Sunday, July 5, 2026
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टूट गया 23 साल पुराना सिलसिला, शहीद मीनार में नहीं लगेगा आतिशबाजी बाजार

कोरोना और आर्थिक तंगी ने तोड़ी आतिशबाजी बाजार की कमर

आतिशबाजी पर अदालती पाबन्दी लग चुकी है मगर खबर यह नहीं है, खबर यह है कि आतिशबाजी का बाजार कोरोना और आर्थिक मजबूरियों की चपेट में आकर फिलहाल बन्द हो गया है। यह एशिया का सबसे बड़ा आतिशबाजी मेला बताया जा रहा है मगर इस साल यह मेला नहीं लग रहा और 23 साल से चली आ रही परम्परा अब थम गयी है। इस समस्या पर विस्तृत जानकारी दे रही हैं वरिष्ठ पत्रकार बबीता माली 

बबीता माली

एशिया का सबसे बड़ा मेला, पटाखों का मेला जो कोलकाता के दिल मैदान के निकट स्थित शहीद मिनार में लगाया जाता था , वो अब इस साल नहीं लगाया जाएगा। पिछले 23 सालों से सजता आ रहा पटाखा मेला इस बार आर्थिक तंगी और कोरोना महामारी का शिकार हो गया।  इस बारे में सारा बांग्ला आतिशबाजी उन्नयन समिति के चेयरमेन बाबला रॉय ने कहा , ‘एक ऐतिहासिक मेले का अंत हो गया।’  एशिया का सबसे बड़ा मेला, सबसे ज्यादा सतर्कता के साथ सारे सुरक्षा नियमों पालन करते हुए लगाया जाता था, इस बार मेला नहीं लग पा रहा है।

ये पहली बार नहीं है जब पटाखा मेले पर रोक लगी हो। इसके पहले 1996 में 2 साल तक मेला नहीं लगाया जा सका था। बाबला रॉय ने बताया , वर्ष 1996  में हाई कोर्ट के जज भगवती प्रसाद द्वारा पटाखों पर नियंत्रण के बाद करीब दो सालों तक पटाखा बाज़ार उर्फ़ पटाखा मेला नहीं लगाया गया था। पहले बड़ाबाजार में लगाया गया था लेकिन पुलिस की पाबंदी के बाद हमने शहीद मीनार में यह आतिशबाजी मेला लगाना शुरू किया।

1998 से मैदान के निकट शहीद मीनार में पटाखा मेला का आयोजन किया जा रहा है।  उन्होंने बताया , केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय से लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी और इसके बाद जाकर हमने इस पटाखा मेला की शुरूआत की थी। जहाँ रक्षा मंत्रालय की तरफ से पुस्तक मेला , हस्त शिल्प मेला और चर्म शिल्प मेला को बंद कर दिया गया था, वहीं हम लगातार लड़ाई करते हुए इस पटाखा मेला का आयोजन करते आ रहे थे।  मगर इस बार मेले को आर्थिक तंगी के कारण बंद करने का निर्णय लिया गया है।

इसलिए शहीद मीनार का ये बाजार कहलाता था पटाखा मेला 

शहीद मिनार में लगने वाला पटाखा बाजार सिर्फ बाजार नहीं था बल्कि ये एक मेला था यानी पटाखों का मेला।  इस बारे में बाबला रॉय बताते है , शहीद मीनार में लगने वाले इस पटाखा मेले में एक समय लाखों – लाखों लोग आया करते थे। यहां की रौनक ऐसी थी कि लोग घूमने के लिए भी आते थे। यहांँ पटाखा बिकने के साथ ही साथ मेला लगता था। बाबला रॉय ये भी बताते है , कई लोग ऐसे भी होते थे जो सिर्फ मेला घूमने आते थे।  वे पटाखें नहीं खरीदते थे लेकिन मेले में घूमकर और खा – पीकर घर लौट जाते थे। इस मेले के बाद ही महानगर के कई जगह पटाखों का बाजार लगना शुरू हुआ। हालाँकि मेला सिर्फ इसी मैदान में लगता था। इस बार बाकी जगहों पर पटाखा बाजार लगेगा लेकिन ऐतिहासिक शहीद मिनार में अब पटाखा मेला नहीं लगेगा।

शुरूआत में 100 स्टाल लगते थे लेकिन बाद में कम होती चली गई संख्या 

बाबला रॉय ने बताया, जब इस ऐतिहासिक पटाखा मेला की शुरूआत की गई थी उस समय इस मेले में 100  स्टाल लगाए जाते थे  लेकिन बाद में धीरे – धीरे स्टाल की संख्या कम होती चली गयी।  अंत में स्टाल की संख्या 27 तक पहुँच गई।  स्टाॅल की संख्या कम होने के बावजूद खर्चों में कोई कमी नहीं आयी। खर्च उससे ज्यादा ही होने लगा। एक स्टाल लगाने में कम से कम 2  से ढाई लाख रुपये का खर्च आता है। मगर, साल दर साल बिक्री कम होती गयी लेकिन खर्च बढ़ता गया।

बाबला रॉय ने बताया , पिछले साल कोरोना के बावजूद शहीद मीनार में पटाखों का मेला सजाया गया था मगर उस दौरान पटाखा व्यवसायियों को 30 से 35 प्रतिशत का नुकसान झेलना पड़ा था।  इस बाबत इस बार पटाखा व्यवसायियों ने इस मेले में हिस्सा लेने से इन्कार कर दिया क्योंकि वे अब और नुकसान नहीं उठा सकते हैं।  इस बार हालात ऐसे है कि 25 व्यवसायी भी ऐसे नहीं है जो मेले में हिस्सा लेने के लिए आगे बढ़े।

कई कारणों से मेले को बंद करने का लिया गया फैसला 

बाबला रॉय ने बताया , सबसे पहली वजह आर्थिक तंगी है।  दरअसल , मेले के लिए डिफेन्स को काफी रुपये देने पड़ते हैं जो इस बार सम्भव नहीं है। इस बार कोरोना ने सभी व्यवसायियों की कमर तोड़ दी है। दूसरा, हमारे पास हाई टेंशन इलेक्ट्रिसिटी भी नहीं होती है जिसे हमें किराये पर लेना होता है और यह काफी महंगा पड़ता है। इसके अलावा पुलिस और दमकल के लिए अलग से स्टाॅल तैयार करना पड़ता है।  वहीं यहाँ पानी की भी व्यवस्था करनी पड़ती है और हमारे स्टाॅल में सुरक्षा के लिहाज से सीसीटीवी और सुरक्षा की भी व्यवस्था करनी पड़ती है जिस पर काफी खर्च होता है। इसके अलावा , पटाखा मेला की अनुमति काफी दिन बाद मिलती है।  ऐसे में स्टाॅल तैयार करने के लिए समय भी ठीक से नहीं मिल पाता है। वहीं 7  दिनों के इस बाजार में केवल 2  से 3  दिन ही बिक्री होती है जो अभी पूरी तरह घट गयी है।  दूसरा , पटाखों की धर – पकड़ है , जो पटाखें 90 डेसीबल से कम आवाज वाले होते हैं, उन्हें भी पकड़ा जाता है।

