Saturday, October 31, 2026
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अनोखा है बिस्कुट को भारतीयों तक पहुँचाने वाले पारले जी का सफर

बच्चा-बच्चा तक जानता है पारले-जी का नाम। जी हाँ, वही पारले-जी, जिसका बिस्कुट बच्चों से लेकर जवान और बुजुर्ग तक चाव से खाते हैं। सुबह चाय के साथ लेना हो या भूख लगने पर झटपट पेट भरने का साधन, मूड कुछ नमकीन खाने का हो या मीठा, पारले-जी को हर पसंद का खयाल है। तभी यह कंपनी बिस्कुट से सिर्फ पैसे नहीं बल्कि लोगों का अथाह प्यार भी कमाती है।
अब बात करते हैं कि पारले जी की शुरुआत कैसे हुई? इसकी दिलचस्प कहानी है। पारले-जी के मालिक मोहन दयाल चौहान बिस्कुट नहीं बल्कि कॉन्फेक्शनरी (मिठाई-चॉकलेट आदि) बनाना चाहते थे। इस काम में मोहन दयाल चौहान के बेटे भी हाथ बंटाना चाहते थे। इसी तैयारी में साल 1928 में ‘हाउस ऑफ पारले’ की स्थापना की गई। बाद में मोहन दयाल चौहान की पसन्द बदली और कॉन्फेक्शनरी का व्यवसाय पहली पसंद नहीं रह गई। चौहान ने 18 साल की उम्र में कपड़ों के व्यवसायी के तौर पर अपना काम शुरू किया था और आगे उन्होंने कई व्यवसायों को नया स्वरूप प्रदान किया।

बेटों का मिला साथ
मोहन दयाल चौहान की मेहनत रंग लाती गई और व्यवसाय आगे बढ़ता गया. इसमें उनके बेटों का भी भरपूर सहयोग मिला और वे भी अपने पिता जी का हाथ बंटाने लगे। कंपनी में नए-नए आयाम जुड़ते गए और बेटों की सलाह पर गौर किया जाने लगा। दयाल चौहान के बेटों ने ही अपने पिता जी को कुछ नया व्यवसाय करने की राय दी। लिहाजा, कई अलग-अलग विकल्पों पर मशविरा शुरू हुआ। कपड़ों के कारोबार में लगे दयाल चौहान ने कॉन्फेक्शनरी में अपनी पूरी मेहनत झोंक दी और इसके लिए वे जर्मनी के दौरे पर निकल पड़े। वहां उन्हें कॉन्फेक्शनरी की तकनीकी और व्यवसाय के नए-नए गुर सिखने थे.

हाउस ऑफ पारले की स्थापना
इसी क्रम में 1928 में मोहन दयाल चौहान ने ‘हाउस ऑफ पारले’ की स्थापना की. इस नाम के पीछे भी दिलचस्प कहानी है। कंपनी का नाम पारले इसलिए पड़ा क्योंकि यह मुंबई से हटकर विले पारले में लगाई गई थी। विले पारले से कंपनी को पारले का नाम मिला। कॉन्फेक्शनरी बनाने की पहली मशीन 1929 में लगाई गयी। काम शुरू हुआ और पारले कंपनी में मिठाई, पिपरमिंट, टॉफी आदि बनाए जाने लगे। ग्लूकोज, चीनी और दूध जैसे कच्चे माल से इन चीजों का उत्पादन शुरू हुआ। शुरुआती दौर में इस काम में 12 परिवारों के सदस्य जुड़े। इन्हीं परिवारों के लोग इंजीनिरिंग से लेकर निर्माण और यहां तक कि उत्पाद की पैकेजिंग का काम भी संभालते थे। ‘सीएनबीसी टीवी18’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी से जो पहला उत्पाद बाजार में पहुंचा वह था ‘ऑरेंज बाइट’. देखते-देखते इस टॉफी ने काफी नाम कमाया और लोगों की जुबान पर पारले का नाम चढ़ गया। ये वो दौर था जब बिस्कुट को प्रीमियम उत्पाद माना जाता था जिसे खासकर अंग्रेज या देश के अमीर लोग ही खाते थे। उस वक्त ज्यादातर बिस्कुट विदेशों से मंगाया जाता था।

