कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में ‘पौधों की खाद्य फैक्टरी’ का पाठ आसान बनाने के लिए चौथी कक्षा में ऑनलाइन टूल के साथ कई व्यावहारिक गतिविधियों को शामिल किया गया था। छात्राओं को पौधों और जानवरों के बीच अन्योन्याश्रयता (एक दूसरे पर निर्भर होना) और मानव गतिविधियों के प्रभावों से अवगत कराया गया। गत 22 अप्रैल पर्यावरण संरक्षण का सन्देश देते हुए एक कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इस बार की थीम रिस्टोर आवर अर्थ यानी पृथ्वी को दोबारा सहेजना था। इसी विचार को केन्द्र में रखकर सारी गतिविधियाँ तय की गयी थीं। इसमें प्रकृति से जुड़ी प्रक्रिया, हरित तकनीक यानी ग्रीन टेक्नोलॉजी और विश्व के इको सिस्टम को संरक्षित करने पर चर्चा हुई। छात्राओं को प्लास्टिक के कुप्रभाव से अवगत करवाया गया और प्लास्टिक की बोतलों को फिर से करने के तरीके समझाए गये। उनको प्लास्टिक की बेकार बोतलों से बर्ड फीडर बनाना और कचरे को कम करना सिखाया गया
सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की छात्राओं ने सीखा प्रकृति संरक्षण
भवानीपुर कॉलेज की एनएसएस टीम पहुँची वृद्धाश्रम,
जयनगर में नेत्र परीक्षण शिविर ईक्क्षाना का आयोजन
कोलकाता : किसी भी समाज के लिए, वहाँ की बुजुर्ग आबादी ज्ञान और गौरव का स्रोत होती है। जहाँ तक वरिष्ठ लोगों की आंँखों के स्वास्थ्य का सवाल है, उसके लिए स्वस्थ जीवन शैली को प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है जो जीवन की लंबी अवधि तक आंँखों के स्वास्थ्य को अच्छा रखे। कहा भी गया है ‘आँखें हैं तो जहाँ है’। सच में आँखें शरीर के लिए दीपक की तरह है, आँखें यदि बेहतर है तो जीवन भी बेहतर ढंग से कट जाता है।
इसके लिए आवश्यक है कि हम समाज के वृद्ध लोगों की आँखों की देखभाल और उनकी सेवा के लिए जागरूक रहें। हमारी दी गई सेवाएँ उन तक अच्छी तरह से पहुंँचे।
बुजुर्गों में आँख से संबंधित बहुत – सी बिमारियाँ जैसे मोतियाबिंद, उम्र से संबंधित धब्बेदार अध: पतन (एएमडी) और ग्लूकोमा आदि हैं जैसी जो बुजुर्गों में अधिक होती हैं । मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी बीमारियाँ उम्र से संबंधित नेत्र रोगों के जोखिम को बढ़ाती हैं। खराब दृष्टि के परिणामस्वरूप गतिशीलता और सक्रियता में कमी आ जाती है। स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए आँखों का स्वस्थ होना बहुत महत्वपूर्ण है
वृद्धों की आँखों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज की एनएसएस इकाई ने दक्षिण बारासात आई फाउंडेशन के सहयोग से जोयनगर ब्लॉक में जन्म भूमि बृद्धबास, दक्षिण बारासात, जोयनगर में एक नि: शुल्क नेत्र जांँच शिविर ईक्क्षाना का आयोजन किया। शिविर का उद्देश्य आंँखों की जांँच और आवश्यक मोतियाबिंद सर्जरी, पर्टिजियम, कैलाजियम डीसीटी/डीसीआर सर्जरी आदि के उपचार की पहचान करना था।
