Saturday, April 11, 2026
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संग्रामी सावरकर : तीनों भाई जेल गए तो महिलाओं ने सम्भाला परिवार

वीर सावरकर पर हमला हुआ तो लाठी लेकर खड़ी हुईं पत्नी

वीर सावरकर हमेशा से ही चर्चा में रहे हैं और उनके विरोधी विवाद खड़ा करते रहे हैं। आज हम बात वीर सावरकर भाइयों की करेंगे मगर विवाद की नहीं, बल्कि सावरकर परिवार की उन महिलाओं की जो उनकी प्रेरणा बनीं और स्वाधीनता संग्राम में उनकी ढाल भी बनीं।

savarkar.org के मुताबिक वीर सावरकर जब अंडमान की सेलुलर जेल में थे, तब उनकी पत्नी यमुनाबाई ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली। यमुनाबाई का साहस तब देखने को मिला, जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद भीड़ ने सावरकर को मारने के लिए उनके घर को घेर लिया। यमुनाबाई खुद लाठी लेकर भीड़ के सामने खड़ी हो गयीं। सावरकर गांधी की हत्या में आरोपी थे जिन्हें बाद में आरोप मुक्त कर दिया गया।

सावरकर महिलाओं की जिंदगी पर उपन्यास
सावरकर की जिंदगी पर छिड़ी बहस के बीच डॉ. शुभा साठे का उपन्यास ‘त्या तिघी’ चर्चा में आ गया है। इसमें उन्होंने सावरकर परिवार की तीन महिलाओं का जिक्र किया है। त्या तिघी उपन्यास के आधार पर नाटक तैयार करने वाली अपर्णा चोथे का कहना है कि यह उपन्यास स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के परिवार की महिलाओं पर आधारित है।

यमुनाबाई

सावरकर परिवार की महिलाओं की चर्चा नहीं होती
सावरकर भाइयों यानी गणेश, विनायक और नारायण सावरकर की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका की अब तक चर्चा होती रही है, लेकिन तीनों भाइयों की पत्नियों- यशोदाबाई, यमुनाबाई और शांताबाई सावरकर के बलिदान और संघर्ष को लेकर चर्चा देखने को नहीं मिलती है।

नाटक के जरिए उजागर की महिलाओं की भूमिका
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में अपर्णा चोथे ने कहा, ‘मुझे डॉ. शुभा साठे के उपन्यास ‘त्या तिघी’ के बारे में पता चला। इसमें तीनों सावरकर महिलाओं के संघर्ष और बलिदान की कहानी है। यह महत्वपूर्ण लग रहा था कि उनकी कहानी को बताया जाए। इसी इरादे से मैंने तीन सावरकर महिलाओं पर आधारित एक नाटक के मंचन का फैसला किया।’

पति को आजादी की लड़ाई में हर सहयोग दिया
अपर्णा कहती हैं, ‘कई लोगों के जीवन में संकट उनके भाग्य में होता है, लेकिन जो इन तीन महिलाओं को अलग बनाता है, वह है उनका जीवन जीने का तरीका। वो दुख, शोक, संकट और पीड़ा का जहर पीते हुए भी सोच में जीवंत थीं। उनकी देशभक्ति सच्ची थी। इन तीनों महिलाओं ने अपने पतियों से अलग होने की पीड़ा और भूख को सहने के बावजूद, स्वतंत्रता के लिए अपने पतियों के संघर्षों में साथ दिया। वे जानती थीं कि उनके पतियों ने देश की सेवा करने की शपथ ली है, इसलिए उन्होंने परिवार को संभाला, एक-दूसरे का साथ दिया। इस तरह आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई।’

सावरकर महिलाओं की कहानी कहता है त्या तिघी
अपर्णा बताती हैं, ‘त्या तिघी’ 80 मिनट का एक नाटक है। इसे मैंने तीन बहनों की भूमिका, उनके जीवन के उदाहरणों के आधार पर तैयार किया है। सबसे बड़े कपल यशोदाबाई और गणेश सावरकर ने खुद अशिक्षित होने के बावजूद अनाथ छोटे भाइयों की परवरिश की। उन्होंने विनायक को बैरिस्टर और नारायणराव को डॉक्टर बनने में मदद की। जब गणेश और विनायक सावरकर अंडमान की सेलुलर जेल में लाइफटाइम जेल की सजा काट रहे थे, तब उनकी पत्नियों को उनके घर पर लगातार पुलिस छापे के साथ रोजमर्रा की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि शांताबाई भी सबसे छोटे भाई नारायणराव से शादी करने के लिए तब भी तैयार हो गईं, जब उन्हें पता चला कि दोनों बड़े भाइयों को उनकी राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए जेल में डाल दिया गया है। इन महिलाओं का उनके रिश्तेदारों ने भी साथ नहीं दिया। फिर भी वे डटी रहीं।
कैसे हुई यमुनाबाई और सावरकर की शादी?
यमुनाबाई का जन्म 04 दिसंबर 1888 को हुआ था। वह रामचंद्र त्र्यंबक (भाउराव) और लक्ष्मीबाई (मनुताई) चिपलूनकर के चार बेटों और सात बेटियों में सबसे बड़ी थीं। उनका मायके का नाम यशोदा था, लेकिन उनके छोटे भाई-बहन उन्हें प्यार से ‘जीजी’ कहकर बुलाते थे। बाद में, उन्हें लोग ‘माई’ कहकर पुकारने लगे। भाऊराव चिपलूनकर ठाणे जिले के जवाहर रियासत में दीवान थे। यमुनाबाई का बचपन खुशनुमा बीता। हालांकि वह चौथी कक्षा तक ही पढ़ पाईं। भाऊराव को अपनी बेटी के लिए पति तलाश करने में मेहनत नहीं करनी पड़ी। असल में सावरकर और भाऊराव एक-दूसरे को जानते थे। यशोदा (सावरकर के बड़े भाई बाबाराव की पत्नी) और यमुनाबाई दोस्त थे। सावरकर से यमुनाबाई के पिता प्रभावित थे। यमुनाबाई के पिता ने सावरकर के मामा और बड़े भाई बाबाराव से अपनी बेटी की शादी की बात चलाई जिस पर सभी राजी थे, लेकिन सावरकर के मामा ने अपने भांजे की पढ़ाई की खर्च उठाने की भाऊराव के सामने शर्त रखी जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस तरह यमुनाबाई और विनायक सावरकर फरवरी 1901 में शादी के बंधन में बंध गए।

