ओटावा : आज से छह साल पहले 2015 में ‘चार पैरों वाले सांप’ की खोज की गई थी। अब एक स्टडी में खुलासा हुआ है कि वह सांप नहीं बल्कि लंबे शरीर वाली समुद्री छिपकली थी। ब्राजील में पाए गए जीवाश्म जीव को शुरुआत में सांप और छिपकली के बीच का जीव समझा जा रहा था। यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा के जीवाश्म विज्ञानियों के मुताबिक 11 करोड़ साल पुराना सरीसृप, टेट्रापोडोफिस एम्प्लेक्टस, एक छिपकली से ज्यादा कुछ नहीं है।
शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगा सांप जैसा
कैल्डवेल ने कहा कि हमारी टीम का प्रमुख निष्कर्ष यह है कि टेट्रापोडोफिस एम्प्लेक्टस वास्तव में एक सांप नहीं है और इसे गलत वर्गीकृत किया गया था। बल्कि इसकी शारीरिक बनावट के सभी पहलू क्रिटेशियस काल से विलुप्त समुद्री छिपकलियों के एक समूह से मेल खाते हैं, जिन्हें डोलिचोसॉर कहा जाता है। शुरुआत में वैज्ञानिकों ने सोचा था कि टेट्रापोडोफिस एम्प्लेक्टस के लक्षण सांपों से मिलते-जुलते हैं लेकिन अब स्पष्ट हो चुका है कि वह एक गलत वर्गीकरण था।
करीब 20 सेमी लंबी थी छिपकली
जब कई साल पहले नमूनों की खोज की गई थी तो विशेषज्ञों ने पाया कि इसकी लंबाई सिर से पैर तक 20 सेमी थी। लेकिन इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसकी लंबाई और ज्यादा बढ़ सकती थी। इसका सिर एक वयस्क मानव नाखून के आकार का होता है और इसकी सबसे छोटी पूंछ की हड्डी की लंबाई एक मिलीमीटर के सिर्फ एक चौथाई होती है। इसके अगले पैर सिर्फ 1 सेमी लंबे होते हैं लेकिन पिछले पैर थोड़े लंबे होते हैं जिनका इस्तेमाल यह शिकार पकड़ने के लिए करता था।
जिसे समझा ‘चार पैरों वाला सांप’, वह निकली 11 करोड़ साल पुरानी समुद्री छिपकली
मशहूर उद्घोषक एवं खेल पत्रकार नोवी कपाड़िया का निधन
नयी दिल्ली : भारतीय फुटबॉल का ‘एनसाइक्लोपीडिया’ कहे जाने वाले मशहूर कमेंटेटर और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर नोवी कपाड़िया का लंबी बीमारी के बाद गत 18 नवम्बर को निधन हो गया। वह 67 वर्ष के थे। कपाड़िया अविवाहित थे और उनकी बहन की मृत्यु के बाद उनके परिवार में कोई नहीं था। नौ फीफा विश्व कप कवर कर चुके कपाड़िया पिछले एक महीने से वेंटिलेटर पर थे, उन्हें ‘मोटर न्यूरोन ’ बीमारी थी, जिसमें रीढ की नसें और दिमाग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है, इसकी वजह से वह पिछले दो साल से अपने घर में ही बंद थे।
लंबे समय से बिस्तर पर ही रहने को मजबूर कपाड़िया हाल ही में पेंशन संबंधी मसले के कारण चर्चा में आए थे जब पूर्व खेल मंत्री किरेन रिजीजू ने मामले में दखल देकर उन्हें चार लाख रूपये की आर्थिक सहायता दिलाई थी। कपाड़िया पिछले कई दशक से ओलंपिक, एशियाई खेल,राष्ट्रमंडल खेल की कमेंट्री करते आए हैं। अशोक क्लब के संस्थापक कपाड़िया ने स्थानीय लीग में फुटबॉल खेला। उन्होंने ‘बेयरफुट टू बूट्स: द मेनी लाइव्स आफ इंडियन फुटबॉल’ किताब भी लिखी। इसके अलावा फुटबॉल प्रेमियों के लिए गाइड भी 2014 में लिखी। वह एसजीटीबी खालसा कॉलेज में पूर्व प्रोफेसर भी थे।
लद्दाख में बनी सड़क दुनिया में सबसे ऊंची, गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज
लेह : लद्दाख में बीआरओ की ओर से बनाई गई सड़क को अब दुनिया की सबसे ऊंची सड़क मान लिया गया है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ने इसको मान्यता दे दी है। रिकॉर्ड बुक में सड़क का नाम दर्ज कर लिया गया है। लद्दाख में बनायी गयी सड़क को दुनिया की सबसे ऊंची सड़क की मान्यता दे दी गयी है। उच्च पर्वतीय क्षेत्र लद्दाख में बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) की ओर इस सड़क का निर्माण कराया गया है। इस सड़क को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल कर लिया गया है।
लद्दाख के उमलिंग्ला दर्रे पर समुंद्रतल से 19,024 फीट की ऊंचाई पर सड़क का निर्माण किया गया है। बीआरओ को इस सड़क के गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स की ओर से प्रमाण पत्र भी मिल गया है। गिनीज बुक के पांच सदस्यों की टीम ने करीब चार महीने तक इस सड़क का सर्वेक्षण किया। इसके बाद अपनी रिपोर्ट दी।
बोलिविया की सड़क को पीछे छोड़ा
उलमिंग्ला दर्रे की यह 15 किलोमीटर लंबी सड़क रिकॉर्ड बनाने में कामयाब रही। इससे पहले सबसे ऊंची सड़क का रिकॉर्ड बोलिविया की उतरुंकू ज्वालामुखी से जोड़ने वाली सड़क के नाम था। यह सड़क समुंद्र तल से 18,953 किलोमीटर की ऊंचाई पर अवस्थित है।
गडकरी ने ट्वीट कर दी जानकारी
केंद्रीय पथ परिवहन और हाइवे मंत्री नितिन गडकरी ने ट्वीट कर पूरे उमलिंग्ला दर्रे की सड़क के गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल होने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बीआरओ आने वाले समय में इस प्रकार के अन्य रिकॉर्ड बनाएगा, ऐसी उम्मीद हम करते हैं। वहीं, केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी ट्वीट कर इस संबंध में कहा कि विश्व की सबसे ऊंची सड़क अब उमलिंग्ला सड़क हो गई है।
एवरेस्ट के आधार शिविर से भी है अधिक ऊंची
