कोलकाता : भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज की एनसीसी टीम के विद्यार्थी कैडट राज तिवारी, कैडट शिवनाथ सोमवंशी और कैडट अंजलि कुमारी का चयन दिल्ली में 26 जनवरी 2022 में होने वाले गणतंत्र दिवस की परेड में हुआ है। जहाँ वे भारत के प्रधानमंत्री को गॉर्ड ऑफ ऑनर देगें।
पश्चिम बंगाल और सिक्किम निदेशालय इंटरग्रुप प्रतियोगिता (आईजीसी कल्याणी) – 2021 में
एनसीसी का सबसे प्रतिष्ठित शिविर गणतंत्र दिवस शिविर है, जो 26 जनवरी दिल्ली के लिए आयोजित किया जाता है । आरडीसी के लिए इस चयन प्रक्रिया में लगभग 4 महीने लगते हैं, जिसमें एनसीसी के कैडट पूरे समय कठोर अभ्यास करते है, इतना ही नहीं इसमें केडेट की चयन प्रक्रिया में कई मानदंड होते हैं जिसमें ऊंँचाई सहित कई मानदंड हैं -उनके वजन, अनुपात, नेतृत्व गुण, असर, सामान्य बुद्धि स्तर आदि विभिन्न क्रियाएँ देखी जाती है जो चयन प्रक्रिया के दौरान जांँचे जाते हैं।
आरडीसी 2022 के लिए, भवानीपुर कॉलेज के – एयर और आर्मी विंग के कैडेट्स ने इसके लिए अभ्यास किया।
जुलाई माह से इकाई स्तर, समूह स्तर एवं निदेशालय स्तर चयन आदित्य और अरित्रिका के मार्गदर्शन में हुआ, जिन्होंने स्वयं आरडीसी में भाग लिया था क्रमशः वर्ष 2018 और 2017में।
पूर्णतः समर्पण और कड़ी मेहनत के साथ कैडेट अंडर ऑफिसर गौरव शशि शर्मा, कैडट राज तिवारी, कैडट अंजलि कुमारी, कैडट सबिहा नूर और कैडट शिवनाश सोमवंशी ने आईजीसी कल्याणी के लिए क्वालीफाई किया है। अब उनके लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं पश्चिम बंगाल और सिक्किम निदेशालय की टुकड़ी में चयन जो कि आरडीसी दिल्ली, 2022 में हमारे राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। कैडट राज तिवारी, कैडट शिवनाथ सोमवंशी और कैडट अंजलि कुमारी का चयन प्रधानमंत्री को सलामी देने के लिए चयनित किया गया है। सीडीटी अंजलि कुमारी महिला एयर विंग 29.10.2021 को सर्वश्रेष्ठ ड्रिल के लिए चुनी गयी। कैडट सबीना नूर बेस्ट कैडट और कैडट अंडर ऑफिसर गौरव शशि शर्मा राष्ट्रीय स्तर पर स्केटिंग चैम्पियनशिप 2013 में चयनित हुए जिन्होंने डांस इवेंट 30.10. 2021 में द्वितीय स्थान प्राप्त किया।
कल्याणी एनसीसी ग्रुप कमांडर वारंट ऑफिसर अभिषेक कुमार सिंह, जिन्होंने आरडीसी 2021 में ड्रील में भाग लिया था और बेस्ट कैडट प्रतियोगिता में एनसीसी अकादमी कल्याणी में जूनियर को प्रशिक्षण देने के लिए रखा गया जो उनके लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। भवानीपुर कॉलेज की एनसीसी समन्वयक प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी और डीन प्रो दिलीप शाह तथा मैनेजमेंट के पदाधिकारियों ने सभी चयनित कैडट को बधाई और शुभकामनाएं दी। यह जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
कोलकाता : बंगीय हिंदी परिषद के कक्ष में युवाओं की संस्था ‘भावधारा’ ने अपना दूसरा ओपन माइक कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम उन युवाओं के लिए था जिन्हें मंच और मौके की तलाश रहती है।भावधारा अभिव्यक्ति को केंद्र में रख कर विविध भाषा और विधाओं को प्रस्तुत करती है। कार्यक्रम की शुरुआत उन दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि देकर की गई जिन्हें कोरोना ने अपने कोख में समा लिया। रचनाकारों और दर्शकों की सार्थक उपस्थिति के बीच निखिता पांडे, पार्वती शॉ, कौशिक दास, शालिनी सिंह, तियासा मंडल, अंकिता गुप्ता, ॠतिका साह, ब्यूटी कुमारी, संध्या चौरसिया, सागर शर्मा ‘आजाद’, रंजन मिश्रा , विश्वरूप साह ‘परीक्षित’ ने हिंदी और बांग्ला में काव्य पाठ तथा आवृत्ति किया, वहीं अनूप भदानी ने हास्य व्यंग्य सुनाया। नन्हीं कवियत्री कोमल शर्मा ने अपनी आवृत्ति से सभी को मंत्रमुग्ध कर लिया। भोजपुरी के युवा कवि-गीतकार दीपक सिंह, हिंदी के प्रतीक प्रवीण और उर्दू गज़लकार अमीर माविया और दीपक मालाकार ने अपने जौहर से समा बांधा। अपने साज और गीत से मो. आरिफ ने समा बांधा। शहर की प्रतिष्ठित गज़लकार निशा कोठारी जी की उपस्थिति से सभी युवाओं में काफी प्रसन्नता थी।
