नयी दिल्ली : भारत के दूसरे चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-2’ ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की मौजूदगी का पता लगाया है। मिशन के दौरान हासिल हुए आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष ए एस किरण कुमार के सहयोग से लिखे गए एक रिसर्च पेपर में कहा गया है कि ‘चंद्रयान-2’ में लगे उपकरणों में ‘इमेजिंग इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर’ (आईआईआरएस) नाम का एक उपकरण भी है जो वैश्विक वैज्ञानिक आंकड़ा प्राप्त करने के लिए 100 किलोमीटर की एक ध्रुवीय कक्षा से जुड़ा काम कर रहा है। ‘करंट साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च पेपर में कहा गया है, ‘आईआईआरएस से मिले शुरुआती डेटा से चंद्रमा पर 29 डिग्री उत्तरी और 62 डिग्री उत्तरी अक्षांश के बीच व्यापक जलयोजन और अमिश्रित हाइड्रोक्सिल (ओएच) और पानी (एच2ओ) के अणुओं की मौजूदगी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।’
स्वतंत्रता दिवस पर तुलसी जयंती समारोह का आयोजन
कोलकाता : स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बंगीय हिंदी परिषद के तत्वावधान में 15 अगस्त,2021 को संध्या 6:30 बजे गूगल मीट के माध्यम से डॉ. ललित कुमार झा की अध्यक्षता में ‘तुलसी जयंती समारोह’ का सफल आयोजन किया गया| इस कार्यक्रम का मुख्य विषय तुलसी के व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को स्पष्ट करना था | कार्यक्रम का शुभारंभ परिषद के मंत्री डाॅ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठी के स्वागत वक्तव्य से हुआ | इसके अतिरिक्त इस कार्यक्रम में वक्ता के रूप में डाॅ. विनय मिश्रा, डाॅ. बीरेंद्र सिंह एवं तान्या चतुर्वेदी उपस्थित रहे। डाॅ. विनय मिश्रा ने तुलसी के साहित्य में सामंजस्य के महत्व को दर्शाया | डाॅ. बीरेंद्र सिंह ने आचार्य शुक्ल के उद्धरण को स्पष्ट किया, जो उन्होंने तुलसी के व्यक्तित्व के संदर्भ में लिखा था तथा सहकारवाद शब्द के ज़रिए भी अपनी बातों को रखा | तान्या चतुर्वेदी ने तुलसी के व्यक्तित्व और उनकी समन्वय दृष्टि पर प्रकाश डाला | अध्यक्षीय वक्तव्य में लालबाबा काॅलेज के विभागाध्यक्ष डाॅ. ललित कुमार झा ने तुलसी की महत्ता और उनके रचना-कर्म के विविध आयामों पर अपना एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और इस विमर्श से संबंधित श्रोताओं की शंका का निवारण अपने वक्तव्य के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया । कार्यक्रम का उत्कृष्ट संचालन साहित्यमंत्री श्री भानु प्रताप पांडे ने किया | कुशल श्रोताओं में सुषमा राय पटेल, रीमा पाण्डेय, जिउतलाल प्रजापति, निखिता पाण्डेय, अनूप यादव, उमेश पांडेय, रमाकांत सिन्हा, ज़ोया अहमद आदि उपस्थित थे। अंत में डाॅ. रंजीत संकल्प ने सभी वक्ताओं एवं श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया | इस वेब-गोष्ठी में परिषद के पदाधिकारियों एवं विद्यार्थियों ने धैर्य एवं संयम के साथ कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना पूरा सहयोग दिया।
