Sunday, July 5, 2026
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प्रवासी बिहारी श्रमिक हैं तो जरूर बनवायें लेबर कार्ड

पटना : बिहार में रोजगार का अभाव होने के चलते यहां से लोग रोजगार की तलाश में पलायन कर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चंडीगढ़, पुणे जैसे औद्योगिक शहरों में जाकर बस गए हैं। वहां वे जैसे-तैसे मेहनत कर अपना और परिवार का भरण-पोषण करते हैं। कोरोना जैसी महामारी के दौरान जब इन रोजगार देने वाले शहरों और राज्यों में सबकुछ ठप हो गया तो बिहार के इन मजदूरों और कामगारों को काफी दिक्कत हुई। इन जैसी परिस्थितियों में ये लोगों के सामने ठीक से पेट भरने तक की मुसीबत आ जाती है। अगर आप ऐसी किसी भी परिस्थिति में अपनी मुश्किल कम करना चाहते हैं तो बिहार सरकार की योजना के तहत लेबर कार्ड जरूर बनवाएं। बिहार में लेबर कार्ड बनवाने के ढेर सारे फायदे हैं जिसका लाभ लेकर आप अपना और अपने परिवार की जिंदगी को सुखमयी बना सकते हैं।

बिहार में कैसे बनवाएं लेबर कार्ड
– सबसे पहले http://bocw.bihar.gov.in/ वेबसाइट को लॉगिन करें।
– वेबसाइट की दाईं साइड लाल पट्टी पर आपको लिखा दिखेगा ‘नए निबंधन के लिए अनुरोध’। इसपर क्लिक करें। यहां क्लिक करते ही एक पीडीएफ फाइल अपलोड होगा। इस PDF फाइल में आप योजना से जुड़ी सारी जानकारी हासिल कर सकते हैं।
– सारी जानकारी हासिल करने के बाद आप अपने ब्लॉक में जाकर वहां श्रम संसाधन विभाग के अफसर से मिलें। उनसे लेबर कार्ड बनवाने का फॉर्म मांगे।
– आप चाहे तो अपने पंचायत के मुखिया से भी इस फॉर्म की डिमांड कर सकते हैं।
– फॉर्म अच्छे से भरने के बाद, उसके साथ सारे डॉक्यूमेंट डॉक्यूमेंट संलग्न कर अपने ब्लॉक के श्रम संसाधन विभाग में जाकर जमा करें। फॉर्म के साथ जरूरी कागजात में आधार कार्ड, बैंक पासबुक की छायाप्रति या नेम प्रिंटेड कैंसिल चेक होना अनिवार्य है।

किस पेशे से जुड़े लोग बनवा सकते हैं लेबर कार्ड
भवन निर्माण एवं रोड निर्माण कार्य में कुशल कोटि के कामगार
राज मिस्त्री
राज मिस्त्री हेल्पर
बढ़ई
लोहार
पेंटर
भवन में बिजली एवं इससे जुड़ा काम करने वाले इलेक्ट्रिशियन
भवन में फर्श/फ्लोर टाइल्स का कार्य करने वाले मिस्त्री और उसके सहायक
सेंट्रिंग एवं लोहा बांधने का कार्य करने वाले
गेट ग्रिल एवं वेल्डिंग का काम करने वाले
कंक्रीट मिक्सर मशीन चलाने वाले और कंक्रीट मिक्स ढोने वाले
महिला कामगार (रेजा) जो सीमेंट, गारा मिक्स ढोने का कार्य करती हैं
रौलर चालक
रोड पुल एवं बांधी निर्माण कार्य में लगे मजदूर
रोड, पुल, बांध, भवन निर्माण कार्य में विभिन्न आधुनिक यंत्रों को चलाने वाले मजदूर
रोड, पुल, बांध, रेलवे, भवन निर्माण कार्य स्थल पर गार्ड/चौकीदार की नौकरी करने वाले
भवन निर्माण में जल प्रबंधन का कार्य करने वाले पलम्बर के निर्माण में लगे अकुशल अस्थाई कामगार
मनरेगा कार्यक्रम के अंतर्गत (बागवानी एवं वानिकी को छोड़कर)
यहां बता दें कि कारखाना अधिनियम 1948 एवं खान अधिनियम 1952 के अंतर्गत निर्माण कार्य में संलग्न श्रमिक इसमें शामिल नहीं हैं।

