
डॉ वसुंधरा मिश्र की सद्यप्रकाशित कथा काव्य संग्रह ‘नव दुर्गा नव रूप ‘ पठनीय कविताओं का संग्रह है। भारतीय संस्कृति में मां दुर्गा को स्त्री शक्तियों के प्रतीक के रूप में देखा गया है। जहां स्त्री भी पूज्य है। नवरात्र में नौ दिनों की पूजा वस्तुत: नौ शक्तियों की पूजा है। डॉ वसुंधरा मिश्र ने नौ शक्तियों पर अपनी कविताओं के माध्यम से संदेश दिया है कि स्त्री भी अपनी प्रतिभा से अपनी शक्ति को उद्घाटित कर सकती है।
नवरात्र नव शक्तियों के सायुज्य का पर्व है जिसकी एक-एक तिथि में एक-एक शक्ति प्रतिष्ठित रहती है।दुर्गा प्रकृति का ही रूप है।एक साधारण स्त्री सिद्धिदात्री मां क्यों नहीं बन सकती?ये पुरुष और स्त्री ऊर्जाओं शिव शक्ति के संतुलन और सामंजस्य की प्रतीक है। डॉ वसुंधरा मिश्र की सिद्धिदात्री पर कविता ‘प्रकृति रूप स्त्री’ में ये पंक्तियां साधारण स्त्री बहुत ही उद्वेलित करती हैं -नव शक्तियों का सायुज्य है दुर्गा/प्रकृति से उत्पन्न प्रकृति को समर्पित ‘
अवतरित होती ऊर्जा और तेज के संचार को जीवन का लक्ष्य बनाना होगा ।’अंध विकासवाद के नाम पर प्रकृति को संरक्षित करना होगा ‘(पृष्ठ61नव दुर्गा नव रूप)जो इस काव्य संग्रह की विशिष्टता है।
स्त्री को अपनी शक्ति का विस्तार करना होगा सभी सिद्धियां प्राप्त करने के लिए त्याग, समर्पण और शक्ति को अपनाना होगा। स्त्री ही भारत के खोए हुए आदर्श और संस्कारों को पुनर्जीवित कर सकती है। वह सिद्धिदात्री बन सकती है। वह स्त्री है, देवी रूप है ,प्रकृति रूप है । मां महागौरी के संबंध में डॉक्टर वसुंधरा मिश्र कहती हैं कि लौकिक जगत में रहने वालों को अपनी’ सुरक्षा स्वयं करनी होगी, भले ही इसके लिए प्रशासन को बदलना हो, लड़ना होगा /समाज और संस्कृति की निरंतर छटाई करनी होगी/ कबीर ने कहा था साधु बनना है तो थोथा को उड़ाना होगा/ युगानुररूप कदम उठाने होंगे/ पहल स्त्री को ही करनी होगी, वह महागौरी है ‘ (पृष्ठ 58)।
प्रकृति की गोद में बड़े-बड़े खतरों को झेलती प्राणों की आहुति देवी को भी देनी पड़ी ,भले ही आज की स्त्री के हाथों में शंख चक्र गदा नहीं है लेकिन वास्तविक जीवन की बुद्धि और चेतना से हासिल कर सकती है। ‘शैलपुत्री कहलाती हो भीतर ही रहती हो ‘में कहती हैं –‘चट्टानों को पिघला देती हो/ राक्षसों को सबक सिखाती हो/ सृष्टि की रचना हो /तुम शैलपुत्री कहलाती हो/ भीतर ही रहती हो।’
यह काव्य संग्रह एक शोध युक्त कविताओं के माध्यम से मां दुर्गा के नौ शक्तियों को समझने में सहायक है। अध्यात्म एवं विज्ञान से जुड़ा यह काव्य संग्रह वर्तमान स्थितियों में स्त्री का नवदुर्गा के रूप में स्थापित कर प्रेरक संदेश देता है ।
नारी की शक्तियों को जागृत करना इस छोटी- सी पुस्तक की बड़ी उपलब्धि है।
जमीन पर उतरना होगा /दुष्कर्म करने वालों का अतिक्रमण कर/ मां कालरात्रि की पहचान बन/ घर-घर को रौशन करने का संकल्प लेना होगा ‘(पृष्ठ52)।’कात्यायनी की तरह बनना होगा’कविता में कवयित्री कहती है -‘हर उम्र में प्रशिक्षण लेना/दैत्यों को ठिकाने लगाना होगा/ समाज की पुनर्स्थापना के लिए ठोस कदम उठाना होगा/ धर्म की इस पुण्य धरती को स्वर्ग बनाना होगा।'(पृष्ठ 47) स्कंदमाता के लिए वह कहती हैं -कहते हैं ,देर है अंधेर नहीं है/ विश्वास और आस्था पर यह धरती टिकी हुई है ‘(पृष्ठ 43)।
कुष्मांडा के विषय में स्त्रियों को ललकारती हैं – ‘किस दुर्गा की बात करें /लौकिक -अलौकिक के भंवर जाल में/ स्त्री को बिठा दिया मंदिर में /सृष्टि का संचालक बन /पुरुष बना सत्ता शासक /स्वयं फंस गई स्त्री जाति /पूजा अर्चन के जंगल में/मनुष्यता के मूल मंत्र भूल/ आडंबर में हुई लीन ‘(पृष्ठ 37-38)चंद्रघंटा के विषय में कहती हैं- द्वंदों और संघर्षों को तोड़ने वाली /जीतने वाली स्त्री एक अच्छी मां भी है /सत्य रज तम को नियंत्रित करती /स्त्री दैवीय शक्तियों का पुंज है,वही चंद्रघंटा है (पृष्ठ 34)।
शुभ सृजन प्रकाशन द्वारा 2026 में प्रकाशित इस काव्य संग्रह का आईएसबीएन नंबर 978-81-968088-4-6 है।