भवानीपुर कॉलेज की एनएसएस टीम ने तैइस अगस्त को शिविर का निरीक्षण करने और सभी आवश्यक व्यवस्था करने के लिए आयोजन स्थल का दौरा किया। उन्होंने रोगियों के लिए उपलब्ध बुनियादी ढांँचे और सुविधाओं की जांँच करने के लिए दक्षिण बारासात आई फाउंडेशन अस्पताल का भी दौरा किया।
अट्ठाइस अगस्त, इक्कीस को एनएसएस का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच छात्रों और एनसीसी का प्रतिनिधित्व करने वाले चार छात्रों और तीन संकाय सदस्यों ने जन्मभूमि बृद्धबास का दौरा किया और नि: शुल्क नेत्र जांँच शिविर की शुरुआत की। स्वयंसेवकों ने सक्रिय रूप से कतार प्रबंधन किया, शिविर को सुचारू रूप से चलाने के लिए डॉक्टरों और लाभार्थियों की सहायता की। दक्षिण बारासात आई फाउंडेशन ने जाँच शिविर आयोजित करने के लिए चिकित्सा, पैरा मेडिकल और शिविर समन्वयक आदि प्रदान किए। वृद्धाश्रम में रहने वाले लोगों के साथ स्थानीय लोगों ने भी आंँखों की जांँच कराई।
इस शिविर में कुल अस्सी लोगों का चेक-अप किया गया।वहीं मोतियाबिंद का कुल ग्यारह ऑपरेशन आवश्यक समझे गए। वहाँ कुल उनतालीस चश्मे प्रदान किए गए।
भवानीपुर कॉलेज चश्मे उपलब्ध कराएगा और एनएसएस यूनिट मोतियाबिंद की सर्जरी कराने के लिए नेत्र अस्पताल के साथ समन्वय करेगी। सेवा भाव और देखभाल के प्रतीक के रूप में, भवानीपुर कॉलेज ने वृद्धाश्रम के सभी निवासियों को राशन, नाश्ता, साबुन, तौलिया, मास्क और सैनिटाइज़र की बोतलें, थर्मामीटर, सर्जिकल कैप जैसी आवश्यक चीजें प्रदान कीं। एनएसएस के वास्तविक आदर्श वाक्य “नॉट मी बट यू” को प्रतिबिंबित करने का यह छोटा सा प्रयास था।
कॉलेज प्रबंधन, प्रो. दिलीप शाह, प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी को धन्यवाद जिन्होंने पूरे प्रोजेक्ट को संचालित करने के लिए अपना निरंतर समर्थन दिया । हम इस आयोजन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रो. चंदन झा और प्रो. मोहित सिंह को भी धन्यवाद देते हैं। पूरा कार्यक्रम एनएसएस की एक पहल थी जिसका समन्वयन प्रो. गार्गी ने किया। इस प्रकार के सामाजिक कार्यों में विद्यार्थियों की अथक भागीदारी रही। विद्यार्थियों ने एक टीम के रूप में काम करना सीखा और महसूस किया कि कैसे कम भाग्यशाली लोग अपना जीवन निर्वाह करते हैं। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
मर्कट मन
– श्वेता गुप्ता
मर्कट मन हैं मेरा,
कोई इसको बांध लें आओ रे,
कभी हंसाता, कभी रुलाता,
कोई इसको समझाओ रे।
क्यों बिगड़ता, क्यों बिलखता,
क्यों बेचैन रहता रे?
रिश्तों की तृष्णा के पीछे,
क्यों करतब दिखाता रे?
आंख मुंदे, यादों को संजोते,
तू कैसे हाथ निकालेगा?
कर विंदा तू, वक़्त से पहले,
वरना मदारी लें जाएगा।
क्यों रुलाता, क्यों लुभाता,
ये कैसा खेल दिखाता रे?
रिश्तों की अभाव में,
कोई नहीं हैं तुझे समझता,
फिर तू ख़ुदको क्यों लुटाता रे?
रिश्तों की चाहत में तू क्यों,
ख़ुद की डोर दें आता रे?
