Friday, October 30, 2026
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सम्मानित हुए बीएचएस के मेधावी विद्यार्थी

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल का पुरस्कार वितरण समारोह हाल ही में आयोजित किया गया। वर्चुअल माध्यम पर आयोजित इस समारोह में दसवीं और बारहवीं के विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। विद्यार्थियों को उनकी उपलब्धियों, निरन्तर प्रयास, अच्छे आचरण और विषयों में प्राप्तांक के लिए पुरस्कृत किया गया। इस श्रेणी में इस वर्ष एस, पी. बनर्जी अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस दसवीं बी के छात्र अथर्व चौधरी ने प्राप्त किया। बिड़ला हाई स्कूल अल्यूमनी ट्रॉफी फॉर द स्कूल टॉपर इसी कक्षा के सर्बो सरकार तथा बारहवीं ए के कॉमर्स के छात्र यश जैन को मिली। दसवीं ई के अमन गुप्ता और बारहवीं बी के कॉमर्स के छात्र शिवम अग्रवाल को द भावेश जाजू मेमोरियल अवार्ड मिला। अकादमिक उत्कृष्टता के लिए ईशान बनर्जी, स्पन्दन दास, आदित्य राय चौधरी, हृतम बोस, अनीश बनर्जी, और वेदान्त पालित को द आई. वी. शर्मा मेमोरियल अवार्ड्स प्रदान किया गया। एआईएसएसई तथा एआईएसएससीई की परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले भी पुरस्कृत किये गये।

 

महिला हिंसा उन्मूलन दिवस पर बीएचएस में असेम्बली

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल में अन्तर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस पर विशेष असेम्बली आयोजित की गयी। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के विरोध में हर साल यह दिन मनाया जाता है। 25 नवम्बर का दिन संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा महिला हिंसा उन्मूलन दिवस घोषित किया गया है। विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से इसे लेकर जागरुकता लाने का प्रयास किया।

भारतीय परम्परा में मिठास भरता आ रहा है खीर का स्वाद

खीर एक ऐसा व्यंजन है जो भारत में किसी भी खास अवसर में मिठास भर देती है। अलग – अलग राज्य और अलग – अलग तरीके मगर खीर पूरे भारत में पसन्द किया जाने वाला व्यंजन है। हमारे पौराणिक इतिहास में खीर का उल्लेख है। रामायण की बात करें तो राजा दशरथ ने जब पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाया तो अग्निदेव ने प्रकट होकर उनको खीर का ही प्रसाद दिया था। इसके बाद उनको श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न पुत्र के रूप में प्राप्त हुए।

खीर शब्द संस्कृत के क्षीर शब्द से आया है जिसका अर्थ है क्षीर और भगवान विष्णु क्षीर सागर में निवास करते हैं तो शाब्दिक अर्थ दूध का सागर बनता है। दरअसल, खीर की उत्पत्ति संस्कृत के क्षीर से हुई है। क्षीर दूध को कहते हैं और इसका अपभ्रंश आज खीर के नाम से जाना जाना जाता है। खीर एक प्रकार का मिष्ठान्न है जिसे चावल को दूध में पकाकर बनाया जाता है। खीर को पायस भी कहा जाता है। ‘खीर’ शब्द, ‘क्षीर’ (= दूध) का अपभ्रंश रूप है। रामायण महाभारत काल में भी खीर का जिक्र है। खीर का पहला उल्लेख 400 ईसापूर्व के जैन और बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है। ठीक इसी प्रकार शरद पूर्णिमा से भी खीर का विशेष सम्बन्ध है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखी खीर पर चन्द्रमा अमत बरसाते हैं। कहने का मतलब यह कि खीर भारतीय परम्परा का महत्वपूर्ण अंग है।