उमलिंग्ला सड़क की ऊंचाई एवरेस्ट चोटी के उत्तरी व दक्षिणी आधार शिविरों से भी ऊंची है। अधिकारियों का कहना है कि उमलिंग्ला में सड़क निर्माण मानव व मशीन दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। यहां तापमान मानस 40 डिग्री तक गिर जाता है। ऑक्सीजन का स्तर भी सामान्य से 50 फीसदी कम हो जाता है। बीआरओ ने इसके बाद भी सड़क पर तारकोल बिछाकर पूर्वी लद्दाख में एलएसी के अग्रिम गांव डेमचोक को सड़क नेटवर्क से जोड़ दिया है। सामरिक दृष्टि से भी इस सड़क को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
त्वचा से त्वचा के स्पर्श का मामला : बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट से खारिज
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग के अंदरूनी अंग को बिना कपड़े हटाए छूना यौन उत्पीड़न नहीं है
नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने त्वचा से त्वचा के स्पर्श को लेकर दिए गए बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया है। अदालत ने 30 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से फैसला रद्द करने की गुहार लगाई थी। राष्ट्रीय महिला आयोग की तरफ से भी खास याचिका दायर कर हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘कानून का उद्देश्य अपराधी को कानून के जाल से बचने की अनुमति देना नहीं हो सकता।’ कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो की धारा 7 के तहत ‘स्पर्श’ और ‘शारीरिक संपर्क’ अभिव्यक्ति के अर्थ को “त्वचा से त्वचा संपर्क” तक सीमित करना न केवल संकीर्ण और कागजी व्याख्या होगी, बल्कि प्रावधान की बेतुकी व्याख्या भी होगी।
क्या था बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग के अंदरूनी अंग को बिना कपड़े हटाए छूना यौन उत्पीड़न नहीं है। उसने अपने फैसले में कहा कि जब तक त्वचा से त्वचा का स्पर्श न हो, तब तक यौन दुराचार नहीं माना जा सकता है। हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने 19 जनवरी को पारित एक आदेश में कहा कि किसी हरकत को यौन हमला माने जाने के लिए ‘गंदी मंशा से त्वचा से त्वचा का संपर्क होना’ जरूरी है। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है। न्यायमूर्ति गनेडीवाला ने एक सेशन्स कोर्ट के फैसले में संशोधन किया जिसने 12 वर्षीय लड़की का यौन उत्पीड़न करने के लिए 39 वर्षीय व्यक्ति को तीन वर्ष कारावास की सजा सुनाई थी।’ इस फैसले के खिलाफ दाखिल अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने 27 जनवरी को हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।
फैसले के खिलाफ क्या तर्क दिए?
अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने मामले को सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाया था। हाई कोर्ट कोर्ट के आदेश का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि मामले में गलत नजीर बनेगी और ऐसे में हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाया जाए। राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि जो व्याख्या की गई है, उसका महिला के मूल अधिकारों के खिलाफ असर होगा। याचिका में कहा गया था कि पोक्सो की धारा-7 के तहत कहा गया है कि अगर कोई शख्स किसी नाबालिग के शरीर के निजी अंगों और सीने को स्पर्श करता है तो वह यौन उत्पीड़न माना जाएगा। इस परिभाषा में कहीं भी त्वचा से त्वचा के स्पर्श की बात नहीं है। शारीरिक स्पर्श बिना कपड़ों के होना चाहिए ऐसा कानून में नहीं लिखा है। साथ ही इसके दूसरे भाग में कहा गया है कि यौन प्रकृति का शारीरिक स्पर्श अगर है तो वह यौन उत्पीड़न का अपराध है। लेकिन हाई कोर्ट ने धारा-7 के तहत यौन उत्पीड़न की गलत व्याख्या की है और वह खतरनाक नजीर बनेगा।
चट्टान में धंसी मिली 700 साल पुरानी रहस्यमय तलवार, किंग आर्थर से हो सकता है सम्बन्ध
लंदन : किंग आर्थर वाकई में थे या नहीं? साल की शुरुआत में मिले कुछ दस्तावेजों ने इतिहास में उनकी मौजूदगी को लेकर नए सिरे से दावे किए थे। लेकिन दस्तावेजों से ज्यादा पुख्ता सबूत अब एक बोस्नियाई नदी की गहराई में मिले हैं। नदी के भीतर चट्टान में धंसी एक तलवार की खोज की गई है जिसे ‘शाही एक्सेलिबुर’ माना जा रहा है जो किंग आर्थर की तलवार थी। पुरातत्वविदों को पत्थर में चौदहवीं शताब्दी की यह तलवार बोस्निया और हर्जेगोविना के पश्चिम में व्रबास नदी की गहराई में मिली है।
किंग आर्थर को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। उन्होंने जिनेवा से शादी की, ‘नाइट्स ऑफ द राउंड टेबल’ का निर्देशन किया, एक्सेलिबुर तलवार को अपने पास रखा और गद्दार मोर्ड्रेड के साथ अपनी अंतिम लड़ाई के बाद उन्हें एवलॉन में दफना कर दिया गया। लेकिन क्या राजा आर्थर वास्तव एक राजा थे या सिर्फ सेल्टिक पौराणिक कथाओं के नायक? यह बहस सदियों से जारी है और इतिहासकार आर्थर के अस्तित्व को लेकर कोई पुष्टि नहीं कर पाए हैं।
दस्तावेजों के पुख्ता हुए अस्तित्व के दावे
हालांकि इस साल की शुरुआत के बाद राजा आर्थर को लेकर कई चीजें बदल गईं। इतिहासकारों को ब्रिटेन के ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में एक पुस्तकालय में मर्लिन, किंग आर्थर और होली ग्रेल के बारे में हस्तलिखित और पांडुलिपियों के सात टुकड़े मिले हैं। ये टुकड़े मूल रूप से फ्रांस के स्ट्रासबर्ग में 1,494 और 1,502 के बीच प्रकाशित हुए थे। इस आश्चर्यजनक खोज ने किंग आर्थर के अस्तित्व को लेकर दावों को और पुख्ता कर दिया है। कुछ लोगों का कहना है कि यह स्पष्ट प्रमाण है कि राजा आर्थर मौजूद थे।