पटाखा बनाने वाले मजदूर भी छोड़ रहे हैं ये व्यवसाय 

इस मामले में भी बबला रॉय ने बताया, पहले पटाखा व्यवसाय से करीब 31 लाख लोग जुड़े हुए थे लेकिन अब इनकी संख्या 22 -23  लाख तक पहुँच गयी है।  पटाखों की मांग कम होने से पटाखा बनाने वाले मजदूर इस काम को छोड़ अन्य व्यवसाय से जुड़ रहे हैं। कुछ सब्ज़ी बिक्री कर रहे हैं तो कुछ दूसरे काम कर रहे हैं। पहले बंगाल पटाखों के निर्माण में दूसरे स्थान पर था लेकिन अब चौथे नंबर पर पहुँच गया है।  तमिलनाडु सबसे आगे हैं। बाबला रॉय ने बताया , पटाखा व्यवसायियों और मजदूरों के लिए अभी रोजी – रोटी के लाले पड़ गए हैं।  अगर समय रहते कोई व्यवस्था नहीं किया गया तो ये व्यवसाय बंद हो जायेगा।  मजदूर खुदकुशी करने लगेंगे।

ग्रीन पटाखों को लेकर कोई फार्मूला नहीं मिलने से परेशानी बढ़ी 

पटाखों से प्रदूषण बढ़ता है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों को जलाने की अनुमति दी है।  मगर ग्रीन पटाखों को लेकर बाबला रॉय का कहना है , ग्रीन पटाखों को बनाने के लिए किस तरह के केमिकल और मसालों का उपयोग होगा, उसे लेकर कोई फार्मूला नहीं दिया गया है। अभी तक ग्रीन पटाखों को लेकर कोई प्रयोग भी नहीं नहीं किया गया है।  हम ग्रीन पटाखा बनाना तो चाहते हैं लेकिन हमारे पास ग्रीन पटाखों को बनाने के लिए क्या सामग्री लगेगी और क्या इसकी प्रक्रिया है , इसको लेकर कोई जानकारी नहीं दी गयी है।  उनका ये भी आरोप है , तमिलनाडु के कुछ व्यवसायी रुपये के दम पर पटाखों पर ग्रीन पटाखों का स्टाॅम्प लगवा लेते हैं और उसे बाजार में छोड़ देते हैं।ऐसा करना बिलकुल गलत है।  हम चाहते हैं कि सरकार ग्रीन पटाखों को लेकर जानकारी और फार्मूला साझा करें।  वहीं उन्होंने सरकार से चीनी स्काई लालटेन और लाइट्स की बिक्री पर रोक लगाने का भी अनुरोध किया है।

लंदन के ‘ट्राफलगर स्क्वायर’ में काली पूजा उत्सव के साथ दिवाली समारोह

प्रवासी बांग्लाभाषियों के आयोजन में दिखा बंगाल की अल्पना का भव्य रंग

कोलकाता : भारत के लोग रोशनी के त्योहार दिवाली मनाने की तैयारियों में ही इन दिनों जुटे हैं। यहां दीपावली की पूर्व संध्या पर मां काली का स्वागत कर इस त्योहार को महिला शक्ति की संस्कृति के साथ मनाया जाता है। कोरोना वैश्विक महामारी के कारण पिछले साल के अंतराल के बाद हेरिटेज बंगाल ग्लोबल (एचबीजी) नामक एक महिला संगठन के तत्वावधान में ब्रिटेन में अधिकांश प्रवासी बंगाली समुदाय के लोगों के साथ लंदन में शनिवार 23 अक्टूबर को ‘ट्राफलगर स्क्वायर में’ लंदन के मेयर श्री सादिक खान के कार्यालय द्वारा आयोजित सांस्कृतिक विविधता का जश्न मनाया गया।

इस दौरान एचबीजी द्वारा बंगाल की शोपीस ‘अल्पना’ कलाकृति को हेरिटेज बंगाल ग्लोबल की उपाध्यक्ष महुआ बेज द्वारा प्रस्तुत किया गया। इसके बाद सेनजुति दास और अनाश्मिता साहा ने नृत्य प्रस्तुति दी। एचबीजी के निदेशक एवं आईलीड संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष प्रदीप चोपड़ा एवं अनिर्बान मुखोपाध्याय ने कहा कि यह आयोजन विश्व स्तर पर बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने का एक प्रयास है।

कोलकाता के मेयर जनाब फिरहाद हकीम ने भी इस आयोजन के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं। कोलकाता के भवानीपुर 75 पल्ली दुर्गा पूजा कमेटी के सचिव सुबीर दास इस आयोजन की बड़ी सफलता की कामना की और लंदनवासियों को भारत के सबसे प्यारे हिस्से कोलकाता को देखने आने के लिए आमंत्रित किया। गौरतलब है कि सुबीर दास ने ही 2018 में पहले बंगाल और ब्रिटेन की सांस्कृतिक सहयोग के साथ-साथ लंदन में टेम्स और कोलकाता में गंगा जल के मिश्रण के साथ दुर्गा मूर्ति बनाने का नेतृत्व किया था।

‘देवी आराधना’ में दिखे महिला सशक्तीकरण के अनूठे रंग

भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय और कोलकाता अनुभव का साझा आयोजन

