इसकी कीमत करीब 6 अरब 59 करोड़ रुपये है हैदराबाद के निजाम ने महारानी की शादी पर दिया था यह हार
लंदन : भारत की आजादी के समय दुनिया के सबसे धनी लोगों में शामिल रहे हैदराबाद के निजाम का खजाना एकबार फिर से चर्चा में है। ब्रिटेन की महारानी के गले की शोभा बढ़ा रहा यह हीरे से बना निजाम का हार विशेषज्ञों की नजर में विश्व भर में शाही आभूषणों में सबसे कीमती माना गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस शानदार हार की कीमत वर्तमान समय में 6 अरब 59 करोड़ रुपये है। उन्होंने कहा कि महारानी के खजाने में एक से बढ़कर एक आभूषण हैं लेकिन इसकी चमक के आगे सब फीके हैं।
ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने कुछ समय पहले अपनी बहू को यह हार पहनने के लिए दिया था। इसे देखकर लोगों की आंखें चौधियां गई थीं। एक्सप्रेस डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक महारानी को यह नेकलेस सबसे पहले साल 1947 में राजकुमार फिलीप के साथ सगाई के बाद हैदराबाद के निजाम की ओर से उपहार के रूप में मिला था। एलिजाबेथ उस समय राजकुमारी थीं और उसके 5 साल बाद वह महारानी बनी थीं। हैदराबाद के निजाम की ओर से शादी का तोहफा
उस समय हैदराबाद पर आसफ जाह सप्तम का हैदराबाद पर शासन था। आसफ दुनिया के सबसे धनी लोगों में शामिल था। आभूषणों के मामलों की विशेषज्ञ डायना बोरोमन कहती हैं कि यह दुनिया की सबसे कीमती शाही आभूषण है और इसकी कीमत वर्तमान समय में करीब 6 अरब 59 करोड़ रुपये है। उन्होंने बताया कि राजकुमारी एलिजाबेथ को यह उनकी शादी का तोहफा हैदराबाद के निजाम की ओर से दिया गया था।
बोरोमन बताती हैं कि निजाम ने निर्देश दिया था कि राजकुमारी अपनी मर्जी से उनके संग्रह से जो भी जेवर लेना चाहें, वह ले सकती हैं। एलिजाबेथ ने इस हीरे से बने अद्भुत हार को चुना जिसे अब हैदराबाद के निजाम का नेकलेस कहा जाता है। यह हार देखने में तीन जुड़े हुए फूल की तरह से नजर आता है। महारानी को यह हार अभी भी बहुत पसंद है और वह अपनी बहू केट मिडलटन को कभी-कभी यह पहनने के लिए देती हैं। हार में प्लेटिनम के अंदर 50 से ज्यादा हीरे लगाए गए
बोरोमन ने कहा कि इस हार में प्लेटिनम के अंदर 50 से ज्यादा हीरे लगाए गए हैं। महारानी खुद इसे कई खास मौकों पर पहन चुकी हैं। इसके अलावा महारानी जापानी मोती से बने हार को भी पहनती रही हैं। बता दें कि हैदराबाद के निजाम अपने शाही खजाने के लिए जाने जाते रहे हैं। हैदराबाद के आखिरी निजाम का खजाना आरबीआई के एक वॉल्ट में बंद है। इस खजाने को केवल दो बार ही प्रदर्शनी के लिए रखा गया है। एक बार 2001 और फिर 2006 में निजाम के आभूषणों को सालर जंग म्यूजियम में कुछ समय के लिए रखा गया था। आखिरी निजाम के वंशज हिमायत अली मिर्जा ने मांग की है कि निजाम के खजाने को रिजर्व बैंक की वॉल्ट से निकाल म्यूजियम में रखा जाए। क्या है हैदराबाद के निजाम का खजाना ?
