Sunday, July 5, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 317

जागृति

प्रो. प्रेम शर्मा

अपराधी दंडित हों-ठीक है,
भ्रष्टाचारी प्रताड़ित हों-मान्य है,
दुराचारी अपमानित हों-स्वीकार है,
पापी का संहार हो-प्रशंसनीय है।

निरपराधी को अलग-थलग करना
पाप है,
सच को सच न स्वीकार करना
दुराचार है,
विध्वंशक लोकतंत्र का विरोध न करना-अनाचार है,
पापियों को दंडित न करना
अधर्म है।

सच्चा कोई मरे नहीं
शर्मिंदगी से,
निरपराधी घुट घुट कर जिए नहीं
आत्मग्लानि से
सदाचारी चरित्र बदले नहीं
विद्रोह में,
धर्मनिष्ठ तिल तिल मरे नहीं
अराजकता में।

जागृति का एक तांडव होना चाहिए
युग परिवर्तन का संकल्प होना चाहिए
आडंबर रहित समाज होना चाहिए
नव आशा उपहार सबको मिलना चाहिए।।

पद्मश्री : लावारिस लाशों के ‘मसीहा’ हैं अयोध्या के शरीफ चाचा

अयोध्या: हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके समाजसेवी मोहम्मद शरीफ को निस्वार्थ सेवा के लिए राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। बुजुर्ग समाजसेवी मोहम्मद शरीफ को लावारिस लाशों के मसीहा के तौर पर जाना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने पिछले 25 वर्षों में 25,000 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है। 30 वर्ष पूर्व युवा पुत्र की मार्ग दुर्घटना से मौत और लावारिस के तौर पर उसके अंतिम संस्कार ने शरीफ पर ऐसा असर डाला कि वो किसी भी लावारिस शव के वारिस बन कर सामने आए।
गौरतलब है कि मोहम्मद शरीफ को पद्मश्री पुरस्कार के लिए चयनित होने के लिए साल 2020 में पत्र मिला था लेकिन कोरोना महामारी के कारण नहीं मिल सका। उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है. साथ ही स्वास्थ्य खराब होने की वजह से परिवार परेशान रहता है। बीते कुछ महीनों पहले उनकी हालात बेहद खराब हो गई थी, परिजनों के पास उनके इलाज कराने तक के पैसे हीं बचे थे. घरवालों पर अलग अलग तरह के कर्जें हैं। उनका बेटा गाड़ी चलाकर परिवार को पालता है.
छोटे बेटे को खोने के बाद लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने वाले मोहम्मद शरीफ चाचा ऐसे खोए की साइकिल मरम्मत की स्थापित दुकान हाशिये पर आ गयी। सेवा संवेदना के जोश में गृहस्थी की गाड़ी पटरी से उतर गयी। शरीफ के तीन बेटों में एक ने साइकिल मरम्मत की दुकान खोली। दूसरे ने मोटरसाइकिल की मरम्मत का काम शुरू किया और तीसरे ड्राइवर का पेशा अपनाया। तन ढंकने के लिए कपड़े दो जून की रोटी और सिर पर छत की जुगत में सुनिश्चित होती रही। मोहम्मद शरीफ भी घरेलू जिम्मेदारी से ऊपर उठकर अपना मिशन आगे बढ़ाते गए।

