नयी दिल्ली । उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 की धारा 3, 5 एवं 7 को असंवैधानिक करार देते इसे निरस्त कर दिया है। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि संसद केवल उन प्रावधानों को दोबारा लागू नहीं कर सकती जिन्हें कोर्ट पहले ही निरस्त कर चुका है, जब तक उनके मूल संवैधानिक दोषों को दूर न कर दिया जाए।
कोर्ट ने कहा कि 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा, चार साल का कार्यकाल और सर्च सह चयन समिति की प्रक्रिया से जुड़े प्रावधान शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। जस्टिस के विनोद चंद्रन ने टिप्पणी की कि ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट रद्द किए गए अध्यादेश की ही एक प्रति है। कोर्ट ने कहा कि यह नई बोतल में पुरानी शराब है। यह मामला ट्रिब्यूनलों की स्वतंत्रता को लेकर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई का हिस्सा है। उच्चतम न्यायालय ने अपने पहले के फैसलों में ट्रिब्यूनल के सदस्यों के कार्यकाल और आयु सीमा से जुड़े नियमों को निरस्त किया था। इसके बावजूद, संसद ने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 पारित किया, जिसमें पुराने प्रावधानों को फिर से शामिल किया गया जैसे कि नियुक्ति के लिए न्यूनतम 50 वर्ष की आयु और केवल चार साल का कार्यकाल जिन्हें कोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका था। मद्रास बार एसोसिएशन ने इस कानून को चुनौती दी थी।
अंगदान और प्रत्यारोपण के लिए एक समान नियम बनाने का दिया निर्देश
नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने अंग दान और प्रत्यारोपण पर एक बड़ा फैसला दिया है। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को कई दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि पूरे देश में एक जैसी नीति और एक जैसे नियम बनाए जाएं ताकि अंग दान की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और तेज हो सके। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ये आदेश इंडियन सोसायटी ऑफ ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वो इस मामले में एक राष्ट्रीय नीति तैयार करे, जिसमें अंग दान के लिए एक समान नियम हो जिसमें लिंग और जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने के उपाय और पूरे देश के लिए एक समान डोनर मानदंड शामिल हो। कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग राज्यों के अलग मानदंड मरीजों और दाताओं, दोनों के लिए असमानता पैदा करते हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वो आंध्र प्रदेश को 2011 के मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम में हुए संशोधनों को अपनाने के लिए राजी करे। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वो कर्नाटक, तमिलनाडु और मणिपुर जैसे राज्यों को तुरंत मानव अंगों और ऊतकों के प्रत्यारोपण के नियम, 2014 लागू करने को कहा जाए, क्योंकि अभी वे अपने अलग-अलग नियमों पर चल रहे हैं।
कोलकाता । पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्यभर में स्लीपर बसों में बढ़ती आग की घटनाओं को देखते हुए महत्वपूर्ण सुरक्षा कदम उठाने का निर्णय लिया है। परिवहन विभाग अब राज्य संचालित बसों में ऐसे आधुनिक उपकरण लगाने की तैयारी कर रहा है, जो बस के चलते समय भी आग या चिंगारी का पता लगते ही तुरंत सक्रिय हो सकें। परिवहन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य परिवहन प्राधिकरण को इस संबंध में सूचित कर दिया गया है और विभिन्न परिवहन उपक्रमों ने शहर और लंबी दूरी की बसों में इन उपकरणों की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है।अधिकारी के अनुसार, सभी वाहनों का नियमित सुरक्षा ऑडिट किया जा रहा है और सरकारी बसों की नियमित सर्विसिंग के लिए नया मानक संचालन प्रोटोकॉल (एसओपी) भी तैयार किया जा रहा है। बस कर्मचारियों को आग की रोकथाम संबंधी विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा और प्रत्येक यात्रा से पहले डीपो स्तर पर बसों की सुरक्षा जांच अनिवार्य की गई है। उन्होंने बताया कि अगले वर्ष तक निजी बसों को भी चरणबद्ध और किफायती तरीके से इसी सुरक्षा ढांचे में शामिल किया जाएगा। वर्तमान में राज्य परिवहन निगमों के पास लगभग दो हजार 600 से अधिक बसों का बेड़ा संचालित हो रहा है। नई पहल से उम्मीद है कि बस यात्रियों की सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार होगा और आगजनी की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकेगा।
नयी दिल्ली । बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री और अवामी लीग की अध्यक्ष शेख हसीना को मानवता के विरुद्ध अपराध का दोषी बताते हुए आईसीटी ने सजा ए मौत का ऐलान किया। 17 नवंबर को ही वर्षों पहले शेख हसीना का निकाह हुआ था। जीवन के खास दिन पर ही उन्हें सबसे बुरी खबर मिली। बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) की तीन सदस्यीय पीठ ने सोमवार दोपहर को ये फैसला सुनाया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शेख हसीना ने 1967 में शेख मुजीब के जेल में रहने के दौरान अपनी मां फजीलतुन नेसा की देखरेख में प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक एम.ए. वाजेद मिया से शादी की थी। बांग्लादेश टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, फजीलतुन नेसा ने जल्दबाजी में इस जोड़े के निकाह की व्यवस्था की थी।
शेख हसीना और एम.ए. वाजेद मिया के दो बच्चे हैं, सजीब वाजेद जॉय और साइमा वाजेद पुतुल। सजीब वाजेद जॉय का जन्म 27 जुलाई, 1971 को और साइमा वाजेद पुतुल का जन्म 9 दिसंबर, 1972 को हुआ था।
शेख हसीना अब तक पांच बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं। उन्होंने पहली बार 1996 से 2001 तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद 2009 से 2014 तक दूसरी बार, 2014 से 2019 तक तीसरी बार, 2019 से 2024 तक चौथी बार और 2024 में पांचवीं बार प्रधानमंत्री के रूप में चुनी गईं। हालांकि, छात्र विरोध प्रदर्शनों के कारण शेख हसीना को 5 अगस्त 2024 को सत्ता छोड़नी पड़ी।
