Monday, July 6, 2026
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बहू को परिवार का हिस्सा मानकर उसके अधिकार दें : इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रयागराज : हाई कोर्ट ने यूपी पावर कार्पोरेशन केस में पूर्णपीठ के फैसले के आधार पर सचिव खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति को नया शासनादेश जारी करने अथवा शासनादेश को ही चार हफ्ते में संशोधित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति नीरज तिवारी ने पुष्पा देवी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। इस फैसले में पूर्णपीठ ने कहा है कि बहू को आश्रित कोटे में बेटी से ज्यादा अधिकार है। यह फैसला इस मामले में भी लागू होगा। कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव व प्रमुख सचिव खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति को आदेश अनुपालन की जिम्मेदारी दी है। कोर्ट ने जिला आपूर्ति अधिकारी को नया शासनादेश जारी होने या संशोधित किए जाने के दो सप्ताह में याची को वारिस के नाते सस्ते गल्ले की दुकान का लाइसेंस देने पर विचार करने का निर्देश दिया है।
बता दें कि याची की सास के नाम सस्ते गल्ले की दूकान का लाइसेंस था, जिनकी 11 अप्रैल, 2021 को मौत हो गई। याची के पति की पहले ही मौत हो चुकी थी। विधवा बहू याची और उसके दो नाबालिग बच्चों के अलावा परिवार में अन्य कोई वारिस नहीं है। याची ने मृतक आश्रित कोटे में दुकान के आवंटन की अर्जी दी। जिसे यह कहते हुए निरस्त कर दिया गया कि पांच अगस्त 2019 के शासनादेश में बेटी को परिवार में शामिल किया गया है किन्तु बहू को परिवार से अलग रखा गया है। कोर्ट ने शासनादेश में बहू को परिवार से अलग करने को समझ से परे बताया और कहा कि बहू को आश्रित कोटे में बेटी से बेहतर अधिकार प्राप्त है इसलिए बहू को परिवार में शामिल किया जाए।

 

पेप्सिको के लेज वाले भारतीय आलूओं का पंजीकरण रद्द

एफ एल -2027 आलू के लिए पेप्सिको ने किसानों पर किया था मुकदमा
नयी दिल्ली : पौधे की किस्मों का संरक्षण करने वाले प्राधिकरण पीपीवी एंड एफआर ने शुक्रवार को पेप्सिको इंडिया  को आलू की किस्म ” के लिए मिला पंजीकरण प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया। यही वह आलू की किस्म है, जिसे उगाने के लिए कंपनी ने गुजरात के किसानों पर मुकदमा किया था।
गौरतलब है कि दो साल पहले अमेरिका की कंपनी पेप्सिको और गुजरात के किसानों के बीच एक विवाद काफी चर्चा में रहा था। मामला था पेप्सिको के ‘लेज’ वाले आलू किसानों द्वारा उगा लेने का। पेप्सिको ने उस खास आलू पर अपना कॉपीराइट जताते हुए किसानों पर मुकदमा और मोटा जुर्माना ठोंका और बाद में मुंह की खाई। अब कंपनी को एक और झटका लगा है क्योंकि आलू की जिस वेरायटी को वह ‘अपना’ बता रही थी, अब वह उसका अपना नहीं रहा है। भारत ने पेप्सिको से यह अधिकार छीन लिया है। पौधे की किस्मों का संरक्षण करने वाले प्राधिकरण पीपीवी एंड एफआर ने शुक्रवार को पेप्सिको इंडिया को आलू की किस्म ‘एफ एल -2027’ के लिए मिला पंजीकरण प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया। यही वह आलू वेरायटी है, जिसे उगाने के लिए कंपनी ने गुजरात के किसानों पर मुकदमा किया था। एफएल – 2027 किस्म का आलू अमेरिका में 2003 में विकसित किया गया था और भारत में इसे एफसी5 के नाम से पहचाना जाता है।
​साल 2019 का वह पूरा विवाद
पेप्सिको ने अप्रैल 2019 में गुजरात के साबरकांठा में 4 छोटे किसानों के खिलाफ पेप्सिको के विशेषाधिकार वाली आलू की किस्म ‘एफएल-2027’ को उगाने और बेचने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया था। पेप्सिको का कहना था कि ये किसान अवैध रूप से आलू की इस किस्‍म को उगा और बेच रहे हैं। कंपनी का दावा था कि आलू की ‘एफएल-2027’ किस्‍म से वह लेज ब्रैंड के चिप्‍स बनाती है और इसे उगाने का एकल अधिकार पेप्सिको के पास है। आलू की इस किस्म का उत्पादन कंपनी के साथ जुड़े हुए किसान ही कर सकते हैं, नहीं। चारों किसानों से पेप्सिको ने 1-1 करोड़ रुपये से ज्यादा के हर्जाने की मांग की थी।
इससे पहले पेप्सिको ने साल 2018 में गुजरात के अरवल्ली जिले के पांच किसानों पर एफएल2027 आलू को बोने के मामले में मोडासा कोर्ट में केस दर्ज किया था। उनसे भी लाखों का हर्जाना मांगा गया था।
जब हुई फजीहत तो वापस लिया मुकदमा
पेप्सिको को किसानों पर मुकदमे को लेकर किसानों और सामाजिक संगठनों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। किसानों की ओर से यह तक कह दिया गया था कि अगर भारत में किसान आलू उगाना बंद कर दें तो पेप्सिको को भारत छोड़ना पड़ जाएगा। भारी फजीहत होते देख और दबाव के चलते पेप्सिको ने गुजरात सरकार से बातचीत के बाद मई 2019 में मुकदमा वापस लेने का ऐलान किया। इस कदम के तहत कंपनी ने अहमदाबाद कमर्शियल कोर्ट में 4 किसानों और मोडासा कोर्ट में 5 किसानों के खिलाफ मुकदमों को वापस लिया था। साथ ही डीसा कोर्ट में बड़े किसानों और ट्रेडर्स के खिलाफ किए गए दो अन्य मुकदमों को भी वापस ले लिया था।
फरवरी 2016 में कंपनी को मिला था पौध किस्म का प्रमाण पत्र
पेप्सिको को इस विशेष किस्म के आलू के लिए भारत में फरवरी 2016 में पौध किस्म का प्रमाण पत्र दिया गया था। लेकिन अब पीपीवी एंड एफआर ने पेप्सिको के इस प्लांट वेराइटी प्रोटेक्शन प्रमाण पत्र को रद्द कर दिया है। पौध किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार कानून, 2001 के तहत कोई किसान कहीं का भी कोई बीज बो सकता है और बेच भी सकता है लेकिन विशेषाधिकार प्राप्त किस्मों की कमर्शियल ब्रांडिग नहीं कर सकता है।
​’पीपीवी एंड एफआर’ के फैसले पर पेप्सिको का क्या है कहना
पेप्सिको इंडिया ने इस फैसले पर कहा कि वह पौध किस्मों और किसान अधिकार संरक्षण (पीपीवी और एफआर) प्राधिकरण द्वारा पारित आदेश की समीक्षा कर रही है। पीपीवी एंड एफआर एक सांविधिक निकाय है, जिसकी स्थापना पौधों की किस्मों और किसानों के अधिकार अधिनियम, 2001 के तहत की गई है। प्राधिकरण का यह निर्णय दरअसल कृषि कार्यकर्ता कविता कुरुगांति द्वारा दायर की गई याचिका पर आया है।
याचिकाकर्ता की क्या रही दलील
याचिकर्ता ने अपनी याचिका में कहा था कि पेप्सिको इंडिया को गलत जानकारी के आधार पर पंजीकरण प्रमाण पत्र दिया गया था। कृषि कार्यकर्ता कविता ने यह भी कहा था कि पेप्सिको इंडिया को आलू की किस्म पर दिया गया बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर), पंजीकरण के लिए निर्धारित प्रावधानों के अनुसार नहीं था और जनहित के खिलाफ था। पीपीवी एंड एफआर ने भी कृषि कार्यकर्ता की याचिका पर सहमति जताई और कहा कि पंजीकरण आवेदक द्वारा दी गई ‘गलत जानकारी’ पर आधारित था। प्राधिकरण ने अपने 79 पृष्ठ के फैसले में कहा, “एफएल 2027 वाले आलू की किस्म के संबंध में पेप्सिको के पक्ष में रजिस्ट्रार द्वारा एक फरवरी 2016 को दिया गया पंजीकरण प्रमाण पत्र तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है।” अपने निर्णय में प्राधिकरण ने रजिस्ट्रार के प्रमाणपत्र जारी करने पर हैरानी जताई है।