पद्मश्री : डायन प्रथा की शिकार बनीं और अब इसके खिलाफ मशाल बनीं ‘छुटनी देवी

सरायकेला : झारखंड की छुटनी देवी को पद्मश्री सम्‍मान से नवाजा गया है। इस महिला को कभी डायन कह कर घर-गांव से निकाल दिया गया था। 62 साल की छुटनी महतो के नाम के आगे अब भारत का श्रेष्ठ सम्मान पद्मश्री जुड़ गया है। एक समय ऐसा भी था कि घर वालों ने डायन के नाम पर न सिर्फ उसे प्रताडि़त किया, बल्कि घर से बेदखल भी कर दिया था। आठ माह के बच्चे के साथ पेड़ के नीचे रहीं। तब पति ने भी साथ छोड़ दिया था। आज वह अपनी जैसी असंख्य महिलाओं की ताकत बन गई है। छुटनी महतो सरायकेला खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड की बिरबांस पंचायत के भोलाडीह गांव में रहती हैं। गांव में ही एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा) के सौजन्य से संचालित पुनर्वास केंद्र चलाती है। वह बतौर आशा की निदेशक (सरायकेला इकाई) यहां कार्यरत है।
छुटनी कहती हैं कि शादी के 16 साल बाद 1995 में एक तांत्रिक के कहने पर उसे गांव ने डायन मान लिया था। इसके बाद उसे मल खिलाने की कोशिश की थी। पेड़ से बांधकर पिटाई की गई। जब लोग उसकी हत्या की योजना बना रहे थे, पति को छोड़कर चारों बच्चों के साथ गांव छोड़कर चली गई। इसके बाद आठ महीने तक जंगल में रहीं। गांव वालों के खिलाफ केस करने गईं, पर पुलिस ने भी मदद नहीं की। लेकिन अब कोई किसी महिला को डायन बताकर प्रताडि़त नहीं कर सकता। उन्होंने अपनी जैसी पीडि़त 70 महिलाओं का एक संगठन बनाया है, जो इस कलंक के खिलाफ लड़ रहा है।
छुटनी कहती हैं कि जैसे ही ऐसे मामले की सूचना मिलती है, उनकी टीम मौके पर पहुंच जाती है। आरोपितों और अंधविश्वास फैलाने वाले तांत्रिकों पर प्राथमिकी दर्ज कराती है। वह पीडि़ता को अपने साथ ले आती हैं। कानूनी कार्रवाई के बाद सशर्त घर वापसी कराती हैं। अबतक 100 से अधिक महिलाओं की घर वापसी करा चुकी हंै। उनका संगठन आरोपितों के खिलाफ कोर्ट में भी लड़ाई लड़ता है। वह कहती हैं कि मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान प्रताडि़त महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान लाना रहा है। आज गांव वाले किसी महिला को डायन कहने से पहले 10 बार सोचते हैं।
ऐसे डायन घोषित कर दी गईं छुटनी

छुटनी की शादी धनंजय महतो के साथ हुई थी। जब उनकी भाभी गर्भवती हुईं तब छुटनी ने कहा कि बेटा होगा, लेकिन बेटी हुई। एक दिन वह बीमार हो गई। स्वजन ने डायन का आरोप लगाकर छुटनी को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। अशिक्षित छुटनी महतो को गांव वालों ने प्रताडि़त करते हुए मल-मूत्र पिलाया। पेड़ से बांधकर पीटा और अर्धनग्न कर गांव की गलियों में घसीटा। छुटनी भागकर मायके चली गई। अब वह दूसरी कमजोर व बेसहारा महिलाओं का सहारा बन गई हैं। किसी भी महिला के प्रताडि़त होने की खबर मिलते ही अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ वहां पर पहुंच जाती हैं। लोगों को पहले समझाती हैं। नहीं मानने पर जेल भिजवाती हैं।
छुटनी ने बताया कि पद्मश्री क्या होता है, मुझे नहीं मालूम, लेकिन कोई बड़ा चीज तो जरूर है, तभी मुझे लगातार फोन आ रहा है। छुटनी ने बताया कि उन्हें सुबह 11 बजे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से फोन आया। बोला कि आपको पद्मश्री मिलेगा। छुटनी ने कहा कि अभी टाइम नहीं है, एक घंटे बाद फोन करना। छुटनी ने बताया कि दोबारा दोपहर 12.15 बजे फोन आया। फोन करने वाले ने बताया कि आपका नाम और फोटो सभी अखबार और टीवी में आएगा। तभी से गांव के लोग काफी खुश हैं। बाहर से भी लगातार फोन आ रहा है, इसलिए लग रहा है कि यह जरूर कोई बड़ी चीज है।
मरते दम तक मेरा संघर्ष जारी रहेगा
छुटनी कहती हैं कि डायन के नाम पर मैंने गहरा जख्म झेला है। चार बच्चों को लेकर घर छोडऩा पड़ा। यदि मैं डायन होती तो उन अत्याचारियों को खत्म कर देती, पर ऐसा कुछ होता नहीं है। ओझा के कहने पर ग्रामीणों ने ऐसा जुल्म किया, जिसकी कल्पना सभ्य समाज नहीं कर सकता है। पुलिस-प्रशासन भी ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता है। मैं उस असभ्य समाज से लोहा ले रही हूं, जहां नारी को सम्मान नहीं मिलता। मरते दम तक मेरा संघर्ष जारी रहेगा।