10 मीटर की गहराई में मिली 700 साल पुरानी तलवार
व्रबास बोस्निया के केंद्र में 240 किलोमीटर लंबी एक नदी है, जो बंजा लुका शहर के पास है। खोजी गई प्राचीन तलवार को किंग आर्थर की माना जा रहा है। रिपब्लिका सर्पस्का म्यूजियम के पुरातत्वविद इवाना पांडज़िक के अनुसार 700 साल पुरानी तलवार नदी की सतह से लगभग 10 मीटर नीचे एक ठोस चट्टान में जड़ी हुई पाई गई। इसे बेहद संभालकर निकाला गया। पुरातत्वविदों ने ज़्वेलाज में स्थित एक मध्ययुगीन महल के खंडहरों के पास खुदाई करते हुए खोज की।
(साभार – नवभारत टाइम्स)
क्या होता है पकड़ुआ बियाह, जानिए
जो लोग बिहार या पूर्वांचल के हैं वे पकड़ुआ बियाह से भली-भांति अवगत हैं, लेकिन विवाह की यह प्रक्रिया देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोगों की उत्सुकता बढ़ाने वाली है। इन्हीं लोगों की उत्सुकता को शांत करने के लिए आइए समझने की कोशिश करते हैं कि पकड़ुआ बियाह क्या होता है, क्यों होता है, कैसे होता है, कब से शुरू हुआ।
पकड़ुआ बियाह क्या होता है
पकड़ुआ बियाह में शादी योग्य लड़के का अपहरण करके उसकी जबरन शादी करवाई जाती है। इस विषय पर बॉलीवुड में अगस्त 2019 में ‘जबरिया जोड़ी’ नाम से एक फिल्म रिलीज हो चुकी है। इसके अलावा कलर्स चैनल पर ‘भाग्यविधाता’ नाम से एक टीवी सीरियल भी प्रसारित हो चुका है। इन दोनों में ही काफी हद तक पकड़ुआ बियाह की सच्चाई को दिखाने की कोशिश की गई है।
पकड़ुआ बियाह की शुरुआत कहां से हुई इसकी कोई पुख्ता जानकारी तो नहीं है, लेकिन माना जाता है कि दूल्हे को अगवा कर उसकी शादी रचाने का चलन बेगूसराय जिले से शुरू हुआ है। बेगूसराय से सटे पटना जिले के हिस्से मोकामा, पंडारख, बाढ़, बख्तियारपुर जैसे इलाके में एक समय इसका खूब चलन था। पकड़ुआ बियाह में गांव या परिवार के दबंग लोग इलाके के किसी पढ़े-लिखे और धन-संपदा से संपन्न शादी योग्य युवक का अपहरण कर लेते हैं। इसके बाद जबरन उसकी शादी किसी लड़की से करा दी जाती है। विरोध करने पर युवक की पिटाई भी की जाती है। कई बार हथियार वगैरह दिखाकर युवक को डराया धमकाया भी जाता है।
इतना ही नहीं, शादी कराने वाले दबंग दूल्हे और उसके परिजनों को इतना डरा धमका देते हैं कि वह मजबूरी वश जबरिया विवाह को स्वीकार कर लेते हैं। आमतौर पर दबंग पहला बच्चा होने तक दूल्हा और उसके परिजनों पर नजर रखते हैं। 1970 से 1990 के दशक में किसी युवक की अगर अच्छी नौकरी लगती तो घर वाले सबसे पहले उसका घर से निकलना बंद कर देते। नौकरी लगने वाली बात काफी गुप्त रखा जाता। नौकरीपेशा लड़के को अकेले घर से निकलने नहीं दिया जाता, डर होता कि कहीं उसका पकड़ुआ बियाह ना करा दिया जाए। 1970 के दशक में बेगूसराय के मटिहानी एरिया में सबसे ज्यादा इस प्रकार की शादी का रिवाज था।
क्यों होता है पकड़ुआ बियाह?
पकड़ुआ बियाह की शुरुआत की मुख्य वजह दहेज प्रथा को माना जाता है। लेकिन इसे बारीकी से समझेंगे तो पता चलता है कि पकड़ुआ बियाह की शुरुआत के पीछे कई और वजहें हैं। दरअसल, 70-80 के दशक में बिहार में शिक्षा और जागरुकता के अभाव में जन्मदर काफी अधिक रही। इससे उन परिवारों ने भी ज्यादा बच्चे कर लिए जिनकी आर्थिक स्थिति उतनी बेहतर नहीं थी। इसके साथ ही बिहार के समाज में उच्च जाति के लोगों में स्टेटस दिखाने का चलन शुरू से ही रहा है। इस स्थिति अगर किसी परिवार में चार बेटियां हैं, लेकिन उसके पिता की इतनी हैसियत नहीं है वह मोटा दहेज देकर अच्छे परिवार में उनकी शादी करा पाए। ऐसे में वह अपनी बेटी की शादी पढ़े-लिखे और धन-संपदा से योग्य दूल्हे से कराने के लिए पकड़ुआ बियाह जैसे विकल्प को तलाशते हैं।
दबंगों ने पकड़ुआ बियाह को बनाया धंधा
पकड़ुआ बियाह का चलन शुरू होने पर इलाके के दबंगों ने इसे धंधा बना लिया। अगर किसी पिता को पकड़ुआ बियाह के जरिए अपनी बेटी की शादी करानी है तो वह इन दबंगों के पास जाते हैं। यहां लड़की के पिता और दबंग के बीच में सौदा होता है। सौदे के मुताबिक पकड़ुआ बियाह कराने और दुल्हन को उसके ससुराल में मान-सम्मान के साथ स्थापित करने के एवज में दबंग को फीस के तौर पर कुछ रकम दी जाती है। साथ ही दूल्हा डॉक्टर, इंजीनियर, बैंककर्मी, रेलवे आदि जिस भी विभाग में नौकरी कर रहा होगा उसके हिसाब से दबंग दुल्हन के पिता से रकम की माँग करते हैं। ऐसे में अगर कोई इंजीनियर दूल्हा 20 लाख रुपये नकद दहेज मांग रहा है तो दबंग दो लाख-दो लाख लेकर पकड़ुआ बियाह करा देते हैं। ऊपर से शादी के तामझाम का भी खर्च बचता है। इस तरह लड़की का पिता महज दो से ढाई लाख रुपये में अपने लिए इंजीनियर दूल्हा पा लेता है। शुरुआत में 5 से 10 हजार रुपये में लड़का उठाया जाता बाद में यह लाख-दो लाख रुपये तक पहुंच गया।
किसी करीबी या परिवार के लोग ही करवाते हैं पकड़ुआ बियाह
पकड़ुआ बियाह में दूल्हे को अगवा कराने में उसके किसी परिवार या रिश्तेदार का ही रोल होता है। करीबी या रिश्तेदार दूल्हे के शहर से गांव आने की पूरी विस्तृत जानकारी देता है। उसके बाद ही दबंग समय और परिस्थिति देखकर युवक का अपहरण करते हैं। शादी होने के बाद दुल्हन को ससुराल में स्थापित कराने में भी उसी रिश्तेदार या करीबी का रोल होता है। क्योंकि जबरन शादी के बाद दुल्हन के साथ उसके ससुराल में क्या व्यवहार हो रहा है इसकी जानकारी वही दबंग तक पहुंचाता है।?