173 दुर्लभ आभूषण, जिनमें से कुछ 184 कैरेट के बिना कटे जैकब डायमंड हैं। इनमें से कुछ दुनिया के 5 सबसे बड़े हीरे से निकले हैं। इस खजाने को लेकर लड़ाई काफी पहले से जारी है। जैकब डायमंड निजाम के खजाने का सबसे कीमती गहना है। इसे छठवें निजाम महबूब अली खान ने शिमला के एक हीरा व्यापारी से खरीदा था। उस समय निजाम ने इसे 23 लाख में खरीदा था। अब इस कीमत 400 करोड़ रुपये के आसपास लगाई जा रही है।
कोझिकोड : मलयाली फिल्म और टेलीविजन अभिनेत्री कोझिकोड शारदा का मंगलवार को यहां एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में निधन हो गया। वह 84 साल की थीं। सूत्रों ने बताया कि अभिनेत्री उम्र संबंधी बिमारियों से पीड़ित थीं और बीते कुछ समय से अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। लोकप्रिय थियेटर कलाकार के रूप में शारदा ने 1979 में ‘अंगाकुरी’ में अभिनय करके रुपहले पर्दे पर पदार्पण किया था। वह कोझिकोड की रहने वाली थीं इसलिए उन्हें कोझिकोड शारदा के नाम से जाना जाता था। केरल विधानसभा के अध्यक्ष एम बी राजेश, लोक निर्माण मंत्री मोहम्मद रियास, संस्कृति मामलों के मंत्री साजी चेरियन ने शारदा के निधन पर शोक व्यक्त किया है।
नयी दिल्ली : सौंदर्य और सेहत उत्पाद बिक्री के ऑनलाइन मंच नायका के मालिकाना हक वाली कंपनी एफएसएन ई-कॉमर्स वेंचर्स के शेयर गत बुधवार को 1,125 रुपये के निर्गम मूल्य के मुकाबले 79 प्रतिशत से अधिक के भारी प्रीमियम के साथ सूचीबद्ध हुए। कम्पनी के शेयरों ने बीएसई पर 77.86 प्रतिशत की छलांग लगाते हुए 2,001 रुपये पर शुरुआत की। इसके बाद यह 89.24 प्रतिशत बढ़कर 2,129 रुपये हो गया।
एनएसई पर यह 79.37 प्रतिशत प्रीमियम के साथ 2,018 रुपये पर सूचीबद्ध हुआ। बीएसई पर कंपनी का बाजार मूल्यांकन 97,754.06 करोड़ रुपये रहा। इस महीने की शुरुआत में एफएसएन ई-कॉमर्स वेंचर्स के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के लिए 81.78 गुना ज्यादा आवेदन मिले थे। 5,352 करोड़ रुपये के आईपीओ के तहत कीमत 1,085-1,125 रुपये प्रति शेयर थी।
100 साल पहले भारत से चुरायी गयी थी नयी दिल्ली : भारत से 100 साल पहले चोरी कर कनाडा भेजी गई मां अन्नपूर्णा की मूर्ति वापस लाई जा चुकी है। मूर्ति को उत्तर प्रदेश में काशी विश्वनाथ मंदिर में 15 नवंबर को स्थापित की गयी । उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री सुरेश राणा और नीलकंठ तिवारी ने मां अन्नपूर्णा की मूर्ति को नई दिल्ली में प्राप्त किया। केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी और जीके रेड्डी ने यूपी सरकार को मूर्ति सौंपी। यह मूर्ति वाराणसी में बाबतपुर से कचहरी, अंधरापुल, मलदहिया, कमच्छा,भेलूपुर होते हुए दुर्गा मंदिर (दुर्गाकुंड) में रखी जाएगी। यहां से दूसरे दिन लंका और सोनारपुरा, मदनपुरा, गोदौलिया, ज्ञानवापी होते हुए बाबा दरबार में 15 नवंबर को पहुँची। कैसे मिली मूर्ति वापस?
यह मूर्ति 18वीं शताब्दी की है। माना जा रहा है कि इसे 1913 में काशी के घाट से चुराकर कनाडा भेज दिया गया था। वहां पर यह मैकेंजी आर्ट गैलरी में रेजिना यूनिवर्सिटी के संग्रह का हिस्सा थी। इस मूर्ति की वसीयत 1936 में नार्मन मैकेंजी ने करवाई थी और मूर्ति को गैलरी के संग्रह से जोड़ा गया था। यह मामला उस वक्त सामने आया जब इस साल गैलरी में एक एग्जीबिशन की तैयारी चल रही थी। इस दौरान एक कलाकार दिव्या मेहरा की नजर इस मूर्ति पर पड़ी और उन्होंने इस मुद्दे को उठाया। इसके बाद सरकार ने अपनी तरफ से मूर्ति की वापसी के प्रयास शुरु किए।
कोलकाता : केंद्र सरकार से पद्मश्री सम्मान से सम्मानित होने वालों में पश्चिम बंगाल के भी सात लोग हैं। उनमें सबसे खास हैं सेवानिवृत्त शिक्षक सुजीत चट्टोपाध्याय। साहित्य और शिक्षा श्रेणी में केंद्र ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है। भारत सरकार के इस बार सामान्य किन्तु विशेष कार्य के लिए आमलोगों को पद्म सम्मान देने से लोग भी खुश हैं।