खीर की कहानी का सम्बन्ध केरल में प्रचलित एक पौराणिक गाथा से भी है। कहते हैं एक बार श्रीकृष्ण ने अंबलापुझा के राजा को परखना चाहा। राजा शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे, सो शतरंज की बिसात पर ही शर्त रखी भगवान कृष्ण ने जो भेस बदलकर साधु के रूप में थे। राजा को लगा मामूली-सा दिखने वाला साधु मेरे सामने क्या टिकेगा, इसलिए शर्त मान ली कि हारने पर उसकी हर शर्त उन्हें मंजूर होगी। खैर, खेल में राजा की हार हुई। साधु ने कहा मुझे इस शतरंज की बिसात भर चावल दो, बस इतना ख्याल रखना कि पहले खाने में जितने दावल के दाने रखे जाएं, दूसरे में उससे दोगुने और तीसरे में उसके दोगुने और इस तरह यह दोगुने का हिसाब पूरे 64 खानों तक बना रहे। राजा को यह मामूली हिसाब-किताब लगा। लेकिन जब असल में चावल रखा जाने लगा और एक-एक कर गिनती आगे बढ़ती रही तो आंकड़ों की विशालता का अहसास राजा को हुआ। यहां तक कि चालीसवें खाने तक पहुंचते-पहुंचते उसके पूरे साम्राज्य के चावल समाप्त हो गए! राजा को परेशान देखकर श्रीकृष्ण ने अपना असली रूप दिखाया। और बाकी बचे चावलों को भक्तों को पाल पायसम के रूप में परोसने का वायदा लिया। तभी से अंबलापुझा के मंदिर में नैवेद्य के रूप में यह खीर बंटती आ रही है।
पायसम को दूध, चावल और गुड़ से बनाया जाता है. जबकि ज्यादातर खीर दूध, चीनी और चावल से बनती है. इसमें सूखे मेवे डाले जाते हैं। पश्चिम बंगाल में यह पायेश हो जाती है. पायेश को दूध, चावल, घी, चीनी/गुड़ और खोया डालकर पकाया जाता है।
वही खीर उत्तर प्रदेश आते-आते बदल जाती है। बनारस में त्योहारों और हवन में इसे दूध, चावल, घी, चीनी, इलायची, मेवे और केसर डालकर पकाया जाता है जबकि दक्षिण भारत में सेवैया और साबूदाने को मिलाकर खीर बनती है। इसें कुछ सूखे मेवे डाले जाते हैं. असम में खीर को पायोख कहा जाता है। इसमें काफी मात्रा में सूखे मेवे डाले जाते हैं। यहाँ इसका रंग थोड़ा गुलाबी होता है। कहीं-कहीं इसे साबूदाना से भी बनाया जाता है। ऐसी खीर असम के परिवारों में महत्वपूर्ण भोजन के तौर पर बनाई जाती है। बिहार में खीर को चावल की खीर कहा जाता है। यहां इसे बनाने के लिए फुल क्रीम दूध, चीनी, इलायची पाउडर, सूखे मेवे और केसर डाला जाता है। अगर केसर न हो तो भी काम चल जाता है। वहीं चीनी की जगह गुड़ डाला जाये तो खीर रसियाव बन जाती है। खीर का सम्बन्ध जगन्नाथ पुरी से भी है। बंगाल की तरह ओडिशा में खीर को पायस कहा जाता है। यह पुरी में दो हजार सालों से बन रही है। इसे अन्नप्रसादम में बांटा जाता है। कहीं-कही पायसम को चीनी, चावल और नारियल के दूध से तैयार किया जाता है। वहीं कर्नाटक में सेवैया से पायसम बनता है. इसमें साबूदाना भी मिलाया जाता है जबकि हैदराबाद में लौकी की खीर खूब पसंद की जाती है। इसे गिल-ए-फिरदौस कहा जाता है जिसे दूध और लौकी से बनाया जाता है। भारत ही नहीं प्राचीन रोम और फारस क्षेत्र में भी खीर के सेवन का उल्लेख मिलता है। रोमवासी पेट को ठंडक पहुंचाने के लिए खीर खाया करते थे. जिस फिरनी को पंजाब में बड़े चाव से खाया जाता है। वो एक जमाने में पर्शिया के पसंदीदा व्यंजनों में से थी। पारसी लोगों ने ही फिरनी में गुलाबजल और सूखे मेवे डालना शुरू किया था. जबकि चीन में बनने वाली खीर में फलों को शहद में डुबोकर डाला जाता है। । ईरान और अफगानिस्तान में खीर से ही मिलते-जुलते व्यंजन शोला-ए-शीरीं और शोला-ए-ज़र्द पकते हैं। आमतौर पर मुहर्रम के दसवें रोज़ इन्हें पकाया जाता है और एक मीठे पेय शर्बत-ए-रेहान के साथ परोसा जाता है। इन्हें गरीबों में भी बांटने की परंपरा है। शोला-ए-ज़र्द के लिए छोटे आकार के शोला (चावल) को दूध और मेवों के संग पकाकर इसमें पीला रंग मिलाया जाता है। आज खीर की विविधता और लोकप्रियता देखते हुए इसके साथ प्रयोग भी खूब हो रहे हैं।

(साभार – न्यूज ट्रैक, अमर उजाला)

अन्तर्द्वन्द्वों, आकांक्षाओं..आशा – निराशा, हर एक भाव का दर्पण ‘अभिव्यक्ति भावों की’

