कोलकाता : पेट्रोल के बाद डीजल ने भी कोलकाता में शतक लगाया है। ईंधन की बढ़ती कीमतों से पुलिस की कारें भी कोई अपवाद नहीं हैं। ऐसे में पुलिस मुख्यालय लालबाजार ने ईंधन की लागत बचाने के लिए इलेक्ट्रिक कार का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। राज्य सचिवालय नवान्न पहले ही ऐसे वाहनों को लीज पर लेने के लिए राजी हो चुका है। टेंडर प्रक्रिया भी खत्म हो गई है। पुलिस अधिकारियों को उम्मीद है कि 228 इलेक्ट्रिक वाहन लालबाजार में जल्द आएंगे। पुलिस का दावा है कि पर्यावरण के अनुकूल वाहनों के इस्तेमाल से वायु और ध्वनि प्रदूषण में कमी आएगी। इससे सालाना कई करोड़ रुपये की बचत होगी।
सूत्रों के मुताबिक, कोलकाता पुलिस ने पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को लीज पर लेने के लिए एक महीने पहले नवान्न को प्रस्ताव भेजा था। पूजा से पहले क्लीयरेंस आया है। राज्य के गृह विभाग के सचिवालय के एक पत्र के अनुसार, इसके लिए लगभग आठ करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। उसके बाद लालबाजार की ओर से सरकारी एजेंसी ईसीएल से 226 इलेक्ट्रिक वाहनों को आठ साल के लिए लीज पर लेने के लिए संपर्क किया गया। कार की आपूर्ति टाटा द्वारा की जाएगी।
एक पुलिसकर्मी ने कहा कि सभी प्रक्रिया से जुड़े कार्य पूरे कर लिए गए हैं। अतिरिक्त आयुक्त रैंक के एक अधिकारी को यह पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई है कि वाहन लालबाजार कब पहुंचेंगे। कोलकाता पुलिस के पास करीब चार हजार वाहन हैं। इनमें से कुछ की उम्र 15 साल से भी ज्यादा है। नतीजतन, इसे अदालत के आदेश के अनुसार रद करने का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए पर्यावरण के अनुकूल कारों को जल्द से जल्द लाने पर जोर दिया जा रहा है। इन वाहनों के लिए छह स्थानों पर हाई स्पीड चार्जिंग प्वाइंट लगाने की भी योजना है। इसके साथ ही कार को कहीं से भी जल्दी चार्ज किया जा सकता है।
8 करोड़ में कोलकाता पुलिस मुख्यालय में आएंगी इलेक्ट्रिक कारें
आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर ने चीड़ के पत्तों से बनाया पैकेजिंग पेपर
कमाई के साथ प्लास्टिक कचरे से मिलेगा छुटकारा
सबसे ज्यादा प्लास्टिक का इस्तेमाल पैकेजिंग के लिए किया जाता है। जिन्हें एक बार इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है, जो प्रकृति के लिए ठीक नहीं है। आईआईटी रुड़की की रिसर्च टीम ने प्लास्टिक पैकेजिंग का विकल्प पहाड़ों में पाए जाने वाले चीड़ के पत्तों से निकाला है। रिसर्च टीम ने महीनों की रिसर्च के बाद चीड़ के पत्तों से पैकेजिंग पेपर बनाने का तरीका ढूंढ निकालना है। ये रिसर्च ‘एक तीर से दो शिकार’ करने जैसा साबित हुआ है। एक तरफ कई शोधकर्ता प्लास्टिक पैकेजिंग का दूसरा विकल्प ढूंढ रहे हैं, वही दूसरी तरफ उत्तराखंड और हिमाचल सरकार चीड़ के पत्तों के कारण जंगल में आग लगने से बचने का कोई उपाय ढूंढ रही थी और ये रिसर्च दोनों बातों के लिए फायदेमंद साबित हुआ है। खास बात तो ये है कि चीड़ से बने पैकेजिंग में फल और सब्जियों को पैक करने पर इनकी लाइफ बढ़ेगी। इसके अलावा पेड़ का इस्तेमाल किए बिना पेपर बनाने का भी एक नया विकल्प मिला है। इसके कमर्शियल प्रोडक्शन होने से पहाड़ में रहने वाले लोगों को रोजगार भी मिलेगा।
कचरे से कुछ बेहतर खोज करने का इरादा था
आपको बता दें उत्तराखंड सहित सभी पहाड़ी इलाकों में चीड़ के पत्ते, यानी पाइन नीडल्स सबसे बड़ा फारेस्ट वेस्ट है। सिर्फ वेस्ट ही नहीं ये पहाड़ी जंगलों के लिए काफी नुकसानदेह भी है। इसके कारण ही जंगल में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इससे निजात पाने के लिए उत्तराखंड सरकार कई तरह के रिसर्च पहले से करवा रही थी। इसी परेशानी को सुलझाने के लिए आईआईटी रुड़की के डिपार्टमेंट ऑफ पेपर टेक्नोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कीर्तिराज गायकवाड़ और उनके शोधछात्र अविनाश कुमार ने पाइन नीडल्स पर तकरीबन 5 महीने शोध करने के बाद इससे पेपर बनाने का अनोखा तरीका खोजा है। प्रोफेसर कीर्तिराज गायकवाड़ ने बताया, “मैं और मेरी टीम कचरे से कुछ उपयोगी बनाने पर शोध कर रही थी। हमने तय किया था कि हम वेस्ट से पेपर बनाने का तरीका खोजेंगे। संयोग से उत्तराखंड सरकार चीड़ के पत्तों का समाधान ढूंढ रही थी और हमने भी चीड़ के पत्तों पर रिसर्च किया और वो सफल भी रहा।”
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार 2018-19 में भारत में 33 लाख टन सिर्फ पैकेजिंग वेस्ट निकला था। कीर्तिराज गायकवाड़ बताते हैं, हमारे देश में प्लास्टिक कचरे को लगातार अनदेखा किया जा रहा है। प्लास्टिक नेचर के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है और इसका समाधान इको – फ्रेंडली पैकजिंग से ही किया जा सकता है। चीड़ के पेपर बनाने से सबसे ज्यादा पहाड़ी जंगलों में आग लगने का खतरा कम होगा। इसके अलावा पेपर बनाने के लिए पेड़ नहीं काटने होंगे। सबसे खास बात ये है कि चीड़ के पत्तों में सेल्यूलोज कंटेंट 31% होता है और पेपर की मजबूती के लिए सेल्यूलोज कंटेंट ही जिम्मेदार होता है। इस तरह चीड़ के पत्तों से बने पैकेजिंग पेपर बहुत मजबूत होगा और प्लास्टिक पैकेजिंग का बेहतर विकल्प।”