पकड़ुआ बियाह पर पुलिस क्यों नहीं करती कार्रवाई?
1970-80 के दशक में बिहार में आमतौर पर माना जाता था कि अगर लड़का इंटरमीडिएट की परीक्षा दे रहा है तो उसे सरकारी नौकरी हो ही जाएगी। इसलिए इंटरमीडिएट की परीक्षा देने के दौरान युवकों का सबसे ज्यादा अपहरण किया जाता और उसका पकड़ुआ बियाह करा दिया जाता। जानकारों का दावा है कि करीब-करीब पकड़ुआ बियाह सफल ही होते हैं। क्योंकि पकड़ुआ बियाह में आमतौर पर कच्ची उम्र के लड़कों को अगवा किया जाता है। शादी के बाद जबरन ही सही, कुछ दिन दुल्हन के साथ रहने से उन दोनों के बीच मानसिक रूप से भी पति-पत्नी का रिश्ता स्थापित हो जाता है। परिवार वालों को सामाजिक दबाव में समझाबुझा दिया जाता है। एकाध ही पकड़ुआ बियाह के मामले होते हैं जो थाने तक पहुंचते हैं। क्योंकि पकड़ुआ बियाह में लड़के को कुछ घंटों के लिए ही अगवा किया जाता है उसके बाद उसे ससम्मान दुल्हन के साथ उसके घर भेज दिया जाता है। समाज की सहभागिता के चलते पुलिस भी ऐसे मामलों में स्वेच्छा से खास दिलचस्पी नहीं लेती है।

पकड़ुआ बियाह के चर्चित मामले
1. पेशे से इंजीनियर विनोद कुमार की जबरन शादी का वीडियो साल 2017 के दिसंबर महीने में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। समाज और दबंगों के लाख डराने धमकाने के बाद भी विनोद ने इस शादी को मानने से इनकार कर दिया। विनोद ने पटना के परिवार न्यायालय में शादी की वैधता को चुनौती दी, जिस पर मई 2019 में प्रिंसिपल जज कृष्ण बिहारी पाण्डेय ने फ़ैसला देते हुए शादी को अमान्य ठहरा दिया।
2. साल 2013 में शेखपुरा जिले के रवीन्द्र कुमार झा के 15 साल के बेटे की शादी जबरन 11 साल की बच्ची से करा दी गई थी। रवीन्द्र कुमार झा ने इस शादी को मानने से इनकार किया तो लड़की वालों ने उनके परिवार के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने रवीन्द्र झा के परिवार को अग्रिम जमानत दे दी, लेकिन तकनीकी दिक्कतों के चलते शादी को अमान्य करार देने से इनकार कर दिया।
3. दरभंगा जिले की रहने वाली कमला के पिता ने उसकी पकड़ुआ बियाह कराया था। सामाजिक दबाव में ससुराल वालों ने कमला को अपना तो लिया लेकिन वह आज भी डरी सहमी रहती है। ससुराल की महिलाएं आए दिन ताने मार देती हैं। कमला मजबूरी में ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर है।
4. सहरसा जिले के रहने वाले आलोक को मई 2012 में उसके दोस्त पार्टी का लालच देकर अपने साथ ले गए फिर बंदूक के बल पर मंडप पर बैठाया और पकड़ुआ बियाह करा दिया था।
5. इसी साल जून में बेगूसराय के तेघड़ा थाना क्षेत्र में शिवम कुमार को बिहट खेमकरणपुर पूर्वी टोला के रहने वाले यदुनंदन सिंह ने गांव के लोगों के साथ मिलकर अगवा कर लिया था। इसके बाद युदुनंदन अपनी बेटी प्रिया भारती से शिवम की जबरन शादी करवा रहे थे। मौके पर पहुंची पुलिस ने कार्रवाई करने के बजाय दोनों पक्षों को समझा बुझाकर दोनों की शादी करवा दी।
पकड़ुआ बियाह का सबसे ज्यादा नुकसान किसे?