तुलसी को पढ़ना समूची भारतीय वांग्मय परम्परा को पढ़ना है : डॉ. ऋषिकेश राय
सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय में मनायी गयी तुलसी जयन्ती
कोलकाता : कोविड -19 का पालन करते हुए सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय में इस वर्ष तुलसी जयन्ती मनायी गयी। इस अवसर पर पर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित तुलसी साहित्य के अध्येता तथा टी बोर्ड के सचिव डॉ. ऋषिकेश राय ने तुलसी साहित्य की समन्वय भावना, लोकभावना तथा संवादधर्मिता पर विशेष रूप से अपनी बात रखी। उन्होंने वरिष्ठ आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा के कथन का उल्लेख करते हुए तुलसीदास को विश्व का सर्वश्रेष्ठ कवि बताया। डॉ. ऋषिकेश राय ने कहा कि तुलसी भारतीय साहित्य के सबसे बड़े संवादधर्मी कवि हैं। अपनी परम्परा से उन्होंने बहुत सुन्दरता से पढ़ा है। तुलसी को पढ़ने का मतलब समूची भारतीय वांग्मय परम्परा को पढ़ना है। बहुत से लोग कहते हैं, कि तुलसी ने शास्त्रों की नकल की है पर तुलसी ने पूर्ण प्रवेश रचना यानी उसका पुनर्पाठ किया है। शास्त्रों में जो दूषण है, उसे भूषण कैसे बनाना है, यह तुलसी जानते हैं। तुलसीदास नीति और साहित्य के साथ राजनीतिशास्त्र के भी ज्ञाता हैं। तुलसी का राम राज्य एक यूटोपिया है जहाँ सब सुखी हैं। तुलसी के राम वाल्मिकी के राम से अलग हैं। तुलसी के राम परात्पर ब्रह्म हैं। तुलसी पर अध्यात्म रामायण का प्रभाव है। तुलसी ने सांस्कृतिक समन्यवय से अपना साम्राज्य स्थापित किया। वे संस्कृत के भी बड़े कवि हैं जो पूरी संस्कृत परम्परा को समझते हैं। रामविलास शर्मा ने तुलसीदास को विश्व का सर्वश्रेष्ठ कवि मानते हैं पर प्रगतिवादियों ने उनकी इस बात को खारिज कर दिया। तुलसी को अवहेलित किया गया है। समारोह की अध्यक्षता कर रहे पश्चिम बंगाल के डी.जी. होमगार्ड मृत्युंजय कुमार सिंह ने कहा तुलसी लोक के हृदय पर राज करते हैं। उन्होंने तुलसीदास के काव्य कला कौशल पर भी चर्चा की। तुलसी जयन्ती समारोह का आरम्भ वरिष्ठ गायक ओमप्रकाश मिश्र द्वारा श्रीराम वन्दना की समधुर प्रस्तुति से हुआ। पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने पुस्तकालय की गतिविधियों का ब्योरा दिया। इस अवसर पर विद्यालय की सेवानिवृत शिक्षिका प्रेम शर्मा के मार्गदर्शन में रामलला नहछू की प्रस्तुति विद्यालय की पूर्व छात्रा सुषमा त्रिपाठी ने की। कार्यक्रम में स्वागत भाषण तथा संचालन डॉ.प्रेमशंकर त्रिपाठी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय के अध्यक्ष भरत कुमार जालान ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी, विजय तिवारी समेत अन्य कर्मचारियों की विशेष भूमिका रही। समारोह का आनन्द आभासी माध्यम से जुड़े लोगों ने भी उठाया।
पहेलियों की रोचक दुनिया को बूझने वाली खगनियाँ