चीड़ के पत्तों से बने पेपर ‘एथिलीन गैस’ सोखने की क्षमता रखते हैं। दरअसल फल – सब्जियां पेड़ से टूटने के बाद एथिलीन गैस छोड़ती हैं, जिससे इनकी राइपनिंग जल्दी होती है। चीड़ के पत्तों से बने पैकेजिंग में अगर ये उपज रखे गए तो इनकी आयु बढ़ेगी। इसके अलावा ये पैकेजिंग प्लास्टिक का बेहतर और प्राकृतिक विकल्प है। अगर इस प्रोसेस पर पेपर का कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू हो जाए तो पेड़ काटने से बचेंगे। साथ ही इस पेपर को बनाने में किसी कैमिकल का इस्तेमाल नहीं किया गया यानी ये पूरी तरह से इको फ्रेंडली है।
प्रोफेसर गायकवाड़ कई सालों से ‘वेस्ट से वेल्थ’ बनाने के आइडिया पर काम कर रहे हैं। वो कनाडा से पोस्ट डॉक की रिसर्च पूरी करने के बाद जनवरी 2020 में आईआईटी रुड़की, ज्वॉइन किये। प्रोफेसर गायकवाड़, मुख्य रूप से पैकेजिंग के क्षेत्र में ही काम करते हैं। 2019 में उन्हें इस क्षेत्र में किए गए रिसर्च के कारण साइंस टेक्नोलॉजी मंत्रालय की तरफ से ‘डीएसटी इन्सपायर फैकल्टी ’ चुना गया था। इसके साथ ही साल 2016 में ऑक्सीजन अब्सॉर्बिंग पैकेज डेवलप करने के लिए उन्हें अमेरिकी यूथ साइंटिस्ट पुरस्कार भी मिला था। प्रोफेसर गायकवाड़ कहते हैं, ‘यहां आने के बाद मैंने उत्तराखंड के जंगलों में लगने वाली आग के बारे में बहुत पढ़ा। जिसका सबसे बड़ा कारण पाइन नीडल है। तभी से इसके कमर्शियल यूज पर रिसर्च करने का मन बनाया। मैंने और मेरी टीम ने इस पर कुछ महीने लगातार रिसर्च की और नतीजा आपके सामने हैं।’
प्रोफेसर गायकवाड़ की ये रिसर्च कई फील्ड के लिए फायदेमंद साबित हुई है। इसका इस्तेमाल फल – सब्जियों की पैकेजिंग के अलावा कैरी बैग, डिलीवरी बॉक्स, कॉस्मेटिक प्रोडक्ट की पैकेजिंग, स्ट्रॉ और पेपर शीट सहित कई जगहों पर किया जा सकता है। प्रोफेसर गायकवाड़ बताते हैं कि सस्टेनेबल पैकेजिंग के कई फायदे हैं। ये बहुत मजबूत, टिकाऊ, इको फ्रेंडली और केमिकल फ्री होते हैं। कई कंपनी ऐसे ही पेपर की तलाश में थीं और हमारे शोध के बाद कई बड़ी ई -कॉमर्स कंपनियां और स्टार्टअप हमारे साथ मिल कर काम करना चाहते हैं, लेकिन अभी हमने निर्णय नहीं लिया है। हमारे लिए सबसे पहले देश है तो हम जो भी निर्णय लेंगे, वो हमारे लोगों को फायदा पहुंचने वाला होगा। प्रोफेसर गायकवाड़ कहते हैं कि मैं अपने इस रिसर्च का श्रेय आईआई रुड़की के डायरेक्टर अजीत कुमार चतुर्वेदी को देना चाहता हूं, जिन्होंने मुझे कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया और हर संभव मदद की।
(साभार – दैनिक भास्कर)
भारत की पहली रेस डायरेक्टर दिव्या, पुरुषों के बीच बनाया मुकाम
नयी दिल्ली : दिल्ली की दिव्या मिगलानी ने मोटर स्पोर्ट्स की दुनिया में अपनी ऐसी धाक जमाई कि कार रेसिंग और कार रैली में भारत की कम उम्र की महिला बनकर उभरीं और रैली सर्किट से लेकर रेसिंग ट्रैक तक पहुंचीं।
पिछले 18 सालों से मोटर स्पोर्ट्स से जुड़ी दिव्या कहती हैं, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने खिताब अपने नाम कर पाऊंगी। पर आज ये सब कुछ कर पाई तो उसके पीछे परिवार का सहयोग है। जब मैंने कार रेसिंग शुरू की तो उसके लिए कोई प्रशिक्षण नहीं लिया और कोई सलाह देने वाला भी नहीं था। करिअर की शुरूआत एचसीएल इंफोसिस्टम्स से हुई। फिर कई मुख्य मीडिया संस्थानों में काम किया। रोज की तरह उस दिन भी ऑफिस जा रही थी। दिल्ली से नोएडा थोड़ी जल्दी पहुंच गई। वहीं अपनी बलेनो कार घुमाने लगी। पास में नेशनल स्टेडियम में लड़कों की भीड़ देखी। उसे देख मैं भी उधर चल दी। वहां कार रेसिंग हो रही थी, मैंने भी दिलचस्पी दिखाई। तब जानकारी मिली कि भारत में ऐसे इवेंट्स होते हैं जहां ड्राइवर्स आकर मुकाबला करते हैं। वहां से फिर ऑटो स्पोर्ट्स के बारे में मालूम हुआ। बस फिर क्या था मैं ऐसे ही मौके की तलाश में थी जो मुझे मिल गया और 2004 से मोटर स्पोर्ट्स का सफर शुरू हुआ।
पहली रैली और गाड़ी पलट गयी