हम सब खुद को अभिव्यक्त करना चाहते हैं, बहुत कुछ कहना चाहते हैं और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है कविता। कविता हमारे मन के भावों के साथ हमारे अन्तर्द्वन्द्वों, हमारी आकांक्षाओं..आशा – निराशा, हर एक भाव का दर्पण है। कविता खुद से किया गया संवाद है जो समाज से प्रभावित भी होता है और समाज को प्रभावित भी करता है। संवाद की इसी परम्परा का अनूठा गीत है प्रो. प्रेम शर्मा का काव्य संग्रह ‘अभिव्यक्ति भावों की’। इस पुस्तक की भूमिका डॉ. अरुण कुमार अवस्थी ने लिखी है। वे लिखते हैं, ‘संग्रह की सभी कवितायें कवयित्री के शुद्ध अन्तर -वेगों की निर्मल अभिव्यक्ति हैं।’
इस काव्य संग्रह का आरम्भ ही सरस्वती वन्दना से होता है – ‘हे श्वेत वरणी हंसवाहिनी/ कर्म कुशलता बुद्धि बल दे/ शुद्ध आचरण मन पवित्र कर दे/ शब्दों में स्नेह सुधा भर दे।’ कवयित्री मन की असीम शक्ति को समझती हैं। ‘मेरी मांग’ कविता में तभी तो वह लिखती हैं – ‘माँग रही हूँ तुमसे मैं तो/शुद्धि, मन और विचारों की। मांग है मुझको मानस बल दो/ चाह है उज्ज्वल भावों की।’

बचपन को याद करते हुए वे बाल जीवन की समस्याओं पर भी बात करती हैं -‘पर हम तो सपने देखते नहीं/ मधुर स्वप्न लुप्त हुए/टेस्ट की दहशत में/ दिन रात हम तो पिस रहे।’ कवयित्री का दार्शनिक मन कुछ कविताओं में प्रकट होता है। ‘नवीन प्रयास’ नामक इस कविता को देखिए – ‘प्राप्तियाँ कम हुईं तो क्या हुआ/ आलोचनाएँ हुईं तो क्या हुआ, उन्नति पथ पर चलने की कोशिश तो की, गति धीमी हुई तो क्या हुआ’।
पुस्तक में 64 कविताएं हैं। भाषा तत्सम शब्दों से ओत – प्रोत है परन्तु सहज एवं बोधगम्य है और कई प्रश्नो के उत्तर तलाशती है तो कुछ प्रश्न उठाती भी है। प्रो. प्रेम शर्मा अध्यापिका रही हैं और उनका दीर्घ अनुभव इन कविताओं में नजर आता है, उनकी बेचैनी और सुकून सब आप इन कविताओं में देख सकते हैं।
कवयित्री जो आस – पास देखती हैं, महसूस करती हैं, सब अपनी कलम में उतार देती हैं। इस संग्रह में हर एक भाव की कविता है, समसामायिक परिस्थितियों को उकेरती कविता है और राष्ट्रीय भाव को अभिव्यक्त करने वाली कविताएँ भी हैं – ‘रचो नया इतिहास क्योंकि, युग बदल रहा/ नूतन विधान छेड़ दो कि जग बुला रहा, निष्फल हुआ हर एक स्वप्न अब साकार हो।’ कविता को सरलता से समझने और गुनने के लिए यह पुस्तक पढ़ी जानी चाहिए।
पुस्तक का नाम – अभिव्यक्ति भावों की
विधा – काव्य संग्रह
कवयित्री- प्रो. प्रेम शर्मा
समीक्षक – सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

लैक्मे : पंडित जवाहरलाल नेहरू का सपना जो टाटा ने साकार किया और माता लक्ष्मी से है जिसका सम्बन्ध

लैक्मे! इस नाम को कौन नहीं जानता। सौन्दर्य उत्पाद या कॉस्मेटिक्स की दुनिया में लैक्मे नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है। लैक्मे भारत की पहली कॉस्मेटिक्स कंपनी है। आज भारत के नंबर वन कॉस्मेटिक्स ब्रांड पर काबिज इस कम्पनी को शुरू किया था जेआरडी टाटा ने। लैक्मे के जरिए टाटा समूह ने पहली बार कॉस्मेटिकक्स उद्योग में कदम रखा था। टाटा समूह ने भारतीय महिलाओं की संजने-संवरने की आकांक्षा और त्वचा की जरूरतों को कुछ इस कदर समझा कि लैक्मे ब्रांड शुरू होने के साथ ही लोकप्रिय होता चला गया। लैक्मे…इस नाम का सम्बन्ध जेआरडी टाटा के साथ-साथ देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और माँ लक्ष्मी से भी है। आइए जानते हैं लैक्मे की शुरुआत का दिलचस्प किस्सा और बुलंदियों पर पहुंचने की इसकी पूरी कहानी…

बात 1952 की है। आजादी के बाद का वह दौर जब स्वतंत्र भारत की अर्थव्यवस्था अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रही थी। लैक्मे की स्थापना के पीछे पंडित जवाहरलाल नेहरू की सोच रही। देश में अच्छी गुणवत्ता वाले निजी देखभाल वाले देसी सौन्दर्य उत्पादों की कमी थी और भारतीय निर्माता भी बेहद कम थे। लिहाजा उस वक्त देश के संपन्न परिवारों की महिलाएं विदेशी सौन्दर्य उत्पाद इस्तेमाल करती थीं। मध्यम वर्गीय परिवारों की महिलाएं घर पर ही तैयार किए गए सौंदर्य उत्पादों का इस्तेमाल करती थीं। सौन्दर्य उत्पादों के आयात के एवज में देश से एक मोटी धनराशि विदेश जाती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को इस बात को लेकर चिंता हुई और यही चिंता लैक्मे की उत्पत्ति का कारण बनी।