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आपसे पहेलियों की बात करूंगी। घबराइए मत, पहेलियाँ नहीं बुझाऊंगी। बस पहेलियों की रोचक दुनिया की सैर कराऊंगी। भले ही साधारण औरतें बात- बात में मुहावरों और कहावतों का इस्तेमाल ही नहीं करतीं बल्कि पहेलियां बूझने और बुझाने में भी पीछे नहीं रहतीं लेकिन जब साहित्य के परिसर में पहेलियों की बात चलती है तो वहाँ औरतों की उपस्थिति नजर नहीं आती। वहाँ एक ही कवि का प्रभुत्व नजर आता है और वह हैं, अमीर खुसरो जो अपनी पहेलियों, मुकरियों आदि के लिए जाने जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी कलम का हुनर नहीं दिखाया है। आदिकालीन साहित्य में अगर अमीर खुसरों की पहेलियों का सरस शब्दजाल दिखाई देता है तो रीतिकाल में खगनियाँ ने अपनी कलम के जादू से सबको मुग्ध कर दिया। उन्हें विशेषतः पहेलियों के लिए ही याद किया जाता है। यह बात और है कि बहुत सी स्त्री रचनाकारों की तरह इन्हें भी इतिहास के कृष्ण पक्ष ने ढँक लिया और कम लोग ही इनके और इनकी रचनाओं के बारे में जानते हैं।
सखियों, खगनियाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में हुआ था। माना जाता है कि ये उत्तर मध्यकाल अर्थात रीतिकाल में सृजनरत थीं। इनके जीवन के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी तो नहीं मिलती लेकिन इनकी पहेलियों को शोधकर्ताओं और लेखकों ने संकलित अवश्य किया है। ज्योतिप्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ द्वारा संपादित पुस्तक “स्त्री कवि संग्रह” में खगनियां की कई पहेलियां संकलित हैं। देखिए, एक उदाहरण और बूझिये तो सही इसका सही जवाब-
“नारी देखी एक अनोखी।
बंद न होती चलती चोखी।
मरना जीना तुरंत बतलाती।
कभी नहीं कुछ खाना खाती।
सदा हाथ में मेरे रहै, बासू केर खगनियां कहै।”
तो बताइए तो सखियों, क्या है इसका जवाब ? चलिए मैं ही बता देती हूं-“नाड़ी”। नाड़ी भी तो स्त्री अर्थात स्त्रीलिंग ही है जिसके चलते रहने पर जिंदगी चलती रहती है। एक और खूबसूरत पहेली बूझिए-
“दोनों बहनें बड़ी अनोखी।
लखने में यह सबसे हैं चोखी।
जिससे ये दोनों लग जातीं।
बिना न देखे उसे अघातीं।
बिना न इनके जीवन रहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”
अब भला कौन हैं, ये दोनों अनोखी बहनें। अरे वही तो हैं, जिनके बिना जग सूना हो जाता है। हाँ भाई हाँ, आँखें।
अब जरा दो पंक्तियों वाली पहेलियाँ भी देखिए-
“लंबी चौड़ी आँगुर चारि, दुहूँ ओर से डारिन फार।
जीव न होय, जीव को गहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”
इसका उत्तर है “कंघा” जो निर्जीव होकर भी सजीव लोगों अर्थात मनुष्यों के बहुत काम आता है। एक और उदाहरण दृष्टव्य है-
“पेट फटा रहता है सदा, बड़े जोर से बजता कहाँ।
पूजा अरचा में वह रहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”
यह है “शंख” जिसके बिना पूजा पाठ पूरा नहीं होता।