दिल्ली में हिमालयन रैली थी जो शिमला से शुरू होकर लेह लद्दाख जानी थी। 2005 का ये वक्त था। पहली रैली वो भी किसी समतल जमीन पर नहीं बल्कि हिमालय की पहाड़ियों पर। सात दिन ये रैली चली। उसमें हर दिन क्वालिफाई करना होता था। जब पहले दिन रैली की तो वो बहुत अलग ड्राइविंग थी, क्योंकि इससे पहले मैंने ऐसे कभी पहाड़ों में ड्राइविंग नहीं की थी। मैं ड्राइविंग कर रही थी और मेरे भाई मुझे नेविगेट कर रहे थे। पहला दिन बहुत अच्छा गया। रैली के दूसरे दिन मैं मारूति जिप्सी चला रही थी। पूरा दिन खत्म होने वाला था तब करीब आधा घंटा पहले हमारी गाड़ी पत्थर से टकराकर पलट गई। विंड स्क्रीन क्रैश हो गई, टायर पलट गए। पर हम दोनों सेफ थे। मुझे अपनी ड्राइविंग पर पूरा भरोसा था फिर जब गाड़ी पलटी तो समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ। जब गाड़ी पत्थर से टकराई तो मैं भी सन्न रह गई। ये गाड़ी का पलटना मेरे लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। हम उस रैली से डिस्क्वालिफाई हो गए। जब मैं घर आई तो मां ने कहा कि अब गाड़ी चलाने का भूत उतर गया, लेकिन मुझे मालूम था कि भूत तो अभी चढ़ा है, क्योंकि मेरे साथ ये दिक्कत है कि जब किसी काम में फेल हो जाती हूँ तो उसके पीछे का कारण ढूंढती हूँ।
जब रेत में सबसे आगे निकल गई जिप्सी
पहली रैली की असफलता के बाद दूसरी रैली 2006 में हुई। इसके लिए खूब प्रैक्टिस की। इस रैली में जान फूंक दी क्योंकि ये तारकोल की सड़क पर नहीं बल्कि रेत से भरे मैदान में होनी थी। यानी राजस्थान में। इस रैली के लिए मैंने इसलिए भी खूब प्रैक्टिस की क्योंकि पहली बार में कार पलट गयी थी और उस डर को बाहर नहीं निकालती तो शायद दोबारा कभी हैंडिल नहीं संभाल पाती। वो रैली इतनी अच्छी हुई कि उसमें हम दोनों भाई-बहन ने रिकॉर्ड बनाया। मेरी जिप्सी एसयूवी एक्स्ट्रीम कैटेगरी में चौथे नंबर पर रही। इसी रैली में मेरा फर्स्ट पोडियम फिनिश मिला। उसी प्रतियोगिता में मुझे जानकारी मिली कि आज तक एक्ट्रीम कैटेगरी में किसी महिला ने पोडियम फिनिश नहीं किया। एक्ट्रीम कैटेगरी में मैं टॉप फोर रही। पुरुषों से भरे मोटर रेसिंग में जब मैं आगे निकल गई तो पीछे मुरझाए और हाथ मलते चेहरे छोड़ दिए। मोटर स्पोर्ट्स में बाइक और कार दोनों की रेसिंग होती है। कार रैली में भी दो कैटेगरी होती हैं। एक एक्सट्रीम जिसमें कोई स्पीड लिमिट नहीं होती। दूसरी, एडवेंचर कैटेगरी जिसमें स्पीड लिमिट होती है। एडवेंचर कैटेगरी थोड़ी आसान होती है। मैंने पहली रैली एक्सट्रीम की थी जिसमें स्पीड नहीं थी।
खेल के मैदान में जाकर की प्रैक्टिस
भारत में मोटर स्पोर्ट्स अभी भी शुरुआती दौर में है। इसलिए इसके लिए बहुत अच्छे ग्राउंड्स नहीं हैं। जब भी जहाँ पर रैली होती थी वहाँ मैं उस जगह की पहले ही रैकी कर लेती थी। वहीं जाकर प्रैक्टिस करती। सिर्फ गाड़ी चलाने की प्रैक्टिस नहीं होती, बल्कि उसकी हैंडलिंग, आपकी मानसिक स्थिरता की भी होती है। अगर आप मानसिक और शारीरिक स्वस्थ पर नहीं होंगे तो ड्राइविंग नहीं हो पाएगी।
गाड़ी और ड्राइवर का टीम वर्क
जब हम ड्राइविंग करते हैं तो मन में आता है कि जिस गाड़ी को हम चला रहे हैं वो ठीक है या नहीं क्योंकि उसे पूरे सात दिन चलाना होता है। जब गाड़ी पर नियंत्रण और भरोसा हो जाता है तब मैं गाड़ी को अपनी सीमा से बाहर ले जा सकती हूँ। अपने विश्वास और गाड़ी पर विश्वास दोनों टीम वर्क हैं। रैली या रेसिंग के दौरान गाड़ी बीच-बीच में बहुत टूटती है। हर दिन इंजीनियर गाड़ी ठीक करता है। रेत की ड्राइविंग बिल्कुल अलग थी। भरी रेत में गाड़ी भगा पाने की तकनीक होती है। ज्यादा रेस देंगे तो टायर रेत में धंसता चला जाएगा। इसलिए अलग टेक्नीक होती है। मेरे समय पर इसकी कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती थी। हमें खुद ही सीखना होता था। रेत में खुद से ड्राइविंग सीखी।
खेल ने बदली दुनिया
खेल से बहुत कुछ सीखने को मिला, जो मैंने खेल से सीखा वो मेरी शख्सियत में भी दिखा। जब हम रैली करते हैं तब हमें नहीं पता होता कि आगे क्या होगा। ये ऐसा खेल है जो जिंदगी को खत्म करने वाला भी हो सकता है। 15 हजार फीट ऊंचाई पर गाड़ी चलाते हैं। अगर एक गलत टर्न ले लिया तो हमारी जान को भी खतरा हो सकता है। ये एक ऐसा खेल है जहां आपके पास किसी भी चीज की गारंटी नहीं होती कि आगे क्या होगा, लेकिन फिर भी हमें स्पीड में गाड़ी को चलाना होता है और आपको प्रतियोगिता में बने रहना होता है। इस खेल से यही सीखा कि जिंदगी में आगे क्या होने वाला है नहीं मालूम। जो आपके पास है वो अभी का वक्त है। वर्तमाम पर ही हमारा नियंत्रण है। ड्राइविंग के वक्त मुझे हमेशा लगता है कि जिस चीज से मुझे डर लग रहा है उस डर के आगे जाने से क्या होगा। जब पहली बार जीत मिली तब उस डर का सामना करना आया। मैं निडर हो पाई। स्पोर्ट्स जेंडर के आधार पर भेदभाव नहीं करता। लोग आपको तब तक अलग तरह से देखते हैं जब तक आप खुद को अलग तरह से देखते हैं।
नौकरी और जुनून साथ-साथ
मेरी जो पहली कार रेसिंग थी उसमें मैंने रेस सूट उधार का मांगा था। मीडिया की नौकरी और रेसिंग साथ साथ किया। मैं अपने अभिभावक से पैसे नहीं लेती थी। इस जीत के बाद मैंने जहाँ भी नौकरी की वहां मुझे प्रायोजक मिला। एक दफ्तर में मैंने मोटर स्पोर्ट्स में जाने के लिए छुट्टी मांगी तो उन्होंने नहीं दी। मैंने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे में कारण लिखा कि मुझे मोटर स्पोर्ट्स में जाना है, इसलिए छुट्टी चाहिए। तब मुझे छुट्टी मिल गई और मेरा इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ। जब कंपनी ने देखा कि मैं अपने पैशन के लिए बहुत समर्पित थी तो उन्होंने ने भी रोका नहीं। मैं नौकरी और मोटर स्पोर्ट्स दोनों साथ में करना चाहती थी। आज दोनों साथ में कर रही हूं। दोनों प्रोफेशन करने से मेरी कार्य क्षमता बढ़ती है।