ऐसे शुरू हुआ बिस्कुट का काम
साल 1938 में पारले ने फैसला किया कि वह ऐसा बिस्कुट बनाएगी जिसे देश का आम आदमी भी खरीद सके और खा सके. इसी क्रम में पारले ग्लूकोज बिस्कुट का उत्पादन शुरू हुआ। यह बिस्कुट सस्ता था और हर जगह बाजार में मौजूद था, इसलिए इसने काफी कम वक्त में पूरे देश में घर-घर में अपनी पकड़ बना ली। इस बिस्कुट के साथ एक राष्ट्रवादी विचारधारा भी थी कि देश में इसे पहली बार बनाया गया है और अब विदेशी बिस्कुट पर कोई निर्भरता नहीं रही। अब अंग्रेज ये नहीं कह सकते थे कि वे ही सिर्फ बिस्कुट खाते हैं या उनके बनाए बिस्कुट पर ही लोग निर्भर हैं। देश के लोगों में यह भावना पूरी तरह से घर कर गयी। पारले अब बिस्कुट कंपनी ही नहीं बल्कि देश की निशानी बन गयी।

सैनिकों की पसंद
पारले ग्लूको बिस्कुट देश में तो छाया ही, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश और इंडियन आर्मी के सैनिकों की भी पसंद बन कर उभरा। अब पारले की सफलता की कहानी अपने चरम पर थी। ऐसे में 1940 में कंपनी ने पहला नमकीन बिस्कुट सॉल्टेड क्रैकर-मोनाको बनाना शुरू किया। तब तक 1947 में देश का विभाजन हो गया और पारले को ग्लूको बिस्कुट का उत्पादन रोकना पड़ा क्योंकि गेहूं इसका मुख्य स्रोत था जिसकी कमी पड़ गयी। इस संकट से उबरने के लिए पारले ने बार्ली से बने बिस्कुट को बनाना और बेचना शुरू किया। 1940 में पारले ऐसी कंपनी बन गई थी जिसके पास दुनिया का सबसे लंबा 250 फीड की भट्टी यानी ओवन था।

बाद में बदला नाम
बाद में और ब्रिटानिया मार्केट में आई और उसने पारले के ग्लूको की तरह ग्लूकोज-डी बनाना शुरू किया। बाजार में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के लिए पारले ने 80 के दशक में ग्लूको का नाम बदलकर पारले-जी कर दिया। पैकेट का रंग भी बदला और सफेद और पीले कवर में बिस्कुट आने लगे। इस पर ‘पारले-जी गर्ल’ की तस्वीर छपी होती थी। शुरू में ‘जी’ का मतलब ग्लूकोज होता था लेकिन 2000 के दशक में यह ‘जीनियस’ के तौर पर जाना जाने लगा। पार्ले-जी गर्ल के बारे में कई कहानी है जिसमें कहा जाता है कि उस वक्त के मशहूर कलाकार मगनलाल दइया ने 60 के दशक में लड़की की तस्वीर बनाई थी जो डिब्बे पर देखा जाता है।

आज देस में पारले-जी के पास 130 से ज्यादा फैक्ट्रियां हैं और लगभग 50 लाख रिटेल स्टोर्स हैं। हर महीने पारले-जी 1 अरब से ज्यादा पैकेट बिस्कुट का उत्पादन करती है। देश के कोने-कोने में जहां सामान ठीक से नहीं पहुंचाए जाते, पारले-जी बिस्कुट वहां भी दिखता है।

(स्त्रोत साभार – टीवी 9 भारतवर्ष)

मेंहदी लगानी हैं तो ये रहे मनभावन डिजाइन्स

नमिता सिंह

श्रृंगार की बात हो तो मेंहदी की बात न हो, ऐसा तो हो नहीं सकता। हर एक उत्सव, और हर एक महत्वपूर्ण अवसर पर मेंहदी लगायी जाती है। मेंहदी के कई डिजाइन्स होते हैं और कई बार डिजाइन चुनना कठिन भी हो जाता है।

शादियों के मौसम में कई बार मेंहदी के अलग डिजाइनों की माँग रहती है और इसे लेकर माथापच्ची भी खूब होती है। आज मेंहदी लगाना एक शानदार कॅरियर है और इसके लिए जरूरी है लगातार अभ्यास और कुछ नया करते रहना।

अगर आप भी मेंहदी की डिजाइन को लेकर उलझन में हैं तो ये डिजाइन देखिए। वधू हों या वधू की सहेलियाँ आपको अच्छा लगेगा। मेंहदी की यह डिजाइन हमें नमिता सिंह ने भेजी हैं। नमिता शुभजिता प्रतिभा सम्मान की प्रतिभागी एवं टीम शुभजिता की सदस्य हैं –