पकड़ुआ बियाह जैसे सामाजिक बुराई से सबसे ज्यादा लड़का लड़की को नुकसान उठाना पड़ता है। लड़की के पिता तो कम पैसे खर्च को बेटी की शादी अच्छी नौकरी या धन-संपदा से संपन्न युवक से करा देते हैं। सामाजिक दबाव में लड़के के परिवार वाले लड़की को अपना भी लेते हैं, लेकिन जीवनचर्या में उन्हें कितने ताने मारे जाते हैं इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, कई बार तो लड़की को पूरे जीवन काल में पति का ठीक से प्यार नसीब नहीं हो पाता है। वहीं लड़का भी ऐसी शादी के बाद मानसिक रूप से परेशान हो जाता है। कई बार वह दिल से पत्नी को कभी स्वीकार ही नहीं पाता है। ऐसी स्थिति में प्यार की डोर से बनने वाला पति-पत्नी का रिश्ते नफरत और डर पर स्थापित हो जाता है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)
भूली -बिसरी यादें – 3

समय के पन्ने उड़ते गये और सन्मार्ग की धमक बढ़ती गई। उसके कुछ कालम तो इतने मशहूर हो गये कि लोग अखबार खोलकर पहले उसे ही पढ़ते यथा -लस्टम पस्टम, चकल्लस, भोजपुरी लस्टम पस्टम, लाल बुझक्कड़, और सारे साप्ताहिक पृष्ठ। रविवारीय परिशिष्ट का तो कोई जवाब ही नहीं था। रुक्म जी ने बैताल कथा और तेनालीराम की कथा, बाल मंडल में खुद लिखते थे जो बच्चों के साथ हर उम्र के लोग बड़े चाव से पढ़ते थे। सन्मार्ग की बेबाक संपादकीय जिसे उस समय आदरणीय रमाकांत उपाध्याय लिखते थे, काफी चर्चित थी।
उस समय सन्मार्ग में कर्मचारियों के बीच जो एका भाव था वह काबिले तारीफ था। सभी एक दूसरे के सुख-दुख के सहभागी थे। रात में ड्यूटी करने वाले संपादकीय विभाग के सारे सदस्य मिल बांटकर खाना खाते थे। इस मामले में भाई हरिराम पांडेय बेजोड़ थे। एक वाकया याद आ रहा है। पांडेय जी चार डब्बों वाला अपना टिफिन बॉक्स लाते थे और आधा किलो दूध यादव टी स्टॉल से मंगाते थे। एक दिन जब उन्होंने अपना सारा टिफिन खाली कर दिया और दूध भी लिए तो रमाकांत उपाध्याय जी ने कहा-आज मैं तुम्हारे लिए 2 किलो दूध मंगवाता हूं, उसे पीकर और बिना लैट्रिन गये, पचाकर दिखाओ तो जानूं कि तुम खाने और पचाने में अव्वल हो। पांडेय जी ने उनकी चुनौती स्वीकार कर ली और 2 किलो दूध गटक कर सो गए। रमाकांत जी रात भर निगरानी करते रहे मगर पांडेय जी उठे तो सुबह 6 बजे ही। उसके बाद किसी ने भी उनसे खाने पीने की कोई शर्त नहीं लगाई।
रमाकांत जी और पांडेय जी में अक्सर हंसी मजाक होता था। कभी कभी तो यह उग्र भी हो जाता और बोलचाल भी कुछ लमहों के लिए बंद हो जाती मगर यह उपाध्याय जी को बहुत देर तक नहीं रोक पाती। वह कुछ ऐसा व्यंग्य तीर चलाते कि पांडेय जी के साथ हम सभी हंस पड़ते और फिर माहौल खुशनुमा हो जाता।
पांडेय जी सिर्फ खाते ही नहीं थे, उनके हाथों में काफी ताकत भी थी। नवरात्र की अष्टमी तिथि को मैंने कुछ फलों के साथ एक समूचा नारियल प्रसाद के रूप में घर से आफिस ले गया था। फल तो यारों में बंट गया मगर नारियल टूटे कैसे? सभी उधेड़बुन में थे। कोई कहता छत पर रखकर हथौड़े से तोड़ दिया जाये तो कोई कहता जमीन पर पटक कर फोड़ दिया जाये। इसी दौरान पांडेय जी आए और सबकी बातें सुनकर उन्होंने एकबारगी नारियल को अपने हाथ में लिया, टेबल पर रखे और दाहिने हाथ से उस पर ऐसा मारा कि वह तीन टुकड़े हो गया। हम सभी हतप्रभ रह यह देखते रह गए। ऐसा विंदास जीवन जीने वाले थे हरिराम पाण्डेय जी। आज हमारे बीच वे नहीं हैं। काल ने उन्हें छीन लिया हमसे मगर उनकी बहुत सारी स्मृतियां आज भी हमारे मन-मस्तिष्क में यों ही दबी पड़ी हैं। रुक्म जी के बाद पांडेय जी ही रविवार के परिशिष्ट का संपादन करते थे। मैं तो बस इतना ही कहूंगा-
आप तो चले गए दुनिया को छोड़कर
पर आपकी यादें तसव्वुर में बसी हैं।
अपने समय की विदुषी कवयित्री थीं रत्नकुँवरि बीबी

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों आज मैं आपको रत्नकुँवरि बीबी की कथा सुनाऊंगी। इनका जन्म मुर्शिदाबाद के प्रसिद्ध जगत सेठ घराने में हुआ था। वह अत्यंत विदुषी स्त्री थीं और कविताएँ लिखती थीं। राजा शिवप्रसाद “सितारे हिंद” उनके पोते थे। उनका परिचय स्वयं उनके पोते की जुबानी जानिए जो अपनी दादी को सम्मानपूर्वक याद करते हुए लिखते हैं- “वह संस्कृत की बड़ी पंडिता थीं। छहों शास्त्रों की वेत्ता। फारसी भाषा भी इतनी जानती थीं कि मौलाना रूमी की मसनवी और दीवान शम्स तबरेज जब कभी भी हमारे पिता पढ़कर सुनाते तो उसका संपूर्ण आशय समझ लेती थीं। गाने- बजाने में अत्यंत निपुण थीं। चिकित्सा यूनानी और हिन्दुस्तानी दोनों प्रकार की जानती थीं। योगाभ्यास में परिपक्व थीं। यम -नियम और वृत्ति ऋषियों और मुनियों की सी थी। सत्तर वर्ष की अवस्था में भी बाल काले थे तथा आँखो की ज्योति बालकों सी थी। वह हमारी दादी थीं। इससे हमको अब उनकी अधिक प्रशंसा लिखने में लाज आती है। परंतु जो साधु संत और पंडित लोग उस समय के उनको जानने वाले काशी में वर्तमान हैं वे सब उनके गुणों को अद्यावधि स्मरण करते हैं।” इस उद्धरण से यह स्पष्ट होता है कि वह अत्यंत ज्ञानी और गुणवती महिला थीं। स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन करते हुए स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीती थीं। बेटों और पोतों के सानिध्य में उन्होंने खुशहाल और लंबा जीवन जीया एवं वृद्धावस्था में साधु-संतों की संगति में, भगवद्भक्ति में जीवन बिताया।