देख, तुझे मर्कट समझ वो,
कैसा नाच नचाता रे।
वक़्त का पहिया चलता जाता,
हर कोई मर्कट एक दिन हैं बनता,
रिश्तों के इस झोलझाल में,
एक मर्कट, दूसरे मर्कट को सलाह दें आता रे।
पहले भी मर्कट थें,
अब भी मर्कट हैं,
दुनिया में बस मर्कट ही रह जाएंगे,
फिर इंसान कहां पायेंगे?
मर्कट मन हैं मेरा, कोई इसको बांध लें आओ रे,
कभी हंसाता, कभी रुलाता,
कोई इसको समझाओ रे,
कोई इसको समझाओ रे।।
जनमानस ने संजोकर रखे हैं पद्मा चारिणी के गीत

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों डिंगल काव्य धारा के अंतर्गत वीर रसात्मक काव्य रचना करने वालों में कुछ कवयित्रियों के नाम भी शामिल हैं जिन्हें समय के साथ भुला दिया गया। यहाँ तक कि इनका नाम भी बहुत से साहित्य प्रेमियों को पता नहीं है। लेकिन गंभीर शोधकर्ताओं की पैनी दृष्टि इनपर और इनके साहित्यिक अवदान पर पड़ी और उन्होंने उनकी रचनाओं को संकलित किया। झीमा चारिणी की रचनात्मकता से मैं आपको परिचित करवा चुकी हूँ। आज मैं आपका परिचय पद्मा चारिणी से करवाऊंगी।
पद्मा चारिणी का रचनाकाल संवत 1643 या 1654 के आसपास माना जाता है। ये चारण ऊदाजी सांदू की सुपुत्री और मालाजी सांदू की बहन थीं। कहा जाता है कि इनका विवाह शंकर बारहठ के साथ हुआ था जो स्वयं एक प्रसिद्ध कवि थे। एक अन्य कथा भी मिलती है जिसके अनुसार इनकी सगाई तो शंकर बारहठ के साथ हुई थी लेकिन विवाह नहीं हो पाया था। संक्षेप में इसकी कथा इस प्रकार है कि एक बार शंकर जी अपने कुछ मित्रों के साथ पद्मा के गाँव के पास से गुजर रहे थे तो उन्होंने सोचा कि मालाजी से भेंट करते चले। संयोग से मालाजी उस समय घर पर नहीं थे। नौकर ने पद्मा को उनके भावी पति के अन्य मित्रों के साथ आने की सूचना दी। पद्मा ने सोचा कि मेहमान बिना आदर सत्कार के चले जाएंगे तो उनके परिवार की बदनामी होगा लेकिन वह अपने भावी पति के सामने नहीं जा सकती थी इसीलिए उसने पुरुष का वेश बनाया और अपना परिचय छोटे कुंवर के रूप में देकर अतिथियों का सत्कार किया। गले मिलकर उनका स्वागत किया और कविता की महफ़िल में कविताएँ भी सुनाईं तथा दूसरे दिन उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया। लेकिन गाँव के चौधरी ने मेहमानों को बताया कि उस घर में तो कोई कुंवर है ही नहीं। कुंवर के पैरों के निशान देखकर उन्होंने कहा कि “ऐ तो बांका पग बाई पद्मा रा” अर्थात ये तिरछे पैरों के निशान पद्मा के हैं क्योंकि वह पैर तिरछे करके चलती थी। सच्चाई जानकर शंकर ने पद्मा से विवाह करने से इंकार कर दिया। हालांकि उन्हें पद्मा की बुद्धिमत्ता की सराहना करनी चाहिए थी लेकिन पुरुष के अहम को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उनकी भावी पत्नी ने उनके मित्रों के गले लगकर उनका स्वागत किया और सबके साथ महफिल भी जमाई। यह बात सुनकर स्वाभिमानिनी चारण कन्या ने आजीवन कुंवारी रहने का निर्णय लिया। उनका मानना था कि विवाह एक बार जिसके साथ तय हो गया उसी