सावरकर नहीं करते थे पूजा, पर पत्नी को करने से नहीं रोका
​​​यमुनाबाई को उस समय लोग माई बुलाते थे। वह एक साधारण महिला थीं जो सावरकर का बहुत ख्याल रखती थीं। उन्होंने उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखा, यह सुनिश्चित किया कि सारवरकर के कपड़े दुरुस्त हों। वह जब भी मौका मिलता सावरकर के साथ समय बितातीं। वह एक धार्मिक महिला थीं। वह प्रतिदिन पूजा करती थीं। सावरकर स्वयं पूजा पाठ करने में विश्वास नहीं रखते थे, लेकिन कभी भी यमुनाबाई को पूजा करने से नहीं रोका।

(साभार – दैनिक भास्कर)

सिविल इंजीनियर ने बनायी पराली और राख से ईंटें

10 महीनों में ही मिले 3.5 करोड़ के ऑर्डर

रुड़की :   उत्तराखंड में रुड़की के रहने वाले तरुण जैमी पेशे से सिविल इंजीनियर हैं, लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के समय या उसके बाद, उन्होंने कभी नौकरी के बारे में नहीं सोचा। वो लगातार ऐसा काम करने के बारे में सोचते थे, जिससे न सिर्फ कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में बदलाव आए बल्कि उन्हें भी अच्छी कमाई हो। हुआ भी यही।

तरुण ने ग्रीनजैम्स नाम से एक स्टार्टअप शुरू किया। इसके जरिए उन्होंने कृषि और फ्लाई ऐश (राख) से ईको-फ्रेंडली ईंटें बनाने का काम शुरू किया। ऐसी ईंटों को एग्रोक्रिट कहा जाता है। दिसंबर 2020 में इसकी शुरुआत और सिर्फ 10 महीनों में उनके स्टार्टअप को 3.5 करोड़ के ऑर्डर मिल चुके हैं।
31 साल के तरुण जैमी सिविल इंजीनियर हैं और फिलहाल सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ( सीएसआईआर – सीबीआरआर) से सिविल इंजीनियरिंग में पीएचडी कर रहे हैं। तरुण बताते हैं मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने ये तय किया था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वो कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में बदलाव लाएंगे और वो ऐसा कर भी रहे हैं।

तरुण बताते हैं ‘ग्रीनजैम्स’ स्टार्टअप का आइडिया दिल्ली की एक घटना से आया। “मैं 2019 में दिल्ली में ड्राइव कर रहा था। स्मॉग और पॉल्यूशन के कारण के कार के शीशे से बहार साफ दिखाई नहीं दे रहा था और इस वजह से मेरी कार लगभग दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। मैंने वापस आने के बाद दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण का कारण जानना चाहा। एक रिसर्च से पता चला कि हरियाणा और पंजाब में फसल की कटाई के बाद जलने वाली पराली दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता के लिए 44% तक जिम्मेदार है।

पराली यानी फसल काटने के बाद बचा बाकी हिस्सा होता है, जिसकी जड़ें धरती में होती हैं। अगली फसल बोने के लिए खेत खाली करना होता है, तो सूखी पराली को आग लगा दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में बहुत ज्यादा मात्रा में कार्बन निकलता है और पर्यावरण को नुकसान ​​​​होता है। कुछ महीनों की रिसर्च के बाद 2020 में तरुण ने अपने भाई और पिता के साथ मिलकर ‘ग्रीनजैम्स’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया, जिसका मकसद एग्रोक्रीट यानी ईको- फ्रेंडली बिल्डिंग मटेरियल तैयार करना है।

क्या होती है कार्बन नेगेटिव ईंट?