फिर तमाम मुकाबलों में गयी
मैं कोयम्बटूर में रेसिंग सर्किट में भी गयी। वहाँ पर कोई भी लड़की नहीं थी। वहां फॉर्मूला कार को चलाने के थोड़ी ट्रेनिंग ली। मैं 15 सालों से यही कर रही हूँ। रेस ट्रेक लर लड़कियों को लाने के लिए उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू किया। आज मोटर स्पोर्ट्स के फेडरेशन में फोर वीलर कैटेगरी में महिलाओं को प्रतिनिधित्व करती हूँ। जब मैंने मोटर स्पोर्ट्स की शुरुआत की थी तब लड़कियां इस फील्ड में बहुत कम थीं। मुझे खुद को भी दूसरों को साबित करना पड़ा। इसलिए अब कह सकती हूं कि आप खुद ही खुद की मदद कर सकते हैं। जो आपके अंदर से आवाज आ रही है वो करें। आज मैं पहली रेस डायरेक्टर हूं। आप अपने लिए रास्ते बनाते हो और वो दुनिया के लिए भी बन जाते हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)
पत्नी के मंगल के लिए मंगलसूत्र पहनते हैं पुणे के शार्दुल
पुणे : पुणे के शार्दुल कदम ने सालभर पहले शादी के मंडप में ही पत्नी के हाथों ‘मंगलसूत्र’ बंधवाया था। उन्होंने इसकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर डाली, जिसके बाद ट्रोलर्स ने उनका जमकर मजाक उड़ाया। शारदुल को साड़ी पहनने से लेकर सिंदूर लगाने तक की नसीहत दी गई। कई लोगों ने कहा कि तुम्हें तो पीरियड्स भी आते होंगे। एक साल बाद अब शादी की तैयारी कर रहे लड़के पूछते हैं कि उन्होंने मंगलसूत्र कहां से डिजाइन करवाया।
इसलिए मंगलसूत्र पहनते हैं शार्दुल
पुणे के शारदुल कदम बताते हैं कि वे मंगलसूत्र इसलिए पहनते हैं क्योंकि उनके लिए ये प्यार की निशानी है। लोग मंगलसूत्र को महिलाओं का गहना मानते हैं, इसे रस्म और रिवाजों से जोड़ देते हैं, जबकि इसके पीछे का अर्थ कम ही लोगों को पता है। मंगलसूत्र दो शब्दों में बंटा है, ‘मंगल’ मतलब शुभ और ‘सूत्र’ मतलब पवित्र धागा। मंगलसूत्र का असल मतलब है वो पवित्र धागा जो दो आत्माओं को जीवनभर एक साथ बांधे रखता है। इसे कहीं भी महिलाओं से नहीं जोड़ा गया है, फिर भला मंगलसूत्र सिर्फ महिलाएं ही क्यों पहने? मंगलसूत्र से जुड़े इमोशन से शारदुल इतने प्रभावित थे कि प्यार जताने के लिए उन्होंने शादी के दिन पत्नी के हाथों मंगलसूत्र पहना।
एंगेजमेंट रिंग की तरह आदान – प्रदान किए मंगलसूत्र
शारदुल कहते हैं कि जब पार्टनर्स एक-दूसरे को एंगेजमेंट रिंग पहनाते हैं तब कोई ये सवाल नहीं करता कि रिंग तो महिलाओं का गहना है, पुरुष इसे क्यों पहन रहे हैं। रिंग को प्यार की निशानी मानकर दोनों पार्टनर एक-दूसरे को राजी-खुशी इसे पहनाते हैं। हमने भी इसी तरह एक-दूसरे को प्यार की निशानी दी है, बस हमारा तरीका थोड़ा अलग रहा। शार्दुल बताते हैं कि उनका पैतृक गांव पुणे से 30 किलोमीटर दूर है। वे महाराष्ट्र के ही रहने वाले हैं और मराठी विवाह में मंगलसूत्र को बहुत अहम माना जाता है। यही वजह है कि उन्होंने शादी के मंडप पर पत्नी के साथ मंगलसूत्र एक्सचेंज किया। ये पल शारदुल और उनकी पत्नी तनुजा के लिए काफी खास था।
डिजाइनर को खास ऑर्डर देकर बनवाया मंगलसूत्र
शारदुल को अपने लिए मंगलसूत्र चुनने में काफी मेहनत करनी पड़ी। वे बताते हैं कि उन्होंने एक महिला फैशन डिजाइनर से खास मंगलसूत्र डिजाइन करवाया, जिसमें काले मोती वाली दो मालाएं पेंडेंट से जुड़ी हैं। इसे तैयार करने में डिजाइनर को 20 दिन लगे थे।
वे शान से मंगलसूत्र पहनकर दफ्तर जाते हैं
कम्युनिकेशन कंसलटेंट शार्दुल का कहना है कि शादी के कुछ दिन तक तो उन्हें सोशल मीडिया पर काफी ट्रोलिंग झेलनी पड़ी थी। इसके बाद जब वो दफ्तर पहुंचे तो उन्हें लगा कि शायद दफ्तर में भी लोग उन्हें जज करने वाली निगाहों से देखेंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सहकर्मी आकर ये जरूर पूछते कि आपने मंगलसूत्र क्यों पहना है। वजह जानकर सब खुश हो जाते हैं। वे शादी के कुछ दिनों तक बड़ा मंगलसूत्र पहनकर ही दफ्तर जाते रहे। इसके बाद रोजाना के लिए उन्होंने मंगलसूत्र हैंड ब्रेसलेट तैयार करवाया। अब शार्दुल खास मौकों पर ही बड़ा मंगलसूत्र पहनते हैं, ठीक उसी तरह जैसे उनकी पत्नी पहनती हैं।
इंस्टाग्राम पर पुरुष पूछते हैं डिजाइनर का नाम
शार्दुल बताते हैं कि शादी कि शुरुआत में उन्हें इतनी ज्यादा ट्रोलिंग झेलनी पड़ी थी कि वो कुछ समय के लिए परेशान हो गए थे। लोग भद्दे-भद्दे कमेंट करते थे। उनकी शादी का मजाक बनाया जाता था। उनका इंस्टाग्राम और बाकी सोशल मीडिया अकाउंट के चैट बॉक्स इसी तरह के मैसेज से भरे होते थे, जिसकी वजह से उन्होंने सोशल मीडिया चलाना ही बंद कर दिया था, लेकिन कुछ दिन बाद कई लड़कों ने उनसे मंगलसूत्र के डिजाइनर का नाम पूछा और इसमें दिलचस्पी दिखाई।