 

भारत जैन महामंडल लेडीज विंग, कोलकाता ने की जरूरतमंद बच्चों की सेवा

कोलकाता :  भारत जैन महामंडल लेडीज विंग, कोलकाता ने मानव सेवा के तहत कोलकाता के ‘नवजीवन’ अनाथालय में बच्चों के काम आने वाली वस्तुएं और खाने-पीने के सामानों का वितरण किया। बच्चों के चेहरों की खुशी देखने लायक थी। बच्चों की सेवा ही ईश्वर सेवा है। आज का यह सेवा कार्य नसरीन वारसी के सहयोग से किया गया। उनकी पुत्री माही के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में भारत जैन महामंडल लेडिज विंग द्वारा यह सराहनीय कदम लिया गया । माही को आशीर्वाद और उज्जवल भविष्य की हार्दिक मंगल-कामनाएं दी गईं । भारत जैन महामंडल लेडीज विंग कोलकाता की वाइस चेयरमैन अंजू सेठिया ने बताया कि इस प्रकार के सेवा कार्य जो भी करना चाहते हैं लेडीज विंग में स्वागत है। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में सुरक्षा एवं भू राजनीति पर परिचर्चा

सेनेर्स की साझेदारी में बीबीए विभाग द्वारा आयोजन 
कोलकाता : किसी भी पैनल चर्चा का उद्देश्य विशेषज्ञों या उद्योग और विचारकों के समूह के बीच बातचीत को बढ़ावा देना है, ताकि दर्शक उनके वक्तव्यों एवं बातचीत से सीख सकें। भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग ने ‘सेनेर्स- के’ नामक अनुसंधान केंद्र की भागीदारी एवं सहयोग से परिचर्चा आयोजित की। वैश्विक स्तर, सुरक्षा और भू – राजनीति पर आयोजित इस परिचर्चा का आयोजन गत 27 नवम्बर को कॉलेज के जुबली सभागार में किया गया।
पैनल चर्चा का नाम ‘ऑकस कॉम्प्लिमेंट्स क्वाड 2.0’ रखा गया तथा विषय ‘वैश्विक स्तर, सुरक्षा और भू-राजनीति’विषय पर चर्चा की गयी। इस पैनल चर्चा में पांच विशिष्ट अतिथियों ने हिस्सा लिया। अतिथियों में एयर चीफ मार्शल अरूप राहा, लेफ्टिनेंट जनरल जॉन रंजन मुखर्जी, मेजर जनरल अरुण रॉय, कमोडोर पी.के बनर्जी एवं कॉलेज के डायरेक्टर जनरल प्रोफेसर (डॉ.) सुमन के. मुखर्जी शामिल हुए ।
एयर चीफ मार्शल अरूप राहा परम विशिष्ट सेवा पदक, अति विशिष्ट, सेवा पदक और वायु सेना पदक से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति द्वारा विशिष्ट सेवा के लिए। वे वर्तमान में सेनेर्स-के, के अध्यक्ष भी हैं। कार्यक्रम की एम सी ख़ुशी सोनी ने अतिथि वक्ताओं का परिचय दिया तत्पश्चात एनसीसी विभाग के केडेटों ने सम्मान पूर्वक उनको मंचासीन किया । पैनल चर्चा की शुरूआत राष्ट्रगान से हुई जिसके बाद सभी माननीय वक्ताओं का विभागीय छात्र अध्यक्ष माधव मोहता ने स्वागत किया। मध्यस्थ का कार्य किया डॉ. सुमन कुमार मुखर्जी ने चर्चा के नियमों और विनियमों से सभी को अवगत कराया ।
पैनल चर्चा के वक्तव्यों से पहले मध्यस्थ डॉ. सुमन कुमार मुखर्जी ने अपने विचार विद्यार्थियों के समक्ष पेश किए। उन्होंने दुनिया का एक अस्थिर, अनिश्चित, जटिल, अस्पष्ट दुनिया में बदलने के उल्लेख के साथ अपनी बातचीत शुरू की। उन्होंने यह भी कहा कि किसी राष्ट्र का विकास न केवल उसके आर्थिक प्रदर्शन पर निर्भर करता है बल्कि उसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रदर्शन पर भी निर्भर करता है। उन्होंने लिटिल रेड राइडिंग हूड की कहानी साझा करते हुए बताया कि दुनिया व्यापार में आपूर्ति श्रृंखला के मेक टेक डिस्ट्रीब्यूशन और पुन: उपयोग की ओर बढ़ रही है। उन्होंने इस तथ्य को भी साझा किया कि भारत के हर पांच में से एक नागरिक आजादी के पचहत्तर साल बाद भी गरीबी रेखा से नीचे है। उन्होंने यह कहकर अपना भाषण समाप्त किया कि हमारे देश को जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है और भविष्य अनिश्चित है कि हमारा देश विकास की धूप का सामना करेगा या झूठ के अंधेरे में डूब जाएगा।