 

भारत जैन महामंडल लेडीज विंग ने की भोजन सेवा

कोलकाता । भारत जैन महामंडल लेडीज विंग कोलकाता ने अध्यक्ष सरोज भसाली के 60 वें जन्मदिन पर जरूरतमंदों को भोजन कराया गया। इसके साथ ही मिष्ठान भी वितरित किया गया। आयोजन को सफल बनाने में युवा शक्ति शशि सेठिया, सुनीता बरडिया, राजसी भसाली, चंदा गोलछा, मीता डोसी, उपाध्यक्ष अंजू सेठिया का सहयोग रहा।  चाय अडडा चाय पर चर्चा और गुप्त नवरात्रि के प्रथम दिन काली माता के बहुत सुंदर दर्शन का सौभाग्य भी मिला। युवा सदस्यों ने उत्साह के साथ भाग लिया। मानव  सेवा ही ईश्वर सेवा के समान है। सेवा करने के इच्छुक हों तो तो भारत जैन महामडल लेडीज विंग से सम्पर्क किया जा सकता है।

नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण देवभूमि उत्तराखंड 

नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण उत्तराखंड देश-दुनिया के पर्यटकों के लिए सबका प्रिय गन्तव्य स्थल बनता जा रहा है। न सिर्फ मसूरी, नैनीताल जैसे पर्यटक स्थल बल्कि औली, खिर्सू, चोपता जैसे तमाम स्थान भी उनके पसंदीदा स्थलों में से शामिल हैं।हिमालय की गोद में स्थित उत्तराखंड देवों की भूमि के नाम से प्रसिद्ध है। उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक स्थलों के कारण भारत की प्रमुख पर्यटन स्थलों की गिनती में बेशुमार है जिसे निहारने दुनिया भर से लोग प्रतिवर्ष यहां आते हैं। इस लेख के जरिए हम आपको उत्तराखंड के उन प्रसिद्ध स्थलों की जानकारी देंगे, जहां आप अपनी सर्दियों की छूट्टियों को यादगार बना सकते हैं।

औली- भारत के उत्तराखंड में स्थित औली हरे-भरे देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ है। यह स्थान विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और जीवों के लिए घर होने के अलावा, यह कई तरह के साहसिक गतिविधियों जैसे स्कीइंग, ट्रेकिंग और कैम्पिंग के लिए जाना जाता है। औली के उत्तर में, बद्रीनाथ मंदिर है जो हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। यहां पर आपको एक और अन्य आकर्षण वैली ऑफ फ्लॉवर्स नेशनल पार्क है जो अल्पाइन वनस्पतियों और वन्यजीव जैसे हिम तेंदुओं और लाल लोमड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। पर्यटकों के बीच बढ़ती लोकप्रियता चलते औली पर्यटकों के लिए मनपसंद गंतव्य में से एक है।

मसूरी- मसूरी  उत्तराखंड की सबसे खूबसूरत और लोकप्रिय जगहों में से एक है। इसे पहाड़ों की रानी भी कहा जाता है। मसूरी, देहरादून से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। यहां हर साल लाखों लोग अपनी फैमिली, दोस्तों के साथ कैम्पटी फॉल, गन लेक और मसूरी लेक जैसी जगहों पर घूमने आते हैं।

चोपता- चोपता उत्तराखंड में केदारनाथ की अद्भुत घाटी में बसा एक छोटा गांव है जोकि एक बहुत ही आकर्षक पर्यटन स्थल है। चोपता ट्रेक सर्दियों के मौसम में ट्रेकिंग करने के लिए भारत के सबसे अद्भुद और रोमांचक ट्रेकों में से एक है जो बड़ी संख्यां में ट्रेकर्स और पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करता है। वास्तव में सर्दियों के मौसम में बर्फ से ढके हिमालय के पहाड़ों के बीच ट्रेकिंग करना जीवन के सबसे शानदार अनुभवों में से एक है।

चमोली- चमोली उत्तराखंड में सर्दियों में घूमने लायक महत्वपूर्ण जगहों में से एक है। खासकर भगवान शिव के मंदिर के लिए बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं। गोपेश्वर पर्यटन के दौरान चमोली जिले में आने वाले पर्यटक गढ़वाल हिमालय पर होने वाली ट्रेकिंग के लिए जाना पसंद करते हैं। ट्रेकिंग के दौरान प्रकृति प्रेमी यहाँ कि सुन्दर वादियों और खूबसूरत दृश्यों का लुत्फ़ उठाना नही भूलते हैं।