पत्नी से भी बड़ा मंगलसूत्र पहनकर घर से निकलते हैं
शार्दुल की कहानी में एक दिलचस्प बात ये निकलकर आई कि उनका मंगलसूत्र उनकी पत्नी के मंगलसूत्र से भी ज्यादा बड़ा है। वो बताते हैं कि जब भी दोनों साथ में घर के किसी फंक्शन में जाते हैं तो लोग पहले हैरान निगाहों से शार्दुल के मंगलसूत्र को देखते हैं। कुछ लोग ये भी टोक देते हैं कि अरे तुम्हारा मंगलसूत्र तो पत्नी से भी बड़ा है! ऐसा उनके साथ अक्सर होता है, लेकिन शारदुल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो पूरे आत्मविश्वास के साथ मंगलसूत्र पहनते हैं।
त्योहार पर पति-पत्नी एक-दूसरे को पहनाते हैं मंगलसूत्र
शार्दुल ने बताया कि जब भी कोई त्योहार या खास मौका होता है, दोनों तैयार होने के बाद हमेशा एक-दूसरे को मंगलसूत्र पहनाते हैं। ये पल उनके लिए बहुत खास होता है, क्योंकि ये उन्हें शादी के दिन की याद दिलाता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)
क्रिकेट की दुनिया का जगमगाता सितारा हैं ‘रन मशीन’ मिताली राज
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 10 हजार से ज्यादा रन बनाने वाली इकलौती महिला क्रिकेटर हैं
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कैप्टन मिताली राज समेत देश का मान बढ़ाने वाले 11 खिलाड़ियों को इस साल खेल रत्न दिया जाएगा। राष्ट्रीय खेल पुरस्कार कमेटी ने 11 खिलाड़ियों का नाम साल 2021 के मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया है। इनमें पांच पैरा एथलीट्स भी शामिल हैं। पहली बार एक साल में खेल रत्न के लिए सबसे ज्यादा खिलाड़ियों को चुना गया है और मिताली राज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 10 हजार से ज्यादा रन बनाने वाली इकलौती महिला क्रिकेटर हैं।
रन मशीन कही जाने वाली मिताली राज ने बीते सितंबर में उस वक्त इतिहास रचा, जब उन्होंने फर्स्ट क्लास, वनडे, टेस्ट और टी-20 समेत क्रिकेट के सभी फॉर्मेट को मिलाकर अपने कॅरियर में 20 हजार से ज्यादा रन बना लिए। इस आंकड़े में मिताली के बनाए घरेलू क्रिकेट के करीब 10 हजार रन और इंटरनेशनल क्रिकेट में 318 मैचों के 10,400 रन शामिल हैं।
दुनिया की पहली ऐसी क्रिकेटर, जिसने हासिल किया रनों का ऐसा मुकाम
इस साल सितंबर में ऑस्ट्रेलियाई महिला टीम के खिलाफ पहले वनडे में 107 गेंदों में 61 रन की पारी खेलकर मिताली 20 हजार रनों के मुकाम तक पहुंचने वाली दुनिया की पहली महिला क्रिकेटर भी बनीं। उन्हें चुनौती देने वाली महिला क्रिकेटर उनके आसपास भी नहीं हैं। उन्होंने क्रिकेट में 50 ओवरों वाले वर्ल्ड कप में भारत की अगुआई की। दोनों ही बार महिला टीम फाइनल में पहुंची थी।
वनडे में सर्वाधिक रिकॉर्ड, 218 मैच खेले, जो सबसे ज्यादा
मिताली राज के वनडे में रिकॉर्ड ही रिकॉर्ड हैं। वह सबसे ज्यादा 218 वनडे खेलने वाली दुनिया की इकलौती खिलाड़ी हैं। वनडे में सबसे ज्यादा 7663 रन बनाने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है। सबसे ज्यादा 59 अर्द्धशतक उनके नाम हैं। वह लगातार 7 अर्द्धशतक लगाने वाली इकलौती बल्लेबाज हैं। मिताली के नाम 7 शतक हैं और वनडे क्रिकेट में नंबर वन रैंकिंग के साथ दुनिया की शीर्ष बल्लेबाज हैं।
टेस्ट क्रिकेट में दोहरा शतक जड़ने वाली पहली भारतीय महिला क्रिकेटर
मिताली टेस्ट क्रिकेट में 214 रन बनाकर दोहरा शतक जड़ने वाली पहली भारतीय महिला क्रिकेटर हैं। टेस्ट में 1 शतक जड़ने वाली वह दूसरी भारतीय क्रिकेटर हैं। भारत के लिए 10 टेस्ट खेलकर मिताली पूर्व क्रिकेटर शुभांगी कुलकर्णी (19 मैच) के बाद दूसरे स्थान पर हैं। इसके अलावा टेस्ट में 663 रन बनाकर मिताली राज दूसरे नंबर पर हैं। शुभांगी 700 रनों के साथ नंबर वन हैं।
टी-20 में भी सबसे ज्यादा रन बनाने वाली देश की पहली और दुनिया की 7वीं महिला
मिताली ने सबसे पहले रेलवे के लिए क्रिकेट खेलना शुरू किया था। 1999 में वह वनडे नेशनल टीम में शामिल की गयीं और आयरलैंड के खिलाफ डेब्यू मैच में शतक (114) ठोककर तहलका मचा दिया था। टी-20 में सबसे ज्यादा रन बनाने वाली मिताली राज का इस फॉर्मेट में भी कोई सानी नहीं है। सबसे ज्यादा 2457 रन बनाने वाली वह भारत की पहली और दुनिया की सातवीं क्रिकेटर हैं। टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वह सबसे ज्यादा 17 अर्धशतक लगाने वाली भारत की पहली और दुनिया की तीसरी बल्लेबाज हैं। 242 से ज्यादा चौके लगाकर वह भारत की पहली और दुनिया की छठी बल्लेबाज हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)
फाल्गुनी नायर : 50 की उम्र में छोड़ा 25 साल का कॅरियर, बैंकर जो बनी सफल उद्यमी
देश में फैशन, ब्यूटी प्रोडक्ट की शीर्ष ई-कॉमर्स कंपनी ‘नायका’ अब दलाल स्ट्रीट का रुख कर रही है। कंपनी ने गुरुवार को अपना आईपीओ लॉन्च किया है। यह वर्ष 2021 का तीसरा सबसे बड़ा आईपीओ है। इससे पहले जोमैटो और सोना कॉमस्टार ने बड़े आईपीओ जारी किए थे।