कोलकाता : भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और कोलकाता अनुभव के तत्वावधान में सांस्कृतिक आयोजन हुआ जिसमें नृत्य, संगीत, नृत्य, नाटिका, मूक अभिनय, गीत आदि के द्वारा माँ दुर्गा की आराधना ‘देवी द सेलिब्रेशन ऑफ विमेनवुड ‘की गई। कार्यक्रम का उद्घाटन किया पश्चिम बंगाल स्टेट अकादमी ऑफ डांस ड्रामा म्युजिक और विजुअल आर्ट्स कोलकाता की मेंबर सेक्रेटरी डॉ. हेमंती चट्टोपाध्याय ने। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में संस्कृति ही मानवता को बचा कर रख सकती है और कोलकाता अनुभव के सभी सदस्यों को हार्दिक बधाई दी। प्रधान अतिथि एवं उपस्थित विशिष्ट अतिथि गणों  ध्रुव मित्र, नौशाद मल्लिक, प्रो तारक सेनगुप्तु, अभिजीत साँतरा, डॉ देवांशु दास ने वक्तव्य रखे। श्री नौशाद मल्लिक ने कविता पाठ भी किया।उद्घाटन के आरंभ में माधुर्य भाव से पूर्ण नृत्य प्रस्तुति ‘कोलकाता अनुभव’ की कलाकार छात्रा आयुष्मी साँतरा ने किया। कार्यक्रम के प्रथम चरण में सभी अतिथियों का स्वागत किया गया।
कार्यक्रम के द्वितीय चरण में सांस्कृतिक कार्यक्रम में थीम ‘देवी द सेलेब्रेशन ऑफ विमनवुड ‘ के अंतर्गत कई नृत्य, संगीत की प्रस्तुति दी गयी। इसका संचालन ओडिसी के प्रख्यात गुरु केलुचरण महापात्र और गुरु पौषाली मुखोपाध्याय की शिष्या प्रसिद्ध ओडिशी नृत्यांगना विजया दत्त और राजीव दत्त, जिनके गुरु केलुचरण महापात्र और गुरु रथिकांत महापात्र ने किया। विषय भावना, चित्र नाट्य आदि के संकलनकर्ता श्रीमती कृष्णा दत्त सुमना घोष दोस्तिदार पवित्र कुमार घोष, देवयानी सेनगुप्तु और विजया दत्त ने किया। कोलकाता अनुभव की संस्थापक विजया दत्त और राजीव भट्टाचार्य ने अपने युगल नृत्य मनमोहक और गूढ़ रहस्यों से पूर्ण माँ गूढ़ सौन्दर्य को नृत्य भंगिमाओं द्वारा मनोहर और ताल लय संगीत के सौन्दर्य तत्वों द्वारा उजागर किया गया जो बहुत ही पसंद किया गया। कोलकाता अनुभव की संस्थापक और प्रख्यात कलाकार कृष्णा दत्त द्वारा परिचालित ‘नारी, शक्ति का उत्स’ एक नाटिका प्रस्तुत की जिसमें समाज की नारी के प्रति वास्तविकता और पाशविकता पूर्ण स्थितियों को अपनी भाव भंगिमाओं और स्वरों की ध्वन्यात्मक उतार चढाव द्वारा सशक्त प्रस्तुति दी। जिसमें आयुष्मि साँतरा और मास्टर उद्भव दास ने भी भाग लिया। मुख्य चरित्र अभिनेत्री कृष्णा दत्त के संवादों, संलापों की भंगिमाएँ, सटीक स्वर निक्षेप, संवेदनाओं का ताल लय का सावलील से भरे स्पर्श ने अपने सर्वश्रेष्ठ अभिनय का परिचय दिया। नाटक के पश्चात ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की मूक प्रस्तुति की गई जिसका रूपायन सदीप भट्टाचार्य ने किया। संजीव घोष द्वारा समूह गीत प्रस्तुति किया गया।
नृत्यांगना प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी द्वारा देवी थीम पर आधारित
देवी दुर्गा के सभी रूपों को भाव पूर्ण ताल लय के साथ बेहतरीन हृदयग्राही नृत्य प्रस्तुति दी जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया।नृत्य के बाद एक सुन्दर मूक अभिनय वैद्यनाथ चक्रवर्ती, जित चक्रवर्ती और सुजय राय द्वारा एवं दूसरा मूक अभिनय किया रतन चक्रवर्ती ने, एकल अभिनय मूक अभिनय किया सायन दत्त ने। वहीं शिवप्रिया सेनगुप्त ने एक आवृत्ति और दो असाधारण मूक अभिनय किया जिसमें मूक और बधिर सदस्य दिलीप भट्टाचार्य और निर्वाक शांतिपुर के रूपायन चौधरी के छात्र छात्राओं ने किया। तनुश्री मित्र ने गायन और विष्णु दास के नृत्य ने सभी दर्शकों का मन मोह लिया वहीं प्रसिद्ध टेलीफिल्म परिचालक नौशाद मल्लिक ने कोलकाता के धर्मतल्ला पर स्वरचित कविता पाठ किया। कार्यक्रम के अंत में सविता घोष और शिला चट्टोपाध्याय के द्वारा किया गया’ घैंटे घ ‘नाटक ने दर्शकों को मुग्ध कर दिया। पंचानन दालाल ने सिन्थेसाइजर बजाया। स्त्री विषयक विभिन्न विषयों पर कला के माध्यम से संयोजन किया कृष्णा दत्त और विजया दत्त ने।विजया दत्त ने अपने पिता प्रसिद्ध कलाकार पीलू भट्टाचार्य को कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का संचालन किया सुदीप्त राय ने और कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ. वसुंधरा मिश्र ने ।

मुलाकात

  • श्वेता गुप्ता

    आज मुद्दतों के बाद उनसे मुलाकात होगी,
    फिज़ा में फिर वही पुरानी बात होगी,

    लफ़्ज़ों से बयां नहीं कर पाएंगे,
    वो गुस्ताखी आज फिर इस बार होगी।

    नजरें छुपाए देखा करेंगे हम उनको,
    नजरें टकराए, तो यूं अनजान बन जाएंगे कि देखा नहीं उनको।

    दिल की मुस्कुराहट आंखों में छलक जाएगी,
    खामोशियों को दिल की हलचल की खबर हो जाएगी।

    इशारों – इशारों में वो बात हो जाएगी,
    फिर वही मुलाकात जल्द खत्म हो जाएगी।

कोलकाता में मेट्रो के नॉन एसी डिब्बों की हुई धूमधाम से विदाई

कोलकाता : कोलकाता मेट्रो रेलवे ने रविवार को गैर-वातानुकूलित डिब्बों को औपचारिक रूप से विदाई दे दी। इन डिब्बों में से कुछ डिब्बे 1984 में देश की पहली भूमिगत रेलवे की स्थापना के समय से ही सेवा में थे। वर्ष 1984 में आज ही के दिन परिचालन शुरू करने वाली कोलकाता मेट्रो ने गैर-वातानुकूलित डिब्बों को हटाने की प्रक्रिया को यादगार बनाने के लिए महानायक उत्तम कुमार स्टेशन पर ‘डाउन द मेमोरी लेन’ नामक एक प्रदर्शनी का आयोजन भी किया।
कोलकाता मेट्रो के महाप्रबंधक मनोज जोशी ने कहा, ‘इन डिब्बों की विदाई के हिस्से के रूप में हमने एक फोटो प्रदर्शनी का आयोजन किया है, जिसमें मेट्रो रेलवे के अतीत, वर्तमान और भविष्य को दर्शाया जाएगा।’
‘जीवन का अभिन्न अंग बन गई’
मनोज जोशी ने कहा कि यह उन पलों को फिर से जीने का अवसर है, जिन्हें शहर ने मेट्रो रेलवे के साथ साझा किया है जो कि लोगों के जीवन का अभिन्न अंग बन गई है। जोशी ने कहा, ‘मेट्रो रेल के नेटवर्क को बढ़ाने का कार्य जारी है और दो से तीन वर्षों के भीतर मेट्रो के नए मार्गों पर परिचालन शुरू हो जाएगा।’