2024 में हुआ छात्र आरक्षण सुधार आंदोलन एक जन विद्रोह में बदल गया। उसी वर्ष जुलाई-अगस्त में, छात्र आंदोलन पर पुलिस ने हमला किया और उन पर गोलियां चलाईं, साथ ही अवामी लीग के विभिन्न स्तरों के नेताओं और कार्यकर्ताओं और पार्टी के सहयोगी संगठनों, छात्र लीग और जुबली लीग के कार्यकर्ताओं पर भी हमला किया। परिणामस्वरूप, आरक्षण सुधार आंदोलन सरकार के पतन का कारण बन गया।
हसीना के अलावा इस मामले में पूर्व गृहमंत्री असदुज्जमां खान कमाल और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) चौधरी अब्दुल्ला अल-ममून भी आरोपी थे। हसीना और खान देश में नहीं हैं, तो पूर्व आईजीपी पुलिस के गवाह बन गए। उन्होंने माफी मांगी, जिस पर गौर करते हुए कोर्ट ने उन्हें 5 साल की सजा सुना दी।
अपने बयान में ममून ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने छात्र आंदोलन को दबाने के लिए सीधे तौर पर ‘घातक हथियारों’ के इस्तेमाल का आदेश दिया था। उन्हें यह निर्देश पिछले साल 18 जुलाई को तत्कालीन गृह मंत्री असदुज्जमा खान के माध्यम से शेख हसीना से प्राप्त हुआ था।
23 अक्टूबर को सुनवाई पूरी होने के बाद, पहले फैसला और सजा सुनाने की तारीख 14 नवंबर तय की गई थी। बाद में, 13 नवंबर को, आईसीटी ने घोषणा की कि वह हसीना और उनके दो शीर्ष सहयोगियों के खिलाफ मामले में 17 नवंबर को फैसला सुनाएगा, और आखिरकार हुआ भी यही। अवामी लीग को खत्म करना चाहती है यूनुस सरकार : हसीना
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (आईटीसी) के फैसले पर पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। शेख हसीना ने सोमवार को कहा कि उनके खिलाफ सुनाया गया फैसला एक ‘धांधली ट्रिब्यूनल’ से आया है, जिसका गठन और अध्यक्षता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अनिर्वाचित अंतरिम सरकार ने किया। इसके पास लोकतांत्रिक जनादेश का अभाव है। बांग्लादेश की पूर्व पीएम ने कोर्ट के फैसले को ‘पक्षपाती’ और ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया। आईसीटी ने पूर्व प्रधानमंत्री को पिछले साल जुलाई में प्रदर्शनकारियों की हत्या का आदेश देने और उनकी सुरक्षा न करने का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। पूर्व पीएम शेख हसीना ने बांग्लादेश आईटीसी के फैसले की आलोचना करते हुए कहा, “मृत्युदंड की अपनी घृणित मांग अंतरिम सरकार के भीतर चरमपंथी लोगों के गलत और खतरनाक इरादे को दर्शाती है। अंतरिम सरकार बांग्लादेश के अंतिम निर्वाचित प्रधानमंत्री को हटाना और अवामी लीग को एक राजनीतिक ताकत के रूप में निष्प्रभावी करना चाहती है।”
शेख हसीना ने कहा कि डॉ. मोहम्मद यूनुस के अराजक और हिंसक शासन के अधीन काम कर रहे लाखों बांग्लादेशी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने के इस प्रयास से मूर्ख नहीं बनेंगे।
उन्होंने अंतरिम सरकार की आलोचना करते हुए कहा, “वे देख सकते हैं कि तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) द्वारा चलाए गए मुकदमों का उद्देश्य कभी न्याय प्राप्त करना या पिछले साल जुलाई-अगस्त की घटनाओं की कोई वास्तविक जानकारी प्रदान करना नहीं था। उनका उद्देश्य अवामी लीग को बलि का बकरा बनाना और डॉ. यूनुस और उनके मंत्रियों की विफलताओं से दुनिया का ध्यान भटकाना था।”
– चालू वित्त वर्ष में 25 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंचने का अनुमान नयी दिल्ली । देश का प्रत्यक्ष कर संग्रह चालू वित्त वर्ष (वित्त वर्ष 26) में सात प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और इसके 25 लाख करोड़ रुपए से अधिक पहुंचने का अनुमान है। यह जानकारी एक वरिष्ठ अधिकारी की ओर से सोमवार को दी गई। इंडिया इंटरनेशनल ट्रेड फेयर के साइडलाइन में बातचीत करते हुए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के चेयरमैन रवि अग्रवाल ने कहा कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक आयकर संग्रह सरकार की ओर से निर्धारित किए गए लक्ष्य 25.20 लाख करोड़ रुपए पर पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने आगे कहा कि देश का प्रत्यक्ष कर संग्रह पिछले साल के मुकाबले 6.99 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और यह काफी उत्साहजनक है। देश का शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह एक अप्रैल से लेकर 10 नवंबर की अवधि में पिछले साल के मुकाबले सालाना आधार पर 6.99 प्रतिशत बढ़कर 12.92 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो गया है। इसकी वजह धीमा रिफंड और कॉरपोरेट टैक्स में जबरदस्त बढ़ोतरी है।
10 नवंबर तक रिफंड सालाना आधार पर 18 प्रतिशत कम होकर 2.42 लाख करोड़ रुपए हो गया है। अग्रवाल ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2024-2025 के लिए ऑडिट रिटर्न जमा करने की समय सीमा बढ़ा दी गई है और चालू वित्त वर्ष के लिए अभी भी दो अग्रिम कर किश्तें बकाया हैं।
इससे पहले के सीबीडीटी के आंकड़ों के अनुसार, भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह इस वित्त वर्ष 17 सितंबर तक पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में 9.18 प्रतिशत बढ़कर 10.82 लाख करोड़ रुपए को पार कर गया, जबकि रिफंड में 23.87 प्रतिशत की तेज गिरावट देखी गई थी।
इस दौरान गैर-कॉर्पोरेट कर राजस्व 13.67 प्रतिशत बढ़कर 5.83 लाख करोड़ रुपए हो गया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शुद्ध कॉर्पोरेट कर संग्रह 4.93 प्रतिशत बढ़कर 4.72 लाख करोड़ रुपए हो गया, जबकि प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) 0.57 प्रतिशत की मामूली वृद्धि के साथ 26,305.72 करोड़ रुपए हो गया। सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह 3.39 प्रतिशत बढ़कर 12.43 लाख करोड़ रुपए हो गया, जबकि रिफंड 23.87 प्रतिशत घटकर 1.60 लाख करोड़ रुपए रह गया।