पद्मश्री : तस्वीरों से इतिहास रचतीं हैं मधुबनी कलाकार दुलारी देवी

मधुबनी: 2 साल की उम्र में शादी, गरीबी की मार अलग… घरों में काम करने वाली दुलारी ने खुद नहीं सोचा था कि उनका संघर्ष उन्हें पद्मश्री दिलाएगा। देश का वो सम्मान जिसे पाने की चाह हर किसी में होती है। लेकिन दुलारी को पद्मश्री पुरस्कार मिलने के पीछे छिपा है उनका अनवरत संघर्ष… 54 साल की दुलारी ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया।
सात हजार मिथिला पेंटिंग बना चुकी हैं पद्मश्री दुलारी देवी
बिहार के मधुबनी जिले के रांटी गांव की रहने वाली दुलारी देवी का जन्म ही अभावों और गरीबी के बीच हुआ। राजनगर प्रखंड की दुलारी देवी बेहद ही गरीब मल्लाह परिवार में जन्मीं थीं। माता-पिता ने 12 साल की उम्र में ही इनका विवाह कर दिया। सात जन्मों के बजाए दुलारी सात साल में ही ससुराल से मायके वापस आ गईं और वो भी 6 महीने की बेटी की मौत के गम के साथ। पढ़ी लिखीं भी नहीं थीं, क्या करतीं। लेकिन कहते हैं कि अगर औरत हिम्मत न छोड़े तो बहुत कुछ कर दिखाती है। मायके से ही दुलारी ने फिर से संघर्ष शुरू किया। घरों में झाड़ू-पोंछा लगा कर कुछ आमदनी हो जाती थी, दुलारी का जीवन चल रहा था लेकिन नसीब में कुछ और था। हाथों में पोंछे की जगह कूची ने ले ली। इसके बाद मधुबनी पेंटिंग बनाने का जो सिलसिला दुलारी ने शुरू किया वो आज तक नहीं रुका। हाथों में जादू ऐसा कि एक वक्त पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी दुलारी की तारीफ की।
किस्मत कब किसे किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दे, कौन जाने। यही दुलारी के साथ हुआ। अपने ही गांव में मिथिला पेंटिंग की मशहूर चित्रकार कर्पूरी देवी के घर दुलारी को झाड़ू-पोंछा करने का काम मिल गया। संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात… ये कहावत यहीं से सच होनी शुरू हो गई, खाली समय में दुलारी अपने घर-आंगन को ही माटी से पोतकर और लकड़ी की ब्रश बना मधुबनी पेंटिंग करने लगीं। कर्पूरी देवी का साथ मिलते ही मानों दुलारी के हाथों का जादू बाहर आ गया।

किताबों तक में दुलारी की गाथा दर्ज
गीता वुल्फ की पुस्तक ‘फॉलोइंग माइ पेंट ब्रश’ और मार्टिन लि कॉज की फ्रेंच में लिखी पुस्तक मिथिला में दुलारी की जीवन गाथा व कलाकृतियां सुसज्जित हैं। सतरंगी नामक पुस्तक में भी इनकी पेंटिग ने जगह पाई है। इग्नू के लिए मैथिली में तैयार किए गए आधार पाठ्यक्रम के मुखपृष्ठ के लिए भी इनकी पेंटिग चुनी गई। पटना में बिहार संग्रहालय के उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दुलारी देवी को विशेष तौर पर आमंत्रित किया। वहां कमला नदी की पूजा पर इनकी बनाई एक पेंटिग को जगह दी गई है। 2012-13 में दुलारी राज्य पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं।

पद्मश्री : ठुकरायी गयी बच्चियों का सहारा बनती हैं पंजाब की प्रकाश कौर

पंजाब के जालंधर सिटी की सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश कौर को 72वें गणतंत्र दिवस पर पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। यह अवॉर्ड पंजाब में परिवार द्वारा ठुकराई गई बालिकाओं के प्रति उनकी सामाजिक सेवा को मान्यता देता है। 63 साल की प्रकाश कौर को उनके माता-पिता ने त्याग दिया था। उन्होंने कहा, ‘पुरस्कार ने समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी को कई गुना बढ़ा दिया है। उनका सबसे बड़ा पुरस्कार तब होगा जब सभी बच्चों को उनके माता-पिता द्वारा पाला जाएगा।’