पैनल चर्चा की शुरुआत प्रथम वक्ता अरूप राहा ने कहा कि चीन की विस्तारवादी नीतियाँ आधुनिक विचारों के खिलाफ हैं। उन्होंने कोविड महामारी की तुलना तीसरे विश्व युद्ध से भी की। उन्होंने विद्यार्थियों को इस तथ्य से अवगत कराया कि कैसे दुनिया व्यापार के लिए चीन पर निर्भर है और कैसे यह जापानी उन्नत तकनीक की मदद से महाशक्ति के रूप में उभरा। दूसरे वक्ता जे आर मुखर्जी ने भविष्य के आर्थिक विकास में भारत के उत्तर पूर्वी हिस्से के प्रमुख विकास के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि उत्तर पूर्व में चाय, तेल, बांस, खनिज, हॉटीकल्चर, हाइड्रो पावर और कोयले के कई संसाधन हैं। उत्तर पूर्व में केवल म्यांमार के साथ समस्याएं हैं क्योंकि यह चीन की पकड़ में है और बांग्लादेश के साथ उनके इस्लामी मूल सिद्धांतों के कारण। अन्यथा वहां बहुत शांति है।
पैनल में तीसरे वक्ता अरुण रॉय ने वैश्विक व्यापार पर अपने विचार रखे। वक्तव्य की शुरुआत करते हुए कहा कि लाइसेंस राज के कारण अमेरिकी व्यवसाय भारत में कैसे टिके नहीं रह सके, कैसे पैसा दुनिया पर राज करता है और कैसे राष्ट्रवाद वैश्विक व्यापार में भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने निकट भविष्य में उत्तर पूर्व क्षेत्र में पारिस्थितिक असंतुलन और व्यापार और विनिर्माण विकास और चीनी उत्पादों के बहिष्कार के माध्यम से हम इसका समर्थन कैसे कर सकते हैं, बताया । उन्होंने विद्यार्थियों को अच्छे नागरिक बनने की सलाह दी।
पैनल के अंतिम वक्ता पी के बनर्जी ने वैश्विक व्यापार और सुरक्षा के लिए महासागर के महत्व पर बात की थी। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार का 97 प्रतिशत महासागरों के जलमार्गों के माध्यम से किया जाता है। उन्होंने अपने विशाल महासागर क्षेत्र के कारण भारत के लिए भू-स्थिर अवसरों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि कैसे अभी भी महासागरों का एक बड़ा हिस्सा निगरानी में नहीं है, जिसके कारण ड्रग्स की तस्करी, मानव तस्करी, बंदूक चलाना, आतंकवाद, चोरी, डकैती, अवैध मछली पकड़ना जैसे कार्य हो रहे हैं। उन्होंने हमें अपनी अगली पीढ़ी को स्वच्छ और बेहतर महासागर सौंपने की भी सलाह दी। अंत में, प्रश्नोत्तर सेशन में सभी पैनल अतिथि वक्ताओं ने भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और भू-राजनीति पर दर्शकों के सवालों का जवाब दिया।
अंत में, विंग कमांडर विष्णु शर्मा को सम्मानित किया गया। विभागीय छात्र अध्यक्ष देवज्योति बनर्जी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। इवेंट मैनेजमेंट टीचर कोऑर्डिनेटर प्रो. कौशिक बैनर्जी और बीबीए इवेंट मैनेजमेंट के छात्र अध्यक्ष देवज्योति बनर्जी और माधव मोहता ने उपरोक्त कार्यक्रम का संचालन किया। कार्यक्रम के इवेंट कमेटी हेड, मेहक भइया और सुस्मृति गन तथा उनके सब-कमेटी हेड, दिशा रूपानी, जाह्नवी खणडेर्या एवं अनुशा अकबर ने भी इस कार्यक्रम में सक्रिय योगदान दिया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