खिर्सू- उत्तराखंड के पौड़ी जिले में पड़ने वाला छोटा सा गांव खिर्सू अपनी प्राकृतिक सुंदरता से पर्यटकों को खासा लुभाता है। खिर्सू उत्तराखंड के खूबसूरत और शांत पर्यटन स्थलों में से एक है। इस छोटे से गांव में बांज, देवदार, चीड़, बुरांश के पेड़ों बीच पक्षियों का कलरव सुनाई देता है। यहां से आप बर्फ से ढकी चोटियों की मनोरम श्रृंखला देख सकते हैं।

धनोल्टी- गढ़वाल हिमालय श्रृंखला की तलहटी में मौजूद धनोल्टी एक मनभावक हिल स्टेशन है। यह भारत की राष्ट्रीय राजधानी के करीब है और समुद्र तल से 2286 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आप ऊंचे-ऊंचे हिमालय के खूबसूरत नजारों का भरपूर मजा ले सकते हैं। दिसंबर और जनवरी में बर्फबारी का मजा लेने के लिए एक बार आपको धनोल्टी भी जरूर जाना चाहिए।

रानीखेत- स्थानीय दर्शनीय स्थलों की यात्रा से लेकर पैराग्लाइडिंग और आसपास के अद्भुत नज़ारों का आनंद लेने के लिए रानीखेत सबसे अच्छे विकल्पों में से एक है। कैंपिंग और ट्रेकिंग जैसी साहसिक गतिविधियों के लिए रानीखेत पसंदीदा जगहों में से एक है। झूला देवी मंदिर, भालू बांध और सेब का बगीचा यहां के सबसे प्रसिद्ध स्थान हैं।

नैनीताल- नैनीताल झील शहर के रूप में जाना जाता है और प्रकृति से भरपूर है। सूर्य की किरणों के नीचे आराम से नैनी झील में नाव की सवारी का आनंद लेने के लिए इको केव गार्डन और नैनीताल चिड़ियाघर में जाने के लिए, पूरे परिवार के लिए घूमने के लिए बहुत सारे स्थान हैं। साहसिक खेलों के शौकीनों के लिए चीना पीक पसंदीदा जगहों में से एक है।

बिनसर- अगर शहर के कोलाहल से ऊब गए हैं और सुकून के कुछ पल बिताना चाहते हैं तो उत्तराखंड के बिनसर घूम आइए. बिनसर अनछुए प्राकृतिक वैभव और शांत परिवेश के लिए मशहूर है। यहां घने देवदार के जंगलों के बीच से हिमालय पर्वत श्रृंखला का मनोरम दृश्य दिखता है। यहां की घाटियां आपकी आंखों को सुकून देंगी। पैदल रास्ते, बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों और सुरम्य घाटियों के साथ, बिनसर एकांत और शांति चाहने वालों के लिए सबसे अच्छी जगह है। उत्तराखंड पर्यटन सचिव दिलीप जावलकर ने बताया कि उत्तराखण्ड में वर्ष भर पर्यटन आधारित गतिविधियों के आयोजन के लिए सरकार द्वारा निरंतर प्रयास किये जा रहे हैं। जैसे-जैसे सर्दी के दिनों के लिए उत्तराखंड में स्कीइंग, पैराग्लाइडिंग, कैंपिंग, हाइकिंग जैसी गतिविधियों के लिए अनुकूल वातावरण है। हम अपने शीतकालीन कार्यक्रमों का आयोजन करके पर्यटकों को सर्वाेत्तम अनुभव प्रदान करने के लिए आगे काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के चुनौतीपूर्ण समय में उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड पर्यटकों और हितधारकों की अधिकतम स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समर्पित है। हम पिछले वर्षों की तरह सभी तैयार शीतकालीन कार्यक्रमों को आयोजित करने के लिए समीक्षा बैठकें आयोजित कर रहे हैं।

पिंजरा

प्रो. प्रेम शर्मा

लघु नाटिका (एकांकी)

पात्र परिचय_
मेंढक ,मेंढकी।
गिलहरी।
बिल्ली मौसी।
डॉक्टर नेवला।
कोविड के समय जानवरों का संवाद–