सरकार ने दी मंजूरी, 2022 से उड़ान भरेगी राकेश झुनझुनवाला की आकासा एयर

मुम्बई : राकेश झुनझुनवाला की आकासा एयर  को विमानन सेवाएं शुरू करने के लिए सरकार की ओर से हरी झंडी मिल गई है। आकासा एयर ब्रांड नाम से भारतीय विमानन सेक्टर में उतर रही एसएनवी एविएशन प्राइवेट लिमिटेड ने बयान में कहा कि कंपनी को भारत के नागर विमानन मंत्रालय से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी एनओसी मिल गया है। आकासा एयर की योजना 2022 की गर्मियों से अपनी विमानन सेवाएं शुरू करने की है। आकासा एयर के सीईओ विनय दुबे ने कहा कि हम बेहद खुश हैं और नागर विमानन मंत्रालय के सहयोग और उनके द्वारा एनओसी दिए जाने के लिए आभारी हैं। आकासा एयर को सफलतापर्वूक लॉन्च करने के लिए जरूरी सभी अतिरिक्त अनुपालनों पर हम रेगुलेटरी अथॉरिटीज के साथ काम करना जारी रखेंगे। आकासा एयर भारतीयों के लिए राष्ट्र की सबसे ज्यादा डिपेंडेबल, अफोर्डेबल और ग्रीनेस्ट एयरलाइन लॉन्च करना चाहती है। दुबे ने आगे कहा कि आकासा एयर में हमारा मानना है कि राष्ट्र की प्रगति के लिए एक मजबूत एयर ट्रान्सपोर्टेशन सिस्टम महत्वपूर्ण है। इसी बात ने हमें एक आधुनिक, इफीशिएंट, क्वालिटी कॉन्शियस एयरलाइन को क्रिएट करने के लिए प्रेरित किया है। आकासा एयर किसी भी भारतीय के सामाजिक-आर्थिक या सांस्कृतिक बैकग्राउंड पर ध्यान दिए बिना सभी भारतीयों की सेवा करेगी।
आने लगा है आकासा एयर में निवेश
खबर है कि राकेश झुनझुनवाला आकासा एयर में पहली किश्त के रूप में 43.75 करोड़ रुपये निवेश कर चुके हैं। रेखा राकेश झुनझुनवाला के नाम से यह निवेश किया गया है। राकेश झुनझुनवाला ने आकासा एयर में कुल 247.5 करोड़ रुपये का निवेश करने की घोषणा की थी। इसके अलावा दुबई के एक निवेशक और न्यू होराइजन इन्वेस्टमेंट फंड के संस्थापक माधव भटकुली ने आकासा एयर में 6.24 करोड़ रुपये का निवेश किया है।
हाल ही में हुई थी पीएम मोदी से मुलाकात
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राकेश झुनझुनवाला से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद पीएम मोदी ने कहा था कि झुनझुनवाला भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर काफी आशावादी हैं। उन्होंने इस बारे में ट्वीट भी किया था।