द हेरिटेज अकादमी में आयोजित हुआ ‘ऐड अड्डा 2021’

कोलकाता : द हेरिटेज अकादमी के मीडिया साइंस विभाग की ओर से एक मार्केटिंग कम्यूनिकेशन कार्यक्रम ‘ऐड अड्डा 2021’ आयोजित किया गया। गत 2 – 3 दिसम्बर को आयोजित इस कार्यक्रम में महानगर के कई कॉलेजों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम में कॉपीराइट, ऐड स्पूफ, ऐड क्विज, जिंगल्स समेत कई अन्य प्रतियोगिताएं आयोजित की गयीं। इन कार्यक्रमों से विज्ञापन और प्रचार अभियानों के बारे में विद्यार्थियों की जानकारी बढ़ी और उनको विज्ञापनों की दुनिया को समझने का मौका मिला। कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता एवं अभिनेता अरिंदम सील ने किया। इस कार्यक्रम में भवानीपुर गुजराती एडुकेशन सोसायटी कॉलेज, स्कॉटिश चर्च कॉलेज, द हेरिटेज अकादमी, सेंट जेवियर्स कॉलेज, सेंट जेवियर्स यूनिवर्सिटी, एनएसएचएम नॉलेज कैम्पस, कलकत्ता विश्वविद्यालय समेत कई अन्य शिक्षण संस्थानों ने भाग लिया। ऐड क्विज प्रतियोगिता का विजेता भवानीपुर गुजराती एडुकेशन सोसायटी कॉलेज बना। वहीं कलकत्ता विश्वविद्यालय ने ऐड स्पूफ और कॉपीराइट प्रतियोगिता प्रथम स्थान प्राप्त किया। पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि केस रूप में अभिनेता नील भट्टाचार्य उपस्थित थे।

कई बीमारियों से अधिक घातक है वायु प्रदूषण, डॉक्टरों ने बताये सजग रहने के तरीके

कोलकाता : प्रदूषण आज एक विकट समस्या बन गया है। यह कई बीमारियों की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक है मगर अब तक इस समस्या का समाधान नहीं निकल सका है। भारत में 7 मिलियन लोग हर साल वायु प्रदूषण से मरते हैं। यह याद रखने वाली बात है कि वायु प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं बल्कि पूरी शरीर पर घातक प्रभाव डालता है।
राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस पर इस समस्या के खिलाफ कई मशहूर चिकित्सक एक साथ आये। गत 2 दिसम्बर को इस मौके पर स्विच ऑन फाउंडेशन की तरफ से डॉक्टर्स फॉर क्लीन एयर (डीएफसीए) के सहयोग से एक पत्रकार सम्मेलन का आयोजन किया। इस मौके लंग केयर फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी डॉ. अरविंद कुमार की ओर से एक वीडियो के जरिए वायु प्रदूषण के खतरे को सामने रखा गया। यह वीडियो सीएमआरआई के डॉक्टर राजा धर ने प्रस्तुत किया।
पश्चिम बंगाल डॉक्टर्स फोरम के समिति सदस्य डॉ, कौशिक चारकी ने कहा कि औद्योगिक श्रमिक न्यूमोकोनियोसिस, एस्बेस्टोसिस जैसे स्वास्थ्य जनित समस्याओं की चपेट में हैं। इनका विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। इस अवसर पर डॉ. अरूप हल्दर, डॉ. कौस्तुभ चौधरी, डॉ. सुमन मल्लिक, डॉ. सैरन्द्री बनर्जी तथा डॉ. संयुक्ता दत्त ने भी विचार रखे।
गौरतलब है कि 2 दिसम्बर को ही भोपाल गैस त्रासदी 1984 में हुई थी और इसके बाद से इसी दिन राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस मनाया जाता है।
वायु प्रदूषण जीवन शैली को लेकर चिकित्सकों के कुछ परामर्श
– प्रदूषण को लेकर जागरूक बनें। हृदय एवं फेफड़ों के मरीज विशेष रूप से सजग रहें।
– इनहेलर पास रखें। एन 95 मास्क पहनें और सुनिश्चित करें कि यह फिट हो।
– कम ईंधन जलाने वाले वाहन इस्तेमाल करें।
– रेस्तरां में खाना कम करें। अगर मांसाहारी हैं तो सप्ताह में एक दिन सब्जियों और पौधों का उपयोग करें।
– घरेलू वायु शोधक इस्तेमाल करें।
– बच्चों को प्रदूषण से बचायें, पानी और अन्य तरल पदार्थ दें। बाहर खुली हवा में व्यायाम करने को प्रोत्साहित करें।

 

सम्मानित हुए बीएचएस के मेधावी विद्यार्थी

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल का पुरस्कार वितरण समारोह हाल ही में आयोजित किया गया। वर्चुअल माध्यम पर आयोजित इस समारोह में दसवीं और बारहवीं के विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। विद्यार्थियों को उनकी उपलब्धियों, निरन्तर प्रयास, अच्छे आचरण और विषयों में प्राप्तांक के लिए पुरस्कृत किया गया। इस श्रेणी में इस वर्ष एस, पी. बनर्जी अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस दसवीं बी के छात्र अथर्व चौधरी ने प्राप्त किया। बिड़ला हाई स्कूल अल्यूमनी ट्रॉफी फॉर द स्कूल टॉपर इसी कक्षा के सर्बो सरकार तथा बारहवीं ए के कॉमर्स के छात्र यश जैन को मिली। दसवीं ई के अमन गुप्ता और बारहवीं बी के कॉमर्स के छात्र शिवम अग्रवाल को द भावेश जाजू मेमोरियल अवार्ड मिला। अकादमिक उत्कृष्टता के लिए ईशान बनर्जी, स्पन्दन दास, आदित्य राय चौधरी, हृतम बोस, अनीश बनर्जी, और वेदान्त पालित को द आई. वी. शर्मा मेमोरियल अवार्ड्स प्रदान किया गया। एआईएसएसई तथा एआईएसएससीई की परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले भी पुरस्कृत किये गये।

