Saturday, July 4, 2026
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काशी के युवा ने बड़ा पैकेज छोड़ शुरू किया ‘चाय बार’, यहां मिलती है 150 किस्‍म की चाय

अभिषेक कुमार झा
वाराणसी : बनारस की किसी गली, नुक्कड़-चौराहे की चाय दुकान पर हाथों में चाय लेकर बतकही करना बनारसियों का एक पसंदीदा शगल है, लेकिन बनारसी चाय की दुकानों का रूप अब बदलने लगा है। काशी के युवाओं और विदेशियों को अब नए फैशनेबल चाय की दुकान या बनारसी भाषा में कहा जाए तो चाय की अड़ी (अड्डा) का स्वरूप अब बदलने लगा है। वाराणसी के कौस्तुभ ने बड़े पैकेज वाली नौकरी को छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू किया। 26 साल के इस युवा ने ये मन बनाया कि अब काशी की इस पारम्परिक जीवनशैली में वो अपने नए आइडिया के साथ काम करेगा और स्वरोजगार को अपनाएगा।
अमित शाह का सुना भाषण और खोल दिया चाय बार
कौस्तुभ ने एनबीटी ऑनलाइन से बातचीत में बताया कि 2018 में वर्तमान गृह मंत्री मंत्री अमित शाह ने रोजगार पर भाषण दे रहे थे। उस दौरान उन्होंने कहा था कि युवा स्वरोजगार अपनाकर भी बड़े एंटरप्रेन्योर बन सकते हैं। पकोड़ा तलना या चाय बेचने पर विपक्षी पार्टियों द्वारा लगातार तंज कसे जाते थे, लेकिन अमित शाह ने भाषण में चाय पकोड़ा बेचने को स्वरोजगार और स्वभिमान से जोड़ दिया था। इसका कौस्तुभ पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसने बढ़िया सैलेरी और इंसेंटिव की नौकरी छोड़ चाय बार खोलने का मन बना लिया। अपनी सेविंग्स और पिता से थोड़ी मदद लेकर कौस्तुभ ने नगवां चौराहे के पास चाय बार खोल दिया। यूनिक कांसेप्ट पर खोले जाने की वजह से कौस्तुभ अब अच्छा खासा मुनाफा भी कमा रहे हैं।
150 से ज्यादा किस्म की चाय बनाते हैं कौस्तुभ
अपने चाय बार को डिज़ाइनर लुक देते हुए कौस्तुभ ने इसमें दुनिया भर में मिलने वाली 150 से ज्यादा किस्म की चाय का ऑप्शन ग्राहकों के लिए रखा। चाय बार में 15 रुपये से लेकर 600 रुपये की चाय इस चाय बार में मिलती है। बढ़िया साफ सुथरे हाईजीनिक तरीके से बनाने की वजह से और शानदार ओपन कैफ़े की लुक की वजह से ये चाय बार लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कौस्तुभ बताते हैं कि चाय बार के नाम से ब्रांड का रजिस्ट्रेशन भी करवाया है और भविष्य में इसकी फ्रेंचाइजी चेन को भी विकसित करेंगे।