बाल विवाह के कारण रोज जान गंवा देती हैं 60 से ज्‍यादा बच्चियां

नयी दिल्‍ली : बाल विवाह से दुनियाभर में हर दिन 60 से अधिक लड़कियों और दक्षिण एशिया में एक दिन में छह लड़कियों की मौत होती है। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर जारी एक नए विश्लेषण में दावा किया गया है कि बाल विवाह के कारण गर्भधारण और बच्चे को जन्म देने की वजह से हर साल तकरीबन 22,000 लड़कियों की मौत हो रही है। ‘सेव द चिल्ड्रन’ की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में हर साल बाल विवाह से संबंधित 2,000 मौत होती हैं। इसके बाद पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 650 और लातिन अमेरिका तथा कैरेबियाई देशों में हर साल 560 मौत होती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘हर साल अनुमानित रूप से गर्भावस्था के कारण 22,000 लड़कियों की मौत हो रही है और बाल विवाह से बच्चों का जन्म हो रहा है। बाल विवाह से हर दिन 60 से अधिक लड़कियों की मौत होती है और दक्षिण एशिया में हर दिन छह लड़कियों की मौत होती है।’’
2030 एक 1 करोड़ बच्चियों की शादी की आशंका
रिपोर्ट क अनुसार, ‘‘हालांकि, पिछले 25 वर्षों में दुनियाभर में करीब आठ करोड़ बाल विवाहों को रोका गया लेकिन कोविड-19 महामारी से पहले ही इसमें प्रगति रुक गयी और महामारी से असमानताएं और ज्यादा गहरी हुई है जिससे बाल विवाह बढ़ते हैं। स्कूलों के बंद होने, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ने तथा और परिवारों के गरीबी की ओर बढ़ने के कारण महिलाओं और लड़कियों पर लॉकडाउन के दौरान हिंसा का खतरा बढ़ा। 2030 तक एक करोड़ और बालिकाओं की शादी होने की आशंका है यानी कि और लड़कियों की मौत होने का खतरा है।’’
फैसलों में लड़कियों की भूमिका हो: विशेषज्ञ
‘सेव द चिल्ड्रन इंटरनेशनल’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इंगर एशिंग ने कहा कि बाल विवाह लड़कियों के खिलाफ यौन और लैंगिक हिंसा का सबसे खराब और जानलेवा रूप है। हर साल लाखों लड़कियों को ऐसे पुरुषों से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है जो उनसे उम्र में कहीं अधिक बड़े होते हैं जिससे उनके सीखने, बचपन जीने और कई मामलों में जीवित रहने का अवसर छिन जाता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘बच्चे को जन्म देना किशोरियों के लिए पहले नंबर का हत्यारा है क्योंकि उनकी कम उम्र बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार नहीं होती। बच्चियों के बच्चे पैदा करने के स्वास्थ्य खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार को बालिकाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे बाल विवाह और समय से पूर्व बच्चे को जन्म देने से होने वाली मौतों से बची रहें। यह तभी हो सकता है जब लड़कियों को प्रभावित करने वाले फैसलों में उनकी भूमिका हो।’’
सेव द चिल्ड्रन, इंडिया के सीईओ सुदर्शन ने कहा, “हम बाल रक्षा भारत’’ में बाल विवाह को संग्रहालयों और इतिहास तक ही सीमित देखना चाहते हैं। यह हमारी सामूहिक विफलता है कि इस सदी में भी मानवता के खिलाफ ऐसा प्रचलित और चिरस्थायी अपराध है। । वे सभी जो समाधान का हिस्सा नहीं हैं, उन्हें खुद को समस्या का हिस्सा समझना चाहिए।” उन्होंने कहा,”बच्चों, और विशेष रूप से बालिकाओं को उनके सीखने के मूल अधिकार और एक खुशहाल और बेफिक्र बचपन का आनंद लेने से वंचित करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है और इसकी निंदा करने की आवश्यकता है। इसे एक सांस्कृतिक तत्व के रूप में खारिज नहीं किया जाना चाहिए और इसके बजाय इसे जीवन और स्वतंत्रता के मूल अधिकार से इनकार के रूप में देखा जाना चाहिए।’’
सेव द चिल्ड्रन द्वारा सोमवार को जारी एक वैश्विक रिपोर्ट ‘‘ग्लोबल गर्लहुड रिपोर्ट 2021: संकट में लड़कियों के अधिकार’’ में संगठन, सरकारों से सभी सार्वजनिक निर्णय लेने में सुरक्षित और सार्थक भागीदारी के उनके अधिकार का समर्थन करके लड़कियों की आवाज उठाने का आह्वान कर रहा है। संगठन ने यह भी मांग की कि सरकारों को समावेशी नीतियों और कार्यक्रमों को विकसित करके सभी लड़कियों के अधिकारों की गारंटी देनी चाहिए, जिसमें असमानता और भेदभाव के विभिन्न रूप (लिंग, जाति, विकलांगता, आर्थिक पृष्ठभूमि, आदि के आधार पर) शामिल हैं।

