Sunday, July 5, 2026
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भारत की पहली रेस डायरेक्टर दिव्या, पुरुषों के बीच बनाया मुकाम

नयी दिल्ली : दिल्ली की दिव्या मिगलानी ने मोटर स्पोर्ट्स की दुनिया में अपनी ऐसी धाक जमाई कि कार रेसिंग और कार रैली में भारत की कम उम्र की महिला बनकर उभरीं और रैली सर्किट से लेकर रेसिंग ट्रैक तक पहुंचीं।
पिछले 18 सालों से मोटर स्पोर्ट्स से जुड़ी दिव्या कहती हैं, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने खिताब अपने नाम कर पाऊंगी। पर आज ये सब कुछ कर पाई तो उसके पीछे परिवार का सहयोग है। जब मैंने कार रेसिंग शुरू की तो उसके लिए कोई प्रशिक्षण नहीं लिया और कोई सलाह देने वाला भी नहीं था। करिअर की शुरूआत एचसीएल इंफोसिस्टम्स से हुई। फिर कई मुख्य मीडिया संस्थानों में काम किया। रोज की तरह उस दिन भी ऑफिस जा रही थी। दिल्ली से नोएडा थोड़ी जल्दी पहुंच गई। वहीं अपनी बलेनो कार घुमाने लगी। पास में नेशनल स्टेडियम में लड़कों की भीड़ देखी। उसे देख मैं भी उधर चल दी। वहां कार रेसिंग हो रही थी, मैंने भी दिलचस्पी दिखाई। तब जानकारी मिली कि भारत में ऐसे इवेंट्स होते हैं जहां ड्राइवर्स आकर मुकाबला करते हैं। वहां से फिर ऑटो स्पोर्ट्स के बारे में मालूम हुआ। बस फिर क्या था मैं ऐसे ही मौके की तलाश में थी जो मुझे मिल गया और 2004 से मोटर स्पोर्ट्स का सफर शुरू हुआ।
पहली रैली और गाड़ी पलट गयी
दिल्ली में हिमालयन रैली थी जो शिमला से शुरू होकर लेह लद्दाख जानी थी। 2005 का ये वक्त था। पहली रैली वो भी किसी समतल जमीन पर नहीं बल्कि हिमालय की पहाड़ियों पर। सात दिन ये रैली चली। उसमें हर दिन क्वालिफाई करना होता था। जब पहले दिन रैली की तो वो बहुत अलग ड्राइविंग थी, क्योंकि इससे पहले मैंने ऐसे कभी पहाड़ों में ड्राइविंग नहीं की थी। मैं ड्राइविंग कर रही थी और मेरे भाई मुझे नेविगेट कर रहे थे। पहला दिन बहुत अच्छा गया। रैली के दूसरे दिन मैं मारूति जिप्सी चला रही थी। पूरा दिन खत्म होने वाला था तब करीब आधा घंटा पहले हमारी गाड़ी पत्थर से टकराकर पलट गई। विंड स्क्रीन क्रैश हो गई, टायर पलट गए। पर हम दोनों सेफ थे। मुझे अपनी ड्राइविंग पर पूरा भरोसा था फिर जब गाड़ी पलटी तो समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ। जब गाड़ी पत्थर से टकराई तो मैं भी सन्न रह गई। ये गाड़ी का पलटना मेरे लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। हम उस रैली से डिस्क्वालिफाई हो गए। जब मैं घर आई तो मां ने कहा कि अब गाड़ी चलाने का भूत उतर गया, लेकिन मुझे मालूम था कि भूत तो अभी चढ़ा है, क्योंकि मेरे साथ ये दिक्कत है कि जब किसी काम में फेल हो जाती हूँ तो उसके पीछे का कारण ढूंढती हूँ।
जब रेत में सबसे आगे निकल गई जिप्सी
पहली रैली की असफलता के बाद दूसरी रैली 2006 में हुई। इसके लिए खूब प्रैक्टिस की। इस रैली में जान फूंक दी क्योंकि ये तारकोल की सड़क पर नहीं बल्कि रेत से भरे मैदान में होनी थी। यानी राजस्थान में। इस रैली के लिए मैंने इसलिए भी खूब प्रैक्टिस की क्योंकि पहली बार में कार पलट गयी थी और उस डर को बाहर नहीं निकालती तो शायद दोबारा कभी हैंडिल नहीं संभाल पाती। वो रैली इतनी अच्छी हुई कि उसमें हम दोनों भाई-बहन ने रिकॉर्ड बनाया। मेरी जिप्सी एसयूवी एक्स्ट्रीम कैटेगरी में चौथे नंबर पर रही। इसी रैली में मेरा फर्स्ट पोडियम फिनिश मिला। उसी प्रतियोगिता में मुझे जानकारी मिली कि आज तक एक्ट्रीम कैटेगरी में किसी महिला ने पोडियम फिनिश नहीं किया। एक्ट्रीम कैटेगरी में मैं टॉप फोर रही। पुरुषों से भरे मोटर रेसिंग में जब मैं आगे निकल गई तो पीछे मुरझाए और हाथ मलते चेहरे छोड़ दिए। मोटर स्पोर्ट्स में बाइक और कार दोनों की रेसिंग होती है। कार रैली में भी दो कैटेगरी होती हैं। एक एक्सट्रीम जिसमें कोई स्पीड लिमिट नहीं होती। दूसरी, एडवेंचर कैटेगरी जिसमें स्पीड लिमिट होती है। एडवेंचर कैटेगरी थोड़ी आसान होती है। मैंने पहली रैली एक्सट्रीम की थी जिसमें स्पीड नहीं थी।
खेल के मैदान में जाकर की प्रैक्टिस
भारत में मोटर स्पोर्ट्स अभी भी शुरुआती दौर में है। इसलिए इसके लिए बहुत अच्छे ग्राउंड्स नहीं हैं। जब भी जहाँ पर रैली होती थी वहाँ मैं उस जगह की पहले ही रैकी कर लेती थी। वहीं जाकर प्रैक्टिस करती। सिर्फ गाड़ी चलाने की प्रैक्टिस नहीं होती, बल्कि उसकी हैंडलिंग, आपकी मानसिक स्थिरता की भी होती है। अगर आप मानसिक और शारीरिक स्वस्थ पर नहीं होंगे तो ड्राइविंग नहीं हो पाएगी।

गाड़ी और ड्राइवर का टीम वर्क
जब हम ड्राइविंग करते हैं तो मन में आता है कि जिस गाड़ी को हम चला रहे हैं वो ठीक है या नहीं क्योंकि उसे पूरे सात दिन चलाना होता है। जब गाड़ी पर नियंत्रण और भरोसा हो जाता है तब मैं गाड़ी को अपनी सीमा से बाहर ले जा सकती हूँ। अपने विश्वास और गाड़ी पर विश्वास दोनों टीम वर्क हैं। रैली या रेसिंग के दौरान गाड़ी बीच-बीच में बहुत टूटती है। हर दिन इंजीनियर गाड़ी ठीक करता है। रेत की ड्राइविंग बिल्कुल अलग थी। भरी रेत में गाड़ी भगा पाने की तकनीक होती है। ज्यादा रेस देंगे तो टायर रेत में धंसता चला जाएगा। इसलिए अलग टेक्नीक होती है। मेरे समय पर इसकी कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती थी। हमें खुद ही सीखना होता था। रेत में खुद से ड्राइविंग सीखी।