कार्यक्रम के संयोजन में स्नेहाशीष पांडे, विकास मिश्रा, अमन प्रसाद, मैथिली झा, राजेश सिंह, ज्वाला मुखी राम, गायत्री उपाध्याय तथा रजनीश मिश्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही। ‘भावधारा पूर्ण रूप से युवाओं द्वारा बनाई गई नई परिकल्पना है तथा हर उस व्यक्ति का सम्मान करती है जिसके पास भाव की सघन पूंजी है भले वह किसी भाषा और विधा में हो’ उक्त बातें बंगीय हिंदी परिषद के संयुक्त मंत्री रणजीत कुमार ‘संकल्प’, कवि रमाकांत सिन्हा और विनोद यादव ने समापन के दौरान कही। कार्यक्रम का संचालन भानु प्रताप पांडेय ने और धन्यवाद ज्ञापन अनूप यादव ने किया। अंत में बंगीय हिंदी परिषद के मंत्री डॉ राजेंद्र नाथ त्रिपाठी और अध्यक्ष डॉ राजश्री शुक्ला ने इस पहल की सराहना करते हुए आशीर्वाद संदेश भेजा।
कोलकाता : कोलकाता की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से साहित्य संवाद श्रृंखला के अंतर्गत काव्यपाठ का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से कवियों ने हिस्सा लिया। कवियों का स्वागत निखिता पांडे ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक डॉ शंभुनाथ ने कहा कविता लिखना-पढ़ना आदमी होना है। कविता ने हमेशा पृथकता और भेद के विरोध में मानवीय पहल की है।साहित्य संवाद के जरिए हम नई पीढ़ी में उतरोत्तर सृजनात्मक संस्कार निर्मित करना चाहते हैं। इस अवसर पर कश्मीर से चर्चित कवि अग्निशेखर ने अपनी कविताओं में विस्थापन की पीड़ा के कई चित्रों को उकेरा। उनकी कविताओं में मनुष्यता की गहरी बेचैनी दिखी।झारखंड से वरिष्ठ कवि उमरचंद जायसवाल ने अपनी कविताओं में प्राकृतिक बिम्बों के जरिए प्रेम और प्रतिबद्धता की बात कही। मृत्युंजय ने अपनी कविताओं के माध्यम से व्यवस्था पर करारा प्रहार किया। उन्होंने हाशिये पर खड़े किसानों की पीड़ा को व्यक्त किया। आरा से अरुण शीतांश ने अपनी कविताओं में मजदूरों,स्त्री और आम आदमी के जीवन की कथा को कविता कोलाज के रूप में स्वर दिया। भोपाल से जुड़ी चर्चित कवयित्री नीलेश रघुवंशी की कविताओं में हमारे समय का सच कई रूपों में व्यक्त हुआ। उनकी कविताओं में व्यवस्था को लेकर गहरा असंतोष भी दिखा। रेखा श्रीवास्तव की कविताओं में नैतिक मूल्यों के पतन को लेकर गहरी बेचैनी दिखी। सुरेश शॉ ने वर्तमान राजनीतिक विसंगतियों पर जोरदार प्रहार किया।हावड़ा हिंदी सेल के सचिव मानव जायसवाल की कविताओं में कलाकार की मृत्यु से उपजे असंतोष की नि:स्तब्धता के साथ राष्ट्र की प्रगति को लेकर एक क्षोभ दिखा। दिल्ली से जावेद आलम खान ने अपनी कविताओं में राजनीतिक स्वार्थपरता को बेनकाब करते हुए आदमियत को बचाने की प्रतिबद्धता दिखाई। आसनसोल से जुड़े रोहित प्रसाद पथिक की कविताओं में आदिवासियों की समस्याओं को लेकर एक असंतोष दिखा। तृषाणिता बनिक ने अपनी कविताओं में आम आदमी की बुनियादी जरूरत रोटी के जरिए अभावग्रस्त जीवन की विडंबनाओं का चित्र खींचा।
संस्था के संयुक्त सचिव संजय जायसवाल ने कहा कि साहित्य संवाद का यह मंच सृजनात्मकता के साथ सहयात्रा का मंच है। साहित्य को व्यापक समाज से जोड़ने के इस मुहिम में सबकी भागीदारी अपेक्षित है। इस अवसर पर भारी संख्या में साहित्य और संस्कृति प्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन राहुल गौंड़ ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन विनोद यादव और तकनीकी सहयोग मधु सिंह ने दिया।
उत्सवों का मौसम है और रोशनी का त्योहार मनाने के लिए हम तैयार हैं। इस बार दीपावली का बाजार पहले की तरह लगा और बाजारों में रौनक भी लौटी है। लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट देखना एक अच्छा अनुभव जरूर है मगर इस खुशी के पीछे जो भय है, उसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। खासकर जब बंगाल में कोरोना के मामले बढ़ रहे हों और देश के अन्य राज्यों में ऐसी ही स्थिति होने की आशंका मंडरा रही हो, फिर भी भय को मात देकर हम सामान्य होने का प्रयास कर रहे हैं। महामारी ने बगैर मास्क के प्रवेश की