“क्या बात है मेंढक भैया! रोज तो बहुत फुदकते थे ,आज बड़े शांत और उदास हो।”
पेड़ की डाल पर बैठे बैठे ही गिलहरी ने मेंढकसे पूछा।
मेंढक_ “हूॅं”।” मेंढकी कोरोना
से चल बसी।”
गिलहरी_”ओ–हो—”
मेंढक_”डॉक्टर नेवला जी ₹200000 मांग रहे हैं मेढकी का शव ले जाने से पहले।”
गिलहरी_”दवाइयां बहुत महॅंगी होंगी।”
मेंढक_”बिल्कुल नहीं कोई दवाई नहीं दी। धूप में बिठाया और गर्म पानी पिलाया”
गिलहरी_”डॉक्टर नेवला जी ईतना पैसा फिर क्यों मांग रहे हैं?”
मेंढक_”मजबूरों का फायदा कौन नहीं उठाता! मेंढकी के शव को देखने भी नहीं दे रहे ना जाने कौन से पिंजरे में कैद किया है शव को”
गिलहरी_”अब क्या करोगे?”
मेढक_”बिल्ली मौसी से सहायता मांगी है। उनका एन.जी.ओ है ना!
वह देखो, आ गई।
बिल्ली मौसी_”मेंढक बेटा! निराश मत हो। डॉक्टर नेवला जी को यह पैसा दे दो और मेंढकी का अंतिम संस्कार करो।”
मेंढक_””यह तो बहुत ज्यादा पैसा लगता है।”
बिल्ली मौसी_”रख लो काम आएगा।”
मेंढक_(कुछ सोच कर) “अच्छा–
हम इस पैसे से एक अस्पताल खोल सकते हैं जहाॅं कोरोना रोगियों की मुफ्त चिकित्सा हो।
“बहुत अच्छा विचार –बहुत अच्छा विचार–“एक स्वर में बिल्ली मौसी और गिलहरी ने समर्थन किया।”
मेंढक(गंभीर स्वर में)”कम से कम डॉक्टर नेवला जी जैसे डॉक्टरों के बनाए पिंजरे में मजबूरन कैद होने से तो रोगी बच पाएंगे”

होम्योपैथी का हब बनेगा बंगाल

अमहर्स्ट स्ट्रीट में खुला होमियो यूनिवर्स होमियो क्लिनिक

कोलकाता । बंगाल होम्योपैथी चिकित्सा का हब बनेगा। बंगाल में होम्योपैथी औषधि के निर्माण की अधिकतर कम्पनियाँ हैं। सोचैम आयुष नेशनल टास्क फोर्स के अध्यक्ष तथा पावेल ग्रुप ऑफ कम्पनी के प्रबन्ध निदेशक डॉ सुदीप्त नारायण रॉय ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि राज्य में विशेष रूप से कोलकाता और उसके उपनगरीय इलाकों में कई पुरानी कम्पनियाँ तथा निर्माण इकाईयाँ हैं। कोलकाता को होमियो हब के रूप में विकसित करने की योजना है। 350 मुख्य निर्माताओं में से 250 कोलकाता और उसके आस -पास हैं। एसोचेम  इसे लेकर वेस्ट बंगाल इंडस्ट्रीयल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के साथ बंगाल को होम्योपैथी हब के रूप में विकसित करने के लिए काम करेगा। क्लस्टर प्रारूप में 5 एकड़ जमीन पर होमियो हब बनाने की योजना है।

उन्होंने कहा कि कोलकाता सार्क और आसियान देशों के पास है। अगले 5 सालों में होम्योपैथी का परिदृश्य बदलेगा। होम्योपैथी का भविष्य उज्ज्वल है और बाजार तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय होम्योपैथी उद्योग सालाना 25 फ़ीसदी की दर से बढ़ रहा है। एसोचैम आयुष एनटीएफ के अध्यक्ष के रूप में डॉ रॉय ने कहा कि 2027 तक वैश्विक होम्योपैथिक उद्योग 18.5 बिलियन अमरीकी डालर तक पहुंचने जा रहा है। उन्होंने कहा कि फिलहाल समय भारतीय होम्योपैथी को बढ़ावा देने का है, क्योंकि भारत को ‘होमलैंड की मातृभूमि’ के रूप में जाना जाता है। एसोचैम आयुष एनटीएफ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय होम्योपैथी को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। डॉ. राय मध्य कोलकाता के अमहर्स्ट स्ट्रीट इलाके में होमियो यूनिवर्स होमियो क्लिनिक का उद्घाटन करने पहुँचे थे। इस अवसर पर 48 नम्बर वार्ड के पार्षद विश्वरूप दे भी उपस्थित थे। व्यवसाय का स्वामित्व जॉयदीप पायेन के पास है, जो असम के बोरीके होमियो रेमेडीज के बिप्लब रॉय द्वारा समर्थित हैं।