काव्य रचना में इनकी रूचि थी। इनके जीवनकाल में तो इनका कोई ग्रंथ प्रकाशित नहीं हुआ लेकिन इनके पोते राजा शिवप्रसाद “सितारे हिंद” ने संवत 1945 में इनका एक ग्रंथ “प्रेम- रत्न” प्रकाशित करवाया। कुल 76 पृष्ठों की इस पुस्तक में दोहा और चौपाई छंदों में श्रीकृष्ण की लीलाओं का सरस वर्णन किया गया है। इसमे कृष्ण के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का जीवंत वर्णन हुआ है। इन छंदों को पढ़ते हुए इनकी विद्वता और काव्य कौशल का आभास सहजता से हो जाता है। दोहा छंद में ब्रज की प्राकृतिक सुषमा के वर्णन के साथ ही कृष्ण के मथुरा गमन के पश्चात ब्रज वासियों की स्थिति, उनकी विरह-व्यथा का मार्मिक वर्णन प्रस्तुत उद्धरण में हुआ है-
“वरन वरन वन तंबुवन दीनो तान वितान।
अति फूले फूले फिरत, डेरा परत न जान।।
जबते मथुरा तन चितै, तजि ब्रज-जन यदुनाथ।
विरह- विथा बृज में बढ़ी, तहँ सब भये अनाथ।
प्रिय तीरथ कुरुखेत सब, आए ग्रहण नहान।
यदुपति राधा गोप गण, नन्दादिक वृषभान।।
गोप एक नटभेष सजि आयो बीच बजार,
तहँ खरभर लशकर परयो, सो अति रह्यो निहार।।
इक यादव हँसिके कह्यो, कहाँ तुम्हारो बास।
अति सुन्दर तन छबि बनी, नाम कहहूँ परकास।।
तब उनहू कहि तुम कहहू, काके सँग कित ठाऊँ।
द्वारावति -पति कटक यह, कह्यो यदुव निज नाउँ।।
सुनत द्वारका नाम तिहि, लियो बिरह उर छाय।
हा नँद- नंदन कंत कहि, गयो ग्वाल मुयझाय।।
अब एक उदाहरण चौपाई छंद में रचित कविता का भी देखिए जिसमें कृष्ण के प्रताप और महात्म्य का वर्णन है। भक्तवत्सल कृष्ण अपने भक्तों की सभी कामनाएँ पूरी करते हैं और विपत्ति के समय उनकी रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसे भगवान कृष्ण की महिमा का बखान रत्नकुँवरि बीबी ने पूरे भक्ति भाव से किया है-
“भक्ताधीन विरद प्रभु केरे, गावत वाणी वेद घनेरे।
संतत रहत भक्त के पासा। पुरवत हैं प्रभु तिनकी आसा।।
जे सप्रेम प्रभु सों मन लावै। तिनको कबहूँ नहिं बिसरावै।।
ग्राह- ग्रसित गजराज छुड़ाए। गरुड़ छाँड़ि तहँ आतुर धाए।।
पुनि प्रभु पाण्डव जरत बचायो। द्रुपद- सुता को बसन बढायो।
अजामील यम ते रखि लीन्हों। भजन प्रताप ध्रुवहिं वर दीन्हों।।
जन प्रहलाद अभय करि थाप्यो। ताही बार न बारहु व्यापो।।
जे जन मन ते ध्यावहिं जैसे। ताकहुँ प्रभु फल देते तैसे।।
बीबी रत्नकुँवरि के पदों में कृष्ण भक्ति में डूबे उद्गार अत्यंत सरस और सहज भाव से अभिव्यक्त हुए हैं। कुछ आलोचकों का यह मानना है कि अवधी भाषा में सिर्फ रामकाव्य की रचना ही हुई है लेकिन अवधी भाषा में विरचित “प्रेम-रत्न” के पद इस बात के प्रमाण हैं कि अवधी भाषा में सरस और सशक्त कृष्ण काव्य भी रचा गया। कृष्ण की भक्ति और उनके प्रेम में आपाद मस्तक डूबे ब्रजवासियों के प्रेम विह्वल ह्दय के भावों -अनुभावों का वर्णन बीबी रत्नकुँवरि ने सफलतापूर्वक किया है। दोहा छंद में वर्णित एक प्रसंग देखिए जिसमें कृष्ण के आने की सूचना पाकर सब लोग आनंद में भरकर अपनी सुधबुध खो बैठे हैं-
“भये मगन सब प्रेम रस, भूलि गये निज देह।
लघु दीरघ बै नारि नर, सुमिरत श्याम-सनेह।।
कहत परस्पर युवति मिलि, लै लै कर अँकवार।
प्रीतम आये का सखि, तन साजहुँ शृंगार।।
जब गोपियाँ इतनी मगन हैं तो राधा की दशा तो सबसे अलग होगी ही, राधा की मार्मिक अवस्था का वर्णन कवयित्री ने अत्यंत निपुणता से किया है-
“तहँ राधा की कछु दशा, वर्णत आवै नाहि।
मलिन वेश भूषण रहित, विवस रहित मन माहिं।।
कबहुँ मुरझावत बिरह-वश, पीत वरण ह्व जाय।
कबहुँ व्यापत अरुणता, प्रेम मगन मुंद छाय।।
कान्ह-कान्ह कबहूँ कहत, कबहूँ रटत निज नाम।
मौन साधि रहि जात जब, श्रमित होत निज बाम।।
चख चितवत जित तित हरि, श्रवण मुरलि धुनि-लीन।
श्याम बास बसि नाक मणि, रूप -पयोनिधि मीन।।
तन मध धन गृह जनन की, नेकहु सुधि तिहि नाहिं।
चितवत काहू नहिं दृगन, लगन लगी उर माहिं।।”