‘ल’ नहीं बोल पाते थे सिंधु घाटी सभ्यता के लोग, भाषा को लेकर हुए बड़े खुलासे

इस्लामाबाद : भाषा सिर्फ संचार का माध्यम ही नहीं है। इतिहासकारों के लिए यह हमेशा प्राचीन सभ्यताओं और समाज के ढांचे को समझने का एक अहम साधन रही है। हाल ही में हुए एक भाषाई अध्ययन से जो परिणाम सामने आए हैं वह प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता और द्रविड़ों के बीच के संबंधों को गहरा करते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप में फैली सबसे पुरानी शहरी सभ्यता है। नेचर जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च से पता चलता है कि इस सभ्यता की आबादी का एक बड़ा हिस्सा पैतृक द्रविड़ भाषाएं बोलता था।
भाषा अभी तक बनी हुई है रहस्य
सिंधु घाटी सभ्यता अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के दस लाख किलोमीटर में फैली हुई थी। यह ताम्रपाषाण सभ्यताओं में सबसे ज्यादा फैली हुई सभ्यता थी। 1926 में इसकी खोज के बाद से ही सभ्यता के पुरातत्व स्थल हमेशा से ही शोधकर्ताओं के लिए एक दिलचस्प विषय रहा है। हालांकि इस सभ्यता में लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को अभी तक समझा नहीं जा सका है।
एक जैसे पाए गए कुछ अक्षर
एक सॉफ्टवेयर डेवलपर और शोधकर्ता बहता अंशुमाली मुखोपाध्याय ने भाषाई और ऐतिहासिक सबूतों का विश्लेषण किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि प्राचीन पर्सिन अभिलेखों के कुछ शब्द प्रोटो-द्रविड़ भाषा से कैसे मेल खाते हैं। उदाहरण के लिए फारसी अभिलेखों में हाथी के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द pri, pru, मूल रूप से ‘प्लू’ से लिए गए हैं, जो स्तनपायी के लिए एक प्रोटो-द्रविड़ शब्द है।
कई भाषाएं बोले जाने का दावा
बहाता ने वायर को बताया कि प्राचीन ईरानी भाषाओं ने इस शब्द को अपनाया और इसे संशोधित किया क्योंकि वे ‘L’ अक्षर का उच्चारण ‘R’ के रूप में करते थे। वर्तमान समय में, सिंधु घाटी महाद्वीप के एक विशाल क्षेत्र में फैली हुई है और विभिन्न प्रकार की भाषाओं का समर्थन करती है, जिसमें ये हिंदी, पंजाबी, सिंधी, मारवाड़ी, गुजराती, शिना, खोवर, कोहिस्तान, बलूची, पश्तो, दारी और वाखी शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि खेती के प्रसार सेपहले करीब 12,000 से 20,000 भाषाएं बोली जाती थीं।

14 साल की उम्र में दीक्षा शिंदे को फेलोशिप देना चाहता है नासा

औरंगाबाद : महाराष्ट्र के औरंगाबाद की रहने वाली दीक्षा शिंदे ने भारत का नाम दुनियाभर में रोशन कर दिया है। महज 14 साल उम्र में दीक्षा शिंदे का सेलेक्शन नासा ने अपने यहाँ फेलोशिप के लिए किया है। दीक्षा शिंदे को नासा के एमएसआई फैलोशिप वर्चुअल पैनल पर पैनलिस्ट के रूप में चुना गया था। न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए बताया कि उनको नासा की यह फेलोशिप कैसे मिली। दीक्षा शिंदे ने बताया उन्होंने ब्लैक होल और गॉड पर एक थ्योरी लिखी थी।
दीक्षा को कैसे मिली फेलोशिप?
दीक्षा ने बताया कि उसके आर्टिकल को तीन प्रयासों के बाद नासा ने स्वीकार किया था। दीक्षा ने कहा कि उन्होंने मुझे अपनी वेबसाइट के लिए एक आर्टिकल लिखने के लिए कहा था। नासा में सेलेक्शन होने के बाद सोशल मीडिया पर दीक्षा की जमकर तारीफ हो रही है।