-बस मालिकों में खुशी की लहर -परिवहन विभाग की नई विज्ञप्ति कोलकाता । 15 साल से अधिक पुरानी बसों को चलाने पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने आखिरकार सशर्त छूट दी है। 15 साल पुरानी बसों को चलाने के मामले में राज्य के परिवहन विभाग ने हाई कोर्ट में जो मसौदा विज्ञप्ति जमा किया था, हाईकोर्ट ने उस पर संतोष जताया है। परिवहन विभाग के मसौदे में बस की आयु नहीं बल्कि बस फिट है या नहीं, इस बात पर अधिक जोर दिया गया है। इस विज्ञप्ति में सिफारिश की गयी थी कि फिटनेस की परीक्षा में अगर कोई 15 साल पुरानी बस पास कर पाती है तो उसे भी सड़कों पर उतारने की बात कही गयी थी। हाई कोर्ट ने इस बात पर अपनी सहमति जतायी है। इस बात से बस मालिकों में खुशी की लहर दौड़ गयी है। लेकिन इस मसौदे में कई बातों का उल्लेख नहीं किया गया है, जिसे लेकर बस-मालिकों में कुछ उलझनें भी हैं। बस-मालिकों का सवाल है कि 15 साल की आयु कौन से साल के कौन से महीने से माना जाएगा? 2 साल पहले जिन बसों को आयु पूरी हो जाने की वजह से बैठा दिया गया है, क्या उनके फिटनेस की जांच करके उन्हें भी सड़कों पर उतारा जा सकता है? उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इन सवालों का जवाब मिल जाएगा। परिवहन विभाग ने अपने मसौदे में फिटनेस पर जोर देने के मामले में राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के बदले हुए फैसले का भी उल्लेख किया है। अब तक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 15 साल से अधिक पुरानी बसों को सड़कों पर चलाने को लेकर निषेधाज्ञा जारी की थी लेकिन बोर्ड ने ही बताया कि अगर स्वास्थ्य ठीक रहता है और प्रदूषण की मात्रा नियंत्रण में रहती है तो पुरानी गाड़ियों को भी चलाने में कोई बाधा नहीं है। अदालत ने पहले ही कहा था, ’15 साल पूरे होते ही किसी गाड़ी को ऑटोमेटिक बंद नहीं किया जा सकता है।’ परिवहन विभाग ने अपने मसौदे में यह स्वीकार किया है कि अचानक हजारों पुरानी बसों को बंद कर देने की वजह से आम यात्रियों की मुश्किलें काफी बढ़ गयी हैं। महानगर में बसों की संख्या कम हो जाने की वजह से भीड़ बढ़ी हैं, मालिक नई बसें नहीं खरीद पाएं हैं। कई गाड़ियां तो हमेशा के लिए बंद कर दी गयी हैं। सबसे अधिक नुकसान ड्राइवर, कंडक्टर, मेकैनिक व गैराज में काम करने वाले हजारों लोगों को पहुंचा है। उनकी जीविका पर बुरा असर पड़ा है। ऐसी स्थिति में परिवहन विभाग ने नया मसौदा तैयार किया है, जिसमें कहा गया है – कोलकाता मेट्रोपॉलीटन इलाके में रजिस्टर्ड हैं, ऐसी बसें 15 साल पूरा होने के बाद भी चलायी जा सकती हैं। लेकिन साल में दो बार फिटनेस और प्रदूषण की जांच करना अनिवार्य है। धुएं की मात्रा वर्ष 2019 में निर्धारित निर्गमन सीमा से नीचे रहना होगा। अगर कोई बस स्वास्थ्य परीक्षा में पास नहीं कर पाती है तो उसे रास्ते पर चलने की अनुमति नहीं होगी। सीटी सबर्बन बस सर्विसेस के सचिव टिटो बसु और सारा बांग्ला बस-मिनी बस समन्वय समिति के सचिव राहुल चट्टोपाध्याय का कहना है, ‘इस फैसले के लिए परिवहन विभाग को असंख्य धन्यवाद। परिवहन को थोड़ा ऑक्सीजन मिला। बड़ी संख्या में कर्मचारियों ने राहत की सांस ली।’
कोलकाता। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के कृष्णनगर उत्तर सीट से निर्वाचित विधायक मुकुल राय की विधायकी रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति देबांशु बसाक और न्यायमूर्ति शब्बर राशिदी की खंडपीठ ने गुरुवार को यह अहम फैसला सुनाया। मुकुल राय वर्ष 2021 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने थे, लेकिन 2022 में वे पुनः तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। इस कदम के बाद उनके विधायक पद को लेकर विवाद खड़ा हो गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 10 के तहत, यदि कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि दल बदलता है तो उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है। इसी प्रावधान के तहत नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष मुकुल राय की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष ने शुभेंदु अधिकारी की याचिका खारिज करते हुए मुकुल राय की विधायकी बरकरार रखी थी। इस निर्णय को चुनौती देते हुए शुभेंदु अधिकारी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अब उच्च न्यायालय ने अध्यक्ष के निर्णय को पलटते हुए मुकुल राय की विधायकी को अमान्य करार दे दिया है। फैसले के बाद शुभेंदु अधिकारी ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा कि यह न सिर्फ राज्य बल्कि संभवतः देश के इतिहास में भी पहली बार हुआ है जब इस तरह का निर्णय सामने आया है। गौरतलब है कि, मुकुल राय तृणमूल कांग्रेस के शुरुआती दिनों से ही पार्टी के रणनीतिकार माने जाते थे। उन्हें कभी पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाता था। वर्ष 2017 के नवंबर में उन्होंने तृणमूल छोड़कर भाजपा का दामन थामा था और 2021 में भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते थे। तृणमूल ने उस चुनाव में अभिनेत्री कौशानी मुखोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद सितंबर 2022 में मुकुल राय दोबारा तृणमूल कांग्रेस में लौट आए, जिसके बाद भाजपा ने उनके खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग उठाई थी। अंततः अब कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले से मुकुल राय की विधायक सदस्यता समाप्त हो गई है। उनके खिलाफ याचिका नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने हीं लगाई थी।
