपनी छाप छोड़ चुकी है। कला के क्षेत्र में एमपी का सर्वोच्च सम्मान उनके नाम दर्ज है। आज की तारीख में वह अलग-अलग जिलों में जाकर भील आर्ट और पिथोरा आर्ट पर कार्यशाला करवाती हैं।

पंजाब के 3,20,000 सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध में संभाला था ब्रिटिश सेना का मोर्चा

97 साल तक गुमनाम रही ‘वीरगाथा’

लंदन : पहले विश्व युद्ध में लड़ने वाले पंजाब के 320,000 सैनिकों के रेकॉर्ड 97 सालों तक एक तहखाने में गुमनामी के अंधेरे में खोए रहे। अब ब्रिटेन के इतिहासकारों ने युद्ध में भारतीय सैनिकों के योगदान को लेकर इनका खुलासा किया है। ये फाइलें पाकिस्तान के लाहौर म्यूजियम की गहराइयों में मिली हैं। इन्हें अब डिजिटल रूप में बदलकर  Armistice Day के लिए एक वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है। अभी तक ब्रिटिश और आयरिश सैनिकों के वंशजों और इतिहासकारों के पास सर्विस रेकॉर्ड के सार्वजनिक डेटाबेस मौजूद थे। लेकिन भारतीय सैनिकों के परिवारों के पास ऐसी कोई सुविधा मौजूद नहीं थी। पंजाबी मूल के कुछ ब्रिटिश नागरिकों को डेटाबेस में अपने पूर्वजों की खोज के लिए पहले ही आमंत्रित किया जा चुका है। परिवारों ने पाया कि उनके गांव के सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस, मध्य पूर्व, गैलीपोली, अदन और पूर्वी अफ्रीका के साथ-साथ ब्रिटिश इंडिया के अन्य हिस्सों के लिए अपनी सेवा दी थी।
युद्ध में शामिल हुए ब्रिटिश सिख मंत्री के परदादा
पंजाब 1947 में भारत और पाकिस्तान के बीच दो हिस्सों में विभाजित हो गया था। ब्रिटिश मंत्री तनमनजीत ढेसी ने फाइलों से सबूतों को उजागर करते हुए बताया कि उनके परदादा ने इराक में सेवा की थी। इस कार्रवाई में वह घायल हो गए थे और अपना एक पैर खो दिया था। यह आशा की जाती है कि ये रेकॉर्ड भारतीय सैनिकों के योगदान के बारे में मिथकों को दूर करने में मदद करेंगे।
सैनिकों की भर्ती का ‘प्रमुख मैदान’ था पंजाब
यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन के अध्यक्ष अमनदीप मदरा ने फाइलों को डिजिटाइज़ करने के लिए ग्रीनविच विश्वविद्यालय के साथ काम किया है। उन्होंने बताया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना की भर्ती के लिए पंजाब प्रमुख ‘भर्ती मैदान’ था। इसके बाद भी ज्यादातर लोगों का योगदान गुमनाम ही रहा। ज्यादातर मामलों में हम उनके नाम तक नहीं जानते हैं। सभी धर्मों के पंजाबी, जिनमें हिंदू, मुस्लिम और सिख शामिल थे, भारतीय सेना का लगभग एक तिहाई हिस्सा और साम्राज्य की संपूर्ण विदेशी सेना का करीब छठा हिस्सा थे।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