सेना की 5 महिला अधिकारियों को मिला कर्नल रैंक में प्रमोशन

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद खुला था रास्ता
नयी दिल्ली : भारतीय सेना के चयन बोर्ड ने पांच महिला अधिकारियों को टाइम स्केल के हिसाब से कर्नल रैंक में प्रमोशन देने का रास्ता साफ किया है। 26 साल की सेवा पूरी होने के बाद यह टाइम स्केल प्रमोशन दिया गया। पहली बार सेवा में सिग्नल कोर, इलेक्ट्रॉनिक और मेकेनिकल इंजीनियर्स कोर और इंजीनियर्स कोर में महिला अधिकारियों को कर्नल के रैंक में प्रमोशन दिया गया है। कर्नल टाइम स्केल रैंक के लिए चयनित पांच महिला अधिकारियों में कोर ऑफ सिग्नल से लेफ्टिनेंट कर्नल संगीता सरदाना, ईएमई कोर से लेफ्टिनेंट कर्नल सोनिया आनंद और लेफ्टिनेंट कर्नल नवनीत दुग्गल और कोर ऑफ इंजीनियर्स से लेफ्टिनेंट कर्नल रीनू खन्ना और लेफ्टिनेंट कर्नल रिचा सागर हैं। पहले सिर्फ मेडिकल कोर, लीगल और एजुकेशन कोर में ही महिला अधिकारियों को यह प्रमोशन दिया जाता था। क्योंकि इन्हीं ब्रांच में महिला अधिकारियों के लिए परमानेंट कमिशन था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद महिला अधिकारी अब उन सभी ब्रांच में परमानेंट कमिशन पा सकती हैं जिनमें वह शॉर्ट सर्विस कमिशन के तहत आई हैं। पहली बार आर्मी एयर डिफेंस, सिगनल्स, इंजीनियर्स, आर्मी एविएशन, इलैक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स, आर्मी सर्विस कोर, आर्मी ऑर्डिनेंस कोर और इंटेलिजेंस कोर में महिला अधिकारियों को परमानेंट कमिशन मिला और वह कर्नल बनने के लिए रेस में शामिल हुई।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इंडियन आर्मी ने 615 महिला अधिकारियों के लिए परमानेंट कमिशन का स्पेशल बोर्ड बैठाया था। जिसमें करीब 50 महिला अधिकारियों ने स्वेच्छा से आगे सर्विस करने से मना कर दिया। 277 महिला अधिकारियों को परमानेंट कमिशन दिया गया। कुछ महिला अधिकारी जो इस स्क्रीनिंग में बाहर हो गई थी, कोर्ट ने उनके मामले को फिर से देखने के निर्देश दिए। जिसके बाद अब 147 और महिला अधिकारियों को परमानेंट कमिशन दिया गया। इस तरह कुल 615 महिला अधिकारियों को कंसीडर किया गया जिनमें से 424 को परमानेंट कमिशन दे दिया गया।

17 साल की उम्र में छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई, अब 75 साल की दादी सूफिज्म में कर रहीं पीएचडी

मुम्बई : सफेद सलवार कुर्ता और मैचिंग के कलर वाला हिजाब पहले वह सोफे पर बैठी हुई हैं। सामने दीवार पर अरबी में कुछ सजावट के रूप में एक अभिलेख है जिस पर अल्लाह के 99 नाम लिखे हुए हैं। उनमें से एक नाम है रहमान। 75 साल की जुबैदा याकूब खंडवानी कहती है कि यह अल्लाह की मेहर है, जो उन्हें बाधाओं का सामना किए बिना ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।सूफीवाद पर पीएचडी के लिए रिसर्च
यह सकारात्मक उर्जा है जो उन्हें सबसे अलग बनाती है। जिस उम्र में लोग आराम को तरजीह देते हैं या अपने अतीत को कागजों में उतार रहे होते हैं, उस उम्र में इस दादी का जज्बा ऐसा है कि वह सूफीवाद पर डॉक्टरेट के लिए रिसर्च कर रही हैं। जुबैदा कहती है कि मैंने इसे एक दशक पहले खत्म कर लिया होता लेकिन कुछ दिक्कतें पेश आ गईं। उन्होंने बताया कि मेरे गाइड, प्रसिद्ध उर्दू, फ़ारसी और इस्लामी अध्ययन के विद्वान प्रो निज़ामुद्दीन गोरेकर (उन्होंने दक्षिण मुंबई में सेंट जेवियर्स कॉलेज सहित कई संस्थानों में पढ़ाया) का निधन हो गया।
उन्होंने कहा कि उसके बाद मेरे शौहर का भी इंतकाल हो गया। जुबैदा के पति याकूब खंडवानी बिजनसमैन थे। वह पूर्व विधायक और हज कमेटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अमीन खंडवानी के छोटे भाई थे। उन्होंने कहा कि इसके बाद मैं गिर गई और मेरे हाथ में फ्रैक्चर हो गया। जुबैदा के बेटे साहिल खंडवानी कहते हैं कि कोई और होता तो इतना सब होने के बाद हिम्मत हार गया होता लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सोहेल माहिम दरगाह के मैनेजिंग ट्रस्टी और हाजी अली दरगाह के ट्रस्टी है। 200 से अधिक वर्षों की विरासत वाला एक परिवार, यह एक ही घर खंडवानी हाउस में रहने वाले खंडवानी की पांचवीं पीढ़ी है। 17 साल की उम्र में छोड़नी पड़ी पढ़ाई
जुबैदा बमुश्किल से 17 साल की थीं जब उनकी मां की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी शादी हो गई। उन्हें अपनी कॉलेज की पढ़ाई छोड़नी पड़ी।। बाद में उन्होंने पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया। बाद में एलएलबी भी पूरी की। सोहेल याद करते हैं कि एक समय था जब मेरी मां, मेरी बड़ी बहन और मैं बांद्रा में सिंधियों द्वारा संचालित एक ही एजुकेशन कॉम्पलेक्स में पढ़ते थे। उन्होंने कहा कि मुझे तब थोड़ी शर्मिंदगी होती थी कि मैं और मेरी मां अलग-अलग क्लास में जाते थे। सोहेल याद करते हैं कि असली आश्चर्य तब हुआ जब उनके पिता ने अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन करने का फैसला लिया। उस समय उनकी मां ने इस्लामिक अध्ययन में एमए कोर्स में दाखिला लिया था।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