ईको फ्रेंडली या एग्रोक्रीट ईंट बनाने की लिए पराली का इस्तेमाल किया जाता है। तरुण बताते हैं, “हर सीजन में फसल काटने के बाद पराली बच जाती है। इसको हमारी टीम किसानों से खरीदती है। इसके छोटे-छोटे टुकड़े किये जाते हैं और गरम पानी में उबला जाता है। उबली हुई पराली को थर्मल पावर से निकलने वाली राख और बाइंडर  (जो सीमेंट की तरह ही काम करता है और ये इको फ्रेंडली होता है) के साथ मिलाकर कार्बन नेगेटिव या एग्रोक्रीट ईंटे तैयार करते हैं।” इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा पराली का इस्तेमाल होता है। इस स्टार्टअप की वजह से किसान पराली को जलाने के बजाय तरुण की कंपनी को बेच देते हैं। “अब तक हमने 20-25 किसानों के साथ टाई अप किया है, जो फसल काटने के बाद पराली जलाने के बजाय हमें बेच देते हैं। हर एक एकड़ पराली के लिए किसानों को तीन हजार रुपये दिए जाते हैं।” एग्रोक्रीट ईंट किसान और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है।

भट्ठे वाली ईंट से बेहतर
तरुण बताते हैं कार्बन नेगेटिव ईंटें बनाने से सबसे ज्यादा फायदा पर्यावरण को होता है। इन ईंटों को बनाने में पराली का इस्तेमाल होता है, जिसे पहले जला दिया जाता था और उसकी वजह से पर्यावरण में कार्बन की मात्रा और ज्यादा बढ़ती है।तरुण बताते हैं, “भट्ठे वाली ईंटों की तुलना में ये कार्बन निगेटिव ईंटें बहुत मजबूत होती हैं । ये ऐसी ईंटें हैं जिससे बनाने वाली बिल्डिंग गर्मी में न ज्यादा गरम होगी और न ही ठंड में ज्यादा ठंडी। भट्ठे वाली ईंट की तुलना में इसको बनाने में 50% कम लागत और 60% कम समय लगता है। कार्बन नेगेटिव ईंटों से बनाने वाली इमारत या मकान में सीमेंट का इस्तेमाल भी 60% तक कम होता है। ऐसे ही कई खूबियां के कारण ये भट्ठे वाली ईंटों से कहीं ज्यादा बेहतर हैं।” तरुण बताते हैं, “ ‘ग्रीनजैम्स’ में तकरीबन 10 स्थायी कर्मचारी हैं जो साल भर काम करेंगे। इसके अलावा हमें सीजनल एम्प्लॉई की भी जरूरत होती है, जो फसल काटने के समय काम करते हैं। हमारे स्टार्टअप से किसानों को भी रोजगार मिल रहा है। अब तक हमने 20-25 किसानों के साथ टाई-अप कर लिया है, जबकि तकरीबन 100 से अधिक किसानों से अगले सीजन में काम करने के लिए बात हो गयी है।” तरुण का कहना है कि आने वाले समय में कई लोगों को खास कर किसानों को इस काम से फायदा होगा।
(साभार – दैनिक भास्कर)

तुर्रम खान को लेकर कहावत तो सुनी है, आज उनको जान भी लीजिए

बड़ा तुर्रम खां बन रहा है.’ ‘ज्यादा तुर्रम खां मत बनो.’ ‘खुद को तुर्रम खां समझ रहा है.’ इस तरह के संवाद आपने अक्सर सुने होंगे. जब कोई हीरो या रंगबाज बनता है तो उसे तुर्रम खां बोल दिया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसके नाम पर इतने डायलॉग बन गए असल में वो कौन थे? चलिए आज जान लेते हैं –

असली नाम था तुर्रेबाज खान
तुर्रम खां का असली नाम तुर्रेबाज खाऩ था। तुर्रम खां कोई मामूली शख्स नहीं थे, बल्कि 1857 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई के क्रांतिकारी थे। मंगल पांडे ने बैरकपुर में जिस आजादी की लड़ाई की शुरुआत की थी, हैदराबाद में उसका नेतृत्व तुर्रम खां ने किया था।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में किया था हैदराबाद नेतृत्व
1857 के स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी मंगल पांडे ने बैरकपुर में फूंकी थी, यह चिंगारी जल्दी ही दानापुर, आरा , इलाहाबाद, मेरठ, दिल्ली , झांसी होते हुए पूरे भारत में आग की तरह फैल गयी। इसी क्रम में हैदराबाद में अंग्रेजों के एक जमादार चीदा खान ने सिपाहियों के साथ दिल्ली कूच करने से मना कर दिया। उसे निजाम के मंत्री ने धोखे से कैद कर अंग्रेजों को सौंप दिया जिन्होंने उसे रेजीडेंसी हाउस से कैद कर लिया गया। उसी को छुड़ाने के लिए जांबाज तुर्रम खां अंग्रेजों पर आक्रमण को तैयार हो गए। 17 जुलाई 1857 की रात की रात को तुर्रम खान ने 500 स्वंतंत्रता सेनानियों के साथ रेजीडेंसी हाउस पर हमला कर दिया।

रात में ही कर दिया अंग्रेजों पर हमला
तुर्रम खां ने रात को हमला इसलिए किया क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि रात के अचानक हमले से अंग्रेज हैरान रह जाएंगे और उन्हें फतेह हासिल होगी लेकिन उनकी इस उम्मीद और योजना एक गद्दार ने विफल कर दिया। दरअसल, दरअसल निजाम के वजीर सालारजंग ने गद्दारी करते हुए अंग्रेजों को पहले ही सूचना दे दी थी। अंग्रेज पूरी तरह से तुर्रम खां के हमले के लिए तैयार थे। उनके तोप गोलों से भरकर तैनात थे और हजारों सिपाही बंदूक भर कर तुर्रम खां और उसके साथियों का ही इंतजार कर रहे थे।