उन्होंने कहा, ‘मैं सभी से एक निवेदन करना चाहूंगी कि वे अपनी नवजात लड़कियों को कचरे या झाड़ियों में न छोड़ें। अगर किसी के लिए किसी भी कारण से एक बालिका को पालना मुश्किल है, तो हम उसका स्वागत खुली बांहों के साथ करेंगे। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां आवारा कुत्तों ने रास्ते में छोड़े हुए शिशुओं को काट लिया और कुछ मामलों में उनकी मृत्यु हो गई। यह बहुत परेशान करने वाला है।’

लाड़-प्यार से पाली जाती हैं बच्चियां

कौर ‘यूनिक होम’ नाम की संस्था चला रही हैं, जिसमें 9 दिन से लेकर 20 साल तक की 80 बच्चियां हैं। अब तक 15 बच्चियों की शादी भी की जा चुकी है। यहां हर बच्चे को लाड़ प्यार से पाला जाता है। वे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों जैसे कि मसूरी में सेंट मैरीज, जालंधर में सेंट जोसेफ आदि में पढ़ सकते हैं और शहर के किसी भी बड़े मॉल से खरीदारी कर सकते हैं। बच्चे हर साल गर्मियों के दौरान किसी भी हिल स्टेशन पर 15 दिनों की छुट्टी पर जा सकते हैं। हर साल 24 अप्रैल को सभी बच्चों का जन्मदिन मनाता है।एक विशाल केक काटा जाता है।

पद्म विभूषण : पत्थरों और रेत पर कहानियाँ कह जाते हैं सुदर्शन

भुवनेश्वर : सुदर्शन साहू को बेजान पत्थरों को उकेरकर पौराणिक कथाओं को सजीव सी दिखने वाली मूर्तियां गढ़ने में महारत हासिल है। अपनी कला के लिए 1988 में पद्मश्री से नवाजे जा चुके सुदर्शन ने 1977 में पुरी में क्राफ्ट म्यूजियम स्थापित किया था। इस बार सुदर्शन साहू को पद्म विभूषण सम्मान दिया गया है।
इसके बाद उन्होंने 1991 में भुवनेश्वर में ओडिशा सरकार के साथ मिलकर एक आर्ट्स एंड क्राफ्ट कॉलेज स्थापित किया था, जहां वे पत्थरों, लकड़ियों और फाइबर ग्लास को जानदार लगने वाली मूर्तियों में बदलने की कला सिखाते हैं। सुदर्शन साहू का जन्म 11 मार्च 1939 को ओडिशा के पुरी में हुआ था। सुदर्शन साहू प्रसिद्ध मूर्तिकार हैं। उनकी बनाई कलाकृतियों की प्रदर्शनी देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं।

‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ से हो चुके हैं सम्मानित
सुदर्शन को 1981 में पत्थर पर नक्काशी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्होंने शिल्प गुरु पुरस्कार 2003 प्राप्त किया। उन्हें वर्ष 2012 में ओडिशा ललित कला अकादमी द्वारा धर्मपद पुरस्कार मिला।

पद्मश्री : पारंपरिक पोशाक में जब नंगे पांव पहुँचीं वनों की रक्षक तुलसी गौड़ा

कर्नाटक की 72 वर्षीय पर्यावरणविद् तुलसी गौड़ा को पेड़ों के संरक्षण में उनके अपार योगदान के लिए राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने पद्मश्री से सम्मानित किया। भारत देश में ऐसे कई लोग हैे, जो बिना किसी स्वार्थ के लिए दूसरों के जीवन में परिवर्तन लाने के लिए अपना जीवन लगा देते हैं। बिना किसी को बताए। बिना किसी लालच के। गुमनामी में। ऐसा ही एक नाम है तुलसी गौड़ा।  भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री प्राप्त करने के लिए राष्ट्रपति भवन के दरबार हाॅल में तुलसी अपनी पारंपरिक पोशाक में जब नंगे पांव पहुंची, तो उनकी इस सादगी ने सबका दिल जीत लिया। तुलसी गौड़ा के काम को भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें 8 नवंबर 2021 को दिया गया। जब तुलसी को यह सम्मान मिला तो दरबार हाॅल तालियों से गूंज उठा। तालियों की इस गूंज में सम्मान था सच्चाई के लिए। सम्मान था देश की सेवा के लिए। सम्मान था आत्मसमर्पण के लिए। सम्मान था निःस्वार्थ सेवा के लिए। सम्मान था अपने जीवन के 60 साल बिना किसी उम्मीद के देश के लिए समर्पित करने के लिए।

जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया

तुलसी गौड़ा को जंगल की ‘इनसाइक्लोपीडिया’ नाम से जाना जाता है। क्योंकि उन्हें दुनिया भर में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों और पौधों की प्रजातियों के बारे में व्यापक ज्ञान है, वे किशोर अवस्था से ही पर्यावरण की रक्षा में सक्रिय रूप से योगदाान दे रही हैं और बिना किसी आर्थिक मदद के हजारों पेड़ लगा चुकी हैं।

कौन हैं पर्यावरणविद तुलसी गौड़ा

आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा पिछले 6 दशक से पर्यावरण के लिए काम कर रही हैं। अब तक वे 30 हजार से अधिक पौधे लगा चुकी हैं। वो भी बिना किसी आर्थिक मदद के। उनकी यह समाजसेवा सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी है। गौड़ा जिन्हें वनों का ‘इंनसाइक्लोपीडिया’ माना जाता है। कर्नाटक के हेलक्की जनजाति से ताल्लुक रखती हैं। छोटी उम्र में अपने पिता को खो देने वाली तुलसी कभी स्कूल नहीं गईं। जब वह सिर्फ 12 साल की थीं, तब अपनी मां के साथ एक स्थानीय नर्सरी में काम करने लगीं गई और वहां काम करते हुए पौधों के बारे में उन्होंन अपार ज्ञान प्राप्त किया। तुलसी की शादी किशोरावस्था में पहुंचने से पहले ही हो गयी थी। लेकिन इससे प्रकृति के प्रति उनके प्रेम भावना में कमी नहीं आई। प्रक्रति की रक्षा के प्रति उनका यही समर्पण था, जिसने उन्हें वन विभाग में एक स्थायी नौकरी दिला दी। गणमान्य व्यक्तियों के साथ पद्मश्री पुरस्कार समारोह में भाग लेने के दौरान उनकी सादगी ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचा। टिवटर यूजर्स ने दिग्गज पर्यावरणविद की विनम्रता की प्रशंसा करते हुए, उन्हें देश की ‘बेयर फुट वंडर वुमन’ बताया। देश का गौरव तुलसी समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

और भी कई पुरस्कारों से नवाजी जा चुकी हैं पद्मश्री तुलसी

भारत के चाैथे सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री  के अलावा कर्नाटक वानिकी विभाग में उनके व्यापक कार्यकाल के लिए उन्हें और भी कई पुरस्कार और मान्यता मिली हैं। जैसे- 1986 में इंदिरा प्रियदर्शिनी व्रक्ष मित्र अवार्ड, 1999 में कर्नाटक राज्य सरकार का राजोत्सव अवार्ड प्रमुख हैं।

हिन्दी कथा साहित्य की स्तम्भ वरिष्ठ कथाकार मन्नू भंडारी का निधन

‘महाभोज’ और ‘आपका बंटी’ जैसी कालजयी रचनाओं की लेखिका मन्नू भंडारी सोमवार 15 नवम्बर  को निधन हो गया।
यह खबर आते ही साहित्‍य जगत में शौक पसर गया। वे नयी कहानी आंदोलन की पुरोधाओं में थीं, जिनकी रचनायें कई दशकों से हमें अपने समय को समझने और संवारने में मदद करेगी। अपने लेखन कार्यकाल में मन्‍नू भंडारी ने कहानियां और उपन्यास दोनों लिखे हैं। ‘मैं हार गई’ (1957), ‘एक प्लेट सैलाब’ (1962), ‘यही सच है’ (1966), ‘त्रिशंकु’, ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’ और ‘आंखों देखा झूठ’ उनके द्वारा लिखे गए कुछ महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है। उन्होंने अपनी पहली कहानी ‘मैं हार गई’ अजमेर में ही लिखी थी जो काफी मशहूर हुई थी।

हिन्दी की प्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931 को मध्यप्रदेश में मंदसौर ज़िले के भानपुर गांव में हुआ था। मन्नू का बचपन का नाम ‘महेंद्र कुमारी’ था। उनके पिता सुख संपत राय उस दौर के जाने-माने लेखक और समाज सुधारक थे, जिन्होंने स्त्री शिक्षा पर बल दिया। वह लड़कियों को रसोई में न भेजकर, उनकी शिक्षा को प्राथमिकता देने के समर्थक थे। मन्नू के व्यक्तित्व निर्माण में उनके पिता का काफी योगदान रहा। उनकी माता का नाम अनूप कुंवरी था जो कि उदार, स्नेहिल, सहनशील और धार्मिक प्रवृति की महिला थी। इसके अलावा परिवार में मन्नू के चार-बहन भाई थे।