खेल ने बदली दुनिया
खेल से बहुत कुछ सीखने को मिला, जो मैंने खेल से सीखा वो मेरी शख्सियत में भी दिखा। जब हम रैली करते हैं तब हमें नहीं पता होता कि आगे क्या होगा। ये ऐसा खेल है जो जिंदगी को खत्म करने वाला भी हो सकता है। 15 हजार फीट ऊंचाई पर गाड़ी चलाते हैं। अगर एक गलत टर्न ले लिया तो हमारी जान को भी खतरा हो सकता है। ये एक ऐसा खेल है जहां आपके पास किसी भी चीज की गारंटी नहीं होती कि आगे क्या होगा, लेकिन फिर भी हमें स्पीड में गाड़ी को चलाना होता है और आपको प्रतियोगिता में बने रहना होता है। इस खेल से यही सीखा कि जिंदगी में आगे क्या होने वाला है नहीं मालूम। जो आपके पास है वो अभी का वक्त है। वर्तमाम पर ही हमारा नियंत्रण है। ड्राइविंग के वक्त मुझे हमेशा लगता है कि जिस चीज से मुझे डर लग रहा है उस डर के आगे जाने से क्या होगा। जब पहली बार जीत मिली तब उस डर का सामना करना आया। मैं निडर हो पाई। स्पोर्ट्स जेंडर के आधार पर भेदभाव नहीं करता। लोग आपको तब तक अलग तरह से देखते हैं जब तक आप खुद को अलग तरह से देखते हैं।
नौकरी और जुनून साथ-साथ
मेरी जो पहली कार रेसिंग थी उसमें मैंने रेस सूट उधार का मांगा था। मीडिया की नौकरी और रेसिंग साथ साथ किया। मैं अपने अभिभावक से पैसे नहीं लेती थी। इस जीत के बाद मैंने जहाँ भी नौकरी की वहां मुझे प्रायोजक मिला। एक दफ्तर में मैंने मोटर स्पोर्ट्स में जाने के लिए छुट्टी मांगी तो उन्होंने नहीं दी। मैंने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे में कारण लिखा कि मुझे मोटर स्पोर्ट्स में जाना है, इसलिए छुट्टी चाहिए। तब मुझे छुट्टी मिल गई और मेरा इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ। जब कंपनी ने देखा कि मैं अपने पैशन के लिए बहुत समर्पित थी तो उन्होंने ने भी रोका नहीं। मैं नौकरी और मोटर स्पोर्ट्स दोनों साथ में करना चाहती थी। आज दोनों साथ में कर रही हूं। दोनों प्रोफेशन करने से मेरी कार्य क्षमता बढ़ती है।
फिर तमाम मुकाबलों में गयी
मैं कोयम्बटूर में रेसिंग सर्किट में भी गयी। वहाँ पर कोई भी लड़की नहीं थी। वहां फॉर्मूला कार को चलाने के थोड़ी ट्रेनिंग ली। मैं 15 सालों से यही कर रही हूँ। रेस ट्रेक लर लड़कियों को लाने के लिए उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू किया। आज मोटर स्पोर्ट्स के फेडरेशन में फोर वीलर कैटेगरी में महिलाओं को प्रतिनिधित्व करती हूँ। जब मैंने मोटर स्पोर्ट्स की शुरुआत की थी तब लड़कियां इस फील्ड में बहुत कम थीं। मुझे खुद को भी दूसरों को साबित करना पड़ा। इसलिए अब कह सकती हूं कि आप खुद ही खुद की मदद कर सकते हैं। जो आपके अंदर से आवाज आ रही है वो करें। आज मैं पहली रेस डायरेक्टर हूं। आप अपने लिए रास्ते बनाते हो और वो दुनिया के लिए भी बन जाते हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

पत्नी के मंगल के लिए मंगलसूत्र पहनते हैं पुणे के शार्दुल

पुणे : पुणे के शार्दुल कदम ने सालभर पहले शादी के मंडप में ही पत्नी के हाथों ‘मंगलसूत्र’ बंधवाया था। उन्होंने इसकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर डाली, जिसके बाद ट्रोलर्स ने उनका जमकर मजाक उड़ाया। शारदुल को साड़ी पहनने से लेकर सिंदूर लगाने तक की नसीहत दी गई। कई लोगों ने कहा कि तुम्हें तो पीरियड्स भी आते होंगे। एक साल बाद अब शादी की तैयारी कर रहे लड़के पूछते हैं कि उन्होंने मंगलसूत्र कहां से डिजाइन करवाया।
इसलिए मंगलसूत्र पहनते हैं शार्दुल
पुणे के शारदुल कदम बताते हैं कि वे मंगलसूत्र इसलिए पहनते हैं क्योंकि उनके लिए ये प्यार की निशानी है। लोग मंगलसूत्र को महिलाओं का गहना मानते हैं, इसे रस्म और रिवाजों से जोड़ देते हैं, जबकि इसके पीछे का अर्थ कम ही लोगों को पता है। मंगलसूत्र दो शब्दों में बंटा है, ‘मंगल’ मतलब शुभ और ‘सूत्र’ मतलब पवित्र धागा। मंगलसूत्र का असल मतलब है वो पवित्र धागा जो दो आत्माओं को जीवनभर एक साथ बांधे रखता है। इसे कहीं भी महिलाओं से नहीं जोड़ा गया है, फिर भला मंगलसूत्र सिर्फ महिलाएं ही क्यों पहने? मंगलसूत्र से जुड़े इमोशन से शारदुल इतने प्रभावित थे कि प्यार जताने के लिए उन्होंने शादी के दिन पत्नी के हाथों मंगलसूत्र पहना।
एंगेजमेंट रिंग की तरह आदान – प्रदान किए मंगलसूत्र
शारदुल कहते हैं कि जब पार्टनर्स एक-दूसरे को एंगेजमेंट रिंग पहनाते हैं तब कोई ये सवाल नहीं करता कि रिंग तो महिलाओं का गहना है, पुरुष इसे क्यों पहन रहे हैं। रिंग को प्यार की निशानी मानकर दोनों पार्टनर एक-दूसरे को राजी-खुशी इसे पहनाते हैं। हमने भी इसी तरह एक-दूसरे को प्यार की निशानी दी है, बस हमारा तरीका थोड़ा अलग रहा। शार्दुल बताते हैं कि उनका पैतृक गांव पुणे से 30 किलोमीटर दूर है। वे महाराष्ट्र के ही रहने वाले हैं और मराठी विवाह में मंगलसूत्र को बहुत अहम माना जाता है। यही वजह है कि उन्होंने शादी के मंडप पर पत्नी के साथ मंगलसूत्र एक्सचेंज किया। ये पल शारदुल और उनकी पत्नी तनुजा के लिए काफी खास था।
डिजाइनर को खास ऑर्डर देकर बनवाया मंगलसूत्र
शारदुल को अपने लिए मंगलसूत्र चुनने में काफी मेहनत करनी पड़ी। वे बताते हैं कि उन्होंने एक महिला फैशन डिजाइनर से खास मंगलसूत्र डिजाइन करवाया, जिसमें काले मोती वाली दो मालाएं पेंडेंट से जुड़ी हैं। इसे तैयार करने में डिजाइनर को 20 दिन लगे थे।
वे शान से मंगलसूत्र पहनकर दफ्तर जाते हैं
कम्युनिकेशन कंसलटेंट शार्दुल का कहना है कि शादी के कुछ दिन तक तो उन्हें सोशल मीडिया पर काफी ट्रोलिंग झेलनी पड़ी थी। इसके बाद जब वो दफ्तर पहुंचे तो उन्हें लगा कि शायद दफ्तर में भी लोग उन्हें जज करने वाली निगाहों से देखेंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सहकर्मी आकर ये जरूर पूछते कि आपने मंगलसूत्र क्यों पहना है। वजह जानकर सब खुश हो जाते हैं। वे शादी के कुछ दिनों तक बड़ा मंगलसूत्र पहनकर ही दफ्तर जाते रहे। इसके बाद रोजाना के लिए उन्होंने मंगलसूत्र हैंड ब्रेसलेट तैयार करवाया। अब शार्दुल खास मौकों पर ही बड़ा मंगलसूत्र पहनते हैं, ठीक उसी तरह जैसे उनकी पत्नी पहनती हैं।