नहीं आए अंग्रेजों की गिरफ्त में
अंग्रेजों के पास बंदूकें और तोपें थीं, जबकि तुर्रम खां और उनके साथियों के पास केवल तलवारें थीं। इसके बावजूद तुर्रम खां ने हार नहीं मानी. तुर्रम खान और उसके साथी अंग्रेजों पर टूट पड़े। तुर्रम की तलवार अंग्रेजों के तोप और बंदूक पर भारी पड़ने लगी लेकिन अंग्रेज संख्या बल और हथियारों में ज्यादा थे। तुर्रम खां और उनके साथी पूरी रात अंग्रेजों का मुकाबला करते रहे। अंग्रेजों की भरपूर कोशिश के बाद भी वे तुर्रम खां को पकड़ नहीं पाए।

धोखे से की हत्या
उस युद्ध के बाद अंग्रेजों ने तुर्रम खां के ऊपर 5000 रुपये का इनाम रख दिया। कुछ दिनों बाद एक गद्दार तालुकदार मिर्जा कुर्बान अली बेग ने तूपरण के जंगलों में धोखे से तुर्रम खान को मार गया।  तुर्रम खां की बहदुरी के चलते लोग आज भी उन्हें याद करते हैं।

(साभार – जी न्यूज)

जैविक खेती में 1.5 लाख रुपये लगाकर 50 करोड़ कमाते हैं योगेश

नयी दिल्ली : बदलते वक्त के साथ खेती-किसानी के क्षेत्रों में भी आधुनिक तकनीक एवं पद्धति की जरूरत महसूस हो रही है। इन्हीं बदलाव पर अमल करते हुए राजस्थान के जालोर के योगेश जोशी ने किसानों को मदद करने का बीड़ा उठाया था। आज योगेश अपने 50 करोड़ रुपये के ऑर्गेनिक खेती व्यवसाय के ज़रिये हजारों किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में काम कर रहे हैं। 1.5 लाख रुपये के निवेश से शुरू हुई योगेश की कंपनी अब 50 से अधिक स्टाफ की मदद से 50 करोड़ से भी ज्यादा का कारोबार कर रही है।
कृषि विज्ञान में अपनी डिग्री पूरी करने के बाद योगेश जोशी ने जैविक खेती में डिप्लोमा के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की। साल 2006 में 8000 रुपये महीने की नौकरी के साथ योगेश ने अपने करियर की शुरुआत की। करीब चार साल तक काम करने के बावजूद योगेश का वेतन केवल 12,000 रुपये महीने पर ही पहुंच पाया, इससे योगेश निराश हो गए और साल 2010 में उन्होंने नौकरी छोड़ जैविक खेती का व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया।
योगेश ने बताया कि जैविक खेती शुरू करने के पीछे उनका मकसद लोगों को मधुमेह, कैंसर जैसी बीमारियों से सुरक्षा दिलाना भी है। पश्चिमी देशों में लोग पहले ही जैविक फल-सब्जियों का सेवन कर रहे हैं। भारत में इसका प्रचलन हाल ही में शुरू हुआ है, कोरोना महामारी के बाद शरीर की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के उद्देश्य से लोग जैविक भोजन पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
योगेश किसानों को बेहतर दाम देकर जैविक फल-सब्जियां खरीदते और फिर उन्हें बड़ी कंपनियों को बेचते जो महंगे भाव पर जैविक खाद्य पदार्थ खरीदना चाहती हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने सात किसानों के साथ मिलकर जीरे की जैविक खेती शुरू की। व्यावहारिक अनुभव की कमी के कारण योगेश ने खेत की मिट्टी में मिले रसायन को खत्म करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया और इस वजह से उनकी पहली फसल बेकार हो गई।

सही तरीका सीखा
तीन साल बाद योगेश ने किसानों के खेत को रसायन से पूरी तरह मुक्त करने में सफलता हासिल की। जोशी के पास ऑर्गेनिक खेती के प्रोजेक्ट में निवेश करने के लिए ज्यादा पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने अपने दोस्तों की मदद ली और 1.5 लाख रुपये का निवेश करके काम शुरू किया।

10 साल में मिली कामयाबी
10 साल पहले शुरू हुई योगेश की एक छोटी शुरुआत बड़े संगठन का रूप ले चुकी है। योगेश की कंपनी रैपिड ऑर्गेनिक अब 3,000 से अधिक किसानों के साथ काम कर रही है। किसानों को बीज, प्रौद्योगिकी, जैविक उर्वरक और संपूर्ण सहायता प्रदान करती है। किसान जैविक उत्पाद उगाकर योगेश को देते हैं। वित्तीय समस्या से जूझ रहे किसानों को लोन भी मिलता है और फिर कंपनी उनसे उचित मूल्य पर फसल भी खरीदती है।

विदेश में जाती है उपज
योगेश ने अब तक 10,000 किसानों को जैविक खेती प्रमाणपत्र हासिल करने में भी मदद की है। योगेश की कंपनी किसानों से 2-3 हजार टन जैविक फसल खरीदती है और उन्हें भारत और विदेशों में बेचती है। योगेश के जैविक खाद्य पदार्थ की बिक्री जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और अन्य देश में होती है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