वाणी प्रवाह 2022 – प्रतियोगिता – समीक्षा लेखन, उपन्यास – तितली

निभा सिंह, कलकत्ता विश्वविद्यालय

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित उपन्यास ‘तितली’ सामाजिक पृष्टभूमि पर लिखा गया हैं। यह 1934 ई. में प्रकाशित हुआ था। ‘तितली’ आजादी के पहले एक गाँव के परिवेश पर आधारित नायिका प्रधान उपन्यास हैं, एक नवयुवती जो तमाम मुसीबतों से अकेले लड़ते हुए सफल होती हैं। यह महुआ के जीवन के अतिरिक्त इंद्रदेव और उसके परिवार की कथा है जिसमें एक धनी परिवार की पारिवारिक समस्याएं अंकित हैं। कथानक के आगे बढ़ने पर कलकत्ता आदि महानगरों के छाया संकेत भी मिल जाते हैं। ‘तितली’ उपन्यास में प्रसाद की स्त्रीवादी दृष्टिकोण उभरकर सामने आता है। इसमें मूर्तिमान नारीत्व, आदर्श भारतीय पत्नीत्व जागृत हुआ है। तितली प्रसाद की  वह नारी पात्र है जिसमें स्वाभिमान का भाव है। उसके पति मधुबन को सजा हो जाने पर एवं उसके पूर्वजों का शेरकोट से बेदखल हो जाने पर तथा बनजरिया पर लगान लग जाने पर, इतनी दुरावस्था मेें भी वह किसी से सहायता की भीख नही माँगती बल्कि वह खुद मेहनत करके लड़कियों की पाठशाला चलाती है और अपने पुत्र को पालती है। अपनी दुरावस्था में अपने ही अवलम्ब पर वह स्वाभिमानपूर्वक जीना चाहती है।

इसमें मुख्य रूप से ग्राम्य जीवन के चित्र और समस्याओं का समावेश किया गया हैं। मिटती हुई सामन्तवादी प्रथा की सूचना ‘तितली’ में मिलती हैं। महाजनों का शोषण, महंतो का पाखंड इसमें अंकित हैं। ‘गोदान’ जैसी विशाल आधारभूमि ‘तितली’ को नहीं प्राप्त हो सकी, पर समस्याएं उसी तरह की हैं। शैला रामनाथ से तर्क करती है और अंत में भारतीय संस्कृति की उच्चता स्वीकार कर लेती हैं। बाबा रामनाथ भारतीय उदार मानवीयता के प्रतिनिधि पात्र हैं, जिन्हें कृषि परंपरा का आधुनिक प्रतीक कहा जायेगा।

साहित्य को नई दिशा देने वाले जयशंकर प्रसाद की अनुपम कृति ‘तितली’ जीवन के गूढ़ रहस्य की बातों-बातों में ही समझा देती हैं। इसकी कथा के माध्यम से प्रसाद जी ने समाज में फैली अनेक भ्रांतियों को भी उजागर किया हैं।खेती के लिए थोड़ी-सी जमीन और हल-बैल के साथ ही गाँव में रहने वाले मजदूरों और किसानों के लिए बैंक, अस्पताल और स्कूल जैसी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति की ओर भी शासकों का ध्यान वे इस उपन्यास में आकर्षित करते हैं। इसमें अपने समय का समाज पूरी ईमानदारी से उजागर हुआ हैं। पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि सुख-सुविधाओं की लूट के मामले में वह आज के समाज से तनिक भी कम नहीं था।
इसमें यह दिखाया गया है कि स्त्री-पुरुष तो अलग-अलग मिट्टी के बने हैं। जहाँ पुरुष छल,बल,दल से अपनी बात मनवाने का प्रयास करते हैं, वही स्त्री अपने कोमल मन में केवल प्रेम को तलाशती हैं। वह प्रेम जो ताकत भी है और कमजोरी भी।वह प्रेम जिसके लिए वह जीती है और जिसके लिए वह मर भी जाना चाहती हैं। वह प्रेम जिसका एक सपना पूर्ण करने के लिए वह जीवन भर संघर्ष करती हैं। लेकिन एक और बात भी है जो स्त्री को पुरूष से भिन्न करती हैं।जहाँ पुरुष समस्याओं से घिर जाने पर और दवाब में या तो उत्पाती हो जाता है या टूट कर बिखर जाता हैं। वही स्त्री कठिन से कठिन परिस्थितियों में अधिक दृढ़ होकर खड़ी रहकर परिवार का सहारा बनती हैं।