तीन अमेरिकी अर्थशास्त्रियों को नोबेल पुरस्कार

स्टाकहोम : तीन अमेरिकी अर्थशास्त्रियों को एक अग्रणी शोध के लिए अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गयी। इनमें से एक ने साबित किया कि न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी से कर्मचारियों की नियुक्ति में कमी नहीं आती है और प्रवासियों के चलते मूल निवासी श्रमिकों का वेतन कम नहीं होता। ये निष्कर्ष सामान्य धारणा के विपरीत हैं। इसके अलावा दो अन्य अर्थशास्त्रियों ने इस तरह के सामाजिक मुद्दों का अध्ययन करने का तरीका बताने के लिए नोबेल सम्मान प्राप्त किया। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाले अर्थशास्त्रियों में बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डेविड कार्ड, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के जोशुआ डी. एंग्रिस्ट और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के गुइडो इम्बेन्स शामिल हैं। कनाडा में जन्मे कार्ड ने अपने शोध में बताया कि न्यूनतम मजदूरी, आव्रजन और शिक्षा श्रम बाजार को कैसे प्रभावित करते हैं, जबकि उसके साथ नोबेल पुरस्कार पाने वाले एंग्रिस्ट और इम्बेन्स ने परंपरागत वैज्ञानिक पद्धतियों पर शोध किया।
प्राकृतिक प्रयोग, ज्ञान का एक समृद्ध स्रोत
रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने कहा कि तीनों ने ‘‘आर्थिक विज्ञान में अनुभवजन्य कार्य को पूरी तरह से बदल दिया है।’’आर्थिक विज्ञान समिति के अध्यक्ष पीटर फ्रेड्रिक्सन ने कहा, ‘‘समाज के लिए अहम सवालों के संबंध में कार्ड के अध्ययन और एंग्रिस्ट और इम्बेन्स के पद्धतिगत योगदान से पता चला है कि प्राकृतिक प्रयोग ज्ञान का एक समृद्ध स्रोत हैं।’’ उन्होंने आगे कहा, ‘‘उनके शोध ने महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देने की हमारी क्षमता में काफी सुधार किया है, जो समाज के लिए बहुत फायदेमंद है।’’
क्या था कार्ड का शोध
कार्ड ने देखा कि क्या हुआ जब न्यू जर्सी ने न्यूनतम वेतन 4.25 डॉलर से बढ़ाकर 5.05 डॉलर कर दिया। शोध में तुलना समूह के रूप में उन्होंने पूर्वी पेंसिल्वेनिया की सीमा पर स्थित रेस्टोरेंट का उपयोग किया। पिछले अध्ययनों के विपरीत उन्होंने और उनके दिवंगत शोध साथी एलन क्रुएगर ने पाया कि न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी का कर्मचारियों की संख्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कार्ड ने बाद में इस मुद्दे पर और काम किया। नोबेल समिति ने कहा कि कुल मिलाकर शोध का निष्कर्ष यह है कि न्यूनतम वेतन में वृद्धि के नकारात्मक प्रभाव 30 साल पहले की तुलना में काफी कम हैं। कार्ड ने यह भी पाया कि किसी देश के मूल निवासियों की आय नए प्रवासियों से लाभान्वित हो सकती है।
एंग्रिस्ट और इम्बेन्स का शोध
एंग्रिस्ट और इम्बेन्स ने पद्धति संबंधी मुद्दों पर काम करने के लिए पुरस्कार प्राप्त किया, जिसकी मदद से अर्थशास्त्री कारण और प्रभाव के बारे में ठोस निष्कर्ष निकाल सकते हैं, भले ही वे इसके लिए सख्त वैज्ञानिक तरीकों से अध्ययन न करें। इम्बेन्स ने मैसाचुसेट्स में अपने घर से फोन पर बात करते हुए संवाददाताओं से कहा कि जब इस बारे में खबर आई, तब वह व्यस्त सप्ताहांत के बाद सो रहे थे। उन्होंने कहा कि वह इस खबर को सुनकर रोमांचित हो गए।
अन्य नोबेल पुरस्कारों के विपरीत अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत में स्थापित नहीं किया गया था बल्कि स्वीडिश केंद्रीय बैंक द्वारा 1968 में उनकी स्मृति में इसकी शुरुआत की गई थी, जिसमें पहले विजेता को एक साल बाद चुना गया था। यह प्रत्येक वर्ष घोषित नोबेल का अंतिम पुरस्कार है।

अब शत प्रतिशत क्षमता के साथ उड़ान भरेंगी एयरलाइन्स

सरकार ने प्रतिबंध हटाकर 100 फीसदी क्षमता से उड़ने की दी इजाजत

नयी दिल्ली : केन्द्र सरकार ने घरेलू विमानन कंपनियों की क्षमता उपयोग को लेकर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है। 18 अक्टूबर से घरेलू सेक्टर में विमानन कंपनियां 100 फीसदी क्षमता के साथ उड़ान भर सकेंगी। मौजूदा समय में घरेलू क्षेत्र में कंपनियां सिर्फ 85 फीसदी क्षमता के साथ ही उड़ान भर सकती हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करने के लिए सरकार ने ये प्रतिबंध लगाया था।
सस्ती हो सकती है हवाई यात्रा
सरकार के प्रतिबंध हटाने के इस फैसले से यात्रियों को भी काफी राहत मिलेगी। इसका सीधा असर हवाई यात्रा की टिकट पर पड़ सकता है। अभी क्षमता कम होने की वजह से एयरलाइन कंपनियों को टिकट की कीमत अधिक रखनी पड़ रही थी, जिसमें अब राहत दी जा सकती है।
बढ़ती मांग और घटते संक्रमण के चलते लिया फैसला
उड्डयन मंत्रालय ने कोरोना वायरस के घटते संक्रमण और त्योहारी सीजन से पहले बढ़ती मांग को देखते हुए ये फैसला किया है। भले ही 18 अक्टूबर से तमाम घरेलू विमानों को पूरी क्षमता के साथ उड़ने की इजाजत मिल चुकी है, लेकिन सभी एयरलाइन्स को कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए बनाये गये निर्देशों को मानना होगा।