खड़ी बोली और अवधी में रचित ये पहेलियाँ तकरीबन हर विषय को समेटती हैं। ये रोचक भी हैं और सरस भी। कभी थोड़ी कठिन लगती हैं और चुनौती भी देती हैं कि बूझो तो सही। और वह पहेली ही क्या जो सुनने वाले को बूझ लेने की चुनौती न दे। तो कभी- कभी आसान भी लगती हैं और आप झट से उसका अर्थ खोल लेते हैं। इस तरह के कुछ और उदाहरण देखिए-
“रहती अंगरेज़न के साथ।
उसे नवाते हैं सब माथ।
बड़ी लड़ाई में वह जावै।
धड़ाधड़ाका शब्द सुनावै।
सदा निशाना अपना गहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”
इसका अर्थ तो आपने समझ ही लिया होगा। जी, बिल्कुल सही समझा। यह है “बंदूक” जिसके धड़ाके के बिना युद्ध नहीं लड़ा जा सकता। एक और आसान सी पहेली का उदाहरण प्रस्तुत है-
“बाँध गले में उसकी डोरी।
देते लड़के हैं झकझोरी।
आसमान में उड़ता रहता।
खाकर झोके बहता रहता।
सूरत सदा तिकोनी रहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”
सही समझा आपने, यह तिकोनी चीज है, पतंग जिसे लड़के बच्चों के साथ बड़े भी बड़े चाव से आसमान में उड़ाते हैं।
सखियों, इन पहेलियों को पढ़कर लगता है कि खगनियाँ बासू नामक गाँव की रहने वाली थीं। संभवतः इसीलिए वह हर पहेली के अंत में अपना नाम अपने गाँव के नाम के साथ जोड़ देती हैं। इन पहेलियों से गुजरते हुए हम खगनियाँ की कवित्त शक्ति और बुद्धि कौशल का अंदाज़ा सहजता से लगा सकते हैं। सखियों, आप स्वयं भी इन्हें पढ़कर आनंद उठाएं और दूसरों को भी पढ़वाएं। इस पढ़ने -पढ़ाने के द्वारा ही हम इस विदुषी कवयित्री को जन मानस के बीच जीवित रख सकते हैं।
स्वाधीनता दिवस पर पढ़ें शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की प्रेरक कविता
युग-युग की शांति अहिंसा की, लेकर प्रयोग गरिमा समस्त,
इतिहास नया लिखने आया, यह पुण्य पर्व पन्द्रह अगस्त।
स्वाधीनता दिवस पर लें तिरंगा व्यंजनों का आनन्द


पद्मा सचदेव : चीड़ों का आशीष, अंधेरे की रोशनी
वह जितनी डोगरी की लेखिका थीं, उतनी ही हिंदी की भी थीं। अलबत्ता, हिंदी वाले उन्हें अपनी ही भाषा की लेखिका मानते थे। इसका कारण शायद यह था कि वे हिंदी लेखकों से अधिक घुली-मिली थीं। चाहे महादेवी हों या अज्ञेय या धर्मवीर भारती सबके साथ उनके मधुर आत्मीय संबंध थे। धर्मवीर भारती को वे राखी बांधती थीं। सातवें दशक में जो लोग धर्मयुग के पाठक रहे उन्हें पद्मा सचदेव का लिखा याद होगा। उनकी तस्वीरें भी।
साहित्य अकादेमी की सीढ़ियों पर उनकी खिलखिलाती हंसी की आवाज सुनाई पड़ती थी, तो लोग जान जाते थे पद्मा जी आ रही हैं। वे युवा लेखकों के रचना पाठ में न सिर्फ उपस्थित रहती थीं बल्कि उनसे मिलतीं और हौसला अाफजाई करती थीं।
उनकी रचनात्मक ताकत लोकगीत थे। उनमें लोक और नागर का अद्भुत संगम था। बरसों वे दिल्ली में रहीं लेकिन उन पर अभिजात्य रंग नहीं चढ़ा। एक खुलापन उनके व्यक्तित्व और लेखन में रहा। 17 अप्रैल 1940 में जम्मू से 40 किलोमीटर दूर एक ऐतिहासिक गांव पुरमंडल के प्रतिष्ठित राजपुरोहित परिवार में जन्मीं पद्मा सचदेव ने बारह-तेरह वर्ष की उम्र में लिखना शुरू किया था।