बेहद आम जीवन जीने वाले सुजीत चट्टोपाध्याय को यह सम्मान यूं ही नहीं मिला है बल्कि वह हैं भी बेहद खास। सेवानिवृत्त हो जाने के बावजूद वह अपने पैतृक गांव बर्दवान के रामनगर के जंगलमहल से सटे इलाके के सैकड़ों छात्रों को शिक्षा का महादान महज दो रुपये सालाना में देते रहे हैं। उनका मानना है कि जिस तरह से सूरज कभी रिटायर्ड नहीं होता ठीक उसी तरह साहित्यकार और शिक्षक अंतिम सांस तक सेवानिवृत्त नहीं हो सकता। समाज और भावी पीढ़ी के प्रति उनकी जिम्मेदारियां आजीवन बनी रहती हैं, इसीलिए वह सेवानिवृत्त हो जाने के बावजूद 300 से अधिक छात्रों को सालाना महज दो रुपये की फीस लेकर पढ़ाते हैं। इन रुपयों को भी वह आसपास के गरीब बच्चों के लिए किताबें, कपड़े और थैलेसीमिया पीड़ित आदिवासी परिवारों के लिए कैंप लगाकर दवाइयां भी वितरित करते थे। उन्होंने जीवनभर शिक्षक के तौर पर शिक्षा का दान तो किया ही है, साथ ही उम्र के आखिरी पड़ाव में भी तन मन और धन का आखरी कतरा समाज को समर्पित कर चुके हैं। ऐसे ही धरोहरों को पद्मश्री मिलना खुद पद्मश्री का ही सम्मान होगा। राष्ट्रपति के हाथ से सम्मानित होने से वह बेहद खुश हैं। इस सम्मान से उनके सभी छात्र भी बेहद खुश हैं। सुजीत ने बताया कि वह अपने घर पर बनी पाठशाला में गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। कक्षा दसवीं तक के छात्रों को सभी विषय तथा 11वीं और डिग्री कॉलेज के छात्रों को बांग्ला साहित्य पढ़ाते हैं। उनके छात्रों की मांग है कि उनके इलाके में बैंक और कॉलेज खोले जाने चाहिए। सुजीत ने बताया कि जंगली क्षेत्र में उनके घर से 30 किलोमीटर दूर बैंक है और आसपास कोई कॉलेज भी नहीं है। इसलिए रामनगर ग्राम पंचायत में बैंक और कॉलेज दोनों खोले जाने की जरूरत है। एक विडंबना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इस संबंध में वह स्थानीय प्रशासन को कई बार पत्र लिख चुके हैं लेकिन कोई जवाब तक देना जरूरी नहीं समझा है। सुजीत ने कहा कि हम जब तक जीते हैं, तब तक केवल अपने लिए नहीं जी सकते, हमें समाज के लिए भी कुछ ना कुछ करते रहना है। उन्होंने बताया कि जंगली क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी और अन्य समुदाय के लोग थैलेसीमिया के बीमारी से जूझ रहे हैं। उनके लिए हर साल कैंप लगाकर दवाइयां देने के साथ-साथ रोगियों की देखभाल की व्यवस्था अपने छात्रों के साथ मिलकर करते हैं। उन्होंने कहा कि वह जिन बच्चों को पढ़ाते हैं उनमें सामाजिक सेवा की भावना उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं ताकि वह जो समाज के लिए कर रहे हैं, वह उनके छात्र भी बड़े होकर पर करें।
नारायण मेमोरियल अस्पताल में मनाया गया विश्व मधुमेह दिवस
इंसुलिन के 100 साल पूरे होने पर जागरुकता अभियान
कोलकाता : मौजूदा समय में पूरे विश्व में लगभग 422 करोड़ लोग मधुमेह के साथ जिंदगी जीने को मजबूर हैं, इनमें से 77 करोड़ लोग भारत में मधुमेह से प्रभावित हैं। यह इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो वर्ष 2045 तक मधुमेह की समस्या देश की आबादी के 76% लोगों में फैलने की आशंका है, जो दुनिया में मधुमेह की राजधानी कहलाने वाले देश चीन को पार कर जाएगी। हमे उम्मीद है कि भारत दुनिया में मधुमेह से जागरुक रहने वाला देश बन सकता है। साल 2021 इसलिए भी खास है क्योंकि इस वर्ष इंसुलिन की खोज के 100 साल भी पूरे हुए है।
डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना वायरस बीमारी (कोविड-19) के कई मरीज गंभीर मधुमेह संकट के साथ अस्पतालों में आते हैं, क्योंकि कोविड-19 संक्रमण के दौरान तनाव के कारण वे मधुमेह के मरीज बने थे। स्टेरॉयड (कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स) का उपयोग इसका एकमात्र उपचार है।
सुपर्णा सेन गुप्ता (सीईओ, नारायण मेमोरियल हॉस्पिटल) ने कहा, हमने पहले कहा था कि लॉकडाउन के प्रभाव के कारण एचबीए1सी के बिगड़ने और टाइप 2 डायबिटीज मेलिटस में संबंधित जटिलताओं से मधुमेह के मामले बढ़ सकते है। इससे बचाव के लिए सीमित और उचित तरीके से व्यायाम करना है।