सरस्वती बाई, जिन्होंने पति दादा साहब फाल्के की सफलता को आधार दिया

भारतीय सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित दादासाहेब फाल्के पुरस्कार दादा साहेब फाल्के के नाम पर दिया जाता है। दादा साहेब को भारत में पहली फिल्म- राजा हरिश्चंद्र बनाने के लिए जाना जाता है। लेकिन उनके इस मुश्किल सफर में उनके लिए छांव बनने वालीं उनकी पत्नी सरस्वतीबाई को कम ही लोग जानते हैं।

19 साल छोटी लड़की से की थी दूसरी शादी
फाल्के ने स्कल्पचर, इंजीनियरिंग, ड्रॉइंग, पेंटिंग और फोटोग्राफी की पढ़ाई की थी। 1899 के प्लेग में उनकी पहली पत्नी की मौत हो गई थी। 1902 में उन्होंने 14 साल की कावेरीबाई से शादी की जिनका नाम बाद में सरस्वती बाई रखा गया। फाल्के 19 साल का उम्र का अंतर देखकर इस शादी के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन उन्हें अपने परिवार के दबाव के आगे झुकना पड़ा।

सरस्वती बाई ने प्रिंटिंग प्रेस का धंधा जमाने में की मदद
फाल्के ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में ड्राफ्टमैन की नौकरी की, राजा रवि वर्मा के प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी की। बाद में अपनी प्रिंटिंग प्रेस खोली तो सरस्वती बाई ने उसमें काफी मदद की। यह उस दौर की बात है जब महिलाओं का काम करना अच्छा नहीं समझा जाता था। लेकिन सरस्वतीबाई फाल्के के हर कदम पर साथ खड़ी रहीं।

दादा साहब फाल्के

सरस्वती बाई को पहली फिल्म देखकर लगा था- अजूबा हो रहा है
सरस्वती बाई ने पहली बार जब शॉर्ट मूवी- द लाइफ ऑफ क्राइस्ट देखी तो उन्हें यकीन नहीं हुआ कि चलते हुए चित्र देखना भी संभव है। दादा साहेब ने उन्हें ये फिल्म एक सरप्राइज के तौर पर दिखाई थी। बाद में वह सरस्वती बाई को प्रोजेक्शन रूम में भी ले गए और फिल्म की बारीकियां समझाईं। फाल्के ने उसी दिन फिल्म बनाने की ठान ली थी। इस विचार में उनके साथ खड़ी थीं तो केवल सरस्वतीबाई।

राजा हरिश्चन्द्र का एक दृश्य

दोस्तों ने कहा- पागल है फाल्के, सरस्वती बाई ने गहने बेचकर पूरे किए सपने
फाल्के के सारे रिश्तेदारों ने कहा कि उन्हें फिल्म बनाने का भूत सवार हो गया है। दोस्तों ने कहा कि उनका दिमाग फिर गया है और उन्हें पागल कहा जाने लगा। उनके विचार का मजाक उड़ाया जाता था। सरस्वती बाई ही थीं जो उनके साथ खड़ी रहीं। उन्होंने फिल्म बनाने के लिए अपने गहने भी बेच दिए थे। इसी पैसे से फाल्के ने जर्मनी से एक कैमरा खरीदा और फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखने लंदन भी गए।

तारामती के किरदार में अन्ना सालुंके

भारतीय सिनेमा की पहली सम्पादक, डेवलपर और प्रोडक्शन मैनेजर थीं
सरस्वती बाई की उम्र तब महज 20 साल थी। ऐसे में वह भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म फाइनेंसर थीं। यही नहीं, उन्होंने फिल्म के सम्पादन, डेवलपर और प्रोडक्शन मैनेजर का भी काम किया। तब फिल्म की रील को डेवलप करने में खासी मेहनत लगती थी। इसके अलावा वह पूरी फिल्म की यूनिट यानी 60-70 लोगों का खाना भी अकेले ही बनाती थीं। इन सब कामों के साथ-साथ वह अपने दो बच्चों की सारी जरूरी जिम्मेदारियां भी उठा रही थीं।

फिल्म में काम करने से किया इन्कार
जब फिल्म- राजा हरिश्चन्द्र में तारामती के किरदार के लिए कास्ट करने की बारी आई तो सारी स्टेज आर्टिस्ट ने हाथ खींच लिए। तब लोगों में ये मान्यता थी कि कैमरे से फोटो खींचते समय आपकी आत्मा का एक अंश भी उसकी रील में कैद हो जाता है। इससे इंसान की जल्दी मौत हो जाती है। इसलिए कोई भी अभिनेत्री रोल के लिए तैयार नहीं हुई। थक-हारकर फाल्के ने सरस्वती बाई से कहा लेकिन वह भी पीछे हट गईं। बाद में इस फिल्म को अन्ना सुलंके नामक पुरुष ने निभाया।इस पर भी फाल्के ने 95 फिल्में और 26 से ज्यादा शॉट फिल्में बनाई हैं। राजा हरिश्चंद्र तीन मई 1913 को मुंबई के कॉरनेशन सिनेमा हॉल में पहली बार दिखाई गई। करीब 40 मिनट लंबी यह फिल्म इतिहास में दर्ज हो गई, लेकिन इसके निर्माण के हर पहलू के पीछे मजबूती से खड़ी रहीं सरस्वतीबाई के नाम पर कोई पुरस्कार, सम्मान नहीं है और न ही उन्हें कोई जानता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

 

घर की रसोई को बनाइए बच्चों का क्लासरूम

जिस उम्र में बच्चों का दिमाग़ तेज़ी से विकास कर रहा होता है, अगर उस समय उन्हें कुछ सिखाया जाए, या उनकी रुचि को तराशा जाए, तो वे ना सिर्फ तेज़ दिमाग़ इंसान बनेंगे बल्कि नए प्रयोगों को करने में उनकी रुचि भी बनेगी। यह वे गुण हैं, जो जीवन में उनके बहुत काम आएंगे। रसोई घर में काम करके उन्हें यह सहजता से मिल जाएंगे। सामान्य ज्ञान, विज्ञान की समझ, गणित को बुनियादी मज़बूती तो ख़ैर मिलेगी ही। अगर आप हैरान हैं, तो जानें कि 3 से शुरु करके बच्चों के साथ अभिभावक हफ्ते में एक या दो बार अगर रसोई के कामों में मदद लें, तो इन लक्ष्य को पाया जा सकता है।
आकार-स्वाद की समझ
रोटी गोल होती है और समोसा त्रिकोण होता है, ये आकार बच्चा रसोई घर में आसानी से सीख सकता है। तीखा क्या है, मीठा क्या है, ये भी जानेगा। खाना बनाते हुए आकार के नाम लें, जैसे गोल रोटी, चौकोर पराठा आदि। इसके अलावा भिंडी गोल या लंबी, आलू मोटा या छोटा काटते हुए आकार समझाए जा सकते हैं।