 

महिला हिंसा उन्मूलन दिवस पर बीएचएस में असेम्बली

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल में अन्तर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस पर विशेष असेम्बली आयोजित की गयी। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के विरोध में हर साल यह दिन मनाया जाता है। 25 नवम्बर का दिन संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा महिला हिंसा उन्मूलन दिवस घोषित किया गया है। विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से इसे लेकर जागरुकता लाने का प्रयास किया।

भारतीय परम्परा में मिठास भरता आ रहा है खीर का स्वाद

खीर एक ऐसा व्यंजन है जो भारत में किसी भी खास अवसर में मिठास भर देती है। अलग – अलग राज्य और अलग – अलग तरीके मगर खीर पूरे भारत में पसन्द किया जाने वाला व्यंजन है। हमारे पौराणिक इतिहास में खीर का उल्लेख है। रामायण की बात करें तो राजा दशरथ ने जब पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाया तो अग्निदेव ने प्रकट होकर उनको खीर का ही प्रसाद दिया था। इसके बाद उनको श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न पुत्र के रूप में प्राप्त हुए।

खीर शब्द संस्कृत के क्षीर शब्द से आया है जिसका अर्थ है क्षीर और भगवान विष्णु क्षीर सागर में निवास करते हैं तो शाब्दिक अर्थ दूध का सागर बनता है। दरअसल, खीर की उत्पत्ति संस्कृत के क्षीर से हुई है। क्षीर दूध को कहते हैं और इसका अपभ्रंश आज खीर के नाम से जाना जाना जाता है। खीर एक प्रकार का मिष्ठान्न है जिसे चावल को दूध में पकाकर बनाया जाता है। खीर को पायस भी कहा जाता है। ‘खीर’ शब्द, ‘क्षीर’ (= दूध) का अपभ्रंश रूप है। रामायण महाभारत काल में भी खीर का जिक्र है। खीर का पहला उल्लेख 400 ईसापूर्व के जैन और बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है। ठीक इसी प्रकार शरद पूर्णिमा से भी खीर का विशेष सम्बन्ध है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखी खीर पर चन्द्रमा अमत बरसाते हैं। कहने का मतलब यह कि खीर भारतीय परम्परा का महत्वपूर्ण अंग है।

खीर की कहानी का सम्बन्ध केरल में प्रचलित एक पौराणिक गाथा से भी है। कहते हैं एक बार श्रीकृष्ण ने अंबलापुझा के राजा को परखना चाहा। राजा शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे, सो शतरंज की बिसात पर ही शर्त रखी भगवान कृष्ण ने जो भेस बदलकर साधु के रूप में थे। राजा को लगा मामूली-सा दिखने वाला साधु मेरे सामने क्या टिकेगा, इसलिए शर्त मान ली कि हारने पर उसकी हर शर्त उन्हें मंजूर होगी। खैर, खेल में राजा की हार हुई। साधु ने कहा मुझे इस शतरंज की बिसात भर चावल दो, बस इतना ख्याल रखना कि पहले खाने में जितने दावल के दाने रखे जाएं, दूसरे में उससे दोगुने और तीसरे में उसके दोगुने और इस तरह यह दोगुने का हिसाब पूरे 64 खानों तक बना रहे। राजा को यह मामूली हिसाब-किताब लगा। लेकिन जब असल में चावल रखा जाने लगा और एक-एक कर गिनती आगे बढ़ती रही तो आंकड़ों की विशालता का अहसास राजा को हुआ। यहां तक कि चालीसवें खाने तक पहुंचते-पहुंचते उसके पूरे साम्राज्य के चावल समाप्त हो गए! राजा को परेशान देखकर श्रीकृष्ण ने अपना असली रूप दिखाया। और बाकी बचे चावलों को भक्तों को पाल पायसम के रूप में परोसने का वायदा लिया। तभी से अंबलापुझा के मंदिर में नैवेद्य के रूप में यह खीर बंटती आ रही है।
पायसम को दूध, चावल और गुड़ से बनाया जाता है. जबकि ज्यादातर खीर दूध, चीनी और चावल से बनती है. इसमें सूखे मेवे डाले जाते हैं। पश्चिम बंगाल में यह पायेश हो जाती है. पायेश को दूध, चावल, घी, चीनी/गुड़ और खोया डालकर पकाया जाता है।
वही खीर उत्तर प्रदेश आते-आते बदल जाती है। बनारस में त्योहारों और हवन में इसे दूध, चावल, घी, चीनी, इलायची, मेवे और केसर डालकर पकाया जाता है जबकि दक्षिण भारत में सेवैया और साबूदाने को मिलाकर खीर बनती है। इसें कुछ सूखे मेवे डाले जाते हैं. असम में खीर को पायोख कहा जाता है। इसमें काफी मात्रा में सूखे मेवे डाले जाते हैं। यहाँ इसका रंग थोड़ा गुलाबी होता है। कहीं-कहीं इसे साबूदाना से भी बनाया जाता है। ऐसी खीर असम के परिवारों में महत्वपूर्ण भोजन के तौर पर बनाई जाती है। बिहार में खीर को चावल की खीर कहा जाता है। यहां इसे बनाने के लिए फुल क्रीम दूध, चीनी, इलायची पाउडर, सूखे मेवे और केसर डाला जाता है। अगर केसर न हो तो भी काम चल जाता है। वहीं चीनी की जगह गुड़ डाला जाये तो खीर रसियाव बन जाती है। खीर का सम्बन्ध जगन्नाथ पुरी से भी है। बंगाल की तरह ओडिशा में खीर को पायस कहा जाता है। यह पुरी में दो हजार सालों से बन रही है। इसे अन्नप्रसादम में बांटा जाता है। कहीं-कही पायसम को चीनी, चावल और नारियल के दूध से तैयार किया जाता है। वहीं कर्नाटक में सेवैया से पायसम बनता है. इसमें साबूदाना भी मिलाया जाता है जबकि हैदराबाद में लौकी की खीर खूब पसंद की जाती है। इसे गिल-ए-फिरदौस कहा जाता है जिसे दूध और लौकी से बनाया जाता है। भारत ही नहीं प्राचीन रोम और फारस क्षेत्र में भी खीर के सेवन का उल्लेख मिलता है। रोमवासी पेट को ठंडक पहुंचाने के लिए खीर खाया करते थे. जिस फिरनी को पंजाब में बड़े चाव से खाया जाता है। वो एक जमाने में पर्शिया के पसंदीदा व्यंजनों में से थी। पारसी लोगों ने ही फिरनी में गुलाबजल और सूखे मेवे डालना शुरू किया था. जबकि चीन में बनने वाली खीर में फलों को शहद में डुबोकर डाला जाता है। । ईरान और अफगानिस्तान में खीर से ही मिलते-जुलते व्यंजन शोला-ए-शीरीं और शोला-ए-ज़र्द पकते हैं। आमतौर पर मुहर्रम के दसवें रोज़ इन्हें पकाया जाता है और एक मीठे पेय शर्बत-ए-रेहान के साथ परोसा जाता है। इन्हें गरीबों में भी बांटने की परंपरा है। शोला-ए-ज़र्द के लिए छोटे आकार के शोला (चावल) को दूध और मेवों के संग पकाकर इसमें पीला रंग मिलाया जाता है। आज खीर की विविधता और लोकप्रियता देखते हुए इसके साथ प्रयोग भी खूब हो रहे हैं।