इंस्टाग्राम पर पुरुष पूछते हैं डिजाइनर का नाम
शार्दुल बताते हैं कि शादी कि शुरुआत में उन्हें इतनी ज्यादा ट्रोलिंग झेलनी पड़ी थी कि वो कुछ समय के लिए परेशान हो गए थे। लोग भद्दे-भद्दे कमेंट करते थे। उनकी शादी का मजाक बनाया जाता था। उनका इंस्टाग्राम और बाकी सोशल मीडिया अकाउंट के चैट बॉक्स इसी तरह के मैसेज से भरे होते थे, जिसकी वजह से उन्होंने सोशल मीडिया चलाना ही बंद कर दिया था, लेकिन कुछ दिन बाद कई लड़कों ने उनसे मंगलसूत्र के डिजाइनर का नाम पूछा और इसमें दिलचस्पी दिखाई।
पत्नी से भी बड़ा मंगलसूत्र पहनकर घर से निकलते हैं
शार्दुल की कहानी में एक दिलचस्प बात ये निकलकर आई कि उनका मंगलसूत्र उनकी पत्नी के मंगलसूत्र से भी ज्यादा बड़ा है। वो बताते हैं कि जब भी दोनों साथ में घर के किसी फंक्शन में जाते हैं तो लोग पहले हैरान निगाहों से शार्दुल के मंगलसूत्र को देखते हैं। कुछ लोग ये भी टोक देते हैं कि अरे तुम्हारा मंगलसूत्र तो पत्नी से भी बड़ा है! ऐसा उनके साथ अक्सर होता है, लेकिन शारदुल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो पूरे आत्मविश्वास के साथ मंगलसूत्र पहनते हैं।
त्योहार पर पति-पत्नी एक-दूसरे को पहनाते हैं मंगलसूत्र
शार्दुल ने बताया कि जब भी कोई त्योहार या खास मौका होता है, दोनों तैयार होने के बाद हमेशा एक-दूसरे को मंगलसूत्र पहनाते हैं। ये पल उनके लिए बहुत खास होता है, क्योंकि ये उन्हें शादी के दिन की याद दिलाता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

क्रिकेट की दुनिया का जगमगाता सितारा हैं ‘रन मशीन’ मिताली राज

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 10 हजार से ज्यादा रन बनाने वाली इकलौती महिला क्रिकेटर हैं
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कैप्टन मिताली राज समेत देश का मान बढ़ाने वाले 11 खिलाड़ियों को इस साल खेल रत्न दिया जाएगा। राष्ट्रीय खेल पुरस्कार कमेटी ने 11 खिलाड़ियों का नाम साल 2021 के मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया है। इनमें पांच पैरा एथलीट्स भी शामिल हैं। पहली बार एक साल में खेल रत्न के लिए सबसे ज्यादा खिलाड़ियों को चुना गया है और मिताली राज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 10 हजार से ज्यादा रन बनाने वाली इकलौती महिला क्रिकेटर हैं।
रन मशीन कही जाने वाली मिताली राज ने बीते सितंबर में उस वक्त इतिहास रचा, जब उन्होंने फर्स्‍ट क्‍लास, वनडे, टेस्ट और टी-20 समेत क्रिकेट के सभी फॉर्मेट को मिलाकर अपने कॅरियर में 20 हजार से ज्यादा रन बना लिए। इस आंकड़े में मिताली के बनाए घरेलू क्रिकेट के करीब 10 हजार रन और इंटरनेशनल क्रिकेट में 318 मैचों के 10,400 रन शामिल हैं।
दुनिया की पहली ऐसी क्रिकेटर, जिसने हासिल किया रनों का ऐसा मुकाम
इस साल सितंबर में ऑस्ट्रेलियाई महिला टीम के खिलाफ पहले वनडे में 107 गेंदों में 61 रन की पारी खेलकर मिताली 20 हजार रनों के मुकाम तक पहुंचने वाली दुनिया की पहली महिला क्रिकेटर भी बनीं। उन्हें चुनौती देने वाली महिला क्रिकेटर उनके आसपास भी नहीं हैं। उन्होंने क्रिकेट में 50 ओवरों वाले वर्ल्ड कप में भारत की अगुआई की। दोनों ही बार महिला टीम फाइनल में पहुंची थी।
वनडे में सर्वाधिक रिकॉर्ड, 218 मैच खेले, जो सबसे ज्यादा
मिताली राज के वनडे में रिकॉर्ड ही रिकॉर्ड हैं। वह सबसे ज्यादा 218 वनडे खेलने वाली दुनिया की इकलौती खिलाड़ी हैं। वनडे में सबसे ज्‍यादा 7663 रन बनाने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है। सबसे ज्‍यादा 59 अर्द्धशतक उनके नाम हैं। वह लगातार 7 अर्द्धशतक लगाने वाली इकलौती बल्‍लेबाज हैं। मिताली के नाम 7 शतक हैं और वनडे क्रिकेट में नंबर वन रैंकिंग के साथ दुनिया की शीर्ष बल्लेबाज हैं।
टेस्ट क्रिकेट में दोहरा शतक जड़ने वाली पहली भारतीय महिला क्रिकेटर
मिताली टेस्‍ट क्रिकेट में 214 रन बनाकर दोहरा शतक जड़ने वाली पहली भारतीय महिला क्रिकेटर हैं। टेस्‍ट में 1 शतक जड़ने वाली वह दूसरी भारतीय क्रिकेटर हैं। भारत के लिए 10 टेस्‍ट खेलकर मिताली पूर्व क्रिकेटर शुभांगी कुलकर्णी (19 मैच) के बाद दूसरे स्‍थान पर हैं। इसके अलावा टेस्‍ट में 663 रन बनाकर मिताली राज दूसरे नंबर पर हैं। शुभांगी 700 रनों के साथ नंबर वन हैं।
टी-20 में भी सबसे ज्यादा रन बनाने वाली देश की पहली और दुनिया की 7वीं महिला
मिताली ने सबसे पहले रेलवे के लिए क्रिकेट खेलना शुरू किया था। 1999 में वह वनडे नेशनल टीम में शामिल की गयीं और आयरलैंड के खिलाफ डेब्‍यू मैच में शतक (114) ठोककर तहलका मचा दिया था। टी-20 में सबसे ज्‍यादा रन बनाने वाली मिताली राज का इस फॉर्मेट में भी कोई सानी नहीं है। सबसे ज्‍यादा 2457 रन बनाने वाली वह भारत की पहली और दुनिया की सातवीं क्रिकेटर हैं। टी20 अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट में वह सबसे ज्‍यादा 17 अर्धशतक लगाने वाली भारत की पहली और दुनिया की तीसरी बल्‍लेबाज हैं। 242 से ज्‍यादा चौके लगाकर वह भारत की पहली और दुनिया की छठी बल्‍लेबाज हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