नायका की पैरंट कंपनी एस एन ई कॉमर्स वेंचर्स की शुरुआत इन्वेस्टमेंट बैंकर रहीं फाल्गुनी नायर ने 2012 में थी। फाल्गुनी नायर ने कुछ ही वर्षों में इसे देश की शीर्ष ब्यूटी प्रोडक्ट्स से जुड़ी ई-कॉमर्स कंपनी बना दिया। इनकी तुलना उद्यमी किरण मजूमदार शॉ से की जाती है।
फल्गुनी नायर का सफर
फाल्गुनी का जन्म 1963 में मुंबई में हुआ और वहीं पली-बढ़ी हैं। पिता व्यवसाय करते थे और माँ उनका सहयोग किया करती थीं। व्यवसाय के गुर इन्हें विरासत में मिले हैं। इन्होंने मुंबई स्थित सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉर्मस एंड इकोनॉमिक्स से ग्रेजुएशन किया है। फिर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद से मास्टर्स की डिग्री ली।
कोटक महिंद्रा में लंबे समय तक की नौकरी
पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 1985 में एक मैनेजमेंट कंसलटेंसी कंपनी में बतौर कंस्लटेंट जुड़ीं। आठ साल बाद कोटक महिंद्रा से जुड़ीं और वहां 19 साल अलग-अलग पदों पर काम करती रहीं। साल 2005 में प्रबन्ध निदेशक बनीं और जब 2012 में इस्तीफा देते समय इसी पद पर थीं।
50 की उम्र में छोड़ा 25 साल लंबा कॅरियर, लिया जोखिम
फाल्गुनी फाइनेंस की दुनिया में काम करती थीं। 25 साल का लंबा कॅरियर था। लेकिन एक दिन अपने सपने को पूरा करने के लिए जमा-जमाया करियर छोड़ दिया, और 2012 में शुरू की ब्यूटी प्रोडक्ट से जुड़ी वेबसाइट नायका डॉट कॉम। दो साल पूरा होने के पहले ही ये देश की नबंर वन वेबसाइट बन गयी। आज इस वेबसाइट पर ब्यूटी प्रोडक्ट के अलावा कपड़े आदि भी मिलने लगे हैं। इस वेबसाइट पर 2500 से ज्यादा ब्रांड मौजूद हैं।
इन फंडों को अपना कर बनीं बिलेनियर
फाल्गुनी का कहना है कि एंटरप्रयोनर्स को एकदम सीधी स्ट्रैटजी बनानी चाहिए। यह क्लियर होना चाहिए कि आप अपने व्यवसाय से क्या चाहते हैं। कई बार काम सिर्फ पैसा कमाने के लिए नहीं बल्कि लंबे समय में आपके काम का असर नजर आता है। फाल्गुनी कहती हैं कि बाजार में जमने के लिए सबसे पहले अपने क्लाइंट को समझने की जरूरत है। इससे आपको ग्राहकों तक ऑनलाइन डिलीवरी करने में मदद मिलेगी।
फाल्गुनी जोखिम लेने पर भी जोर देती हैं। यही वजह से कि उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए बैंकर की अच्छी भली नौकरी छोड़ दी। उनका कहना है कि महिलाओं को खासकर बिजनेस में रिस्क लेने की जरूरत है।
व्यवसाय में कामयाबी हासिल करने के लिए पूरा मन लगाकर काम करें। फाल्गुनी खुद क्लाइंट के ऑर्डर पर नजर रखती हैं। चुनौती लें और व्यक्तिगत स्तर पर काम में जुट जाएं।
(साभार – दैनिक भास्कर)
दिवंगत अभिनेता पुनीत राजकुमार के नेत्रदान से रोशन हुई 4 लोगों की जिंदगी
बंगलुरू : दिवंगत अभिनेता पुनीत राजकुमार की आंखों से चार लोगों को रोशनी मिली है। पुनीत अपनी माँ की तरह परोपकार के कामों में शामिल रहते थे। इसी वजह से उन्होंने अपनी आंखें दान करने का संकल्प लिया था। उनके निधन के बाद इसे पूरा किया गया। पुनीत की आंखों को नारायण नेत्रालय आई हॉस्पिटल को दान कर दिया गया था। पुनीत के पिता अभिनेता राजकुमार ने भी अपनी आंखें दान की थीं।
कन्नड़ फिल्म अभिनेता पुनीत का जिम में वर्कआउट के दौरान दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। हार्ट अटैक के तुरंत बाद पुनीत को बेंगलुरु के विक्रम अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। पुनीत के निधन के बाद राज्य के सभी थिएटर बंद कर दिए गए और कई इलाकों में धारा 144 लागू की गई थी।
इस तरह दो आंखों से रोशन हुईं आंखें
नारायण नेत्रालय के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डॉ. भुजंग शेट्टी ने बताया कि उन्होंने कॉर्निया की मुख्य और गहरी परत को अलग किया। हर आंख का इस्तेमाल दो रोगियों के इलाज के लिए किया गया। जिनमें एक महिला और बाकी तीन पुरुष शामिल थे।
पुनीत से चेतन ने भी ली प्रेरणा
कन्नड़ अभिनेता चेतन ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखा कि जब मैं अस्पताल में अप्पू सर के आखिरी दर्शन के लिए गया था, तब डॉक्टरों की एक टीम ने उनके निधन के 6 घंटे के अंदर ऑपरेशन किया और उनकी आंखें निकालीं। अप्पू सर ने भी डॉ. राजकुमार की तरह अपनी आंखें दान की हैं। अप्पू सर के दिखाए रास्ते पर चलकर और उनकी याद में हम सबको नेत्रदान करने की शपथ लेनी चाहिए। मैं भी अपनी आंखें दान करूंगा।
ऐसा रहा पुनीत का फिल्मी सफर
पुनीत के पिता राजकुमार दक्षिण के आइकन रहे हैं। पुनीत ने अपने कॅरियर की शुरुआत बाल अभिनेता के तौर पर की थी। उन्हें फिल्म बेट्टद हूवु के लिए सर्वश्रेष्ठ बाल अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। फिल्म ‘अप्पू’ से बतौर शीर्ष अभिनेता अपने कॅरियर की शुरुआत की थी। उन्हें आकाश (2005), आरसु (2007), मिलन (2007) और वंशी (2008) जैसी फिल्मों में दमदार अभिनय के लिए जाना जाता है, जो अभी तक उनकी सबसे बड़ी कॉमर्शियल हिट हैं।पुनीत को आखिरी बार ‘युवरत्ना’ में देखा गया था, जो इस साल की शुरुआत में रिलीज हुई थी। साउथ में उनकी फिल्मों की दीवानगी इस कदर होती थी कि एक बार उनकी 14 फिल्में लगातार कम से कम 100 दिनों तक सिनेमा घरों में बनी रही थीं।