कोलकाता । पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के बीच एक बड़ा खुलासा सामने आया है। यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई) ने चुनाव आयोग को सूचित किया है कि राज्य के लगभग 34 लाख आधार कार्ड धारक अब ‘मृत’ पाए गए हैं, जबकि करीब 13 लाख ऐसे लोग भी गुजर चुके हैं, जिन्होंने कभी आधार कार्ड बनवाया ही नहीं था। यह जानकारी यूआईडीएआई अधिकारियों और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज कुमार अग्रवाल के बीच हुई बैठक में साझा की गई। एक अधिकारी ने गुरुवार सुबह बताया कि बैठक का उद्देश्य मतदाता सूची के आंकड़ों के सत्यापन और उसमें संभावित त्रुटियों की पहचान करना था। सीईओ कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चुनाव आयोग को मृत, काल्पनिक (घोस्ट), अनुपस्थित और डुप्लीकेट मतदाताओं को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही थीं। ऐसे में यूआईडीएआई से प्राप्त मृत नागरिकों का डेटा मतदाता सूची से इन प्रविष्टियों को हटाने में अहम भूमिका निभाएगा। अधिकारी ने बताया कि नौ दिसम्बर को मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद, यदि किसी आवेदक का नाम ऐसे आधारधारकों में पाया गया, जो अब जीवित नहीं हैं, तो संबंधित निर्वाचन निबंधक अधिकारी (ईआरओ) उन्हें सत्यापन के लिए तलब कर सकता है। इसके अलावा, अधिकारियों ने बताया कि बैंक खातों से भी सूचना एकत्र की जा रही है, क्योंकि अधिकांश खातों से आधार जुड़ा हुआ है। बैंकों ने ऐसे खातों का विवरण दिया है जिनकी केवाईसी वर्षों से अपडेट नहीं की गई, जिससे उन मृत व्यक्तियों की पहचान आसान हो रही है जिनके नाम अब भी मतदाता सूची में मौजूद हैं। राज्य में इस समय एसआईआर अभियान के तहत घर-घर जाकर बूथ स्तर अधिकारी (बीएलओ) नामांकन प्रपत्र वितरित कर रहे हैं। यह प्रक्रिया वर्ष 2025 की मतदाता सूची के आधार पर चल रही है और इसमें वर्ष 2002 की सूची से प्राप्त आंकड़ों का मिलान भी किया जा रहा है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अनुसार, बुधवार रात आठ बजे तक राज्य में कुल 6.98 करोड़ यानी 91.19 प्रतिशत नामांकन प्रपत्र वितरित किए जा चुके थे।
-अब तक 3.17 लाख छापेमारी, 3,645 लाइसेंस रद्द और 418 एफआईआर
नयी दिल्ली। केंद्र सरकार ने खरीफ और चल रहे रबी सीजन के दौरान किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने तथा काला बाजार, जमाखोरी और डाइवर्जन पर रोक लगाने के लिए देशभर में अबतक तीन लाख से अधिक छापेमारी की गईं, हजारों लाइसेंस रद्द किए गए और सैकड़ों प्राथमिकी दर्ज हुईं। खाद्य एवं उर्वरक विभाग ने कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सहयोग से गए इस अभियान से पहले दोनों विभागों के सचिवों ने राज्यों के साथ कई संयुक्त बैठकें कीं, जिसके बाद जिला स्तर पर बड़े पैमाने पर छापेमारी और कानूनी कार्रवाई शुरू की गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक कुल 3,17,054 निरीक्षण और छापेमार कार्यवाइयां की गईं। इनमें 5,119 कारण बताओ नोटिस जारी किए गए, 3,645 लाइसेंस रद्द या निलंबित किए गए और 418 प्राथमिकी दर्ज की गईं। जमाखोरी के विरुद्ध 667 नोटिस, 202 लाइसेंस रद्द या निलंबन तथा 37 प्राथमिकी, जबकि डाइवर्जन के मामलों में 2,991 नोटिस, 451 लाइसेंस रद्द या निलंबन और 92 प्राथमिकी दर्ज की गईं। सभी कार्रवाई आवश्यक वस्तु अधिनियम और उर्वरक नियंत्रण आदेश, 1985 के तहत की गईं। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, पंजाब, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्यों में अभियान सबसे प्रभावी रहा। उत्तर प्रदेश में 28,273 निरीक्षण, 1,957 नोटिस और 2,730 लाइसेंस रद्द या निलंबित किए गए। महाराष्ट्र में 42,566 निरीक्षणों के साथ 1,000 से अधिक लाइसेंस रद्द, जबकि बिहार में लगभग 14,000 निरीक्षण और 500 से अधिक लाइसेंस निलंबित किए गए। इन कार्रवाइयों से कृत्रिम कमी और मूल्य हेराफेरी पर रोक लगी। गुणवत्ता पर निगरानी के तहत 3,544 नोटिस संदिग्ध निम्न गुणवत्ता वाले उर्वरकों पर जारी किए गए, जिनमें 1,316 लाइसेंस रद्द या निलंबन और 60 प्राथमिकी दर्ज की गईं। नियमित नमूना परीक्षण और गुणवत्ता जांच के माध्यम से घटिया उर्वरकों को आपूर्ति श्रृंखला से हटाया गया ताकि किसानों तक केवल मानक गुणवत्ता के उर्वरक ही पहुंचें। राज्य सरकारों ने डिजिटल डैशबोर्ड और तत्काल निगरानी प्रणाली के माध्यम से भंडार की आवाजाही पर निगरानी रखी और जब्त किए गए उर्वरकों को सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों तक शीघ्र पहुंचाया। किसानों की शिकायतों पर भी त्वरित कार्रवाई की गई।
कैथरीन क्लेमां का नाम गूगल पर आपको मिल जाएगा पर विस्तृत जानकारी नहीं मिलेगी। जब कैथरीन की किताब एडविना और नेहरू को दूसरी बार पढ़ा था। आम तौर पर इस पुस्तक को दुर्लभ प्रेम कथाओं में जाना जाता है पर यह किताब मेरी नजर में बतौर पाठक प्रेमकथा से कहीं आगे है। भारत -पाकिस्तान के विभाजन के दौरान मचा तांडव, भारतीय नेताओं की मनोदशा…यह किताब सबके नकाब खोलती है। पुस्तक का अनुवाद निर्मला जैन ने किया है और यह एक शानदार अनुवाद है। प्राक्कथन में कैथरीना मानती हैं कि प्रेम की इस परम्परा का जन्म 12वीं शताब्दी के यूरोप में धर्मयुद्धों के समय हुआ था। (पेज -1) …आगे वह लिखती हैं कि मैंने नेहरू और एडविना पर इसी परिप्रेक्ष्य में ऐतिहासिक उपन्यास लिखा है। मुक्त भाव से मैंने कुछ ऐसी कुछ स्थितियों जोड़ दी हैं, जो संभवतः घटित नहीं हुईं, लेकिन कुछ संकेतों के आधार पर उनका घटित होना संभव जान पड़ता है। दूसरी ओर कुछ और स्थितियां जो असंभव प्रतीत होती हैं, वास्तव में एकदम सच्ची है। (पेज -2) नेहरू और एडविना दोनों इंसान थे। दोनों में नेतृत्व का गुण था। दोनों रोमांटिक थे, उनमें भावावेश था और अपने ढंग से दोनों भारत के लिए समर्पित थे।(पेज -2) उपन्यास चौरी चौरा कांड से शुरू होता है। यहां अहिंसा के नाम पर गांधी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस लिया जाता है। पूरे उपन्यास में गांधी के सन्दर्भ में एक बात स्पष्ट है कि गांधी को अहिंसा की उम्मीद केवल हिन्दुओं से थी मगर मुसलमानों के सन्दर्भ में उनका यह प्रेम नहीं दिखता। कृति में ऐसे कई स्थल हैं जहां स्पष्ट होता है कि गांधी की दृष्टि में मुसलमान प्राथमिकता थे..जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। आमतौर पर जब यह बात कही जाती है तो कहने वाले को संघी कह दिया जाता है, भाजपाई या हिन्दू आतंकवादी तक कह दिया जाता है मगर यह ध्यान में रखना जरूरी है कि यह पुस्तक फ्रांस की लेखिका ने लिखी है जिसका संघ से या हिन्दू मत से दूर – दूर तक कोई संबंध नहीं था। इस उपन्यास में एडविना के कई प्रेम संबंधों का जिक्र मिलता है और इसमें बनी और बिलपाले का नाम शामिल है। यह भी एडविना माउंडबेटन के साथ अपने संबंधों को लेकर बहुत निश्चित नहीं थी, माउंटबेटन को उनके जवाब का इंतजार करना पड़ा था । एक पात्र कहता है -पहली बात तो यह कि अभी तक सगाई की घोषणा नहीं की गयी है, ज्यादा से ज्यादा यही हो सकता है कि युवा माउंटबेटन अभी कुमारी एडविना एशले के जवाब का इंतजार कर रहे हैं…(पेज -8) ।