फाल्गुनी नायर : 50 की उम्र में छोड़ा 25 साल का कॅरियर, बैंकर जो बनी सफल उद्यमी

देश में फैशन, ब्यूटी प्रोडक्ट की शीर्ष ई-कॉमर्स कंपनी ‘नायका’ अब दलाल स्ट्रीट का रुख कर रही है। कंपनी ने गुरुवार को अपना आईपीओ लॉन्च किया है। यह वर्ष 2021 का तीसरा सबसे बड़ा आईपीओ है। इससे पहले जोमैटो और सोना कॉमस्टार ने बड़े आईपीओ जारी किए थे।
नायका की पैरंट कंपनी एस एन ई कॉमर्स वेंचर्स की शुरुआत इन्वेस्टमेंट बैंकर रहीं फाल्गुनी नायर ने 2012 में थी। फाल्गुनी नायर ने कुछ ही वर्षों में इसे देश की शीर्ष ब्यूटी प्रोडक्ट्स से जुड़ी ई-कॉमर्स कंपनी बना दिया। इनकी तुलना उद्यमी किरण मजूमदार शॉ से की जाती है।

फल्गुनी नायर का सफर
फाल्गुनी का जन्म 1963 में मुंबई में हुआ और वहीं पली-बढ़ी हैं। पिता व्यवसाय करते थे और माँ उनका सहयोग किया करती थीं। व्यवसाय के गुर इन्हें विरासत में मिले हैं। इन्होंने मुंबई स्थित सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉर्मस एंड इकोनॉमिक्स से ग्रेजुएशन किया है। फिर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद से मास्टर्स की डिग्री ली।

कोटक महिंद्रा में लंबे समय तक की नौकरी

पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 1985 में एक मैनेजमेंट कंसलटेंसी कंपनी में बतौर कंस्लटेंट जुड़ीं। आठ साल बाद कोटक महिंद्रा से जुड़ीं और वहां 19 साल अलग-अलग पदों पर काम करती रहीं। साल 2005 में प्रबन्ध निदेशक बनीं और जब 2012 में इस्तीफा देते समय इसी पद पर थीं।

50 की उम्र में छोड़ा 25 साल लंबा कॅरियर, लिया जोखिम
फाल्गुनी फाइनेंस की दुनिया में काम करती थीं। 25 साल का लंबा कॅरियर था। लेकिन एक दिन अपने सपने को पूरा करने के लिए जमा-जमाया करियर छोड़ दिया, और 2012 में शुरू की ब्यूटी प्रोडक्ट से जुड़ी वेबसाइट नायका डॉट कॉम। दो साल पूरा होने के पहले ही ये देश की नबंर वन वेबसाइट बन गयी। आज इस वेबसाइट पर ब्यूटी प्रोडक्ट के अलावा कपड़े आदि भी मिलने लगे हैं। इस वेबसाइट पर 2500 से ज्यादा ब्रांड मौजूद हैं।
इन फंडों को अपना कर बनीं बिलेनियर
फाल्गुनी का कहना है कि एंटरप्रयोनर्स को एकदम सीधी स्ट्रैटजी बनानी चाहिए। यह क्लियर होना चाहिए कि आप अपने व्यवसाय से क्या चाहते हैं। कई बार काम सिर्फ पैसा कमाने के लिए नहीं बल्कि लंबे समय में आपके काम का असर नजर आता है। फाल्गुनी कहती हैं कि बाजार में जमने के लिए सबसे पहले अपने क्लाइंट को समझने की जरूरत है। इससे आपको ग्राहकों तक ऑनलाइन डिलीवरी करने में मदद मिलेगी।
फाल्गुनी जोखिम लेने पर भी जोर देती हैं। यही वजह से कि उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए बैंकर की अच्छी भली नौकरी छोड़ दी। उनका कहना है कि महिलाओं को खासकर बिजनेस में रिस्क लेने की जरूरत है।
व्यवसाय में कामयाबी हासिल करने के लिए पूरा मन लगाकर काम करें। फाल्गुनी खुद क्लाइंट के ऑर्डर पर नजर रखती हैं। चुनौती लें और व्यक्तिगत स्तर पर काम में जुट जाएं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

दिवंगत अभिनेता पुनीत राजकुमार के नेत्रदान से रोशन हुई 4 लोगों की जिंदगी

 बंगलुरू : दिवंगत अभिनेता पुनीत राजकुमार की आंखों से चार लोगों को रोशनी मिली है। पुनीत अपनी माँ की तरह परोपकार के कामों में शामिल रहते थे। इसी वजह से उन्होंने अपनी आंखें दान करने का संकल्प लिया था। उनके निधन के बाद इसे पूरा किया गया। पुनीत की आंखों को नारायण नेत्रालय​​​ आई हॉस्पिटल को दान कर दिया गया था। पुनीत के पिता अभिनेता राजकुमार ने भी अपनी आंखें दान की थीं।
कन्नड़ फिल्म अभिनेता पुनीत का जिम में वर्कआउट के दौरान दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। हार्ट अटैक के तुरंत बाद पुनीत को बेंगलुरु के विक्रम अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। पुनीत के निधन के बाद राज्य के सभी थिएटर बंद कर दिए गए और कई इलाकों में धारा 144 लागू की गई थी।
इस तरह दो आंखों से रोशन हुईं आंखें
नारायण नेत्रालय के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डॉ. भुजंग शेट्टी ने बताया कि उन्होंने कॉर्निया की मुख्य और गहरी परत को अलग किया। हर आंख का इस्तेमाल दो रोगियों के इलाज के लिए किया गया। जिनमें एक महिला और बाकी तीन पुरुष शामिल थे।

पुनीत से चेतन ने भी ली प्रेरणा
कन्नड़ अभिनेता चेतन ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखा कि जब मैं अस्पताल में अप्पू सर के आखिरी दर्शन के लिए गया था, तब डॉक्टरों की एक टीम ने उनके निधन के 6 घंटे के अंदर ऑपरेशन किया और उनकी आंखें निकालीं। अप्पू सर ने भी डॉ. राजकुमार की तरह अपनी आंखें दान की हैं। अप्पू सर के दिखाए रास्ते पर चलकर और उनकी याद में हम सबको नेत्रदान करने की शपथ लेनी चाहिए। मैं भी अपनी आंखें दान करूंगा।

ऐसा रहा पुनीत का फिल्मी सफर
पुनीत के पिता राजकुमार दक्षिण के आइकन रहे हैं। पुनीत ने अपने कॅरियर की शुरुआत बाल अभिनेता के तौर पर की थी। उन्हें फिल्म बेट्टद हूवु के लिए सर्वश्रेष्ठ बाल अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। फिल्म ‘अप्पू’ से बतौर शीर्ष अभिनेता अपने कॅरियर की शुरुआत की थी। उन्हें आकाश (2005), आरसु (2007), मिलन (2007) और वंशी (2008) जैसी फिल्मों में दमदार अभिनय के लिए जाना जाता है, जो अभी तक उनकी सबसे बड़ी कॉमर्शियल हिट हैं।पुनीत को आखिरी बार ‘युवरत्ना’ में देखा गया था, जो इस साल की शुरुआत में रिलीज हुई थी। साउथ में उनकी फिल्मों की दीवानगी इस कदर होती थी कि एक बार उनकी 14 फिल्में लगातार कम से कम 100 दिनों तक सिनेमा घरों में बनी रही थीं।

समाज सेवा में भी रहे अव्वल
अपने 46 साल के छोटे से जीवनकाल में पुनीत परोपकार के भी पावर स्टार थे। वे धर्म के खिलाफ कुछ नहीं सुन पाते थे। कोरोना महामारी के दौरान भी पुनीत ने सीएम रिलीफ फंड में 50 लाख रुपए दान किए थे। पुनीत ने 45 स्कूल, 26 अनाथालय, 16 वृद्घाश्रम, 19 गोशाला और 1800 अनाथ लड़कियों की उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी उठाई थी। पुनीत के जाने के बाद अभिनेता विशाल ने घोषणा की है कि अनाथ लड़कियों की शिक्षा की जिम्मेदारी वे उठाएंगे।