के साथ ही होगा अन्यथा नहीं होगा। इस प्रसंग में एक और कथा मिलती है। डॉ. हीरालाल माहेश्वरी ने शंकर बारहठ का उल्लेख करते हुए पद्मा की कथा इस प्रकार लिखी है- “संवत 1643 जोधपुर के मोटे राजा उदैसिंह के समय में जब आऊवै में चारणों ने धरणा दिया था, तब उनमें ये शंकर बारहठ भी थे लेकिन किसी कारणवश ये इस धरणे को छोड़कर चले गए। कहा जाता है, इसी कारण पद्मा जो माला सांदू की बहन थी, इनको छोड़कर राजा राय सिंह के छोटे भाई को अपना धर्म भाई मान कर उसी के महल में रहने लग गई।”
पद्मा बचपन से ही अपने पिता के संरक्षण में काव्य रचना करती थी। उसकी प्रतिभा की चर्चा बीकानेर के तत्कालीन राजा राय सिंह जी के भाई अमर सिंह के कानों तक भी पहुँची थी। जब उन्होंने पद्मा के आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा के बारे में सुना तो उनसे बहन का नाता जोड़कर अपने महल में आदरपूर्वक स्थान दिया। समय पड़ने पर पद्मा ने रियासत के प्रति अपनी वफादारी का परिचय भी दिया। एक बार मुगल बादशाह अकबर की शाही सेना अमर सिंह को पकड़ने आई थी। उस समय अमर सिंह अफीम के नशे में सो रहे थे। तब पद्मा ने ओजपूर्ण गीत गाकर उन्हें नींद से जगाया था। वह गीत यहाँ प्रस्तुत है-
“सहर लुटतो सदा तूं देस करतो सरद्द,
कहर नर पड़ी थारी कमाई
उज्यागर झाल खग जैतहर आभरण,
अमर अकबर तणी फौज आई
वीकहर सींह घर मार करतो वसूं।
अभंग अर व्रन्द तौ सीस आया
लाग गयणांग भुज तोल खग लंकाल
जाग हो जाग कालियाण जाया
गोल भर सबल नर प्रकट अर गाहणां
अरबखां आवियो लाग असमाण
निवारो नींद कमधज अबै निडर नर
प्रबल हुय जैतहर दाखवो पाण
जुडै जमराण घमसाण मातौ जठै
साज सुरताज धड़ बीच समरौ
आप थी जका थह न दी भड अवर नै
आप री जिकी थह रयौ अमरौ।”
पद्मा का एक दूसरा लोकप्रिय गीत भी मिलता है जिसे उन्होंने प्रसिद्ध वीर नारायण धनजोत के शौर्य की प्रशंसा में लिखा था। नारायण सिवाना दुर्ग की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। कवयित्री ने उनके शौर्य को अपनी कविता के माध्यम से लोक इतिहास के पन्नों पर अमर कर दिया। ओज गुण से संपन्न यह गीत सुनने वालों के मन में वीर भाव का संचार करता है। देखिए-
“गयण गाज आवाज रणतूर पाषर रहच साल ले सींधवो राग साथै,
दुरति धनराज रौ वैर जलू डोहतो मल्हपीयो मुगली फौज माथै।
धीखै कमंध षगधर आल्दघी में अर घड़ा जाणती जेण आंझै,
सर दल सामुहो दंस पाबासरो झी ये बराहण लोह झाझै।”
पद्मा के एक और गीत को बहुत प्रसिद्धि मिली है जिसके केन्द्र में वीर नायक शिवा बाढ़ेला का शौर्यपूर्ण चरित्र है। वीर रणमल के वंशजों ने अपने मंदिर की रक्षा के लिए युद्ध करते हुए अपने प्राण त्याग दिये थे। इस सैन्य टुकड़ी का नायक शिवा बाढ़ेला था। कवयित्री ने अत्यंत ओजपूर्ण शब्दों में शिवा के अद्भुत रणकौशल और बहादुरी को वर्णित किया है। इनके अन्य गीतों में फहीम नामक योद्धा तथा अबदल खां पठान जैसे वीर योद्धाओं के शौर्य का वर्णन मिलता है। पद्मा चारिणी ने मुख्यत वीर रस की कविताओं की रचना की है। ओजगुण से संपन्न इनकी कविताओं में रणबांकुरों के शौर्य का वर्णन अत्यंत सजीवता से हुआ है। वीर रस में आप्लावित एक और गीत की पंक्तियां दृष्टव्य हैं