डॉ. सुजीत भट्टाचार्य (एमडी, डीएनबी, एमएनएएमएस, डीएम (पीजीआई) एमआरसीपी) ने कहा, इंसुलिन लगभग 100 वर्षों से मधुमेह के इलाज के लिए उपलब्ध है, यह मधुमेह वाले लोगों के जीवन में बदलाव ला रहा है।
डॉ. इप्सिता घोष (एमडी, डीएम) ने कहा, यह देखा गया है कि इस वैश्विक महामारी के कारण देश की आबादी में पोस्ट प्रांडियल रक्त शर्करा के स्तर में 48% की वृद्धि हुई है। हमारा लक्ष्य गैर-मधुमेह व्यक्तियों में भी जोखिम का निर्धारण करना है और साथ ही उन्हें इसके दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों से अवगत कराना है।
कोलकाता : वर्ष 2021 के ओपन डोर्स रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए एक शीर्ष गंतव्य स्थान बना हुआ है, जहां अब तक 200 से अधिक विभिन्न मूल निवास स्थानों से 914,000 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय छात्रों का स्वागत किया गया है। 2020-2021 शैक्षणिक वर्ष में 167,582 छात्रों के साथ भारतीय छात्रों की संख्या लगभग 20 प्रतिशत है।
वास्तव में, संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वार वैश्विक कोविड -19 महामारी के दौरान अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए खुले रहे और उनका स्वागत होता रहा। पिछले वर्ष अमेरिका. सरकार और अमेरिका के उच्च-शिक्षा संस्थानों ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों का व्यक्तिगत रूप से, ऑनलाइन और हाइब्रिड शिक्षण विधियों के माध्यम से सुरक्षित रूप से स्वागत करने के उपायों को लागू किया, यह गारंटी देते हुए कि अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए अवसर और संसाधन मजबूत बने रहें।
अंतर्राष्ट्रीय छात्र गतिशीलता पर ओपन डोर्स रिपोर्ट के विमोचन के अवसर पर बोलते हुए, कांसुलर मामलों के मंत्री डॉन हेफ्लिन ने कहा, “वैश्विक महामारी के बावजूद, भारतीय छात्र वीजा के लिए आवेदन करने और संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा करने में सक्षम थे। हमने अकेले इस गर्मी के मौसम में 62,000 से अधिक छात्र वीजा जारी किए, जो पिछले किसी भी वर्ष की तुलना में अधिक है। इससे पता चलता है कि विदेश में अध्ययन करने के इच्छुक भारतीय छात्रों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका पसंद का गंतव्य बना हुआ है। हम आने वाले वर्ष में कई और वीजा जारी करने की आशा करते हैं, ताकि भारतीय छात्रों को अमेरिका में अध्ययन के अपने सपनों को साकार करने में मदद मिल सके।
सांस्कृतिक और शैक्षिक मामलों के सलाहकार एन्थनी मिरांडा ने कहा, “अंतर्राष्ट्रीय छात्र गतिशीलता अमेरिकी कूटनीति, नवाचार, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए केंद्रित है। संयुक्त राज्य अमेरिका उच्च शिक्षा के लिए स्वर्ण मानक है, जो विश्व स्तरीय व्यावहारिक अनुप्रयोग और अनुभव प्रदान करता है और हमारे स्नातकों को वैश्विक अर्थव्यवस्था में लाभ प्रदान करता है।” उन्होंने आगे कहा कि “हम भारतीय छात्रों को महत्व देते हैं, क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को बनाए रखने और विकसित करने और वर्तमान और भविष्य की वैश्विक चुनौतियों का सामूहिक रूप से समाधान करने के लिए अमेरिकी साथियों के साथ जीवन भर का संबंध बनाते हैं।”
ओपन डोर्स रिपोर्ट का 2021 फॉल स्नैपशॉट, जो 2021-2022 शैक्षणिक वर्ष के लिए तत्पर एवं आशान्वित है, उक्त स्नैपशॉट के अनुसार इस वर्ष छात्रों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि दर्शाता है, साथ ही इस बात की पुष्टि करता है कि अंतर्राष्ट्रीय छात्र एक अमेरिकी शिक्षा को महत्व देते हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका में अध्ययन के बारे में सहायता चाहने वाले छात्रों को एजूकेशन यूएसए इंडिया ऐप डाउनलोड करना चाहिए, जो आईओएस और एंड्रॉइड डिवाइस पर मुफ्त में उपलब्ध है। एक बटन के क्लिक पर, यह ऐप कॉलेज आवेदन प्रक्रिया के बारे में नवीनतम जानकारी प्रदान करता है और संयुक्त राज्य अमेरिका में उच्च शिक्षा की योजना बनाने के लिए एक त्वरित और आसान पहला कदम है।
कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में हाल ही में नेशनल एचीवमेंट सर्वे यानी राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण सम्पन्न हुआ। यह सर्वेक्षण 5वीं कक्षा की छात्राओं के लिए हुआ। इसमें कुल 119 छात्राओं में से 104 छात्राओं ने भाग लिया। इस दौरान कोविड सम्बन्धी सभी नियमों का पालन किया गया और स्कूल के बाहर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिसकर्मी सक्रिय रहे। छात्राओं में भी उत्साह देखा गया। इस अवसर पर प्रिंसिपल, शिक्षिकाओं और छात्राओं ने अपने अनुभव साझा किये –
कोइली दे (प्रिंसिपल, सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल) – स्कूल में इतने लम्बे समय के बाद छात्राओं को देखना एक अद्भुत अनुभव था। ऐसा लगा जैसे कि स्कूल की इमारत में जान आ गयी। सर्वे सुरक्षा सम्बन्धी सभी नियमों का पालन करते हुए बहुत अच्छी तरह सम्पन्न हुआ। यह भावुक करने वाला दिन था।
विदिशा पांजा (हेडमिस्ट्रेस) – डेढ़ साल बाद पाँचवीं कक्षा की छात्राएँ स्कूल आयीं। छात्राओं को देखना एक अच्छा अनुभव रहा। सर्वे में 91 प्रतिशत छात्राओं ने भाग लिया। कोविड -19 सम्बन्धी सभी नियमों का पालन किया गया। कुल मिलाकर यह अनुभव बहुत अच्छा रहा।
डियाना बनर्जी ( शिक्षिका, अंग्रेजी एवं इतिहास) – बच्चों को लगभग 2 साल के बाद स्कूल में देख पाना, यह बहुत अलग अनुभव था। बच्चियाँ बहुत उत्साहित लग रही थीं। नेशनल सर्वे का भी उनका यह पहला अनुभव था। उनको थोड़ा संशय था पर वे दिलचस्पी ले रही थीं। सम्बन्धित सेक्शन की शिक्षिकाओं को भी सर्वे में भाग लेना था। शिक्षिका के रूम में हमें शिक्षण पद्धति और संसाधनों को लेकर जानकारी देनी थी।
पूनम धवन (शिक्षिका, गणित एवं ईवीएस) – 2 साल के बाद अपने सामने छात्राओं को स्कूल में देख पाना एक आनन्ददायक अनुभव रहा। स्कूल ने सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करने पर हमेशा जोर दिया। नेशनल सर्वे में भाग लेने के लिए बच्चियाँ बहुत उत्साहित थीं। सभी शिक्षिकाओं और कर्मचारियों ने कोविड -19 का टीका लगवा लिया है। मैंने भी सर्वे में भाग लिया और मुझे शिक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर जानकारी देनी थी।
मंजीत कौर (शिक्षिका, हिन्दी) – 2 साल के लम्बे समय के बाद स्कूल आकर छात्राएँ बहुत उत्साहित थीं। स्कूल ने सुरक्षा सम्बन्धी नियमों का पर्याप्त ध्यान रखा। भीड़ को नियंत्रित करने की व्यवस्था की गयी। चयनित छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ सर्वेक्षण में भाग लिया। मैंने भी अपनी शिक्षण पद्धति की जानकारी दी।
अरित्रि नन्दी (छात्रा)- मुझे सर्वे बहुत ही आसान लगा। अंग्रेजी और मैथेमेटिक्स (गणित) का पेपर सबसे आसान था। मुझे सबसे अच्छा लगा कि मैं इतने लम्बे समय के बाद अपनी सहेलियों के पास बैठने का अवसर पा सकी। हालांकि हमें एक दूसरे के पास जाने की अनुमति नहीं थी लेकिन उनको अपने सामने देखना ही मुझे खुशी से भर गया।
ओजस्वी थलादि (छात्रा) – सर्वे के पहले हम सब नर्वस थे। मैं नर्वस थी पर उत्साहित भी थी पर जब प्रश्नपत्र देखा तो यह अद्भुत था। कुछ प्रश्नों को छोड़कर सारे प्रश्नों के उत्तर आते थे। अपनी सहेलियों से इतने लम्बे समय बाद मिलना मुझे बहुत अच्छा लगा।
सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, साहित्य संसार का अवगाहन करने पर पता चलता है कि ऐसी बहुत सी कवयित्रियाँ हुई हैं जिनके जीवन के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती लेकिन उनकी कुछ रचनाओं को शोधकर्ताओं ने अपने प्रयत्नों से ढूंढ निकाला और उन्हें बचा कर रखा है। हालांकि उनकी रचनाओं में पारंपरिक स्त्री का स्वरूप और उसके कर्त्तव्यों का वर्णन ही प्रमुखता से हुआ है लेकिन इसके बावजूद संतोष इस बात का है कि उस युग में जब लड़कियों के लिए कविता करना तो दूर की बात थी लिखना पढ़ना ही तकरीबन निषिद्ध माना जाता थे, ये कवयित्रियाँ अपने सृजन के माध्यम से अपने होने का मतलब ढूंढने की कोशिश कर रही थीं। पारंपरिक जीवन मूल्यों के बीच जन्म लेकर उन आदर्शों को