‘क्षण क्षण के रस निचोड़ना आना चाहिए’

रिसड़ा : रिसड़ा के श्रीनारायण धाम में जीवन मंत्र व्याख्यान श्रृंखला के तहत आज रविवार को जीवन में तनाव के कैसे बचें पर एक सुपरिचित साहित्यकार-पत्रकार डॉ. अभिज्ञात ने अपने प्रभावी वक्तव्य से लोगों की मनोदशा में सकारात्मक बदलाव लाने के सुझाव दिये। उन्होंने कहा कि सकारात्मक दृष्टि बनाने रखने से जीवन की स्थिति में सुधार अवश्यक होगा। उन्होंने इसके लिए कुछ सूत्र भी दिये। नकारात्मक भाव सुन्दर को असुंदर, संगीत को कर्णकटु और स्वादिष्ट को बेस्वाद बना देता है। मनोस्थिति बाह्य जगत की प्रभावशीलता का निर्माण करती है। यदि कोई विचार आपका लगातार पीछा कर रहा है और तनाव पैदा कर रहा है तो इसका अर्थ यह है कि आपमें एकाग्रता की खूबी है। लेकिन अभ्यास के जरिये अपने मन हो हांकना भी आना चाहिए। हर क्षण जीवन बदल रहा है और उसमें बहुत कुछ सुन्दर और सुखद है। क्षण क्षण के रस निचोड़ना आना चाहिए, इससे न तो अवसाद आयेगा और ना ही तनाव। जीवन किसी बड़ी कामयाबी के इन्तजार में मत खत्म करें छोटी छोटी उपलब्धियां ही जीवन को बनाती हैं। यह न भूलें कि जितनी बड़ी कामयाबी होगी उतनी ही कीमत भी वसूलेगी।
कार्यक्रम स्वामी केशवानंद जी महाराज के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। उन्होंने जीवन में तनाव के आध्यात्मिक पहलुओं की चर्चा की और पौराणिक प्रसंगों से तनाव के सकारात्मक पहलुओं की भी व्याख्या की। स्वागत भाषण डॉ. पीके अग्रवाल ने दिया। कार्यक्रम का संचालन संतोष  सिंह ने किया।

‘विट्ठल गिरधर’  छाप लगाई, लीला पद गंगा बहु गाई’

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को दीपावली की राम- राम। सखियों, जैसा कि आपको पहले भी बता चुकी हूँ कि मध्ययुगीन रचनाकारों में ऐसी बहुत सी स्त्रियाँ रचनाकर्म से जुड़ी हुई थीं जिन पर इतिहास- लेखकों की दृष्टि नहीं पड़ी। न जाने कितनी भक्त कवयित्रियाँ अलक्षित ही  रह गई हैं। उनमें से कुछ की गिनी- चुनी रचनाएँ उपलब्ध हैं तो कुछ के नाम भी समय के प्रवाह में लुप्त हो गये हैं। ऐसा ही एक नाम है, गंगाबाई का जो‌ श्री विट्ठल गिरधर या विट्ठल गिरधरन के नाम से काव्य- सृजन करती थीं। गंगाबाई गुसाईं विट्ठलनाथ की शिष्या थीं। “दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता” के अनुसार गंगाबाई की माता क्षत्राणी थीं। वह महावन में रहती थीं और श्री गुसाईं विट्ठलनाथ जी की सेवा करती थीं लेकिन वह गुसाईं जी को गुरु भाव से नहीं बल्कि काम -भाव से देखती थीं। जब गुसाईं जी को इस बात का आभास हुआ तो वह क्रोधित हुए और उन्होंने उन्हें गोकुल आने की मनाही कर दी। महावन में रहते हुए और गुसाईं जी की वियोग-व्यथा को झेलते हुए एक दिन वह उनका ध्यान कर रही थीं कि स्वप्नावस्था में उन्हें लगा कि वह गर्भवती हैं।  उन्होंने गंगाबाई को जन्म दिया तथा पुन: भगवद्भक्ति में लीन हो गईं। इस कथा का सार यही है कि गंगाबाई की माता गुसाईं विट्ठलनाथ की शिष्या या सेविका थीं। गंगाबाई भी बड़ी होकर उन्हीं की सेवा करने लगी और बाद में वह महावन से गोपालपुर आकर रहने लगीं। कहा जाता है कि श्री गोवर्धन जी (कृष्ण का एक स्वरूप) उनके साथ हँसते- खेलते और बातें करते थे। वह उन्हें अपनी लीलाओं का दर्शन भी कराते थे। गंगाबाई गोवर्धन जी अर्थात कृष्ण की स्तुति करने हेतु पदों की रचना और उनका गायन करती थीं। इन पदों को वह अपने गुरु ‌विट्ठलनाथ जी को भी सुनाती थीं। संभव है कि गुरु उन पदों में कुछ संशोधन-परिमार्जन करते हों। चूंकि वह विट्ठलनाथ जी की शिष्या थीं संभवतः इसीलिए वह विट्ठल गिरधरन के नाम से काव्य- रचना किया करती थीं।

 उनके पदों का संग्रह और संपादन  करने वाले रमणिक लाल पीठदिया के अनुसार उनका जन्म संवत 1628 में और मृत्यु 1736 में हुई। इसके अनुसार उनकी उम्र तकरीबन 108 वर्ष की ठहरती है। गुसाईं जी के प्रपौत्र श्री हरिराय जी ने अष्टछाप के कवियों के पदों का जो संचयन किया उसमें गंगा बाई के पदों को भी शामिल किया गया है। श्री रूपचंद खंडेलवाल “भूप” ने “विट्ठलायन” ग्रंथ में गंगाबाई को श्रद्धा के साथ स्मरण किया है। उनका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है-

“रह गोपालपुर त्याग महावन। नित्य जहां तेहि लीला दर्शन।।

गोवर्धन ता ढिंग आवैं। चौपड़ खेले हँसे- हँसावैं।।

‘विट्ठल गिरधर’  छाप लगाई। लीला पद गंगा बहु गाई।।” 

इन विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि गंगाबाई कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। ऐसी भक्तिन कि वह अपने कल्पना- लोक में विचरण करते हुए यह आभास भी करती थीं कि कृष्ण उनसे बातें कर रहे हैं और वह मीराबाई की तरह कृष्ण को अपने पदों का गायन करके सुना रही हैं। यह भाववावेश की एक स्थिति विशेष होती है जिसमें कल्पना भी सच लगती है, इसे आज मनोवैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है। गंगाबाई और कृष्ण को लेकर बहुत सी कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। इनमें से एक कहानी यह भी है कि श्रीनाथ जी (कृष्ण का एक रूप विशेष जिसमें बालक के रूप में उनकी पूजा होती है) गंगाबाई को सदेह अपनी लीला में लेकर गये थे। एक ओर तो गंगाबाई के पदों और उनके बारे में प्रचलित कहानियों में यह संकेत मिलता है कि वह कृष्ण को बालक रूप अर्थात श्रीनाथ जी के रूप में पूछती थीं और कई ऐसी कहानियाँ मिलती हैं जिनमें वह श्रीकृष्ण को “लरिका” अर्थात बालक कहकर संबोधित करती हैं और उनके बालहठों को पूरा भी करती हैं तो दूसरी ओर वह सखी या संगिनी के रूप उनके साथ लीला भी करती हैं। वस्तुत: श्रीनाथ जी के प्रति वात्सल्य भाव तो दिखाई देता है लेकिन कृष्ण के प्रति माधुर्य भाव की भक्ति ही गंगाबाई के जीवन और उनके काव्य का मुख्य स्वर है। माधुर्य भक्ति से पूरित इन पदों में कृष्ण की प्राप्ति की उत्कंठा प्रस्फुटित हुई है। कृष्ण के रूप- सौन्दर्य का बहुत अधिक वर्णन तो कवयित्री नहीं करतीं लेकिन कृष्ण की रूप- माधुरी और उनकी रसिकता की चर्चा वह अवश्य करती हैं। उस स्वरूपवान कृष्ण के सामीप्य लाभ के लिए गोपियाँ तरह- तरह के जतन करती हैं और अपनी व्याकुलता को प्रकट करने से भी नहीं हिचकिचातीं। उस व्याकुलता के चित्रण में गंगाबाई के ह्दय के भावों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। उद्धृत पद देखिए-