 

कोविड-19 : रक्षा प्रदान करने वाले एंटीबॉडी का पता चला

वाशिंगटन : अनुसंधानकर्ताओं ने एक ऐसे एंटीबॉडी का पता लगाया है जो सार्स-सीओवी-2 वायरस के व्यापक स्वरूपों के खिलाफ अत्यधिक सुरक्षा प्रदान करता है। ‘इम्यूनिटी’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के निष्कर्षों से एंटीबॉडी आधारित नई उपचार पद्धतियां विकसित करने में मदद मिल सकती हैं, जिनकी क्षमता वायरस के विभिन्न स्वरूपों के सामने आने के बाद भी कम नहीं होती।
अमेरिका स्थित ‘वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसन इन सेंट लुइस’ के प्रोफेसर और मुख्य अनुसंधानकर्ता माइकल एस डायमंड ने कहा, ‘‘मौजूदा एंटीबॉडी कुछ स्वरूपों के खिलाफ कारगर हैं, लेकिन ये सभी स्वरूपों पर कारगर नहीं हैं।’’ डायमंड ने कहा, ‘‘यह वायरस समय और स्थान के साथ स्वरूप बदलना जारी रखेगा।’’ उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत रूप से काम करने वाले प्रभावी एंटीबॉडी को मिलाकर नए संयोजन बनाने से व्यापक स्वरूपों से लड़ने में मदद मिल सकती है। व्यापक स्वरूपों पर काम करने वाले एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने ‘रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन’ (आरबीडी) के रूप में जाने जाने वाले स्पाइक प्रोटीन के एक महत्वपूर्ण हिस्से के साथ चूहों को प्रतिरक्षित किया। फिर उन्होंने एंटीबॉडी-बनाने वाली कोशिकाओं को निकाला और उनसे आरबीडी को पहचानने वाली 43 एंटीबॉडी प्राप्त कीं। उन्होंने दो ऐसे एंटीबॉडी का चयन किया जो चूहों को संक्रमण से बचाने में सबसे प्रभावी थे और संक्रमण के स्वरूपों के एक पैनल के खिलाफ उनकी जांच की। अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि एक एंटीबॉडी, सार्स2-38 ने सभी स्वरूपों को आसानी से निष्प्रभावी कर दिया।

 

भारतीय स्टार्टअप कंपनियों ने जून तिमाही में जुटाया 6.5 अरब डॉलर का निवेश : रिपोर्ट