इस प्रकार ‘तितली’ प्रसाद की वह नारी पात्र है जिसमें आत्मबल प्रबल है, जो अपने पति से विरहित होकर भी विचलित नहीं होती बल्कि विषम परिस्थितियों को झेलती हुई समाज में सगर्व मस्तक उठाये अपने लिए सम्मानित स्थान बनाती है, जो तत्कालीन समाज में अत्यंत कठिन था परंतु प्रसाद ने इसे कर दिखाया। यह एक बेहद रोचक उपन्यास है जिसे पढ़ना हृदय को कभी दुःखी करता है कभी आनंदित। भारतीय समाज की एक बीते हुए युग की विवेचना करती हुई यह पुस्तक शुरू से अंत तक पाठक को बांधे रखती हैं। इसको जयशंकर प्रसाद की उत्कृष्ट रचना माना जा सकता है यह हिम्मत, समर्पण, मित्रता, भाईचारे का, प्रेम का, प्रेम की पीड़ा का, विरह का उपन्यास हैं।

प्रतिभागी- निभा सिंह
प्रतियोगिता का नाम- समीक्षा लेखन
मातृभाषा- हिंदी
ई मेल आई डी- [email protected]
Phone no.- 8240604722

शेक्सपीयर सरणी में खुला बिफोर यू डाई बुक कैफे

कोलकाता । फिल्म बिफोर यू डाई 18 फरवरी को रिलीज होने वाली है। यह फिल्म एक संदेश देती है कि हमें अपने जीवन के हर पल को जब्त कर लेना चाहिए और अपने जीवन को पूरी तरह से जीना चाहिए। ऐसा करने के लिए हम में से प्रत्येक को अपनी बकेट लिस्ट बनानी चाहिए। फिल्म के निर्माता प्रदीप चोपड़ा ने 131 थिंग्स टू डू “बिफोर यू डाई” शीर्षक एक पुस्तक जारी की।? इसके साथ भारतीय़ भाषा परिषद के निकट बुक कैफे बिफोर यू डाई कैफे भी खुला जिसका उद्घाटन सौमेन मित्रा, सेवानिवृत्त आईपीएस और वर्तमान में विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) और निदेशक ( प्रशिक्षण) ने किया। परिषद विभिन्न भाषाओं को बढ़ावा देती है, मुख्यतः हमारी राष्ट्रीय भाषा हिंदी को। यह कैफे न केवल कॉफी और नमकीन परोसेगा, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के समान विचारधारा वाले लोग रचनात्मक चर्चा, बौद्धिक गतिविधियां, पुस्तक और ट्रेलर लॉन्च करेंगे। फिल्म को पहले ही एलआईएफएफटी इंडिया अवार्ड्स 2022 और हाल ही में 9वें नोएडा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव- 22 में एक विशेष फिल्म मेंशन जैसे फिल्म समारोहों में पहचान मिली है। बिफोर यू डाई बुक कैफे “द शेयर चाय” के नए अवतार की विशेषता एक कप चाय पर प्रसिद्ध बंगाली ‘अड्डा’ के अनुरूप है और विशिष्ट मिट्टी के कप को भूलना नहीं है। हम बिफोर यू डाई’ ‘शेयर चाय’ में प्रसिद्ध शेयर मार्केट चाय और टोस्ट संस्कृति को दक्षिण कोलकाता में लाने का लक्ष्य रखते हैं। आईलेड के अध्यक्ष और फिल्म बिफोर यू डाई के निर्माता प्रदीप चोपड़ा ने कहा है, “बिफोर यू डाई … कैफे में अपना ट्रेलर लॉन्च करने वाली पहली फिल्म है। जब से मैंने इस फिल्म को लिखा है, तब से मेरी इस फिल्म के साथ एक विशेष बॉन्डिंग रही है, लेकिन कभी नहीं सोचा था कि रिलीज होने से पहले ही यह इतनी भव्य हो जाएगी। ”
शेयर चाय के मालिक मनीष अग्रवाल ने कहा है कि “शेयर चाय” में हमारा उद्देश्य प्रसिद्ध चाय और टोस्ट संस्कृति को दक्षिण कोलकाता में लाना है। हमारी विशिष्टता हमारी स्वच्छता और स्वादिष्ट स्नैक्स की श्रृंखला है। मिट्टी के बर्तन में स्वाद एक अनूठा स्वाद और सुगंध जोड़ता है।
हमने अपना पहला आउटलेट सदर्न एवेन्यू में खोला और भारी प्रतिक्रिया ने हमें एक कदम आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। 36ए शेक्सपियर सरणी में हमारा दूसरा कैफे है।