उपन्यास में कस्तूरबा गांधी के निधन का प्रसंग मार्मिक है और कहीं न कहीं महात्मा कहे जाने वाले गांधी की मानवता पर भी सवाल उठते हैं। क्या कोई पति इतना क्रूर हो सकता है कि स्वदेशी के नाम पर डॉक्टरों के कहने के बावजूद अपनी पत्नी को इस स्थिति में ला दे की कि वह दवा ही न ले। – डॉक्टर ने कस्तूरबा को चटाई पर सीधा करके उनके चेहरे की परीक्षा की। उसे उनके हृदय और फेफड़ों आदि की गति को आले (स्टैथेस्कोप) से सुनने की जरूरत नहीं पड़ी। बिना कुछ बोले, गंभीर मुद्रा में उसने अपना बैग खोलकर एक सिरिज और शीशी निकाली। यह क्या है? गांधी ने तीखे स्वर में पूछा। सिर्फ पेन्सिलीन, मिस्टर गांधी। परेशान न हों : दो या तीन शीशियां बस और हम इन्हें ठीक कर लेंगे। गाँझी ने धीरे से कहा- क्या मैं यह समझूँ कि आप इनको इंजेक्शन देंगे? डॉक्टर ने अपनी सिरिज की तरफ देखा, और कुछ मुस्कुराते हुए कहा – उन्हें सुई का चुभना पता भी नहीं लगेगा। सवाल यह नहीं है कि , गांधी ने जवाब दिया। मैं इंजेक्शन लगाकर इलाज करने के एकदम खिलाफ हूँ, यह प्राकृतिक नहीं है। और जो प्राकृतिक नहीं है वह मानवता के लिए हितकर नहीं है। क्या? डॉक्टर चिल्लाया -आप इंजेक्शन के लिए मना नहीं करेंगे, क्या आप ऐसा करेंगे? (पेज -25) इसी पेज पर आगे वर्णन है – गाँधी जी उठे और रात के अंधियारे में डॉक्टर के पीछे बाहर चले गए। मेरे लिए आपको आगाह करना जरूरी है मिस्टर गाँधी, पेन्सिलिन के बिना वे नहीं बचेंगी। डॉक्टर फुसफुसाया। इसके अलावा आपके बेटे, देवदास इस इलाज पर जोर दे रहे हैं।….बात आगे बढ़ती है पर गाँधी नहीं मानते। अपनी मरणासन्न पत्नी के पास जाकर कहते हैं – बा ..सुनो। अगर तुम जीना चाहती हो तो तुम्हें सिरिंज से पेन्सिलिन का एक इंजेक्शन लगवाना होगा। क्या तुम्हें मंजूर है? सिंरिज से? वे बुदबुदाईं, आपको तो यह पसंद नहीं है, या है? इसका फैसला सिर्फ तुम्हें करना है, बा, महात्मा ने उनकी भौहों को चूमते हुए फुसफुसाकर कहा, सिर्फ तुम्हें प्यारी बा…….. (पेज – 26)और बा ने गांधी के कारण इंजेक्शन नहीं लिया। पुणे के यरवदा आश्रम में फरवरी के महीने में उन्होंने दम तोड़ दिया। इसके बाद भी गांधी को रक्ती भर भी दया नहीं आती। कस्तूरबा के निधन के अगले दिन वे डॉक्टर से कहते हैं – अगर मैंने पेन्सिलिन लगाने की अनुमति दे भी दी होती, तो भी वह उन्हें नहीं बचा सकती थी। डॉक्टर चुप रहा। हम लोग बासठ साल इक्कठे रहे और उन्होंने मेरी गोदी में दम तोड़ दिया। इससे बेहतर और क्या हो सकता था? महात्मा ने ऐसे पूछा जैसे वे डॉ़क्टर से अपनी बात का समर्थन चाहते थे।अब पाठक स्थिति को पलट दें और सोचें कि अगर गांधी के साथ ऐसी स्थिति होती तो क्या कस्तूरबा वही करतीं जो गांधी ने किया? मुझे लगता है नहीं करतीं…आगे मैं फिर सोचती हूँ और फिर मन में सवाल उठता है कि क्या बह्मचर्य और सत्य के नाम के प्रयोग के नाम पर गांधी द्वारा किये गये कृत्यों को जिस तरह आदर्श स्वीकृति मिली है, वह प्रयोग क्या कस्तूरबा करतीं या ऐसे ही पुरुषों के कंधे पर हाथ रखकर घूमतीं तो क्या यह समाज उनको स्वीकार करता? गाँधी के प्रण के लिए कस्तूरबा ने बलिदान दिया और प्रैक्टिकल होकर कहूँ तो गाँधी ने स्वदेशी के नाम पर और परम्परा ने पतिव्रता के नाम पर जिस तरह स्त्रियों का ब्रेन वॉश किया, यह उसकी ही परिणति थी।
कई जगहों पर उल्लेख मिलता है महात्मा गांधी को तीन बार मलेरिया हुआ था। वे कई दिन तक बिस्तर पर रहे। इसी दौरान वे एक जिद कर बैठे, बोले मैं दवा नहीं लूंगा। प्राकृतिक तरीके से जो इलाज होता है, उसी से ठीक होकर दिखाऊंगा। खैर, महात्मा गांधी की मच्छरों के सामने एक न चली। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के मुताबिक, अंत में गांधी जी को ‘कुनेन’ लेनी पड़ी। वे दवा लेने के विरोध में थे। दूसरे तरीकों से खुद को ठीक करने में उनकी ज्यादा रुचि थी। आईसीएमआर में मलेरिया पर पेश की गई एक रिपोर्ट के दौरान यह बात सामने आई है। मतभेदों के बावजूद कस्तूरबा गांधी से अधिक समर्पित महिला थीं।
कैथरीन क्लेमा ने भारतीय राजनीति में नेहरू की भूमिका पर विस्तार से बात की है। 18 मार्च 1946 को नेहरू और एडविना की पहली मुलाकात होती है। आरम्भ में एडविना को नेहरू में कोई दिलचस्पी नहीं होती और न ही वे उनको महत्व देती हैं मगर लुई माउंटबेटन को पता था कि नेहरू भविष्य में उनके लिए कितने उपयोगी हो सकते हैं। माउंटबेटन एडविना से नेहरू का परिचय देते हुए कहते हैं – और वे एशियन रिलेशंस कांफ्रेंस के अध्यक्ष हैं। लॉर्ड लुई ने उत्तेजित होकर कहा, तुम्हें मालूम है कि भारत का भविष्य बहुत दूर तक नेहरू पर निर्भर है? उनके बगैर मुसलमानों के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता, भारत में नागरिक शांति नहीं हो सकती। (पेज -32)
जलियावाला बाग हत्याकांड के आरोपाी जनरल डायर को लंदन में सम्मान मिल रहा था। माउंटबेटन जब कहते हैं कि डायर को सैनिक अदालत में पेश किया गया था तो नेहरू कटुता के साथ कहते हैं, –और, उसका हुआ क्या? वह मजे से दिन गुजार रहा है; भारत में रहने वाले अंग्रेजों के चंदे से बँधी पेंशन के सहारे। (पेज -46) ..यहां पर एडविना नेहरू का समर्थन करती हैं। नेहरू कहते हैं – जिस समय हम लोग जेल में थे उस समय जिन्ना और मुस्लिम लीग की साजिशों को खुली छूट देकर इस खतरे को इंग्लैंड ने ही बढ़ाया है। एक बात तो तय है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंग्रेज सरकार को खटकते थे। एक प्रसंग है जहां नेहरू कहते हैं – लेकिन मैं उस भारतीय देशभक्त सुभाषचंद्र बोस के बारे में बात करना चाहता हूँ। उनकी सेना के मुस्लिम सैनिकों को अपराधी ठहराने के कारण ही कलकत्ता उत्तेजित हो गया है। और वे दंगे…………..