समाज सेवा में भी रहे अव्वल
अपने 46 साल के छोटे से जीवनकाल में पुनीत परोपकार के भी पावर स्टार थे। वे धर्म के खिलाफ कुछ नहीं सुन पाते थे। कोरोना महामारी के दौरान भी पुनीत ने सीएम रिलीफ फंड में 50 लाख रुपए दान किए थे। पुनीत ने 45 स्कूल, 26 अनाथालय, 16 वृद्घाश्रम, 19 गोशाला और 1800 अनाथ लड़कियों की उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी उठाई थी। पुनीत के जाने के बाद अभिनेता विशाल ने घोषणा की है कि अनाथ लड़कियों की शिक्षा की जिम्मेदारी वे उठाएंगे।
‘क्षण क्षण के रस निचोड़ना आना चाहिए’
रिसड़ा : रिसड़ा के श्रीनारायण धाम में जीवन मंत्र व्याख्यान श्रृंखला के तहत आज रविवार को जीवन में तनाव के कैसे बचें पर एक सुपरिचित साहित्यकार-पत्रकार डॉ. अभिज्ञात ने अपने प्रभावी वक्तव्य से लोगों की मनोदशा में सकारात्मक बदलाव लाने के सुझाव दिये। उन्होंने कहा कि सकारात्मक दृष्टि बनाने रखने से जीवन की स्थिति में सुधार अवश्यक होगा। उन्होंने इसके लिए कुछ सूत्र भी दिये। नकारात्मक भाव सुन्दर को असुंदर, संगीत को कर्णकटु और स्वादिष्ट को बेस्वाद बना देता है। मनोस्थिति बाह्य जगत की प्रभावशीलता का निर्माण करती है। यदि कोई विचार आपका लगातार पीछा कर रहा है और तनाव पैदा कर रहा है तो इसका अर्थ यह है कि आपमें एकाग्रता की खूबी है। लेकिन अभ्यास के जरिये अपने मन हो हांकना भी आना चाहिए। हर क्षण जीवन बदल रहा है और उसमें बहुत कुछ सुन्दर और सुखद है। क्षण क्षण के रस निचोड़ना आना चाहिए, इससे न तो अवसाद आयेगा और ना ही तनाव। जीवन किसी बड़ी कामयाबी के इन्तजार में मत खत्म करें छोटी छोटी उपलब्धियां ही जीवन को बनाती हैं। यह न भूलें कि जितनी बड़ी कामयाबी होगी उतनी ही कीमत भी वसूलेगी।
कार्यक्रम स्वामी केशवानंद जी महाराज के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। उन्होंने जीवन में तनाव के आध्यात्मिक पहलुओं की चर्चा की और पौराणिक प्रसंगों से तनाव के सकारात्मक पहलुओं की भी व्याख्या की। स्वागत भाषण डॉ. पीके अग्रवाल ने दिया। कार्यक्रम का संचालन संतोष सिंह ने किया।
‘विट्ठल गिरधर’ छाप लगाई, लीला पद गंगा बहु गाई’

सभी सखियों को दीपावली की राम- राम। सखियों, जैसा कि आपको पहले भी बता चुकी हूँ कि मध्ययुगीन रचनाकारों में ऐसी बहुत सी स्त्रियाँ रचनाकर्म से जुड़ी हुई थीं जिन पर इतिहास- लेखकों की दृष्टि नहीं पड़ी। न जाने कितनी भक्त कवयित्रियाँ अलक्षित ही रह गई हैं। उनमें से कुछ की गिनी- चुनी रचनाएँ उपलब्ध हैं तो कुछ के नाम भी समय के प्रवाह में लुप्त हो गये हैं। ऐसा ही एक नाम है, गंगाबाई का जो श्री विट्ठल गिरधर या विट्ठल गिरधरन के नाम से काव्य- सृजन करती थीं। गंगाबाई गुसाईं विट्ठलनाथ की शिष्या थीं। “दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता” के अनुसार गंगाबाई की माता क्षत्राणी थीं। वह महावन में रहती थीं और श्री गुसाईं विट्ठलनाथ जी की सेवा करती थीं लेकिन वह गुसाईं जी को गुरु भाव से नहीं बल्कि काम -भाव से देखती थीं। जब गुसाईं जी को इस बात का आभास हुआ तो वह क्रोधित हुए और उन्होंने उन्हें गोकुल आने की मनाही कर दी। महावन में रहते हुए और गुसाईं जी की वियोग-व्यथा को झेलते हुए एक दिन वह उनका ध्यान कर रही थीं कि स्वप्नावस्था में उन्हें लगा कि वह गर्भवती हैं। उन्होंने गंगाबाई को जन्म दिया तथा पुन: भगवद्भक्ति में लीन हो गईं। इस कथा का सार यही है कि गंगाबाई की माता गुसाईं विट्ठलनाथ की शिष्या या सेविका थीं। गंगाबाई भी बड़ी होकर उन्हीं की सेवा करने लगी और बाद में वह महावन से गोपालपुर आकर रहने लगीं। कहा जाता है कि श्री गोवर्धन जी (कृष्ण का एक स्वरूप) उनके साथ हँसते- खेलते और बातें करते थे। वह उन्हें अपनी लीलाओं का दर्शन भी कराते थे। गंगाबाई गोवर्धन जी अर्थात कृष्ण की स्तुति करने हेतु पदों की रचना और उनका गायन करती थीं। इन पदों को वह अपने गुरु विट्ठलनाथ जी को भी सुनाती थीं। संभव है कि गुरु उन पदों में कुछ संशोधन-परिमार्जन करते हों। चूंकि वह विट्ठलनाथ जी की शिष्या थीं संभवतः इसीलिए वह विट्ठल गिरधरन के नाम से काव्य- रचना किया करती थीं।
उनके पदों का संग्रह और संपादन करने वाले रमणिक लाल पीठदिया के अनुसार उनका जन्म संवत 1628 में और मृत्यु 1736 में हुई। इसके अनुसार उनकी उम्र तकरीबन 108 वर्ष की ठहरती है। गुसाईं जी के प्रपौत्र श्री हरिराय जी ने अष्टछाप के कवियों के पदों का जो संचयन किया उसमें गंगा बाई के पदों को भी शामिल किया गया है। श्री रूपचंद खंडेलवाल “भूप” ने “विट्ठलायन” ग्रंथ में गंगाबाई को श्रद्धा के साथ स्मरण किया है। उनका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है-