सहायक प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए पीएचडी की अनिवार्यता टली

नयी दिल्ली : यूजीसी ने विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसरों की सीधी भर्ती के लिए योग्यता के रूप में पीएचडी की अनिवार्यता को लेकर तारीख आगे बढ़ा दी है। यह फैसला कोविड-19 महामारी के मद्देनजर लिया गया है। यूजीसी द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने कोविड-19 महामारी के मद्देनजर विश्वविद्यालयों के विभागों में सहायक प्रोफेसरों की सीधी भर्ती के लिए योग्यता के रूप में पीएचडी की अनिवार्यता के संबंध में तारीख को एक जुलाई 2021 से बढ़ाकर एक जुलाई 2023 करने का निर्णय लिया है।’

अब कुवैती सेना में भी महिलाएं लड़ेंगी युद्ध, 15 साल पहले मिला था मताधिकार

कुवैत सिटी : कुवैत की सेना ने मंगलवार को कहा कि महिलाएं अब सेना में युद्धक भूमिकाओं में भी शामिल हो सकती हैं। सालों तक सेना में सिर्फ नागरिक भूमिकाओं में सीमित रहने वाली महिलाओं के लिए यह पहला मौका है। कुवैत सशस्त्र बलों ने ट्वीट करते हुए बताया कि रक्षा मंत्री हमद जबेर अल-अली अल-सबाह ने कहा है कि महिलाओं के लिए विभिन्न लड़ाकू और अधिकारी रैंकों में शामिल होने के लिए दरवाजा खोल दिया गया है।
न्यूज एजेंसी कुना की रिपोर्ट के मुताबिक मंत्री ने कहा कि समय आ गया है कि कुवैती महिलाओं को अपने भाइयों के साथ कुवैती सेना में प्रवेश करने का अवसर दिया जाए। उन्होंने महिलाओं की ‘क्षमताओं और कठिनाई को सहने की क्षमता’ पर भरोसा जताया। कुवैत की महिलाओं को साल 2005 में वोट देने का अधिकार मिला था। इस देश में महिलाएं कैबिनेट और संसद दोनों में हिस्सा लेने के लिए सक्रिय हैं।

चिकित्सा सहायता देंगी महिलाएं
हालांकि वर्तमान में संसद में कोई सीट महिलाओं के पास नहीं है। अन्य खाड़ी देशों के विपरीत कुवैत की संसद को विधायी शक्ति हासिल है। यहां सांसदों को सरकार और राजघरानों को चुनौती देने के लिए जाना जाता है। महिलाएं कुवैत सेना में शामिल होने के अपने शुरुआती चरण में चिकित्सा और दूसरी सैन्य सेवाओं में अपनी सहायता देंगी।

महिलाओं ने मनवाया अपना लोहा
खाड़ी देशों में कुवैत उन देशों में शामिल है जहां महिलाओं को समान अधिकार मिले हुए हैं। कई क्षेत्रों में महिलाएं पहले भी अपना लोगा मनवा चुकी हैं। इसीलिए उन्हें सेना में पुरुषों के साथ मिलकर लड़ने का मौका दिया गया है। महिलाओं को समान अधिकार देने के मामले में यूएई सबसे आगे है। हालांकि लंबे संघर्ष के बाद सऊदी अरब की महिलाएं भी अब आगे बढ़ रही हैं।