अनुमति नहीं जैसे बोर्ड तो लगवा दिये मगर मास्क नहीं लगाने की जिद भी हम हर ओर से देख रहे हैं। बंगाल में गुटखे पर पाबन्दी लगी है मगर यह पाबन्दी तो पहले से ही है, इसके बावजूद स्थितियों को देखकर लगता ही नहीं कि यहाँ पर प्रतिबन्ध जैसी कोई चीज ही नहीं है। सबसे जरूरी है आत्म अनुशासन, और यह अनुशासन भीतर से आना चाहिए। खुद को अनुशासित करना हमें खुद ही सीखना होगा, यह कोई सरकार या पुलिस हमें नहीं सिखा सकती। अगर हम अनुशासित होंगे, नियमों का पालन करेंगे तभी हमारे बच्चों की भी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। कोरोना के साथ इन दिनों अगर मीडिया में कोई चीज छायी है तो वह है आर्यन खान की गिरफ्तारी, जमानत और उसके पीछे हो रही सियासत। दुःख की बात यह है कि देश के दिग्गज मीडिया घरानों का बर्ताव आर्यन खान के अधिवक्ताओं जैसा हो गया है। इस देश में किंग खान के बेटे की तरह हजारों युवा नशे के साथ पकड़े जाते हैं, सजा काटते हैं और उनकी पैरवी करने वाला कोई नहीं होता। छोटे – मोटे अपराधों के लिए भी बच्चों को सलाखों के पीछे जाना पड़ता है लेकिन इन बच्चों के माता – पिता वीआईपी संस्कृति से नहीं हैं, इसलिए इनकी सुनवाई कहीं नहीं होने वाली। यह इस देश की न्याय व्यवस्था में व्याप्त वर्ग भेद को दर्शाता है।यह बहुत शर्मनाक स्थिति है क्योंकि इस बात का कोई मतलब नहीं है कि मीडिया के हर माध्यम में आर्यन खान को नायक और पीड़ित बनाकर पेश किया जाए। आखिर ऐसा दिखाकर युवा पीढ़ी को कौन सी राह दिखायी जा रही है। आर्यन पर कोई भी निर्णय अदालत का होगा, मगर एक बात तय है कि अगर एक अपराधी को बचाने के लिए ऐसी सियासत होगी तो देश का चौथा खम्भा अपनी विश्वसनीयता खो देगा और यही सबसे बड़ा संकट है..सम्भलिए और दीये के उत्सव में मन का दीया आलोकित कीजिए। आलोक पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ
धनतेरस का बाजार इस बार उद्योग जगत के लिए अच्छी खबर आया। पिछले वर्ष की तुलना में तो इस साल बाजारों में रौनक रही और आभूषणों की माँग में भी वृद्धि देखी गयी और नये स्टोर भी खुले। हरि कृष्ण समूह के एचके ज्वेल्स के निदेशक पराग शाह कहते हैं “आज, हम पिछले साल की तुलना में इस धनतेरस पर 22% ~ 25% की वृद्धि देख रहे हैं। धनतेरस के अवसर पर सोना खरीदना। दिन भाग्य और समृद्धि का प्रतीक है जो न केवल भारतीय परंपरा के लिए बल्कि हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। उपनगरीय इलाकों और छोटे शहरों से सोने की मांग भी आज अधिक है। साथ ही, दो साल की मानसिक चिंता और चुनौतियों के बाद, ग्राहक उत्सुक हैं। सोने, आभूषण और अन्य कीमती धातुओं में खर्च करने और निवेश करने के लिए। अक्टूबर 2021 में सातवें वेतन आयोग की घोषणा से डीए में बढ़ोतरी और दिवाली से पहले बकाया राशि में वृद्धि रत्न और आभूषण उद्योग के लिए अच्छी है। साथ ही, आगामी शादी के मौसम की भी संभावना है बदला लेने की खरीदारी देखें एचके ज्वेल्स प्राइवेट लिमिटेड पिछले साल की तुलना में इस धनतेरस पर 22% ~ 25% की खुदरा बिक्री में वृद्धि देख रहा है।
वहीं एच के ज्वेल्स ने बंगाल में भी अपने स्टोर खोलने शुरू किये हैं। कंपनी ने दार्जिलिंग में किसना स्टोर लॉन्च किया है जिसके मालिक हैं श्री अमित चौधरी और यह कंपनी का पश्चिम बंगाल में पहला फ्रेंचाइजी है। सिलीगुड़ी ज़िले में स्थित 700~800 वर्गफुट आकार के स्टोर में पैसों के लिए मूल्य और प्रीमियम सेगमेंट इन दोनों के हिसाब से कलेक्शन की एक वैविध्यपूर्ण रेंज प्रदर्शित की गई है। कंपनी के पास संपूर्ण भारत में 3400 से अधिक रिटेल स्टोर हैं।
पराग शाह कहते हैं कि छोटे शहरों में ब्रांडेड आभूषणों की माँग है।
इनमें से ज़्यादातर बाज़ार कार्यक्रम चालित खपत या उच्च रुप से व्यापक कंपनियों की मांग पूरी करते हैं लेकिन किसना किफायती और सुविधाजनक मूल्य पर रोज़मर्रा के आभूषण भी उपलब्ध कराएगी। किसना में हमने अच्छी तर डिज़ाइन की गई, किफायती लेकिन फिर भी महत्वाकांक्षी ज्वेलरी के कम सेवा प्राप्त सेगमेंट के लिए सेवा उपलब्ध कराके इस श्रेणी में अग्रणी बनने का लक्ष्य रखा है। एक समृद्ध विरासत का एक भाग होना, प्रापण, प्रक्रिया और डिज़ाइन में हमारी ताकत हमें एक ऐसी लाभ वाली स्थिति में लाती है जिससे हम आत्म-विश्वास की भावना के साथ कीमत को लेकर संवेदनशील और प्रीमियम ज्वेलरी श्रेणी दोनों में मार्गनिर्देशन कर सकते हैं। ”
सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, राजवंश की साहित्य- सेवी रानियों की शृंखला के अंतर्गत आज मैं आपका परिचय बाघेली विष्णुप्रसाद कुंवरि से करवाऊंगी। विष्णुप्रसाद कुंवरि बाघेल वंश की कन्या थीं इसीलिए इनके नाम के साथ बाघेली शब्द जुड़ा था। आप रीवां के महाराज रघुराजसिंह की पुत्री थीं। महाराजा रघुराज सिंह स्वयं हिंदी के प्रसिद्ध कवि के रूप में जाने जाते थे और उनके दरबार में बहुत से कवियों को आश्रय मिला था। वह अपनी वैष्णव भक्ति के लिए भी ख्यात थे। ऐसे कविह्रदय राजा की पुत्री के मन में काव्य- प्रेम का अंकुरण होना स्वाभाविक ही था। कवयित्री विष्णु प्रसाद कुंवरि का जन्म संवत् 1903 में हुआ था। संवत 1921 में इनका विवाह जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के छोटे भाई किशोर सिंह के साथ हुआ। पिता से इन्हें भगवद्भभक्ति और काव्यप्रतिभा दोनों ही विरासत में मिली थी। वैष्णव मत के प्रति समर्पित कवयित्री के इष्ट देव कृष्ण थे और वह अपना हस्ताक्षर “दीनानाथ” के नाम से करती थीं। इन्होंने जोधपुर में दीनानाथ का एक मंदिर भी बनवाया था। संवत 1955 में अपने पति की आकस्मिक मृत्यु से वह शोक- सागर में डूब गईं और अंततः भक्ति के द्वारा उन्होंने अपने जीवन की शून्यता को भरने का प्रयास किया। कृष्ण- भक्ति इनका सहारा बनी और इसके द्वारा वह सांसारिक- मानसिक कष्टों से मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़ीं। ह्रदय में संचित कविता का बीज अश्रुजल से पुष्पित हुआ और कृष्ण के प्रेम में डूबकर विष्णुकुंवरि कविताओं की रचना करने लगीं। इनके कुल तीन ग्रंथ बताएं जाते हैं- अवध- विलास, कृष्ण- विलास और राधा-रास- विलास। “अवध- विलास” में राजा रामचंद्र के चरित्र का वर्णन है और यह दोहा और चौपाई छंद में लिखा गया है। “राधा- रास -विलास” की रचना में गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग हुआ है। अतः इसे चंपू काव्य कहा जा सकता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसमें राधा का वर्णन किया गया है। “कृष्ण विलास” में कृष्ण की लीलाओं का अत्यंत सरस वर्णन हुआ हे। कानपुर से प्रकाशित होने वाले “रसिक मित्र” नामक पत्र में उनकी कविताएँ प्रकाशित होती थीं। “स्त्री कवि कौमुदी” में इनका जीवन- परिचय लिखने और इनकी कविताओं को संकलित वाले लेखक ज्योति प्रसाद मिश्र “निर्मल” इनकी काव्य- प्रतिभा पर इस प्रकार प्रकाश डालते हैं- “ग्रंथों को देखने से मालूम होता है कि इनकी कविता सुंदर, भगवद्भक्ति से परिपूर्ण होती थी।”
इनके ग्रंथ “अवध- विलास” का एक पद देखिए जिसमें कवयित्री ने वनवासी राम के जीवन का वर्णन किया है-
“आये प्रागराज में प्रभुवर, मुनिन कीन्ह प्रनामा।
चित्रकूट में फेर विराजे, निरख अनेक सुनामा।।
बन में बसे प्रभू लछिमन सँग, कैसा था वह देसा।
तहाँ सुपनखा आई छलकूँ, सुन्दर निरख रमेसा।।
आई कही राम की ओरा, भूल गई-मन मोरा।
रहूँ तुम्हारे घर में प्यारे, सुनो अवध -चित्त-चोरा।।
हँसे प्रभू सीता को लख के, बोले बैन गँभीरा।
हमरे नारी बड़ी सुन्दरी, जाओ लछिमन ओरा।।
जाके नारी नहीं है वाके, जाय घरे तुम रहहू।।
कुँवर बड़ो है रसिक लाडिली, मुदित मना हो रहहू।।
चली सुपनखा लछिमन ओरा, कहे वचन मुसुकाई।
राखो हमसी नारि सुन्दरी, हिल हिल रहो सदाई।।”
उपरोक्त पद को पढ़ते हुए यह साफ महसूस किया जा सकता है कि इसमें बहुत ज्यादा लालित्य या काव्यकौशल नहीं है लेकिन कथा को सहज ढंग से काव्यमयता के साथ प्रस्तुत करने की कला कवयित्री को अवश्य आती है।
“राधा- रास- विलास” से एक पद उद्धृत है जिसमें पावस ऋतु में वृंदावन की प्राकृतिक शोभा को वर्णित करते हुए कवयित्री ने अपने प्रेमानुराग को भी अभिव्यक्ति दी है। उन्हें काले बादलों में अपने आराध्य देव और प्रियतम कृष्ण का मुख नजर आता है-