अपना जीवन मानने वाली सत्री रचनाकारों से किसी बगावत की उम्मीद तो की नहीं जा सकती थी इसीलिए उन्होंने जो और जैसा भी लिखा उसे उस युग की स्त्री रचनात्मकता के रूप में स्वीकार करके, युग विशेष के दस्तावेज के रूप में देखना चाहिए। पूरे मध्ययुगीन समाज में स्त्रियों के इर्द-गिर्द इतने बंधन थे कि स्त्री का मानव होकर जीना ही मुश्किल था। मैं पहले भी कह चुकी हूं कि इनसे मुक्ति का मार्ग इन स्त्रियों ने भक्ति में ढूंढा, वह चाहे देव भक्ति हो या पति भक्ति या फिर परंपरा भक्ति। लेकिन इस भक्ति को उपेक्षा की दृष्टि से देखने के बजाय इसके पीछे निहित कारणों को समझने की आवश्यकता है। मीरा अपने ढंग की अलग दुस्साहसी कवयित्री थीं लेकिन कुछ स्त्रियां ऐसी भी थीं जो समाज के बीच रहते हुए, उसके नियम-कायदों, मान्यताओं आदि को शिरोधार्य करके अपनी सीमा के भीतर रहकर लेखन कार्य कर रही थीं। उनकी रचनाओं में युग विशेष का जीवन और विचारधारा पूरी विश्वसनीयता के साथ वर्णित हुई है। ऐसी ही एक कवयित्री थीं- विरंजीकुँवरि जिन्होंने संवत 1905 में “सती- विलास” नामक ग्रंथ की रचना की।
विरंजीकुँवरि जी के जीवन के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती। इनके जीवन से जुड़े तथ्यों की खोज करने के साथ इनकी रचनाओं का संकलन करने वाले श्री ज्योतिप्रसाद मिश्र “निर्मल” अपनी पुस्तक “स्त्री कवि कौमुदी” में लिखते हैं – “इनकी मृत्यु कब हुई और इनका जन्म कब हुआ, इस संबंध में अभी ठीक ठीक पता नहीं चल सका” इनकी रचनाओं के बारे में भी वह लिखते हैं- “इनकी कविता साधारण दर्जे की है। लेकिन तो भी स्त्री होने के नाते से ये कविता साधारणतय अच्छी कर लेती थीं।” इनके बारे में इतनी जानकारी मिलती है कि वह जौनपुर के गढ़वाल नामक गांव में रहती थीं। इनके पति का नाम साहबदीन था जो दुर्गवंशीय ठाकुर अमर सिंह के पुत्र थे। बचपन से काव्य -रचना का संस्कार इनके मन में अंकुरित हुआ था और अपनी कविताओं में प्राय: वह उपदेशात्मक शैली में स्त्री – कर्त्तव्यों के विषय में लिखती थीं। अपने जीवन के संबंध में भी इन्होंने अपनी रचनाओं में संकेत छोड़े हैं जिन्हें पढ़कर उनके मायके और ससुराल के संबंध में जानकारी मिलती है। अपने श्वसुर कुल का परिचय दोहा और सोरठा छंद में इन्होंने विस्तार से दिया है। देखिए-
“सूर्य्यवंश में रघु भये, रघुवंशी श्रीराम।
तासु तनय लवकुश भये, द्वीखित पूरन काम।।
द्वीखित वंश उदित भरे, दुर्गवंश महाराज।
तिलक जुक्त सब सोभिजे, सत्य, धर्म्म कर साथ।।”
इसी वंश परंपरा में आगे जाकर अमर सिंह होते हैं जो राम के परम भक्त हैं और राम की कृपा से ही इन्हें साहबदीन नामक पुत्र की प्राप्ति होती है-
“रामचंद्र के दास अमरसिंह मन वचन से।
पुत्र होने की आस, सेवो हरि-पद कमल दृढ़।।”
सेवत वंश गोपाल के, तेहि सुत साहिबदीन।
सो प्रभु तत्व विचार के, रहत ब्रह्म में लीन।।”
ऐसे ज्ञानी तथा ब्रह्मलीन पति की संगति में काव्य प्रतिभा से संपन्न विरंजीकुँवरि की कविता पर भक्ति और आध्यात्म का प्रभाव पड़ा। कहा जाता है कि वह अपनी कविताएँ अपने पति को सुनाया करती थीं और जीवन के अंतिम पड़ाव में आकर संभवतः पति की मृत्यु के उपरांत उन्होंने संन्यास- जीवन अपना लिया था तथा साधु संतों की संगति में रहा करती थीं। उन्होंने अपनी कविताओं में अपने मायके का परिचय भी दिया है-
“अब भाखौ माइक अचल, काशी शुभ अस्थान।
जाके दरसन हेत हित, देव करहिं प्रस्थान।।
विमल वंश रघुवंश के, बहै बयार सरोह।
ग्राम नेवादा में विदित, मम पितु सीतलसींह।।
इससे यह स्पष्ट होता है कि वह काशी के नेवादा गांव में रहने वाले शीतल सिंह की पुत्री थीं। “सती- विलास” की कविताओं में इनके जीवन की कतिपय घटनाओं और स्थितियों के संकेत मिलते हैं। पारंपरिक भारतीय स्त्री की भांति पति-प्रेम और पति सेवा ही उनके जीवन का उद्देश्य रहा और वह तमाम स्त्री जाति को पातिव्रत्य की महिमा समझाना चाहती हैं। एक साधारण स्त्री की भांति वह अपने घर -परिवार एवं दांपत्य जीवन की परिधि के बाहर नहीं झांकती। उसी में खुश रहती हुई वह अपने जीवन को धन्य मानती हैं। विरंजीकुँवरि अपने आप को अत्यंत तुच्छ स्त्री के रूप में वर्णित करती हैं जिसे पति के प्रेम और साहचर्य, विद्वता तथा भक्तिभाव ने संवार कर असाधारण बना दिया। वह स्वयं को गंवार कहती हैं जिसे पति ने स्वीकार ही नहीं किया बल्कि उनका उद्धार भी किया। “सती- विलास” जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है स्त्रियों को अपने सतीत्व को बनाए रख कर पति भक्ति में दत्तचित्त होकर जीवन यापन करने का उपदेश देता है। वह लिखती हैं कि स्त्रियों के लिए पातिव्रत्य ही सबसे बड़ा धर्म है-