बगीचे में बेकार पड़ी मूर्तियां निकलीं बेशकीमती, मिले 2 करोड़

लंदन : ब्रिटेन में एक परिवार को उस वक्त झटका लगा जब उन्हें पता चला कि उनके बगीचे में लगी मूर्तियां बेशकीमती हैं। बगीचे में लगी मूर्तियां जिन्हें परिवार मामूली समझ रहा था दरअसल प्रचीन मिस्र की कलाकृतियां हैं जिनकी कीमत करोड़ो में है। बगीचे में लगी मूर्तियां दो बैठे स्फिंक्स की हैं जो देखने में बेहद साधारण लगती हैं। परिवार को जानकर आश्चर्य हुआ कि प्राचीन मिस्र की कलाकृतियों की कीमत 2.47 करोड़ रुपए से अधिक है।
परिवार घर छोड़ने से पहले इन मूर्तियों से छुटकारा पाना चाहता था। उन्होंने मूर्तियों को बेचने के उद्देश्य से लिए इनकी कीमत लगवाई। तब तक परिवार को असलियत के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। विशेषज्ञों की जांच में सामने आया कि काई और धूल से ढकी हुई दोनों मूर्तियां दरअसल 5000 साल पुरानी हैं। लेकिन परिवार ने उन्हें अपने बगीचे में सजावट के रूप में बेहद लापरवाही से रखा हुआ था।
नए घर नहीं ले जाना चाहते थे मूर्तियां
रिपोर्ट्स के अनुसार मूर्तियां खराब स्थिति में थीं लेकिन अपनी इस हालत के कारण वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान खींच रही हैं। जब मूर्तियों को नीलामी के लिए रखा गया तो बढ़ती बोलियों से परिवार स्तब्ध रह गया। Metro.co.uk ने ऑक्शनर जेम्स मंदर के हवाले से कहा, ‘एक स्थानीय परिवार ने हमसे संपर्क किया। अपने नए घर में शिफ्ट हो रहे थे और अपने बगीचे कुछ पुराने सामान को हटाना चाहते थे। जो उनके नए घर के लिए फिट नहीं था।
दो करोड़ में बिकीं मूर्तियां
उन्होंने बताया कि बोली धीमी होने से पहले तेजी से 100,000 पाउंड तक बढ़ गई। मूर्तियों को आखिरकार 195,000 पाउंड यानी 2 करोड़ रुपए में बेच दिया गया। जेम्स ने कहा कि नीलामी के लिए यह एक रोमांचक दिन था। यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मूर्तियों को बेचने वालों को इसकी कीमत का कोई अंदाजा नहीं था। उन्होंने सजावट के सामान के तौर पर इन्हें खरीदा था और कई सालों तक इसे सजाए रखा।

 

पढ़ाई छूटी, हौसला नहीं, मुश्किलों के आगे तनकर खड़ी है कबड्डी खिलाड़ी प्रीति

कोयंबटूर : कोयंबटूर के सीरानैकेन पलायम की आर प्रीति को अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी क्योंकि उसके परिवार के पास स्कूल फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे। प्रीति के माता-पिता पेशे से मजदूर हैं। महामारी और लॉकडाउन में उन्हें काम नहीं मिला और बच्ची की पढ़ाई छूट गई। प्रीति के घर में बिजली भी नहीं है, दो वक्त का पेट भर खाना बहुत मुश्किल से जुट पाता है, लेकिन कबड्डी खेलते समय प्रीति के दिमाग में ये बातें नहीं आती हैं।
प्रीति ने पिछले महीने नेपाल में आयोजित एक टूर्नामेंट में लड़कियों की कबड्डी टीम का नेतृत्व किया। इससे पहले टीम ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता जीती थी। उनके पास नेपाल जाने के लिए रुपये नहीं थे। चूंकि यह सरकारी कार्यक्रम नहीं था, इसलिए उन्हें प्रायोजकों की तलाश करनी पड़ी। टीम के कोच जी सतीश कुमार ने कुछ लोगों से मदद ली और बाकी अपनी जेब से रुपये खर्च करके लड़कियों की टीम नेपाल भेजी, जहां उन्हें कामयाबी मिली।
छूट गयी पढ़ाई
प्रीति ने कहा, ‘पिछले साल मैंने कॉलेज जॉइन किया था, लेकिन ऑनलाइन कक्षाएं अटैंड करने के लिए मेरे पास मोबाइल नहीं था। मेरी पढ़ाई यहीं से बंद हो गई। अब मैंने फिर से दाखिला ले लिया है लेकिन मुझे आगे सेमेस्टर फीस देनी है, जो मेरे पास नहीं है। खेल कठिनाइयों को भूलने में मदद करता है। मैं पिछले छह साल से खेल रही हूं और सारी मुश्किलों का सामने कर रही हूं।’
पिता की मौत, मां ने पढ़ाने के लिए 5000 रुपये लिए उधार
प्रीती की टीम की साथी सी कीर्तना 11वीं में पढ़ती है। उसने कहा कि एक साल पहले उसके पिता का निधन हो गया। उसकी मां अपने चार बच्चों की परवरिश के लिए एक मजदूरी करती है। कबड्डी उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा है। थडगाम के रहने वाले कीर्तना कोयंबटूर के नेहरू स्टेडियम के लिए सुबह 5.30 बजे बस पकड़ती है, तब वह सुबह 7 बजे तक प्रैक्टिस के लिए पहुंच पाती है, लेकिन वह कभी भी अपनी प्रैक्टिस मिस नहीं करती है।
खाली पेट कबड्डी खेलने को मजबूर
कीर्तना ने कहा, ‘मैं सुबह खाना खाकर नहीं आती हूं। दोपहर के भोजन के लिए, मैं अपने कोच के घर और एक टीम के साथी के घर पर वैकल्पिक दिनों में खाना खाती हूं क्योंकि मेरी मां मुझे खाने के लिए पैसे नहीं दे सकती हैं। उसने मेरे स्कूल में दाखिले के लिए 5,000 रुपये उधार लिए और उसे किश्तों में चुका रही है। लेकिन वह मुझे खेल को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती रहती हैं। मेरी इच्छा प्रो कबड्डी लीग में खेलने की है।’
चार साल पहले बनी यह टीम
चार साल पहले कोच सतीश के मार्गदर्शन में लड़कियां एक साथ आई थीं। एक पूर्व कबड्डी खिलाड़ी सतीश का कहना है कि 20 लड़कियों की टीम संगठित रूप से बनी है। उन्होंने एक निजी स्कूल में कोचिंग के साथ शुरुआत की, उसी दौरान इन बच्चियों ने उन्हें संपर्क किया। सतीश ने कहा कि आज उन्हें अपनी इस टीम पर गर्व है।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