“रह गोपालपुर त्याग महावन। नित्य जहां तेहि लीला दर्शन।।
गोवर्धन ता ढिंग आवैं। चौपड़ खेले हँसे- हँसावैं।।
‘विट्ठल गिरधर’ छाप लगाई। लीला पद गंगा बहु गाई।।”
इन विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि गंगाबाई कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। ऐसी भक्तिन कि वह अपने कल्पना- लोक में विचरण करते हुए यह आभास भी करती थीं कि कृष्ण उनसे बातें कर रहे हैं और वह मीराबाई की तरह कृष्ण को अपने पदों का गायन करके सुना रही हैं। यह भाववावेश की एक स्थिति विशेष होती है जिसमें कल्पना भी सच लगती है, इसे आज मनोवैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है। गंगाबाई और कृष्ण को लेकर बहुत सी कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। इनमें से एक कहानी यह भी है कि श्रीनाथ जी (कृष्ण का एक रूप विशेष जिसमें बालक के रूप में उनकी पूजा होती है) गंगाबाई को सदेह अपनी लीला में लेकर गये थे। एक ओर तो गंगाबाई के पदों और उनके बारे में प्रचलित कहानियों में यह संकेत मिलता है कि वह कृष्ण को बालक रूप अर्थात श्रीनाथ जी के रूप में पूछती थीं और कई ऐसी कहानियाँ मिलती हैं जिनमें वह श्रीकृष्ण को “लरिका” अर्थात बालक कहकर संबोधित करती हैं और उनके बालहठों को पूरा भी करती हैं तो दूसरी ओर वह सखी या संगिनी के रूप उनके साथ लीला भी करती हैं। वस्तुत: श्रीनाथ जी के प्रति वात्सल्य भाव तो दिखाई देता है लेकिन कृष्ण के प्रति माधुर्य भाव की भक्ति ही गंगाबाई के जीवन और उनके काव्य का मुख्य स्वर है। माधुर्य भक्ति से पूरित इन पदों में कृष्ण की प्राप्ति की उत्कंठा प्रस्फुटित हुई है। कृष्ण के रूप- सौन्दर्य का बहुत अधिक वर्णन तो कवयित्री नहीं करतीं लेकिन कृष्ण की रूप- माधुरी और उनकी रसिकता की चर्चा वह अवश्य करती हैं। उस स्वरूपवान कृष्ण के सामीप्य लाभ के लिए गोपियाँ तरह- तरह के जतन करती हैं और अपनी व्याकुलता को प्रकट करने से भी नहीं हिचकिचातीं। उस व्याकुलता के चित्रण में गंगाबाई के ह्दय के भावों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। उद्धृत पद देखिए-
“सखी अब मो पै रह्यो न जाय।
चलि री मिल उन ही पैं जैये जहाँ चरावत गाय।।
अंग अंग की सब सुधि भूली देखत नंद किशोर।
मेरो मन हर लियो तब ही को जब चितयें यह ओर।।”
कृष्ण के प्रति अनुराग और कृष्ण के रूप का प्रभाव इतना ज्यादा है कि भक्त कवयित्री अपनी विकलता को अपने पदों में जीवन्त कर देती है। ऐसा नहीं कि कृष्ण पर इस विकलता कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह भी अपनी भक्तिन की मनोकामना पूरी करने को तैयार हैं जाते हैं लेकिन बदले में या दान में कुछ मांगते हैं और यह भक्तिन दान में दे भी तो क्या। वह तो अपना सर्वस्व पहले ही कृष्ण पर वार चुकी है। प्रेमपूरित माधुर्य भाव की भक्ति में समर्पण ही मुख्य है और गंगाबाई भी यही करती हैं। स्वयं को कृष्ण के चरणों पर वारकर उनकी प्रेमासिक्त भक्ति में आपादमस्तक आप्लावित हो जाती हैं। उद्धृत पद में समर्पण भाव का सुंदर वर्णन हुआ है –
“ग्वालिनि दान हमारो दीजै।
अति मनमुदित होय ब्रजसुंदरि खत लाल हसि लीजै।।
दीजे मन मेरो अब प्यारे निरखि निरखि मुख जीजे।
अति रस गलित होत वः भामिनी मनमाने सो कीजे।।
चलि न सकत अति ठठकि रहत पग रूप रासि अब पीजे।
श्री विठ्ठलगिरिधरन लाल सों नवल नवल रस भीजे ।।”
“गंगाबाई के पद” नामक संग्रह में गंगाबाई के तमाम पद संकलित हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार इनके पदों की संख्या तकरीबन 296 है। ये पद कृष्ण की भक्ति और प्रेम के साथ ही उनकी दिनचर्या से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर केंद्रित हैं। इन पदों में नायिका भेद की परिपाटी पर विरह व्यथा से व्याकुल विरहिणी नायिका का वर्णन भी हुआ है और खंडिता नायिका का भी। रासलीला और दानलीला के पद तो अत्यंत ह्दयग्राही बन पड़े हैं। इनके अतिरिक्त वर्षा ऋतु में गाए जाने वाले हिंडोला के पद भी हैं और फागुन या होरी के पद भी। मल्हार, धमार, राग गौड़ आदि पर केंद्रित पदों की रचना भी गंगाबाई ने की है। जन्माष्टमी के अवसर पर गाए जानेवाले बधाई गीत एवं भजन तो बहुत ही सुंदर बन पड़े। गुसाईं जी को विभिन्न अवसरों पर बधाई देते हुए भी गंगाबाई ने कुछ पदों की रचना की है। वस्तुतः गंगाबाई सिर्फ भक्तिन ही नहीं थीं बल्कि काव्य मर्मज्ञ भी थीं। वह स्वयं को कृष्ण की अनन्य प्रेयसी मानती थीं। उनका पूरा जीवन कृष्णार्पित था। उन्हें राग- रागिनियों का पर्याप्त ज्ञान भी था जिनका उपयोग वह काव्य- रचना में करती थीं। सरल- सहज ब्रजभाषा में रचित उनके पद अत्यंत सरस तथा ह्दयग्राही हैं।
‘तू साथ है..हरदम!….रंगकर्मी एस. एम. अजहर आलम को समर्पित फिल्म
कोलकाता में रंगमंच के लिये अपनी पूरी ज़िंदगी समर्पित करने वाले उसी ‘रंग-व्यक्तित्व’ स्व.अज़हर आलम पर देखिये थेस्पियन परिवार की श्रद्धांजलि फ़िल्म ‘तू साथ है..हरदम!