​जेआरडी टाटा से साझा किया विचार

नेहरू ने टाटा ग्रुप के चेयरमैन और अपने दोस्त जेआरडी टाटा से इस बारे में बात की और देश के अंदर अच्छी गुणवत्ता वाले कॉस्मेटिक्स बनाने वाली कंपनी स्थापित करने को कहा। नेहरू जानते थे कि जेआरडी टाटा ही वह शख्स हैं, जिनमें चुनौतियों से जूझने का जुनून और एंटरप्रेन्योरिशप के स्किल हैं। जेआरडी टाटा को भी यह आइडिया पसंद आया क्योंकि कॉस्मेटिक्स के बाजार में देश के अंदर कॉम्पिटीशन न के बराबर था। इस तरह उत्पत्ति हुई लैक्मे ब्रांड की। एक ऐसी कॉस्मेटिक्स कंपनी, जिसने भारतीयों की त्वचा और भारतीय जलवायु को ध्यान में रखकर कॉस्मेटिक्स उतारे।

​टाटा ऑयल मिल्स कंपनी की सब्सिडियरी के तौर पर लॉन्चिंग

लैक्मे को टाटा ऑयल मिल्स कंपनी (टॉम्को) की पूर्ण स्वामित्व वाली सब्सिडियरी के तौर पर 1953 में लॉन्च किया गया। टॉम्को को कोचीन में 1920 में शुरू किया गया था। कोचीन का वर्तमान नाम कोच्चि है। लैक्मे को टॉम्को ने फ्रांस की दो नामी कंपनियों रॉर्बट पिग्वेट और रेनॉयर  के साथ मिलकर शुरू किया था। विदेशी सहयोगियों की इक्विटी में कोई भागीदारी नहीं थी। उनकी भागीदारी केवल उनके संरक्षित परफ्यूम बेसेस के बारे में तकनीकी जानकारी देने तक सीमित थी, जिसके लिए उन्हें टाटा की ओर से फीस का भुगतान किया जाता था। लैक्मे पूरी तरह से एक स्वदेशी ब्रांड था।

​माँ लक्ष्मी से कैसे नाता

लैक्मे, फ्रेंच शब्द है और इसका अर्थ लक्ष्मी है। यह नाम पड़ना भी काफी दिलचस्प है। जब कंपनी को शुरू किया गया तो फ्रांसीसी सहयोगियों को एक नाम सुझाने को कहा गया। एक ऐसा नाम, जिसमें दोनों देशों की झलक हो। तब लैक्मे नाम सामने आया, जो पेरिस में उस वक्त विख्यात एक ओपेरा से प्रेरित था। उस ओपेरा का नाम लैक्मे था, जो समृद्धि और सुंदरता की देवी लक्ष्मी पर आधारित था। तो यह कंपनी के लिए एक सही नाम था। वहीं यह भी कहा जाता है कि लैक्मे का नाम जेआरडी टाटा ने लक्ष्मी ही रखा था और बाद में इसे बदला गया।

​एक छोटे किराए के परिसर से शुरुआत

लैक्मे की शुरुआत मुंबई में पेद्दार रोड पर एक छोटे किराए के परिसर से हुई थी। लॉन्च होने के बाद इसके परिचालन और प्रॉडक्ट रेंज तेजी से बढ़ी और 1960 आते-आते कंपनी बड़े परिसर की तलाश करने लगी। लैक्मे के प्रॉडक्ट अच्छे भी थे और कम कीमतों पर उपलब्ध थे। जल्द ही लैक्मे को टॉम्को की सेवरी फैक्ट्री में शिफ्ट कर दिया गया। लैक्मे के लॉच होने के बाद भारत में विदेशी सौन्दर्य उत्पादों की खेप आनी लगभग बंद सी हो गई। फिल्मों में भी मेकअप के लिए लैक्मे के सौन्दर्य उत्पाद इस्तेमाल किए जाने लगे, जिससे आम लोगों में इसके प्रति विश्वास जगा।