इस पर लॉर्ड माउंटबेटन कहते हैं – आप जानते हैं कि सिवा इस राजद्रोही के उल्लेख के सिवा जिसे आप देशभक्त कहते हैं, मैंने सिंगापुर के आपके कार्यक्रम पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। उस समय भारतीय मामलों के अवर सचिव ऑर्थर हेंडसन थे। इस किताब में कलकत्ता के दंगों का उल्लेख है यानी डायरेक्ट ऐक्शन डे जो 16 अगस्त 1946 को हुआ था और यह नृशंसता भारतीय इतिहास में दबा दी गयी। स्पष्ट है कि एक विदेशी लेखिका इस बात को मानती है कि कलकत्ता दंगों की आग में जला था और जिन्ना इसके जिम्मेदार थे – यह सीधे कार्रवाई का दिन है, हमारे जिन्ना ने कहा था। मुसलमानों की ताकत दिखाने का दिन। लूटमार की बात अलग है, उसे हमें सिर्फ अपने महान नेता से तय करना है। (पेज -54)इसके बाद भीषण रक्तपात और बर्बरता के दिल दहला देने वाले दृश्य हैं जो कि तीन दिन तक चलते रहे मगर हमारे राजनेता तब भी अपनी सियासी रोटियां सेंकने में व्यस्त थे। इन दंगों में सोहरावर्दी की भूमिका रही है मगर किताब में जिक्र नहीं मिलता । 16 अगस्त के बाद 17 दिसम्बर 1946 को भी कोलकाता में दंगे हुए मगर इनका जिक्र बहुत कम मिलता है। मजे की बात यह है कि जो जिन्ना पाकिस्तान के लिए लड़ रहे थे, उनको उर्दू नहीं भाती थी। सरोजनी ने ठंडी सांस लेकर कहा, यह सच है, जो पाकिस्तान के लिए लड़ रहा है, वह मुसलमानों की भाषा नहीं बोलता। नेहरू उर्दू बोलते हैं मगर जिन्ना नहीं । (पेज – 63)
31 मार्च 1947 को एडविना, माउंटबेटन और गाँधी की मुलाकात होती है और गाँधी जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनाने के लिए तैयार हैं और जब यह कहा जाता है कि नेहरू नहीं मानेंगे तो वह नेहरू को मना लेने की बात कहते हैं। याद रहे कि यह वह समय था जब मुसमान हिन्दुओं का कत्लेआम कर रहे थे। गाँधी कहते हैं – मिस्टर जिन्ना का अपना अहंकार है, योर हाईनेस ! लेकिन मैं जानता हूँ उन्हें कैसे राजी किया जा सकता है। उन्हें भारत सरकार में प्रधानमंत्री का पद चाहिए। आगे वह कहते हैं – उन्हें (नेहरू को) स्वीकार करना होगा वरना भारत नष्ट हो जाएगा। (पेज -93)
– लेकिन, मैडम मिस्टर जिन्ना और वो बहुत दोनों बहुत अभिमानी हैं। नेहरू वायसराय की मदद नहीं मांगेंगे। मैंने मांग ली। मैं अपने को सिर्फ हिन्दू नहीं महसूस करता । सारे हिन्दुस्तानी, मुस्लिम, पारसी, सिख, जैन, ईसाई, यहूदी- सब मेरे बच्चे हैं….खासकर मुसलमान । (पेज -94)
महात्मा गांधी अपने विषय में कहते हैं – महिलाओं से बात करना मेरे जीवन का प्रिय शगल है। (पेज -113) । जिन्ना को लेकर सरोजिनी नायडू और एडविना की बातचीत का एक प्रसंग है –सरोजिनी ने गंभीरता से बात शुरू की, जिस जिन्ना को एक जमाने में मैं जानती थी वह कांग्रेस का स्वाधीनता सेनानी था, एक ऐसा युवक जिसका उत्साह और चुम्बकीय आकर्षण सामान्य लोगों जैसा नहीं था। वह हिन्दु और मुसलमानों के बीच एकता का कट्टर समर्थक था। और मुझे यकीन नहीं आता कि उस महान ज्वाला का लेशमात्र भी उसके हृदय में बाकी नहीं रहा है। (पेज -133)
बंटवारे के समय गाँधी और जिन्ना की असहमति साफ झलकती है। जिन्ना कहते हैं – नहीं मोहनदास, मैंने सिर्फ उनकी बातें सुनी हैं, जिन्ना ने धीरे से जवाब दिया। अल्लाह के नाम पर, जिसका आह्वान तुम भी करते हो, बातों को सीधे देखो। जिम्मेदारी न मेरी है न नेहरू की। इस स्थिति में दो ऐसे समुदायों के साथ जो एक साथ रहने से नफरत करते हैं, जबरदस्ती करके, तुम जहर ही खोल सकते हो। (पेज -140)
लार्ड माउंटबेटन की बाल्कन योजना में बंगाल को अलग कर दिया गया था, उसके पास विकल्प था – भारत या पाकिस्तान में से किसी के साथ मिलने या स्वतंत्र हो जाने का । बंगाल नेहरू की तिजोरी में नहीं आने वाला था। जाहिर था कि नेहरू और कृष्ण मेनन में से किसी को- क्षेत्रीय बंटवारे की व्यवस्था की जानकारी नहीं थी। (पेज -147) यह जाहिर तौर पर किया गया धोखा था और यह लार्ड लुई जानते थे। वह जानते थे कि नेहरू इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उपन्यास पढ़ने पर एक बात लगी और वह यह कि लार्ड लुई माउंटबेटन ने एडविना को आगे बढ़ाया और नेहरू के करीब जाने दिया, जो एक तरह से हनी ट्रैप जैसा ही है। उसने सोचा -कितने आराम से लुई ने कह दिया कि नेहरू मुझे पसंद करते हैं। नहीं, वह जोर से बोली। डिकी मैं उनकी नजरों में मेमसाहब हूँ। वे मुझे कैसे चाह सकते हैं? मैं यह नहीं कह रही हूं स्वीटहार्ट कि वे तुमसे प्रेम करते हैं, मैं सिर्फ कह रहा हूँ कि वे तुम्हें पसंद करते हैं, ये दोनों बातें एक नहीं हैं। हमारा दोस्त एक लाइलाज रोमांटिक व्यक्ति है। आखिर जेल में इतने साल……………………।