अमित खरे: बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी से प्रधानमंत्री मोदी के सलाहकार तक

रांची : साल 1977 में सोलह साल के रहे अमित खरे ने रांची के एक केंद्रीय विद्यालय से मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा पास की तो, उन्हें क़रीब 80 फ़ीसद नंबर मिले थे। वे उस साल अपने स्कूल के टॉपर रहे. इसके बाद की पढ़ाई उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज से की।
फिर भारतीय प्रबंधन संस्थान (आइआइएम) अहमदाबाद गए और वहां से मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजीएम) किया. बाद में उन्होंने अमेरिका के साइकेरस यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई भी की।
साल 1985 में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के लिए चुने गए. पहले बिहार और बिहार विभाजन के बाद (2000) में झारखंड कैडर के अधिकारी रहे अमित खरे भारतीय प्रशासनिक सेवा से अपनी हालिया सेवानिवृति के बाद अब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकार नियुक्त किए गए हैं।
इस कारण वे चर्चा में हैं लेकिन यह पहला मौक़ा नहीं है, जब उनकी चर्चा हो रही हो। नब्बे के दशक के बहुचर्चित पशुपालन घोटाला (चारा घोटाला) से लेकर पिछले साल बनी नई शिक्षा नीति-2020 और आइटी रुल्स-2021 के प्रावधानों को बनाने में भूमिका के लिए भी अमित खरे चर्चा में रहे हैं। कई अहम पद पर रहे
अमित खरे की छवि एक गंभीर अधिकारी की रही है।
झारखंड में उनके अधीनस्थ रहे एक अधिकारी ने बताया, “वे कम बोलते हैं. गंभीर रहते हैं. कभी-कभार मुस्कुराते हैं. लूज़ टॉक नहीं करते और फ़ाइलों को पेंडिंग रखने की उनकी आदत नहीं. वे कई-कई फ़ाइलें एक दिन में निपटाते रहे हैं. लोग उन्हें पढ़ाकू, रिसर्चर और अंतर्मुखी मानते हैं. प्रशासनिक प्रबंधन और वित्त उनके प्रिय विषय रहे है। .”
आईएएस अधिकारी के तौर पर अपने 36 साल के करियर के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों को संभाला है. पिछले 30 सितंबर को अपनी सेवानिवृति के वक़्त वे भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय में सचिव थे।
इससे पहले वे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में भी सचिव रह चुके हैं. बिहार में वे पटना समेत कई दूसरे ज़िलों के ज़िलाधिकारी, प्राथमिक शिक्षा निदेशक और बिहार राज्य चर्म उद्योग विकास निगम के सर्वेसर्वा रहे। साल 2000 में बिहार बंटवारे के बाद उन्होंने झारखंड कैडर चुना और वे रांची आ गए।
झारखंड में वित्त सचिव, उच्च शिक्षा सचिव, विकास आयुक्त रहने के साथ वे तत्कालीन राज्यपाल वेद मारवाह के प्रधान सचिव रहे। उन्होंने एक वक़्त रांची विश्वविद्यालय के कुलपति का भी पद संभाला।