“जाँचेउ धर्म्म पतिव्रत केरा, जाते करू सब धर्म बसेरा।।
का पतिव्रता का व्यवहारू, कवन धर्म्म तिये सुगति सिंगारू।।
कवन वर्त पति के पिय भाखो, जेहि हित जीय देह में राखों।।
अब पिय निरनय देहु बताई, मैं गंवारी कछु जानि न पाई।।”
इसी पति प्रेम या पति भक्ति की अभिव्यक्ति उनके काव्य में बारंबार हुई है। वह बताती हैं कि पति की संगति में ही उन्होंने वेद- पुराणों का ज्ञान प्राप्त किया, शास्त्रों का अध्ययन किया एवं पति भक्ति से भगवद्भक्ति तक का रास्ता तय किया। उस कालखंड की स्त्रियों के लिए पति ही एकमात्र देवता था और उसकी चरणों की भक्ति में ही मुक्ति मिलती थी। इसी भाव की कुछ अन्यान्य काव्य पंक्तियों में भी हुई है-
“तीरथ सो कछु नेम नहीं, अरु जानत नहीं कछु देव पुजारी।
चाल कुचाल हमें नहिं मालुम, यातै कहें सब लोग गँवारी।।
ज्ञान विवेक कहा लहै नारि, सदा जेहि निर्धन संत विचारी।
तातै “विरंजि” विचारि कहै, मोहि देहु सियापति कंत सो यारी।।
अर्थात तमाम तीर्थ -व्रत, पूजा -पाठ पर पति का सानिंध्य और उसका प्रेम भारी है। जिस तरह ईश्वर की भक्ति से तमाम कष्टों से मुक्ति मिलती है, ठीक उसी तरह पति भक्ति की राह पर चलकर तुच्छ से तुच्छ स्त्री भी मुक्ति पा सकती है, यही समझाना कवयित्री का उद्देश्य है। इसी भाव का एक और पद देखिए-
“होइ मलीन कुरूप भयावनि, जाहि निहार घिनात है लोगू।
सोऊ भजे पति के पद-पंकज, जाइ करें सति लोक में भोगू।।
ताहि सराहत हैं विधि शेष, महेश बखानै बिसारि के जोगू।
यातै “बिरंजी” विचारि कहै, पति के पद की तिय किंकरि होगू।।”
जिस समाज में पति के बिना स्त्री का कोई अस्तित्व ही नहीं है, उसमें स्त्री का पतिव्रता होना और पातिव्रत्य की महिमा का बखान करना कोई बड़ी बात नहीं थी। कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा में दोहों की रचना की थी-
“पतिबरता मैली भली, काली, कुचिल, कुरूप ।
पतिबरता के रूप पर, बारौं कोटि स्वरूप ।।
तथा
“पतिबरता मैली भली, गले काँच को पोत ।
सब सखियन में यों दिपै , ज्यों रवि ससि की जोत ॥”
सखियों, जब सारा समाज आदर्श स्त्री उसी को मानता था और है जो अपने पति को देवता समझकर उसकी पूजा करे और स्वयं को उसकी दासी समझे, इस स्थिति में विरंजीकुँवरि जैसी पारंपरिक स्त्री ने अपनी कविताओं में उसी सत्य को अभिव्यक्ति किया जो उस समय के समाज का सच था। आज भी यह सच पूरी तरह से बदला नहीं है। आज भी आधुनिकता का परचम फहराने वाली स्त्रियाँ भी तीज और करवा चौथ जैसे व्रत उपवास करती हैं और पति की पूजा भी करती हैं। स्थितियों में तब तक बदलाव नहीं आएगा जब तक हमारा मानस परिवर्तित नहीं होगा और हम सही अर्थों में आधुनिक तथा प्रगतिशील नहीं बनेंगे।
पत्रकारिता की दुनिया में डॉ. एस. आनन्द एक स्तम्भ का नाम हैं…पत्रकारिता और साहित्य की अद्भूत जुगलबंदी से इन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में साहित्य के हस्तक्षेप को मजबूत किया। बतौर पूर्व सह संपादक, (सन्मार्ग), साहित्य संपादक, (प्रभात वार्ता), फीचर संपादक, (सलाम दुनिया) जनता के हृदय में इन्होंने जगह बनायी। इनके व्यंग्य तलवार की तेज धार की तरह हैं जो समसामायिक स्थितियों और समस्याओं की विद्रूपता पर तीक्ष्ण कटाक्ष करते हैं। पत्रकारिता जीवन की स्मृतियों को डॉ. एस. आनन्द खोल रहे हैं और शुभजिता इस खजाने को आपके लिए लायी है…इसे पढ़िए और पत्रकारिता की दुनिया को समझिए। – सम्पादक, शुभजिता