“बृन्दावन पावस छायो।
चहुँ दिसि धार अम्बर छाये, नील मणि प्रिय मुख छायो।
कोयल कूक सुमन कोमल के कालिंदी कल कूल सुहायो।”
यमुना तट पर कृष्ण और गोपियों के बीच होनेवाली रासलीला का अत्यंत सरस चित्र उन्होंने उद्धृत पद में खींचा है जिसे रचते हुए कवयित्री तो आनन्द मग्न होती ही हैं, पाठक भी इस ह्रदयग्राही सरस पद को पढ़कर आनंद -सागर में गोते लगाने लगता है-
“जमना तट रंग की कीच बही।
प्यारेजी के प्रेम लुभानी आनंद रंग सुरंग चही।।
फूलन हार गुंथे सब सजनी, युगल मदन आनंद लही।
तन मन सुमरि भरमती विव्हल, विष्णु कुंवरि है लेत सही।।”
कृष्ण-राधा और गोपियों की लीला के अत्यंत जीवंत चित्र कवयित्री ने अपने पदों में खींचे हैं। होली प्रसंग के पद तो अत्यंत सरस बन पड़े हैं। कृष्ण की बाँसुरी पर केंद्रित पदों की रचना भी कवयित्री ने की है लेकिन रसखान के बाँसुरी प्रसंग की तरह यहाँ बाँसुरी के प्रति गोपी या राधा के असूया भाव का वर्णन नहीं हुआ है बल्कि प्रशंसा और प्रेम का मधुर स्वर गुंजरित होता है। जब कृष्ण से अथाह प्रेम है तो भला उनकी बाँसुरी से प्रेम क्यों नहीं होगा। देखिए-
“बाजैरी बँसुरिया मन-भावन की।
तुम हो रसिक रसीली वंशी अति सुन्दर या मन की।
या मुख लै वाको रस पीवै अंग- अंग सुखमा तन की।।
या मुख की मैं दासि चरन रज दोउ सुख उपजावन की।
शोभा निरखत सखि सबै मिलि विष्णुकुँवरि सुख पावन की।।”
विष्णुकुँवरि के कुछ पदों पर पूर्ववर्ती कवियों का प्रभाव भी लक्षित किया जा सकता है। उद्धृत पंक्तियों को पढ़ते हुए मीराबाई के पद (छांड़ दई कुल की कानि…) की याद स्वाभाविक रूप से ताजा हो जाती है-
“छोड़ि कुन कानि और आनि गुरु लोगन की, जीवन सु एक निज जाति हित मानी है।
दरस उपासी प्रेम- रस की पियासी वाके, पद की सुदासी दया दीठि की बिकानी है।।”
ऐसे ही एक और पद को पढ़ते हुए पद्माकर का पद (सुंदर सुरंग रंग शोभित अनंग अंग…) याद आता है-
“सुंदर सुरंग अंग अंग में अनंग धारो, जाके पद पंकज में पंकज दुखारो है।
कवयित्री के पदों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करने पर यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि उनका मन रामकथा से अधिक कृष्णकथा में रमा है। रामकथा के वर्णन में जहाँ कथा ही प्रधान है वहीं कृष्ण के प्रति कवयित्री का प्रेम, समर्पण, अनुराग, भक्ति आदि भाव अत्यंत मुखरता से व्यंजित हुए हैं। राधा- कृष्ण की प्रेम लीलाओं के सरस वर्णन के माध्यम से वह अपने जीवन के खोए हुए प्रेमिल क्षणों को पुनर्जीवित करती जान पड़ती हैं। कृष्ण और राधा की कथा में कल्पना का विलास भी है और प्रेमसिक्त भक्ति का सुवास भी। भाषा में सहज लालित्य आ जाता है और काव्यकला भी निखर उठती है। भाषा की सहजता इनकी कविता का एक विशेष गुण है जिससे कविता सीधे पाठक के मन में उतर जाती है और अपनी सरसता से स्थायी प्रभाव छोड़ने में भी सफल हो जाती है। कवयित्री विष्णुप्रसाद कुंवरि के पद साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं लेकिन हैरानी इस बात की है कि इनके रचनात्मक योगदान के विषय म़े भी हिंदी साहित्य की इतिहास की पुस्तकों में शायद ही कोई जिक्र मिले। जिस दौर में वह लिख रही थीं वह भक्ति का दौर भले ही नहीं था लेकिन उनकी भक्तिपरक रचनाओं में छिपी उनकी पीड़ा और व्याकुलता में उस भारतीय स्त्री की व्यथा को सहजता से महसूस किया जा सकता है जिसके पास भक्ति के अतिरिक्त दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता।
दीपावली पर घर को सुन्दर बनाना तो हम सभी की कोशिश रहती है और जरा सी तैयारी के साथ आप यह काम आसानी से कर सकते हैं। इसके लिए बस आस – पास की चीजों पर ध्यान देना जरूरी है, बस आप भी ध्यान दीजिए और घर सजाइए –
बंदनवार : दरवाजों पर लगाए जाने वाले वंदनवार या तोरण आपके घर की सुंदरता को बढ़ाते हैं। बाजार में कांच, कौड़ी, नारियल, ऊन, मोती से सजे बड़े ही खूबसूरत तोरण या वंदनवार मिलते हैं, जिन्हें सजाकर आप घर के प्रवेश द्वार को सुंदर और आकर्षक बना सकते हैं।