शब्द और भाषा का विकास
6-8 साल की उम्र से बच्चा जब व्यंजन विधि पढ़ता है और बारी-बारी क्या करना है, यह बताता जाता है, तो उसे वस्तुओं के बारे में जानकारी मिलती है। सामग्रियों के बीच अंतर पहचानकर उनके नाम और अंतर याद रखता है, जैसे कि सफ़ेद नमक और काले नमक के बीच का अंतर। इससे बच्चा नए शब्द भी सीखता है। वहीं जब रेसिपी की हर स्टेप पढ़कर खाना बनाने में मदद करता है, तो उसकी भाषा का विकास होता है। जब बच्चे के साथ खाना बनाएं, तो उससे पूछें कि अगला क़दम क्या होगा। इस तरह वह योजना बनाना, समय का सही इस्तेमाल और व्यंजन विधि का सही अनुपालन करना सीखेगा। जब तक खाना बन नहीं जाता, तब तक धैर्य भी रखना होगा। इससे ध्यान और सब्र दोनों गुणों का विकास होगा।

व्यावहारिक गुण बेहतर होंगे
दस साल से बड़ी उम्र के बच्चों के लिए सामग्रियां मिलाना, आटे की लोइयों को बेलना बच्चों के हाथों को मज़बूत और नियंत्रित करता है, जैसे वो जानेगा कि हाथों का कितना ज़ोर लगाकर बेलना है और सही आकार कैसे लाना है। आंखों और हाथों का समन्वय कौशल किसी चीज़ को बेलने, मिलाने और फैलाने से विकसित होते हैं।

अंकों का ज्ञान
नाप-तौल सीखना तो स्वाभाविक ही है। आप जब बच्चे से आटा बोल में डालने के लिए कहें, तो साथ में कप की गिनती भी करें। हर बार जब आप कप या चम्मच से सामग्री निकालें तो ज़ोर से गिनें। 5 साल से ऊपर के बच्चे को शुरुआती जोड़-घटाना समझा सकते हैं। थोड़े बड़े बच्चे नापकर व्यंजन बनाने के स्वाद पर असर को समझ जाएंगे।

जो पसंद है वही कराएं
आमतौर पर बच्चों को चीज़ों को काटना और गैस जलाने जैसे काम ही पसंद आते हैं। अगर बच्चा किसी ज़िद का बहाना बनाकर रसोई से जाने का रास्ता ढूंढे, तो उसे उसकी दिलचस्पी का काम दे दें, जैसे कि बिस्किट केक बनाना। बच्चे के साथ उनका पसंदीदा भोजन बनाएं। उनसे कहें कि अगर तुम्हें ये खाना है, तो अंत तक ध्यान देना होगा।

भावनात्मक विकास
हाथों से खाना पकाने की गतिविधियां बच्चों में भरोसा और कौशल पैदा करने में मददगार होती हैं। रेसिपी सीखने से बच्चों को स्वतंत्र बनने की भी प्रेरणा मिलती है। इससे उन्हें निर्देशों पर अमल करने और समस्या सुलझाने की क्षमता विकसित करने की भी सीख मिलती है। दूसरों के लिए खाना बनाने से उनके प्रति प्रेम भाव भी विकसित होगा।
(साभार – दैनिक भास्कर)