हालात सामान्य होने तक किसी भी ई-नीलामी से परहेज करेगी कोल इंडिया 

नयी दिल्ली : बिजली उत्पादन संयंत्रों में कोयले के कम भंडार के बीच सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया ने अपनी सहायक कंपनियों से हालात सामान्य होने तक बिजली क्षेत्र के लिए विशेष फॉरवर्ड ई-नीलामी को छोड़कर कोयले की किसी भी तरह की ई-नीलामी आयोजित करने से परहेज करने को कहा है।
गौरतलब है कि बिजली संकट की खबरों के मद्देनजर कोयले की आपूर्ति के लिए बिजली क्षेत्र को प्राथमिकता दी जा रही है। कोल इंडिया ने अपनी सहायक इकाइयों को भेजे एक पत्र में कहा, ‘‘बिजली घरों में भंडार की मौजूदा स्थिति को देखते हुए घटते स्टॉक को फिर से भरने के लिए बिजली क्षेत्र को कोयले की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा रही है। कोयला कंपनियों को सलाह दी जाती है कि बिजली क्षेत्र के लिए विशेष फॉरवर्ड ई-नीलामी को छोड़कर हालात सामान्य होने तक किसी भी ई-नीलामी से परहेज करें।’’
इन सहायक कंपनियों में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल), भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) और सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) शामिल हैं। पत्र में कहा गया कि यदि कोई कोयला कंपनी बिजली क्षेत्र को भेजे जाने वाले कोयले को प्रभावित किए बिना किसी अन्य क्षेत्र को ई-नीलामी करना चाहती है तो ऐसी किसी भी नीलामी की योजना से पहले उचित कारण के साथ कोल इंडिया पहले बताया जा सकता है।
कोल इंडिया ने कहा कि राष्ट्र के हित में यह केवल एक अस्थायी प्राथमिकता है और इसका आशय ई-नीलामी प्रारूप को रोकना नहीं है।

भवानी देवी ने फ्रांस में जीती तलवारबाजी स्पर्द्धा

नयी दिल्ली : ओलंपिक के लिये क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला तलवारबाज भवानी देवी ने फ्रांस में चार्लेलविले राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में महिला व्यक्तिगत साबरे वर्ग में खिताब जीता । भवानी ने इसके बारे में ट्वीट करके जानकारी दी ।
उन्होंने लिखा ,‘‘ फ्रांस में चार्लेलविले राष्ट्रीय टूर्नामेंट में महिलाओं के साबरे व्यक्तिगत वर्ग में जीत दर्ज की । कोच क्रिस्टियन बाउर, अर्नाड श्नाइडेर और सभी साथियों को धन्यवाद । सत्र की अच्छी शुरूआत के लिये बधाई ।’’ तोक्यो में भवानी ने राउंड आफ 64 का मुकाबला जीता था लेकिन अगले दौर में हार गई थी । वह इस समय विश्व रैंकिंग में 50वें स्थान पर है और फिलहाल एशियाई खेल 2022 की तैयारी में जुटी है ।

श्रीलंका के पहले टेस्ट कप्तान बांदुला वर्णपुरा का निधन

कोलंबो : श्रीलंका के पहले टेस्ट कप्तान बांदुला वर्णपुरा का निधन हो गया। वह 68 बरस के थे। स्थानीय मीडिया की खबरों के अनुसार शरीर में शर्करा का स्तर काफी अधिक बढ़ने के चलते रक्त संचार में समस्या के कारण इसी महीने उनका दायां पैर काटना पड़ा था। ठोस तकनीक वाले सलामी बल्लेबाज वर्णपुरा मध्यम तेज गति की गेंदबाजी करने में भी सक्षम थे।
फरवरी 1982 में इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट में श्रीलंका की अगुआई करने के अलावा वह देश की ओर से टेस्ट क्रिकेट में पहली गेंद का सामना करने वाले और पहला रन बनाने वाले बल्लेबाज भी थे। इसी मैच में बल्लेबाजी और गेंदबाजी (दूसरी पारी में) दोनों में श्रीलंका के लिए आगाज करने का कारनामा भी उन्होंने किया। श्रीलंका क्रिकेट (एसएलसी) ने उनके निधन पर शोक जताया है।
वर्णपुरा ने 1975 से 1982 तक चार टेस्ट और 12 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में देश का प्रतिनिधित्व किया। वर्णपुरा ने हालांकि विद्रोही टीम के साथ 1982-83 में रंगभेद दौर में दक्षिण अफ्रीका का दौरा करने का फैसला किया था जिसके बाद श्रीलंका क्रिकेट ने उन पर आजीवन प्रतिबंध लगाया था। उन्होंने बाद में राष्ट्रीय टीम के कोच और श्रीलंका क्रिकेट में प्रशासक की भूमिका निभाई।

महिलाओं के लिए नये अवसर लाया वर्क फ्रॉम होम का चलन

‘वर्क फ्रॉम होम’ … कोरोना काल में यह नया शब्द हमारी बोलचाल का हिस्सा बना गया है। भले ही महामारी के चलते नौकरियों पर संकट छाया रहा, लेकिन चुनौतियों के साथ बहुत से अवसर भी आए हैं। इस दौरान जो नौकरियां उपलब्ध हुईं, उनमें महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है। ‘कॅरियर प्लेटफॉर्म जॉब्स फॉर हर’ की रिसर्च बताती हैं कि 2019 में महिलाओं को काम पर रखने वाली कंपनियों की संख्या 18% थी, वहीं ये आंकड़ा 2021 में 33% हो गया। इस शोध में यह बात भी सामने आई कि कंपनियां हर भूमिका के लिए महिला कर्मचारियों पर भरोसा जता रही हैं। उन्हें मैनेजमेंट से लेकर सीनियर लेवल तक की जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। करीब 300 कंपनियों पर किए गए इस सर्वे में यह भी पता चला कि जो महिलाएं पढ़ी-लिखी होने के बावजूद शादी के बाद अपने कॅरियर को छोड़ देती हैं उनके लिए वर्क फ्रॉम होम का कल्चर नया अवसर बनकर उभरा है।