(साभार – न्यूज ट्रैक, अमर उजाला)

अन्तर्द्वन्द्वों, आकांक्षाओं..आशा – निराशा, हर एक भाव का दर्पण ‘अभिव्यक्ति भावों की’

हम सब खुद को अभिव्यक्त करना चाहते हैं, बहुत कुछ कहना चाहते हैं और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है कविता। कविता हमारे मन के भावों के साथ हमारे अन्तर्द्वन्द्वों, हमारी आकांक्षाओं..आशा – निराशा, हर एक भाव का दर्पण है। कविता खुद से किया गया संवाद है जो समाज से प्रभावित भी होता है और समाज को प्रभावित भी करता है। संवाद की इसी परम्परा का अनूठा गीत है प्रो. प्रेम शर्मा का काव्य संग्रह ‘अभिव्यक्ति भावों की’। इस पुस्तक की भूमिका डॉ. अरुण कुमार अवस्थी ने लिखी है। वे लिखते हैं, ‘संग्रह की सभी कवितायें कवयित्री के शुद्ध अन्तर -वेगों की निर्मल अभिव्यक्ति हैं।’
इस काव्य संग्रह का आरम्भ ही सरस्वती वन्दना से होता है – ‘हे श्वेत वरणी हंसवाहिनी/ कर्म कुशलता बुद्धि बल दे/ शुद्ध आचरण मन पवित्र कर दे/ शब्दों में स्नेह सुधा भर दे।’ कवयित्री मन की असीम शक्ति को समझती हैं। ‘मेरी मांग’ कविता में तभी तो वह लिखती हैं – ‘माँग रही हूँ तुमसे मैं तो/शुद्धि, मन और विचारों की। मांग है मुझको मानस बल दो/ चाह है उज्ज्वल भावों की।’

बचपन को याद करते हुए वे बाल जीवन की समस्याओं पर भी बात करती हैं -‘पर हम तो सपने देखते नहीं/ मधुर स्वप्न लुप्त हुए/टेस्ट की दहशत में/ दिन रात हम तो पिस रहे।’ कवयित्री का दार्शनिक मन कुछ कविताओं में प्रकट होता है। ‘नवीन प्रयास’ नामक इस कविता को देखिए – ‘प्राप्तियाँ कम हुईं तो क्या हुआ/ आलोचनाएँ हुईं तो क्या हुआ, उन्नति पथ पर चलने की कोशिश तो की, गति धीमी हुई तो क्या हुआ’।
पुस्तक में 64 कविताएं हैं। भाषा तत्सम शब्दों से ओत – प्रोत है परन्तु सहज एवं बोधगम्य है और कई प्रश्नो के उत्तर तलाशती है तो कुछ प्रश्न उठाती भी है। प्रो. प्रेम शर्मा अध्यापिका रही हैं और उनका दीर्घ अनुभव इन कविताओं में नजर आता है, उनकी बेचैनी और सुकून सब आप इन कविताओं में देख सकते हैं।
कवयित्री जो आस – पास देखती हैं, महसूस करती हैं, सब अपनी कलम में उतार देती हैं। इस संग्रह में हर एक भाव की कविता है, समसामायिक परिस्थितियों को उकेरती कविता है और राष्ट्रीय भाव को अभिव्यक्त करने वाली कविताएँ भी हैं – ‘रचो नया इतिहास क्योंकि, युग बदल रहा/ नूतन विधान छेड़ दो कि जग बुला रहा, निष्फल हुआ हर एक स्वप्न अब साकार हो।’ कविता को सरलता से समझने और गुनने के लिए यह पुस्तक पढ़ी जानी चाहिए।
पुस्तक का नाम – अभिव्यक्ति भावों की
विधा – काव्य संग्रह
कवयित्री- प्रो. प्रेम शर्मा
समीक्षक – सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

लैक्मे : पंडित जवाहरलाल नेहरू का सपना जो टाटा ने साकार किया और माता लक्ष्मी से है जिसका सम्बन्ध