पर्दे, कुशन कवर : घर के जितने भी पर्दे या कुशन कवर हैं उन्हें ट्रेडीशनल लुक देकर सुदंर बना सकते हैं। जैसे चौड़ी बॉर्डर वाली साड़ी से बने पर्दे ना भी बनाएं तो साड़ी की बॉर्डर को पर्दे के किनारों पर स्टिच करवाकर पर्दे को नया लुक दे सकते हैं।
मिरर वर्क, थ्रेड वर्क व कच्छी कशीदे से सजे कुशन कवर त्योहारों के लिए बेस्ट हैं। पर्दे, कुशन कवर, टेबल क्लॉथ आदि में ग्लॉसी की बजाय कंट्रास्ट रंगों पर अधिक ध्यान दें। कलरफूल पैचवर्क वाले कुशन कवर और पर्दों के साथ मिरर वाले हेंगिंग्स इस दीपावली पर आपके कमरे की खूबसूरती में चार चांद लगा सकते हैं।
लाइट डेकोरेशन एवं कलर कॉम्बिनेशन : रोशनी के इस त्योहार पर लाइटिंग का कलर के साथ अरेंजमेंट करने से फेस्टिवल में घर को आकर्षक बना सकते हैं। इसके लिए आप दिवाली लैंप, स्काई कैंडल, वॉटर कैंडल, जेल कैंडल, फाइबर कैंडल या फ्लोटिंग कैंडल्स का उपयोग कर सकते हैं। घर की दीवारों के रंगों के लाइट शेड छोटे कमरे को बड़ा व डार्क शेड बड़े कमरे को छोटा करने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए रंगों के साथ लाइट का अच्छा कॉम्बिनेशन करें।
घंटियां : खुबसूरत और विभिन्न आकार एवं डिजाइन की मिट्टी या मैटल की घंटियों को खास जगहों पर हेंग करके कमरे को सुंदर बना सकते हैं। इन घंटियों को लगाकर आप अपने घर के माहौल को खूबसूरत और खुशनुमा बना सकते हैं।
मिट्टी के पात्र : अलग-अलग आकार व आकृति के मिट्टी तथा टेराकोटा के पात्र आपके कमरे की खूबसूरती में चार चांद लगा देंगे। आप इन्हें किसी टेबल पर सजा कर रख सकते हैं या घर के किसी कोने को इससे खूबसूरत बना सकते हैं। इसके अलावा हैंडीक्राफ्ट आइटम, मूर्तियां आदि से भी सजावट की जा सकती है।
इंडोर प्लांट्स : इन्डोर प्लांट्स से घर को डेकोरेट करके आप घर को और भी बेहतर ढंग से सुंदर बना सकते हैं। इन्डोर प्लांट लगे गमलों को अलग-अलग रंगों में रंगकर उसे मेहमानों के कमरे में रखें।
रंगोली या मांडना : रंगोली में सूखे रंग रहते हैं और मांडना में गीले। आप जैसा चाहें वैसे रंगों का उपयोग करके घर को दिवाली लुक देकर बहुत ही सुंदर बना सकते हैं। आजकल तो बाजार में मिलने वाली रेडिमेड रंगोली चिपकाकर भी आप फर्श को खूबसूरत बना सकते हैं।
फूलदान : बाजार में आपको ड्राय फ्लॉवर, वेलवेट आदि से बने खूबसूरत नकली फ्लॉवर मिले जाएंगे। फूलों से सजे फ्लॉवर पॉट व फ्लॉवर बॉस्केट सेंटर टेबल की खूबसूरती को चार गुना बढ़ा देते हैं। फ्लॉवर पॉट को घर के किसी कोने या डाइनिंग टेबल पर भी सजा सकते हैं।
दीये से सजाएं घर : इस दीपावली पर कलरफुल और आकर्षक लुक वाले दीयों को खरीदकर आप सेंटर टेबल पर या कमरे के किसी कोने में बखूबी सजा सकते हैं। आप दीयों पर पेंटिंग कर उसे खूबसूरत बना सकते हैं। मिट्टी के दीयों पर कई खूबसूरत आकृतियां भी बनाई जा सकती हैं।
ताजे फूलों की माला : दिवाली पर ताजे गेंदे के फूलों की माला बनाकर उन्हें दरवाजे, खिड़की और गैलरी में लगाएं। प्रत्येक तीन से पांच फूलों के बीच आम का एक पत्ता लगाएं और उन्हें खूबसूरती से घर के अंदर की दीवारों पर चारों ओर लगा सकते हैं। यह बहुत ही पारंपरिक लुक होगा जो लोगों को अच्छा लगेगा।
कहते हैं दक्षिण भारत का ‘स्वर्ण मंदिर’
भारत में यूं तो महालक्ष्मी के कई मंदिर है जिसमें से कुछ खास मंदिर है जैसे केरल का पद्मनाभस्वामी मंदिर, मुंबई का महालक्ष्मी मंदिर, तिरुपति के पास तिरुचुरा का पद्मावती का मंदिर, कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर, दिल्ली का लक्ष्मीनारायण मंदिर, इंदौर का महालक्ष्मी मंदिर, हिमाचल का चौरासी मंदिर, चंबा का लक्ष्मीनारायण का मंदिर, चेन्नई का अष्टलक्ष्मी मंदिर आदि। इन्हीं में से एक है तमिलनाडु का ‘स्वर्ण मंदिर’।
तमिलनाडु के जिले वेल्लू में स्थित थिरुमलई कोड गांव श्रीपुरम में स्थित महालक्ष्मी मंदिर को ‘दक्षिण भारत का स्वर्ण मंदिर’ कहा जाता है।
2. कहते हैं कि यह मंदिर 1500 किलो से अधिक शुद्ध सोने से बना है। इसी वजह से इसे दक्षिण भारत का ‘स्वर्ण मंदिर’ या ‘गोल्डन टेंपल’ कहते हैं। कहते हैं कि इस मंदिर के निर्माण में जितना सोना लगा है, उतना दुनिया के किसी मंदिर में नहीं लगा है।