कॅरियर को लेकर महिलाएं ज्यादा केन्द्रित
वॉशिंगटन में प्यू रिसर्च सेंटर की मानें तो युवा महिलाएं पुरुषों से ज्यादा कॅरियर पर ध्यान दे रही हैं। महिलाओं के लिए सफल कॅरियर ही पहली प्राथमिकता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि वे अपने कॅरियर के अलावा परिवार की जरूरतों के बारे में नहीं सोचती हैं। आधुनिक दौर की महिलाएं अपनी इस पारंपरिक छवि को भी बनाए रखती हैं। वे परिवार और करियर, दोनों पर ही ध्यान देती हैं। इसी सर्वे में महिलाओं और पुरुषों दोनों ने माना कि वे शादी और पैरेंटिंग को भी जीवन की महत्वपूर्ण चीजों में एक मानते हैं। पीडब्ल्यूसी की खोज के अनुसार कोरोनाकाल में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं अपने करियर की संभावनाओं के बारे में ज्यादा अलर्ट रही हैं।

फिर वेतन कम क्यों?
देश में जेंडर पे गैप पर लंबे समय से बहस चल रही है। ए जर्नल ऑफ इकोनॉमी एंड सोसाइटी में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि आमतौर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम कमाती हैं। वेतन को लेकर बात करने में महिलाएं काफी पीछे हैं इसलिए उनकी तनख्वाह कम होती है। महिलाओं की प्रोमोशन और वेतन की मांग की बात को भी अनसुना किया जाता है। वहीं, द जेंडर नेचर ऑफ ऑथरशिप के अनुसार अकादमिक और शोध के काम का श्रेय महिलाओं को उनके पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले में कम मिलता है।

क्या महिलाओं के लिए तनाव बन रहा गर्भधारण करना?
फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि ज्यादातर कामकाजी महिलाओं को लगता है कि प्रेग्नेंट होने से उनकी जॉब को खतरा हो सकता है या फिर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जा सकता है। वहीं, इस मामले में पिता बनने वाले पुरुषों को कार्यस्थल पर ज्यादा बढ़ावा मिलता है।

फर्जी नौकरियों के प्रलोभन से रहें दूर
अधिकतर महिलाएं इंटरनेट सर्फिंग के दौरान कई बेहतर नौकरियाँ देखती हैं। कई बार फोन कॉल्स भी आते हैं, लेकिन इसमें बहुत सी फर्जी होती हैं। ऐसे में अलर्ट रहना जरुरी है, क्योंकि गोपनीय सूचनाओं का फायदा उठाकर कोई भी ब्लैकमेल कर सकता हैं। इस स्थिति से बचने के लिए कंपनी के बारे में अच्छी तरह से रिसर्च करना जरुरी है।

इन क्षेत्रों में भविष्य संवार सकती हैं महिलाएं

डिजिटल मार्केटिंग,विज्ञापन, फैशन डिजाइनिंग, एयर होस्टेस, पत्रकारिता एवं जन संचार, शिक्षण, मानव संसाधन

कृष्ण भक्ति में भौतिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्ति का मार्ग ढूंढती हैं रणछोड़ कुंवरि जी

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, राजस्थान के राजघरानों में साहित्य- संवर्धन की सुदीर्घ गौरवमय परंपरा रही है। राज- काज के साथ साहित्य, कला और संगीत को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करने में यहाँ के राजा-महाराजों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। राजघराने की रानियाँ भी इस मामले में पीछे नहीं रहीं। पुरूषों में जहाँ जोधपुर के महाराजा मानसिंह, तख्तसिंह आदि समेत कई नाम गिनाए जा सकते हैं वहीं रानियों में तीजण भटियाणी अर्थात प्रताप कुंवरि बाई सहित कई ऐसी रानियों के नाम लिए‌ जा सकते हैं जिन्होंने साहित्य- साधना में अपना जीवन न्योछावर दिया। भले ही साहित्य सृजन का रास्ता भक्ति की राह से होकर निकला लेकिन इससे न रचयिता का महत्व कम करके आंका जा सकता है ना रचना का। कुछ राम को अपना आराध्य देव मानती थीं तो कुछ कृष्ण को। रामभक्ति के प्रति समर्पित कुछ रानियों का जिक्र मैं पहले कर चुकी हूं। आज मैं एक कृष्ण भक्त कवयित्री से आपको परिचित करवाऊंगी जो इतिहास के पन्नों पर बहुत ज्यादा स्थान तो नहीं घेरतीं लेकिन साहित्य के प्रति इनके समर्पण को‌ अनदेखा नहीं किया जा सकता। सखियों, मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि ऐश्वर्य के सागर में डूबी रानियों का जीवन बहुधा बहुत से मानसिक कष्टों से घिरा होता था। साथ ही राजमहल में बहुत तरह के षडयंत्र भी हुआ करते थे। शायद इनसे मुक्ति का मार्ग भक्ति में ही दिखाई देता था। संभवतः इसीलिए राजकुल की रानियों ने राम और कृष्ण के प्रति स्वयं को समर्पित करते हुए ‌उनसे अपने उद्धार की विनती बार- बार की है। मुक्ति कामना का स्वर इन रानियों की रचनाओं में प्रमुखता से गुंजरित होता है। सुख -समृद्धि के बीच आखिर ‌वह कौन सी ऐसी छटपटाहट या वेदना थी जो भौतिक सुखों को‌ त्यागकर रानियों को आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर करती थी, इसके उत्तर इतिहास के पन्नों में ही नहीं छिपे हैं बल्कि मानव मनोविज्ञान की किताबों में भी ढूंढे जा सकते हैं। अतिव्यस्त महाराजा पतियों से प्राप्त उपेक्षा या प्रेम का अभाव इन रानियों को एक ऐसे काल्पनिक जगत में ढकेल देता था जहाँ ‌अराध्य प्रेमी में और प्रेमी अराध्य में बदल जाता था और भौतिकता के बंधनों को काटकर‌ ये रानियाँ अपने प्रभु की भक्ति में स्वयं को‌ लय कर देना चाहती थीं। रानी रणछोड़ कुंवरि के काव्य में भी बंधनों की पीड़ा और छटपटाहट को‌ स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है और मुक्ति के लिए लगाई गई गुहार भी साफ- साफ सुनाई देती है। इस गुहार में मध्ययुगीन ‌स्त्री की पीड़ा- वेदना की आवाजें ‌घुली- मिली हैं।