आगे माउंटबेटन कहते हैं – अगर यह सिर्फ अच्छी दोस्ती है तो इससे मुझे भी फायदा होगा। (पेज -156। )वह नेहरू को मनाने के लिए एडविना से मदद मांगते हैं। एक तरह से लार्ड साहब ने एडविना को रिश्ता आगे बढ़ाने के लिए विवश किया था और एडविना आरम्भ में मदद ही कर रही थी। गाँधी कुरान में आयतें पढ़ने की बात ही नहीं करते बल्कि एक हद तक प्रचार भी करते हैं। (पेज -188)। सोहरावर्दी ने मुसलमानों की सुरक्षा के लिेए महात्मा गांधी से मदद माँगी थी। पुस्तक में एक जगह उस भविष्यवाणी का उल्लेख है जहाँ माउंटबेटन अपनी ही मौत की भविष्यवाणी पर बात करते हैं…वह मूर्ख ज्योतिषी मुझसे क्या कह रहा था ? कि मेरी जिंदगी का खात्मा एक विस्फोट के कारण होगा? (पेज -207) । 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और उस दिन महात्मा गाँधी ने उपवास शुरू किया। इस किताब के मुताबिक लाहौर में सिख मुसलमान औरतों के साथ अभद्रता करते हैं। मुसलमान भी यही करते हैं, दंगा शुरू हो चुका होता है मतलब 1947 में दंगे की आग पहले पाकिस्तान में ही भड़की थी, भारत में नहीं। पाकिस्तान से जब लाशों से भरी ट्रेन अमृतसर पहुंचती है तो यह आग भारत में फैल जाती है। एडविना डिकी (माउंटबेटन को एडविना इसी नाम से बुलाती थीं) से कहती हैं – अभी – अभी एक ट्रेन अमृतसर पहुंची है। सारी गाड़ी ऐसे यात्रियों से भरी है जिनके गले काट दिये गये हैं। कुछ के सिर उतार दिये गये हैं। (पेज -232)। हैरत की बात यह है कि रक्तपात की इस विभीषिका के बीच भी मुसलमानों के प्रति हर नेता के मन में सॉफ्ट कॉर्नर है, फिर चाहे वह गांधी हों या नेहरू हों मगर हिन्दुओ के लिए और सिखों के लिए यह दर्द न के बराबर है। मारकाट दिल्ली में भी होती है और दंगों में मुसलमान मारे जाते हैं। नेहरू बेचैन हैं – ईमानदारी से मिस्टर गवर्नर जनरल, मेरी तरफ देखिए। मैं, जिस दिन से स्वतंत्रता मिली है, उसी दिन से सोया नहीं हूँ।……………..पुराने किले में पांव रखने की जगह नहीं है, हुमायूं के मकबरे में शरणार्थी बगीचों में पटे पडे हैं। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि इन हजारों लोगों के खाने की व्यवस्था कहां से करूँ? (पेज -255) ।धर्मांतरण तेजी से हो रहा था, हिन्दुओं और सिखों को तलवार की नोंक मांस खिलाया जा रहा था, मुसलमान बनाया जा रहा था। (पेज -259) । हैरत की बात है कि मारकाट दोनों तरफ से हो रही थी मगर सरकार हो या कांग्रेस के नेता, गांधी हों या नेहरू, सब के सब हिन्दुओं को ही हिंसा का दोषी बता रहे थे और मुसलमानों की रक्षा खुलकर कर रहे थे। किताब में हिंसा की घटनाएं इतनी वीभत्स हैं कि आप सिहर उठेंगे। (पेज -265) । गांधी कहते हैं – मैं हिन्दुस्तानी हूँ, गाँधी ने एक -एक शब्द पर जोर देते हुए कहा. सिर्फ हिन्दू नहीं हूँ। जब तक मेरे देश का एक -एक मुसलमान अपने घर लौटकर शांति से नहीं रहने लगता, तब तक मैं चैन से नहीं बैठूंगा। ( पेज- 278) बेचारे मुसलमान ! उन्हें कब्र का पत्थर तक नसीब नहीं होता। गांधी जी ने रोष से कहा -उन्हें तसल्ली देनी होगी, बताना होगा कि हम उनके मृतकों की व्यवस्था कर रहे हैं । (पेज -292)
अपनी लंबी छड़ी लेकर नेहरू चिल्लाए- मैं तुम लोगों को चेतावनी देता हूँ। अगर कभी भी किसी ने इस मस्जिद पर हमला किया चो मैं तुम्हें सजा दूंगा। (पेज -284) ।बात यहीं नहीं थमती, गाँधी हिन्दुओं को ही दोषी मानते हैं – महात्मा बुदबुदाए । नेहरू नहीं जानता, पर दोष भारत का है। दोष हिन्दुओं का है। यही कहने मैं जाऊंगा..और अगर मरने से पहले मुझे सिर्फ एक काम करना हो, तो वह होगा, अपने देश की तरफ से मुसलमानो और सिखों को क्षमायाचना। (पेज -293)
यह भाषा हम कहीं भी हम हिन्दुओं के लिए उनके मुंह से नहीं सुनते तो क्या हिन्दू गांधी की नजर में हिन्दुस्तानी नहीं थे या भारत के नागरिक नहीं थे? जितनी चिन्ता गांधी और नेहरू मुसलमानों की करते हैं, हिन्दुओं की इतनी चिन्ता न जिन्ना को होती है और सोहरावर्दी जैसे नेताओं को होती है तो पूछने वाली बात यह है कि क्य मानवता बोध एकतरफा होने पर बच सकता है ? एकमात्र सरदार पटेल दिखते हैं जो खुलकर निष्पक्षता से बात रखते हैं। इस हिंसा और त्रासदी के बीच भी नेहरू और एडविना का प्रेम बदस्तूर जारी रहता है और उनकी अतरंगता के किस्से किताब में दर्ज हैं। (पेज -286) वहीं दूसरी तरफ पूर्व प्रेमी माल्कम को लेकर उनमें अपराधबोध है और एडविना अपनी ही जटिलताओं में घिरी रहती हैं। (पेज -303)वहीं गांधी ने सत्ता में न होते हुए भी भारत सरकार पर अपना प्रभाव बरकरार रखा और भारत सरकार पर उन्होंने पाकिस्तान के पक्ष में दबाव बनाए रखा और इसके लिए उनका हथियार था उपवास और अनशन। -उपवास के दूसरे दिन ही भारत सरकार ने पाकिस्तान का देना चुका दिया था। पर महात्मा जी के लिए इतना ही काफी नहीं था। वे मुसलमानों की सुरक्षा के लिए एक घोषणापत्र भी जारी करवाना चाहते थे। नींद के दो दौरों के बीच गाँधी जी ने अपने सचिव प्यारेलाल को उस घोषणापत्र की शर्तें बोलकर लिखवाई थीं। कोई भी बात उनकी नजर से छूटी नहीं थी : वह मलबे का ढेर बना दी गयीं मस्जिदों का पुनर्निर्माण हो; या रेलों में मुसलमानों की सुरक्षा हो; या चाँदनी चौक में मुसलमानों की दुकानों के बायकॉट पर रोक हो। तमाम धार्मिक तथा राजनैतिक नेताओं ने हस्ताक्षर कर दिये थे। (पेज – 331) बस हिन्दू संगठनों ने हस्ताक्षर नहीं किये थे। 