बेशकीमती हीरे जड़े कंगन 61 करोड़ रुपये में बिके

फ्रांस की रानी के गहने हुए नीलाम
जिनेवा : फ्रांसीसी राजा लुई 16वें की प्रसिद्ध पत्नी मैरी एंटोनेट के कंगन की एक जोड़ी नीलामी में 7.46 मिलियन स्विस फ्रै़ंक्स (8.34 मिलियन डॉलर) में बिकी। इन कंगनों पर बेशकीमती हीरे जड़े हुए हैं। ये फ्रांसीसी शाही परिवार के गहनों के दुर्लभ अवशेषों में से एक हैं। जिनेवा में क्रिस्टी की नीलामी में इन कंगनों ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा।
इसमें 112 हीरे लगे हुए हैं और प्रत्येक हीरे का वजन 97 ग्राम (3.4 औंस) है। इसके अलावा इसमें चांदी और सोना भी लगा हुआ है। ये कंगन दो से चार मिलियन स्विस फ्रैंक्स के पूर्व-बिक्री अनुमान से कहीं अधिक कीमत पर बिके। अंतिम कीमत में टैक्स और दूसरे शुल्क भी शामिल थे। अभी खरीदार की पहचान उजागर नहीं की गई है। बुधवार को सोथबीज ने भी नीलामी का आयोजन किया जिसमें 26.8 कैरेट का एक नीलम और मैचिंग ईयर क्लिप्स बिक्री के लिए रखी गई थीं।
रूस के शाही गहने हुए नीलाम
ये गहने कभी रूस की ग्रैंड डचेस मारिया पावलोवना के थे। 1917 में रूस की क्रांति के दौरान ये देश से बाहर चले गए थे। इन तीनों के 480,000 फ़्रैंक (525,800 डॉलर) तक पहुंचने की उम्मीद है। दूसरी ओर अमेरिका में शर्लॉक होम्स के नॉवेल ‘द हाउंड ऑफ द बास्करविल्स’ की मूल स्क्रिप्ट का एक हैंडरिटेन पेज 423,000 डॉलर यानी 3.13 करोड़ रुपए में बेचा गया है।
शेरलॉक होम्स की स्क्रिप्ट हुई नीलाम
20×33 सेमी का यह पेज टेक्सास के डलास में हेरिटेज नीलामी की ओर से एक निजी खरीदार को बेचा गया था। जानकारी के मुताबिक पेज अच्छी स्थिति में है। इसकी शीर्षक ‘चैप्टर XIII, फिक्सिंग द नेट्स’ है। इसमें होम्स और डॉ वाटसन को मूर पर एक हत्या और एक संदिग्ध को गिरफ्तार करने के बारे में चर्चा करते हुए दिखाया गया है। पेज में एक लाइन कटी हुई भी है जहां इस पुस्तक के लेखक कॉनन डॉयल ने स्क्रिप्ट में सुधार किया था।

15 हजार पौधे, पानी में उगा रहे स्ट्रॉबेरी, लौकी और करेला जैसी सब्जियां

बरेली : अभी तक फार्म हाउस के बारे में तो खूब सुना होगा लेकिन बरेली के एक पत्रकार ने अपने मकान को हाउस फार्म में बदलकर अनूठी मिसाल पेश की है। रामवीर ने अपने मकान में ही हाइड्रोपोनिक्स विधि से अलग-अलग तरह के 15 हजार पौधे और बेल लगा रखी हैं। उनके पास 100 बीघा खेत भी हैं, जहां वह ऑर्गेनिक खेती करते हैं।
एक घटना ने दिखाई राह
जीवन में एक घटना के बाद रामवीर ने ठान लिया कि वह अब ऑर्गेनिक खेती ही करेंगे। बात 2016 की है। उनके दोस्त के चाचा का कैंसर से निधन हो गया। वह कोई नशा नहीं करते थे। बाद में डॉक्टरों ने बताया कि इसकी वजह कीटनाशक हो सकते हैं जो सब्जियों और हमारे घरों में आने वाले अन्य खाने की चीजों में इस्तेमाल किए जाते हैं। उसके बाद से एक अभियान के तौर पर रामवीर ऑर्गेनिक खेती करने लगे।
60 रुपये किलो आटा, 150 रुपये किलो गुड़
रामवीर का पूरा ध्यान खेती पर है और अभी वह फ्रीलांसिंग ही कर रहे हैं। अब वह ऑर्गेनिक खाद्य उत्पाद भी तैयार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 60 रुपये प्रति किलो गेहूं का आटा बेच रहे हैं। चावल 130 रुपये प्रति किलो और गुड़ का पाउडर 150 रुपये किलो बिकता है। वह छोटे किसानों को नि:शुल्क प्रशिक्षण भी देते हैं।
हाइड्रोपोनिक्स विधि पर एक नजर
केवल पानी में या बालू या कंकड़ों के बीच नियंत्रित जलवायु में बिना मिट्टी के पौधे उगाने की तकनीक को हाइड्रोपोनिक कहते हैं। हाइड्रोपोनिक शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों ‘हाइड्रो’ और ‘पोनोस’ से मिलकर हुई है। हाइड्रो का मतलब है पानी, जबकि पोनोस का अर्थ है कार्य।
( साभार – नवभारत टाइम्स)