“सखी अब मो पै रह्यो न जाय।

चलि री मिल उन ही पैं जैये जहाँ चरावत गाय।।

अंग अंग की सब सुधि भूली देखत नंद किशोर।

मेरो मन हर लियो तब ही को जब चितयें यह ओर।।”

कृष्ण के प्रति अनुराग और कृष्ण के रूप का प्रभाव इतना ज्यादा है कि भक्त कवयित्री अपनी विकलता को अपने पदों में जीवन्त कर देती है। ऐसा नहीं कि कृष्ण पर इस विकलता कोई प्रभाव नहीं पड़ता।‌ वह भी अपनी भक्तिन की मनोकामना पूरी करने को तैयार हैं जाते हैं लेकिन बदले में या दान में कुछ मांगते हैं और यह भक्तिन दान में दे भी तो क्या। वह तो अपना सर्वस्व पहले ही कृष्ण पर वार चुकी है। प्रेमपूरित माधुर्य भाव की भक्ति में समर्पण ही मुख्य है और गंगाबाई भी यही करती हैं। स्वयं को कृष्ण के चरणों पर वारकर उनकी प्रेमासिक्त भक्ति में आपादमस्तक आप्लावित हो जाती हैं‌। उद्धृत पद में समर्पण भाव का सुंदर वर्णन हुआ है –

“ग्वालिनि दान हमारो दीजै।

अति मनमुदित होय ब्रजसुंदरि खत लाल हसि लीजै।।

दीजे मन मेरो अब प्यारे निरखि निरखि मुख जीजे।

अति रस गलित होत वः भामिनी मनमाने सो कीजे।।

चलि न सकत अति ठठकि रहत पग रूप रासि अब पीजे।

श्री विठ्ठलगिरिधरन लाल सों नवल नवल रस भीजे ।।”

 “गंगाबाई के पद” नामक संग्रह में गंगाबाई के तमाम पद संकलित हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार इनके पदों की संख्या तकरीबन 296 है। ये पद कृष्ण की भक्ति और प्रेम के साथ ही उनकी दिनचर्या से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर केंद्रित हैं। इन पदों में नायिका भेद की परिपाटी पर विरह व्यथा से व्याकुल विरहिणी नायिका का वर्णन भी हुआ है और खंडिता नायिका का भी। रासलीला और दानलीला के पद तो अत्यंत ह्दयग्राही बन पड़े हैं। इनके अतिरिक्त वर्षा ऋतु में गाए जाने वाले हिंडोला के पद भी हैं और फागुन या होरी के पद भी। मल्हार, धमार, राग गौड़ आदि पर केंद्रित पदों की रचना भी गंगाबाई ने की है। जन्माष्टमी के अवसर पर गाए जानेवाले बधाई गीत एवं भजन तो बहुत ही सुंदर बन पड़े। गुसाईं जी को विभिन्न अवसरों पर बधाई देते हुए भी गंगाबाई ने कुछ पदों की रचना की है। वस्तुतः गंगाबाई सिर्फ भक्तिन ही नहीं थीं बल्कि काव्य मर्मज्ञ भी थीं। वह स्वयं को कृष्ण की अनन्य प्रेयसी मानती थीं‌। उनका पूरा जीवन कृष्णार्पित था। उन्हें राग- रागिनियों का पर्याप्त ज्ञान भी था जिनका उपयोग वह काव्य- रचना में करती थीं। सरल- सहज ब्रजभाषा में रचित उनके पद अत्यंत सरस तथा ह्दयग्राही हैं। 

‘तू साथ है..हरदम!….रंगकर्मी एस. एम. अजहर आलम को समर्पित फिल्म

कोलकाता में रंगमंच के लिये अपनी पूरी ज़िंदगी समर्पित करने वाले उसी ‘रंग-व्यक्तित्व’ स्व.अज़हर आलम पर देखिये थेस्पियन परिवार की श्रद्धांजलि फ़िल्म ‘तू साथ है..हरदम!

सुशोभित हुई आदिगुरु शंकराचार्य की प्रतिमा, नये सिरे से संवर रहा है केदारनाथ धाम

  • 225 करोड़ रुपये की लागत से प्रथम चरण के निर्माण कार्य पूरे किए जा चुके हैं

उत्तराखंड की ये देवभूमि प्राचीन काल से ही ऋषियों की तपोस्थली रही है। साथ ही योगनगरी के रूप में ये विश्व के लोगों को आकर्षित करती रही है। हिमालय की ये तपोभूमि, जो तप और त्याग का मार्ग दिखाती है, उसके लिए पृथक राज्य के रूप में उत्तराखंड के निर्माण का सपना अटल बिहारी वाजपेयी जी ने पूरा किया था। अटल जी मानते थे कनेक्टिविटी का सीधा कनेक्शन विकास से है। उन्हीं की प्रेरणा से आज देश में कनेक्टिविटी के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अभूतपूर्व स्पीड और स्केल पर काम हो रहा है। उत्तराखंड की सरकार भी इस दिशा में गंभीरता से काम कर रही है। बाबा केदार के आशीर्वाद से केदारधाम की भव्यता को और बढ़ाया जा रहा है, श्रद्धालुओं के लिए नई सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। चारधाम को जोड़ने वाली ऑल वैदर रोड़ पर तेज़ी से काम चल रहा है। चारधाम परियोजना, देश और दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बहुत बड़ी सुविधा तो बना ही रही है, साथ ही गढ़वाल और कुमाऊं के चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों को भी आपस में जोड़ रही है। कुमाऊं में चारधाम रोड के लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर हिस्से से इस क्षेत्र के विकास को नया आयाम मिलने वाला है।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन से भी उत्तराखंड की रेल कनेक्टिविटी को और विस्तार मिलेगा। सड़क और रेल के अलावा एयर कनेक्टिविटी को लेकर हुए कार्यों का लाभ भी उत्तराखंड को मिला है। देहरादून हवाई अड्डे की क्षमता को 250 पैसेंजर से बढ़ाकर 1200 तक पहुंचाया गया है। प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशों के मुताबिक उत्तराखंड में हैलीपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