एक महाविद्यालय के हिन्दी प्रवक्ता की शानदार नौकरी छोड़कर मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। यह मेरा व्यक्तिगत निर्णय था लेकिन इससे मेरा घर-परिवा अचंभित रह गया था। पिता जी तो इतने नाराज़ रहे कि कई दिनों तक बातचीत भी बंद कर दिए। बराबर यही कहते रहे कि परम गंग को छाड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावे लेकिन मैंने परवाह नहीं की और अनपरा, सोनभद्र से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ऊर्जांचल वाणी में बतौर सम्पादक नौकरी ज्वाइन कर ली और एक साल तक संपादन और लेखन में जुड़ा रहा। उस दौरान मेरे लेख, व्यंग्य और कविताएं भी जानी-मानी पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होने लगे और चर्चित भी हुए। अर्थलाभ भी होने लगा और मन भी लेखन और पठन पाठन में रम गया। उसी दौरान मेरी एक कहानी -जिन्दगी का रंगमंच, सन्मार्ग कोलकाता में आदरणीय रुक्म जी ने छापा जिसका अनुवाद उर्दू और बांग्ला में हुआ। नागरी पत्रिका में में प्रकाशित मेरी कहानी -दो बीघा जमीन, संपादक विजय बलियाटिक ने प्रकाशित कर मुझे इतना प्रोत्साहित किया कि मैंने ताबड़तोड़ कहानियां लिखनी शुरू कर दी। चुप्पी के बोल, संकल्प, विकल्प, फिर वही, आदमी काम का, अहसास, जैसी कई कहानियां- उत्कर्ष, निहारिका, मुक्ता, त्रिविधा, सन्मार्ग, आज, माध्यम, गंगा आदि में छपीं और लोगों द्वारा सराही गयीं।
फिर मैंने आपातकाल के दौरान घटी कुछ खट्टी-मीठी घटनाओं को केन्द्रित कर एक उपन्यास-सिन्दूरी चन्द्रमा, लिखा जिसका धारावाहिक प्रकाशन वाराणसी से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र दिग्काल में भाई चन्द्रकान्त के सम्पादन में किया गया।
ऊर्जांचल वाणी छोड़ने के बाद मैं स्वतंत्रत भारत हिन्दी दैनिक से जुड़ा और उसी दौरान मेरी मुलाकात सन्मार्ग के प्रबंध संपादक आदरणीय हीरालाल चौबे से हुई जो मेरे पिताजी के अभिन्न मित्र थे और दोनों ने एक साथ बनारस से प्रकाशित होने वाली लोकप्रिय पत्रिका-वासन्ती, के संपादन का काम किया था और बाद में हीरालाल चौबे ने उसे छोड़ दिया और पिता जी (महेंद्र शंकर) उसके अकेले संपादक रह गये थे। चौबे जी के ही कहने पर मैंने सन्मार्ग 1990 में ज्वाइन किया। उस समय इसके संपादक आदरणीय राम औतार गुप्ता जी थे। वे पिता जी को बखूबी जानते व पहचानते थे इसलिए मुझे उनके सुंदर निर्देश व प्रोत्साहन भी मिलते रहे। व्यक्ति को पढ़ने में माहिर गुप्ता जी ने मुझे एक पेज धर्म संस्कृति के संपादन का दिया और कहा कि मंगलवार को छपने वाला यह पेज पाठकों को पसंद नहीं आ रहा है। अगर तुमने इसे रुचिकर बना दिया तो इस पृष्ठ का पारिश्रमिक तुम्हें सबसे ज्यादा दिया जायेगा। मैंने यह दायित्व स्वीकार कर बनारस के कुछ अच्छे और चर्चित लेखकों को जोड़ा और छोटी छोटी धार्मिक, आध्यात्मिक , प्रेरक कथाएं छापनी शुरू की। पहले के अंकों में जहां तीन चार आलेखों से पन्ना भर दिया जाता था, अब उसी पेज पर दर्जन भर रचनाएं छपने लगीं। सन्मार्ग के समाचार संपादक उस वक्त रमाकांत उपाध्याय जी थे और राधाकृष्ण प्रसाद जी ने साथ ही लेजर डिपार्टमेंट के भाई अनिल कुमार राय व कार्तिक लाल यादव के सहयोग से धर्म संस्कृति पृष्ठ काफी लोकप्रिय हो गया और अखबार का सर्कुलेशन भी लगभग मनोरंजन पृष्ठ के बराबर हो गया। इससे प्रसन्न होकर गुप्ता जी ने मेरा पारिश्रमिक तो बढ़ाया ही, लस्टम पस्टम जिसे लंबे समय से रमाकान्त जी लिख रहे थे, मुझे सौंप दिया। 23 सालों तक मैं अनवरत सप्ताह में 6 दिन इस स्तम्भ को लिखता रहा। दरअसल व्यंग्य लेखन का मेरा यह पहला अनुभव था। इससे पहले मैं व्यंग्य कविताएं जरूर लिखता रहा। मैंने एक नये कलेवर और नये अंदाज में लस्टम पस्टम लिखा और वह दिनों दिन परवान चढ़ता गया। एक व्यंग्य लेखक की पहचान मुझे सन्मार्ग से ही मिली और इसका पूरा श्रेय गुप्ता जी, राधाकृष्ण प्रसाद और अनिल कुमार राय को जाता है क्योंकि आप सभी ने मुझे बार-बार प्रोत्साहित करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। ध्यातव्य है कि आरंभिक काल में गुप्ता जी खुद लस्टम पस्टम पढ़कर पास करते थे किन्तु उनके बाद राधाकृष्ण जी ने यह दायित्व संभाला।