नारियल के खोल से बनाती हैं किचेनवेयर, अब है लाखों का व्यवसाय

तिरुअनन्तपुरम : केरल को उसकी प्राकृतिक खूबियों के चलते ‘ईश्वर का देश’ कहते हैं। यहां नारियल की पैदावार देश में सबसे ज्यादा होती है। जहाँ नारियल का बेकार पदार्थ निकलता है। इसी वेस्ट को बेस्ट तक ले जाने के लिए केरल की मारिया ने किचनवेयर बनाने का स्टार्टअप ‘थेंगा’ नाम से शुरू किया है। तकरीबन जीरो निवेश से शुरू हुए इस स्टार्टअप से हर महीने 3 लाख रुपए का वे व्यवसाय कर रही हैं। हैंडमेड मेड और इको फ्रेंडली प्रोडक्ट होने के कारण इसकी डिमांड देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी हर साल बढ़ रही है। इतना ही नहीं इस स्टार्टअप के जरिए कई कारीगरों को रोजगार के साथ परम्परा गत हस्तशिल्प को भी बढ़ावा मिल रहा है। 26 साल की मारिया कुरियाकोस केरल की त्रिशूर की रहने वाली हैं। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स करने के बाद मुम्बई में 2 साल तक एक कॉरर्पोरेट कंपनी में काम किया और उसके बाद व्यवसाय करने के लिए नौकरी छोड़ केरल वापस आ गयी।
मरिया बताती हैं कि पढ़ाई के बाद मैं अपना कारोबार शुरू करना चाहती थी। एक ऐसा कारोबार, जो मेरी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हो साथ ही इको फ्रेंडली भी हो। मैं केरल में रहती हूं जहां देश में सबसे ज्यादा नारियल का उत्पादन होता है। तो मैंने सोचा क्यों न नारियल से ही जुड़ा कोई काम करूं और इस तरह ‘थेंगा’ स्टार्टअप की शरुआत हुई।
मलयालम में ‘थेंगा’ शब्द का अर्थ नारियल होता है। जो बहुत ही यूनीक है, क्योंकि खाना बनाने से लेकर दवाइयां, ईंधन, पारम्परिक घर बनाने में किसी न किसी तरह नारियल पेड़ के हर हिस्से का इस्तेमाल किया ही जाता है। नारियल तेल की फैक्ट्री से निकले हुए वर्ज्य पदार्थों से आइडिया आया। मारिया कोकोनट वेस्ट से करीब दो दर्जन वैराइटी के प्रोडक्ट तैयार कर रही हैं। ये सभी प्रोडक्ट लकड़ी से बने प्रोडक्ट की तरह ही दिखते हैं।
मारिया कोकोनट वेस्ट से करीब दो दर्जन वैराइटी के उत्पाद तैयार कर रही हैं। ये सभी प्रोडक्ट लकड़ी से बने उत्पाद की तरह ही दिखते हैं। मारिया ने स्टार्टअप शुरू करने से पहले कई उत्पादों पर रिसर्च किया। स्थानीय लोगों से बात की। कुछ उनकी भी राय जानी। नारियल से सामान तैयार करने वाली कई फैक्ट्रियों में भी गयीं और वहाँ से उन्हें आइडिया मिला।
मारिया बताती हैं कि नारियल खोल की कई खूबियां हैं। जैसे ये काफी ठोस और टिकाऊ होता है। बहुत पहले, केरल के आसपास के कई कारीगर नारियल खोल का इस्तेमाल खाना परोसने वाली करछी बनाने के लिए किया करते थे जो आज कम हो गये हैं।
नारियल तेल फैक्ट्री में नारियल को निकालने के बाद बड़ी मात्रा में खोल को फेंक दिया जाता है। जो पूरी तरह बेकार हो जाता है। मारिया ने इसी से किचन वेयर प्रोडक्ट बनाने का काम किया। अब तक हजारों नारियल के खोल से किचन वेयर बनाये गए हैं। जिनकी माँग देश विदेश हर जगह बढ़ रही है।
मरिया को उनके स्टार्टअप में माता-पिता दोनों का बहुत सहयोग मिला। हर नई शुरूआत की तरह मरिया का भी सफर आसान नहीं था, लेकिन उनके पिता ने ऐसे कारीगरों को ढूंढ़ा जो इस तरह का काम करने लायक थे। मारिया ने कहा, ‘नारियल खोल को किचनवेयर में बदले के लिए कुछ मुझे मशीनों की जरूरत थी जो शेल को अंदर और बहार से चिकना कर सकें और इसमें मेरे पापा ने मदद की। मरिया के पिता, कुरियाकोस वरू (65), पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं। उन्होंने हार्डवेयर स्टोर से स्पेयर पार्ट्स खरीदकर कुछ ही दिनों में कोकोनट शेल को चिकना करने के लिए जरूरी सैंडिंग मशीनों को बनाया। घर में पड़ी एक हैंडहेल्ड ड्रिल से बफर और डिस्क सैंडर जैसी फिटिंग्स बनाई। जबकि मरिया की मां, जॉली कुरियाकोस (63) ने बैकयार्ड और पास की एक ऑयल मिल से अलग-अलग आकार के कोकोनट के गोले इकट्ठा करने में मदद की।
मारिया कहती हैं कि थेंगा के प्रोडक्ट्स दिखने में काफी हद तक वुडन प्रोडक्ट्स जैसे ही दिखते हैं, पर इन्हें बनाने में किसी भी तरह से प्रकृति को नुकसान नहीं होता है। ऐसे में कोकोनट शेल से बने किचन वेयर, लकड़ी के बर्तनों का अच्छा विकल्प बन सकते हैं। इससे किचन वेयर टिकाऊ तो होते ही हैं। इसके अलावा समय के साथ ये और सुन्दर दिखने लगते हैं। सभी उत्पादों को कारीगर हाथ से बनाते हैं। किसी भी तरह का केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता। प्रोडक्ट में चमक के लिए नारियल तेल से ही घिसाई की जाती है। इस तरह हमारा प्रोडक्ट 100% होम मेड और इकोफ्रेंडली है। वे बताती हैं कि हम अपने काम को और बढ़ने के लिए श्रीलंका और अंडमान और निकोबार से नारियल के बड़े खोल मंगा रहे हैं ताकि बड़े बर्तन बना सकें।
मरिया बताती हैं कि हमने व्यवसाय की शुरुआत कुछ ही उत्पादों के साथ की और धीरे धीरे काम बढ़ता गया। आज हमारे पास कप, बाउल, कटलरी, कैंडल स्टैंड , कुकिंग स्पून सहित करीब 23 उत्पाद हैं जो ऑनलाइन मिलते हैं। हर साल लोगों की डिमांड बढ़ती ही जा रही है। भारत के साथ-साथ अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, दुबई और कुवैत सहित कई देशों में हम अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग कर रहे हैं। इसके साथ ही हमने तकरीबन 16 कारीगरों को रोजगार दिया है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