कोलकाता की श्रुति को इन्फ्रा का राइजिंग स्टार यूथ अवार्ड

कोलकाता । कोलकाता की श्रुति चक्रवर्ती को इन्फ्रा का राइजिंग स्टार यूथ अवार्ड मिला है। श्रुति को यह पुरस्कार रोबोटिक्स एवं एआई के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए यह सम्मान मिला है। इन्फ्रा की ओर से गणतंत्र दिवस के अवसर पर इस सम्मान के विजेताओं का नाम घोषित किया गया। इन्फ्रा यानी इंडिया -फ्रांस एसोसिशएशन भारत और फ्रांस के सम्बन्धों को मजबूत कर रहा है। श्रुति के अतिरिक्त सौर उर्जा के क्षेत्र में गुरलीन कौर और सामुदायिक समाज सेवा के लिए प्रशांत कुमार रघुपति को भी सम्मानित किया गया। गौरतलब हे कि इन्टर्नशिप के दौरान उसने स्टैफर्डशायर यूनिवर्सिटी के प्रोटोटाइपिंग एवं प्रोडक्ट डेवलपमेंट प्रोग्राम सैम्पिड के माध्यम से प्रॉम्टैक लिमिटेड के साथ काम किया है। रोबोटिक तकनीक के जरिए उसने व्यवसायियों की भी सहायता की जिसके लिए उसे सराहा भी गया।

भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडेय को दी श्रद्धांजलि

कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों ने 73 वें गणतंत्र दिवस पर स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडेय को श्रद्धांजलि अर्पित की। इन एक्ट के छात्र ने मंगल पांडेय की कहानी अपनी जुबानी सुनाई । कॉलेज के डायरेक्टर जनरल डॉ सुमन मुखर्जी, टीआईसी डॉ सुभब्रत गंगोपाध्याय, डीन प्रो दिलीप शाह, वाइस प्रिंसिपल डॉ पिंकी सरदार साहा, सोहिला भाटिया और कॉलेज के पदाधिकारियों उमेश ठक्कर, जीतू भाई ने तिरंगा फहराया। देश के गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगे को एनसीसी के कैडट्स ने मार्च पास्ट करते हुए झंडे को सलामी दी । उसमें एनसीसी के छात्र और छात्राओं दोनों ही के पैंतालीस कैडेटों ने हिस्सा लिया।
एनसीसी केडेट राज तिवारी को कॉलेज ने बधाई और शुभकामनाएं दी क्योंकि वह इस वर्ष 26 जनवरी को राजपथ पर होने वाले गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेने के लिए चयनित हुआ। यह कॉलेज के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के लिए गौरव की बात है। संगीत विशेषज्ञ सौरभ गोस्वामी के साथ सभी विद्यार्थियों और शिक्षक गणों ने राष्ट्रगीत में हिस्सा लिया। देश के संविधान को सभी ने एक साथ दोहराया। सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए जो ऑनलाइन यूट्यूब पर लाइव था। डायरेक्टर जनरल डॉ सुमन मुखर्जी ने देश में भाईचारा, सौहार्द, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत के लोकतंत्र का महत्व बताया। साथ ही, भारत के विकास में स्त्री सशक्तिकरण के लिए शिक्षा को महत्वपूर्ण बताया। वहीं प्रो दिलीप शाह ने भारतीय संविधान के पूर्ण रूप से भारत में कैसे लागू हुआ लागू, उसके इतिहास पर विद्यार्थियों को जानकारी दी। टीआईसी डॉ सुभब्रत गंगोपाध्याय ने सभी को गणतंत्र दिवस पर शुभकामनाएं दीं। इस राष्ट्रीय पर्व पर विद्यार्थियों ने रंगोली भी बनाई।कोरोना के नियमों का पालन और सावधानीपूर्वक कार्यक्रम किया गया। प्रो दिव्या उदेशी, प्रो विवेक पटवारी, प्रो स्वप्ना साहा, कृपा शाह आदि शिक्षकों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने किया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।