3. 100 एकड़ में फैला यह मंदिर चेन्नई से 145 किलोमीटर दूर पलार नदी के किनारे स्थित है। इस मंदिर को बनने में लगभग 7 साल का समय लगा था। इसके निर्माण में लगभग 300 करोड़ रुपए की लागत आई थी। 24 अगस्त 2007 को इस मंदिर को दर्शनार्थ खोला गया था।
सूरज की रोशनी में यह मंदिर खूब चमकता परंतु रात के समय लाइट में यह मंदिर और भी ज्यादा चमकता है तब इसमें लगे सोने की चमक देखते ही बनती है। मंदिर परिसर में करीब 27 फीट ऊंची एक दीपमाला भी है, जिसके प्रकार में मंदिर जगमगा उठता है।
5. इस स्वर्ण मंदिर का निर्माण वेल्लोर स्थित धर्मार्थ ट्रस्ट श्री नारायणी पीडम द्वारा कराया गया था।
धनतेरस का त्योहार हर वर्ष कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहते हैं। धनतेरस के दिन सोना, चांदी, आभूषण, बर्तन आदि की खरीदारी के अलावा लोग घर, वाहन, प्लॉट आदि भी खरीदते हैं। धनतेरस पर विशेष कर चांदी के आभूषण, चांदी एवं पीतल के बर्तन या फिर लक्ष्मी और गणेश अंकित चांदी के सिक्के खरीदने की परंपरा है। धनतेरस पर चांदी और पीतल के बर्तन क्यों खरीदते हैं? आइए जानते हैं इसके बारे में।
पौराणिक कथा के अनुसार, सागर मंथन के समय समुद्र से भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को देवताओं का वैद्य भी कहा जाता है। उनकी कृपा से व्यक्ति रोगों से मुक्त होकर स्वस्थ रहता है।
भगवान धन्वंतरि जब प्रकट हुए थे, तो उनके हाथ में कलश था। इस वजह से हर वर्ष धनतेरस को चांदी के बर्तन, चांदी के आभूषण या फिर लक्ष्मी और गणेश अंकित चांदी के सिक्के खरीदे जाते हैं। भगवान धन्वंतरि को पीतल धातु प्रिय है, इसलिए धनतेरस पर पीतल के बर्तन या पूजा की वस्तुएं भी खरीदी जाती हैं।
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस पर इन वस्तुओं की खरीदारी करने से शुभता बढ़ती और व्यक्ति की आर्थिक उन्नति होती है। भगवान धन्वंतरि को धन, स्वास्थ्य और आयु का देवता माना जाता है। उनको चंद्रमा के समान भी माना जाता है। चंद्रमा को शीतलता का प्रतीक मानते हैं। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा करने से संतोष, मानसिक शांति और सौम्यता प्राप्त होती है।
भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के आचार्य और माता लक्ष्मी के भाई भी हैं क्योंकि माता लक्ष्मी भी समुद्र मंथन से निकली थीं। धनतेरस पर पीतल के बर्तन खरीदने के बाद उसमें घर पर बने पकवान रखकर भगवान धन्वंतरि को अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस पर खरीदारी करने से धन, सुख और समृद्धि में वृद्धि होती है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि के साथ कुबेर की भी पूजा करने की परंपरा है। (साभार – दैनिक जागरण)
अपने सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व के अलावा, सोना भी निवेश का एक विकल्प है जो आर्थिक संकट के दौरान अच्छा प्रदर्शन करते हुए समय के साथ बेहतर रिटर्न देता है। पारंपरिक स्वर्ण, ईटीएफ और म्यूचुअल फंड और मिलेनियल्स के पसंदीदा डिजिटल गोल्ड और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड से लेकर सोने में निवेश करने के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। हालांकि निवेश की यह पूरी प्रक्रिया जोखिम लेने की क्षमता, जरूरत और निवेशकों के निवेश परिदृश्य पर निर्भर करती है कि वे अपने लिए उपयुक्त विकल्पों का चयन करें। आनंद राठी शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स में कमोडिटी और करेंसी विभाग के डाइरेक्टर नवीन माथुर हमें बता रहे हैं गोल्ड के निवेश के विभिन्न रास्ते:—
पारम्परिक स्वर्ण
फिजिकल गोल्ड या भौतिक सोना, निवेश का सबसे पुराना तरीका है, जिसमें सोने के बार (छड़ें)/सिक्के और आभूषणों में निवेश शामिल है। बार/सिक्कों में निवेश करना आभूषणों की तुलना में हमेशा लाभदायक होता है क्योंकि आभूषणों के मामले में मेकिंग चार्ज अधिक होता है। हालांकि, पारम्परिक स्वर्ण में निवेश के दौरान चोरी और शुद्धता के मुद्दों का जोखिम बना रहता है, लेकिन यह एक ऐसी संपत्ति है जिसे पूरी तरह से निजी और गोपनीय रखा जा सकता है और आधी रात को इसका लिक्विडेशन यानी इससे लगे पैसे को निकाला जा सकता है।