लैक्मे! इस नाम को कौन नहीं जानता। सौन्दर्य उत्पाद या कॉस्मेटिक्स की दुनिया में लैक्मे नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है। लैक्मे भारत की पहली कॉस्मेटिक्स कंपनी है। आज भारत के नंबर वन कॉस्मेटिक्स ब्रांड पर काबिज इस कम्पनी को शुरू किया था जेआरडी टाटा ने। लैक्मे के जरिए टाटा समूह ने पहली बार कॉस्मेटिकक्स उद्योग में कदम रखा था। टाटा समूह ने भारतीय महिलाओं की संजने-संवरने की आकांक्षा और त्वचा की जरूरतों को कुछ इस कदर समझा कि लैक्मे ब्रांड शुरू होने के साथ ही लोकप्रिय होता चला गया। लैक्मे…इस नाम का सम्बन्ध जेआरडी टाटा के साथ-साथ देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और माँ लक्ष्मी से भी है। आइए जानते हैं लैक्मे की शुरुआत का दिलचस्प किस्सा और बुलंदियों पर पहुंचने की इसकी पूरी कहानी…

बात 1952 की है। आजादी के बाद का वह दौर जब स्वतंत्र भारत की अर्थव्यवस्था अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रही थी। लैक्मे की स्थापना के पीछे पंडित जवाहरलाल नेहरू की सोच रही। देश में अच्छी गुणवत्ता वाले निजी देखभाल वाले देसी सौन्दर्य उत्पादों की कमी थी और भारतीय निर्माता भी बेहद कम थे। लिहाजा उस वक्त देश के संपन्न परिवारों की महिलाएं विदेशी सौन्दर्य उत्पाद इस्तेमाल करती थीं। मध्यम वर्गीय परिवारों की महिलाएं घर पर ही तैयार किए गए सौंदर्य उत्पादों का इस्तेमाल करती थीं। सौन्दर्य उत्पादों के आयात के एवज में देश से एक मोटी धनराशि विदेश जाती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को इस बात को लेकर चिंता हुई और यही चिंता लैक्मे की उत्पत्ति का कारण बनी।

जेआरडी टाटा से साझा किया विचार

नेहरू ने टाटा ग्रुप के चेयरमैन और अपने दोस्त जेआरडी टाटा से इस बारे में बात की और देश के अंदर अच्छी गुणवत्ता वाले कॉस्मेटिक्स बनाने वाली कंपनी स्थापित करने को कहा। नेहरू जानते थे कि जेआरडी टाटा ही वह शख्स हैं, जिनमें चुनौतियों से जूझने का जुनून और एंटरप्रेन्योरिशप के स्किल हैं। जेआरडी टाटा को भी यह आइडिया पसंद आया क्योंकि कॉस्मेटिक्स के बाजार में देश के अंदर कॉम्पिटीशन न के बराबर था। इस तरह उत्पत्ति हुई लैक्मे ब्रांड की। एक ऐसी कॉस्मेटिक्स कंपनी, जिसने भारतीयों की त्वचा और भारतीय जलवायु को ध्यान में रखकर कॉस्मेटिक्स उतारे।

​टाटा ऑयल मिल्स कंपनी की सब्सिडियरी के तौर पर लॉन्चिंग

लैक्मे को टाटा ऑयल मिल्स कंपनी (टॉम्को) की पूर्ण स्वामित्व वाली सब्सिडियरी के तौर पर 1953 में लॉन्च किया गया। टॉम्को को कोचीन में 1920 में शुरू किया गया था। कोचीन का वर्तमान नाम कोच्चि है। लैक्मे को टॉम्को ने फ्रांस की दो नामी कंपनियों रॉर्बट पिग्वेट और रेनॉयर  के साथ मिलकर शुरू किया था। विदेशी सहयोगियों की इक्विटी में कोई भागीदारी नहीं थी। उनकी भागीदारी केवल उनके संरक्षित परफ्यूम बेसेस के बारे में तकनीकी जानकारी देने तक सीमित थी, जिसके लिए उन्हें टाटा की ओर से फीस का भुगतान किया जाता था। लैक्मे पूरी तरह से एक स्वदेशी ब्रांड था।

​माँ लक्ष्मी से कैसे नाता

लैक्मे, फ्रेंच शब्द है और इसका अर्थ लक्ष्मी है। यह नाम पड़ना भी काफी दिलचस्प है। जब कंपनी को शुरू किया गया तो फ्रांसीसी सहयोगियों को एक नाम सुझाने को कहा गया। एक ऐसा नाम, जिसमें दोनों देशों की झलक हो। तब लैक्मे नाम सामने आया, जो पेरिस में उस वक्त विख्यात एक ओपेरा से प्रेरित था। उस ओपेरा का नाम लैक्मे था, जो समृद्धि और सुंदरता की देवी लक्ष्मी पर आधारित था। तो यह कंपनी के लिए एक सही नाम था। वहीं यह भी कहा जाता है कि लैक्मे का नाम जेआरडी टाटा ने लक्ष्मी ही रखा था और बाद में इसे बदला गया।

​एक छोटे किराए के परिसर से शुरुआत

लैक्मे की शुरुआत मुंबई में पेद्दार रोड पर एक छोटे किराए के परिसर से हुई थी। लॉन्च होने के बाद इसके परिचालन और प्रॉडक्ट रेंज तेजी से बढ़ी और 1960 आते-आते कंपनी बड़े परिसर की तलाश करने लगी। लैक्मे के प्रॉडक्ट अच्छे भी थे और कम कीमतों पर उपलब्ध थे। जल्द ही लैक्मे को टॉम्को की सेवरी फैक्ट्री में शिफ्ट कर दिया गया। लैक्मे के लॉच होने के बाद भारत में विदेशी सौन्दर्य उत्पादों की खेप आनी लगभग बंद सी हो गई। फिल्मों में भी मेकअप के लिए लैक्मे के सौन्दर्य उत्पाद इस्तेमाल किए जाने लगे, जिससे आम लोगों में इसके प्रति विश्वास जगा।