बचपन से ही उन्हें, प्यार से ‘मन्नू’ पुकारा जाता था इसलिए उन्होंने लेखन में भी अपने नाम का चुनाव मन्नू का ही किया। लेखक राजेंद्र यादव से शादी के बाद भी महेंद्र कुमारी मन्नू भंडारी ही रही। मन्नू भंडारी ने अजमेर के ‘सावित्री गर्ल्स हाई स्कूल’ से शिक्षा प्राप्त की और कोलकाता से बीए की डिग्री हासिल की थी। उन्होंने एमए तक शिक्षा ग्रहण की और वर्षों तक दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में पढ़ाया।

 

बच्चों के लिए आई नयी कोरोना वैक्सीन

देश में बच्चों के लिए कोरोना वैक्सीन जल्द लगनी शुरू हो सकती है। सरकार ने जायडस हेल्थकेयर की तरफ से बनाई गई दुनिया की पहली डीएनए बेस्ड कोरोना वैक्सीन ZyCov-D की 1 करोड़ खुराक का ऑर्डर दे दिया है। यह वैक्सीन 12 साल से ऊपर के उम्र वाले लोगों को लगाई जा सकती है। सरकार इसे 12-18 साल के बच्चों को लगाने के लिए खरीद रही है। क्या है कीमत, क्यों यह बाकी वैक्सीन से अलग है, कोरोना से बचाव में यह कितनी कारगर है…आइए जानतें हैं इससे जुड़ी बड़ी बातें।

सरकार को कितने में पड़ रहा एक डोज?

ZyCov-D तीन डोज वाली वैक्सीन है। सरकार इसके लिए 265 रुपये प्रति डोज के हिसाब से ऑर्डर दिया है। यानी 3 डोज की कीमत पड़ी 795 रुपये। नीडल-फ्री तकनीक के लिए 93 रुपये प्रति डोज अलग से लगेंगे। इसमें जीएसटी शामिल नहीं है। इस तरह सरकार के लिए तीनों डोज के लिए कीमत 1,074 रुपये होगी।
क्या आम आदमी को इसके लिए देने पड़ेंगे पैसे?
अगर सरकारी सेंटर पर वैक्सीन लगवाते हैं तो यह मुफ्त में पड़ेगी। लेकिन प्राइवेट सेंटर पर इस वैक्सीन का पूरा कोर्स यानी 3 डोज 1500-2500 रुपये के बीच हो सकता है।
किनको लगेगी ये वैक्सीन?
यह वैक्सीन 12 साल या इससे ऊपर के व्यक्ति को लगाई जा सकती है। इसका मतलब है कि इसे 12 साल से 18 साल तक के बच्चों को भी लगाया जा सकता है। यह बात इसे खास बनाती है क्योंकि फिलहाल देश में बच्चों को कोरोना की वैक्सीन नहीं लग रही है। सरकार ने इसे 12 से 18 साल के बच्चों के लिए ही खरीदा है।
तीनों डोज के बीच कितने दिनों का अन्तर ?
ZyCov-D के हर डोज के बीच कम से कम 28 दिन का अंतराल रहेगा। यानी पहला डोज लेने के 28वें दिन दूसरा डोज और 56वें दिन तीसरा डोज। इस हिसाब से भले ही इसके 3 डोज हो लेकिन इसका कोर्स कोविशील्ड से पहले ही पूरा हो जाएगा। दो डोज वाली कोविशील्ड के दोनों डोज के बीच का गैप फिलहाल 84 दिन है।
क्यों बाकी वैक्सीन से अलग है ZyCov-D?
यह भारत ही नहीं, दुनिया की भी पहली डीएनए बेस्ड कोरोना वैक्सीन है। इसके अलावा इसका कोर्स 3 डोज का है जबकि ज्यादातर कोरोना वैक्सीन दो डोज वाली हैं। इसे लगाने के लिए सूई की भी जरूरत नहीं होगी।
कैसे काम करती है डीएनए वैक्सीन?
जायडस कैडिला की यह कोरोना वैक्सीन दुनिया की पहली डीएनए वैक्सीन है। इसके जरिए जेनेटिकली इंजीनियर्ड प्लास्मिड्स को शरीर में इंजेक्ट किया जाता है। इससे शरीर में कोविड-19 के स्पाइक प्रोटीन का उत्पादन होता है और इस तरह वायरस से बचाव वाले एंटीबॉडी पैदा होते हैं। ज्यादातर कोरोना वैक्सीन के 2 डोज लगते हैं लेकिन कैडिला की इस वैक्सीन के 3 डोज लगेंगे।
सूई से नहीं लगाने का क्या फायदा है?
इस वैक्सीन के बारे में एक और खास बात है। यह सूई से नहीं लगाई जाएगी। इसे एक खास डिवाइस के जरिए लगाया जाएगा। जायडस कैडिला का दावा है कि इस मेथड से वैक्सीन लगने की वजह से दर्द नहीं होगा। कंपनी का तो यहां तक दावा है कि इससे वैक्सीन के साइड इफेक्ट भी कम हैं।
कितनी कारगर है ZyCov-D?
फेज-3 के क्लीनिकल ट्रायल में ZyCov-D 66.6 प्रतिशत कारगर पाई गई है।
ZyCov-D को किसने बनाया है?
ZyCov-D को भारतीय कंपनी जायडस कैडिला ने बनाया है। इसे मिशन कोविड सुरक्षा के तहत सरकार के बायोटेक्नॉलजी डिपार्टमेंट के साथ साझीदारी में विकसित किया गया है।