गोल्ड ईटीएफ
गोल्ड ईटीएफ, एक एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड है जिसका उद्देश्य घरेलू भौतिक सोने की कीमतों को ट्रैक करना है। इसे आप इलेक्ट्रोनिक तरीके से खरीद सकते हैं और इसे आपके डीमैट खाते में रखा जाता है। वे पैसिव यानी निष्क्रिय निवेश साधन हैं, जो पारम्परिक स्वर्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं और बहुत उच्च शुद्धता वाले फिजिकल गोल्ड से समर्थित होते हैं। गोल्ड ईटीएफ, सोना में किए जाने वाले आसान निवेश और स्टॉक निवेश के लचीलेपन को एक साथ जोड़ते हैं क्योंकि वे सूचीबद्ध हैं।
म्यूचुअल फंड
म्यूचुअल फंड कोई नया विचार नहीं है। गोल्ड म्यूचुअल फंड पेशेवर फंड प्रबंधन की पेशकश करते हैं और गोल्ड ईटीएफ की इकाइयों में निवेश करते हैं। गोल्ड ईटीएफ के विपरीत बिना डीमैट खाते के भी गोल्ड म्यूचुअल फंड में निवेश किया जा सकता है। 5 साल से कम के निवेश परिदृश्य वाले लघु और मध्यम अवधि के निवेशकों के लिए, गोल्ड ईटीएफ और गोल्ड म्यूचुअल फंड सबसे अच्छे विकल्प हैं, क्योंकि वार्षिक इसमें लागत 2% से कम रहती है और वे अत्यधिक तरल होते हैं और इन्हें आसानी से खरीदा और बेचा जा सकता है।
डिजिटल गोल्ड
डिजिटल गोल्ड गूगल पे, फोनपे, पेटीएम आदि के माध्यम से खरीदा जा सकता है, जो काफी आसान है और इसमें एक रुपये के साथ न्यूनतम निवेश किया जा सकता है। साथ ही आपको यह बिना किसी सुरक्षित तिजोरी या बैंक लॉकर के 24 कैरेट सोना रखने में सक्षम बनाता है। यहां, विक्रेता प्रत्येक ऑनलाइन खरीद के लिए एक सुरक्षित तिजोरी में भौतिक सोने के बराबर वजन रखता है। हालांकि, इसमें जोखिम यह है कि सेबी या आरबीआई जैसा कोई नियामकीय निरीक्षण मौजूद नहीं है।
सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड
सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड (एसजीबी) में निवेश को लेकर हाल ही में तेजी आई है और यदि आप 5 साल से अधिक के निवेश परिदृश्य वाले दीर्घकालिक निवेशक हैं, यह अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए सबसे अच्छा विकल्प हैं। एसजीबी आरबीआई द्वारा जारी किए जाते हैं और 2.5% प्रति वर्ष की गारंटीकृत आवधिक ब्याज भुगतान की पेशकश करते हैं। साथ ही परिपक्वता पर निवेशकों को मूलधन की वापसी और 5 साल की लॉक-इन अवधि के बाद कर से छूट की निकासी सुविधा मिलती है। दरअसल, इन सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड की ऑनलाइन खरीदारी पर फिलहाल 50 रुपये प्रति ग्राम की छूट है। एसजीबी का एक अन्य लाभ यह है कि उनका सेकेंडरी मार्केट में कारोबार होता है और परिपक्वता अवधि से पहले भी इसे आसानी से बेचा जा सकता है। हालांकि, अभी इसमें तरलता कम है, लेकिन भविष्य में इसमें तेजी आ सकती है।
निवेश का कौन साधन बढ़िया
वर्ष 2019 और 2020 में सोने ने 24% और 28% से अधिक रिटर्न दिया है, इसलिए हम निवेशकों को आपकी जोखिम लेने की क्षमता के आधार पर आपके निवेश का चयन करने के लिए सावधान करना चाहेंगे। भले ही पारंपरिक निवेशक पारम्परिक स्वर्ण के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इसकी सलाह नहीं दी जाती है क्योंकि वे बड़े पैमाने पर आपके मुनाफे में सेंध लगा देते हैं। हम उच्च खरीद-बिक्री प्रसार के कारण डिजिटल स्वर्ण से दूर रहना पसंद करते हैं। वहीं 5 साल से कम की निवेश अवधि के साथ मिलेनियल, गोल्ड ईटीएफ और गोल्ड म्यूचुअल फंड को पसंद कर सकते हैं, क्योंकि वे अत्यधिक तरल हैं और 2% से कम वार्षिक लागत के साथ आसानी से खरीदे और बेचे जा सकते हैं। सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड सभी के बीच पसंदीदा दांव है, जो 5 साल की लॉक-इन अवधि के बाद कर मुक्त निकासी (टैक्स फ्री रिडम्प्शन) के साथ-साथ 2.5% प्रति वर्ष का आवधिक ब्याज भुगतान देता है। इसकी सेकेंडरी मार्केट में आसानी से ट्रेडिंग की जा सकती है। (साभार – नवभारत टाइम्स)