उन्होंने डोगरी लोकगीतों से प्रभावित होकर डोगरी में कविता लिखना शुरू की थी। उन्हें डोगरी की पहली आधुनिक कवयित्री भी कहा जाता है। उनके पास लोकगीतों का दर्द तो था ही, निजी दुख भी थे। उनके पिता भारत-पाक विभाजान के दौरान मारे गए थे। वे यह जख्म जीवनभर नहीं भूल सकीं। उनकी रचनाओं में शायद इसलिए एक कशिश रहती थी।
साहित्य अकादेमी की ओर से जब उन्हें 2019 में फेलो बनाया गया तो उन्होंने कहा था, “बचपन में लोकगीतों से मिली प्रेरणा से लिखना सीखा पर हिंदी में लिखने के लिए मुझे धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती ने प्रेरित किया था। जब मुझे साहित्य अकादेमी मिला तो विश्वास ही नहीं हुआ कि मुझे यह सम्मान मुल्कराज आनंद, नामवर सिंह और रशीद अहमद सिद्दीकी के साथ मिल रहा है। बचपन में डोगरी लोकगीत सुनकर मैं चमत्कृत हो जाती थी कि कौन है जो इन्हें लिखता है? तब मैं दस-बारह साल से ही छंद जोड़ने लगी। गांव में रहकर मैंने लोक गीतों को करीब से जाना।”
कम महिला लेखिकाएं हैं, जिन्हें अकादेमी में फैलो होने का सम्मान प्राप्त हुआ है। वे इस पंक्ति में महादेवी वर्मा, बाल अम्मा, कुर्तुल-एन-हैदर, अमृता प्रीतम, अनीता देसाई और कृष्णा सोबती के साथ शामिल हैं। पद्मा जी अपने गद्य के लिए भी जानी जाती थीं। ऐसा गद्य जो बहुत सरस, आत्मीय, अंतरंग तथा पारदर्शी है, जिसमें प्रवाह देखा जा सकता है। अज्ञेय के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने शब्दों में अज्ञेय के व्यक्तित्व और अपनी यादों को साकार कर दिया था। लिखने के अलावा उन्होंने रेडियों के लिए भी काम किया। कुछ बरस जम्मू रेडियो के अलावा उन्होंने दिल्ली में डोगरी समाचार विभाग में भी काम किया। उन्हें कई सम्मान मिले। शायद ही कोई सम्मान हो, जो उन्हें न मिला हो। उन्हें पद्मश्री, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, सोवियत लैंड पुरस्कार, सरस्वती सम्मान और साहित्य अकादेमी की महत्तर सदस्यता से नवाजा गया था। साहित्य अकादेमी पुरस्कार तो उन्हें 1971 में ही मिल गया था। उन्हें यह पुरस्कार ‘मेरी कविता मेरे गीत’ के लिए मिला था। 2016 में पुस्तक ‘चित्त चेते’ के लिए उन्हें 25वां सरस्वती सम्मान मिला था। यह उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक थी।
पद्मा जी कहती थीं, “विचार में कविता अपने आप आती है। गद्य को लाना पड़ता है।” उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें ‘जम्मू एक शहर था’ काफी चर्चित हुआ था। उनकी एक कविता है जो भूले नहीं भूलती।
शिलुका*
देह जलाकर मैं अपनी
लौ दूं अंधेरे को
जलती-जलती हंस पडूं
जलती ही जीती हूं मैं
जैसे बटोत के जंगल में
जल रही शिलुका कोई
देवदारों की धिया (बेटी)
चीड़ों का मुझे आशीष
अंधेरे की मैं रोशनी…
जंगल का हूं मोह मैं
जो तू है वही हूं मैं
अपनी मृत्यु पर रोई
यह बस्ती टोह ली
चक्की में डालकर
बांह पीसती हूं मैं
लोक पागल हो गया
तुझे कहां ढूंढता रहा
तू तो मेरे पास था
तभी तो जीती हूं मैं
मैं एक कितबा हूं
लिखा हुआ हिसाब हूं
मैं पर्णकुटिया तेरी
लाज तुम रखना मेरी
रमिया रहीमन हूं मैं
कुछ तो यकीनन हूं मैं!