आदिगुरू शंकराचार्य की प्रतिमा

साल 2013 में आई भीषण आपदा के बाद सबसे बड़ी चुनौती केदारपुरी के पुनर्निर्माण की थी। इसकी वजह यह थी कि त्रासदी में केदारनाथ के 23 हेक्टेयर क्षेत्र में से करीब 12-13 हेक्टेयर बाढ़ में बह गया था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और केंद्र सरकार के मार्गदर्शन में केदारपुरी का मास्टर प्लान इस तरह से तैयार किया गया है जिससे यह लंबे समय तक टिका रहे। पुनर्निर्माण की योजना से लेकर उसके कार्यनान्वयन की तैयारी इस प्रकार से की गयी कि नये इन्फ्रास्ट्रक्चर में कम से कम सौ साल कोई परेशानी न आए। माननीय प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन और निर्देशन में श्री केदारनाथ धाम में पांच महत्वपूर्ण योजनाओं पर कार्य आरंभ हुए।
225 करोड़ रुपये की लागत से प्रथम चरण के निर्माण कार्य पूरे किए जा चुके हैं। पहले चरण में श्री आदि शंकराचार्य समाधि का निर्माण, सरस्वती नदी एवं उसके घाटों की सुरक्षा, तीर्थ पुरोहितों के आवास निर्माण पर 70 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं तथा मंदाकिनी नदी एवं उसके घाटों की सुरक्षा और मंदाकिनी नदी पर 60 मीटर लंबे सेतु के निर्माण पर 155 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। इसके अतिरिक्त आस्था पथ का काम किया गया है ताकि वहां रहने वालों और श्रद्धालुओं को किसी प्रकार का कष्ट न हो। इसके अतिरिक्त श्री केदारनाथ धाम में भारत सरकार के संस्कृति विभाग के नेतृत्व में प्राचीन मूर्तियों का ओपन म्यूजियम बनाया जा रहा है। केदारपुरी के पुनर्निर्माण प्रोजेक्ट के दूसरे चरण में 184 करोड़ रुपये की लागत वाले निर्माण कार्य चल रहे हैं। ये काम अब अपने अंतिम चरण में है। इसे विश्व स्तरीय धार्मिक स्थल बनाया जा रहा है। इस पूरे प्रोजेक्ट के निर्माण कार्य केदारनाथ की धारक क्षमता को ध्यान में रखकर किया गया है। विशेष ध्यान इस बात पर दिया गया है कि पुनर्निर्माण से जुड़ा हुआ जो भी काम हो वो पुरानी शैली में ही हो। श्री केदानाथ धाम में निम्न विकास कार्य किये जा रहे हैं।
केदारनाथ धाम कें मार्ग पर बनाए जाएंगे फैब्रिकेटेड रेन शेल्टर 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण कार्यों को लेकर उत्तराखंड सरकार तेजी से कदम बढ़ा रही है। इस कड़ी में केदारनाथ विकास प्राधिकरण/टिहरी विशेष क्षेत्र प्राधिकरण के लिए स्वीकृत 422.39 लाख रुपये की लागत वाली योजना के लिए शासन की ओर से 168.96 लाख रुपये की पहली किस्त जारी कर दी गयी है। इसके तहत श्री केदारनाथ धाम के पैदल मार्ग में कई जगह फैब्रिकेटेड रेन शेल्टर का निर्माण किया जाएगा। इसका सीधा लाभ केदारनाथ आने वाले घरेलू और विदेशी तीर्थयात्रियों को मिलेगा।
केदारनाथ विकास प्राधिकरण/टिहरी विशेष क्षेत्र प्राधिकरण के अंतर्गत 133.25 लाख रुपये की लागत से श्री केदारनाथ धाम पैदल यात्रा मार्ग के गौरीकुंड से जंगल चट्टी मार्ग खंड में निश्चित अंतराल पर फैब्रिकेटेड रेन शेल्टर शेड का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए शासन की ओर से 53.30 लाख रुपये की धनराशि जारी कर दी गयी है। जबकि लगभग 145.30 लाख रुपये की लागत से श्री केदारनाथ धाम पैदल मार्ग के अंतर्गत भीमबली से रामबाड़ा मार्ग खंड (वाया नवनिर्मित वैकल्पिक मार्ग) के मध्य निश्चित अंतराल पर फैब्रिकेटेड रेन शेल्टर शेड का निर्माण किया जाना है। इसके लिए शासन की ओर से 58.12 लाख रुपये का बजट जारी किया गया। ऐसे ही 143.84 लाख रुपये की लागत से बनने वाले श्री केदारनाथ धाम पैदल यात्रा मार्ग के अंतर्गत जंगल चट्टी से भीमबली मार्ग खंड में निश्चित अंतराल पर फैब्रिकेटेड रेन शेड के निर्माण के लिए शासन की ओर से 57.54 लाख रुपये जारी किए गए।
केदारनाथ धाम में रावल और पुजारियों के लिए होगा तीन मंजिला इमारत का निर्माण
विश्व प्रसिद्ध श्री केदारनाथ धाम में यात्रा और पूजा का सफल आयोजन कराने के लिए रावल और पुजारियों को एक ही छत के नीचे सभी सुविधाएं मिलेगी। इसके लिए केदारनाथ धाम में रावल व पुजारियों के लिए तीन मंजिला इमारत का निर्माण किया जाएगा। जिसके लिए शासन की ओर से 10 करोड़ रुपये का बजट जारी किए गए हैं। केदारनाथ के रावल ही धाम में छह माह की पूजा-अर्चना के लिए पुजारी को अधिकृत करते हैं।
श्री केदारनाथ धाम से करीब 300 मीटर सरस्वती नदी समीप बनने वाले तीन मंजिला इमारत में 18 कक्षों का निर्माण किया जाएगा। 6.39 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली इस इमारत में रावल निवास, पुजारी आवास, भोग मंडी, पंथेर आवास, समालिया आवास, वेदपाठी आवास, पूजा कार्यालय आदि की व्यवस्था की जाएगी। जिसके लिए उत्तराखंड शासन की ओर से 10 करोड़ रुपये की धनराशि उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम बोर्ड को प्राप्त हो चुकी है। जिसकी पहली किस्त मार्च और दूसरी किश्त जुलाई को जारी की गयी है।

धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रसाद योजना
प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रसाद योजना के तहत श्री केदारनाथ के रूट पर अवस्थापना सुविधाओं के विकास के लिए 34.78 करोड़ की स्वीकृति प्रदान करते हुए भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय की ओर से अब तक 27.83 करोड़ रुपये की धनराशि अवमुक्त की जा चुकी है। योजना के तहत धाम में होने वाले सभी विकास कार्य पूरे किए जा चुके हैं। जबकि श्री बद्रीनाथ धाम के लिए योजना के तहत भारत सरकार पर्यटन मंत्रालय की ओर से 39.23 करोड़ की  धनराशि स्वीकृत करते हुए 11.77 करोड़ रुपये की धनराशि अवमुक्त की जा चुकी है। जिसकी मदद से बद्रीनाथ धाम में योजना के तहत होने वाले कार्यों को तेजी से किया जा रहा है। इसके साथ ही प्रसाद योजना के तहत गंगोत्री और यमुनोत्री धाम में तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के लिए होने वाले विकास कार्यों की 54.35 करोड़ रुपये की डीपाआर पर प्रशासनिक स्वीकृति मिल गयी है।