रत्नकुँवरि बीबी ने सफल एवं आनंदमय पारिवारिक जीवन जीते हुए कृष्ण भक्ति से परिपूरित सुंदर और भावप्रवण काव्य की रचना की। ये पद पाठकों के ह्दय और मस्तिष्क दोनों पर सहजता से अपनी छाप छोड़ते हैं। चूंकि उस समय की स्त्रियों में अपनी कविता के प्रति सजगता का अभाव था , संभवतः इसीलिए लंबी आयु प्राप्त करने और सुखी जीवन जीनेवाली बीबी रत्नकुँवरि की रचनाएँ उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हो पाईं होंगी। साहित्यिक अभिरुचि संपन्न पारिवारिक परिवेश ने जहाँ उन्हें काव्य रचना के लिए प्रेरित किया वहीं साहित्य प्रेमी पौत्र ने उनकी रचनाओं को दुनिया के सामने लाकर अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व का निर्वाह किया अन्यथा कालांतर में उनकी रचनात्मक प्रतिभा से साहित्यिक जगत अनिभिज्ञ ही रहता। अब भी गहन शोधकर्ताओं को छोड़ दें तो बहुत से लोग इनके नाम और साहित्यिक अवदान से अपरिचित ही हैं। रत्नकुँवरि बीबी जैसी न जाने कितनी स्त्री रचनाकारों की रचनाएँ काल के गाल में समा गई होंगी क्योंकि उन्हें प्रकाशन का सौभाग्य नहीं मिला।
गीत – समय कविता संग्रह को पढ़ते हुए

प्रसिद्ध गीतकार और रचनाकार किशन दाधीच के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह गीत समय को पढ़ते हुए भारत की काव्यात्मक यात्रा को समझने का मौका मिला। गत छह दशकों से लिख रहे किशन दाधीच ने वर्तमान समय की सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों की संवेदनशीलता को गहराई से महसूस किया है। यही कारण है कि गीत – समय में कविताओं की श्रृंखला पूरे चित्रों को पाठक के मन मस्तिष्क में अंकित कर देती हैं।
लोककलाविद् साहित्यकार एवं उदयपुर लोककला मंडल के पूर्व निदेशक डॉ महेंद्र भानावत का कहना है कि किशन दाधीच ने अपना गेज नहीं बदला है। डॉ संगम मिश्र सेंट्रल अकादमी संस्थान उदयपुर में चेयरमैन हैं, उनका कहना है कि स्वान्तः सुखाय जीने वाले किशन दाधीच उनके प्रिय कवि हैं। उनको सुनना अच्छा लगता है।
महाकवि सूर्य मल्ल मिश्रण के प्रति उनकी कविता ‘तुम सती के आचमन’ की ये पंक्तियाँ – – –
आँधियों को स्वर दिया
अभियान गीतों का तुम्हीं ने
बिजलियों के पाँव बाँधे
सृजन के घुंघुरुँ तुम्हीं ने।
— – – – – –
तुम प्रणय के चिर क्षणों में
अर्चना की इक घड़ी हो (पृष्ठ 95-96)
कवि धरती पर निःसहाय लोगों के लिए गीत गाता है। उसका गीत जनयुद्ध है वह इसका स्वयं साक्षी है – – –
मनुष्य के संघर्ष को
काटने वाले सत्य का
साक्षी रहूँगा मैं
क्योंकि इस जनयुद्ध में
संजय की भूमिका
तुम्हारी नहीं मेरी है।( पृष्ठ 100)
कवि भारत की धरती पर होने वाले मनुष्य और मानवता के संबंधों और उनके संघर्षों के साक्षी हैं। इतने लंबे समय को कवि ने स्वयं से साझा किया है।
‘गीत – समय’ का प्रकाशन कोरोना काल में आने के पीछे भी कवि की सकारात्मक सोच और भाव हैं। यह सच है कि नवगीत जिस पीढ़ी के हाथों निर्मित होने के उपक्रम में था, वह थी आजादी के बाद की पहली नौजवान पीढ़ी जो गाँव के नैसर्गिक और अर्जित संस्कारों से हिम्मत और हौसला ही नहीं, मानवीयता की अटूट पहचान लेकर छोटे- बड़े शहरों में आई और आजाद देश की नयी संभावनाओं से अपनी परिवर्तनकारी महत्वाकांक्षाओं को जोड़कर संघर्ष की धूप- धूल से लड़ती हुई जीने लगी। स्वभावतः और रहन- सहन के बदलाव की अनवरत लड़ाई में, कभी उस पीढ़ी का सदस्य शहरी एकांत में ग्रामीण नागर मानस का साक्षात्कार करता रहा।
किशन दाधीच की काव्य यात्रा आत्मविश्वास से पूर्ण और अटूट हौसला देने वाली है। उनकी रचनाधर्मिता परंपरागत लीक से हटकर रचना कर्म करने की प्रक्रिया है। वीरेंद्र मिश्र, रामदरश मिश्र, रामनरेश पाठक, रवींद्र भ्रमर आदि गीतकार की लंबी श्रृंखला रही है। किशन दाधीच उसी श्रृंखला के फूल हैं जिनकी खुशबू समाज की दकियानूसी परंपराओं को नकारते हुए आती है।
जनसंघर्ष की अनिवार्य परिस्थितियों और राजनीति की रणनीतियों के साक्षी रहे किशन जी ने अपने विचारों को कविता और गीतों के माध्यम से समाज के प्रति अपने दायित्व को सक्रिय रुप से शब्दों में पिरोया है। नवगीत का स्वभाव जनबोध से ही जुड़ा हुआ है।उनका मानना है कि गीत ही वह विधा है जो कवि और जन मानस के भाव, लय के आधार पर खड़ी होती है, विचारधाराओं के उत्साह मात्र के आधार पर नहीं। आम आदमी की मानसिकता को आंदोलन या नारे से भरे गीत नहीं बल्कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक व्यवहार के गीत ही बदल सकते हैं। कवि ने कविता मजदूरों के गीत कविता में
, दर्द फिर जुलूस हो गया कविता में कवि का कहना है कि
– – लोग फिर मारे गए हैं प्रार्थना करते हुए
जो खबर के न हुए
बहरे वातायन। प्रश्न वाचक हो गए
चर्खियों की चाल पर आदि आदि कविताएँ आम आदमी के संत्रास की कथा ही कहती हैं। गा सकूँ मैं जिन्दगी को, मैंने बुना गीत का बाना, भोर की तलाश में आदि कविताएँ आशावादी हैं।
बाहर भीतर का आदमी, सूर्य नगर का मौन, अध कतरा दिन आदि कविताओं में द्वंद्वात्मक चित्रों को उकेरनी वाली हैं। दबे पाँव चलता है सूरज, सूर्य मुखी का भोर पत्र कविता में आशा की किरणें हैं।
डॉ लोहिया के प्रति कवि ने लिखा है – – –
आहत है, कोई नायक जो
समाज के उत्थान के लिए