2 दोस्तों ने शुरू किया फूड फॉरेस्ट, टर्नओवर 15 करोड़, दिये 200 रोजगार

आईआईटी से पढ़े दोस्तों ने ‘बीफॉरेस्ट’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया है। जहां लोग नेचर में रहने के साथ परमाकल्चर फार्मिंग, यानी एक ही फार्मिंग लैंड पर एक साथ फल, सब्जियां, मसाले और अनाज उगा रहे हैं। इस अनूठे स्टार्टअप से पर्यावरण को तो फायदा हो ही रहा है। साथ ही उनकी अच्छी कमाई भी हो रही है। दोनों दोस्त सालाना 15 करोड़ रुपये का टर्नओवर कमा रहे हैं। इतना ही नहीं इस मुहिम के जरिए 200 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
37 साल के सुनीथ रेड्डी और 39 साल के शौर्य चंद्र हैदराबाद के रहने वाले हैं। सुनीथ ने कंप्यूटर साइंस की पढाई आईआईटी चेन्नई से की और शौर्य ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग IIT रुड़की से करने के बाद आईआईएम अहमदाबाद से मैनेजमेंट किया। इसके बाद दोनों ने इंटरनेशनल कंपनी में काम किया, जहां उनकी अच्छी खासी तनख्वाह थी, बावजूद इसके उन्होंने कुछ अलग और नया करने का प्लान किया।
शौर्य चंद्र कहते हैं, ‘मैं और सुनीथ 13 साल से एक साथ काम कर रहे हैं और हमें शुरू से प्रकृति से बहुत लगाव रहा है। इसलिए हमने सोचा कि एक ऐसा काम शुरू कि जाए जो प्रकृति से जुड़ा हो। इस तरह से बीफारेस्ट स्टार्ट करने का आइडिया आया।’
सुनीथ बताते हैं स्टार्टअप का नाम ‘बी हैप्पी’ शब्द के तर्ज पर ‘बीफॉरेस्ट’ रखा। इसके पीछे हम लोगों को सन्देश देना चाहते हैं कि जिस तरह जीने के लिए खुश रहना जरूरी है उसी तरह प्रकृति के लिए जंगल और नेचुरल फार्मिंग भी जरूरी है। अगर प्रकृति से कुछ लेना है तो उसके साथ तालमेल बना कर रखना जरूरी है।
बीफॉरेस्ट में एक साथ एक ही जमीन पर कई तरह के फसलें उगाई जा सकती हैं। यानी फल, सब्जियां, मसाले, अनाज हर तरह की फसलों का लाभ लिया जा सकता है। बीफॉरेस्ट में एक साथ एक ही लैंड पर कई तरह के फसलें उगाई जा सकती हैं। यानी फल, सब्जियां, मसाले, अनाज हर तरह की फसलों का लाभ लिया जा सकता है।
शौर्य बताते हैं, “हमने स्टार्टअप से पहले रिसर्च किया, जिसमें पता चला बड़े किसानों की तुलना में छोटे किसानों को फार्मिंग से ज्यादा फायदा नहीं हो पता है। उसके कई कारण हैं- जैसे छोटे लैंड पर एक ही तरह की फसलों की फार्मिंग करना या मार्केट में उनकी फसलों का सही कीमत न मिलना। सभी के लिए बड़ी जमीन खरीद कर उस पर खेती करना संभव भी नहीं है। तब हमने छोटे-छोटे किसानों को एक साथ जोड़कर खेती करना शुरू किया।”
कन्वेंशनल फार्मिंग में एक ही तरह की फसल एक ही खेती योग्य जमीन तैयार की जाती है। जहां ज्यादा से ज्यादा उत्पाद के लिए केमिकल और पेस्टिसाइड्स के का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि ‘परमाकल्चर’ इससे बिलकुल अलग है। परमाकल्चर में एक ही साथ एक ही फार्मिंग लैंड पर कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं। इसमें केमिकल और पेस्टिसाइड का इस्तेमाल नहीं होता है। सुनीथ बताते हैं, “परमाकल्चर का सबसे बड़ा फायदा ये है कि एक फसल का बाई- प्रोडेक्ट दूसरी फसल को जल्दी उगाने में मदद करता है। इस तरह की फार्मिंग में फसलों को बाहर से न ही किसी तरह के केमिकल की जरूरत होती है और न ही मिट्टी का पोषण खत्म होता है। जैसे पेड़-पौधे प्रकृति से पोषण लेकर खुद ही बढ़ते हैं, वैसा ही परमाकल्चर में भी होता है।”
इसमें बहुत ही कम लागत में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है। यहां कम संसाधन में प्राकृतिक रूप से फसल उगाया जा सकता है। सबसे अच्छी बात है कि साल भरा फार्मिंग लैंड पर किसी न किसी फसल का उत्पादन होता रहता है।
बीफारेस्ट में कई लोग जुड़ कर एक बड़ा फार्मिंग लैंड खरीदते हैं। फिर एक साथ बहुत ही कम लागत में ज्यादा से ज्यादा फसलों का उत्पादन किया जाता है। बीफारेस्ट का लैंड दिखने में किसी फारेस्ट की तरह ही दिखेगा। एक फूड फारेस्ट जहां जामुन, कटहल, संतरा, चेरी, कॉटन सिल्क, काली मिर्च और कॉफी सहित कई और फैसले उगाई गई होंगी। इस मुहिम से कोई भी जुड़ सकता है। सभी को शेयर भी बराबर का मिलता है।
सुनीथ बताते हैं,“पहले प्रोजेक्ट में शौर्य के अलावा, कुछ और लोग बीफॉरेस्ट से जुड़े थे। फार्मिंग के लिए हैदराबाद से पास किसी गांव में जमीन तलाशना शुरू कर दिया। हम सभी ने एक साथ जमीन के छोटे-छोटे हिस्सों पर काम करना शुरु कर दिया। पहले प्रोजेक्ट का रिजल्ट अच्छा रहा तो हमने अपने काम को और बढ़ाया। एक साल में हमारे प्रोजेक्ट में से काफी लोग जुड़ गए और धीरे-धीरे काम बढ़ता ही जा रहा है। फिलहाल बीफॉरेस्ट के चार प्रोजेक्ट हैदराबाद, मुंबई, कूर्ग और चिकमंगलूर में तकरीबन 500 एकड़ जमीन पर चल रहा है। जिसमें सुनीथ और शौर्य के साथ हर प्रोजेक्ट में अलग अलग साझेदार हैं।
प्रकृति के बीच रह कर प्राकृतिक संसाधनों की मदद से खेती होती है। ऐसे कई लोग हैं जो शहर की जिन्दगी छोड़, प्रकृति के नजदीक रहना चाहते हैं। यह स्टार्टअप उन्हें जंगल में रहने के साथ साथ कमाई करने में भी मदद मदद करता है। यहां पेड़-पौधे और फसल तो हैं हीं इसके अलावा घर भी परम्परागत तरीके से बने हैं जो पूरी तरह इको- फ्रेंडली होते हैं।
शौर्य ने कहते हैं, ‘हम यहाँ स्थानीय लोगों के साथ मिलकर काम करते हैं। इसलिए जो भी साझेदार गाँव में आकर रहना या काम करना चाहता है, वो इस बात का ध्यान रखता है कि यहां के लोग और उनके कल्चर को बढ़ावा मिले।’ सब एक साथ मिलजुल कर काम करते हैं
बीफॉरेस्ट में जमीन किसी एक व्यक्ति के पास न होकर परियोजना में शामिल सभी साझेदारों की होती है। सभी ग्रुप में मिलजुल कर काम करते हैं। एक ग्रुप के जरिए सभी किसानों को कैसे और क्या करना है, इसकी जानकारी दी जाती है। साथ ही खेती से होने वाली कमाई को कैसे आपस में बांटना है ये भी तय किया जाता है। शौर्य बताते हैं, “बीफारेस्ट स्थानीय किसानों को उनकी खेती की सही कीमत दिलाने और उन्हें सही बाजार में ले जाने में भी मदद करता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

18 साल के अस्थमा मरीज ने बनाया बेहद सस्ता एयर प्यूरीफायर

पढ़ाई के साथ अब  लाखों का कारोबार

नयी दिल्ली : दिल्ली दुनिया के उन शहरों में शुमार है, जहां एयर क्वालिटी बहुत खराब है। ज्यादातर घरों में एयर प्यूरीफायर लगाना मजबूरी है, लेकिन महंगा होने के कारण सभी इसे अफोर्ड नहीं कर पाते हैं। इस परेशानी को देखते हुए दिल्ली के रहने वाले कृष ने दुनिया का पहला इको-फ्रेंडली एयर प्यूरीफायर बनाया है जो 100% स्वदेशी भी है। कृष ने दूसरों की मदद करने के मकसद से मात्र 18 साल की उम्र में स्टार्टअप की शुरुआत की और अपने ब्रांड का पेटेंट करा कर उसका ट्रेडमार्क भी ले लिया। कृष आज पढ़ाई के साथ लाखों का कारोबार सम्भाल रहे हैं और उन्होंने कई लोगों को रोजगार भी दिया है। आज इनके ब्रांड का प्यूरीफायर पूरे देश में बिक रहा है। दो साल में हजारों प्यूरीफायर बेचने के अलावा उन्होंने इसे कई जरूरतमंदों को दान भी किया है।
20 वर्षीय कृष चावला दिल्ली के रहने वाले हैं। कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। फिलहाल कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से आगे की पढ़ाई कर रहे हैं। बचपन से कृष को अस्थमा की बीमारी थी, जिसकी वजह से उन्हें सांस लेने में काफी दिक्कत होती थी। दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता की वजह से उन्हें घर में भी मास्क और नेबुलाइजर की जरूरत पड़ती थी। कृष बताते हैं, “मैं घर के बाहर मास्क के बिना नहीं जा सकता था। मुझे कई बार अस्थमा का दौरा भी आया। मेरी सेहत की वजह से मेरे घर में हमेशा प्यूरीफायर ऑन रहता था, ताकि मैं बीमार न हो जाऊं। एक दिन मैं संयोग से प्यूरीफायर को खोल दिया, तब मुझे पता चला कि इसे बनाना तो आसान है। मेरे घर में जो प्यूरीफायर लगा था, वह काफी महंगा था। मैं इंजीनियरिंग का विद्यार्थी था तो मुझे मशीनों के बारे में पता है और तब मुझे आइडिया आया की सस्ता प्यूरीफायर भी बनाया जा सकता है।”