सिमौन ने दी नयी ऊँचाई

इसके बाद लैक्मे को एक नई उंचाई पर लेकर गईं सिमोन टाटा, जो नवल एच टाटा की पत्नी थीं। उन्होंने 1961 में लैक्मे की प्रबन्ध निदेशक का पद संभाला। सिमोन का जन्म जेनेवा, स्विट्जरलैंड में हुआ था। 1953 में वह एक पर्यटक के तौर पर भारत आईं, जहां उनकी मुलाकात नवल एच टाटा से हुई। नवल और सिमोन ने साल 1955 में शादी कर ली और फिर सिमोन हमेशा के लिए मुंबई में बस गईं। सिमोन, नवल टाटा की दूसरी पत्नी हैं। टाटा ग्रुप के वर्तमान चेयरमैन एमिरेट्स रतन टाटा, नावल टाटा और उनकी पहली पत्नी की संतान हैं। सिमोन टाटा की सौन्दर्य को लेकर समझ और व्यवसाय की सूझबूझ ने जल्द ही लैक्मे को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया और यह एक आइकॉनिक ब्रांड बन गया। सिमोन 1982 में लैक्मे की चेयरपर्सन बनीं। सिमोन जब भी विदेशी जाती थीं, वह सौन्केदद सैंपल साथ लाती थीं और उन्हें केमिस्ट को देती थीं ताकि उनके स्पेसिफिकेशन के बारे में पता किया जा सके और लैक्मे को और उम्दा बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

 

​बॉलीवुड की शीर्ष  हीरोइनों का लिया गया साथ

लैक्मे यूं ही इतनी बुलंदी पर नहीं पहुंची। सेल्स ऑफिसेज, सेल्सपर्सन्स, डीलर और एजेंटों के पूरे नेटवर्क ने सुनिश्चित किया कि लैक्मे पूरे भारत के शहरी बाजारों में और उम्दा प्रदर्शन करे। वक्त—वक्त पर मार्केट सर्वे किए गए, अच्छे से सोचसमझ कर तैयार की गई मार्केट स्ट्रैटेजीस पर अमल किया गया और बड़े पैमाने पर पब्लिसिटी कैंपेन चलाए गए। लैक्मे ब्रांड को खड़ा करने के लिए उस जमाने की दिग्गज बॉलीवुड अभिनेत्रियों जैसे रेखा, हेमा मालिनी, जया प्रदा आदि को लैक्मे के विज्ञापन में लिया गया। लैक्मे का पहला ब्रांड फेस मॉडल श्यामोली वर्मा थीं, जो कि 80 के दशक की शुरुआत में एक जानामाना नाम थीं। हर उस भारतीय कस्बे को डिस्ट्रीब्यूशन के तहत कवर किया गया, जिसकी आबादी 20000 लोग या उससे ज्यादा थी। उस वक्त लैक्मे की प्रॉडक्ट रेंज में महिलाओं के लिए मेकअप, स्किनकेयर प्रॉडक्ट और टॉयलेटरीज शामिल थे। बाद में कंपनी पुरुषों के लिए पर्सनल केयर रेंज में भी उतरी, जिसने लैक्मे को और सफलता दिलाई। लैक्मे प्रॉडक्ट्स को कड़े क्वालिटी परीक्षण से गुजारा जाता था ताकि हर प्रॉडक्ट उच्च ग्रेड का हो और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरे।

​1980 में पहला ब्यूटी सैलन खुला
1980-1980 में लैक्मे का पहला ब्रांडेड ब्यूटी सैलों खुला। सैलों में महिलाओं को ब्यूटी ट्रीटमेंट की पूरी रेंज उपलब्ध कराई गई, इसके लिए क्वालिफाइड ब्यूटीशियंस की मदद ली गई। साल 1993 में टॉम्को को हिंदुस्तान यूनिलीवर के साथ मर्ज कर दिया गया। पहले हिंदुस्तान यूनिलीवर, हिंदुस्तान लीवर (एचएलएल) के नाम से जानी जाती थी।

हिंदुस्तान यूनिलीवर का हुआ ब्रांड

इसके बाद 1996 में टाटा समूह और हिंदुस्तान यूनिलीवर की लैक्मे में 50:50 की साझेदारी हो गयी। साल 1998 में लैक्मे की पूरी हिस्सेदारी हिंदुस्तान यूनिलीवर को मिल गई और लैक्मे, हिंदुस्तान यूनिलीवर के ब्रांड के नाम से जाना जाने लगा। लैक्मे को इस सोच के साथ हिंदुस्तान यूनिलीवर को दिया गया था कि वह ही भविष्य में इसके साथ बेहतर न्याय कर पाएगी और हिन्दुस्तान यूनीलिवर इस विश्वास पर खरा उतरा।

​300 उत्पाद, 70 से भी ज्यादा देशों में कारोबार
आज लैक्मे प्रॉडक्ट की रेंज 100 रुपये से शुरू होती है। इसके लगभग 300 उत्पाद हैं और 70 से ज्यादा देशों में बिक रहे हैं। आज लैक्मे का 6 माह का ब्यूटी कोर्स भी है, जो कि एक डिप्लोमा कोर्स है। गरीब लड़कियों के लिए स्कॉलरशिप प्रोग्राम और स्टार्टअप शुरू करने में मदद की भी पेशकश की जा रही है। लैक्मे फैशन वीक, लैक्मे शोज जैसे ईवेंट भी आयोजित किए जाते हैं।