केदारनाथ में बनने वाले म्यूजियम में संजो कर रखी जाएगी उत्तराखंड की संस्कृति
भारत सरकार के संस्कृति विभाग के नेतृत्व में श्री केदारनाथ धाम में बनाए जाने वाले म्यूजियम में उत्तराखंड की संस्कृति को संजो कर रखा जाएगा। जिसमें मुख्य रूप से प्राचीन शिव मूर्तियों व चित्रों को शामिल किया जाएगा। केदारनाथ धाम में होने वाले विभिन्न विकास कार्यों के तहत अस्पताल, अतिथि गृह, पुलिस स्टेशन व अन्य निर्माण कार्याेँ के लिए 8 भवनों का ध्वस्तीकरण किया जाएगा।
साल 2013 में आई आपदा से हुई क्षति से उभरने के लिए प्रदेश सरकार की ओर से केंद्र सरकार के मार्गदर्शन में श्री केदारनाथ मास्टर प्लान के अंतर्गत विभिन्न निर्माण व पुनिर्माण कार्य किए जाने हैं। केदारनाथ धाम में प्राचीन मूर्तियों का ओपन म्यूजियम बनाया जाएगा। जिसका कार्य भारत सरकार के संस्कृति विभाग के नेतृत्व में पूरा किया जाएगा। साथ ही तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरस्वती एवं मंदाकिनी नदी के संगम का अत्याधुनिक तरीके से पूर्ननिर्माण किया जाएगा। इसके अलावा श्रद्धालुओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा दी जाए। इसके लिए धाम के पास अस्पताल भी तैयार किया जाएगा, जो अत्याधुनिक तकनीक और विभिन्न प्रकार की सुविधाओं से लैस होगा। इसके साथ ही धाम के आसपास एक अतिथि गृह, पुलिस स्टेशन और कमांड एंड कंट्रोल सेंटर भी तैयार किया जाना प्रस्तावित है।
केदारनाथ धाम में बने जीएमवीएन और प्रशासनिक भवन वर्तमान में चालू हालत में हैं। जिसमें से 4 भवनों में प्रत्येक भवन में 5 कक्ष कुल 20 कक्ष हैं। जो यात्राकाल में जिला प्रशासन द्वारा प्रशासनिक अधिकारियों के लिए शासकीय कार्य के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। अन्य 4 भवन हालनुमा कक्ष के रूप में निर्मित हैं। जिनका उपयोग वर्तमान में लाया जा रहा है। इन सभी भवनों का करीब 77.00 लाख रुपये की लागत से ध्वस्तीकरण किया जाएगा। जिनके स्थान में करीब 5462 लाख रुपये की लागत से धाम में अन्य भवनों का निर्माण कार्य किए जाएंगे।
श्री केदारनाथ में सुशोभित हुई आदिगुरु शंकराचार्य की प्रतिमा
श्री केदारनाथ धाम में आदिगुरु शंकराचार्य की प्रतिमा सुशोभित हुई। मैसूर के मूर्तिकारों द्वारा कृष्णशिला पत्थर से तैयार की 12 फीट ऊंची प्रतिमा की चमक के लिए उसे नारियल पानी से पॉलिश किया गया है।
साल 2013 में आई दैवीय आपदा में आदिगुरु शंकराचार्य की समाधि भी बह गई थी। जिसके बाद माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दिशा निर्देश में केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण कार्यों के तहत आदिगुरु शंकराचार्य की समाधि विशेष डिजाइन से तैयार की गई है। आदिगुरु शंकराचार्य की समाधि केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे छह मीटर जमीन की खुदाई कर बनाई गई है। समाधि के मध्य में मैसूर के मूर्तिकारों द्वारा तैयार प्रतिमा को सुशोभित किया गया।
पांच पीढ़ियों से मूर्तिकला की विरासत को संजोए हुए मैसूर के मूर्तिकार योगीराज शिल्पी ने अपने पुत्र अरुण के साथ मिलकर मूर्ति का काम पूरा किया है। आदिगुरु शंकराचार्य की प्रतिमा निर्माण के लिए देश भर के मूर्तिकारों की ओर से अपना मॉडल पेश किया गया था। जिसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से योगीराज शिल्पी को प्रतिमा तैयार करने के लिए अनुबंध किया गया था। इस विशेष परियोजना के लिए योगीराज ने कच्चे माल के रूप में लगभग 120 टन पत्थर की खरीद की और छेनी प्रक्रिया को पूरा करने के बाद इसका वजन लगभग 35 टन है। योगीराज ने साल 2020 के सितंबर माह से प्रतिमा बनाने का काम शुरू किया था। मूर्तिकला आदि शंकराचार्य को बैठने की स्थिति में प्रदर्शित करती है।
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केन्द्र सरकार और राज्य सरकार का एजेंडा उत्तराखंड का समग्र विकास है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीति सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास को लेकर उत्तराखंड का समग्र विकास करने के लिए लगातार काम किया जा रहा है। इसका प्रदेश के हर एक व्यक्ति को सीधा लाभ मिलेगा।
सतपाल महाराज, पर्यटन मंत्री

आने वाले 10 सालों में रिकोर्ड तोड़ तीर्थयात्री आएंगे केदारनाथ :  पीएम मोदी

-पीएम मोदी ने आदि गुरु शंकराचार्य की प्रतिमा का किया अनावरण

– नया आकर्षण बनी आदि गुरु शंकराचार्य की प्रतिमा

देहरादून। दिवाली के ठीक एक दिन बाद उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध चारधामों में से एक तथा भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री केदारनाथ धाम पहुंचे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आदि गुरु शंकराचार्य के समाधि स्थल पर उनकी प्रतिमा का अनावरण किया। इससे पहले गर्भगृह में पूजन करने के बाद पीएम ने यहां की परिक्रमा की। इस मौके पर सभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि श्री केदारनाथ धाम में हो रहे तमाम विकास कार्यों से उत्तराखंड के पर्यटन को बहुत फायदा मिलेगा। पिछले 100 सालों में जितने श्रद्धालु यहां आए हैं, आने वाले 10 सालों में रिकोर्ड तोड़ पर्यटक और श्रद्धालु केदारनाथ आएंगे।

धाम में आदि गुरु शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित होने से उत्तराखंड पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। इसके साथ ही श्री केदारनाथ धाम में तीर्थयात्रियों के लिए पर्यटन की दृष्टि से नया आकर्षित स्थल भी तैयार हुआ है। इससे प्रदेश और चारधाम यात्रा से जुड़े व्यापारियों व कारोबारियों को न केवल आर्थिक लाभ मिलेगा। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केदारनाथ में तमाम निर्माण कार्यों का शिलान्यास और लोकार्पण भी किया। पीएम मोदी ने कहा कि कि बाबा केदार में आकर बेहद अलग अनुभूति होती है, जो बरबस मुझे अपनी तरफ खींच लेती है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य के सामने बैठकर मुझे आदि शंकराचार्य के नजरों से तेज पुंज नजर आ रहा था। गरूड़ चट्टी से मेरा विशेष लगाव है। सरस्वती के घाट, मंदाकनी पर पुल बनाकर यात्रा सुगम होगी। पीएम मोदी ने कहा कि उत्तराखंड में होमस्टे के नेटवर्क से देश-दुनिया के पर्यटकों व तीर्थयात्रियों को घर जैसी सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। श्री केदारनाथ धाम में परंपरा और आधुनिकता के मेल से हुए विकास कार्यों से श्रद्धालुओं व तीर्थ पुरोहितों को सहायता मिलेगी। साथ ही केदारनाथ धाम तक तीर्थयात्रियों को केबल कार से पहुंचाने की भी तैयारी की जा रही है।

वहीं, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री का हिमालय और हिमालय के तमाम मंदिरों से विशेष लगाव रहा है। प्रधानमंत्री ने हमेशा से यहां से आध्यात्मिक दिव्य ऊर्जा प्राप्त की है। पीएम मोदी का धन्यवाद करते हुए सीएम धामी ने कहा कि उनके निर्देश पर ही केदारनाथ के पुनर्निर्माण के कार्य संपन्न हो रहे हैं। साल 2013 में आई दैवीय आपदा में आदि गरु शंकराचार्य की समाधि बह गई थी। जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिशा निर्देश में केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण कार्यों के तहत आदि गुरु शंकराचार्य की समाधि अद्भुत तरीके से बनाई गई है। इसका सीधा लाभ उत्तराखंड के पर्यटन और यहां के स्थानीय लोगों को मिलेगा।