कई बार खारिज होने के बाद के बाद बनाया प्यूरीफायर
बाजार में मिलने वाले ज्यादातर एयर प्यूरीफायर महंगे होते हैं, जिसे सब खरीद नहीं सकते। कृष के अनुसार प्यूरीफायर में लगने वाले पार्ट बहुत महंगे नहीं होते हैं, बावजूद इसके बाजार में मिलने वाले ज्यादातर प्यूरीफायर काफी महंगे होते हैं। कृष ने मात्र 18 साल की उम्र में ये तय किया कि वो देश में ही सस्ता और अच्छा प्यूरीफायर बनाएंगे।
2017 में एयर प्यूरीफायर बनाने की शुरुआत की गई, जिसमें कुछ खास बातों पर ध्यान दिया गया। शुरुआत में प्यूरीफायर के तकरीबन 320 प्रोटोटाइप बनाए, लेकिन इनमें से कोई भी बाजार के पैमानों पर खरा नहीं उतरा। इस काम में कृष के पिता ने भी उनका साथ दिया और आखिरकार कई महीनों की मेहनत के बाद फाइनल प्रोटोटाइप तैयार किया गया जिसे ‘ ब्रेदिफाई’ नाम से पेटेंट भी कराया और उसका ट्रेडमार्क भी लिया।
कृष बताते हैं ,”मेरे पास आईडिया तो था लेकिन किसी तरह का अनुभव नहीं था। जिस तरह का एयर प्यूरीफायर मैं बनाना चाहता था उसके लिए मुझे लगातार दो साल तक मेहनत करनी पड़ी और 2019 में ‘ ब्रेदिफाई’ ’ को लोगों तक पहुंचने में कामयाब रहा।”
कृष का एयर प्यूरिफायर दुनिया का पहला इको-फ्रेंडली प्यूरीफायर है जो 98% प्लास्टिक फ्री है। इसे अल्ट्रा-ड्यूरेबल कंप्रेस्ड लकड़ी से बनाया गया है। कृष बताते हैं कि प्यूरीफायर बनाने का मकसद ही लोगों को कम कीमत में प्यूरीफायर देना था वो भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना। कृष ने प्यूरीफायर बनाने के लिए कुछ पैमाने तय किये जैसे प्यूरीफायर की कीमत दूसरे ब्रांड की तुलना में बहुत कम और क्वालिटी अच्छी होनी चाहिए। इसके अलावा प्लास्टिक का इस्तेमाल न के बराबर हो, ताकि पर्यावरण को भी सुरक्षित रहे।
कृष बताते हैं, “मैंने अपने ब्रांड में ‘रिवर्स एयर तकनीक’ का इस्तेमाल किया है। जिससे हवा ज्यादा से ज्यादा शुद्ध होती है। साथ ही इसमें हाई ग्रेड हेपा (एचईपीए) फिल्टर का इस्तेमाल हुआ है। इसमें तीन तरफ से हवा अंदर जाती है और शुद्ध होती रहती है। इसलिए आप इसे कहीं भी रखें, यह अपना काम करता रहेगा। यह सभी तरह के हानिकारक प्रदूषकों से आपको सुरक्षित रखता है।”
कृष ने स्टार्टअप की शुरुआत एक लाख की लागत से छोटे स्तर पर की और आज इ-कॉमर्स के जरिये अपने उत्पाद को पूरे देश में बेच रहे हैं। यही नहीं कम उम्र में तकरीबन 10 लोगों को रोजगार भी दिया है।
कृष का मकसद स्टार्टअप से लोगों की मदद करना था और वो ये करने में कामयाब भी रहे। कृष बताते हैं, “ज्यादातर ब्रांडेड प्यूरीफायर के बेसिक मॉडल की शुरुआत 15 हजार से होती है और एक लाख रुपये तक जाती है। मार्केट में ज्यादातर बिकने वाले प्यूरीफायर 30-40 हजार के होते हैं, जबकि हमारे यहां बेसिक मॉडल 4 हजार का है। ज्यादातर हमारे ब्रांड के बिकने वाले प्यूरीफायर 4 से15 हजार के होते हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं की हमारा ब्रांड मार्केट में कितना किफायती है। इसके अलावा हमारे सभी प्यूरीफायर स्वदेशी हैं और इसलिए अगर किसी भी ग्राहक को बाद में प्यूरीफायर का फिल्टर बदलना हो तो हम तुरंत उपलब्ध करा देते हैं।”

तकरीबन 4500 प्यूरीफायर बेच चुके हैं और 500 दान भी किए
कृष का स्टार्टअप 2019 में शुरू हुआ था, लेकिन 2020 में उन्हें बाजार से अच्छा प्रतिसाद मिला शुरू हुआ। कृष बताते हैं अब तक 5500 से ज्यादा एयर प्यूरीफायर की बिक्री हो गई है। साथ ही उन्होंने 500 से ज्यादा एयर प्यूरीफायर दिल्ली के हॉस्पिटल, स्कूल, अनाथालय और सामाजिक संगठनों को दान भी दिए हैं। कृष कहते हैं, “मेरा उद्देश्य देश में ज्यादा से ज्यादा मध्यमवर्गीय परिवारों को एयर प्यूरीफायर बेचना है, ताकि कोई भी वायु प्रदूषण की वजह से बीमार न पड़े। मैंने खुद ये तकलीफ झेली है और इसलिए मैं जानता हूं कि एयर प्यूरीफायर होना कोई लग्जरी नहीं बल्कि जरूरत है। ऐसे में इसकी कीमत कम होनी चाहिए।” कृष के इस इनोवेशन और स्टार्टअप को नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने भी सराहा है। अमिताभ ने अपने ट्विटर पर कृष के बारे में ट्वीट कर लिखा था कि युवा उद्यमी कृष चावला 100% मेड इन इंडिया एयर प्यूरीफायर बना रहे हैं, जो प्लास्टिक फ्री है। यह आत्मनिर्भर भारत की तरफ एक बेहतर कदम है।

(साभार – दैनिक भास्कर)