(*चीड़ की लकड़ी, पहाड़ी घरों में मोमबत्ती की तरह जलाई जाती है)
शिलुका*
देह जलाकर मैं अपनी
लौ दूं अंधेरे को
जलती-जलती हंस पडूं
जलती ही जीती हूं मैं
जैसे बटोत के जंगल में
जल रही शिलुका कोई
देवदारों की धिया (बेटी)
चीड़ों का मुझे आशीष
अंधेरे की मैं रोशनी…
जंगल का हूं मोह मैं
जो तू है वही हूं मैं
अपनी मृत्यु पर रोई
यह बस्ती टोह ली
चक्की में डालकर
बांह पीसती हूं मैं
लोक पागल हो गया
तुझे कहां ढूंढता रहा
तू तो मेरे पास था
तभी तो जीती हूं मैं
मैं एक कितबा हूं
लिखा हुआ हिसाब हूं
मैं पर्णकुटिया तेरी
लाज तुम रखना मेरी
रमिया रहीमन हूं मैं
कुछ तो यकीनन हूं मैं!
(साभार – आउटलुक)
31 बंगाल बीएन एनसीसी द्वारा पचहत्तरवें दिवस पर स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को सलाम
नयी दिल्ली : कोविड -19 प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए, 31 बंगाल बीएन एनसीसी के कैडेट, ईडन गार्डन स्टेडियम, कोलकाता के पास नेताजी पार्क में 75 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमारे लिए स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने वाले योद्धाओं को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्र हुए। मातृभूमि कैडेटों को हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानकारी दी गयी। उनकी वीरता और बलिदान की कहानियों ने उन सभी कैडेटों को प्रेरित किया जिन्होंने हमारे महान नेताओं के नक्शेकदम पर चलने का संकल्प लिया है। 31 बंगाल बीएन एनसीसी ने नेताजी पार्क में नेताजी की प्रतिमा का दायित्व लिया है और पूरे वर्ष इसके रखरखाव की देखभाल कर रहा है। कैडेटों ने प्रतिमा की सफाई की और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को श्रद्धांजलि दी। हमारे सभी योद्धाओं के सम्मान में पेंटिंग, गायन और कविता पाठ जैसे अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
माँ आश्छेन : मोहम्मद अली पार्क की खूंटी पूजा सम्पन्न
कोलकाता : मोहम्मद अली पार्क की दुर्गा पूजा के लिए तैयारियाँ आरम्भ हो गयी हैं। महानगर के ख्यातिलब्ध दुर्गोत्सव में से एक यह पूजा यूथ एसोसिएशन द्वारा आयोजित की जाती है। गत 11 अगस्त को आय़ोजित हुई इस खूंटी पूजा में पार्षद तथा बोरो संयोजक रेहाना खातून, पार्षद शगुफ्ता परवीन मौजूद थीं। आयोजकों में मुख्य संरक्षक रामचन्द्र बड़ोपोलिया, उपाध्यक्ष ओमप्रकाश पोद्दार समेत अन्य पदाधिकारी इस अवसर पर उपस्थित थे।
कोविड – 19 : चुनौतियों को अवसर बना रहा है सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल
सृजनात्मकता से भरी गतिविधियों में खोज लिया समाधान