30 जनवरी 1948 को गाँधी की हत्या होती है और 14 फरवरी 1948 तक तीन हजार लोगों की गिरफ्तारी हुई। हिन्दू संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। समय बीतता है, एडविना और नेहरू अपनी -अपनी दुनिया में रहते हुए भी एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। मिलते हैं और रिश्ते बने रहते हैं। जवाहर के सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा से भी रिश्ते रहे। 21 जून 1948 को एडविना पति माउंटबेटन के साथ लंदन लौटती हैं मगर हमेशा नेहरू के सम्पर्क में रहती हैं, पत्राचार जारी रहता है, निजी बातचीत होती है और वह भी फोन पर ऑपरेटरों के माध्यम से। (पेज -412) 11 सितम्बर 1948 को जिन्ना की मौत फेफड़ों के कैंसर के सात तपेदिक की बीमारी के कारण होती है। जिस पाकिस्तान को जन्म देने के लिेए जिन्ना ने भारत के दो टुकड़े किये, उसी पाकिस्तान की सरजमीं पर वे एम्बुलेंस में पानी के लिेए तड़पते हुए दम तोड़ते हैं। 1951 में सरदार पटेल का निधन होता है। 1960 में कई बीमारियों से ग्रस्त एडविना गुजरती हैं और 27 मई 1964 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का निधन होता है। इसके बाद 27 अगस्त 1979 को नौका पर आयरिश विद्रोहियों के विस्फोट में लार्ड माउंटबेटन की मृत्यु होती है। कितनी अजीब बात है, एडविना के जाने के बाद नेहरू 4 साल से ज्यादा नहीं जी सके और नेहरू और माउंटबेटन में 27 की संख्या अनायास मेल खाती है।
इस किताब में लेखिका ने सन्दर्भ दिये हैं, जहां कल्पना की है, वह बातें कही हैं और प्रामाणिकता के लिए पुस्तकों की सूची भी दी है। निर्मला जैन का अनुवाद भाषा और भाव, दोनों का प्रवाह बनाए रखता है। पुस्तक पढ़कर एक बात तो समझ में आई कि हिन्दुओं के साथ भेदभाव हमेशा से होता आया है और इसकी शुरुआती कहानी महात्मा गाँधी से शुरू होती है, इसी राह पर नेहरू चलते हैं। जब परिस्थितयों को देखती और समझती हूँ तो समझ में आता है कि नाथूराम गोडसे ने अपनी परवाह न करते हुए गाँधी को मारने का निश्चय क्यों किया होगा। हमारी राजनीति आज तक तुष्टीकरण की इसी जमीन पर चलती आ रही है जहाँ धर्मनिरपेक्षता का मतलब हिन्दू आतंक और मुसलमानों का तुष्टीकरण हैं तो अगर आप गाँधी और नेहरू के प्रशंसक हैं तो यह पुस्तक न पढ़ें क्योंकि आप निष्पक्ष होकर पढ़ नहीं सकेंगे और पढ़ लिया तो स्वीकार नहीं कर सकेंगे। यह किताब सिर्फ प्रेम कहानी नहीं बल्कि इतिहास के कुछ निर्मम अध्याय को खोलने का माध्यम है। मैंने एडविना और नेहरू से अधिक भारतीय इतिहास को समीक्षा के केंद्र में रखा है क्योंकि मेरी समझ में वही जरूरी था। पुस्तक – एडविना और नेहरू लेखिका – कैथरीन क्लैमां अनुवाद – निर्मला जैन प्रकाशक – राजकमल पेपरबैक्स पहला संस्करण -2007
कोलकाता। राजस्थान ब्राह्मण संघ द्वारा गत 1 नवम्बर को संस्था के मुख्यालय सप्तर्षि भवन में संस्था के पूर्व अध्यक्ष मोहनलाल पारीक की अध्यक्षता में संगीतमय दीपावली प्रीति सम्मेलन मनाया गया।कार्यक्रम में उपस्थित कोलकाता नगर निगम की पार्षद मीना पुरोहित ने सभी सदस्यों को दीपावली त्यौहार की मंगलकामना देते हुए सभी से समाज के कार्यो में अग्रणी भूमिका अदा करने की अपील की।पार्षद विजय ओझा ने कहा हम सभी दीवाली त्यौहार की तरह जीवन में जगमगाते रहें।वरिष्ठ साहित्यकार बंशीधर शर्मा एवम वसुंधरा मिश्र ने स्वलिखित रचनाओं का वाचन कर सभी को एकता का संदेश दिया।सुप्रसिद्ध गायक सत्यनारायण तिवाड़ी एवम युवा गायक दीपक पारीक की अगुवाई में रेखा नारीवाल, संगीता नांगला,रेणु मिश्रा,सुलेखा शर्मा,संपत जोशी ने भी शानदार प्रस्तुति देकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।संस्था की अध्यक्ष दुर्गा व्यास का शुभकामना संदेश वाचन किया गया।सुशील ओझा,विष्णु शर्मा,महेंद्र पुरोहित,डॉ उषा आसोपा,विद्याधर चोटिया,वीरेंद्र शर्मा,शिवकिशन किराडू,श्यामसुंदर व्यास आदि की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही। संचालन राजकुमार व्यास ने किया।संस्था के उपमंत्री पवन शर्मा एवम सुशीला जोशी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।