रानी रणछोड़ कुंवरि बाघेली जी रीवां राज्य के महाराजा विश्वनाथ प्रसाद के भ्राता बलभद्रसिंह की पुत्री थीं। इनका जन्म संवत् 1946 में हुआ था। इनका विवाह जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह से संवत 1961 में हुआ था। रणछोड़ कुंवरि जी राजस्थान की अधिकांश शिक्षित राजकुमारियों और महारानियों की तरह कृष्ण की उपासक थीं और उनकी अराधना में उन्होंने पदों की रचना की थी। राजकीय जीवन में सुख समृद्धि के प्राचुर्य के बावजूद वह अपने आराध्य गोविंद लाल से स्वयं को भौतिक कष्टों से उबारने की याचना करती हैं। मुक्ति की आकांक्षा का स्वर इनके पदों में मुखर हो उठा है। एक पद देखिए-

“गोविन्द लाल तुम हमारे, मोहे दुख में उबारे|

मै सरन हूँ कि तिहारे, तुम, काल कष्ट टारे||

हो बाघेली के प्यारे, सिरक्रीट मुकुट वारे।

छोनी छटा को पसारे, मोहिनी सूरत न निसारे।।”

हालांकि इस पद में कोई शिल्प का चमत्कार या भाषा की कलाबाजी नहीं है लेकिन सहज मन का प्रेम और विरही आत्मा की व्याकुल पुकार को साफ- साफ महसूस कराया जा सकता है जो अपने प्रेमी या आराध्य से प्रार्थना करती है कि उसे दुखों के दलदल से उबारकर मोक्ष प्रदान करे। अपने अराध्य देव के रूप पर मुग्ध भक्त कवयित्री एक प्रेयसी की भांति उनके नाम के साथ अपना नाम जोड़कर प्रसन्न और आश्वस्त ‌होती है।

कृष्ण के ही एक और नाम वाली रणछोड़ कुंवरि जी अपने पदों में बार- बार गोविंद को स्मरण करती हैं और बताती हैं कि किस प्रकार उन्हें सुमिरने से मन निर्मल हो जाता है और मानव मात्र को मुक्ति का पथ सहजता से प्राप्त हो जाता है। एक और पद देखिए-

“आभा तो निर्मल होय सूरज किरण उगे से,

चित्त तो प्रसन्न होय गोविन्द गुण गाये सें|

पीतल तो उज्जवल रेती के मांजे से,

हृदय में जोति होय गुरु ज्ञान पाये सें||

भवन में विक्षेप होय दुनियां की संगति से,

आनंद अपार होय गोविन्द के धाये से||

मन को जगावो अरु गोविन्द के सरन आबो,

तिरने के ये उपाय गोविन्द मन भाये सें||”

रणछोड़ कुंवरि बाघेली जी के किसी स्वतंत्र काव्य ग्रंथ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती लेकिन इनके बहुत से भक्तिभाव से पूरित पद और कवित्त मिलते हैं जिनमें कृष्ण के मनमोहक स्वरूप का वर्णन मिलता है। कृष्ण के स्वरूप और चरित वर्णन के द्वारा कवयित्री उनके प्रति अपनी निष्ठा को अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं और कृष्ण के प्रति समर्पण और उनकी सेवा में ही भौतिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्ति का मार्ग ढूंढती हैं। इनके पदों को पढ़ते हुए मध्ययुगीन स्त्री के जीवन की यंत्रणा और छटपटाहट को महसूस किया जा सकता है।

 

सत्ता और बाजार के अतिक्रमण से आस्था और उत्सव को बचाना भी होगा

शुभजिता फीचर डेस्क

आज दशमी है, विजयादशमी..और आप सभी को शुभ विजयादशमी। शुभजिता दुर्गोत्सव में कई मंडप देखे, कई प्रतिमाएँ देखीं और अब वातावरण में हर्ष और विषाद के सुर मिल गये हैं तो विचार भी उमड़ रहे हैं। दुर्गा पूजा हमारी आस्था, विश्वास और उल्लास का पर्व है। समय बदला तो इसमें मनोरंजन की मात्रा बढ़ी और इसके बाद बाजार का हस्तक्षेप भी बढ़ा और अब राजनीति का दखल भी बढ़ रहा है। जब तक सब कुछ सही अनुपात में हो, बुरा नहीं लगता। सबकी जरूरत है मगर अनुपात और हर चीज कितनी होनी चाहिए…यह शायद हम भूल रहे हैं।