सिमौन ने दी नयी ऊँचाई

इसके बाद लैक्मे को एक नई उंचाई पर लेकर गईं सिमोन टाटा, जो नवल एच टाटा की पत्नी थीं। उन्होंने 1961 में लैक्मे की प्रबन्ध निदेशक का पद संभाला। सिमोन का जन्म जेनेवा, स्विट्जरलैंड में हुआ था। 1953 में वह एक पर्यटक के तौर पर भारत आईं, जहां उनकी मुलाकात नवल एच टाटा से हुई। नवल और सिमोन ने साल 1955 में शादी कर ली और फिर सिमोन हमेशा के लिए मुंबई में बस गईं। सिमोन, नवल टाटा की दूसरी पत्नी हैं। टाटा ग्रुप के वर्तमान चेयरमैन एमिरेट्स रतन टाटा, नावल टाटा और उनकी पहली पत्नी की संतान हैं। सिमोन टाटा की सौन्दर्य को लेकर समझ और व्यवसाय की सूझबूझ ने जल्द ही लैक्मे को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया और यह एक आइकॉनिक ब्रांड बन गया। सिमोन 1982 में लैक्मे की चेयरपर्सन बनीं। सिमोन जब भी विदेशी जाती थीं, वह सौन्केदद सैंपल साथ लाती थीं और उन्हें केमिस्ट को देती थीं ताकि उनके स्पेसिफिकेशन के बारे में पता किया जा सके और लैक्मे को और उम्दा बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

 

​बॉलीवुड की शीर्ष  हीरोइनों का लिया गया साथ

लैक्मे यूं ही इतनी बुलंदी पर नहीं पहुंची। सेल्स ऑफिसेज, सेल्सपर्सन्स, डीलर और एजेंटों के पूरे नेटवर्क ने सुनिश्चित किया कि लैक्मे पूरे भारत के शहरी बाजारों में और उम्दा प्रदर्शन करे। वक्त—वक्त पर मार्केट सर्वे किए गए, अच्छे से सोचसमझ कर तैयार की गई मार्केट स्ट्रैटेजीस पर अमल किया गया और बड़े पैमाने पर पब्लिसिटी कैंपेन चलाए गए। लैक्मे ब्रांड को खड़ा करने के लिए उस जमाने की दिग्गज बॉलीवुड अभिनेत्रियों जैसे रेखा, हेमा मालिनी, जया प्रदा आदि को लैक्मे के विज्ञापन में लिया गया। लैक्मे का पहला ब्रांड फेस मॉडल श्यामोली वर्मा थीं, जो कि 80 के दशक की शुरुआत में एक जानामाना नाम थीं। हर उस भारतीय कस्बे को डिस्ट्रीब्यूशन के तहत कवर किया गया, जिसकी आबादी 20000 लोग या उससे ज्यादा थी। उस वक्त लैक्मे की प्रॉडक्ट रेंज में महिलाओं के लिए मेकअप, स्किनकेयर प्रॉडक्ट और टॉयलेटरीज शामिल थे। बाद में कंपनी पुरुषों के लिए पर्सनल केयर रेंज में भी उतरी, जिसने लैक्मे को और सफलता दिलाई। लैक्मे प्रॉडक्ट्स को कड़े क्वालिटी परीक्षण से गुजारा जाता था ताकि हर प्रॉडक्ट उच्च ग्रेड का हो और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरे।

​1980 में पहला ब्यूटी सैलन खुला
1980-1980 में लैक्मे का पहला ब्रांडेड ब्यूटी सैलों खुला। सैलों में महिलाओं को ब्यूटी ट्रीटमेंट की पूरी रेंज उपलब्ध कराई गई, इसके लिए क्वालिफाइड ब्यूटीशियंस की मदद ली गई। साल 1993 में टॉम्को को हिंदुस्तान यूनिलीवर के साथ मर्ज कर दिया गया। पहले हिंदुस्तान यूनिलीवर, हिंदुस्तान लीवर (एचएलएल) के नाम से जानी जाती थी।

हिंदुस्तान यूनिलीवर का हुआ ब्रांड

इसके बाद 1996 में टाटा समूह और हिंदुस्तान यूनिलीवर की लैक्मे में 50:50 की साझेदारी हो गयी। साल 1998 में लैक्मे की पूरी हिस्सेदारी हिंदुस्तान यूनिलीवर को मिल गई और लैक्मे, हिंदुस्तान यूनिलीवर के ब्रांड के नाम से जाना जाने लगा। लैक्मे को इस सोच के साथ हिंदुस्तान यूनिलीवर को दिया गया था कि वह ही भविष्य में इसके साथ बेहतर न्याय कर पाएगी और हिन्दुस्तान यूनीलिवर इस विश्वास पर खरा उतरा।

​300 उत्पाद, 70 से भी ज्यादा देशों में कारोबार
आज लैक्मे प्रॉडक्ट की रेंज 100 रुपये से शुरू होती है। इसके लगभग 300 उत्पाद हैं और 70 से ज्यादा देशों में बिक रहे हैं। आज लैक्मे का 6 माह का ब्यूटी कोर्स भी है, जो कि एक डिप्लोमा कोर्स है। गरीब लड़कियों के लिए स्कॉलरशिप प्रोग्राम और स्टार्टअप शुरू करने में मदद की भी पेशकश की जा रही है। लैक्मे फैशन वीक, लैक्मे शोज जैसे ईवेंट भी आयोजित किए जाते हैं।

 (स्त्रोत साभार – नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, विकिपीडिया)