पद्मश्री : खुद गरीबी के कारण पढ़ नहीं सके मगर सन्तरे बेचकर खोला स्कूल

बेंगलुरु : संतरे बेचने वाले 65 वर्षीय हरेकाला हजब्बा को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। हजब्बा को यह सम्मान शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक कार्य करने के लिए दिया गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में हजब्बा को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक पद्मश्री से नवाजा। र्नाटक के दक्षिण कन्नड़ा के न्यूपाड़ापू गांव के रहने वाले हरेकाला हजब्बा ने अपने गाँव में अपनी जमापूंजी से एक स्कूल खोला। इसके साथ ही वह हर साल अपनी बचत का पूरा हिस्सा स्कूल के विकास के लिए देते रहे। हजब्बा को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा 25 जनवरी 2020 में ही हुई थी, लेकिन फिर कोरोना वायरस महामारी के चलते समारोह का आयोजन नहीं हो सका।
कौन हैं हरेकला हजाब्बा ?
हरेकला हजब्बा कर्नाटक के मैंगलोर शहर में एक संतरा विक्रेता हैं. उनकी उम्र 65 साल है। अपने गाँव में स्कूल न होने की वजह से हजब्बा पढ़ाई न कर सके, लेकिन शिक्षा के प्रति समर्पण ऐसा था कि अब वो शिक्षितों के लिए भी मिसाल बनकर उभरे हैं।
 कैसे मिली स्कूल खोलने की प्रेरणा?
हजाब्बा पढ़े-लिखे नहीं हैं। यहां तक कि वो कभी स्कूल नहीं गए। वो बताते हैं, ‘एक दिन विदेशी कपल उनसे संतरे खरीदना चाहता था। उन्होंने कीमत भी पूछी। लेकिन मैं समझ नहीं सका। उन्होंने कहा कि यह मेरी बदकिस्मती थी कि मैं स्थानीय भाषा के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं बोल सकता। वह कपल चला गया। मुझे बेहद बुरा लगा। इसके बाद मुझे यह ख्याल आया कि गांव में एक प्राइमरी स्कूल होना चाहिए ताकि हमारे गांव के बच्चों को कभी उस स्थिति से गुजरना ना पड़े जिससे मैं गुजरा हूं।’
और फिर जब शुरू किया स्कूल
हजाब्बा ने गांववालों को समझाया और उनकी मदद से स्थानीय मस्जिद में एक स्कूल शुरू किया। इसके अलावा वो स्कूल की साफ-सफाई और बच्चों के लिए पीने का पानी भी उबालते। साथ ही, छुट्टियों के दौरान वह गांव से 25 किलोमीटर दूर दक्षिण कन्नड़ जिला पंचायत कार्यालय जाते और बार-बार अधिकारियों से शैक्षणिक सुविधाओं को औपचारिक रूप देने की विनती करते। हजाब्बा की मेहनत रंग लाई। जिला प्रशासन ने साल 2008 में दक्षिण कन्नड़ जिला पंचायत के अंतर्गत नयापुडु गांव में 14वां माध्यमिक स्कूल बनवाया।