नयी दिल्ली : देश की स्टार्टअप कंपनियों को चालू कैलेंडर वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में 6.5 अरब डॉलर का निवेश मिला है। वहीं 11 स्टार्टअप इकाइयां प्रतिष्ठित यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हो गयी हैं। यूनिकॉर्न से तात्पर्य एक अरब डॉलर से अधिक के मूल्यांकन से है। नास्कॉम-पीजीए लैब्स की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है।
रिपोर्ट के अनुसार दूसरी तिमाही में स्टार्टअप इकाइयों में निवेश के 160 सौदे पूरे हुए। यह जनवरी-मार्च की अवधि की तुलना में दो प्रतिशत अधिक है। रिपोर्ट कहती है, ‘‘2021 की दूसरी तिमाही स्टार्टअप की वृद्धि की कहानी की दृष्टि से शानदार रही। जहां इस तिमाही के दौरान स्टार्टअप इकाइयों को सबसे अधिक वित्तपोषण मिला, वहीं इस दौरान यूनिकॉर्न की संख्या में सबसे अधिक का इजाफा हुआ। कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान भारतीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र ने अपनी जुझारू क्षमता का परिचय दिया है।’’जून तिमाही में भारतीय स्टार्टअप्स को 6.5 अरब डॉलर का निवेश मिला, जो तिमाही-दर-तिमाही आधार पर 71 प्रतिशत की वृद्धि है।
तिमाही के दौरान सबसे बड़ा सौदा….फूड डिलिवरी मंच स्विगी का रहा। स्विगी ने इस दौरान 80 करोड़ डॉलर का कोष जुटाया। शेयरचैट ने 50.2 करोड़ डॉलर, बायजूस ने 34 करोड़ डॉलर, फार्मईजी ने 32.3 करोड़ डॉलर और मीशो ने 30 करोड़ डॉलर जुटाए। इसके अलावा पाइन लैब्स ने 28.5 करोड़ डॉलर, देल्हीवेरी ने 27.7 करोड़ डॉलर, जेटा ने 25 करोड़ डॉलर, क्रेड ने 21.5 करोड़ डॉलर और अर्बन कंपनी ने 18.8 करोड़ डॉलर की राशि जुटाई।
पीजीए लैब्स के निदेशक, कॉम्पेटिटिव इंटेलिजेंस अभिषेक मैती ने कहा, ‘‘जून, 2021 तक 53 यूनिकॉर्न वाले भारतीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र ने अप्रैल-जून तिमाही में काफी अच्छा प्रदर्शन किया। तिमाही के दौरान जहां सबसे अधिक वित्तपोषण के सौदे हुए, वहीं एक तिमाही में सबसे अधिक संख्या में यूनिकॉर्न भी जुड़ीं।’’ मैती ने कहा कि लॉकडाउन अंकुशों में ढील के बाद आगे की छमाही में भी सौदों के हिसाब से भारतीय बाजार की स्थिति बेहतर नजर आ रही है।

दक्षिण भारतीय अभिनेत्री चित्रा का निधन

चेन्नई : दक्षिण भारतीय फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री चित्रा का गत शनिवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। नजदीकी पारिवारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी। कई भारतीय भाषाओं की फिल्मों में काम करने वाली 56 वर्षीय अभिनेत्री के परिवार में पति और एक बेटी है। तेल के एक बहुत बड़े ब्रांड से जुड़ने के कारण चित्रा को ‘नल्लनई’ के नाम से भी जाना जाता था। चित्रा ने चेन्नई में शालीग्राम स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। पारिवारिेक सूत्रों के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार आज ही होगा।
चित्रा का जन्म केरल के कोच्चि शहर में हुआ था और उन्होंने 1990 के दशक में अपने बेहतरीन अभिनय के जरिए तमिल फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने रजनीकांत, सरथकुमार और प्रभु समेत कई अन्य दिग्गज अभिनेताओं के साथ कई फिल्मों में काम किया। चित्रा ने 1975 में निर्देशक के बालाचंदर की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता तमिल फिल्म ‘अपूर्व रागंगल’ में एक बाल कलाकार के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की। चित्रा ने कमल हासन और श्रीविद्या जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ भी काम किया। उन्होंने कई मलयालम, तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया।