 (स्त्रोत साभार – नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, विकिपीडिया)

प्रख्यात साहित्यकार श्रीनिवास शर्मा का निधन

कोलकाता : प्रख्यात वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक श्रीनिवास शर्मा का निधन शुक्रवार 2 दिसम्बर की रात हो गया। वे 89 वर्ष के थे। स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण उनको महानगर के मारवाड़ी रिलीफ सोसायटी अस्पताल में दाखिल करवाया गया था। उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा था परन्तु इस बीच अन्य शारीरिक व्याधियों के कारण उनकी तबीयत बिगड़ती चली गयी और उनको बचाया नहीं जा सका। वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीनिवास को उनके साहित्यिक योगदान के अतिरिक्त विशेष रूप से दैनिक छपते – छपते के उत्सव विशेषांक के सम्पादन के लिए याद किया जायेगा। इस पत्रिका का सम्पादन उन्होंने निरन्तर 37 वर्ष तक किया। छपते – छपते के सम्पादक एवं ताजा टीवी के चेयरमैन वरिष्ठ पत्रकार विश्वम्भर नेवर ने कहा कि श्रीनिवास जी के प्रयास से ही उत्सव विशेषांक हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ विशेषांक बन सका था। उनके निधन के कोलकाता के साहित्य जगत में शोक की लहर है।

अच्छा नागरिक बनना ही देश के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता होगी

यह साल का अंतिम महीना है और हम नये साल की तरफ बढ़ रहे हैं। आने वाला साल देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। कोविड -19 के टीकाकरण का रिकॉर्ड भले ही हम बना चुके हैं मगर वैक्सीन की दूसरी खुराक अब भी कई लोग नहीं ले रहे हैं। इस बीच ओमिक्रॉन नाम का नया वैरिएंट नया खतरा बनकर सामने आ गया है। ऐसे में जरूरी है कि हम सभी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए कोरोना सम्बन्धी नियमों का पालन करें। देखा जाये तो पहले की तुलना में कोविड -19 को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरुकता आई है मगर इसे बरकरार भी रखना होगा। यह समय है कि जब हम पीछे मुड़कर देखें कि क्या हमने पाया है और कहाँ हमें सुधार करने की जरूरत है। साल भर किसानों का आन्दोलन छाया रहा। चुनाव को देखते हुए काफी कुछ बदलाव हुए पर जिस तरह से आन्दोलन हुआ या जिस तरह के तरीके अपनाए गये…उसे देखते हुए कहीं न कहीं आन्दोलन के तरीकों पर एक बार फिर से हमें नजर डालनी होगी और यह सिर्फ किसानों के साथ नहीं है बल्कि कहीं भी हो…अराजकता को प्रश्रय देने वाली हर बात को विरोध की प्रक्रिया से दूर रखना होगा। 2021 ने काफी कुछ सिखाया है, यूँ कहें कि हम चुनौतियों से जूझना और इसके बीच चलना सीख रहे हैं तो यह गलत नहीं होगा। अब जरूरी है कि अब जब हम आगे बढ़ें तो पूरे आत्मविश्वास और संयम के साथ बढ़ें और सबसे अधिक जरूरी यह कि जिम्मेदार नागरिक बनें। अगले साल देश की आजादी को 75 साल पूरे होंगे और अमृत महोत्सव के दौरान एक अच्छा नागरिक बनना ही देश के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता होगी।

शब्दकोश ‘मरियम वेबस्टर’ ने ‘वैक्सीन’ को चुना 2021 का शब्द

न्यूयॉर्क : शब्दकोश ‘मरियम वेबस्टर’ ने ‘वैक्सीन’ (टीके) को 2021 का शब्द चुना है। ‘मरियम वेबस्टर’ के एडिटर-एट-लार्ज पीटर सोकोलोवस्की ने ‘एपी’ को सोमवार को होने वाली घोषणा से पहले बताया, ‘‘ 2021 में यह शब्द हम सभी के जीवन में सबसे अधिक मौजूद रहा। यह दो अलग-अलग कहानी बयां करता है। एक विज्ञान से जुड़ी, जो उस उल्लेखनीय गति को बयां करती है, जिससे टीके का निर्माण किया गया। साथ ही नीति, राजनीति और राजनीतिक संबद्धता को लेकर भी इसके संबंध में चर्चा जारी है। यह एक शब्द है, जो दो बड़ी कहानियां बयां करता है।’’‘ऑक्सफोर्ड’ अंग्रेजी शब्दकोश को प्रकाशित करने वाले लोगों ने वर्ष के शब्द के रूप में ‘वैक्स’ का चयन किया था। वहीं, ‘मरियम-वेबस्टर’ ने पिछले साल ‘पैनडेमिक’ शब्द का चयन किया था, जो उसकी ऑनलाइन साइट पर सबसे अधिक खोजा गया।
सोकोलोवस्की ने कहा कि ‘पैनडेमिक’ अब पीछे छूटता जा रहा है और हम अब उसके प्रभावों को देख रहे हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिका में दिसंबर में कोविड-19 रोधी टीके की पहली खुराक दिए जाने के बाद ‘मरियम वेबस्टर’ पर ‘वैक्सीन’ को 601 प्रतिशत अधिक खोजा गया। 2019 में, जब टीकों के बारे में बहुत कम बात हो रही थी, उसकी की तुलना ‘मरियम-वेबस्टर’ पर इस वर्ष ‘वैक्सीन’ शब्द को 1,048 प्रतिशत अधिक खोजा गया। सोकोलोवस्की ने कहा कि असमान वितरण, टीका अनिवार्यता और ‘बूस्टर’ खुराक पर बहस के कारण भी इस शब्द में लोगों की रुचि बढ़ी है। साथ ही, टीका लगाने को लेकर लोगों में संकोच को लेकर भी इसकी लोकप्रियता बढ़ी।