“सिर झूर कीयो षागै चढ़ सेरे, सास प्रामीयो जोह संगाथ।
आदम गयो घूणतो उतबंग, हूरां गई मसलती हाथ।।
कण कण कमल कयो अबदलखां, पनह षुहा यश्योह संपेण।
तसवी वणति नयेण गयो तणि, बेगम रथ गया षसम विण।।”
राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध अलंकार वयण सगाई का सुंदर निर्वाह पद्मा चारिणी या पद्मा सांदू ने अपने छंदों में किया है। वीर रस का अत्यंत रोमांचक वर्णन करनेवाली डिंगल काव्य धारा की इस सफल कवयित्री को इतिहास के अंधकार ने भले ही लील लिया लेकिन जनमानस में उनकी स्मृति आज भी लोक कथाओं और लोकगीतों में सुरक्षित है। उनके नाम से जुड़ा मुहावरा राजस्थानी भाषा के लोगों में प्रसिद्ध है। जब भी किसी व्यक्ति को कसूरवार ठहराना होता है, उसकी ओर संकेत करके कहा जाता है -“बांका पग बाई पद्मा रा।” इसी तरह उनके ओजपूर्ण गीत भी जनमानस में रचे बसे हैं और जो कवि लोक स्मृति में जीवित रहता है वही सच्चा कवि होता है। इसके बावजूद कवयित्री पद्मा चारिणी के रचनात्मक अवदान का पुनर्पाठ एवं पुनर्मूल्यांकन अवश्य होना चाहिए। साथ ही इनकी कविताओं को अधिकाधिक लोगों के बीच पहुँचाने की आवश्यकता भी है। थोड़ी कोशिश मैंने की, थोड़ी आप भी करिए।
शिक्षक दिवस पर जानिए कुछ खास बातें
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को 1962 से शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा जताई थी। यहां पढ़ें शिक्षक दिवस से जुड़ी ये 20 बातें: –
1. 1962 में देश के राष्ट्रपति बने डॉक्टर राधाकृष्णन एक महान शिक्षाविद् और शिक्षक के रूप में दुनियाभर में जाने जाते हैं।
2. डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना था कि देश में सर्वश्रेष्ठ दिमाग वाले लोगों को ही शिक्षक बनना चाहिए।
3. डॉक्टर राधाकृष्णन के पिता उनके अंग्रेजी पढ़ने या स्कूल जाने के खिलाफ थे। वह अपने बेटे को पुजारी बनाना चाहते थे।
4. डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन बेहद ही मेधावी छात्र थे और उन्होंने अपनी अधिकतर पढ़ाई छात्रवृत्ति के आधार पर ही पूरी की।
5. सर्वपल्ली राधाकृष्णन छात्रों में इतने लोकप्रिय थे कि जब वह कलकत्ता जा रहे थे, उन्हें मैसूर विश्वविद्यालय से रेलवे स्टेशन तक फूलों की बग्घी में ले जाया गया था।
6. जाने—माने प्रोफेसर एच.एन.स्पेलडिंग डॉक्टर राधाकृष्णन के लेक्चर से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय में उनके लिए चेयर स्थापित करने का फैसला कर लिया।
7. शिक्षा के क्षेत्र में डॉक्टर राधाकृष्णन के अभूतपूर्व योगदान के लिए 1931 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने नाइट के सम्मान से भी नवाजा।
8. वर्ष 2015-16 तक देश में कुल शिक्षकों की संख्या 42,74,206 है। इनमें राज्य सरकार और सर्व शिक्षा अभियान द्वारा नियुक्त शिक्षक शामिल हैं।