निरंतर कार्य करता रहा
जो अधूरा रहा।
अज्ञेय ने मानवीय व्यक्तित्व की व्याख्या में भाषा को अनिवार्य तत्व माना है। वे भाषा को माध्यम नहीं, अनुभूति मानते हैं। अच्छी भाषा वे उसे ही मानते हैं जो भाषा और अनुभूति के अद्वैत को स्थापित करे। कवि किशन की भाषा में अनुभूति का जबर्दस्त बंधन है जो आम आदमी से जुड़ा हुआ है।
कवि उस दौर से भी गुजरे हैं जब नयी कविता और वामपंथी धारा की कविताएँ भी परिवर्तन की प्रक्रिया में थीं और जनवादी कविताओं में जनजीवन की विभिन्न परिस्थितियों और विषयों को शब्दबद्ध किया जा रहा था। वर्ग संघर्ष, वर्ग हितों की पड़ताल, चरित्रालोचन, व्यवस्था का पर्दाफाश और व्यापक तौर पर समाजवादी यथार्थवादी दृष्टि से जनसंघर्ष की वास्तविक अवस्थाओं और प्रक्रियाओं से जुड़ी संरचनाएँ आ रही थीं। कवि मानते हैं कि गीत मनुष्य की संवेदना से जुड़ा उसके नैसर्गिक स्वभाव का एक महत्वपूर्ण अंग है जो हर युग में मनुष्य को सींचता रहता है। कवि किशन के गीत की भाषा नव आधुनिक और स्वयं विकसित शैली शिल्प की विविध लहरें हैं जिसमें उतार- चढा़व और सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं के सुदृढ़ तट भी हैं। वे स्वयं ‘आत्मकथ्य ‘में लिखते हैं – – गीत भारतीय काव्य की प्रमुख पहचान है। कवि की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह समाज में संस्कारों की प्रतिष्ठा करे और निर्माण की प्रक्रिया को तेज करे। पृष्ठ 18
कविता उसके लिए ‘महज एक शौक नहीं, अस्मिता की रक्षा करने के लिए वह वचनबद्ध है। इक्कीसवीं सदी में यंत्रवत होती जा रही जिन्दगी में रस को बचाए रखने की शक्ति केवल गीत में है। (पृष्ठ 20) ।
रचना के प्रति प्रतिबद्ध कवि अपनी चालीस कविताओं के संग्रह’ गीत- समय’ में सभी युवागीतकारों और कवियों को संदेश भी देते हैं क्योंकि उनका मानना है कि आज भी हमारी लडा़ई जारी है।
गीत – समय में तीन लंबी गीतात्मक स्वभाव की लंबी कविताएँ हैं जिसमें लड़ते हुए आदमी की छवि है जो लगातार लड़कर बुराई और अन्याय, अत्याचार का प्रतिकार करता आया है। यहीं से पाठक अंधकार और उजाले के साथ परिचय करता है और वर्तमान समय की सच्चाई को उजागर करता है।
गीत- समय का कवि मूलतः प्रगतिशील विचारों से अनुप्रेरित रहा है। समाज के वर्ग, जाति और धर्मगत भेदों से ऊपर उठकर समानता का दम भरते रहे हैं। उनके गीत सामाजिक त्रास और विषमताओं के विरुध्द चेतावनी के गीत हैं, उन सारी शक्तियों के विरुध्द है जो लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर ‘फासीवाद ‘का प्रचार करती हैं। (पृष्ठ 9) पहली कविता का शीर्षक ‘प्रश्न – मयी दोपहरी’ जीवन की इस लंबी यात्रा पर ही प्रश्न उठाती है –
टंके हुए कितने भ्रम
जिन्दगी मिली हमको
यातना शिविर जैसी
गूंगों का मुक्ति बोध शाही ख्ययाम नहीं। (पृष्ठ 26)
कवि स्वयं नीलकंठ है, वह चुनौतियों का सामना करता है –
हम नीलकंठ हैं
गरल हमी से हारा है
हमने छूकर पाषाणों को स्वप्न दिए हैं
हम सागर की गहराई का राज लिए हैं
फिर क्यों गुदले पानी में नावें छोड़ रहे हैं
नई राह पर
स्वर्ण पुरातन
गवां दिया हमने।।( पृष्ठ 73)
कवि के विषय में वरिष्ठ साहित्यकार जीवन सिंह ने स्पष्ट लिखा है कि किशन दाधीच अपनी प्रतिबद्धता को नहीं छिपाते। उनका एक गीत ‘गीत की गाँव तक पद यात्रा’ यह पद यात्रा ही उनके साहित्यकार की प्रतिबद्धता है। – – जिस बूंदी से किशन दाधीच का रिश्ता पिछली सदी के आठवें दशक तक रहा जो उनकी पैतृक नगरी है और बूंदी एक कस्बा जैसा ही था। बूंदी साहित्यक ऊर्जा की धरती रही है जहांँ साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों का तीर्थ स्थल है। पत्रकार लज्जा राम मेहता,ऋषि दत्त मेहता, भाषाविद् डॉ भोलाशंकर व्यास,शहीद रामकल्याण आदि की कीर्ति गाथा अंकित है। उनकी संवेदनशीलता से भरे गीत बूंदी से होकर ही आते हैं ।कवि किशन दाधीच शहरी सदी को आंकड़े की सदी कहते हैं। – – – गीत के माध्यम से इस समाज के उबड़ खाबड़ यथार्थ को व्यक्त करना बहुत कठिन है लेकिन कवि ने गीत के माध्यम से यह काम बहुत सलीके से किया है।( पृष्ठ 15) मानवता के विकास और उन्नति के लिए कवि के लिए जो गीत रचनाएँ की हैं उसे मनुष्य का मन मस्तिष्क सहज ही अपना लेता है।
गीत – समय काव्य संग्रह कवि का पहला काव्य संग्रह है। नई दिल्ली और हैदराबाद के प्रसिद्ध प्रकाशन नीलकमल पब्लिकेशन के सुरेशचंद्र शर्मा द्वारा प्रकाशित किया गया है । कीमत 300 रुपये हैं। प्रथम संस्करण है जो 2021 में आया है। पुस्तक का आवरण डॉ श्रीनिवास अय्यर द्वारा अंकित किया गया है जो कलम की कहानी में निहित रस- रंग और संगीत की स्वर लहरी का आह्वान करते हैं।
अभी भी हम भरोसा कर सकते हैं कविताओं पर, साहित्य पर जो समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आशा की किरणें जगाती हैं।