संवैधानिक जनादेश का महत्वपूर्ण पहलू है व्यक्तिगत स्वतंत्रता : उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने कहा कि महज इसलिए किसी को गिरफ्तार करना कि यह कानूनी रूप से वैध है, इसका यह मतलब नहीं है कि गिरफ्तारी की ही जाए। साथ ही उसने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता संवैधानिक जनादेश का एक महत्वपूर्ण पहलू है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर नियमित तौर पर गिरफ्तारी की जाती है तो यह किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा एवं आत्मसम्मान को ‘‘बेहिसाब नुकसान’’ पहुंचा सकती है।
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय की पीठ ने कहा कि अगर किसी मामले के जांच अधिकारी को यह नहीं लगता कि आरोपी फरार हो जाएगा या सम्मन की अवज्ञा करेगा तो उसे हिरासत में अदालत के समक्ष पेश करने की आवश्यकता नहीं है। पीठ ने इस हफ्ते की शुरुआत में एक आदेश में कहा, ‘‘हमारा मानना है कि निजी आजादी हमारे संवैधानिक जनादेश का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जांच के दौरान किसी अभियुक्त को गिरफ्तार करने की नौबत तब आती है जब हिरासत में पूछताछ आवश्यक हो जाए या यह कोई जघन्य अपराध हो या ऐसी आशंका हो कि गवाहों को प्रभावित किया जा सकता है या अभियुक्त फरार हो सकता है।’’

रक्षाबन्धन पर स्वदेशी राखियों की भारी माँग से चीनी राखियों को लगा झटका

नयी दिल्ली : देश में हाल ही में रक्षाबन्धन का त्योहार उत्साह के साथ मनाया गया और कारोबारियों के लिए भी यह त्योहार खुशियों भरा रहा। इस बार देश में भारतीय राखियों का ही जलवा रहा और लोगों ने चीनी राखियों से परहेज किया। इस कारण चीन को 5,000 करोड़ रुपये का झटका लगा है। कन्फडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ( सीएआईटी) यानी कैट ने लोगों से स्वदेशी राखियां अपनाने का आह्वान किया था। कैट ने दावा किया कि इस बार स्वदेशी राखियों की माँग अधिक रही और भारतीय सामान से बनी राखियाँ ही बिकीं। कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी सी भरतिया एवं राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने बताया की इस वर्ष देश के 40 हजार से ज्यादा व्यापारी संगठनों ने देशभर के सभी शहरों में घरों में काम करने वाली महिलाओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और स्लम बस्तियों में रहने वाली महिलाओं से बड़ी मात्रा में राखियां बनवाई।
ये राखियां रही आकर्षण का केंद्र
कैट के मुताबिक स्वदेशी राखियों में विशेष रूप से आजादी अमृत महोत्सव राखी, ‘अक्साई चीन हमारा है’ के सन्देश वाली राखी, जय हिन्द राखी, वन्देमातरम राखी तथा वैदिक राखी देश भर में आकर्षण का केंद्र रहीं। भारतीय राखियों के कारण इस वर्ष चीन को 5 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के राखी कारोबार से देश भर के व्यापारियों ने बड़ी चोट दी। विभिन्न राज्यों के व्यापारिक संगठनों के सहयोग से करोड़ों राखियां बनवाई। प्रति वर्ष देश में लगभग 50 करोड़ राखियों की मांग रहती है।कैट के आह्वान पर पर देशभर में पहली बार अनेक प्रकार की विशिष्ट राखियां बनवाई गई जिसमें नागपुर में बनी खादी की राखी, जयपुर में सांगानेरी कला की राखी, पुणे में खेती के बीज राखी, मध्य प्रदेश के सतना में ऊन की राखी, झारखंड के जमशेदपुर में आदिवासी वस्तुओं की राखी, असम के तिनसुकिया में चाय की पत्तियों की राखी, कोलकाता में जूट की राखी, मुंबई में सिल्क की राखी, केरल में खजूर की राखी, कानपुर में मोती और बुंदों की राखी, बिहार में मधुबनी एवं मैथिली कला की राखी, पुड्डुचेरी में स्टोन राखी, बंगलुरू में फूलों की राखी आदि प्रमुखता से बनाई गयी।