 

जब जज साहब ने खुद ही भर दी आईआईटी की छात्रा की फीस

प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस दिनेश कुमार सिंह एक दलित छात्रा की योग्यता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने खुद उसकी फीस भर दी। उन्होंने जॉइंट सीट एलोकेशन अथॉरिटी और आईआईटी बीएचयू को भी निर्देश दिए कि छात्रा को तीन दिन में दाखिला दिया जाए। अगर सीट न खाली हो तो अतिरिक्त सीट की व्यवस्था की जाए। हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में छात्रा ने बताया कि उसके पिता की किडनी खराब हैं। उनकी बीमारी व कोविड की मार के कारण परिवार की आर्थिक हालत बुरी होने से वह फीस नहीं जमा कर पाई। उसने जॉइंट सीट एलोकेशन अथॉरिटी को पत्र लिखकर फीस जमा करने के लिए मोहलत मांगी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। मजबूरन उसे कोर्ट आना पड़ा। उसने मांग की थी कि फीस की व्यवस्था करने के लिए कुछ और समय दिया जाए।
शुरू से ही रहा अच्छा प्रदर्शन
दरअसल छात्रा दलित है। उसने दसवीं की परीक्षा में 95 प्रतिशत तथा बारहवीं कक्षा में 94 प्रतिशत अंक हासिल किये थे। वह जेईई की परीक्षा में बैठी और उसने मेन्स में 92 प्रतिशत अंक प्राप्त किये तथा उसे बतौर अनुसूचित जाति श्रेणी में 2062 वां रैंक हासिल हुआ। उसके बाद वह जेईई एडवांस की परीक्षा में शामिल हुई जिसमें वह 15 अक्टूबर 2021 को सफल घोषित की गई और उसकी रैंक 1469 आयी।
आईआीटी बीएचयू में मिली सीट
इसके पश्चात आईआईटी बीएचयू में उसे गणित एवं कम्पयूटर से जुड़े पंच वर्षीय कोर्स में सीट आवंटित की गई। किन्तु वह दाखिले की लिए जरूरी 15 हजार की व्यवस्था नहीं कर सकी और समय निकल गया। वह दाखिला नहीं ले पाई। उसने याचिका दाखिल कर मांग की थी कि उसे फीस की व्यवस्था करने के लिए कुछ और समय दे दिया जाए।
वकील तक का नहीं कर सकी इंतजाम
छात्रा इतनी गरीब है कि वह अपने लिए एक वकील का भी इंतजाम भी नहीं कर सकी थी। इस पर अदालत के कहने पर अधिवक्तागण सर्वेश दुबे एवं समता राव ने आगे आकर छात्रा का पक्ष रखने में अदालत का सहयेाग किया।
सप्ताह में दो बार होती है पिता का डायलसिस
छात्रा ने याचिका में कहा कि उसके पिता के गुर्दे खराब हैं और उसका प्रत्यारोपण होना है। अभी उनका सप्ताह में दो बार डायलसिस होता है। ऐसे में पिता की बीमारी एवं कोविड की मार के कारण उसके परिवार की आर्थिक हालत बुरी होने के कारण वह समय पर फीस नहीं जमा कर पाई। जबकि वह प्रारम्भ से ही एक मेधावी छात्रा रही है।