9. भारत में प्राथमिक महिला शिक्षकों की भागीदारी 2014 तक 49.49 फीसदी थी। जबकि माध्यमिक शिक्षा में यह भागीदारी 43.21 प्रतिशत थी।
10. दुनिया में सबसे ज्यादा महिला शिक्षक रूस में हैं। वर्ष 2014 में यहां 98.81 प्रतिशत प्राथमिक महिला शिक्षक थीं। इसके बाद ब्राजील (89.64%) का नंबर आता है।
11. दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में अलग-अलग तारीख पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। हालांकि विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्तूबर को मनाया जाता है।
12. यूनेस्को ने 1994 में शिक्षकों के कार्य की सराहना के लिए 5 अक्तूबर को विश्व शिक्षक दिवस के रूप में मनाने को लेकर मान्यता दी थी।
13. अमेरिका में 1944 में मैटे वायटे वुडब्रिज ने सबसे पहले वकालत की। फिर 1953 में कांग्रेस ने मान्यता दी। 1980 में 7 मार्च को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के रूप में चुना गया। मगर बाद में मई के पहले मंगलवार को इसका आयोजन किया गया।
14. सिंगापुर में सितंबर के पहले शुक्रवार को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। जबकि अफगानिस्तान में पांच अक्तूबर को ही यह दिवस मनाया जाता है।
15. हैरी पॉटर सीरीज की लेखिका पहले जे.के. रोलिंग पुर्तगाल में बच्चों को पढ़ाया करती थीं।
16. यूनेस्को के मुताबिक वर्ष 2030 तक प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लक्ष्य को पूरा करने के लिए 6.9 करोड़ शिक्षकों की जरूरत होगी।
17. सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले को देश की पहली महिला शिक्षक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने लड़कियों की शिक्षा में अहम योगदान दिया था।
18. देश में वर्ष 2015-16 तक हर 23 प्राथमिक, 37 उच्च माध्यमिक और 24 उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों पर एक-एक शिक्षक उपलब्ध है।
19. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक 2015-16 में देश में 26,06,120 प्राथमिक शिक्षक थे।
20. देश में 1951 में 5,38,000 प्राथमिक शिक्षक थे, जिनमें 4,56,000 पुरुष शिक्षक और 82,000 महिला शिक्षक थीं।
भवानीपुर 75 पल्ली में खूँटी पूजा के साथ दुर्गोत्सव की तैयारी शुरू
कोलकाता : भवानीपुर 75 पल्ली की खूँटी पूजा हाल ही में सम्पन्न हुई। भवानीपुर में देवेन्द्र घोष रोड पर यह पूजा मण्डप बनाया जाता है। यह दुर्गा पूजा कमेटी अपने सामाजिक कार्यों के लिए जानी जाती है। इस बार खूँटी पूजा में राज्य के परिवहन मंत्री फिरहाद हकीम, विधायक देवाशीष कुमार, विधायक मदन मित्रा, कार्तिक बनर्जी, 71 नम्बर वार्ड की संयोजक समेत अन्य लोग उपस्थित थे। यह इस पूजा का 57वाँ वर्ष है। क्लब के सचिव सुबीर दास ने उम्मीद जाहिर की कि हर साल की तरह इस बार भी लोग भवानीपुर 75 पल्ली की पूजा को पसन्द करेंगे।