भाई आईएफ़एस, पत्नी आईएएस
रांची में उप-महालेखापरीक्षक रहे अविनाश चंद्र खरे (पिताजी) और नलिनी खरे (मां) के घर जन्मे अमित खरे के बड़े भाई अतुल खरे भारतीय विदेश सेवा के 1984 बैच के अधिकारी रहे हैं।
आईएफ़एस से रिटायर होने के बाद वे इन दिनों संयुक्त राष्ट्र के लिए काम कर रहे हैं। अमित खरे की पत्नी निधि खरे 1992 बैच की आईएएस अधिकारी हैं। वे इन दिनों केंद्र सरकार के खाद्यान्न व सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में अपर सचिव हैं। वे भी झारखंड कैडर की अधिकारी हैं और इन दिनों केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं।
पशुपालन घोटाला में जाँच
नब्बे के दशक में मौजूदा झारखंड का हिस्सा बिहार राज्य की परिधि में था। बिहार सरकार ने अप्रैल 1995 में अमित खरे को पश्चिमी सिंहभूम का ज़िलाधिकारी बनाकर चाईबासा भेजा।
उन्हीं दिनों बिहार के तत्कालीन मुख्य महालेखापरीक्षक टीएन चतुर्वेदी ने पशुपालन विभाग में आवंटित बजट से अधिक ख़र्च से संबंधित कुछ गड़बड़ियां पकड़ीं और सरकार को इस बारे में बताया।
तब राज्य के वित्त सचिव रहे वीएस दुबे ने इन गड़बड़ियों के बारे में बिहार के सभी ज़िलाधिकारियों को चिट्ठी लिखी। पटना से निकली वह चिट्ठी कई सौ किलोमीटर का सफ़र तय कर चाईबासा पहुँची।
तब वहाँ डीएम रहे अमित खरे ने उस पत्र के आधार पर इसकी छानबीन करायी, तो उन्हें भी गड़बड़ियां दिखीं। खरे ने वहां के ज़िला पशुपालन अधिकारी से जवाब तलब किया, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
इसके बाद 27 जनवरी 1996 को उन्होंने चाईबासा के पशुपालन कार्यालय पर छापा मारा और कई गड़बड़ियों के सबूत मिलने के बाद उस दफ़्तर को सील करा दिया। उस मामले में एफ़आइआर करायी गई और बाद के दिनों में रांची, जमशेदपुर, गुमला और दुमका में भी छापे पड़े। फिर कुछ लाख की गड़बड़ियों से शुरू हुआ यह मामला 900 करोड़ रुपये से भी अधिक के पशुपालन घोटाला के तौर पर सामने आया।
उस मामले में बिहार के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों डॉ जगन्नाथ मिश्र और लालू प्रसाद यादव को सज़ा भी हुई। डॉ जगन्नाथ मिश्र का देहांत हो चुका है और लालू प्रसाद यादव अभी ज़मानत पर हैं। यह पहला मामला था, जब एक आईएएस के तौर पर अमित खरे मीडिया की सुख़ियों में आए। वे इसपर किसी भी तरह की सीधी टिप्पणी से बचते रहे हैं। हालांकि, कुछ साल पहले उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें तब किसी तरह का डर नहीं लगा और न किसी ने उन्हें कोई प्रलोभन दिया।

चुनौतियां और उपलब्धि
पशुपालन घोटाला में पुलिस रिपोर्ट कराने के कुछ ही दिनों बाद अमित खरे का तबादला तब मृतप्राय समझे जाने वाले बिहार राज्य चर्म उद्योग विकास निगम में कर दिया गया।
वे पटना चले गए और उसके बाद बिहार में नौकरी करने का दौर हमेशा सुखद नहीं रहा। साल 1997 में पिताजी की तबीयत बिगड़ने पर उन्होंने छुट्टी ली, जो बीच में ही रद्द कर दी गयी। उसी दौरान उनके पिताजी का निधन भी हो गया। झारखंड में काम करते हुए भी वे किसी सरकार के बहुत क़रीब या बहुत दूर नहीं रहे। उनकी छवि तटस्थ अधिकारी की रही। इस कारण वे और उनकी आईएएस पत्नी कई बार केंद्रीय प्रतिनियुक्तियों पर जाते रहे।
वे केंद्र की मौजूदा सरकार में सूचना व प्रसारण मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय में सचिव रहे। इस दौरान नई शिक्षा नीति-2020 और डिजिटल मीडिया पर निगरानी से संबंधित आइटी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रुल 2021 बनाने में उनकी भूमिकाएं भी चर्चा में रहीं । वे तब एचआरडी सचिव बनाए गए, जब जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) में फ़ी-स्ट्रक्चर में बढ़ोतरी के बाद वहाँ के छात्र आन्दोलन कर रहे थे। उन्होंने सचिव रहते हुए कुलपति से बात कर फ़ीस बढ़ोतरी को वापस कराया और वह आंदोलन शांत हुआ। ऐसे कई और क़िस्से अमित खरे के साथ जुड़े हैं।