महामारी में निकाले थे 1500 कर्मचारी, अब दोबारा दी नौकरी

नयी दिल्ली : कोविड महामारी का दौर हर किसी के लिए मुश्किल रहा। कंपनियों के कारोबार का नुकसान हुआ तो उन्होंने कॉस्ट कटिंग करते हुए छंटनी शुरू की, जिसके चलते न जाने कितने लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। फ्रांस की हॉस्पिटैलिटी कम्पनी एकॉर ग्रुप ने भी 1500 लोगों को नौकरी से निकाला। लेकिन अब यह कंपनी उनकी फिर से नियुक्ति कर रही है। इतना ही नहीं उन 1500 कर्मचारियों में से एक तिहाई को कंपनी वापस भी रख चुकी है।
एकॉर की भारत में 55 संपत्तियां हैं। भारत, मध्य पूर्व और अफ्रीका के लिए एक्कोर के सीओओ मार्क डेसक्रोजाइल ने टीओआई को बताया, ‘हमारे पास भारत में 6,000 कर्मचारी हैं। कोविड के दौरान और रेवेन्यु में कमी के चलते दुर्भाग्य से उनमें से 25% की छंटनी करनी पड़ी। हमने कर्मचारियों के लिए उस राशि से एक फंड बनाया, जो शेयरधारकों को लाभांश के रूप में भुगतान किया जाना था। दूसरी लहर के बाद की रिकवरी उम्मीद से कहीं ज्यादा मजबूत रही है और हमने भारत में निर्धारित कार्यबल को फिर से नियुक्त करना शुरू कर दिया है।’
कुछ ने ठुकरा दिया ऑफर
अब तक, छंटनी किए गए लोगों में से लगभग एक तिहाई को लौटने के लिए आमंत्रित किया गया है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को यह कॉल मिली, उनमें से कुछ ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उन्होंने महामारी के दौरान कुछ और करना शुरू कर दिया था।
होटल में सुविधाओं पर अधिक खर्च कर रहे लोग
रिकवरी को लेकर डेस्क्रोजाइल ने कहा कि चूंकि ऑक्युपेंसी बढ़ रही है, इसलिए एवरेज रूम रेट पिछड़ रहे हैं। लोग अब होटल में ठहरने, खाने-पीने या अपने कमरे को अपग्रेड करने पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं। बड़ी संख्या में मेहमान इन दिनों ब्रेक पर जा रहे हैं। हवाई किराए पर बचत होने से वे होटल में ठहरने के लिए सुविधाओं पर अधिक खर्च कर सकते हैं। शादियों का चल रहा सीजन होटलों के लिए थोड़ी राहत लेकर आ रहा है। भले ही फुटफॉल बढ़ रहा है, लेकिन कुल मिलाकर राजस्व अभी भी प्री कोविड लेवल के करीब नहीं है।

गुफा में खुदाई कर रहे पुरातत्वविदों ने खोजा 14 हजार साल पुराना पूरा शहर

अंकारा : जर्मन पुरातत्व संस्थान ने घोषणा करते हुए बताया कि तुर्की के पश्चिमी तट पर पहली बार 14,000 साल पुरानी एक बस्ती की खोज की गई है। इस साइट की खोज पिछले साल की शरद ऋतु के दौरान तुर्की और जर्मन वैज्ञानिकों के वैज्ञानिकों की एक टीम ने की थी। यहां डिकिली और बर्गमा शहरों के बीच एक गुफा में खुदाई का पुरातात्विक सर्वे किया गया। पाई गई परतें एपिपेलियोलिथिक काल की हैं।
शोधकर्ताओं ने रेडियोकार्बन विधि का इस्तेमाल करके और पत्थर के औजार और हड्डियों जैसी अन्य खोजों की बारीकी से जांच करके उम्र का निर्धारण किया। अन्य खोजें बीजान्टिन और इस्लामी काल के साथ-साथ कांस्य युग से संबंधित हैं। कुछ महीने पहले तुर्की के संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय के सहयोग से और बर्गामा म्यूजियम के निर्देशन में प्राचीन स्थल पर और शोध करने के लिए छह हफ्ते का खुदाई अभियान चलाया गया था।
गुफा में रहते थे शिकारी
जिस गुफा में बस्ती की खोज की गई थी उसका इस्तेमाल शिकारियों के रहने और उत्पादन स्थल के रूप में भी किया जाता था। इससे पहले फ्रांस के ल्योन शहर से 128 किलोमीटर दूर पुरातत्वविदों ने एक प्राचीन कैपिटल सिटी की खोज की थी। इस जगह से खोजकर्ताओं को सैकड़ों तरह की अलग-अलग वस्तुएं भी मिली थीं। बताया गया था कि ये सारा सामान यीशु मसीह के जन्म के लगभग 800 साल पहले का है।
फ्रांस के ल्योन शहर से मिला खजाना
खोजे गए खजानों में कांस्य हथियार और ट्रिंकेट, साथ ही कुम्हार के घड़े और रथ के टुकड़े मिले थे। इतनी मात्रा में प्राचीन सामान मिलने से टूलूज़-जीन जारेस विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद काफी खुश हुए थे। उनका दावा था कि यह सेल्टिक कैपिटल सिटी का हिस्सा हो सकता है। यहां से मिली कलाकृतियों को लगभग 800 ईसा पूर्व या फ्रांस के कांस्य युग से संबंधित अर्नफील्ड संस्कृति (1,300 से 800 ईसा पूर्व) के अंत का बताया जा गया था।