हर वर्ग की साझी आवाज है साहित्य संवाद
कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से साहित्य संवाद श्रृंखला के अंतर्गत काव्यपाठ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से कवियों ने हिस्सा लिया। स्वागत वक्तव्य देते हुए प्रो.संजय जायसवाल ने कहा कि साहित्य संवाद का यह आयोजन सृजनात्मकता की पहल है ताकि नई पीढ़ी को सृजनात्मकता से जोड़ा जा सके। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ शंभुनाथ ने कहा कि कविताएं हमें जीवन को देखने समझने की एक नयी दृष्टि प्रदान करती हैं। चर्चित कवि अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि यह आयोजन नई प्रतिभाओं का मंच है।इस आयोजन में हर वर्ग की साझी आवाजें हैं। वरिष्ठ कवि प्रियंकर पालीवाल ने प्रेम को अपनी कविता में व्यक्त किया तो वहीं प्रो. गीता दुबे ने अपनी कविता के माध्यम से उन कथित प्रेमियों पर व्यंग्य किया जो लड़की द्वारा प्रेम को न स्वीकारने पर उन पर एसिड फेंक देते हैं। मशहूर कवयित्री लवली गोस्वामी ने मातृस्नेह को शब्दों में पिरोया और समां बांध दी। वरिष्ठ कवि राजेश मिश्र ने अॉनलाइन परीक्षा पर तंज कसते हुए बिना परीक्षा के पास होने वाले विद्यार्थियों पर व्यंग्य किया। हरिद्वार से जुड़ी ज्योति शर्मा ने पहाड़, नदी और गांव को अपनी कविताओं में शामिल किया। जमालपुर से जुड़ें चर्चित कवि परितोष पीयूष ने प्रेम पर अद्भुत कविताएं सुनाई। साथ ही आज की परिस्थिति पर कटाक्ष किया। कोलकाता के प्रसिद्ध कवि राहुल शर्मा ने व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अपनी कविताओं का पाठ किया। मधु सिंह ने अपनी कविता में आदिवासियों के जीवन को व्यक्त किया। गया से महेश कुमार कविता के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं को बयां किया। वहीं विद्यासागर विश्वविद्यालय की छात्रा अन्नू तिवारी ने अपनी कविता में वृक्षों का वर्णन किया। कार्यक्रम का सफल संचालन संजय जायसवाल ने किया। तकनीकी राहुल गौड़ ,रूपेश यादव और धन्यवाद ज्ञापन रामनिवास द्विवेदी ने दिया।
डी. पी. एस. रूबी पार्क में नए कलेवर में ‘प्रज्ञा’
कोलकाता : दिल्ली पब्लिक स्कूल रूबी पार्क, कोलकाता में हिंदी उत्सव ‘प्रज्ञा 2021’ का आभासी मंच पर आयोजन पूर्ण सफलता के साथ संपन्न हुआ| हिंदी के इस विशाल कार्यक्रम में महानगर के कुल 14 विद्यालयों ने भाग लिया| कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की वंदना के साथ किया गया| इस महामारी के दौर में आभासी मंच पर प्रतिभागियों को इतने उत्साह से भाग लेता देख विद्यालय की प्राचार्या जयति चौधरी ने प्रसन्नता व्यक्त की| कथा वाचन, एकल अभिनय, दृश्यात्मक काव्य पाठ तथा विज्ञापन रचना जैसे नए कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक भागेदारी कर विद्यार्थियों ने सबका मन मोह लिया| इस कार्यक्रम में अजय कुमार प्रसाद जो रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया में प्रबंधक के पद की शोभा बढ़ा रहे हैं, ओमप्रकाश अश्क जिन्होंने प्रभात खबर, हिन्दुस्तान तथा दैनिक जागरण जैसे लोकप्रिय हिंदी समाचार पत्र के सम्पादकीय सदस्य के रूप में कार्य किया है, कोलकाता हिंदी नाट्य क्षेत्र की जानी-मानी हस्ती उमा झुनझुनवाला तथा ‘साहित्य अकादमी’ और ‘ज्ञानपीठ’ जैसे सम्माननीय पुरस्कारों द्वारा विभूषित कुणाल सिंह जी ने निर्णायक की भूमिका निभाई| प्रतिभागियों के प्रदर्शन को देख निर्णायक गण अभिभूत हो गए|
इस कार्यक्रम में ‘कथा वाचन’ में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ बी. डी. एम. इंटरनेशनल स्कूल के व्योम चौधरी तथा शिरीन चटर्जी को, द्वितीय स्थान सुशीला बिड़ला हाई स्कूल की शालिका अग्रवाल व श्रीनीका रॉय को प्राप्त हुआ और तृतीय स्थान पर रहे बिड़ला हाई स्कूल के तनीश आदित्य तथा अक्षत डागा | ‘दृश्यात्मक कविता पाठ’ में प्रथम स्थान पर रहे एपीजे स्कूल साल्ट लेक के अरोहा सान्याल तथा वेदांश गरोड़िया, द्वितीय स्थान पर बी. डी. एम. इंटरनेशनल स्कूल के अनन्या भारतद्वाज और कनिष्क मुख़र्जी रहे तथा तृतीय स्थान मिला दिल्ली पब्लिक स्कूल रूबी पार्क की श्रेयसी झा तथा निशिता सिन्हा को| ‘विज्ञापन रचना’ में शीर्ष स्थान प्राप्त हुआ बिड़ला हाई स्कूल के रोहन कुमार तथा श्रेष्ठ अग्रवाल को, दूसरे स्थान के हकदार रहे बी. डी. एम. इंटरनेशनल स्कूल के सुहाना हुसैन तथा श्लोक चटर्जी तथा तीसरे स्थान पर कब्ज़ा जमाया दिल्ली पब्लिक स्कूल रूबी पार्क के अगस्त्य गुप्ता तथा अदिति मिश्रा ने| अपने अभिनय से लोहा मनवाते हुए ‘एकल अभिनय’ प्रतियोगिता में सर्वोच्च स्थान पर एक बार फिर रहा बी. डी. एम. इंटरनेशनल स्कूल जिसका प्रतिनिधित्व कर रही थी अद्रिजा मुख़र्जी, द्वितीय स्थान पर दिल्ली पब्लिक स्कूल रूबी पार्क के प्रतिभागी सार्थक दलाल रहे तथा तृतीय स्थान प्राप्त हुआ सुशीला बिड़ला हाई स्कूल की मेधा मुसद्दी को| प्रज्ञा 2021 का विजेता रहा बी. डी. एम. इंटरनेशनल स्कूल तथा उपविजेता दिल्ली पब्लिक स्कूल रूबी पार्क| सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र तथा विजेता और उपविजेता विद्यालयों को ट्रॉफी प्रदान की गयी| कार्यक्रम का संचालन प्रतीक्षा भुइयाँ, सुप्रीत कौर तथा तनिष धर ने संयुक्त रूप से किया| कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन अभिषेक तिवारी(हेड ब्वॉय) द्वारा दिया गया|
बीएचएस में मनाया गया विश्व मानवतावादी दिवस
कोलकाता : हर साल 19 अगस्त को, संयुक्त राष्ट्र बगदाद में संयुक्त राष्ट्र सभा पर 2003 के हमले को याद करते हुए विश्व मानवतावादी दिवस मनाता है। बिड़ला हाई स्कूल के ग्यारहवीं कक्षा के छात्रों ने इस अवसर पर एक आयोजन किया जिसमें मानवता का महत्व और यूएन के प्रयासों के बारे में समझाया गया। कोविड -19 के दौरान भी मानवता के लिए कार्यकर्ताओं ने अथक प्रयास किये। कार्यक्रम का उद्देश्य मानवता के प्रति विद्यार्थियों को जागरूक करना था।