कोलकाता : कोविड – 19 बहुत ही चुनौतीपूर्ण समय है। लॉकडाउन और घर में रहकर काम करना अगर एक विकल्प बना भी तो इसे अपनाना इतना आसान नहीं था लेकिन बाद में यह हमारी जिन्दगी का हिस्सा सा बना और इसके कारण एक नयी व्यवस्था बनी, वर्चुअल माध्यम, सोशल मीडिया, इंटरनेट के कारण आज जिन्दगी बदल गयी है और इसका असर लम्बे समय तक रहने वाला है। सोशल मीडिया माध्यमों पर बड़े आयोजन भी हो रहे हैं। सरकारी और निजी वार्ताएँ हो रही हैं। बड़ी कम्पनियों तथा संस्थानों के कर्मचारियों ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ की संस्कृति को अपना लिया है। शिक्षण संस्थान भी समय के साथ चल रहे हैं। कक्षाएं और कार्यक्रम ऑनलाइन हो रहे हैं और स्कूलों ने कुशलता के साथ परिस्थिति को सम्भाल लिया है। आज हम बात करेंगे सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की। इस स्कूल में हाल ही में नयी प्रिंसिपल कोइली दे ने पदभार सम्भाला है और उनके पास इस समस्या को लेकर न सिर्फ पूरा रोड मैप तैयार था बल्कि इसे उन्होंने सफलतापूर्वक लागू भी किया।। आज हम सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की सफलता की यही कहानी आपके सामने रख रहे हैं। बहुत से स्कूल और संस्थान अब भी उलझन में हैं कि कोविड -19 से उत्पन्न परिस्थितियों के बीच स्कूल को कैसे खोला जाए और विद्यार्थियों तथा शिक्षकों की सृजनात्मकता को किस तरह बरकरार रखा जाए।

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की ओर से आयोजित एक पत्रकार वार्ता में स्कूल की नयी प्रिंसिपल कोइली दे, हेडमिस्ट्रे विदिशा पांजा, कोकरिकुलर कोऑर्डिनेटर रुबेना चटर्जी (सीनियर सेक्शन) तथा रितु पसारी (जूनियर सेक्शन) ने इन गतिविधियोंके बारे में विस्तार से बताया।
कोविड -19 के दौरान जब बच्चे घर में रहे तो यह दबाव था..हम सब पर था। यह सिर्फ अकादमिक दबाव नहीं था कि बच्चों की पढ़ाई ठीक से नहीं हो पा रही थी क्योंकि स्कूलों में तो ऑनलाइन मोड पर कक्षाएँ ली ही जा रही थीं। एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी था क्योंकि छात्राएँ अपनी सहेलियों से ही नहीं मिल पा रही थीं और बच्चे अपने मन की गतिविधियाँ नहीं कर पा रही थीं। हमारे स्कूल में सलाहकार बच्चों को रोज फोन करते थे। मार्च से लेकर आज तक बच्चों को विभिन्न माध्यमों से मानसिक तौर पर बच्चों को आराम मिले, इसके लिए कई प्रकार की गतिविधियाँ करती थीं। बच्चे संगीत, नृत्य या अपनी किसी अन्य प्रिय गतिविधि से खुद को जोड़ रहे थे।
पिछले साल जब हमने स्कूल खोला तो फ्रेंडशिप पीरियड शुरू किया था। दो कक्षाओं के बीच में जब इंटरवल होता था तो बच्चे अपने दोस्तों से मिलता था और वहाँ कोई शिक्षिका या शिक्षक नहीं रहते थे। छठीं से 12 वीं कक्षा की छात्राओं के लिए इस कक्षा को इंटरवल नाम दिया गया। हम इन चीजों को लेकर सजग थे। छात्राएँ भी ऑनलाइन कक्षाओं को लेकर सजग रहीं। स्कूल खोला गया तो मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक क्लब हमने शुरू किया जिसका नाम आविष्कार है और वर्चुअल माध्यम पर संगीत, नृत्य थेरेवी की व्यवस्था की गयी। गुस्से और तनाव को नियंत्रित करना सिखाया गया। योग, सांस से जुड़े व्यायाम शुरू किय़े गये। पहले स्थिति गम्भीर थी लेकिन अब वे बेहतर थे। वहीं शिक्षक – शिक्षिकाओं के लिए भी काउंसिलिंग के सत्र शुरू किये गये। वर्चुअल कक्षाएँ संचालित करना शिक्षिकाओं के लिए भी कठिन था पर उन्होंने बेहतरीन काम किया। इसमें वित्तीय मामलों पर जानकारी दी गयी। पैसे को कैसे सम्भालना था, यह बचाया गया। अपने स्कूल की शिक्षिकाओं के साथ किया गया। शनिवार को यह दूसरे स्कूलों के लिए उपलब्ध होगा। सीनियर स्तर पर छात्राओं को इसकी जानकारी दी।