मोहम्मद अली पार्क की पूजा में टीकाकरण एक थीम बना

परम्परा पर बाजार हावी हुआ मगर तब क्या करें जब आडम्बर हावी होने लगे और सारा प्रचार तंत्र उत्सव के आनन्द में इतना डूब जाये कि सही और गलत का फर्क भूलने लगे। सम्भवतः आपको लगे कि बातों को जटिल बनाया जा रहा है मगर आप खुद सोचिए तो क्या हमारी जीवन शैली ऐसी नहीं हो गयी कि हम असामान्य चीजों को भी चलन के नाम पर स्वीकार करने लगे हैं। उत्सव में राजनीति नहीं मिलनी चाहिए और विश्वास में तो बिल्कुल नहीं। सारा शहर बुर्ज खलीफा के जादू में मदहोश होता जा रहा है। माँ की प्रतिमा को सोने की साड़ी पहनायी जा रही है, करोड़ों के आभूषण पहनाये जा रहे हैं…जमकर सराहा जा रहा है मगर इसके पीछे जो अन्धेरा है, कभी उसके बारे में सोचिए…क्या मंडप बनाने वालों और माँ की प्रतिमा को बनाने वाले हाथों में हमने उम्मीद का एक भी दीया रखा है? कोई सवाल नहीं करेगा कि ये करोड़ों रुपये जो खर्च हो रहे हैं, उनका स्त्रोत क्या है.. ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारे उत्सव आडम्बर के साथ ही अब श्रद्धा के नाम पर काले को सफेद बनाने का खेल बन गये हैं।

इस राज्य में पूजा आयोजकों को बहुत प्रोत्साहन मिला है, आर्थिक सहायता और बिजली भी मिली है मगर किस कीमत पर मिली है, यह मंडप के बाहर प्रवेश द्वार को देखने पर समझ आ जाता है जब आप सरकारी योजनाओं से लेकर राजनेताओं के बड़े होर्डिंग्स देखते हैं। बंगाल में इस बार की पूजा में सरकारी योजनाओं का प्रचार जिस तरह से हुआ और हद तो तब हो गयी जब नेत्री को देवी बना दिया गया। क्या यह देवी की आराधना है…सरकारी योजनाएं जनता के लिए होती हैं…तो उनके लिए 2-4 बैनर काफी हैं लेकिन सत्ता और बाजार दोनों ही आस्था को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, यह गलत है। इधर बांग्लादेश में एक अफवाह के कारण माँ दुर्गा की प्रतिमायें तोड़ी जा रही हैं तो दूसरी तरफ किसानों से सहानुभूति के नाम पर राजनीति की रोटियाँ सेंकी जा रही हैं। सहानुभूति जताने के और भी तरीके हैं, व्यथा दर्शाने के और भी तरीके हैं मगर पंडाल के बाहर जूते – चप्पल और पैर दिखाकर क्या साबित करने की कोशिश की गयी, यह समझ के बाहर है। दूसरी तरफ ऐसे भी मंडप हमने देखे जो थोड़े में बहुत कुछ कह गये। बजट कम था मगर सन्देश बड़ा। सामाजिक कार्यों में पूजा आयोजकों को व्यस्त देखा गया। यह अच्छी बात है मगर सबसे पहले हमें खुद से सवाल करना होगा कि हम आधुनिकता के नाम पर स्वार्थ की जो गठरी ढो रहे हैं, वह हम कब तक ढो सकेंगे? अच्छी बात यह रही है कि कार्निवल के नाम पर माँ की प्रतिमाओं को लेकर होने वाला रोड शो नहीं हो रहा, वरना यह तमाशा भी आस्था के अपमान जैसा ही लगता है कई बार।

जनता का उत्सव सत्ता और बाजार के पास रह गया है और हम सब मन में जानते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए। इस बार भी कोरोना का प्रभाव लगभग हर मंडप पर रहा…पूजा आयोजकों की थीम भी कोरोना बना तो कहीं पर माँ को कोरोनासुर का वध करते हुए दिखाया गया। हर मंडप में आयोजकों को जनता से मास्क पहनने, दूरी रखने और भीड़ से बचने का अनुरोध करते हुए देखा गया मगर हम सब जानते हैं कि पंडालों के बाहर स्थिति क्या रही। लोगों को मास्क पहनने में दिक्कत रही।

ऐसे में अगर कोरोना की तीसरी लहर दस्तक दे तो इसमें हैरत क्या? लॉक डाउन की परिस्थिति में बंगलों में रहने वालों पर शायद असर न हो मगर उनके बारे में सोचिए जो रोज कमाते हैं, तब पेट भरता है। उन बच्चों के बारे में सोचिए जो पिछले 2 साल से स्कूल का चेहरा तक नहीं देख सके हैं। शायद यह हमारे मन के विकार हैं जो इतनी बाधाएं आ रही हैं। आज विजयादशमी है, घाटों पर विर्सजन के लिए कतार लगेगी। सत्ता हो, बाजार हो या हम हों, उत्सव की गरिमा को बनाये रखना हमारा ही दायित्व है, इसे भूलना नहीं चाहिए। आश्छे बोछर में आस्था का बाजार न बने, बस यही प्रार्थना है, सुन रही हो न माँ?