अभिभावकों से बहुत सहयोग मिला। आर्थिक समस्याओं को देखते हुए बहुत सी छात्राओं को फीस में छूट मिली। स्कूल प्रबन्धन से लेकर शिक्षक – शिक्षिकाओं ने बहुत अच्छा काम मिला। वर्चुअल माध्यमों पर शिक्षिकाओं से बात होती है। यह बहुत ही अनौपचारिक तरीके से आयोजित होता है जिसमें हम सब शिक्षिकाओं से बात करके उनकी समस्या को समझते हैं। पिछले साल अभिभावकों के लिए एक काउंसिलिंग सत्र आय़ोजित किया गया था। हमने कुकरी, योग, जैसे सत्र आयोजित हुआ। हम एक्सचेंज प्रोग्राम करते थे…कोविड – 19 के दौरान बाधा आयी और इसके बाद वर्चुअल माध्यम पर शुरू किया गया। अब लगता है कि इस दौर ने बहुत कुछ सिखाया। वर्चुअल खेलकूद आयोजित किये गये।
हमने डिजिटल पुस्तकालय शुरू किया गया है। इसमें अनगिनत किताबें रखी जा सकती हैं। कोविड – 19 में सब कुछ बुरा नहीं था, इसे स्वीकार कर आगे बढ़ने के कई तरीके भी हमने सीखे हैं।
वर्चुअल पिकनिक – यह पिकनिक नर्सरी से लेकर तीसरी कक्षा की छात्राओं के लिए आयोजित की गयी थी। इस मौके पर बच्चियों ने थीम के अनुसार परिधान पहने थे। उनके पास पानी की बोतल, कैप और धूप के चश्मे भी थे। एक तरफ जहाँ नर्सरी की छात्राएं डिज्नीलैंड की वर्चुअल यात्रा पर निकलीं तो के जी और पहली कक्षा की छात्राओं ने दुबई के मिरेकल गार्डन की वर्चुअल सैर की। दूसरी कक्षा की छात्राओं की थीम फूल थीं तो उनके लिए बोर्डिग पास भी था और वे श्रीनगर के ट्यूलिप गार्डन गयीं। वहीं तीसरी कक्षा की छात्राएं हॉलीवुड के यूनिर्वसल स्टूडियो स्थित जुरासिक पार्क देखा। छात्राओं को कई खेल खिलाए गये। इस पिकनिक से अभिभावक भी काफी प्रसन्न रहे।

डिजिटल दूरियों की खाई को पाटने के लिए स्कूल में दान उत्सव आयोजित किया गया। स्कूल में सफलतापूर्वक 92 मोबाइल फोन, 9 टैबलेट, 9 डेस्कटॉप, 12 लैपटॉप, 1 टेलीविज़न सेट और अनगिनत सामान जैसे इयरफ़ोन, हेडफ़ोन, कीबोर्ड और माउज़ इकट्ठा किए जा सके।
अंतिम चरण में, इन उपकरणों को जरूरतमंद बच्चों की शैक्षणिक जरूरतों को पूरा करने के लिए इन गतिविधियों से जुड़े चार संगठनों को दान कर दिया गया। शिक्षकों और आरोग्य संध्या के कुछ छात्रों को सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में आमंत्रित किया गया था, जहाँ प्रिंसिपल कोइली दे और हेडमिस्ट्रेस, विदिशा पांजा ने उन्हें उपकरण सौंपे थे। अन्य तीन संगठनों के लिए, किड्स सेंटर, गरियाहाट, राइज, कृष्णानगर और उपेंद्र विद्यामंदिर, शोभाबाजार, स्कूल की मानसिक स्वास्थ्य कल्याण टीम, जिसमें स्कूल के काउंसलर, विशेष शिक्षक और कुछ छात्र उपस्थित रहे।
हमें उम्मीद है कि इस प्रस्तुति से आपको मदद मिलेगी। अगर आपने भी इस तरह के प्रयासों से स्थिति को सुधारने में सफलता प्राप्त की है तो हमसे जरूर साझा करें..आपकी एक कोशिश बहुत से लोगों के लिए वरदान बन सकती है।




